class 11 history solutions | आधुनिकीकरण के रास्ते

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आधुनिकीकरण के रास्ते
            (PATHS TO MODERNISATION)
                  मुख्य बिंदु (Main Points)
• चीन एक विशाल महाद्वीपीय देश है। इसमें कई तरह के जलवायु क्षेत्र हैं। इसके विपरीत
जापान एक द्वीपशृंखला है । इसमें चार मुख्य द्वीप हैं-होंशू, क्यूंशृं, शिकोकू तथा होकाइदो।
• चीन का प्रमुख जातीय समूह ‘हाक’ तथा प्रमुख भाषा चीनी (पुतोंगहुआ) है।
• जापान के लोगों का मुख्य भोजन चावल है और मछली प्रोटीन का मुख्य स्रोत है
• 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान का एदो नगर संसार का सबसे अधिक जनसंख्या वाला
नगर बन गया । ओसाका और क्योतो भी बड़े शहरों के रूप में उभरे ।
•जापान अपने आयात किए गए माल का मूल्य सोने में चुकाता था । इसलिए जापान को
एक धनी देश समझा जाता था ।
•1867-68 ई. में जापान में शोगुन (तोकुगोवा वंश का) शासन समाप्त कर दिया गया।
•सम्राट् व्यवस्था से जापानी विद्वानों का अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से था जिसमें सम्राट्
नौकरशाही और सेना मिलकर सत्ता चलाते थे । नौकरशाही तथा सेना सम्राट् के प्रति
उत्तरदायी होती थी।
जापान में जनसंख्या के दबाव को कम करने के लिए सरकार ने प्रवास को बढ़ावा दिया।
• द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी नामक नगरों पर बम गिराए गए।
यह तर्क दिया गया कि युद्ध को जल्दी समाप्त करने के लिए बमों का प्रयोग आवश्यक
था। परंतु इससे जो भारी विनाश हुआ वह बिल्कुल अनुचित था ।
• अमेरीकी नियंत्रण के दौरान जापान का विसैन्यीकरण कर दिया गया ।
•चीन का घींग राजवंश पश्चिमी शक्तियों द्वारा पेश की गई चुनौतियों का सामना करने में
असफल रहा । (1839-42) में ब्रिटेन के साथ हुए पहले अफीम युद्ध ने इसे कमजोर बना दिया।
•चीन में 1911 में मंचू शासन के पतन के बाद गणराज्य की स्थापना हुई । इसकी घोषणा
1 जनवरी, 1912 ई. को की गई।
• कन्फ्यूशियसवाद की विचारधारा कन्फ्यूशियस (551-479 ई.पू.) और उनके अनुयायियों
की शिक्षा से विकसित की गई थी। इसका संबंध अच्छे व्यवहार, व्यावहारिक समझदारी
तथा उचित सामाजिक संबंधों से था ।
•सनयात सेन के तीन सिद्धांत थे-राष्ट्रवाद, गणतंत्र तथा समाजवाद ।
•चियांग काइशक (1857-1975) कुआमीनतांग के नेता थे। वह सनयात सेन की मृत्यु के
पश्चात् कुओमीनतांग के नेता बने ।
• लांग मार्च चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की यांग्सी तक 6000 मील की एक कठिन यात्रा थी।
• डॉ. सनयात सेन ने 1912 में तुंग-मेंग-हुई तथा कई अन्य दलों को मिलाकर चीन में एक
राष्ट्रीय दल की स्थापना की । यह दल कुओमितांग दल के नाम से जाना गया ।
•’पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना 1949 में हुई। यह नये लोकतंत्र के सिद्धांतों
पर आधारित थी।
•पीपुल्स कम्यून्स चीन के ग्रामीण क्षेत्रों में आरंभ किए गए। इनमें लोग सामूहिक रूप से
भूमि के स्वामी होते थे और मिल-जुल कर फसल उगाते थे ।
• बीजिंग के तियानमेन चौंक पर लोकतंत्र की मांग करने वाले छात्रों के प्रदर्शन का क्रूरतापूर्वक
दमन कर दिया गया।
• मेजी शिक्षा पद्धति में पढ़ाए जाने वाले विषयों का मुख्य लक्ष्य विद्यार्थियों को निष्ठावान
नागरिक बनाना था।
चीन के साम्यवादी दल तथा उसके समर्थकों ने परंपराओं को समाप्त करने का प्रयास किया।
उनका विचार था कि परंपराएं लोगों को गरीबी में जकड़े हुए हैं।
                        वस्तुनिष्ठ प्रश्न
              (Objective Questions)
1. कोमिंतांग (नेशनल पीपुल्स पार्टी) का संस्थापक कौन था ?
(क) सनयात-सेन
(ख) चियांग काई शेक
(ग) माओ जेदोंग
(घ) देंग जियोपिंग                                                         उत्तर-(क)
2. निम्नलिखित में कौन-सी समस्या कारखानों के मजदूरों की समस्या नहीं थी?
(क) काम करने के घंटे बहुत लम्बे थे।
(ख) शहर में कार बहुत चलती थी।
(ग) मजदूरों को कम वेतन मिलता था।
(घ) काम करने की परिस्थितियाँ खराब होती थीं।                 उत्तर-(ख)
3. चीन में पीकिंग विश्वविद्यालय कब स्थापित हुआ ?
(क) 1802
(ख) 1812
(ग) 1902
(घ) 2002                                              उत्तर-(ग)
4. कौंमिटर्न का अन्य नाम क्या है ?
(क) प्रथम अंतर्राष्ट्रीय
(ख) द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय
(ग) तृतीय अंतर्राष्ट्रीय
(घ) चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय                                    उत्तर-(ग)
5. लाँग मार्च (1934-35) के यात्रा की दूरी क्या थी?
(क) 3000 मील
(ख) 4000 मील
(ग) 5000 मील
(घ) 6000 मील                                               उत्तर-(घ)
6. पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना कब हुई?
(क) 1948
(ख) 1949
(ग) 1950
(घ) 1951                                         उत्तर-(ख)
7. पीपुल्स कम्यून्स क्या थे?
(क) जहाँ लोग एकत्र जमीन के मालिक थे और मिल-जुलकर फसल उगाते थे।
(ख) जहाँ एकत्र होकर लोग युद्ध करते थे।
(ग) जहाँ राजा के साथ मनोरंजन किया जाता था।
(घ) जहाँ सामन्तों की महत्वपूर्ण बैठकें होती थीं।                    उत्तर-(क)
(8) रेड गार्डस में कौन शामिल थे ?
(क) किसान और मजदूर
(ख) सामन्त
(ग) छात्र और सेना
(घ) गाँवों के लोग                                                उत्तर-(ग)
(9)कोमिंतांग पार्टी का निम्नलिखित में कौन-सा कार्य नहीं होता ?
(क) एक दमनकारी सरकार की स्थापना की।
(ख) सत्ता में स्थानीय आवादी को शामिल नहीं किया गया।
(ग) भूमि सुधार का कार्यक्रम चलाया।
(घ) बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगा दी।                    उत्तर-(घ)
10. ताइवान में मार्शल-लॉ कय हटाया गया ?
(क) 1687
(ख) 1787
(ग) 1887
(घ) 1987                                            उत्तर-(ग)
11. जापान के आधुनिकीकरण का एक दुष्परिणाम था ?
(क) सैनिकवाद
(ख) शैक्षणिक विकास
(ग) औद्योगिक विकास
(घ) सांस्कृतिक पतन                                 उत्तर-(क)
12. जापानी सैन्यबलों का सर्वोच्च कमांडर निम्न में से कौन है ?
(क) सम्राट
(ख) जनरल..
(ग) एडमिरल
(घ) ब्रिगेडियर                                            उत्तर-(क)
13. जापान में आधुनिक बैंकिंग संस्थाओं का प्रारंभ कब हुआ?
(क) 1772
(ख) 1815
(ग) 1852
(घ) 1872                                              उत्तर-(घ)
                         अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न
        (Very Short Answer Type Questions)
प्रश्न 1.19वीं शताब्दी के आरंभ में चीन और जापान की राजनीतिक स्थिति की तुलना
कीजिए।
उत्तर-19वीं शताब्दी के आरंभ में चीन का पूर्वी एशिया पर प्रभुत्व था । वहाँ छींग राजवंश
की सत्ता बहुत ही सुरक्षित जान पड़ती थी । दूसरी ओर जापान एक छोटा-सा देश था जो
अलग-थलग जान पड़ता था।
प्रश्न 2. चीन और जापान के भौतिक भूगोल में कोई दो अंतर बताइए।
उत्तर-(1)चीन एक विशाल महाद्वीपीय देश है। इसमें कई तरह के जलवायु क्षेत्र हैं।
इसके विपरीत जापान एक द्वीपशृंखला है। इसमें चार मुख्य द्वीप हैं । होश, क्यूशू, शिकोकू तथा
होकाइदो।
(ii) चीन भूकंप क्षेत्र में नहीं आता, जबकि जापान बहुत ही सक्रिय भूकंप क्षेत्र में आता है।
प्रश्न 3. चीन के प्रमुख जातीय समूह तथा प्रमुख भाषा का नाम बताएँ। यहाँ की अन्य
राष्ट्रीयताएंँ कौन सी हैं?
उत्तर–चीन का प्रमुख जातीय समूह ‘हान’ तथा प्रमुख भाषा चीनी (पुतोंगहुआ) है। यहाँ
की अन्य राष्ट्रीयताएँ हैं-उइघुर, हुई, मांचू तथा तिब्बती ।
प्रश्न 4. जापान की जनसंख्या में कौन-कौन लोग शामिल हैं ?
उत्तर-जापान की अधिकतर जनसंख्या जापानी है । इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ आयनू
अल्पसंख्यक तथा कुछ कोरिया के लोग भी रहते हैं । कोरिया के लोगों को यहाँ उस समय मजदूर
के रूप में लाया गया था जब कोरिया जापान का उपनिवेश था ।
प्रश्न 5. जापान के लोगों के भोजन की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-जापान के लोगों का मुख्य भोजन चावल है और मछली प्रोटीन का मुख्य स्रोत है।
यहाँ कच्ची मलली साशिमी या सूशी बहुत ही लोकप्रिय है क्योंकि इसे बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक
माना जाता है।
प्रश्न 6. 16वीं शताब्दी के अंतिम चरण में जापान में भविष्य के राजनीतिक विकास
की भूमिका तैयार करने में किन परिवर्तनों का योगदान था ?
उत्तर-(i) किसानों से शस्त्र ले लिए गए । अब केवल समुराई ही तलवार रख सकते
थे। इससे शांति और व्यवस्था बनी रही।
(ii) दैम्यो को अपने क्षेत्रों की राजधानी में रहने के आदेश दिए गए। उन्हें काफी सीमा
तक स्वायत्तता प्रदान की गई।
(iii) मालिकों और करदाताओं का निर्धारण करने के लिए भूमि का सर्वेक्षण किया गया
और भूमि का वर्गीकरण उत्पादकता के आधार पर किया गया । इसका उद्देश्य राजस्व के लिए
स्थायी आधार बनाना था।
प्रश्न 7. 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान में होने वाले नगरों के विस्तार की
विशेषताएँ बताओ।
उत्तर-(i) 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान का एदो नगर संसार का सबसे अधिक
जनसंख्या वाला नगर बन गया ।
(ii) ओसाका और क्योतो भी बड़े शहरों के रूप में उभरे ।
(iii) दुर्गों वाले कम-से-कम 6 शहर ऐसे थे जहाँ की जनसंख्या 50,000 से अधिक थी।
इसकी तुलना में अधिकतर यूरोपीय देशों में केवल एक-एक ही बड़ा शहर था।
प्रश्न 8. जापानी लोग (16वीं शताब्दी के अंतिम चरण में) छपाई कैसे करते थे?
उत्तर–जापानी लोगों को यूरोपीय छपाई पसंद नहीं थी। वे लकड़ी के ब्लाकों से छपाई
करते । पुस्तकों की लोकप्रियता से पता चलता है कि पुस्तकों की छपाई व्यापक स्तर पर की
जाती थी।
प्रश्न 9. 16वीं तथा 17वीं शताब्दी में जापान को एक धनी देश क्यों समझा जाता था?
उत्तर-जापान चीन से रेशम जैसी विलास की वस्तुएँ तथा भारत से कपड़े का आयात
करता था । जापान इसका मूल्य सोने में चुकाता था। इसी कारण जापान को एक धनी देश समझा
जाता था।
प्रश्न 10. जापान द्वारा अपने आयातों का मूल्य सोने में चुकाने से देश की अर्थव्यवस्था
पर पड़े बोझ को कम करने के लिए उठाए गए कोई दो पग बताइए।
उत्तर-(i) बहुमूल्य धातुओं के निर्यात पर रोक लगा दी गई।
(ii) निशिजिन (क्योतो) में रेशम उद्योग का विकास किया गया, ताकि रेशम का आयात
न करना पड़े। शीघ्र ही यह उद्योग संसार का सबसे बड़ा उद्योग बन गए।
प्रश्न 11. कॉमोडोर पेरी (अमेरिका) जापान कब आया? उसके प्रयलों से अमेरिका
तथा जापान के बीच हुई संधि की कोई दो शर्ते बताएँ।
उत्तर-कॉमोडोर पेरी 1853 ई. में जापान आया। उसके प्रयलों से अमेरिका तथा जापान
के बीच हुई संधि के अनुसार-
(i) जापान के दो बंदरगाह अमेरिकी जहाजों के लिए खोल दिए गए।
(ii) अमेरिका को जापान में थोड़ा-बहुत व्यापार करने की छूट भी मिल गई।
इस घटना को ‘जापान का खुलना’ भी कहते हैं।
प्रश्न 12. निशिजिन (क्योतो) में रेशम उद्योग के विकास के कोई तीन पहलू बताइए।
उत्तर-(i) 1713 से यहाँ केवल देशी रेशमी धागा प्रयोग किया जाने लगा जिससे इस
उद्योग को और अधिक प्रोत्साहन मिला ।
(ii) निशिजिन में केवल विशिष्ट प्रकार के महंगे उत्पाद बनाये जाते थे।
(iii) 1859 ई. में देश का व्यापार आरंभ होने पर रेशम जापान की अर्थव्यवस्था के लिए
मुनाफे का प्रमुख स्रोत बन गया ।
प्रान 13. मेजी पुनर्स्थापना से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-1867-68 ई. में जापान में शोगुन (तोकुगोवा वंशका) शासन समाप्त कर दिया
गया और उसके स्थान पर नये अधिकारी तथा सलाहकार सामने आये। ये लोग जापानी सम्राट्
के नाम पर शासन चलाते थे। इस प्रकार देश में सम्राट् फिर से सर्वेसर्वा बन गया । उसने मेजी
को उपाधि धारण की । जापान के इतिहास में इस घटना को मेजी पुनर्स्थापना कहा जाता है।
प्रश्न 13(1), जापान में मेजी शासन के अधीन ‘फुकोकु क्योहे’ के नारे से क्या तात्पर्य था?
उत्तर-फुकोकु क्योहे के नारे से तात्पर्य था-समृद्ध देश, मजबूत सेना । वास्तव में सरकार
ने यह जान लिया था कि उसे अपनी अर्थव्यवस्था का विकास तथा मजबूत सेना का निर्माण करने
को आवश्यकता है, वरना उन्हें भी भारत की तरह दास बना लिया जाएगा । इसीलिए फुकोकु
क्योहे का नारा दिया गया ।
प्रश्न 14. ‘सम्राट् व्यवस्था’ से जापानी विद्वानों का क्या अभिप्राय था?
उत्तर-सम्राट व्यवस्था से जापानी विद्वानों का अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से था जिसमें सम्राट्
नौकरशाही और सेना मिलकर सत्ता चलाते थे। नौकरशाही तथा सेना सम्राट् के प्रति उत्तरदायी
होती थी।
प्रश्न 15. जापान में नयी विद्यालय व्यवस्था क्या थी? इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर-1870 के दशक से जापान में नयी विद्यालय व्यवस्था अपनाई गई । इसके अनुसार
सभी लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल जाना अनिवार्य कर दिया गया। पढ़ाई की फीस बहुत कम
थी। परिणाम यह हुआ कि 1910 तक ऐसी स्थिति आ गई कि कोई भी बच्चा स्कूल जाने से
वंचित नहीं रहा।
प्रश्न 16. मेजी शासन के अधीन किए गए कोई दो सैनिक परिवर्तन बताएँ ।
उत्तर-मेजी शासन के अधीन निम्नलिखित सैनिक परिवर्तन हुए-
(i) 20 साल से अधिक आयु वाले प्रत्येक नवयुवक के लिए एक निश्चित समय के लिए
सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी गई।
(ii) एक आधुनिक सैन्य बल तैयार किया गया ।
प्रश्न 17. जापान में लोकतांत्रिक संविधान और आधुनिक सेना के दो अलग आदर्शों
को महत्व देने के क्या परिणाम निकले?
उत्तर-(i) जापान आधिक रूप से विकास करता रहा।
(ii) सेना ने साम्राज्य विस्तार के लिए दृढ़ विदेश नीति अपनाने के लिए दबाव डाला ।
इस कारण चीन और रूस के साथ युद्ध हुए जिनमें जापान विजयी रहा। शीघ्र ही उसने अपना
एक औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर लिया।
प्रश्न 18.1902 की आंग्ल-जापान संधि पर ब्रिटेन ने हस्ताक्षर क्यों किए ? जापान
के लिए इस संधि का क्या महत्त्व था?
उत्तर-1902 को आंग्ल-जापान संधि पर ब्रिटेन ने इसलिए हस्ताक्षर किए क्योंकि वह चीन
में रूसी प्रभाव को रोकना चाहता था । जापान के लिए इस संधि का यह महत्व था कि इसके
अनुसार उसे विश्व के अन्य उपनिवेशवादियों के बराबर का दर्जा मिल गया ।
प्रश्न 19. मेजी युग में अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण के लिए उठाए गए कोई तीन
कदम बताइए।
उत्तर-(i) कृषि पर कर लगाकर धन एकत्रित किया गया ।
(i) 1870-1872 में तोक्यो (Tokyo) और योकोहामा बंदरगाह के बीच जापान की
पहली रेल लाइन बिछाई गई।
(i) वस्र उद्दोग के विकास के लिए यूरोप से मशीने आयात की गई।
मान 20. जापान में 1920 के बाद जनसंख्या के दबाव को कम करने के लिए क्या
कदम उठाए गाए ?
उत्तर-जापान में जनसंख्या के दबाव को कम करने के लिए सरकार ने प्रवास को बढ़ावा
दिया । पहले लोगों को उत्तरी द्वीप होकायदो की और भेजा गया। यह काफी हद तक एक स्वतंत्र
प्रदेश था और वहाँ आयनू कहे जाने वाले लोग रहते थे । इसके बाद उन्हें हवाई, ब्राजील और
जापान के बढ़ते हुए औपनिवेशिक साम्राज्य की ओर भेजा गया ।
प्रश्न 21. जापान के एक आधुनिक समाज में रूपांतरण की झलक दैनिक जीवन
में कैसे दिखाई दी?
अथवा, जापान के विकास के साथ-साथ यहाँ की रोजमर्रा की जिंदगी में किस तरह,
बदलाव आए ? चर्चा कीजिए।                                                           (T.B.D.)
उत्तर-जापान में पहले पैतृक परिवार व्यवस्था प्रचलित थी जिसमें कई पीढ़ियों परिवार के
मुखिया के नियंत्रण में रहती थी। परंतु जैसे-जैसे लोग समृद्ध हुए पृथक परिवार प्रणाली अथवा
नयी घर व्यवस्था अस्तित्व में आई । इसमें पति-पत्नी साथ रहकर कमाते थे और घर बसाते थे।
बिजली से चलने वाले नए घरेलू उत्पादों तथा नए पारिवारिक मनोरंजनों की मांग भी बढ़ने लगी।
प्रश्न 22. द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के किन दो नगरों पर परमाणु बम गिराए गए
और क्यों ? क्या यमों का प्रयोग उचित था ?
उत्तर-द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी नामक नगरों पर बम
गिराए गए । यह तर्क दिया गया कि युद्ध को जल्दी समाप्त करने के लिए बों का प्रयोग
आवश्यक था । परंतु इससे जो भारी विनाश हुआ वह बिल्कुल अनुचित था ।
प्रश्न 23. जापान पर अमेरिकी नियंत्रण (1945-47) का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-(i) अमेरिकी नियंत्रण के दौरान जापान का विसैन्यीकरण क दिया गया ।
(ii) एक नया संविधान लागू हुआ। इसके अनुच्छेद 9 की ‘युद्ध न करने की’ तथाकथित
धारा के अनुसार जापान युद्ध को अपनी राष्ट्रीय नीति नहीं बना सकता।
प्रश्न 23. क्या पड़ोसियों के साथ जापान के युद्ध और उसके पर्यावरण का विनाश
तीव्र औद्योगीकरण की जापानी नीति के चलते हुआ?                         (T.B.Q.)
उत्तर-यह बात सत्य है कि जापान के तीव्र औद्योगीकरण के कारण ही जापान ने पर्यावरण
के विनाश तथा युद्धों को जन्म दिया ।
(i) उद्योगों के अनियंत्रित विकास से लकड़ी तथा अन्य संसाधनों की मांग बढ़ी। इसका
पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ा।
(i) कच्चा माल प्राप्त करने तथा तैयार माल की खपत के लिए जापान को उपनिवेशों
की आवश्यकता पड़ी । इसके कारण जापान को पड़ोसियों के साथ युद्ध करने पड़े ।
प्रश्न 24. पश्चिमी ताकतों द्वारा पेश की गई चुनौतियों का सामना छींग (क्विंग)
राजवंश ने कैसे किया ?                                                      (T.B.Q.)
उत्तर–चीन का छींग राजवंश पश्चिमी शक्तियों द्वारा पेश की गई चुनौतियों का सामना
करने में असफल रहा। (1839-42) में ब्रिटेन के साथ हुए पहले अफीम युद्ध ने इसे कमजोर
बना दिया । देश में सुधारों एवं परिवर्तन की मांग उठने लगी। छींग राजवंश इसमें भी असफल
रहा और देश गृहयुद्ध की लपेट में आ गया।
प्रश्न 25. दो क्विंग (छींग) सुधारकों के नाम बताइए । उनके द्वारा चीनी व्यवस्था
को सुदृढ़ बनाने के लिए किए गए कार्यों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर-कांग यूवेई और लियांग किचाउ दो प्रसिद्ध क्विंग छींग सुधारक थे।
(i) उन्होंने एक आधुनिक प्रशासकीय व्यवस्था, नयी सेना और शिक्षा व्यवस्था के निर्माण
के लिए नीतियों बनाई।
(ii) संवैधानिक सरकार की स्थापना के लिए स्थानीय विधानपालिकाओं का गठन किया
गया । उन्होंने चीन को उपनिवेशीकरण से बचाने पर भी विचार किया।
प्रश्न 26.20वीं शताब्दी के पहले दशक (1901-10) में चीनी विचारकों ने भारत
की आलोचना करते हुए क्या विचार व्यक्त किए ?
उत्तर उन्होंने लिखा कि भारत एक ऐसा देश है जो किसी अन्य देश द्वारा नहीं, बल्कि
एक कंपनी ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के हाथों बर्बाद हो गया । उन्होंने ब्रिटेन की सेवा करने तथा अपने
ही लोगों के प्रति क्रूर होने के लिए भी भारतीयों की आलोचना की।
प्रश्न 27. 1870-1914 ई. तक चीन की स्थिति एक अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश जैसी थी।
स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-1870 से 1914 तक चीन साम्राज्यवाद का शिकार हो चुका था । इस देश पर किसी
साम्राज्यवादी देश का शासन तो नहीं था, परंतु यह विश्व की लगभग सभी साम्राज्यवादी शक्तियों
के प्रभाव क्षेत्रों में बंट चुका था। इस प्रकार चीन की स्थिति, एक अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश जैसी
हो गई।
प्रश्न 28. अफीम युद्धों के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर–अफीम युद्ध चीन में अफीम के ‘अवैध व्यापार के कारण हुए । अंग्रेज व्यापारी
भारी मात्रा में चीन अफीम ले जाते थे। इस प्रकार चीनी लोग पूरी तरह अफीम खाने के आदी
हो गए जिससे उनका शारीरिक और नैतिक पतन हुआ। इस व्यापार के कारण ही चीन को अंग्रेजों
के विरुद्ध लड़ना पड़ा।
प्रश्न 29. चीन में बॉक्सर विद्रोह कब हुआ? इसका क्या महत्व था ?
उत्तर–चीन में बॉक्सर विद्रोह 1889-90 ई. में हुआ । इस विद्रोह को अंग्रेजी, फ्रांँसीसी,
जापानी, जर्मन तथा अमेरिकी सेनाओं ने मिलकर दबाया । इस विद्रोह के कारण चीन विभाजित
होने से बच गया।
प्रश्न 30. चीन में गणराज्य की स्थापना का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर–चीन में 1911 में मंचू शासन के पतन के बाद गणराज्य की स्थापना हुई। इसकी
घोषणा 1 जनवरी, 1912 ई. को की गई।
नानकिंग को इसकी राजधानी बनाया गया । डॉ० सनयात सेन इस गणराज्य के राष्ट्रपति बने।
प्रश्न 31. चीन में आगे की ओर बड़ी छलांग (Great Leap Forward 1958-59)
से क्या अभिप्राय है।
उत्तर-आगे की ओर बड़ी छलांग से अभिप्राय चीन द्वारा आश्चर्यजनक उन्नति करने का
प्रस्ताव था, परंतु चीनी नेता इसमें विफल रहे । इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे-
(i) चीन में कम्यूनों की स्थापना की गई और लोगों को इसमें शामिल होने के लिए बाध्य
किया गया । (ii) कृषि उत्पादन में गिरावट आई । (iii) मूल्यवान् साधन बर्बाद किए गए।
इन सबके परिणामस्वरूप 1960-62 के दौरान देश में गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। आगे की
ओर छलांग चीन को आगे ले जाने की बजाय पीछे ले गई।
प्रश्न 32. चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति क्या थी?
उत्तर-सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति (Cultural Revolution) चीन में आरंभ की गई।
चीन आर्थिक क्षेत्र में बढ़ी छलांग लगाने में विफल रहा था। चीन के नेता यह दिखाना चाहते
थे कि विफलता के लिए माओ-जंडांग तथा अन्य नेता जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि अन्य लोग जिम्मेदार
या। अत: क्रांति के नाम पर मनमाने ढंग से निषि व्यक्तियों पर झूठे आरोप लगाए गए और
उन्हें बंदी बनाया गया । परिणामस्वरूप पूरे देश में अव्यवस्था फैल गई और सारी अर्थव्यवस्था
छिन्न-भिन्न हो गई।
प्रश्न 33. चीन में प्रचलित कंफ्यूशियसवाद की विचारधारा क्या थी?
उत्तर-कंफ्यूशियसवाद को विचारधारा कंफ्यूशियस (551-479 ई.पू.) और इनके
अनुयायियों की शिक्षा से विकसित की गई थी। इसका संबंध अच्छे व्यवहार, व्यावहारिक
समझदारी तथा उचित सामाजिक संबंधों से था। इस विचारधारा ने सामाजिक मानक स्थापित
किए और चीनी राजनीतिक सोंच तथा संगठनों को ठोस आधार प्रदान किया।
प्रश्न 34. 1905 ई. में चीन में प्रचलित परीक्षा प्रणाली को समाप्त क्यों कर दिया गया?
उत्तर–चीन में प्रचलित परीक्षा प्रणाली में केवल साहित्यिक कौशल को ही मांग होती है।
यह क्लासिक चीनी सीखने की कला पर ही आधारित थी जिसको आधुनिक विश्व में कोई
प्रासंगिकता नजर नहीं आती थी। दूसरे, यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास में भी बाधक थी।
इसलिए 1905 ई. में इस परीक्षा प्रणाली को समाप्त कर दिया गया।
प्रश्न 35. सनयात सेन के तीन सिद्धांत क्या थे?                 (T.B.Q)
उत्तर-सनयात सेन के तीन सिद्धांत (सन मिन चुई) निम्नलिखित थे-
(i) राष्ट्रवाद-इसका अर्थ था मांचू राजवंश को सत्ता से हटाना, क्योंकि उसे विदेशी
राजवंश माना जाता था।
(ii) गणतंत्र-देश में गणतांत्रिक सरकार की स्थापना करना ।
(iii) समाजवाद-पूंजी का नियमन करना तथा भूमि के स्वामित्व में बराबरी लाना ।
प्रश्न 36. चियांग काइ शेक कौन थे? उन्होंने महिलाओं को कौन-से चार सदगुण
अपनाने के लिए प्रेरित किया ?
उत्तर-चियांग काइ शेक (1887-1975) कुओमीनतांग के नेता थे । वह सनयात सेन की
मृत्यु के पश्चात् कुओमीनतांग के नेता बने । उन्होंने महिलाओं को ये चार सद्गुण अपनाने के
लिए प्रेरित किया-सतीत्व, रंगरूप, वाणी और काम ।
प्रश्न 37. चीनी गणराज्य में महिला मजदूरों (शहरी) की क्या समस्याएं धीं ?
उत्तर-(i) महिला मजदूरों को बहुत कम वेतन मिलता था।
(ii) काम करने के घंटे बहुत लंबे थे।
(iii) काम करने की परिस्थितियाँ बहुत खराब थीं।
प्रश्न 38. देश (चीन) को एकीकृत करने के प्रयासों के बावजूद कुओमीनतांग
असफल रहा। क्यों?
उत्तर-(i) कुओमीनतांग का सामाजिक आधार संकीर्ण था और राजनीतिक दृष्टिकोण
सीमित था।
(ii) सनयात सेन के कार्यक्रम में शामिल पूंजी के नियमन और भूमि-अधिकारों में समानता
को लागू न किया जा सका।
(iii) पार्टी ने किसानों की अनदेशी की और लोगों की समस्याओं को ओर कोई ध्यान
न दिया ।
प्रश्न 39. 1945-49 के दौरान ग्राणीम चीन में कौन-से दो मुख्य संकट थे?
उत्तर-(i) पर्यावरण संबंधी संकट-इसमें बंजर भूमि, वनों का विनाश तथा बाढ़ शामिल थे।
(ii) सामाजिक आर्थिक संकट-यह संकट विनाशकारी भूमि-प्रथा, ऋण, प्राचीन
प्रौद्योगिकी तथा निम्न स्तरीय संचार के कारण था।
प्रश्न 40. 1930 ई. में माओत्सेतुंग ने किस बात का सर्वेक्षण किया ? इसका क्या
उद्देश्य था?
उत्तर-1930 ई. में माओत्सेतुंग ने जुनवू में एक सर्वेक्षण किया । इसमें नमक तथा
सोयाबीन जैसी दैनिक उपयोग की वस्तुओं, स्थानीय संगठनों की तुलनात्मक मजबूतियों, धार्मिक
संगठनों की मजबूतियों, दस्तकारों, लोहारों तथा वेश्याओं आदि का सर्वेक्षण किया । इसका उद्देश्य
शोषण के स्तर की जानकारी प्राप्त करना था।
प्रश्न 41. लाँग मार्च (1934-35) क्या था ? इसका क्या परिणाम निकला ?
उत्तर–लाँग मार्च चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की शांग्सी तक 6000 मील की एक कठिन
यात्रा थी । इस यात्रा के बाद येनान पार्टी का नया अड्डा बन गया । यहाँ माओत्सेसुंग ने
वारलॉर्डिज्म को समाप्त करने, भूमि सुधारं लागू करने और विदेशी साम्राज्यवाद से लड़ने के
कार्यक्रम को आगे बढ़ाया । इसमें उन्हें मजबूत सामाजिक आधार मिला ।
प्रश्न 42. चीन के लिए 4 मई का आंदोलन क्यों महत्वपूर्ण था ?
उत्तर-4 मई का आंदोलन 1919 में पीकिंग में हुआ। इस आंदोलन में छात्रों की सक्रिय
भूमिका थी। इसके परिणामस्वरूप चीन में साम्यवादी दल की स्थापना का मार्ग खुला और चीन
के छात्रों और श्रमिकों में जागृति की भावनाएं उत्पन्न हुई ।
प्रश्न 43. कुओमितांग दल की स्थापना के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-डॉ. सनयात सेन ने 1912 में तुंग-हुई तथा कई अन्य दलों को मिलाकर चीन में
एक राष्ट्रीय दल की स्थापना की। यह दल कुओमिनतांग दल के नाम से जाना गया । इसी दल
1920 में दक्षिणी चीन में कैंटन सरकार की स्थापना की।
प्रश्न 44. 1911 की चीनी क्रांति के दो कारण बताएँ ।
उत्तर-(i) मंचू सरकार अप्रिय हो रही थी और जनता का रोष उसके प्रति बढ़ रहा था।
(ii) मंचू सरकार की रेल नीति 1911 की क्रांति का तात्कालिक कारण बनी। रेल नीति
को केंद्र के अधीन करने से अनेक समस्याएं उत्पन्न हुई और अंततः इसी ने 1911 की क्रांति को
भड़काया।
प्रश्न 45. 1911 की चीनी क्रांति के दो परिणाम बताएँ।
उत्तर-(i) 1911 की चीनी क्रांति के परिणामस्वरूप चीन में मंचू राजवंश का शासन
समाप्त हो गया ।
(ii) चीन की जनता को नवीन संविधान प्राप्त हुआ और चीनी गणतंत्र की स्थापना हुई।
प्रश्न 46. 1949 की चीनी क्रांति के क्या कारण थे?
उत्तर-(i) साम्यवादियों ने गैंसी में साम्यवादी शासन का गठन कर लिया था। यह
समाजवादी राज्य पूरे चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना करना चाहता था।
(ii) चीन में गृह-युद्ध छिड़ गया, परंतु साम्यवादी और राष्ट्रीय सरकार किसी साँझे
संविधान पर राजी न हुए।
प्रश्न 47. चीन में साम्यवादी राज्य का आरंभ कब और कैसे हुआ?
उत्तर-अक्टूबर, 1949 में साम्यवादियों ने राष्ट्रीय सरकार की राजधानी कैंटन पर अधिकार
कर लिया। च्यांग-काई-शेक भागकर फारमूसा चला गया। पहली अक्टूबर, 1949 को
साम्यवादियों ने चीन की राष्ट्रीय सरकार की घोषणा की और पीकिंग को चीन की राजधानी बना दिया।
प्रश्न 48. कमोडोर पैरी की जापान यात्रा के बारे में दो तथ्य लिखो।
काम अमेरिका की सरकार का संदेश जापान की सरकार तक पहुँचाना था। (ii) वह युद्ध करके
उत्तर-(i) पैरी मिशन 1853 में अमेरिका के राष्ट्रपति फिलमोर ने जापान भेजा था। उसका
भी जापान से अपना उद्देश्य पूरा कर सकता था।
प्रश्न 49. कमोडोर पैरी के दो मुख्य उद्देश्य क्या थे ?
उत्तर-(i) यदि कोई अमेरिकन जहाज जापान के समुद्र तट पर टूट जाए, तो उसके.
नाविकों और यात्रियों को जापान में आश्रय दिया जाए।
(ii) अमेरिकन जहाजों को यह अनुमति हो कि वे जापान के बंदरगाहों से कोयला, जल
खाद्य सामग्री आदि ले सकें।
प्रश्न 50. कंगावा की संधि किन दो देशों के बीच हुई ? इसकी दो शर्ते कौन-सी थीं?
उत्तर-कंगावा की संधि जापान आर अमारका म हान वाली पहली संधि थी।
दो शर्ते-(i) विदेशी जहाजों को जापान के कुछ बंदरगाहों से कोयला भरने तथा खाद्यान्न
एवं जल लेने का अधिकार होगा।
(ii) अमेरिका के किसी जहाज के टूटने पर उसके नाविकों और यात्रियों के साथ परम
मित्रता का व्यवहार किया जाएगा।
प्रश्न 51. पश्चिमी देशों से संधियाँ करने से जापान पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-(i) पश्चिमी देशों के संपर्क में आकर जापान ने उनके ज्ञान को अपनाया और
पचास वर्षों के भीतर ही उनके समान सबल हो गया ।
(ii) विदेशी संपर्क के कारण तोकुगावा वंश के शोगुनों का प्रभाव समाप्त हुआ और देश
में जापानी सम्राट् ने फिर से शक्ति पकड़ ली।
प्रश्न 52. जापान में मेजियों की पुनर्स्थापना के लिए उत्तरदायी कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर-1867-1868 में मेजी वंश के नेतृत्व में तोकुगावा वंश के शासन को समाप्त कर
दिया गया । मेजियों की पुनर्स्थापना के पीछे कई कारण थे-
(i) देश में विभिन्न क्षेत्रों में असंतोष व्याप्त था ।
(ii) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तथा कूटनीतिक संबंधों की मांग की जा रह थी।
प्रश्न 53. मेजी युग में जापान ने कृषि क्षेत्र में क्या प्रगति की?
उत्तर-(i) कृषक कृषि करने वाली भूमि के स्वामी बन गए।
(ii) जापान ने पश्चिमी देशों से कृषि विशेषज्ञों की सेवाएं प्राप्त की और कृषि क्रांति के
बीज बोए ।
प्रश्न 54. मेजी युग के दो महत्वपूर्ण कार्य लिखें।
उत्तर-(i) जापान में संयुक्त राज्य अमेरिका की पद्धति पर एक राष्ट्रीय बैंक की स्थापना
की गई। इस बैंक को नोट छापने का अधिकार दिया गया ।
(ii) जापान में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। छ: साल के बच्चों के लिए शिक्षा
अनिवार्य कर दी गई।
प्रश्न 55. रूस-जापान युद्ध की दो विशेष बातें बताएँ।
उत्तर-(i) रूस-जापान युद्ध 1904-05 में हुआ था।
(ii) इसमें छोटे से देश जापान ने रूस को पराजित किया ।
प्रश्न 56. ‘सर्वहारा की तानाशाही’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-‘सर्वहारा की तानाशाही’ की अवधारणा कार्ल मार्क्स की देन है। इसमें इस बात
पर बल दिया गया था कि धनी वर्ग की दमनकारी सरकार का स्थान श्रमिक वर्ग की क्रांतिकारी
सरकार लेगी । यह लोकतंत्र वर्तमान अर्थ में अधिनायकतंत्र नहीं होगा।
प्रश्न 57. ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना कब हुई ? यह सरकार रूस
की साम्यवादी सरकार से किस प्रकार भिन्न थी ?
उत्तर–’पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना 1949 में हुई। यह नये लोकतंत्र के
सिद्धांतों पर आधारित थी जो सभी सामाजिक वर्गों का गठबंधन था । इसके विपरीत रूस की
साम्यवादी सरकार का आधार ‘सर्वहारा की तानाशाही’ था।
प्रश्न 58. चीन के पीपुल्स कम्यूंस क्या थे ?
उत्तर-पीपुल्स कम्यूंस चीन के ग्रामीण क्षेत्रों में आरंभ किए गए। इनमें लोग सामूहिक
रूप से भूमि के स्वामी होते थे और मिल-जुलकर फसल उगाते थे। 1958 तक देश में 26,000
ऐसे समुदाय थे।
प्रश्न 59. सांस्कृतिक क्रांति का चीन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-(i) सांस्कृतिक क्रांति से देश में अव्यवस्था फैल गई जिससे पार्टी कमजोर हुई।
(ii) अर्थव्यवस्था तथा शिक्षा के प्रसार में भी बाधा पड़ी।
प्रश्न 60. 1978 में चीन में आधुनिकीकरण के लिए किस चार सूत्री लक्ष्य की घोषणा
की गई?
उत्तर-इस चार सूत्री लक्ष्य में ये चार बातें शामिल थीं-विज्ञान, उद्योग, कृषि तथा रक्षा
का विकास।
प्रश्न 61. चीन में 4 मई के आंदोलन की 70वीं वर्षगांठ (1989 में) पर घटित घटना
की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-(i) इस अवसर पर अनेक बुद्धिजीवियों ने अधिक खुलेपन की माँग की और कड़े
सिद्धांतों को समाप्त करने के लिए आवाज उठाई।
(ii) बीजिंग के तियानमेन चौक पर लोकतंत्र की मांग करने वाले छात्रों के प्रदर्शन का
क्रूरतापूर्वक दमन कर दिया गया ।
प्रश्न 62. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज ताइवान की क्या स्थिति है ?
उत्तर-आज राजनयिक स्तर पर अधिकांश देशों के व्यापार मिशन केवल ताइवान में ही
हैं। परंतु ये ताइवान में अपने दूतावास स्थापित नहीं कर सकते और न ही वहाँ की सरकार के
साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर सकते हैं। इसका कारण यह है कि ताइवान को आज भी चीन
का अंग माना जाता है।
प्रश्न 63. मेजी शिक्षा पद्धति में पढ़ाए जाने वाले नये विषयों का क्या लक्ष्य था ?
उत्तर—मेजी शिक्षा पद्धति में पढ़ाए जाने वाले विषयों का मुख्य लक्ष्य विद्यार्थियों को
निष्ठावान् नागरिक बनाना था । नैतिक शास्त्र में सम्राट् के प्रति वफादारी पर बल दिया जाता था।
प्रश्न 64. चीन के साम्यवादी दल और उसके समर्थकों ने परंपरा को समाप्त करने
का प्रयास क्यों किया?
उत्तर–चीन के साम्यवादी दल तथा उसके समर्थकों ने निम्नलिखित कारणों से परंपरा को
समाप्त करने का प्रयास किया-
(i) उनका विचार था कि परंपरा लोगों को गरीबी में जकड़े हुए है।
(ii) उनका मानना था कि परंपरा महिलाओं को उनकी स्वतंत्रता से वंचित रखती है और
देश के विकास में बाधा डालती है।
                        लघु उत्तरात्मक प्रश्न
         (Short Answer Type Questions)
प्रल 1. चीन के भौतिक भूगोल, प्रमुख जातीय समूहों तथा भाषाओं का संक्षिप्त वर्णन
कीजिए।
उत्तर-भौतिक भूगोल-चीन एक विशालकाय महाद्वीपीय देश है। इसमें कई प्रकार की
जलवायु वाले क्षेत्र शामिल हैं। इसके मुख्य क्षेत्र में प्रमुख नदियाँ हैं-पीली नदी अथवा हुआंग
हो, संसार की तीसरी सबसे लंबी नदी यांगत्सी और पर्ल नदी। देश का बहुत बड़ा भाग पहाड़ी है।
जातीय समूह तथा भाषाएँ-चीन का सबसे प्रमुख जातीय समूह हान है और यहाँ की प्रमुख
भाषा है-चीनी । हान के अतिरिक्त चीन में कई अन्य राष्ट्रीयताएँ भी हैं। जैसे उइघुर,हुई, मांचू
और तिब्बती । इसी प्रकार कई अन्य भाषाएँ भी बोली जाती हैं जैसे-कैंटनीज कैंटन (गुआंगजाओ)
को बोली-उए और शंघाईनीज (शंघाई की बोली-वू)
प्रश्न 2. चीनी भोजनों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर–चीनी भोजनों में क्षेत्रीय विविधता पायी जाती है । इनमें मुख्य रूप से चार प्रकार
के भोजन शामिल हैं।
(i) सबसे प्रसिद्ध पाक प्रणाली दक्षिणी या कॅटोनी है। यह कैंटन तथा उसके आंतरिक
क्षेत्रों की पाक प्रणाली है। इसकी प्रसिद्धि इस बात के कारण है कि विदेशों में रहने वाले अधिकतर
चीनी कैंटन प्रांत से संबोधत हैं । डिम सम (शाब्दिक अर्थ दिल को छूना) यहीं का जाना माना
खाना है । यह गुंथे हुए आटे को सब्जी आदि भरकर उबाल कर बनाया गया व्यंजन है
(ii) उत्तर में गेहूं मुख्य आहार है।
(iii) शेचुओं में प्राचीन काल में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा लाए गए मसाले और रेशम मार्ग द्वारा
पंद्रहवीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा लाई गई मिर्च के कारण झालदार और तीखा खाना
मिलता है।
(iv) पूर्वी चीन में चावल और गेहूँ दोनों खाए जाते हैं।
प्रश्न 3. जापान की भौतिक विशेषताओं की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-जापान की मुख्य भौतिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(i) जापान एक द्वीप शृंखला है। इनमें से चार सबसे बड़े द्वीप हैं-होंशू, क्यूश, शिकोकू
और होकाइदो । सबसे दक्षिण में ओकिनावा द्वीपों की शृंखला है। मुख्य द्वीपों की 50 प्रतिशत
से अधिक भूमि पहाड़ी है।
(ii) जापान बहुत ही सक्रिय भूकंप क्षेत्र में आता है।
(iii) जापान की भौगोलिक परिस्थितियों ने वहाँ की वास्तुकला को प्रभावित किया है।
(iv) देश की अधिकतर जनसंख्या जापानी है । परंतु यहाँ कुछ आयनू अल्पसंख्यक और
कुछ कोरिया के लोग भी रहते हैं । कोरिया के लोगों को यहाँ श्रमिकों के रूप में उस समय लाया
गया था जब कोरिया जापान का उपनिवेश था।
(v) जापान में पशु नहीं पाले जाते हैं।
(vi) चावल यहाँ की मुख्य खाद्य फसल है और मछली प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। यहाँ
की कच्ची मछली साशिमी अथवा सूशी अब संसार भर में लोकप्रिय है क्योंकि इसे बहुत ही
स्वास्थ्यवर्द्धक माना जाता है।
प्रश्न 4. जापान पर तोकुगावा वंश के शोगुनों ने कब से कब तक शासन किया ?
वे अपना शासन किस प्रकार चलाते थे ?
उत्तर-जापान पर क्योतो में रहने वाले सम्राट का शासन हुआ करता था। परंतु बारहवीं
शताब्दी तक वास्तविक सत्ता शोगुनों के हाथ में आ गई । वे सैद्धांतिक रूप से राजा के नाम पर
शासन करते थे। 1603 से 1867 तक तोकुगावा परिवार के लोग शोगुन पद पर आसीन थे।
देश 250 भागों में विभाजित था जिनका शासन दम्यों लार्ड चलाते थे। शोगुन दैयो पर नियंत्रण
रखते थे। उन्होंने दम्यो को लंबे समय तक राजधानी एदो (आधुनिक तोक्यो) में रहने का आदेश
दिया, ताकि वे उनके लिए कोई खतरा न बन जाएँ । शोगुन प्रमुख शहरों और खदानों पर भी
नियंत्रण रखते थे । जापान का योद्धा वर्ग सामुराई ( शासन करने वाला) अभिजात था । वे शोगुन
तथा दैम्यो की सेवा में थे।
प्रश्न 5. जापान में नगरों का आकार कैसे बढ़ा ? इसका क्या महत्व था?
उत्तर-जापान में दैम्यो की राजधानियों का आकार लगातार बढ़ने लगा। 17वीं शताब्दी
के मध्य तक जापान में एदो (आधुनिक तोक्यो) संसार का सबसे अधिक जनसंख्या वाला नगर
बन गया । इसके अतिरिक्त ओसाका और क्योतो भी बड़े शहरों के रूप में उभरे । दुर्गों वाले
कम-से-कम छः शहर ऐसे थे जहाँ की जनसंख्या 50,000 से भी अधिक थी । इसकी तुलना
में उस समय के अधिकतर यूरोपीय देशों में केवल एक-एक ही बड़ा शहर था ।
महत्व-(i) बड़े शहरों के परिणामस्वरूप जापान की वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था का विकास
हुआ और वित्त एवं ऋण की प्रणालियाँ स्थापित हुईं।
(ii) व्यक्ति के गुण उसके पद से अधिक मूल्यवान समझे जाने लगे।
(iii) शहरों में जीवंत संस्कृति का प्रसार होने लगा ।
(iv) बढ़ते हुए व्यापारी वर्ग ने नाटकों और कलाओं को संरक्षण प्रदान किया।
(v) लोगों को पढ़ने में रुचि ने होनहार लेखकों को अपने लेखन द्वारा अपनी जीविका चलाने
में सहायता पहुंचाई।
प्रश्न 6. ताकुगावा शासन के अधीन जापान की अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तनों की
विवेचना कीजिए।
उत्तर-ताकुगावा शासन के अधीन जापान को एक धनी देश समझा जाता था। इसका
कारण यह था कि वह चीन से रेशम जैसी विलासी वस्तुएँ, भारत से कपड़े का आयात करता
था । इन आयातों का मूल्य चाँदी और सोने में चुकाया जाता था। इसका देश की अर्थव्यवस्था
पर अत्यधिक भार पड़ा । अतः ताकुगावा ने मूल्यवान् धातुओं के निर्यात पर रोक लगा दी। उन्होंने
क्योतो में निशिजिन में रेशम उद्योग के विकास के लिए भी पग उठाये ताकि रेशम का आयात
कम किया जा सके । निशिजिन का रेशम विश्व भर में सबसे अच्छा रेशम माना जाने लगा। मुद्रा
के बढ़ते हुए प्रयोग और चावल के शेयर बाजार के निर्माण से पता चलता है कि अर्थतंत्र नयी
दिशाओं में विकसित हो रहा था ।
प्रश्न 7. जापान में कॉमोडोर पेरी के आगमन और इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-1853 में अमेरिका ने कॉमोडोर मैथ्यू पेरी को जापान भेजा । उसने जापान सरकार
से एक समझौते पर हस्ताक्षर करने की मांग की । इसके अनुसार जापान को अमेरिका के साथ
राजनयिक और व्यापारिक संबंध बनाने थे। इस समझौते पर जापान ने अगले वर्ष हस्ताक्षर किए।
वास्तव में जापान चीन के रास्ते में पड़ता था और अमेरिका के लिए चीन का विस्तृत बाजार बहुत
ही महत्व रखता था । इसके अतिरिक्त अमेरिका को प्रशांत महासागर में अपने बेड़ों के लिए
ईंधन लेने के लिए स्थान चाहिए था। उस समय केवल एक ही पश्चिमी देश जापान के साथ
व्यापार करता था और वह था-हालैंड।
महत्व-पेरी के आगमन ने जापान की राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। सम्राट का
अचानक ही महत्व बढ़ गया। इससे पहले तक उसे बहुत ही कम राजनैतिक अधिकार प्राप्त थे।
1868 में एक आंदोलन द्वारा शोगुन को जबरदस्ती सत्ता से हटा दिया गया और सम्राट मेजी को
एदो में लाया गया । एदो को राजधानी बना दिया गया। इसका नया नाम तोक्यो रखा गया जिसका
अर्थ है पूर्वी राजधानी ।
प्रश्न 8. जापान को बाहरी संसार के लिए खोलने के पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क
दिए गए?
उत्तर-जापान के अधिकारीगण और लोग यह जानते थे कि कुछ यूरोपीय देश भारत तथा
कई अन्य स्थानों पर औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर रहे हैं। अंग्रेजों के हाथों चीन की पराजय
के समाचार फैल रहे थे और इन्हें लोकप्रिय नाटकों में भी दर्शाया जा रहा था। इससे लोगों में
यह भय उत्पन्न हो गया कि बाहरी दुनिया के साथ संपर्क से जापान को भी उपनिवेश बनाया
जा सकता है। फिर भी देश के बहुत से विद्वान और नेता यूरोप के नए विचारों तथा तकनीकों
से सीख लेना चाहते थे, जबकि कुछ अन्य विद्वान यूरोपीय लोगों को अपने से दूर रखना चाहते
थे। कुछ लोगों ने देश को बाहरी संसार के लिए धीरे-धीरे और सीमित रूप से खोलने के लिए
तर्क दिया । अत: जापानी सरकार ने फुकोकु क्योहे (समृद्ध देश, मजबूत सेना) के नारे के साथ
नयी नीति की घोषणा की। उन्होंने यह समझ लिया कि उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था का विकास
और मजबूत सेना का निर्माण करने की आवश्यकता है, अन्यथा उन्हें भी भारत की तरह दास
बना दिया जाएगा । इस कार्य के लिए जनता में राष्ट्रीय भावना का विकास करने और प्रजा को
नागरिक की श्रेणी में लाने की आवश्यकता थी।
प्रश्न 9. जापान में ‘सम्राट व्यवस्था’ का पुनर्निर्माण किस प्रकार हुआ?
उत्तर-जापान में मेजी सरकार ने ‘सम्राट-व्यवस्था’ के पुनर्निर्माण का काम शुरू किया।
सम्राट् व्यवस्था से जापानी विद्वानों का अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से था जिसमें सम्राट् नौकरशाही
और सेना मिलकर सत्ता चलाते थे और नौकरशाही तथा सेना सम्राट् के प्रति उत्तरदायी होती थी।
राजतांत्रिक व्यवस्था की पूरी जानकारी के लिए कुछ अधिकारियों को यूरोप भेजा गया । सम्राट
को सीधे-सीधे सूर्य देवी का वंशज माना गया । वह पश्चिमी ढंग के सैनिक वस्त्र पहनने लगा।
उसके नाम से आधुनिक संस्थाएं स्थापित करने के लिए अधिनियम बनाए जाने लगे। 1890 की
शिक्षा संबंधी राजाज्ञा ने लोगों को पढ़ने तथा जनता के सार्वजनिक एवं साँझे हितों को बढ़ावा
देने के लिए प्रेरित किया।
प्रश्न 10. जापान में 1870 के दशक में अपनाई गई नयी विद्यालय-व्यवस्था पर
टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-1870 के दशक से जापान में नयी विद्यालय-व्यवस्था अपनाई गई। इसके अनुसार
सभी लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल जाना अनिवार्य कर दिया गया । 1910 तक ऐसी स्थिति
आ गई कि कोई भी बच्चा स्कूल जाने से वंचित नहीं रहा । पढ़ाई की फीस बहुत कम थी।
आरंभ में पाठ्यक्रम पश्चिमी नमूनों पर आधारित था। परंतु बाद में आधुनिक विचारों पर बल
देने के साथ-साथ राज्य के प्रति निष्ठा और जापानी इतिहास के अध्ययन पर बल दिया जाने लगा।
पाठ्यक्रम किताबों के चयन तथा शिक्षकों के प्रशिक्षण पर शिक्षा मंत्रालय नियंत्रण रखता था।
नैतिक संस्कृति का विषय पढ़ना प्रत्येक के लिए जरूरी था । पुस्तकों में माता-पता के प्रति आदर,
राष्ट्र के प्रति बफादारी और अच्छा नागरिक बनने की प्रेरणा विकसित की जाती थी।
प्रश्न 11. राष्ट्र के एकीकरण के लिए जापान की मेजी सरकार ने क्या पग उठाए?
उत्तर-राष्ट्र के एकीकरण के लिए मेजी सरकार ने पुराने गाँवों और क्षेत्रीय सीमाओं को
बदल कर एक नया प्रशासनिक ढांचा तैयार किया । प्रत्येक प्रशासनिक इकाई के पास पर्याप्त
राजस्व होना जरूरी था ताकि स्थानीय स्कूल तथा स्वास्थ्य सुविधाएँ जारी रखी जा सकें । साथ
ही ये इकाइयाँ सेना के लिए भर्ती केन्द्रों के रूप में भी कार्य कर सकें। 20 साल से अधिक
आयु वाले प्रत्येक नवयुवक के लिए एक निश्चित अवधि के लिए सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी
गई। एक आधुनिक सैन्य बल तैयार किया गया । राजनीतिक दलों के गठन को नियंत्रित करने
के लिए एक कानून-प्रणाली स्थापित की गई । सेंसर व्यवस्था को भी कठोर बनाया जाना था।
ऐसे परिवर्तनों के कारण सरकार को विरोध का सामना करना पड़ा । सेना और नौकरशाही को
सीधा सम्राट् के अधीन रखा गया। इसका उद्देश्य यह था कि संविधान बनने के बाद भी सेना
और मौकरशाही सरकारी नियंत्रण से बाहर रहे।
प्रश्न 12. जापान की लिपियों की मुख्य विशेषताएं बताइए।
उत्तर-जापानियों ने अपनी लिपि छठी शताब्दी में चीनियों से ली थी। परंतु जापानी भाषा
चीनी भाषा से बहुत अलग है। इसलिए उन्होंने दो ध्वन्यात्मक वर्णमालाओं का विकास भी
किया-हीरागाना और कताकाना । हीरागाना नारी सुलभ समझी जाती है क्योंकि हेआन काल में
बहुत-सी लेखिकाएंँ इसका प्रयोग करती थीं। यह चीनी चित्रात्मक चिन्हों और ध्वन्यात्मक अक्षरों
को मिलाकर लिखी जाती है । शब्द का प्रमुख भाग चीनी लिपि कांजी के चिन्ह से लिया जाता
है और शेष भाग हीरागाना से ।
ध्वन्यात्मक अक्षरमाला द्वारा ज्ञान को पूरे समाज में फैलाने में सहायता मिली। 1880 के
दशक में यह सुझाव दिया गया कि जापानी या तो पूरी तरह से ध्वन्यात्मक लिपि का विकास
करें या कोई यूरोपीय भाषा अपना लें। परंतु दोनों में से कुछ भी नहीं किया जा सका।
प्रश्न 13. 1889 में जापान को जो नया संविधान मिला, उसकी कोई चार विशेषताएं बताएँ।
उत्तर-1889 में जापान को जो नया संविधान मिला, उसकी चार मुख्य विशेषताओं का
वर्णन इस प्रकार है-
(i) सम्राट् कार्यकारिणी का प्रधान था। उसकी स्थिति काफी महत्वपूर्ण थी। सभी मन्त्रियों
की नियुक्ति सम्राट् ही करता था और वे सम्राट् के प्रति उत्तरदायी होते थे। लोगों का विश्वास
था कि सम्राट् पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है और वह दैवी-गुणों से संपन्नं है। इसलिए उसका
सम्मान किया जाना चाहिए ।
(ii) संविधान में एक संसद् का प्रावधान था जिसे डाएट (राजा की सभा) कहते थे।
डाएट की शक्तियाँ काफी सीमित थीं । सेना के अधिकार इतने अधिक थे कि धीरे-धीरे डाएट
पर सेना का प्रभुत्व स्थापित हो गया ।
(iii) मताधिकार बहुत अधिक सीमित था । यह अधिकार देश की तीन प्रतिशत से भी
कम जनता को प्राप्त था।
(iv) राजसत्ता पर कुलीनतंत्र का नियंत्रण बढ़ाने के लिए पुलिस को व्यापक अधिकार
दिए गए । प्रेस को नियंत्रित करने, जनसभाओं पर रोक लगाने तथा प्रदर्शनों को रोकने के लिए
पुलिस को विशेष शक्तियाँ प्राप्त थीं।
प्रश्न 14. प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व कोई दो घटनाओं को बताइए जिन्होंने जापान का
एक साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में अभ्युदय किया । कोई दो देश बताइए जिनके साथ
जापान का इस काल में टकराव हुआ।
उत्तर-1853 में अमेरिका का जल सेनानायक पैरी जापान के एक बंदरगाह पर पहुंचा।
उसने जापान में अनेक सुविधाएँ प्राप्त को, परंतु जापान अन्य एशियाई देशों की तुलना
भाग्यशाली निकला । वहाँ मेजो शासन के बाद सैनिक तथा औद्योगिक उन्नति हुई । अतः जापान
भी यूरोप के साम्राज्यवादी देशों की भांति मंडियों को खोज में लग गया ।
(i) जापान के निकट चीन था और चीन उसके लिए अच्छी मंडी सिद्ध हो सकता था।
दोनों देश 1894 में कोरिया के प्रश्न पर एक-दूसरे से युद्ध कर चुके थे। इसके बाद जापान का
श्रीन में प्रभाव काफी बढ़ गया था।
(ii) 1902 में इंग्लैंड तथा जापान का समझौता हुआ । इसके अनुसार जापान को अन्य
यूरोपियन शक्तियों के समान दर्जा मिल गया।
(iii) 1904 में उसने रूस को पराजित किया। इसके परिणामस्वरूप उसे सखालिन का
दक्षिणी भाग प्राप्त हुआ। जापान के लियोनतुंग प्रायद्वीप पर भी उसका अधिकार हो गया। उसने
पोर्ट आर्थर पट्टे पर ले ली।
(iv) 1910 में कोरिया जापान का उपनिवेश बन गया । 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के
समय जापान एक महाशक्ति बन चुका था।अतः जापान की आकांक्षाएँ भी हर साम्राज्यवादी
देश की भांति आर्थिक तथा राजनीति सत्ता प्राप्त करने की थी।
टकराव-जापान का प्रथम विश्व-युद्ध से पूर्व चीन तथा रूस से टकराव हुआ ।
प्रश्न 15. जापान की उपनिवेशवादी (साम्राज्यवादी) नीति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-जापान 1890 के दशक में औपनिवेशिक होड़ में सक्रिय हुआ । उसका पहला
निशाना चीन था । वह चीन में अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करके पूर्वी एशिया पर अपना प्रभुत्व
स्थापित करना चाहता था। बाद में उसने समस्त एशिया तथा प्रशांत महासागर क्षेत्र में अपनी
श्रेष्ठता स्थापित करना अपना लक्ष्य बना लिया । 1895 ई. में उसने चीन से युद्ध किया और उसे
परास्त करके फारमोसा को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया। यह प्रदेश पहले चीन का भाग
था। 1905 ई. में कोरिया को जापान का संरक्षित राज्य बना दिया गया और इसके पाँच वर्ष
बाद कोरिया का जापान में विलय हो गया । कोरिया भी पहले चीन के अंतर्गत था। इससे पूर्व
1899 ई में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोपीय देशों ने जापान को महाशक्ति के रूप में स्वीकार
कर लिया था। 1902 ई. में आंग्ल-जापान संधि हुई । इसके अनुसार जापान को अन्य
उपनिवेशवादियों के बराबर का स्थान दिया गया। 1904-1905 में रूस-जापान युद्ध में जापान
विजयी रहा । परिणामस्वरूप मंचूरिया के दक्षिणी भाग को जापान का प्रभाव क्षेत्र मान लिया गया।
इसके अतिरिक्त सखालिन द्वीप का आधा भाग तथा लियोनतुंग प्रायद्वीप भी उसके नियंत्रण में आ
गए । इस प्रकार जापान ने एक बहुत बड़े औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना कर ली।
प्रश्न 16. फुफुजावा यूकिची कौन थे ? उनकी सफलताओं तथा विचारों का संक्षिप्त
वर्णन कीजिए।
उत्तर-फुफुजावा यूकिची (1835-1901) का जन्म एक निर्धन सामुराई परिवार में हुआ
था । इनकी शिक्षा नागासाकी और ओसाका में हुई । उन्होंने डच और पश्चिमी विज्ञान पढ़ा और
बाद में अंग्रेजो भी सीखी। 1860 में वह अमरीका में पहले जापानी दूतावास में अनुवादक के
रूप में गए । इससे इन्हें पश्चिम पर पुस्तक लिखने के लिए पर्याप्त सामग्री मिली । उन्होंने अपने
विचार क्लासिकी में नहीं बल्कि बोल-चाल की भाषा में लिखे। यह पुस्तक बहुत ही लोकप्रिय
हुई। उन्होंने एक शिक्षा संस्थान स्थापित किया जो आज केओ विश्वविद्यालय के नाम से जाना
जाता है। वह मैरोकुश संस्था के मुख्य सदस्यों में से थे । यह संस्था पश्चिमी शिक्षा का प्रचार
करती थी।
अपनी एक पुस्तक ‘ज्ञान को प्रोत्साहन’ में उन्होंने जापानी ज्ञान की कड़ी आलोचना की।
उन्होंने लिखा ‘जापान के पास प्राकृतिक दृश्यों के अतिरिक्त गर्व करने के लिए कुछ भी नहीं है’
इनका सिद्धांत था, “स्वर्ग ने इंसान को इंसान के ऊपर नहीं बनाया न ही इंसान को इंसान के
नीचे।”
प्रश्न 17. जापान में सत्ता केंद्रित राष्ट्रवाद के क्या परिणाम निकले?
उत्तर-1930-40 में जापान में सत्ता कोद्रत राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिला । इस अवधि में
जापान ने साम्राज्य विस्तार के लिए चीन और एशिया के अन्य भागों में युद्ध किए । जापान द्वारा
अमरीका के पलं हार्वर पर आक्रमण, दूसरे विश्व युद्ध का भाग बन गया । इसी आक्रमण के
परिणामस्वरूप अमरीका द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल हो गया ।
इस दौर में जापान में सामाजिक नियंत्रण में वृद्धि हुई । असहमति प्रकट करने वालों पर
अत्याचार किए गए और उन्हें जेल भेजा गया । देशभक्तों की ऐसी संस्थाएं बनीं जो युद्ध का
समर्थन करती थीं। इनमें महिलाओं के भी कई संगठन शामिल थे। 1943 में एक संगोष्ठी हुई
‘आधुनिकता पर विजय’ का आयोजन हुआ। इसमें इस विषय पर विचार किया गया कि आधुनिक
रहते हुए पश्चिम पर कैसे विजय पाई जारा दर्शनशास्त्री निशितानी केजी ने ‘आधुनिक’ को तीन
पश्चिमी धाराओं के मिलन और एकता से परिभाषित किया-पुनर्जागरण, प्रोटेस्टेंट सुधार और
प्राकृतिक विज्ञानों का विकास । उन्होंने कहा कि जापान की ‘नैतिक ऊर्जा’ ने उसे एक उपनिवेश
बनने से बचा लिया। अब जापान को एक नई विश्व पद्धति अर्थात् एक विशाल पूर्वी एशिया का
निर्माण करना चाहिए।
प्रश्न 18. चीन के आधुनिक इतिहास से संबंधित विषयों के बारे में तीन अलग-अलग
विचारधाराएं कौन-सी थीं?
उत्तर–चीन के आधुनिक इतिहास का संबंध संप्रभुत्ता की पुनः प्राप्ति, विदेशी नियंत्रण से
हुए अपमान से मुक्ति तथा समानता एवं विकास को संभव बनाने से है । इस संबंध में तीन
अलग-अलग विचारधाराएँ थीं-
(i) कांग योवेल (1858-1927) तथा लियांग किचाउ (1873-1929) जैसे सुधारक
पश्चिम की चुनौतियों का सामना करने के लिए पारंपरिक विचारों को नए ढंग से प्रयोग करने
के पक्ष में थे।
(ii) चीनी गणतंत्र के पहले राष्ट्राध्यक्ष सन-यात-सेन जैसे गणतांत्रिक क्रांतिकारी जापान
और पश्चिम के विचारों से प्रभावित थे ।
(iii) चीन की कम्युनिस्ट पार्टी युगों-युगों की असमानताओं को समाप्त करना और देश
से विदेशियों को खदेड़ना चाहती थी।
प्रश्न 19. चीन में साम्राज्यवादी प्रभुत्व का आरंभ कौन-से प्रसिद्ध युद्धों से हुआ?
इन युद्धों के दो कारण तथा दो परिणाम बताएंँ।
उत्तर–चीन में साम्राज्यवादी प्रभुत्व का आरंभ ‘अफीम के युद्धों’ से हुआ।
कारण-(i) अंग्रेज व्यापारी चीन में बड़े पैमाने पर चोरी-चोरी अफीम ला रहे थे जिससे
चीनियों का शारीरिक एवं नैतिक पतन हो रहा था ।
(ii) 1839 ई. में चीन के एक सरकारी अफसर ने जहाजों पर लदी अफीम को पकड़
लिया और उसे नष्ट कर दिया । अतः ब्रिटेन ने चीन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
परिणाम-(i) इन युद्धों में चीन की पराजय हुई । चीनियों को हर्जाने के रूप में अत्यधिक
धनराशि देनी पड़ी । उन्हें अपने पाँच बंदरगाहों में व्यापार का अधिकार भी अंग्रेजों को देना पड़ा।
.(ii) चीनी सरकार को इस बात के लिए सहमत होना पड़ा कि इन बंदरगाहों में यदि कोई
अंग्रेज अपराध करेगा तो उस पर मुकद्मा चीन की नहीं बल्कि इंग्लैंड की अदालतों में चलाया
जाएगा।
प्रश्न 20. उन्नीसवीं शताब्दी में साम्राज्यवादियों ने चीन में अपना प्रभुत्व किस प्रकार
स्थापित किया ?
अथवा, ‘चीनी खरबूजे का काटा जाना’ उक्ति की व्याख्या कीजिए।
अथवा, चीन पर साम्राज्यवाद के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-ब्रिटेन के विरुद्ध अफीम युद्धों में चीन पराजित हुआ था। परिणामस्वरूप उसे
हांग-कांग का प्रदेश अंग्रेजों को देना पड़ा और अपने पाँच बंदरगाह अंग्रेज व्यापारियों के लिए
खोलने पड़े। शीघ्र ही फ्रांस ने भी ऐसी असमान संधियाँ चीन पर लाद दी और उससे अनेक
सुविधाएं प्राप्त कर ली। तत्पश्चात् चीन तथा जापान के बीच युद्ध हुआ जिसमें जापान विजयी
रहा। इसके परिणामस्वरूप चीन ने फारमोसा तथा कुछ अन्य द्वीप जापान को सौंप दिए । चीन
पर 15 करोड़ डालर का हर्जाना भी डाला गया । चीन को यह राशि फ्रांस, रूस, ब्रिटेन तथा
जर्मनी ने ऋण के रूप में दी और बदले में चीन को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में बाँट लिया। संयुक्त
राज्य अमेरिका भी पीछे न रहा । उसने ‘मुझे भी’ की नीति द्वारा चीन में पश्चिमी देशों के बराबर
की सुविधाएँ प्राप्त कर ली । इस प्रकार चीन पूरी तरह से भिन्न-भिन्न देशों के प्रभाव क्षेत्रों में
बँट गया । इसी प्रक्रिया को ‘चीनी खरबूजे का काटा जाना’ कहते हैं ।
प्रश्न 21. ‘खुले द्वार’ अथवा ‘मुझे भी’ नीति से क्या अभिप्राय था ? ब्रिटेन ने इस
नीति का समर्थन क्यों किया?
उत्तर-‘खुले द्वार’ अथवा ‘मुझे भी’ नीति का सुझाव संयुक्त राज्य अमेरिका ने दिया था।
इस नीति का अर्थ यह था कि सभी देशों को चीन के प्रत्येक भाग में व्यापार करने के समान
अवसर मिलने चाहिए । अमेरिका ने यह सुझाव इसलिए दिया था, क्योंकि उसे भय था कि अन्य
देश चीन में पूर्ण रूप से अपने प्रभाव क्षेत्र स्थापित कर लेंगे और उसे वहाँ व्यापार करने का कोई
अवसर नहीं मिलेगा। ब्रिटेन ने भी इस नीति का समर्थन किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि
जापान और रूस चीन को हड़प जाएँ । दूसरे, संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह वह भी चीन में
अपनी सेनाएँ आसानी से भेज सकता था।
प्रश्न 22. संयुक्त राज्य अमेरिका ने ‘खुले द्वार की नीति’ (Open Door Policy)
क्यों और कैसे अपनाई?
उत्तर अमेरिका ने खुले द्वार की नीति चीन के संबंध में अपनाई । 1890 के दशक में
यूरोपीय शक्तियाँ चीन को आपस में विभाजित कर लेने की योजना बना रही थीं । अमेरिका को
इस बात का भय था कि कहीं उसे अलग-थलग न कर दिया जाए । वह चाहता था कि यूरोपीय
शक्तियों की भांति उसे भी चीन में सुविधाएँ प्राप्त हों । इसलिए उसने एक नई नीति की घोषणा
की जो इतिहास में ‘खुले द्वार की नीति’ के नाम से विख्यात है। इसका अर्थ था कि चीन के
मामले में किसी भी देश के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा, उन क्षेत्रों के संबंध में भी नहीं जिन्हें
यूरोपीय देश अपना प्रभाव क्षेत्र बताते हैं। परिणामस्वरूप यूरोपीय देशों की भांति अमेरिका ने भी
संधि द्वारा चीन से सुविधाएँ प्राप्त की। कुछ समय पश्चात् चीन में विदेशी शक्तियों के बढ़ते
हुए प्रभाव के विरुद्ध बॉक्सर विद्रोह हुआ । इस विद्रोह को दबाने में अमरीकी सेनाओं ने भी यूरोपीय
सेनाओं का पूरा साथ दिया।
प्रश्न 23. प्रथम आंग्ल-चीन युद्ध अथवा अफीम युद्ध के क्या कारण थे ?
उत्तर-प्रथम आंग्ल-चीन युद्ध अथवा अफीम युद्ध के अनेक कारण थे-
(i) अंग्रेज व्यापारी चीन के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करना चाहते थे। परंतु चीनी
शासक विदेशियों को असभ्य समझते थे और उनके साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहते थे। (ii)
चीनी सरकार ने देश में चोरी छिपे अफीम का व्यापार करने वाले व्यापारियों को कैंटन से बाहर
निकल जाने का आदेश दिया । इससे चीन और इंग्लैंड के बीच तनाव पैदा हुआ । (iii) ब्रिटेन
और चीन के बीच इस बात का भी झगड़ा था कि कैंटन के अंग्रेज निक पी कानून की दृष्टि से
चीन की बजाय इंग्लैंड के अधीन थे । (iv) अंग्रेज व्यापारी इस बात से चढ़े हुए थे कि चीनी
व्यापारियों पर उनका जो ऋण बकाया था, उसे वे दे नहीं पा रहे थे । अतः इंग्लैंड की सरकार
के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह अंग्रेज व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए चीन में हस्तक्षेप
करे । (v) अंग्रेज व्यापारियों ने अपनी सरकार पर दबाव डाला कि वह शक्ति प्रदर्शन अथवा
युद्ध द्वारा चीनी सरकार को इस बात के लिए विवश करे कि वह अफीम व्यापार पर रोक न लगाए।
इसी बीच अंग्रेज तथा चीनी नाविकों की एक झड़प में एक चीनी नाविक मारा गया ।
परिणामस्वरूप चीनी सरकार अंगेज व्यापारियों के प्रति कठोर नीति अपनाने लगी। मामला गंभीर
होता गया । आखिर इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पामटन ने चीन के विरुद्ध युद्ध के आदेश जारी कर दिए।
प्रश्न 24. प्रथम अफीम युद्ध के क्या परिणाम निकले ?
उत्तर-प्रथम अफीम युद्ध के परिणाम चीन के लिए बड़े हानिकारक सिद्ध हुए। इस युद्ध
के परिणामों का वर्णन इस प्रकार है-
(i) इस युद्ध के परिणामस्वरूप चीन का आर्थिक शोषण होना आरंभ हो गया। अब अंग्रेज
चीन में बिना किसी रोक-टोक के अफीम का व्यापार करने लगे। इससे चीन पर आर्थिक दबाव
काफी बढ़ गया । (ii) नानकिंग की संधि के कारण चीन के सम्मान को भारी ठेस पहुंची। इसके
साथ ही चीन को सैनिक शक्ति का महत्व भी घट गया । अतः अब वे विदेशी शक्तियांँ चीन
पर दबाव डालकर सुविधाएं प्राप्त करने का प्रयत्ल करने लगी । (iii) प्रथम अफीम युद्ध के
पश्चात् चीन को विशेषाधिकार के सिद्धांत को विवश होकर स्वीकार करना पड़ा । चीन ने इस
बात को स्वीकार कर लिया कि वह अपराध करने वाले विदेशियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं
करेगा। इसके परिणामस्वरूप चीन की सर्वोच्चता का अंत हो गया । (iv) चीन ने काफी लंबे
समय से अपने व्यापार के लिए बंद द्वार की नीति अपना रखी थी । विदेशी व्यापारियों को कैंटन
के अतिरिक्त कहीं और व्यापारिक केंद्र स्थापित करने की आज्ञा नहीं थी । परंतु प्रथम अफीम युद्ध
के परिणामस्वरूप चीन सरकार को खुले द्वार की नीति अपनाने के लिए विवश होना पड़ा। (v)
कुछ ही समय पश्चात् यूरोपीय देशों ने चीन में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना आरंभ कर दिया।
इसके परिणामस्वरूप साम्राज्यवादी युग आरंभ हो गया और चीन अपनी स्वाधीनता खोने लगा।
प्रश्न 25. 1911 ई. की चीनी क्रांति के कारणों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-कारण-1911 ई. की क्रांति का एक महत्वपूर्ण कारण उसकी बढ़ती हुई जनसंख्या
थी। इससे भोजन की समस्या गंभीर होती जा रही थी। इसके अतिरिक्त 1910-1911 ई.की
भयंकर बाढ़ों के कारण लाखों लोगों को जानें गई तथा देश में भुखमरी फैल गई। इससे लोगों
में असंतोष बढ़ गया जिसके परिणामस्वरूप विद्रोह की आग भड़क उठी । क्रांति का दूसरा कारण
‘प्रवासी चीनियों का योगदान’ था। विदेशों में रहने वाले चीनी लोग काफी धनी हो गए थे
वे चीन में सत्ता परिवर्तन के पक्ष में थे। अत: उन्होंने क्रांतिकारी संस्थाओं की खूब सहायता की।
मंचू सरकार के नए कर भी क्रांति लाने में सहायक सिद्ध हुए । इन करों के लगने से चीन के
लोगों में क्रांति की भावनाएं भड़क उठीं । जापान की उन्नति भी चीनी क्रांति एक कारण था।
चीन के लोग मंचू सरकार को समाप्त करके जापान की भाति उन्नति करना चाहते थे। चीन में
यातायात के साधनों का सुधार होने के कारण चीनी क्रांति के विचारों के प्रसार को काफी बल
मिला । अतः यह भी क्रांति का एक अन्य कारण था।
प्रश्न 26. 1911 की चीनी क्रांति के परिणामों तथा महत्व की चर्चा कीजिए।
उत्तर-1911 ई. की क्रांति के दो मुख्य परिणाम निकले- मंचू राजवंश का अंत तथा
गणतंत्र की स्थापना । परंतु इ क्रांति का महत्व इन्हीं दो बातों तक ही सीमित नहीं था । वास्तव
में यह क्रांति गणतंत्र व राजांत्र पर विजय थी। इसकी एक विशेष बात यह थी कि वह विजय
बिना किसी रक्तपात व प्राप्त की गई थी। इसके अतिरिक्त चीन की जनता को एक संविधान प्राप्त
हुआ और देश में जा की संप्रभुत्ता की घोषणा की गई । इस क्रांति की एक और विशेष बात
यह रही कि क्रांतिक रेयों ने सम्राट के प्रतिनिधि युआन शिकाई को ही चीनी गणतंत्र के राष्ट्रपति
के रूप में स्वीकार कर लिया । इसके अतिरिक्त विदेशी शक्तियाँ भी इस क्रांति के प्रति पूर्णतया
तटस्थ (Neutral) रहीं । देश में 1911 की क्रांति ने राष्ट्रीय भावना का संचार किया । सबसे
महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसने चीनियों को शोषण से मुक्ति दिलाई और उनके सम्मान को
बढ़ाया।
प्रश्न 27. आधुनिक चीन का संस्थापक किसे माना जाता है ? उनका तथा उनके
सिद्धांतों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर-सन-यात-सेन (1866-1925) को आधुनिक चीन का संस्थापक माना जाता है।
वह एक गरीब परिवार से थे । उन्होंने मिशन स्कूलों में शिक्षा ग्रहण की जहाँ उनका परिचय
लोकतंत्र और ईसाई धर्म से हुआ । उन्होंने डाक्टरी की पढ़ाई की । परंतु वह चीन के भविष्य
को लेकर चिंतित थे। उनका कार्यक्रम तीन सिद्धांत (सन-मिन-चुई) के नाम से विख्यात है।
ये तीन सिद्धांत हैं-
(i) राष्ट्रवाद-इसका अर्थ था मांचू वंश, जिसे विदेशी राजवंश माना जाता था को सत्ता
से हटाना । साथ ही विदेशी साम्राज्यवादियों को चीन से बाहर निकालना ।
(ii) गणतंत्र-गणतांत्रिक सरकार की स्थापना करना ।
(iii) समाजवाद-पूंजी का नियमन करना और भूस्वामित्व में बराबरी लाना। सन-यात-सेन
के विचार फुओयीनतांग के राजनीतिक दर्शन का आधार बने । उन्होंने कपड़ा, भोजन, घर और
परिवहन-इन चार बड़ी आवश्यकताओं को रेखांकित किया ।
प्रश्न 28. चीन में 4 मई के आंदोलन पर टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर-4 मई, 1919 को प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुए शाति सम्मेलन के निर्णयों के विरोध
में बीजिंग में एक जोरदार प्रदर्शन हुआ । भले ही चीन ने ब्रिटेन के नेतृत्व में विजयी आंदोलन
का रूप ले लिया जिसने एक पूरी पीढ़ी को परंपरा से हटकर चीन को आधुनिक विज्ञान, लोकतंत्र
और राष्ट्रवाद द्वारा बचाने के लिए प्रेरित किया। क्रांतिकारियों ने देश के संसाधनों को विदेशियों
से मुक्त कराने, असमानताएँ समाप्त करने और गरीबी को कम करने का नारा लगाया। उन्होंने
लेखन में सरल भाषा का प्रयोग करने, पैरों को बांधने की प्रथा और औरतों की अधीनस्थता को
समाप्त करने, विवाह में बराबरी लाने और गरीबी को समाप्त करने के लिए आर्थिक विकास की
मांँग की।
प्रश्न 29. चीन में अभिजात सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश दिलाने वाली परीक्षा प्रणाली का
संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर–चीन में अभिजात सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश अधिकतर परीक्षा द्वारा ही होता था। इसमें
8 भाग वाला निबंध निर्धारित प्रपत्र में (पा-कू-वेन) शास्त्रीय चीनी में लिखना होता था। यह
परीक्षा विभिन्न स्तरों पर प्रत्येक 3 वर्ष में 2 बार अयोजित की जाती थी। पहले स्तर को परीक्षा
में केवल 1-2 प्रतिशत लोग ही 24 साल की आयु तक पास हो पाते थे और वे ‘सुंदर प्रतिभा’
बन जाते थे। इस डिग्री से उन्हें निचले कुलीन वर्ग में प्रवेश मिल जाता था। 1850 से पहले
देश में 526869 सिविल और 212330 सैन्य प्रांतीय (शेंग हुआन) डिग्री वाले लोग मौजूद थे।
क्योंकि देश में केवल 27000 राजकीय पद थे, इसलिए निचले दर्जे के कई डिग्रीधारकों को नौकरी
नहीं मिल पाती थी। यह परीक्षा विज्ञान और प्रोद्योगिकी के विकास में बाधक थी। इसका कारण,
यह था कि इसमें केवल साहित्यिक कौशल पर ही बल दिया जाता था। केवल क्लासिक चीनी
सीखने की कला पर ही आधारित होने के कारण 1905 ई. में इस परीक्षा प्रणाली को समाप्त कर
दिया गया ।
प्रश्न 30. 1930 ई. जुनवू (चीन) में क्या सर्वेक्षण किया गया ? इसका क्या उद्देश्य
और महत्व था?
उत्तर-1930 में जुनवू में किए गए एक सर्वेक्षण में माओ-से-तुंग ने नमक और सोयाबीन
जैसी दैनिक प्रयोग की वस्तुओं, स्थानीय संगठनों की तुलनात्मक मजबूतियों, छोटे व्यापारियों,
दस्तकारों और लोहारों, वेश्याओं तथा धार्मिक संगठनों को मजबूतियों का परीक्षण किया। इसका
उद्देश्य शोषण के अलग-अलग स्तरों को समझना था। उन्होंने ऐसे आंकड़े इकट्ठे किए कि कितने
किसानों ने अपने बच्चों को बेचा है और इसके लिए उन्हें कितने पैसे मिले। लड़के 100-200
यूआन पर बिकते थे। परंतु लड़कियों की बिक्री के कोई प्रमाण नहीं मिले, क्योंकि जरूरत मजदूरों
की थी लैंगिक शोषण को नहीं। इस अध्ययन के आधार पर उन्होंने सामाजिक समस्याओं को
सुलझाने के तरीके पेश किए ।
प्रश्न 31. चीन की ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ सरकार की सफलताओं का
संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर–चीन में 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को सरकार स्थापित हुई। यह ‘नए
लोकतंत्र के सिद्धांतों पर आधारित थी। नया लोकतंत्र सभी सामाजिक वर्गों का गठबंधन था।
अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्र सरकार के नियंत्रण में रखे गए। निजी कारखानों और भूस्वामित्व को
धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया। यह कार्यक्रम 1953 तक चला, जब सरकार ने समाजवादी
परिवर्तन का कार्यक्रम आरंभ करने की घोषणा की। 1958 में ‘लंबी छलांग वाले’ आंदोलन द्वारा
देश का तेजी से औद्योगीकरण करने का प्रयास किया गया । लोगों को अपने घर के पिछवाड़े
में इस्पात की भट्टियाँ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। ग्रामीण इलाकों में पीपुल्स कम्यूंस
आरंभ किए गर । इसमें लोग सामूहिक रूप से भूमि के स्वामी थे और मिल-जुल कर फसल
उगाते थे।
प्रश्न 32. माओ-त्से-तुंग ने पार्टी (साम्यवादी) द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के
लिए क्या किया? क्या उनके तौर-तरीके पार्टी के सभी लोगों को पसंद थे ?
उत्तर-माओ-त्से-तुंग पार्टी द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जनसमुदाय को प्रेरित
करने में सफल रहे। उनकी चिंता ‘समाजवादी व्यक्ति’ बनाने की थी जिसे पाँच चीजें प्रिय होनी
थीं- पितृभूमि, जनता, काम, विज्ञान और जन संपति। किसानों, महिलाओं, छात्रों और अन्य गुटों
के लिए जन संस्थाएं बनाई गई । उदाहरण के लिए ‘ऑल चाइना डेमोक्रेटिक वीमेंस फेडरेशन’
के 70 लाख सदस्य थे। इसी प्रकार ‘ऑल चाइना स्टूडेंट्स फेडरेशन’ के 32 लाख 90 हजार
सदस्य थे। परंतु ये लक्ष्य और तरीके पार्टी के सभी लोगों को पसंद नहीं थे। 1953-54 में कुछ
लोग औद्योगिक संगठनों और आर्थिक विकास की ओर अधिक ध्यान देने पर बल दे रहे थे
लोऊ शाओघी (1896-1969) तथा तंग शीयाओफी (1904-97) ने कम्यून प्रथा को बदलने
को चेष्ठा को क्योंकि यह कुशलतापूर्वक काम नहीं कर रही थी। घरों के पिछवाड़ों में बनाया
गया स्टील औद्योगिक दृष्टि से उपयोगी नहीं था।
प्रश्न 33. चीन में भयंकर अकाल क्यों पड़ा?
अथवा, माओ का ‘आगे की ओर महान छलांग’ कार्यक्रम क्यों असफल रहा?
उत्तर-चीन का भयंकर अकाल ‘आगे की ओर महान् छलांग’ कार्यक्रम की असफलता
का परिणाम था । यह कार्यक्रम मुख्यतः तकनीकी कारणों से असफल रहा । कृषि उत्पादन को
बढ़ाने के लिए त्रुटिपूर्ण कृषि तकनीकों का प्रयोग किया गया । उदाहरण के लिए-
(i) भूमि में सामान्य मात्रा से दस गुणा अधिक बीज डाला गया। इससे पौधे बढ़ने से
पहले ही मर गए ।
(ii) गेहूँ और मक्का को एक साथ बोने का प्रयास किया गया। परंतु यह प्रयास असफल रहा।
(ii) चिड़ियाँ खेत में बिखरे बीजों को खा जाती थीं । इसलिए उन्हें बड़ी संख्या में मार
दिया गया।
दुर्भाग्य से इसके भी बुरे परिणाम निकले । जब फसलों पर कीड़े आए तो उन्हें खाने
के लिए चिड़ियाँ न रहीं । अतः फसलें नष्ट हो गई। इसके अतिरिक्त सिंचाई यंत्रों को गलत स्थानों
पर स्थापित किया गया जिससे भूमि का बड़े पैमाने पर अपरदन हुआ। बोई जाने वाली फसलों
के संबंध में कोई विशेष दिशा-निर्देश नहीं दिए गए थे। इसके परिणामस्वरूप सब्जियों तथा अन्य
फसलों का उत्पादन शून्य हो गया । इस प्रकार देश में भयंकर अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई।
प्रश्न 34. चीन में भयंकर अकाल के दौरान सरकार द्वारा भ्रामक प्रचार तथा उसकी
त्रुटिपूर्ण नीति का वर्णन कीजिए।
उत्तर–चीनी नेता केवल आधिकारिक आंकड़ों में विश्वास रखने लगे थे । फसलों की
रिकार्ड वृद्धि केवल मात्र दिखावा थी । वास्तव में उत्पादन आँकड़ों का मात्र एक तिहाई था।
सरकार ने स्थिति को वश में रखने के लिए भ्रामक प्रचार की नीति अपनाई तथा नये-नये नारे
गढ़ लिए । उदाहरण के लिए 1959 ई. में अकाल के समय लोगों को घास को उबालकर खाना
पड़ रहा था उस समय पार्टी ने लोगों को सुझाव दिया कि “अधिक उत्पादन वाले वर्ष में भी
कम खाय” । लोग इतने कमजोर हो गए कि वह काम भी नहीं कर सकते थे । ये सारा दिन
घर पर रहने लगे। इस स्थिति में देश के रेडियो लोगों को आराम करने की सलाह देने लगे।
देश के डॉक्टरों ने प्रचार किया कि चीन के लोगों को विटामिन तथा वसा की कोई आवश्यकता
नहीं है क्योंकि उनका शारीरिक गठन हो विशेष प्रकार का है। सरकार की इस त्रुतिपूर्ण नीति
ने अकाल की स्थिति को और भी गंभीर बना दिया।
प्रश्न 35. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए-
(i) माओ की आगे की महान छलांग (Great Leap Forward) कार्यक्रम
(ii) पिंगपोंग (Ping Pong) कूटनीति
(iii) तियाननमेन स्क्वायर हत्याकांड ।
उत्तर-(i)माओ की आगे की ओर महान छलांग (Great Leap Forward)
कार्यक्रम- ‘आगे की ओर महान् छलांग’ माओ का एक आर्थिक कार्यक्रम था। यह कार्यक्रम
1959 ई. में आरंभ किया गया। इसके अंतर्गत ग्रामीण सहकारी समितियों और सामूहिक खेतों
को मिलाकर बड़े-बड़े कम्यून बना दिए गए। ये कम्यून राष्ट्र के स्वामित्व के प्रतीक थे। इसका,
उद्देश्य खाधान उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ औद्योगिकीरण को बढ़ावा देना था। परंतु इसके
विनाशकारी परिणाम निकले । इसका कारण यह था कि कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी के
अधिकारी इसे उस पैमाने पर लागू करने में सक्षम नहीं थे, जैसा माओ ने सोचा था । अतः एक
बार फिर चीन को खाद्यान के अभाव तथा औद्योगिक मंदी का सामना करना पड़ा।
(ii) पिंगपोंग (Ping Pong) कूटनीति साम्यवादी चीन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका
के बीच संबंध तनावपूर्ण थे। इसके दो मुख्य कारण थे-एक तो दोनों देशों की अर्थव्यवस्था
अलग-अलग थी। दूसरे अमेरिका ने अभी तक जनवादी चीन को मान्यता नहीं दी थी। वह ताइवान
में स्थित च्यांग-काई-शेक को चीन की वास्तविक सरकार मानता था । संयुक्त राष्ट्र में भी ताइवान
को ही सदस्यता प्राप्त थी। परंतु 1972 ई. में अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एकाएक
चीन की यात्रा करने का कार्यक्रम बना लिया । यह कार्यक्रम दोनों देशों के अधिकारियों के बीच
लगभग दस वर्षों से चल रही कूटनीतिक वार्ताओं का परिणाम या इन्हीं गुप्त वार्ताओं को ही
पिंगपोंग कूटनीति का नाम दिया जाता था। दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने में पाकिस्तान ने भी
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः मार्च, 1972 में निक्सन ने चीन को पार को। उसने जनवादी
चीन को हो वास्तविक चीन स्वीकार कर लिया और उसे मान्यता दे दी। इसके परिणामस्वरूप
ताइवान का स्थान जनवादी चीन को मिल गया। इस प्रकार अमेरिका और चीन के बीच स्थायी
रूप से राजनीतिक संबंध स्थापित हो गए।
(ii) तियाननमेन स्क्वायर हत्याकांड-चोन में साम्यवादी पार्टी के कुउ नेता कठोर
नीति में विश्वास रखते थे। उन्हें चीनी शासक डॅग के उदारवादी तरीके पसंद नहीं थे। इसलिए
वे डेंग पर कठोर नीति अपनाने के लिए दबाव डाल रहे थे । डेंग ने अपनी स्थिति को मजबूत
बनाने के लिए विद्यार्थियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे पायें की कठोर नीतियों
के समर्थकों को कमजोरियों का पता लगाएं। परंतु 1988-89 में उसके अपने आर्थिक सुधार
ही असफल होते दिखाई देने लगे। वस्तुओं के दाम वेतनों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गए।
मई, 1989 में बीजिंग के विद्यार्थी नगर के प्रसिद्ध तियाननमेन चौक में शांतिपूर्वक इकठ्ठे होने
लगे। वे और अधिक राजनीतिक सुधारों, प्रजाटो तथा पार्टी में प्रष्टाचार को समाप्त करने की
मांँग करने लगे। अपनी मांगों को पूरा करवाने के लिए उन्होंने संगीतमय रंगारंग प्रदर्शन भी किए।
प्रजातंत्र को अर्पित एक चुत भी बनाया गया जिसके गले में उत्साहपूर्वक माला पहनाई गई।
इन प्रदर्शनों की बदती हुई लोकप्रियता को देखते हुए सरकार के कान खड़े हो गए । उसने इन्हें
साम्यवादी पार्टी की सत्ता के लिए चुनौती माना । डेंग स्वयं कठोर नीति पर उतर आया। उसने
अपने दो उदारवादी अधिकारियों को हटा दिया 13 जून, 1989 की रात को चौक में टैंकों सहित
सेना भेज दी गई । चौक में एकत्रित 1500-3000 लोगों को गोलियों से उड़ा दिया गया । इस
हत्याकांड की पूरे विश्व में भर्त्सना हुई। परंतु चीन ने इसकी कोई परवाह न की।
प्रश्न 36. चीन में 1930 के दशक में गृह-युद्ध के आधार की विवेचना कीजिए।
उत्तर-1 दिसम्बर, 1927 को कैंटन में कम्युनिस्टों ने एक विद्रोह का नेतृत्व किया और
सोवियत रूस की एक सरकार स्थापित की, परंतु इस विद्रोह को कुचल दिया गया। इस घटना
में लगभग 5000 मजदूर मारे गये । इससे चीन के राष्ट्रीय आंदोलन में फूट पड़ गयी । सोवियत
सलाहकारों को चीन से बाहर निकाल दिया गया तथा कोमिनतांग के अनेक नेता देश छोड़कर
चले गये । इनमें सनयात सेन की विधवा भी शामिल थी। परंतु देश में कम्युनिस्टों की शक्ति
का पूरी तरह पतन नहीं हुआ । कई कम्युनिस्ट देश के विभिन्न भागों में फैल गये और उन्होंने
कुछ प्रदेशों को अपने नियंत्रण में ले लिया । इस प्रकार चीन का गृह-युद्ध एक नये चरण में प्रवेश
कर गया जो कम्युनिस्टों तथा च्यांग-काई-शेक सरकार के बीच चला।
प्रश्न 37. चीनी कोमिनतांग पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें।
उत्तर- कोमिनतांग की स्थापना 1912 में चीन के राष्ट्रवादी नेता सनयात सेन ने की थी
उनके तीन मुख्य उद्देश्य थे-(i) चीन को विदेशी प्रभुत्व से मुक्त करवाना, (ii) चीन में आधुनिक
लोकतंत्र की स्थापना करना तथा, (iii) भूमि सुधारों द्वारा कृषकों को सामंती नियंत्रण से मुक्त
करवाना । सनयात सेन के अधीन कोमिनतांग की लोकप्रियता दूर-दूर तक फैल गई। इस संस्था
के उद्देश्य 1921 ई. में स्थापित साम्यवादी दल से मेल खाते थे । परंतु शीघ्र ही दोनों दलों में
मतभेद उत्पन्न हो गए । 1925 ई. में सनयात सेन की मृत्यु हो गई और कोमिनतांग का नेतृत्व
च्यांग-काई-शेक के हाथों में आ गया । उसने साम्यवादियों पर कूर अत्याचार करने आरंभ कर
दिए । विवश होकर साम्यवादी नेता माओ जेड़ाग ने महाप्रस्थान (6000 मील की लंबी यात्रा)
का कार्यक्रम अपनाया और उत्तरी चीन में अपना प्रभाव बढ़ा लिया । अंतत: 1949 ई. में उसने
च्यांग-काई-शेक को फारमोसा (वर्तमान ताइवान) भाग जाने के लिए विवश कर दिया । इस
प्रकार कोमिनतांग का पतन हो गया ।
प्रश्न 38. चीन की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति (1965) क्या थी? इसका क्या
परिणाम निकला?
उत्तर-‘समाजवादी व्यक्ति’ की रचना के इच्छुक माओवादियों और माओ की साम्यवादी
विचारधारा के आलोचकों के बीच संघर्ष छिड़ गया । 1965 को महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति
इसी संघर्ष का परिणाम थी । माओ ने यह क्रांति अपने आलोचकों का सामना करने के लिए आरंभ
की थी । पुरानी संस्कृति, पुराने रिवाजों और पुरानी आदतों के विरुद्ध अभियान छेड़ने के लिए
रेड गार्ड्स-मुख्यतः छात्रों और सेना का प्रयोग किया गया । छात्रों और पेशेवर लोगों को जनता
से सीख लेने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में भेजा गया । साम्यवादी होने की विचारधारा पेशेवर ज्ञान
से भी अधिक महत्वपूर्ण बन गई । तर्कसंगत वादविवाद का स्थान दोषारोपण और नारेबाजो ने
ले लिया ।
परिणाम-सांस्कृतिक क्रांति से देश में खलबली मच गई जिससे पार्टी कमजोर हुई।
अर्थव्यवस्था और शिक्षा के प्रसार में भी भारी बाधा आई । परंतु 1960 के उत्तराई से स्थिति
बदलने लगी । 1975 में पार्टी ने एक बार फिर कड़े सामाजिक अनुशासन और औद्योगिक
अर्थव्यवस्था के निर्माण पर बल दिया ताकि देश बीसवीं शताब्दी के अंत तक एक शक्तिशाली
देश बन सके।
प्रश्न 39. चीन में हुई सांस्कृतिक क्रांति की व्याख्या करें।                       [B.M.2009] उत्तर-चीन में सन् 1965 में माओ ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत की। माओ
समाजवादी व्यक्ति की रचना के इच्छुक थे तथा दक्षता के बजाय विचारधारा पर बल देते थे। इसके
विपरीत चीन में कुछ लोग समाजवादी विचारधारा के स्थान पर पूँजीवाद पर बल दे रहे थे। माओ
ने इसी द्वन्द की समाप्ति हेतु सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत की जिसके तहत प्राचीन संस्कृति और
पुराने रिवाजों और पुरानी आदतों के खिलाफ रेड गार्डस का इस्तेमाल किया गया। रेड गार्डस
में मुख्यतः सेना एवं छात्रों का प्रयोग होता था। नागरिकों के दोषारोपण ने तर्कसंगत बहस का
स्थान ले लिया और चीन सांस्कृतिक परिवर्तन की करवट लेने लग गया।
                  दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न
    (Long Answer Type Questions)
प्रश्न 1. मेजी पुनर्स्थापना से पहले की वे अहम घटनाएँ क्या थीं, जिन्होंने जापान के
तीव्र आधुनिकीकरण को संभव किया ?                                               (T.B.Q.)
उत्तर-मेजी पुनर्स्थापना 1867-68 में हुई। इससे पहले की निम्नलिखित मुख्य घटनाओं
ने जापान के तीव्र आधुनिकीकरण को संभव बनाया-
(i) किसानों से शस्त्र ले लिए गए । अब केवल समुराई ही तलवार रख सकते थे। इससे
शांति और व्यवस्था बनी रही जबकि पिछली शताब्दी में प्राय: लड़ाइयाँ होती रहती थीं । शांति
एवं व्यवस्था को आधुनिकीकरण का मूल आधार माना जाता है।
(ii) दैम्यो को अपने क्षेत्रों की राजधानी में रहने के आदेश दिए गए। उन्हें काफी हद
तक स्वायत्तता भी प्रदान की गई।
(i) मालिकों और करदाताओं का निर्धारण करने के लिए भूमि का सर्वेक्षण किया गया
और भूमि का वर्गीकरण उत्पादकता के आधार पर किया गया । इसका उद्देश्य राजस्व के लिए
स्थायी आधार बनाना था ।
(iv) दैम्यो की राजधानियों का आकार लगातार बढ़ने लगा। अतः 17वीं शताब्दी के मध्य
तक जापान में एदो (आधुनिक तोक्यो) संसार का सबसे अधिक जनसंख्या वाला नगर बन गया।
इसके अतिरिक्त ओसाका और क्योती भी बड़े शहरों के रूप में उभरे । दुर्गा वाले कम-से-कम
छः शहर ऐसे थे जहाँ की जनसंख्या 50,000 से अधिक थी । इसकी तुलना में उस समय के
अधिकतर यूरोपीय देशों में केवल एक ही बड़ा शहर था । बड़े शहरों के परिणामस्वरूप जापान
की वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था का विकास हुआ और वित्त एवं ऋण की प्रणालियाँ स्थापित हुई।
(v) व्यक्ति के गुण उसके पद से अधिक मूल्यवान समझे जाने लगे।
(vi) शहरों में जीवंत संस्कृति का प्रसार होने लगा । बढ़ते हुए व्यापारी वर्ग ने नाटकों
और कलाओं को संरक्षण प्रदान किया ।
(vii) लोगों की पढ़ने में रुचि ने होनहार लेखकों को अपने लेखन द्वारा अपनी जीविका
चलाने में सहायता पहुंचाई । कहते हैं कि एदो में लोग नूडल की कटोरी के मूल्य पर पुस्तक किराये
पर ले सकते थे। इससे पता चलता है कि पुस्तकें पढ़ना अत्यधिक लोकप्रिय था और पुस्तकों
की छपाई भी व्यापक स्तर पर होती थी।
(viii) मूल्यवान धातुओं के निर्यात पर रोक लगा दी गई।
(ix) रेशम के आयात पर रोक लगाने के लिए स्योतो में निशिजिन में रेशम उद्योग के
विकास के लिए पग उठाये गए । कुछ ही वर्षों में निशिजिन का रेशम विश्वभर में सबसे अच्छा
रेशम माना जाने लगा।
(x) मुद्रा के बढ़ते हुए प्रयोग और चावल के शेयर बाजार के निर्माण से भी जापानी अर्थतंत्र
का विकास नयी दिशाओं में हुआ।
प्रश्न 2. जापान में मेजी शासन के अधीन अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण किस
प्रकार हुआ? उद्योगों के विकास का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर–अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण मेजो सुधारों की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी।
इसके लिए निम्नलिखित पग उठाए गए-
(i) कृषि पर कर लगाकर धन एकत्रित किया गया।
(i) 1870-1872 में तोक्यो (Tokyo) से योकोहामा बंदरगाह के बीच जापान की पहली
रेल लाइन बिछाई गई।
(iii) वस्त्र उद्योग के लिए यूरोप से मशीने आयात की गई। मजदूरों के प्रशिक्षण तथा
देश के विश्वविद्यालयों और स्कूलों में पढ़ाने के लिए विदेशी कारीगरों को बुलाया गया।
(iv) कई जापानी विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए विदेश भी भेजा गया।
(v) 1872 में आधुनिक बैंकिंग संस्थाओं की स्थापना की गई।
(vi) मित्सुबिशी और सुमितोमो जैसी कंपनियां सब्सिडी और करों में छूट के कारण प्रमुख
जहाज निर्माता कंपनियों बन गई। अब जापान का व्यापार जापानी उहाजों द्वारा होने लगा।
बड़ी-बड़ी व्यापारिक संस्थाओं जायवात्सु’ का प्रभुत्व दूसरे विश्व युद्ध के बाद तक अर्थव्यवस्था
पर बना रहा।
(vii) 1872 में जापान की जनसंख्या 3.5 करोड़ थी जो 1920 में 55 करोड़ हो गई।
जनसंख्या के दबाव को कम करने के लिए सरकार ने प्रवास को बढ़ावा दिया। पहले लोगों को
उत्तरी द्वीप होकायदो को ओर भेजा गया। यह काफी सीमा तक एक स्वतंत्र प्रदेश था और वहांँ
आयनू कहे जाने वाले लोग रहते थे। इसके बाद उन्हें हवाई, ब्राजील और जापान के बढ़ते हुए
औपनिवेशिक साम्राज्य की ओर भेजा गया । उद्योगों के विकास के साथ-साथ लोग शहरों की
ओर आने लगे। 1925 तक 21 प्रतिशत जनता शहरों में रहती थी। 1935 तक यह बढ़ कर 32
प्रतिशत हो गई।
(vi) जापान में औद्योगिक मजदूरों की संख्या 1970 में 7 लाख से बढ़कर 1913 में
40 लाख पहुंँच गई। अधिकतर मजदूर ऐसी इकाइयों में काम करते थे जिनमें से भी कम लोग
थे और जिनमें मशीनों तथा विद्युत-ऊर्जा का प्रयोग नहीं होता था। कारखानों में काम करने वाले
मजदूरों में आधे से अधिक महिलाएं घो। 1900 के बाद कारखानों में पुरुषों की संख्या बढ़ने लगी।
परंतु 1930 के दशक में ही आकर पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक हुई।
कारखानों में मजदूरों की संख्या भी बढ़ने लगी। फिर भी 1940 में 5 लाख 50 हजार
कारखानों में पांच-पांच से भी कम मजदूर काम करते थे।
पर्यावरण पर प्रभाव-उद्योगों के तीव्र और अनियत्रित विकास तथा लकड़ी की अधिक
मांँग से पर्यावरण का विनाश हुआ। संसद के निम्न सदन में सदस्य तनाको शोजो ने 1897 में
औद्योगिक प्रदूषण के विरुद्ध पहला आंदोलन छेड़ा । 500 गांववासी जन विरोध में एकत्रित हुए
और उन्होंने सरकार को कार्यवाही करने के लिए विवश किया।
प्रश्न 3. जापान के आक्रामक राष्ट्रवाद, पश्चिमीकरण तथा परंपरा की विवेचना कीजिए।
उत्तर-आक्रामक राष्ट्रवाद-मेजो संविधान सीमित मताधिकार पर आधारित था।
संविधान द्वारा बनाई गई डायट (संसद्) के अधिकार सौमित थे। शाही पुनः स्थापना करने वाले
नेता सत्ता में बने रहे और उन्होंने राजनीतिक पार्टियों का गठन किया। 1918-1931 के दौरान
जनमत द्वारा चुने गए प्रधानमत्रियों ने मंत्रिपरिषद् बनाई। इसके बाद उन्होंने पार्टियों का भेद भुला
कर राष्ट्रीय मंत्रिपरिषदें बनाई । सम्राट सैन्य बलों का कमांडर था और 1500 से यह माना जाने
लगा कि थलसेना और नौसेना का नियंत्रण स्वतंत्र है । 1899 में प्रधानमंत्री ने आदेश दिया कि
केवल सेवारत जनरल और एडमिरल ही मंत्री बन सकते हैं । सेना को मजबूत बनाने का अभियान
और जापान के उपनिवेशों की वृद्धि इस भय से एक-दूसरे से संबंधित थी कि जापान पश्चिमी
शक्तियों की दया पर निर्भर है। यह भय दिखा कर सैन्य-विस्तार के और सैन्यबलों को अधिक
धन जुटाने के उद्देश्य से ऊँचे कर वसूले गए । इन करों के विरुद्ध आवाजें उठी परंतु उन्हें दवा
दिया गया।
पश्चिमीकरण तथा परंपरा-अन्य देशों के साथ जापान के संबंधों के बारे में जापानी
बुद्धिजीवियों की आने वाली पीढ़ियों के विचार भिन्न-भिन्न थे। कुछ का विचार था कि अमरीका
और पश्चिमी यूरोपीय देश सभ्यता की ऊँचाइयों पर हैं । जापान को भी उसी ऊंचाई पर पहुंचने
की आकांक्षा रखनी चाहिए । फुकुजावा यूकिची मेजी काल के प्रमुख बुद्धिजीवियों में से थे ।
उनका कहना था कि जापान को अपने में से एशिया को निकाल फेंकना चाहिए। उनके कहने
का अभिप्राय यह था कि जापान को अपने एशियाई लक्षण छोड़ कर पश्चिम का भाग बन जाना
चाहिए।
अगली पीढ़ी ने पश्चिमी विचारों को पूरी तरह से अपनाने पर आपत्ति की और कहा कि
राष्ट्रीय गौरव का निर्माण देशी मूल्यों पर ही होना चाहिए । दर्शनशास्त्री मियाके सेत्सरे
(1860-1945) ने तर्क पेश किया कि विश्व सभ्यता के हित में प्रत्येक राष्ट्र को अपने विशेष
गुणों का विकास करना चाहिए । स्वयं को अपने देश के लिए समर्पित करना स्वयं को विश्व
के प्रति समर्पित करने के समान है। दूसरी ओर बहुत से बुद्धिजीवी पश्चिमी उदारवाद की ओर
आकर्षित थे । वे चाहते थे कि जापान अपना निर्माण सेना की बजाय लोकतंत्र के आधार पर करे।
संवैधानिक सरकार की मांग करने वाले आंदोलन के नेता उएकी एमोरी (1857-1892)
फ्रांसीसी क्रांति के मानव के प्राकृतिक अधिकारों और जन प्रभुसत्ता के सिद्धांतों के प्रशंसक थे।
वह उदारवादी शिक्षा के पक्ष में थे जो प्रत्येक व्यक्ति को विकसित कर सके । कुछ दूसरे लोगों
ने तो महिलाओं के मताधिकार की भी सिफारिश की । इस दबाव ने सरकार को संविधान की
घोषणा करने पर बाध्य किया ।
प्रश्न 4. दो विश्वयुद्धों के बीच में जापान में सैनिकवाद के उत्थान की विवेचना
कीजिए । यह विकास जापान द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने के लिए कहाँ तक
उत्तरदायी था?
उत्तर-1918 ई. तक जापान आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध या। परंतु देश में राजनीतिक
अस्थिरता का वातावरण था । देश में लोकतंत्र की स्थापना के प्रयास किए जा रहे थे। परंतु
सेना सत्ता पर अपना प्रभाव बढ़ाने में व्यस्त थी । फलस्रूप जापान पुनः सैनिकवाद की ओर
बढ़ने लगा।
जापान में सैनिकवाद के बढ़ते कदम-द्वितीय विश्व युद्ध तक जापान में सैनिकवाद के
विकास का वर्णन इस प्रकार है-
(i) 1929 की महान् आर्थिक मंदी-1929 ई. में विश्व तथा विशेषकर संयुक्त राज्य
अमेरिका को महान् आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा । फलस्वरूप संयुक्त राज्य में वस्तुओं
का उपभोग बहुत ही कम हो गया । इसका जापान की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।
इसका कारण यह था कि अमेरिका जापान से निर्यात होने वाले कृषि उत्पादन का सबसे बड़ा
बाजार था। देश का निर्यात कम होने से कृषकों को घोर निर्धनता का सामना करना पड़ा । तंग
आकर वे सेना में भर्ती होने लगे। इस अवसर का लाभ उठा कर देश के सेनानायकों ने सैन्यवाद
का महिमा गान करना आरंभ कर दिया । वे चाहते थे कि जापान चीन में चल रहे गृह युद्ध का
लाभ उठा कर चीन को एक उपनिवेश के रूप में प्रयोग करे ।
(ii) मंचूरिया संकट 1931-मंचूरिया चीन का एक प्रांत था । यहाँ चीन की कंपनियों
का बहुत अधिक प्रभाव था। चीन की राष्ट्रवादी सरकार ने उसकी शक्ति को नियंत्रित करने का
प्रयास किया। अत: टोक्यो (जापान) के सैनिकवादियों ने देश के अनुदार राजनेताओं के सहयोग
से मंचूरिया पर आक्रमण कर दिया और वहाँ एक कठपुतली सरकार की स्थापना कर दी। इस
संबंध में देश के प्रधानमंत्री इनुकई (Inukai) से पूछा तक नहीं गया । जब इनुकई ने इस घटना
का विरोध किया, तो उसकी हत्या कर दी गई और देश का शासन सेना के अधीन कर दिया
गया । फलस्वरूप जापान में सैनिकवाद की जड़ें और अधिक गहरी हो गई।
(iii) सैनिक फासीवाद-उपरोक्त घटना के पश्चात् द्वितीय विश्व युद्ध तक जापान में
सैनिक फासीवाद का बोलबाला रहा । वहाँ सेना सर्वेसर्वा बन गई और सम्राट् नाममात्र का मुखिया
बना रहा । सैनिक सत्ता का विरोध करने वाले लोगों के साथं सख्ती के साथ निपटा गया । ऐसे
अधिकांश लोगों को साम्यवादी होने की आड़ में गोलियों से उड़ा दिया गया। विचारों की
अभिव्यक्ति तथा शिक्षा पर प्रतिबंध लगा दिया गया । जापान की विदेश नीति ने आक्रामक रूप
धारण कर लिया । इसका मुख्य उद्देश्य एशिया में तेजी से औपनिवेशिक विस्तार करना था।
इस दिशा में ब्रिटेन तथा अमेरिका के हितों को चोट पहुंचाने का हर संभव प्रयास किया गया ।
जापान द्वारा 1937 में चीन पर आक्रमण के समय अनेक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार
दिया गया । इस हत्याकांड का जापानी सम्राट भी विरोध करने का साहस न कर सका । इस
प्रकार जापान में सैनिकवाद इतना अधिक हावी हो गया कि इसने जापान को द्वितीय विश्व युद्ध
में धकेल दिया। उसने अन्य दो फासीवादी देशों इटली तथा जर्मनी का साथ दिया ।
प्रश्न 5. ‘मेजी पुनःस्थापन’ का अर्थ क्या है ? जापान के विकास पर इसके भावी
परिणाम क्या थे?
उत्तर–जापान में शताब्दियों तक ‘शोगुन’ शासक सत्ता के वास्तविक स्वामी बने रहे । परंतु
1868 में ‘शोगुन’ शासन समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर नए शासक तथा सलाहकार
सामने आए । ये लोग जापानी सम्राट् के नाम पर शासन चलाते थे। इस प्रकार देश में सम्राट
फिर से सर्वेसर्वा बन गया । उसने ‘मेजी’ की उपाधि धारण की । इसलिए जापान के इतिहास
में इस घटना को ‘मेजी पुनः स्थापना’ का नाम दिया गया ।
महत्व-‘मेजी पुनःस्थापना’ का जापान की भावी प्रगति पर गहरा प्रभाव पड़ा जिसका वर्णन
इस प्रकार है-
(i) औद्योगिक प्रगति-मेजी युग में जापान ने औद्योगिक क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति की।
देश की सरकार ने उद्योगों में व्यापक पूंजी निवेश किया । बाद में उद्योग पूंजीपतियों को बेच दिए
गए । इस प्रकार अब नए उद्योग आरंभ करने के लिए सरकारी सहायता की कोई आवश्यकता
न रही । किसानों की दरिद्रता का भी उद्योगों को लाभ पहुँचा । अनेक निर्धन किसान गाँवों को
छोड़कर नगरों में आ बसे। परिणामस्वरूप उद्योगों के लिए सस्ते मजदूर उपलव्य होने लगे । 20वीं
शताब्दी के आरंभ तक जापान उद्योगों में इतना अधिक शक्तिशाली हो गया कि वह अंतराष्ट्रीय
बाजार में यूरोप के औद्योगिक देशों के साथ टक्कर लेने लगा।
(ii) नवीन संविधान-सन् 1889 में जापान को एक नया संविधान मिला। इसकी मुख्य
विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-
(i) सम्राट् को कार्यकारिणी के प्रधान के रूप में विशेष शक्तियाँ दी गई थीं। सभी मंत्रियों
की नियुक्ति सम्राट् द्वारा होती थी और वे अपने कार्यों के लिए सम्राट् के प्रति उत्तरदायी होते थे।
वास्तव में सम्राट् को दैवी शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था।
अतः उसे पवित्र एवं श्रेष्ठतम मानकर उसकी पूजा की जाती थी।
(ii) संविधान में एक संसद् का प्रावधान था जिसे डायट कहते थे। परंतु डायट की
शक्तियाँ काफी सीमित थी । उस पर सेना का नियंत्रण स्थापित किया गया था।
(iii) पुलिस को व्यापक अधिकार दिए गए थे। वह राजतंत्र विरोधी गतिविधियों पर
आसानी से रोक लगा सकती थी।
(ii) औपनिवेशिक विस्तार-1890 के दशक में जापान यूरोपीय देशों के साथ
औपनिवेशिक होड़ में शामिल हो गया। इसने 1895 ई. में चीन से युद्ध किया और उसे परास्त
करके फारमोसा पर अपना अधिकार कर लिया। फिर 1905 ई. में कोरिया उसका संरक्षित राज्य
बन गया और इसके पाँच वर्ष पश्चात् यह प्रदेश जापानी साम्राज्य का अंग बन गया ।
इस प्रकार मेजी पुनः स्थापना के बाद जापान एक शक्तिशाली देश के रूप में उभरने लगा।
संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोपीय देशों ने 1899 में ही उसे एक महाशक्ति के रूप में स्वीकार
कर लिया था । कुछ देशों ने उसके साथ समानता के आधार पर संधियाँ भी की थीं।
प्रश्न 6. 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से लेकर प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति तक
एक विश्व शक्ति के रूप में जापान के विकास क्रम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-जापान एशिया की एकमात्र सामान्यवादी शक्ति था। उसने अपना साम्राज्यवादी
प्रसार 19वीं शताब्दी के अतिम दशक में किया। इससे पूर्व जापान स्वयं साम्राज्यवाद का शिकार
होते-होते बचा था। 1853 ई. में कमोडोर पेरी के नेतृत्व में जंगी जहाज जापान के तट पर पहुंँचे
थे। पेरी ने बल प्रयोग द्वारा जापान को अमेरिकी जहाजरानी तथा व्यापार की छूट देने के लिए
बाध्य किया । जापान के साथ ब्रिटेन, हालैंड, फ्रॉस तथा रूस ने भी समझौते किए। फिर भी
जापान अन्य एशियाई देशों के कटु अनुभव से बचा रहा।
जापान का शक्तिशाली बनना-1876 ई. में जापान में महत्वपूर्ण सत्ता परिवर्तन हुआ
जिसे मेजी पुनस्र्थापना कहा जाता है । मेजी काल में जापान ने बहुत उन्नति की । उसने अपनी
अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाना आरंभ कर दिया और कुछ ही दशकों में वह विश्व का एक
प्रमुख औद्योगिक देश बन गया । इसके अतिरिक्त वे शक्तियाँ जिन्होंने पश्चिमी देशों को
साम्राज्यवादी बनाया था, जापान में भी सक्रिय थीं । पश्चिमी देशों की भांति जापान के पास भी
अपने उद्योगों के लिए कच्चा माल बहुत कम था । उसे अपने माल की खपत के लिए नए बाजार
भी चाहिए थे । अत: उसकी नजर ऐसे देशों पर पड़ी जो उसकी इन दोनों आवश्यकताओं की
पूर्ति कर सकते थे । इस प्रकार वह भी साम्राज्यवाद की होड़ में सम्मिलित हो गया ।
साम्राज्यवाद विस्तार-जापान के साम्राज्यवादी विस्तार पर वर्णन इस प्रकार है-
(i) जापान के निकट चीन था और चीन में उसके साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए
पर्याप्त अवसर थे। दोनों देश 1894 में कोरिया के प्रश्न पर एक-दूसरे से युद्ध कर चुके थे।
इसके बाद जापान का चीन में प्रभाव काफी बढ़ गया था ।
(ii) 1902 में इंग्लैंड तथा जापान का समझौता हुआ । इसके अनुसार जापान को अन्य
यूरोपीय शक्तियों के समान दर्जा मिल गया ।
(iii) 1904-05 में उसने रूस को पराजित किया। इसके परिणामस्वरूप उसे सखालिन
का दक्षिणी भाग प्राप्त हुआ । जापान का लियाओतुंग प्रायद्वीप के दक्षिणी भाग पर भी अधिकार
हो गया । उसने पोर्ट आधर पट्टे (किराये) पर ले ली।
(iv) 1910 में कोरिया जापान का उपनिवेश बन गया ।
इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के समय तक जापान एक महाशक्ति बन चुका था । यदि
पश्चिमी शक्तियाँ उसके मार्ग में बाधा न बनतीं तो वह चीन में अपना और अधिक प्रसार कर
सकता था । परंतु यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि पश्चिमी देशों की तुलना में जापान के
साम्राज्यवादी कारनामे काफी बदतर थे।
प्रश्न 7. द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजय के पश्चात् जापान का विश्व की आर्थिक
जानिन के रूप में उत्थान किस प्रकार हुआ?
उत्तर युद्ध के बाद को स्थिति द्वितीय विश्व युद्व में पराजय के बाद जापान के
औपनिवेशिक साम्राज्य के प्रयास थम गए । यह तक दिया गया था कि युद्ध को जल्दी समाप्त
करने के लिए जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये गये थे। परंतु बहुत
से लोगों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाली विनाशलीला पूरी तरह से अनावश्यक
थी। अमरीकी नियंत्रण (1945-47) के दौरान जापान का विसैन्यीकरण कर दिया गया। एक
नया संविधान भी लागू हुआ । इसके अनुच्छेद 9 के ‘युद्ध न करने’ की तथाकधित धारा के
अनुसार जापान युद्ध को राष्ट्रीय नीति नहीं बना सकता । कृषि सुधार, व्यापारिक संगठनों के
पुनर्गठन और जापानी अर्थव्यवस्था में जायबात्सु अर्थात् बड़ी एकाधिकार कंपनियों की पकड़ को
समाप्त करने का प्रयास किया गया । राजनीतिक पार्टियों को पुनर्जीवित किया गया और युद्ध के
पश्चात् 1946 में पहले चुनाव हुए । इन चुनावों में पहली बार महिलाओं ने भी मतदान किया।
आर्थिक शक्ति के रूप में उत्थान-युद्ध में भयंकर हार के बावजूद जापानी अर्थव्यवस्था
का बड़ी तेजी से पुनर्निर्माण हुआ । संविधान को औपचारिक रूप से लोकतांत्रिक बनाया गया ।
परंतु जापान में जनवादी आंदोलन और राजनीतिक भागीदारी का आधार बढ़ाने की ऐतिहासिक
परंपरा रही थी। अत: युद्ध से पहले के काल की सामाजिक संबद्धता को सुदृढ़ किया गया ।
इसके परिणामस्वरूप सरकार, नौकरशाही और उद्योग के बीच एक निकट संबंध स्थापित हुआ।
अमरीकी समर्थन और कोरिया तथा वियतनाम में युद्ध से उत्पन्न मांग ने जापानी अर्थव्यवस्था को
सुदृढ़ बनाने में सहायता की । 1964 में तोक्यो में हुए ओपिक खेल जापानी अर्थव्यवस्था की
परिपक्वता के प्रतीक थे। तेज गति वाली शिकाँसेन अर्थात् बुलेट ट्रेन का जाल भी 1964 में आरंभ
हुआ। ये गाड़ियां 200 मील प्रति घंटे की गति से चलती थीं । अब ये 300 मील प्रति घंटे की
गति से चलती हैं। यह बात भी जापानियों को सक्षमता को दर्शाती है कि उन्होंने नयी प्रौद्योगिकी
द्वारा बेहतर और सस्ते उत्पाद बाजार में उतारे ।
1960 के दशक में नागरिक समाज आंदोलन’ का उदय हुआ । इस आंदोलन द्वारा बढ़ते
औद्योगीकरण के कारण स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव की पूरी तरह से उपेक्षा कर
देने का विरोध किया गया । कैडमियम का विष, जिसके कारण एक बहुत ही कष्टप्रद बीमारी
होती थी, औद्योगिक दुष्प्रभाव का आभिक सूचक था। इसके बाद 1960 के दशक में वायु
प्रदूषण से भी समस्याएं उत्पन्न हुई। दवाव गुटों ने इन समस्याओं को पहचानने और मृतकों के
लिए मुआवजा देने की मांग की। सरकार की सक्रियता से नए कानूनों से स्थिति में सुधार आने
लगा। 1980 के दशक के मध्य से पर्यावरण संबंधी विषयों में लोगों की रुचि में कमी आई है,
क्योंकि जापान ने विश्व के कुछ कठोरतम पर्यावरण नियंत्रण कानून बनाए हैं। आज जापान एक
विकसित देश है। वह अपनी राजनीतिक और प्रौद्योगिकीय क्षमताओं का प्रयोग करके स्वयं को
एक विश्व शक्ति बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।
प्रश्न 8. आधुनिक चीन का आरंभ कय से माना जाता है ? इसका उदय किस प्रकार
हुआ?
उत्तर-आधुनिक चीन का आरंभ सोलहवों और सत्रहवीं शताब्दी में, पश्चिम के साथ
उसका पहला सामना होने के समय से, माना जाता है । इस काल में जेसुइट मिशनरियों ने
खगोलविद्या और गणित जैसे पश्चिमी विज्ञानों को चीन पहुँचाया ।
(1) अफीम युद्ध की भूमिका-आधुनिक चीन का उदय-19वीं शताब्दी में ब्रिटेन ने
अपने अफीम के व्यापार को बढ़ाने के लिए चीन के विरुद्ध सैन्य बल का प्रयोग किया । इस
प्रकार पहला युद्ध (1839-42) हुआ । इसने सत्ताधारी क्विंग (छांग) राजवंश को कमजोर किया
और सुधार तथा बदलाव की मांगों को मजबूती दी।
वास्तव में चीनी उत्पादों जैसे चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तनों की माँग ने ब्रिटिश
व्यापार में भारी असंतुलन पैदा कर दिया था। परंतु पश्चिमी उत्पादों को चीन में बाजार नहीं मिला।
इसलिए चीन से आयातित माल का भुगतान चाँदी में करना पड़ता था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने
एक विकल्प ढूंदा-अफीम । यह भारत के कई भागों में उगाई जाती थी ! वे चीन में अफीम
की बिक्री द्वारा चाँदी कमाकर कैंटन में उधार पत्रों के बदले कंपनी के प्रतिनिधियों को देने लग।
कंपनी इस चाँदी का प्रयोग ब्रिटेन के लिए चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन खरीदने
के लिए करने लगी। ब्रिटेन, भारत और चीन के बीच यह उत्पादों का ‘त्रिकोणीय व्यापार’ था।
(ii) आधुनिक व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण-क्विंग सुधारकों कांग यूवेई और लियांग
किचाउ ने व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने पर बल दिया । इस उद्देश्य से उन्होंने एक आधुनिक
प्रशासकीय व्यवस्था, नयी सेना और शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए नीतियाँ बनाई । संवैधानिक
सरकार की स्थापना के लिए स्थानीय विधानपालिकाओं का गठन भी किया गया। उन्होंने चीन
को उपनिवेशीकरण से बचाने पर विचार किया ।
(iii) उपनिवेश बनाये गए देशों के नकारात्मक उदाहरण-उपनिवेश बनाए गए देशों
के नकारात्मक उदाहरणों ने चीनी विचारकों पर गहरा प्रभाव डाला। 18वीं शताब्दी में पोलैंड का
बँटवारा इसका सर्वाधिक चर्चित उदाहरण था । यहाँ तक कि 1890 के दशक में पोलैंड का शब्द
‘बोलान बू’ नामक क्रिया (Verb) के रूप में प्रयोग किया जाने लगा । क्रिया इसका अर्थ था-‘हमें
पोलैंड करने के लिए’ । चीन के सामने भारत का उदाहरण भी था । लियांग किचाउ का मानना
था कि चीनी लोगों में एक राष्ट्र की भावना जागृत करके ही पश्चिम का विरोध किया जा सकता
है। 1903 में उन्होंने लिखा कि भारत ऐसा देश है जो किसी अन्य देश द्वारा नहीं, बल्कि एक
कंपनी अर्थात् ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों बर्बाद हो गया । वे ब्रिटेन की सेवा करने और अपने
ही लोगों के प्रति क्रूर होने के लिए भारतीयों की आलोचना करते थे। उनके तर्कों से अधिकांश
चीनी प्रभावित थे, क्योंकि ब्रिटेन ने चीन के साथ युद्ध में भारतीय सैनिकों का ही प्रयोग किया था।
(iv) चीनियों की परंपरागत सोंच में बदलाव-चीनियों की परंपरागत सोच को बदलना
भी आवश्यक था । कन्फयूशिसवाद चीन की प्रमुख विचारधारा थी। यह विचारधारा कन्फयूशियस
(551-479 ई.पू.) और उसके अनुयायियों की शिक्षा से विकसित की गई थी। इसका संबंध
अच्छे व्यवहार, व्यावहारिक समझदारी और उचित सामाजिक संबंधों से था। इस विचारधारा ने
चीनियों के जीवन के प्रति दृष्टिकोण को बदल दिया और नये सामाजिक मानक स्थापित किए।
इसने चीनी राजनीतिक सोच और संगठनों को भी ठोस आधार प्रदान किया ।
(v) नए विषय-लोगों को नये विषयों में प्रशिक्षित करने के लिए विद्यार्थियों को जापान,
ब्रिटेन और फ्रांँस में पढ़ने के लिए भेजा गया । 1890 के दशक में बहुत बड़ी संख्या में चीनी
विद्यार्थी पढ़ने के लिए जापान गए । वे नये विचार लेकर वापस आए। उन्होंने चीन में गणतंत्र
की स्थापना में भी अग्रणी भूमिका निभाई । चीन ने जापान से ‘न्याय’, ‘अधिकार’ और ‘क्रांति’
के शब्द ग्रहण किए। 1905 में रूस-जापान युद्ध हुआ । यह एक ऐसा युद्ध था जो चीन की धरती
पर और चीनी प्रदेशों पर प्रभुत्व के लिए लड़ा गया था । इस युद्ध के बाद सदियों पुरानी चीनी
परीक्षा- प्रणाली समाप्त कर दी गई। यह परीक्षा प्रणाली प्रत्याशियों को अभिजात सत्ताधारी वर्ग
में प्रवेश दिलाने का काम करती थी।
(vi) गणतंत्र की स्थापना-1911 में चीन में क्रांति हुई जिसने मंचू शासन का अंत
कर दिया । इसके बाद सनयात-सेन के नेतृत्व में देश में गणतंत्र की स्थापना हुई । गणतंत्र की
स्थापना के साथ ही चीन ने सच्चे अर्थों में आधुनिक युग में प्रवेश किया ।
प्रश्न 9. सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् कुमोमिनतांग के अधीन देश के राजनीतिक,
सामाजिक तथा आर्थिक विकास की समीक्षा कीजिए।
उत्तर-सनयात सेन को मृत्यु के पश्चात् ज्योग काइ शेक (1857-1975) कुओमिनलाग
के नेता बनकर उभरे।
(i) उन्होंने सैन्य अभियान द्वारा बार-लाईस (स्थानीय नेता जिन्होंने सत्ता छीन ली थी)
को अपने नियंत्रण में किया और साम्यवादियों की शक्ति नष्ट की। उन्होंने सेक्युलर और विवेकपूर्ण
इहलौकिक, कन्फूशियसवाद का समर्थन किया। इसके साथ-साथ उन्होंने राष्ट्र का सैन्यीकरण
करने की भी चेष्टा की।
(ii) उन्होंने कहा कि लोगों को एकताबद्ध व्यवहार को प्रवृत्ति और आदत का विकास
करना चाहिए।
(i) उन्होंने महिलाओं को चार सदगुण अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया-सतीत्व, रूप-
रंग, वाणी और काम । महिलाओं की भूमिका को घरेलू स्तर पर ही रखने पर बल दिया गया।
यहाँ तक कि उनके कपड़ों की लंबाई निर्धारित करने का प्रस्ताव भी रखा गया।
(iv) कुओमिंतांग का सामाजिक आधार शहरी प्रदेशों में था । देश का औद्योगिक विकास
धीमा था और गिने-चुने क्षेत्रों तक सीमित था। शंघाई जैसे शहरों में 1919 में औद्योगिक मजदूर
वर्ग का विस्तार हो रहा था । इनकी संख्या लगभग 5 लाख थी। परंतु इनमें से केवल कुछ प्रतिशत
मजदूर ही जहाज निर्माण जैसे आधुनिक उद्योगों में लगे हुए थे। अधिकतर लोग ‘नगण्य शहरी ‘
(शियाओं शिमिन), व्यापारी और दुकानदार होते थे।
(v) शहरी मजदूरों, विशेषकर महिलाओं को बहुत कम वेतन मिलता था । काम करने
के घंटे बहुत लंबे थे और काम करने की परिस्थितियाँ बहुत खराब थीं। जैसे-जैसे व्यक्तिवाद बढ़ा,
महिलाओं के अधिकारों, परिवार बनाने के तरीकों और प्रेम-प्यार आदि विषयों पर अधिक ध्यान
दिया जाने लगा।
(vi) सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन लाने में स्कूलों और विश्वविद्यालयों के विस्तार
से सहायता मिली । 1902 में पीकिंग विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। पत्रकारिता फली-फूली जो
कि सोच का प्रतिरूप थी । शाओ तोआफेन (1895-1944) द्वारा संपादित लोकप्रिय ‘लाइफ
वीकली’ इसी नयी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती थी। इसने अपने पाठकों को नए विचारों
के साथ-साथ महात्मा गांधी और तुर्की के आधुनिकतावादी नेता कमाल अतातुर्क से अवगत
करवाया।
(vii) देश को एकीकृत करने के प्रयासों के बावजूद कुओमिनतांग अपने संकीर्ण सामाजिक
आधार और सीमित राजनीतिक दृष्टिकोण के कारण असफल रहा । सन-यात-सेन के कार्यक्रम
का बहुत ही महत्वपूर्ण भाग “पूंजी के नियमन और भूमि-अधिकारों में समानता” को कभी भी
लागू न किया जा सका । इसका कारण यह था कि पार्टी ने किसानों और बढ़ती सामाजिक
असमानता की अनदेखी की । इसने लोगों की समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय सैनिक व्यवस्था
थोपने का प्रयास किया।
(viii) 1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण किया तो कुओमीनतांग पीछे हट गया। इस
लंबे और थका देने वाले युद्ध ने चीन को कमजोर बना दिया । 1945 और 1949 के दौरान कीमतें
30 प्रतिशत प्रति महीने की दर से बढ़ी। इससे आम आदमी को काफी कठिनाई का सामना करना
पड़ा। ग्रामीण चीन में भी दो संकट थे । एक पर्यावरण संबंधी था जिससे बंजर भूमि, वनों का
नाश और बाढ़ शामिल थे। दूसरा सामाजिक-आर्थिक था। यह संकट भूमि-प्रथा, ऋण, प्राचीन
प्रौद्योगिकी और निम्न स्तरीय संचार के कारण था ।
प्रश्न 10. चीन में साम्यवादी पार्टी की स्थापना कब और कैसे हुई? 1949 तक
माओत्सेतुंग के अधीन यह किस प्रकार शक्तिशाली बनी?
उत्तर–चीन में साम्यवादी पार्टी की स्थापना 1921 में, रूसी ऋति के कुछ समय बाद हुई
थी । रूसी क्रांति की सफलता ने पूरे विश्व पर गहरा प्रभाव डाला था लेनिन और ट्राटस्को जैसे
नेताओं ने मार्च 1918 में कौमिटलं अथवा तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय (Third International) का गठन
किया ताकि विश्व स्तरीय सरकार बनाई जा सके जो शोषण को समाप्त करे । कोमिंटर्न और
सोवियत संघ ने विश्व भर में साम्यवादी पार्टियों का समर्थन किया। मार्क्सवादी विचारधारा पर
आधारित इन पार्टियों का मानना था कि शहरी क्षेत्रों में क्राति मजदूर वर्गाद्वारा आयेगी। आरंभ
में विभिन्न देशों के लोग कौमिटर्न के प्रति बहुत आकर्षित हुए । परंतु शीघ्र हो यह सोवियत संघ
के स्वार्थों की पूर्ति का शस्त्र बन गया । 1943 में इसे समाप्त कर दिया गया
माओत्सेतुंग (1893-1976) के अधीन साम्यवादी पार्टी सी.सी.पी. (साम्यवादी
पार्टी):- माओ-त्से-तुंग मार्क्सवादी पार्टी (सी सीपी) के प्रमुख नेता के रूप में उभरे । उन्होंने
क्रांति के कार्यक्रम को किसानों से जोड़ते हुए एक अलग मार्ग अपनाया । उनको सफलता से चीनी
साम्यवादी पार्टी एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बन गई जिसने अंतत: कुओमिनतांग पर विजय
प्राप्त की।
माओत्सेतुंग के आमूल परिवर्तनवादी तौर तरीके-माओत्सेतुंग के आमूल परिवर्तनवादी
तौर-तरीके जियांग्सी नामक स्थान पर दिखाई दिए। 1928-1934 के बीच उन्होंने यहाँ के पर्वतों
में कुओमिनतांग के आक्रमों से सुरक्षित शिविर लगाए । एक सशक्त किसान परिषद् (सोवियत)
का गठन किया गया । भूमि पर नियंत्रण और इसके पुनर्वितरण के साथ इसका एकीकरण हुआ।
अन्य नेताओं से हटकर, माओ ने स्वतंत्र सरकार और सेना पर बल दिया । माओत्सेतुंग महिलाओं
की समस्याओं से भी अवगत थे। इसलिए उन्होंने ग्रामीण महिला संघों को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने
विवाह के नए कानून बनाए । आयोजित विवाहों और विवाह के समझौतों के क्रय-विक्रय पर रोक
लगा दी गई। तलाक को आसान बनाया गया।
लाँग मार्च तथा साम्यवादियों का सत्ता में आना-कुओमिंतांग द्वारा कम्युनिस्टों की
सोवियत को नाकेबंदी ने पार्टी को कोई अन्य आधार दंडने पर विवश किया । इसके चलते उन्हें
लॉग मार्च (1934-1935) पर जाना पड़ा, जो कि शांग्सी तक 6000 मील की कठिन यात्रा थी।
अपने नये अड्डे येनान में उन्होंने वारलॉर्डिज्म को समाप्त करने, भूमि सुधार लागू करने और
विदेशी साम्राज्यवाद से लड़ने के कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। इससे उन्हें मजबूत सामाजिक आधार
मिला । द्वितीय विश्व युद्ध के कठिन वर्षों में साम्यवादियों और कुओमौनतांग ने मिलकर काम
किया । युद्ध समाप्त होने के बाद कुओमीनतांग की पराजय हुई और साम्यवादी सत्ता में आ गए।
प्रश्न 11. प्रथम विश्व युद्ध के तत्काल बाद के सालों में चीन के राष्ट्रवादी आंदोलन
की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं? सनयात सेन की मौत के बाद वहाँ जो घटनाएं घटीं, उनका
वर्णन कीजिए और यह भी बताइए कि उनके क्या परिणाम निकले।
उत्तर-राष्ट्रीय आंदोलन का आरंभ तथा विशेषताएँ-प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के
समय चीन में दो प्रमुख सरकारें थीं । इनमें से एक पर कोमिनतांग का अधिकार था । इस सरकार
का मुख्यालय कैंटन में था । दूसरी सरकार का शासनाध्यक्ष एक सैनिक जनरल था । उसका
मुख्यालय बीजिंग में था। 1919 ई में पेरिस शान्ति सम्मेलन ने शांतुंग प्रदेश को जापान के हवाले
करने का निर्णय दिया। इससे चीन में साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ हो
गया। इसका श्रीगणेश 4 मई, 1919 को बीजिंग विविद्यालय के छात्रों द्वारा साम्राज्यवाद विरोधी
प्रदर्शन से हुआ । यह आंदोलन ‘चार मई आंदोलन’ के नाम से विख्यात है । यह आंदोलन शीघ्र
ही चीन के अन्य भागों में भी फैल गया । 1921 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई जो
शीघ्र ही देश की एक प्रमुख शक्ति बन गई। इस समय प्रसिद्ध चीनी नेता सनयात सेन भी चीन
को एकीकृत करने के लिए प्रयत्नशील थे। वे पश्चिमी देशों की सहायता से अपने उद्देश्य की
पूर्ति करना चाहते थे। परंतु जब उन्हें पश्चिम की ओर से कोई सहायता न मिली, तो उन्होंने
सोवियत संघ से समर्थन माँगा । अन्ततः 1925 ई. में कोमिनतांग तथा कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग
से एक राष्ट्रीय सरकार गठित करने का निर्णय लिया गया । इस सेना ने शीघ्र ही युद्ध सरदारों
के विरुद्ध अपना अभियान आरंभ कर दिया । परंतु मार्च, 1925 ई. में डॉ. सनयात सेन का देहांत
हो गया जिससे स्थिति बिल्कुल बदल गई ।
डॉ. सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् की घटनाएँ- (i) डॉ. सनयात सेन की मृत्यु के
पश्चात् कोमिनतांग तथा कम्युनिस्ट पार्टी का गठबंधन समाप्त हो गया और देश में गृह युद्ध छिड़
गया । अब वहाँ किसान तथा मजदूर सक्रिय हो उठे। 1925 में ही शंघाई में मजदूर की हत्या
के विरोध में हड़तालें और प्रदर्शन हुए। ये हत्याएँ जापानी उद्योगपतियों तथा ब्रिटिश पुलिस की
कार्यवाही से हुई थीं । विद्रोही किसानों ने कई स्थानों पर अपने भू-स्वामियों से उनकी भूमि छीन ली।
(ii) 1927 ई. के मार्च मास में राष्ट्रीय क्रांतिकारी सेना नानकिंग पहुँची । यहाँ संयुक्त राज्य
अमेरिका तथा ब्रिटेन के युद्ध पोतों ने गोलाबारी आरंभ कर दी। इस गोलाबारी में सैकड़ों लोग
मारे गए । परंतु उसी समय कोमिनतांग में फूट पड़ गई और राष्ट्रीय क्रांतिकारी सेना के नेता
च्यांग-काई-शेक ने नानकिंग में अपनी सरकार स्थापित कर ली । वह कोमिनतांग में विद्यमान
वामपंथी तत्वों में कम्युनिस्ट दल (मजदूरों) की शक्ति का दमन करना चाहता था। उसकी सैनिक
टुकड़ियों ने शंघाई में मजदूरों के घरों में छापे मार कर हजारों की संख्या में मजदूरों को मार डाला।
(iii) 1 दिसम्बर, 1927 को कैंटन में कम्युनिस्टों ने एक विद्रोह का नेतृत्व किया और
सोवियत रूस की एक सरकार स्थापित की, परंतु इस विद्रोह को कुचल दिया गया । इस घटना
में लगभग 5000 मजदूर मारे गये । इससे चीन के राष्ट्रीय आंदोलन में फूट पड़ गयी । सोवियत
सलाहकारों को चीन से बाहर निकाल दिया गया तथा कोमिनतांग के अनेक नेता देश छोड़कर
चले गये । इनमें सनयात सेन की विधवा भी शामिल थी। परंतु देश में कम्युनिस्टों की शक्ति
का पूरी तरह पतन नहीं हुआ । कई कम्युनिस्ट देश के विभिन्न भागों में फैल गये और उन्होंने
कुछ प्रदेशों को अपने नियन्त्रण में ले लिया । इस प्रकार चीन का गृह-युद्ध एक नये चरण में
प्रवेश कर गया जो कम्युनिस्टों तथा च्यांग-काई-शेक सरकार के बीच चला।
(iv) मंचूरिया पर जापानी अधिकार के कारण चीन में जापानी माल के बहिष्कार का भी
एक आंदोलन चला। परंतु इस संबंध में कोमिनतांग के नेता च्यांग-काई-शेक तथा कम्युनिस्टों के
बीच एकता स्थापित न हो सकी । कोमिनतांग ने जापान के विरुद्ध कार्यवाही करने की बजाय
कम्युनिस्टों की शक्ति कुचलने की और ही अपना ध्यान लगाया । परंतु ग्रामीण प्रदेशों में कम्युनिस्टों
की शक्ति निरंतर बढ़ती ही चली गई । इसी बीच माओ-त्से-तुंग एक प्रभावशाली कम्युनिस्ट नेता
के रूप में उभर कर सामने आये । उन्होंने किसान शक्ति की सहायता से देश में समाजवादी क्रांति
लाने की योजना बनाई । परंतु 1934 ई. में च्यांग-काई-शेक ने एक विशाल सेना के साथ
कम्युनिस्टों के प्रभाव क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया । कम्युनिस्ट यह नहीं चाहते थे कि उनका पूरी
तरह सफाया कर दिया जाये । अत: वे अपने प्रभाव क्षेत्रों को छोड़कर चले गये । उनमें से लगभग
1 लाख कम्युनिस्ट उत्तर-पश्चिम की ओर येनान क्षेत्र में जा पहुँचे । येनान पहुँचने में कम्युनिस्टों
ने लगभग छः हजार मील की लयी यात्रा की। इसी कारण इतिहास में यह घटना ‘लंबी यात्रा’
(Long, March) के नाम से विण्यात है। इस घटना के कारण कम्युनिस्टय की लोकप्रियता में
काफी वृद्धि हुई। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान अनेक जमीदास भूमि छीन कर किसानों में
बाँट दी थी । अत: लोगों के मन में यह बात पूरी तरह बैठ गई कि कम्युनिष्ट दल ही जन-साधारण
का भला कर सकता है। लोग च्यांग-काई-पाक की सरकार को जमादार, यूदया तथा सौदागरों
की सरकार समझने लगे।
(v) 1937 में चीन पर एक भीषण जापानी आक्रमण हुआ। व्योग-काई-शेक की सेना,
जो केवल कम्युनिस्ट विरोधी कार्यवाही में ही व्यस्त थी, जापानी सेना के सामने न टिक सकी।
परिणामस्वरूप उसे पीछे हटना पड़ा । उनकी सरकार का मुख्यालय नानकिंग से हटकर चंगकिंग
में पहुँच गया । परंतु इसी बीच जापानी आक्रमण को रोकने के लिए एक संयुक्त मोर्थ का गठन
भी किया जा चुका था। यह सब एक महत्वपूर्ण घटना के कारण संभव हुआ था जिसमें
च्यांग-काई-शेक को बंदी बना लिया गया था और उसे तब तक नहीं छोड़ा गया था, जब तक
कि कोमिनतांग कम्युनिस्टों के साथ मिलकर जापान का विरोध करने के लिए तैयार न हो गये।
परंतु इस एकता के बावजूद भी दोनों दलों के लोग एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखते रहे।
परिणाम-डॉ. सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् चीन में जो घटना चक्र चला, उसका सबसे
महत्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि कम्युनिष्ट दल एक शक्तिशाली दल के रूप में उभरकर सामने आया।
प्रश्न 12. क्या आप मानते हैं कि माओ-से-तुंग और चीन के साम्यवादी दल ने चीन
को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की नींव डालने में सफलता प्राप्त की?
उत्तर-इसमें कोई संदेह नहीं कि माओ-से-तुंग अथवा माओजेदांग और उसके साम्यवादी
दल ने चीन को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की नींव डालने में सफलता प्राप्त की।
यह बात नीचे दिए गए पटनाक्रम से स्पष्ट हो जाएगी-
सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् कोमिनतांग की गतिविधियां-1925 में सनयात सेन
की मृत्यु के पश्चात् कोमिंतांग का नेतृत्व च्यांग-काई-शेक के हाथों में आ गया। इससे पूर्व 1921
में चीन में साम्यवादी दल की स्थापना हुई थी। यद्यपि उसने कोमिंतांग के शासन को सुदृढ़ बनाया,
तो भी उसने सनयात सेन के तीन क्रांतिकारी उद्देश्यों को पूरा करने की दिशा में कोई कदम न
उठाया । इसके विपरीत उसने कोमिंतांग में अपने विरोधियों तथा साम्यवादियों को कुचलने की
नीति अपनाई । उसे सोवियत संघ का समर्थन भी प्राप्त था । इसके अतिरिक्त उसने जमींदारों
के एक नये वर्ग को उभारने का प्रयास किया जो किसानों का शोषण करते थे। इसी बीच
माओ-जेदांग नामक साम्यवादी नेता ने किसान आंदोलन को मजबूत बनाने के लिए लाल सेना का
निर्माण किया।
माओ जेदांग का उत्कर्ष-1930 में माओ जेदांग किसानों तथा मजदूरों की सभा का
सभापति बन गया और भूमिगत होकर काम करने लगा। उसके सिर पर 25 लाख डालर का
इनाम था । उसने नए सिरे से लाल सेना का संगठन किया और च्यांग-काई-शेक की विशाल
सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध आरंभ कर दिया। उसने च्यांग की सेना को चार बार भारी पराजय
दी। परंतु पाँचवें आक्रमण में उस पर इतना दबाव पड़ा कि उसने ‘महाप्रस्थान’ (Long March)
की योजना बनाई और उसे कार्यान्वित किया । लाल सेना के इस प्रस्थान की गणना विश्व की
अद्भुत घटनाओं में की जाती है। इस यात्रा में लगभग एक लाख साम्यवादियों ने भाग लिया।
उन्होंने 268 दिनों में 6000 मील की दूरी तय की और देश के उत्तरी प्रांतों रॉसी तथा कांसू
(Shensi and Kansu) पहुँचे । यहाँ तक पहुँचने वालों की संख्या केवल 20,000 ही थी
1935 में माओ ने जापानियों के विरुद्ध साम्यवादी मोर्चा खड़ा किया । उसने अनुभव किया
कि जापान के विरुद्ध संघर्ष उसे लोकप्रिय बना देगा और उसके जन-आंदोलन को भी अधिक
प्रभावशाली बनाएगा । उसने यह भी सुझाव दिया कि कोमितांग लाल सेना के साथ मिल कर
कार्य करे और संयुक्त मोर्चे की स्थापना की जाए परंतु च्यांग ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस
बात से च्यांग की प्रतिष्ठा को इतना अधिक आघात पहुँचा कि उसके अपने ही सैनिकों ने उसे
बंदी बना लिया। माओ ने तब तक जापान के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा, जब तक उसे सफलता
नहीं मिली।
च्यांग के विरुद्ध संघर्ष-च्यांग माओं की बढ़ती हुई शक्ति से बहुत चिन्तित था। वह
उसके साथ मिलकर काम नहीं करना चाहता था। बहुत कठिनाई के बाद वह जापान के विरुद्ध
माओ का साथ देने के लिए तैयार हुआ । जब युद्ध समाप्त हुआ तो माओ ने च्यांग के सामने
मिली-जुली सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा, परन्तु च्यांग ने इसे स्वीकार नहीं किया । माओ ने
अपना संघर्ष जारी रखा। 1949 में च्यांग को चीन से भाग कर फारमोसा (वर्तमान ताइवान) में
शरण लेनी पड़ी। माओ जंदांग को चीन की सरकार का अध्यक्ष (Chaiman) चुना गया।
अपनी मृत्यु तक वह इसी पद पर बना रहा ।
प्रश्न 13. चीन में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना कैसे हुई? इस क्रांति के चीन पर
पड़े प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा, चीन में 1949 की क्रांति कैसे हुई? चीन पर इसके क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर–चीन में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना निम्नलिखित चरणों में हुई-
(i) डॉ. सनयात-सेन की मृत्यु के पश्चात् च्यांग-काई-शेक के नेतृत्व में कोमिंतांग और
माओ जेदांग (माओ-त्से-तुंग) के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी के बीच गुहयुद्ध छिड़ गया।
(ii) चीन पर जापानी आक्रमण के समय दोनों पार्टियों और उनकी सेनाओं ने जापानी
आक्रमण का सामना करने के लिए कुछ समय तक आपस में सहयोग किया परंतु इनका आपसी
टकराव फिर भी समाप्त न हुआ।
(iii) कोमितांग मुख्यतः पूंजीपतियों और जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी
थी। दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी मजदूरों और किसानों की पार्टी थी। कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण
वाले क्षेत्रों में जमींदारों की जागीरें जब्त करके जमीन को किसानों के बीच बाँट दिया गया। अपनी
इन नीतियों से कम्युनिस्ट पार्टी ने धीरे-धीरे करोड़ों चीनी लोगों को अपना समर्थक बना लिया था।
कम्युनिस्ट पार्टी ने जनमुक्ति सेना नाम से एक बड़ी सेना भी बना ली थी।
(iv) जापान की हार तथा चीन से जापानी सैनिकों के भागने के बाद गृहयुद्ध फिर से भड़क
उठा । अमेरिकी सरकार ने च्यांग-काई-शेक को भारी सहायता दी। परंतु उसको सेनाएँ 1949
तक पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं । अपनी बची-खुची सेना के साथ च्यांग-काई-शेक ताईवान
(फारमोसा) चला गया । अक्टूबर, 1949 को चीनी लोक गणराज्य की स्थापना की घोषणा की
गई और माओ उदांग के नेतृत्व में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई।
चीन पर क्रान्ति के प्रभाव-(i) 1949 को चीनी क्रांति ने चीनी समाज के स्वरूप को
बदल डाला । परंपरागत चीनी समाज कन्फयूशियस के सिद्धांतों और विचारों पर आधारित था।
परंतु क्रांति के बाद देश में नई विधारधारा उत्पन्न हुई। अब श्रमिक वर्ग और चीनी नागरिकों को
उचित सम्मान दिया जाने लगा।
(ii) इस क्रांति से चीनी लोगों का दैनिक जीवन काफी सुधी हो गया । क्रांति के बाद
साम्यवादी सरकार ने देश में राशन प्रणाली आरंभ की और जीवन की आवश्यकताओं को लोगों
तक पहुंँचाया । बीमारियों, आगजनी और लूटमार के अपराधों पर भी निकाल करने का प्रयास
किया गया।
(iii) इस क्रांति से भूमिहीन किसानों को भूमि मिली। इसके अतिरिक्त सरकार ने किसानों
की सहायता के लिए सहकारी समितियों बनाई।
(iv) इस क्रांति से स्त्रियों की दशा में भी परिवर्तन आया । क्रांतिकारी सरकार ने स्रियों
के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाये। उनके क्रय-विक्रय को अवैध घोषित कर दिया गया।
(v) चीनी क्रांति से विश्व में समाजवादी विचारधारा को बल मिला ।
प्रश्न 14. जापान ने अपने सैन्य आधुनिकीकरण के औचित्य को किस प्रकार सही
ठहराया ?                             
उत्तर-जापान में मेजी पुनस्र्थापना के पश्चात जापान में शिक्षा, उद्योग, सैन्य, राजनीति आदि
अनेक क्षेत्रों का आधुनिकीकरण किया। सैन्य आधुनिकीकरण के पीछे यूरोपीय देशों द्वारा जापान
को अपने उपनिवेश बना लेने का डर, उच्च करों को वसूलने में उठने वाले विद्रोह को दबाने तथा
विश्व के मानचित्र पर एक सशक्त देश के उभरने की महत्वाकांक्षा थी। अत: इन्नों बातों के आधार
पर जापान ने अपने सैन्य आधुनिकीरण के औचित्य को सही ठहराया।
प्रश्न 15. मेइजी पुनर्स्थापना के पश्चात जापान के आधुनिकीकरण हेतु कौन-कौन से
कदम उठाये गये।
उत्तर मेइजी पुनर्स्थापना के पश्चात् जापान ने शिक्षा, उद्योग, सैन्य, राजनीति, आधुनिकीकरण
के पीछे यूरोपीय देर्शों द्वारा जापान को अपने अपने उपनिवेश बना लेने का डर, उच्च करों को
वसूलने में उठने वाले विद्रोहों को दबाने तथा विश्व के मान चित्र पर एक सशका देश के उभरने
की महत्वाकांक्षा थी। अत: इन्हीं बातों के आधार पर जापान ने अपने सैन्य आधुनिकीकरण के
औचित्य को सही ठहराया। अशिक्षा, सामंती व्यवस्था, आर्थिक अव्यवस्था तथा विदेशी शक्तियों
द्वारा जापान की आंतरिक व्यवस्था से लाभ उठाकर उपनिवेश बनाने की कोशिश में 1867 में
जापान के सम्राट मुत्सहितो को, जिसने ‘मेहजी’ की उपाधि धारण की, सता सौंप दिया। इसे ही
इतिहास में मेइजी पुनर्स्थापना कहते हैं।
उपर्युक्त समस्याओं के निराकरण हेतु आवश्यकता थी जापान के आधुनिकीकरण करने की,
जिसे सम्राट ने धैर्य के साथ किया। इसी हेतु 1871 में सामंतवादी व्यवस्था का महाँ अन्त कर
दिया गया। शासन में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिये दो सदन वाली डायर की
स्थापना की गई। नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का दर्जा दिया गया।
मेइजी पुनर्स्थापना के पश्चात् शिक्षा की अतीव उन्नति जापान में हुई। जापान में शिक्षा का
आधार राष्ट्रीयता के प्रसार को बनाया गया।

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इकाई एक : प्रारंभिक समाज 

इकाई एक : साम्राज्य  

इकाई एक : बदलती परंपराएँ

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