9th english

bihar board 9 class english solution | THE SECRET OF WORK

THE SECRET OF WORK

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bihar board 9 class english solution

class – 9

subject – english

lesson 1 – THE SECRET OF WORK

THE SECRET OF WORK
—Swami Vivekanand

Introduction : Swami Vivekanand [1863- 1902] is considered as one of the makers of modern India. His name was Narendra Nath Duty. He became the disciple of Ramakrishna Paramhans and became famous as Swami Vivekanand after the joined the Ashram of Ramkrishna Paramhans. At very young age, he toured extensively in the country and abroad and propgated the ideal of his master. He also apprised the world with the cultural heritage of India which made a deep impact on the population of the world.
This writing entitled ” Secret of Work”  has been taken from his lectures on Karma— Yoga which was later published bin a book from.
The main idea of ‘ Karm Yoga’ throws  light on Karm which is work or duty. It advocates to leave the result in the hands of almighty [सर्वशक्तिमान यानी ईश्वर ] of what you do.
                   

SUMMARY

The whole philosophy of Karma Yoga has been dealt by the narrator in eleven peragraphy of this lesson ‘ The Secret of Work’ .
1. The world is full of miseries. The miseries arise due to ignorance of mankind. The writer says ” Ignorance is the mother of all evil”.
One has to be spiritually strong and educated to ward off misery from his life. Mankind has to be made pure and prefect .
2. The effect of work is either good or bad. God Commands us to work will have good effect and bad  work will bring bad result. God Commands is to work incessantly. Do work but keep your soul out of bondage . It means that never involve yourself go have a desired result. This desire of man is the source of agony which should be avoided.
3. The writer or the narrator says that mind is just like a lake where the wave of thoughts rises and drowns at the end but it leaves a mark which means that the thoughts may reappear again. This reappearance of thoughts is part of your ‘Sanskara’ .
Each man’s character is determined by this Sanskara. If good impressions prevail, the character becomes good. The work done by him will be good and the result will be always good.
4. Swami Vivekanand says that making of character is like the formation of a shell of a tortoise. One may break the outer shell of the tortoise into pieces but the tortoise will not take out its feet and head once it tukes [अंदर छुपा लेना] both the organs into the shell. Man also control his organs and the inner motive to the suitability of his character and only a man of character can achieve truth. He can not do any evil.
5. We meet hundred of persons during the day. Out of this hundred some may be good , some may be bad. There may be one whom you love the most. At night when you go to bed , you remember only the best whom you love. The others just vanish from your mind.
6.  This world is not permanent habitation. It is one of the stops in the long journey of life and soul. So Swamiji says. ‘ Be unattended ‘. So you  work as you are a stranger in this land.
7. Do not work like a slave, work line a master. Ninety percent of man and woman work like a sleve and the result is misery and pain. A slave works without any pleasure in the work and so he can not find love in what he does. There is no act of love which can’t bring happiness in life. So that is the difference between the work of a slave and a master. The master’s work brings peace while the slave’s work brings misery.
8. Lord Krishna says: If I stop from work for a moment, the whole uni- verse will decay and die. Because, I love the world, I work incessantly but still I keep myself unattended.
9. As soon as one realized this point, his work is done and he has attached the goal.
10. Whatever you do for your child, a particular person, a city or a state expect nothing in return as you do not ask anything from your children for the work you have done for them . This will bring pleasure for you and you will remain unattended to this worldly bondage.
11. There are two things which guide the conduct of a man-might and mercy. The exercise of might is an act of selfishness. Mercy is heavenly.
To be good, one has to have mercy. The selfless and unattended person can live in the mid of crowded and sinful city but he will be carrying no sin. It is the Same way as the lotus leaf carries water drops on its body but the drops are unable to wet the lotus leaf. So mercy is the man’s real virtue.

         SUMMARY IN HINDI
स्वामी विवेकानंद की गणना आधुनिक भारत के निर्माणओं में की जाती है। उनका जन्म 1863 में हुआ था और मात्र 39 वर्ष की अल्प आयु में वे इस संसार को छोड़कर चले गये। उनकी मृत्यु वर्ष 1902 में हो गयी। पर अपने छोटे से जीवन काल में उन्होंने ऐसे कार्य किये जो उनके जीवन को अमरत्व प्रदान करता है। उनके मामा – पिता ने उनका नाम नरेंद्रनाथ दत्त रखा था।
बाद में रामकृष्ण परमहंस के प्रधान शिष्य बन गये स्वामी विवेकानंद के नाम से सुविख्यात हुये। अपने युवा काल में ही विवेकानंद ने देश और विदेश का पर्यटन किया और अपने गुरु आदर्शों को सर्वत्र फैलाया । उन्होंने भारत की सांस्कृतिक उपलब्धियों और ज्ञान के असीम भंडार से विश्व के लोगों का परिचय करवाया। इसने विश्व के जनमानस पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ा।
‘द सिक्रेट आॅफ वर्क ‘ नामक यह निबंध उनके व्याख्यान से लिया गया है जिसका विषय था ‘कर्म  योग ‘ कर्म योग उस वैदिक सिद्धान्त पर प्रकाश डालता है जिसमें कहा गया है कि मनुष्य अपना कर्म निष्ठापूर्वक करें और उसके फल की प्राप्ति की अपेक्षा न करे। फल देने वाला सर्वशक्तिमान है।

                 निबन्ध का सारांश
अपने इस व्याख्यानात्मक निबन्ध में, व्याख्याता ने कर्मयोग्य पर विस्तार से विचार किया है जो यहाँ ग्यारह पाराग्राफ में समाहित है। लेखक कहता है —
1. यह जीवन , दुखों का खजाना है। हमारे अन्तर की अज्ञानता के कारण ही ये दु:ख जन्म लेते हैं। लेखक कहता है हमारे सभी अनर्थों के मूल में हमारी अज्ञानता है। इस अज्ञानता को दूर करने के लिए हमें अपनी आत्मिक शक्ति को मजबूत बनाना होगा। शिक्षा को उसका आध पर बनाना होगा। मानव समुदाय को निश्छल, निर्दोष और उत्तम बनाने की आवश्यकता है।
2. किसी भी कार्य का प्रभाव या तो अच्छा होगा या फिर बुरा । लेकिन इतना निश्चित है कि अच्छे कार्य का प्रतिफल ही होना चाहिये। बुरे कार्य का अंत सदा बुरा होता है। ईश्वर हमें इस दुनिया में कार्य करने के लिये भेजता है। कार्य करो पर अपने को बन्धन से मुक्त रखो । यह बन्धन हमारी इच्छा है जो दु:खों को जन्म देती है हमारी इच्छा ही हमारे ताप का कारण है।
3. लेखक कहता है कि मानव का मस्तिष्क एक तालाब की तरह है। इस सरोवर में विचारों का तरंग उठता है जो एक सीमा तक जाकर विलीन हो जाता है। लेकिन मस्तिष्क के अंत: भाग में यह सुरक्षित रहता है — इसका अर्थ यह हुआ कि यह कभी भी जागृत होकर उपस्थित हो सकता है। यह चिन्तन का पुनः जागरण ही हमारे संस्कारों का निर्माण करता है। मनुष्य के चरित्र की विविधता उसके अंदर के संस्कार पर आधारित होता है । इसीलिए मनुष्य के चारित्रिक गुण अलग-अलग होते हैं। अपने संस्कारगत गुणों के कारण मनुष्य में सद्बुद्धि का प्रभाव अधिक जागृत होता है और इस प्रकार उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है। उसके द्वारा किया गया कार्य उत्तम होगा और उसका प्रतिफल सदैव अच्छा होगा।
4. स्वामी विवेकानंद का कथन है कि मनुष्य में  चरित्र  का निर्माण एक कछुये के खोल क्षकी तरह होता है। एक कछुये के बाहरी आवरण के आप टुकड़े – टुकड़े कर दें पर फिर भी कछुआ अपनी गर्दन और पैरों को कभी भी बाहर नहीं आने देगा ? कहने का तात्पर्य है कि चारित्रिक विशेषतायें विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी पहचान नहीं खोती हैं। वह अन्त तक बनी रहती है। मनुष्य अपने बाहरी अंग और आन्तरिक कार्यकलापों पर अपने चारित्रिक विशेषताओं के अनुसार नियंत्रित करता है। वही सत्य की प्राप्ति भी करता है।
5. हम अपने दैनिक जीवन में सैकड़ों लोगों से मिलते हैं। इनमें कुछ अच्छे होते हैं और कुछ खराब । कुछ ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें आप हृदय से चाहने लगते हैं। उनपर आपका प्यार उमड़ता है। रात्रिकाल में जब आप सोने जाते हैं तो आपके मन में बार-बार उन्हीं की छवि उभरती है जिन्हें आप प्यार करते हैं या दिल से चाहते हैं। दूसरे मिलने वाले लोगों की छवि आपके मस्तिष्क से लुप्त हो जाती है।
6. स्वामीजी कहते हैं — यह विश्व, यह  धरती हमारा स्थायी निवासी नहीं है। यह जीवन की लम्बी यात्रा में मात्र एक पड़ाव है। स्वामीजी का कहना है कि आप असंपृक्त होकर यहाँ निवास करें और बना किसी फल की चाह के कार्य करें आप इस दुनिया के एक अपरिचित इन्सान हैं।
7. इसीलिये आप एक गुलाम बनकर यहाँ न जीयें आप अपने कार्य के स्वयं नियामक या अधिपति हैं। दुनियाँ के नब्बे प्रतिशत लोग, एक गुलाम , एक दास की तरह कार्य करते हैं और इस दासता के कारण दु:ख के भागी बनते हैं। प्यार ,प्रेम का कोई ऐसा कार्य नहीं है जिससे आनन्द की सृष्टि नहीं होती है।
8. भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है— अगर मैं एक क्षण के लिये कार्य करना बंद कर दूँ तो सारी पृथ्वी , सारी संरचना तहस- नहस होकर नष्ट हो जायेगी। चूँकि में इस कृति को प्यार करता हूँ  इसीलिये मैं अनवरत कार्य करता हूँ। मेरी इनमें कोई आसक्ति नहीं होती।
9. जैसे ही कोई इस सत्य को समझ लेगा , वह लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा और माना जायेगा कि उसने जीवन का अपना कार्य सम्पन्न कर लिया।
10. आप जिसके लिये भी कोई कार्य करें — चाहे तो वह आपका पुत्र हो, कोई व्यक्ति हो, समाज हो राज्य हो — आप उसके बदले में किसी फल – प्राप्ति की अपेक्षा करें। वह वैसा ही है जैसा आपका अपने पुत्र के लिये किया गया कार्य – आप अपने पुत्र से एवज में किसी मूल्य की अपेक्षा नहीं करते। इस प्रकार आपके हृदय में आनन्द की सृष्टि होगी और आप इस दुनियावी बन्धन से अपने को मुक्त रख पायेंगे ।
11. मनुष्य के आचरण को दो वस्तुयें प्रभावित करती हैं— शक्ति और दया । शक्ति का प्रयोग स्वाथीपन का आचरण दर्शाता है। दया ईश्वर की भक्ति है — दया में ईश्वर का वास है। दया उत्तम चरित्र का प्रतिक है। एक नि: स्वार्थी तथा असंपृक्त व्यक्ति जिसे दुनिया से मोह नहीं है, पापियों के समुदाय के बीच रहकर भी कमल के पत्ते पश्र चमकते पानी के बुँद की तरह प्रकाशमान बना रहेगा। उस पर पाप की छाया भी नहीं पड़ेगी और वह पत्ते के ऊपर रहकर भी पत्ते से बिल्कुल अलग रहेगा। अतः दया ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

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