10th hindi

bihar board class 10 hindi solution | भारत से हम क्या सीखें

भारत से हम क्या सीखें

bihar board class 10 hindi solution

वर्ग – 10

विषय – हिंदी

पाठ 3 – भारत से हम क्या सीखें

 भारत से हम क्या सीखें
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                                                        -मैक्समूलर
लेखक परिचय-विश्वविख्यात विद्वान फ्रेड्रिक मैक्समूलर का जन्म आधुनिक जर्मन के डसाउ नामक नगर में 6 दिसम्बर, 1823 ई० में हुआ था। इनके पिता विल्हेल्म मूलर थे। पिता
को मृत्यु के बाद अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के बीच भी मैक्समूलर अध्ययन से विरत नहीं हुए। ये बचपन में ही संगीत, ग्रीक और लैटिन भाषा के विशेषज्ञ बन गए। 18 वर्ष की अवस्था में लिपजिंग वि० वि० में उन्होंने संस्कृत का अध्ययन शुरू किया। वे लैटिन काव्य सृजन भी किया
करते थे।
कृतियाँ:-1994 ई. मैक्समूलर ने संस्कृत के हितोपदेश का जर्मन भाषा में अनुवाद प्रकाशित करवाया ‘कंठ’ और केन आदि उपन्यासों का भी जर्मन भाषा में अनुवाद प्रस्तुत किया। ‘मेघदूत’ महाकाव्य का भी जर्मन पद्यानुवाद कर यश का भी काम किया। इन्होंने जर्मन एवं लैटिन भाषा में अनेक रचनाओं का सृजन कर्म करके अपनी प्रतिभा से विश्व को अवगत कराया।
साहित्यिक विशेषताएँ:-मैक्समूलर पाश्चात्य विद्वानों में अग्रगण्य है। इन्होंने वैदिक तत्त्व ज्ञान को मानव सभ्यता का मूल स्रोत माना। विवेकानन्द ने इन्हें ‘वेदांतियों का भी वेदांती’ कहा था। भारत के प्रति इनका अनुराग अत्यधिक था। इन्होंने भारतीय मनिषियों द्वारा सृजित साहित्य
को विश्व पटल पर लाने का काम किया। उसकी महता और उपयोगिता से सबको अवगत कराया। ये सच्चे रूप में भारत भक्त थे। संस्कृत साहित्यानुरागी थे। वेदों के प्रति अगाध श्रद्धा थी। इनके साहित्य में भारतीय वाङमयी विशेषताओं पर गंभीर चिंतन परक सारगर्भित निबंध पढ़ने एवं देखने
योग्य है।
      इनके साहित्य में भारतीय साहित्य, प्रकृति, भाषा, संस्कृति, सभ्यता का विशद् चित्रण हुआ
सारांश :-‘भारत से हम क्या सीखें’ निबंध द्वारा मैक्समूलर ने भारतीय श्री संपदा से पूरे विश्व को अवगत कराया है। भारत ने पूरे विश्व को क्या दिया है। मानव हित के लिए इनके द्वारा
संपादित कार्यों का कितना महत्त्व है, आदि विषयों पर तर्कसंगत और व्यावहारिक पक्षों पर अपनी लेखनी द्वारा ध्यान केन्द्रित करते हुए मैक्समूलर ने विशद् प्रकाश डाला है।
            भारतीय भू-संपदा, प्राकृतिक सुषमा, भू-आकृति, जंगल-जमीन, जल आदि के बारे में विशद चर्चा करते हुए भारत की महत्ता को रेखांकित किया है।
              संस्कृत भाषा की प्राचीनता उसकी उपयोगिता, भाषिक संरचना उसे महत्व पर पूर्णरूपेण प्रकाश डालते हुए भारतीय लोगों के रहन-सहन, खान-पान का सम्यक चित्रण किया है।
              भारत का इतिहास, भूगोल, ज्ञान-विज्ञान काफी पुराना है। यहाँ के मनीषियों ने अपनी साधना और त्याग भावना से लोकहित का काम किया है। मैक्समूलर से इसकी प्राचीन विशेषता विलक्षता की चर्चा करते हुए नवागंतुकों को यह संदेश दिया है कि विश्व की सभ्यता भारत से बहुत कुछ सीखती है और ग्रहण करती है। मैक्समूलर भी स्वयं के भाग्यशाली मानते हैं कि इस विलक्षण देश की सभ्यता-संस्कृति को करीब से देखने समझने का उन्हें मौका मिला इस भाषण की महत्ता
आज भी है। स्वदेशाभिमान के विलोपन के इस दौर में इस भाषण की उपयोगिता और बढ़ जाती है।
              इस लेख से नयी पीढ़ी अपने देश तथा इसकी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-साधना, सांस्कृतिक वैभव, प्राकृतिक वैभव से अवगत होगी। यह लेख एक प्रामाणिक लेख है जो भारतीय लोकजीवन उसके साहित्य, इतिहास, दर्शन, भाषा, लोकरीतियों आदि पर सम्यक प्रकाश डालता
है।
        गद्यांश पर आधारित अर्थ ग्रहण-संबंधी प्रश्न
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1. सर्वविध सम्पदा और प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण कौन-सा देश है, यदि आप मुझे इस भृमण्डल का अवलोकन करने के लिए कहें तो बताऊँगा कि वह देश है-भारत। भारत, जहाँ भूतल पर ही स्वर्ग की छटा निखर रही है। यदि आप यह जानना चाहें कि मानव मस्तिष्क की उत्कृष्टतम उपलब्धियों का सर्वप्रथम साक्षात्कार किस देश ने किया है और किसने जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर विचार कर उनमें से कइयों के ऐसे समाधान ढूँढ निकाले हैं कि प्लेटो और काण्ट जैसे दार्शनिकों का अध्ययन करनेवाले हम यूरोपियन लोगों के लिए भी वे मनन के योग्य है, तोमैं यहाँ भी भारत ही का नाम लूंगा। और यदि यूनानी, रोमन और सेमेटिक जाति के यहूदियों की विचारधारा में ही सदा अवेगाहन करते रहनेवाले हम यूरोपियनों को ऐसा कौन-सा साहित्य पढ़ना चाहिए जिससे हमारे जीवन का अंतरतम परिपूर्ण, अधिक सर्वागीण, अधिक विश्वव्यापी, यू कहें, कि सम्पूर्णतया मानवीय बन जाये, और यह जीवन ही क्यों, अगला जन्म तथा शाश्वत जीवन भी सुधर जाये, तो मैं एक बार फिर भारत ही का नाम लूँगा।
    [2011 (A)]
(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) विष के दाँत
(ख) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ग) भारत से हम क्या सीखें
(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ख) मैक्समूलर
(ग) अशोक वाजपेयी
(घ) भीमराव अंबेदकर
(ग) लेखक ने बार-बार भारत का ही नाम क्यों लिया है?
(घ) भारत ने किसका साक्षात्कार किया है?
उत्तर-(क)-(ग) भारत से हम क्या सीखें
(ख)-(ख) मैक्समूलर
(ग) लेखक का भारत के प्रति अगाध प्रेम-संबंध है। भारतीय साहित्य और संस्कृति
अनायास विदेशियों को आकर्षित कर लेते हैं। मानवीय मूल्यों के संपोषक भारत ने विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम् का पाठ पढ़ाया है यही कारण है कि लेखक ने बार-बार भारत का ही नाम लिया है।
(घ) भारत ने मानव मस्तिष्क की उत्कृष्टतम उपलब्धियों का सर्वप्रथम साक्षात्कार किया है। पाश्चात्य देशों से आनेवाले इसकी संस्कृति से प्रभावित हुए हैं। जो भी यहाँ आया भारत से कुछ-न-कुछ सीखकर गया है।
2. यदि आपके मन में पुराने सिक्कों के लिए लगाव है, तो भारतभूमि में ईरानी, केरियन, थेसियन, पार्थियन, यूनानी, मेकेडिनियन, शकों, रोमन और मुस्लिम शासकों के सिक्के प्रचुर परिमाण में उपलब्ध होंगे। जब वारेन हेस्टिंग्स भारत का गवर्नर जनरल था तो वाराणसी के पास उसे 172 दारिस नामक सोने के सिक्कों से भरा एक घड़ा मिला था। वारेन हेस्टिंग्स ने अपने मालिक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के निदेशक मंडल की सेवा में सोने के सिक्के यह समझकर भिजवा दिये कि यह एक ऐसा उपहार होगा जिसकी गणना उसके द्वारा प्रेषित सर्वोत्तम दुर्लभ वस्तुओं में की जाएगी और इस प्रकार वह स्वयं को अपने मालिकों की दृष्टि में एक महान उदार व्यक्ति प्रमाणित कर देगा। किन्तु उन दुर्लभ प्राचीन स्वर्ण मुद्राओं की यह नियति थी कि कम्पनी के निदेशक उनका ऐतिहासिक महत्त्व समझ ही न पाए और उन्होंने उन मुद्राओं को गला डाला। जब वारेन हेस्टिंग्स इंग्लैंड लौटा तो वे स्वर्ण मुद्राएँ नष्ट हो चुकी थीं अब यह आप लोगों पर निर्भर करता है कि आप ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ भविष्य में कभी न होने दें।
(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) भारत से हम क्या सीखें
(ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ
(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं?
(क) भीमराव अंबेदकर
(ख) मैक्समूलर
(ग) अशोक वाजपेयी
(घ) यतीन्द्र मिश्र
(ग) वारेन हेस्टिंग्स ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के निदेशक मंडल को सोने के सिक्कों को क्या सोचकर भिजवाया था?
(घ) कंपनी निदेशक द्वारा सोने के सिक्कों को गलवाने की घटना से लेखक हमें किस ओर संकेत करना चाहता है?
उत्तर-(क)-(क) भारत से हम क्या सीखें
(ख)-(ख) मैक्समूलर
(ग) वारेन हेस्टिंग्स महत्त्वाकांक्षी था। उसने अपने मालिक ईस्ट इण्डिया कंपनी के निदेशक मंडल की सेवा में सोने के सिक्के यह सोचकर भिजवाये थे कि यह उसका ऐसा उपहार होगा जिसकी गणना उसके द्वारा प्रेषित सर्वोत्तम दुर्लभ वस्तुओं में की जायेगी और वह अपने मालिक
की दृष्टि में एक महान उदार व्यक्ति बन जायेगा।
(घ) सोने के सिक्के दुर्लभ वस्तुओं में से थे। कंपनी निदेशक उन सिक्कों के ऐतिहासिक महत्त्व को नहीं समझ पाये और उन सिक्कों को गलवा दिया। वस्तुतः यहाँ लेखक ऐतिहासिक एवं दुर्लभ वस्तुओं के समाप्त होने से विक्षुब्ध है। आज भी हम ऐतिहासिक एवं दुर्लभ वस्तुओं के महत्त्व को समझ नहीं पा रहे हैं। हमें इन्हें सुरक्षित रखना चाहिए।
3. यदि आप लोगों को अत्यंत सरल राजनैतिक इकाइयों के निर्माण और विकास से संबद्ध प्राचीन युग के पुरातन रूपों के बारे में इधर जो अनुसंधान हुए हैं, उनके महत्त्व और
वैशिष्ट्य को परखने की क्षमता प्राप्त करनी है, तो आपको इसके लिए आज भारत की ग्राम पंचायतों के रूप में इसके प्रत्यक्ष दर्शन का सुयोग अनायास ही मिल जाएगा। भारत में प्राचीन स्थानीय शासन-प्रणाली या पंचायत-प्रथा को समझने-समझाने का बहुत बड़ा क्षेत्र विद्यमान है।
(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) भारत से हम क्या सीखें
(ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) नागरी लिपि
(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) विनोद कुमार शुक्ल
(ग) मैक्समूलर
(घ) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) सरलतम और राजनैतिक इकाइयों की जानकारी का माध्यम क्या है?
(घ) गद्यांश का सारांश लिखें।
उत्तर-(क)-(क) भारत से हम क्या सीखें
(ख)-(ग) मैक्समूलर
(ग) सरलतम और राजनैतिक इकाइयों की जानकारी भारत की ग्राम पंचायत व्यवस्था के अध्ययन से प्राप्त की जा सकती है।
(घ) भारत की ग्राम-पंचायत व्यवस्था संसार की सबसे प्राचीन सरलतम् और राजनैतिक प्रशासनिक इकाई है। इससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
4. अपने सच्चे आत्मरूप की पहचान में भारत का स्थान किसी भी देश के बाद दूसरे नम्बर पर नहीं रखा जा सकता। मानव-मस्तिष्क के चाहे किसी भी क्षेत्र को आप अपने विशिष्ट अध्ययन का विषय क्यों न बना लें, चाहे वह भाषा का क्षेत्र हो या धर्म का, दैवत विज्ञान का हो या दर्शन
का, चाहे विधिशास्त्र या कानून का हो अथवा रीति-रिवाजों व परम्पराओं का, प्राचीन काल या शिल्प का हो अथवा पुरातन का, इनमें से किसी में विचरण करने के लिए भले ही आप चाहें, न चाहें आपको भारत की शरण लेनी ही होगी, क्योंकि मानव इतिहास से सम्बद्ध अत्यन्त बहुमूल्य और अत्यन्त उपादेय प्रामाणिक सामग्री का एक बहुत बड़ा भाग भारत और केवल भारत में ही संचित है।
(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) मछली
(ख) आविन्यो
(ग) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(घ) भारत से हम क्या सीखें
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) भीमराव अंबेदकर
(ख) मैक्समूलर
(ग) महात्मा गाँधी
(घ) अमरकांत
(ग) किन-किन क्षेत्रों की विशिष्ट जानकारी के लिए भारत की शरण लेना जरूरी
(घ) गद्यांश का आशय लिखें।
उत्तर-(क)-(घ) भारत से हम क्या सीखें
(ख)-(ख) मैक्समूलर
(ग) भाषा, धर्म, दैवत विज्ञान, दर्शनशास्त्र, विधि या कानून, रीति-रिवाजों, परम्पराओं और प्राचीन कला या शिल्प एवं पुरातन विज्ञान की विशिष्ट जानकारी के लिए भारत सबसे उपयुक्त स्थान है।
(घ) आत्मरूप को पहचानने की दृष्टि से ही भारतीय साहित्य से बढ़कर कोई साहित्य ही नहीं है। साहित्य ही नहीं, दर्शनशास्त्र, कानून, प्राचीन शिल्प एवं कला, धर्म, दर्शन या भाषा की विस्तृत जानकारी की प्रचुर सामग्री भारत में उपलब्ध है।
5. संस्कृत की सबसे पहली विशेषता है इसकी प्राचीनता, क्योंकि हम जानते हैं कि ग्रीक भाषा से भी संस्कृत का काल पुराना है। जिस रूप में आज यह हम तक पहुँची है, उसमें भी अत्यन्त प्राचीन तत्त्व भली-भाँति सुरक्षित है। ग्रीक और लैटिन भाषाएँ लोगों को सदियों से ज्ञात है और निस्संदेह यह भी अनुभव किया जाता रहा था कि इन दोनों भाषाओं में कुछ-न-कुछ साम्य अवश्य है। किन्तु समस्या यह थी कि इन दोनों भाषाओं में विद्यमान समानता को व्यक्त कैसे किया जाए?
कभी ऐसा होता था कि किसी ग्रीक शब्द की निर्माण प्रक्रिया में लैटिन को कुंजी मान लिया जाता था और कभी किसी लैटिन शब्द के रहस्यों को खोलने के लिए ग्रीक का सहारा लेना पड़ता था। उसके बाद जब गॉथिक और एंग्लो-सैक्सन जैसी ट्यूटानिक भाषाओं, पुरानी केल्टिक तथा स्लाव भाषाओं का भी अध्ययन किया जाने लगा तो इन भाषाओं में किसी-न-किसी प्रकार का पारिवारिक
सम्बन्ध स्वीकार करना ही पड़ा। किन्तु इन भाषाओं में इतनी अधिक समानता कैसे आ गई, और समानताओं के साथ ही साथ इतना अधिक अन्तर भी इनमें कैसे पड़ गया, यह रहस्य बना ही रहा और इसी कारण ऐसे अनेक अहेतुकवाद उठ खड़े हुए जो भाषाविज्ञान के मूल सिद्धान्तों के सर्वथा विपरीत हैं। किंतु ज्यों ही इन भाषाओं के बीच में संस्कृत आ बैठी कि तत्काल लोगों को एक सही प्रकाश और गर्मी का अहसास होने लगा, और इसी से भाषाओं का पारस्परिक सम्बन्ध भी स्पष्ट हो गया। निश्चित ही संस्कृत इन सब भाषाओं की अग्रजा है। उससे हमें ऐसी बहुत-सी
बातें ज्ञात हो सकीं जो इस परिवार की किसी अन्य भाषा में सर्वथा भुला दी गई थीं।
(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) भारत से हम क्या सीखें
(ख) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ग) विष के दाँत
(घ) बहादुर
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) गुणाकर मूले
(ख) रामविलास शर्मा
(ग) नलिन निलोचन शर्मा
(घ) मैक्समूलर
(ग) कौन-सी भाषा सभी भाषाओं की अग्रजा है?
(घ) किन-किन भाषाओं का पारिवारिक संबंध स्वीकार करना पड़ा?
(ङ) भाषाओं के पारिवारिक संबंध को लेकर उठनेवाले विवाद को किस भाषा की आधार पर सिद्ध किया गया?
उत्तर-(क)-(क) भारत से हम क्या सीखें
(ख)-(घ) मैक्समूलर
(ग) संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की अग्रजा है।
(घ) गॉथिक और एंग्लो-सैक्सन जैसी ट्यूटानिक भाषाओं, पुरानी केल्टिक तथा स्लाव भाषाओं का पारिवारिक संबंध स्वीकार करना पड़ा।
(ङ) भाषाओं के पारिवारिक संबंध को लेकर उठनेवाले विवाद को संस्कृत भाषा के आधार पर सिद्ध किया गया, आग के लिए संस्कृत में अग्नि और लैटिन का इग्निस एक ही शब्द मिलता है।
6. एक भाषा बोलना एक माँ के दूध पीने से भी बढ़कर एकात्मकता का परिचायक है और भारत की पुरातन भाषा संस्कृत सार रूप से वही है जो ग्रीक, लैटिन या एंग्लो सेक्सन भाषाएँ हैं। यह एक ऐसा पाठ है, जिसे हम भारतीय भाषा और साहित्य के अध्ययन के बिना कभी न पढ़ पाते, और भारत यदि हमें इस एक पाठ के सिवा और कुछ भी न पढ़ा पाता तो भी हम इससे ही इतना कुछ सीख जाते जितना दूसरी कोई भाषा कभी न सिखा पाती।
(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) शिक्षा और संस्कृति
(ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ
(घ) भारत से हम क्या सीखें
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) भीमराव अंबेदकर
(ख) मैक्समूलर
(ग) अशोक वाजपेयी
(घ) यतीन्द्र मिश्र
(ग) भारतीय भाषा और साहित्य के अध्ययन के बिना हम क्या नहीं जान पाते हैं?
(घ) इस गद्यांश का सारांश लिखिए।
उत्तर-(क)-(घ) भारत से हम क्या सीखें
(ख)-(ख) मैक्समूलर
(ग) भारतीय भाषा और साहित्य के अध्ययन के बिना हम कभी न जान पाते कि संस्कृत भाषा भी साररूप से वही है जो ग्रीक, लैटिन या ऐंग्लो सेक्सन की भाषाएँ।
(घ) भारत की पुरातन भाषा संस्कृत सार रूप से ग्रीक, लैटिन और ऐंग्लो सेवसन की ही भाषा है। इस बात का पता भारतीय साहित्य और इतिहास के अध्ययन के सिबा नहीं लगता।
                     अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
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1.जनरल कमिंघम ने कौन-सी रिपोर्ट तैयार की? या जनरल कमिंघम का महत्त्व क्या है?
उत्तर-जनरल मिंघम ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की वार्षिक रिपोर्ट तैयार की।
2. वारेन हेस्टिंग्स को कहाँ दारिस नामक सोने के सिक्के मिले?
उत्तर-वारेन हेस्टिंग्स को वाराणसी के पास दारिस नामक सोने के 172 सिक्के मिले।
3. भारत में प्राचीन काव्य में स्थानीय शासन की कौन-सी प्राणली प्रचलित थी?
उत्तर-ग्राम-पंचायत द्वारा स्थानीय शासन चलता था।
4. मैक्समूलर ने किन विशेष क्षेत्रों में अभिरुचि रखनेवालों के लिए भारत का प्रत्यक्ष ज्ञान आवश्यक बताया है?
उत्तर-मैक्समूलर ने भू-विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, जन्तु-विज्ञान, नृवंश विद्या, पुरातात्विक, इतिहास, भाषा आदि विभिन्न क्षेत्रों में अभिरूचि रखनेवालों के लिए भारत का प्रत्यक्ष ज्ञान आवश्यक बताया है।
                पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
                          पाठ के साथ
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प्रश्न 1. समस्त भूमंडल में सर्वविद् सम्पदा और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण देश भारत है-लेखक ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर-लेखक का कहना है कि अगर कोई उनसे पूछे कि सर्वविद् सम्पदा और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण कौन-सा देश या इस भूमंडल का अवलोकन करने के लिए कहें तो लेखक यहीं बताएगा कि भारत है। भारत इसलिए है क्योंकि यहाँ की धरती पर स्वर्ग की छटा निखर रही है।
कहने का भाव यह है कि भारत-भू स्वर्ग से भी बढ़कर और सुंदर है।
             अगर मानव मस्तिष्क की उत्कृष्टतम उपलाब्धियाँ चिंतन की अवरिल धारा और जीवन की विविध समस्याओं पर विचार करते हुए एक ही सर्वोत्तम रूप से शोध और निष्कर्ष निकाले गए हैं तो वह देश भारत ही है। यहाँ के दार्शनिकों के चिंतन का प्रभाव काष्ट और प्लेटो के विचारों
पर भी गहरे रूप से पड़ा है। भारतीय दर्शन की चिंतन धारा, सांस्कृतिक गरिमा और साधना का. उत्कृष्टतम रूप भारत के ऋषियों के आचरण और कर्म में दिखता है।
          साहित्य, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, विज्ञान, दर्शन, आदि विषयों पर गंभीर और तात्विक-विश्लेषण-विवेचन के बारे में कोई जानना चाहे तो उसे भारत-भू का दर्शन करना होगा। नमन करना होगा।
          विश्व-बंधुत्व, मानवीयता, समता, स्वतंत्रता और विश्वव्यापी करुणा, अहिंसा की शिक्षा देकर पूरे विश्व को अगर किसी देश ने आलोकित किया है तो वह भारत ही है। अतः, भारत-भू विश्व में सर्वाधिक प्राकृतिक सौंदर्य और संपूर्ण संपदा से भरपूर स्वर्ग से भी बढ़कर है।
प्रश्न 2. लेखक की दृष्टि में सच्चे भारत के दर्शन कहाँ हो सकते हैं और क्यों?
उत्तर-लेखक-दृष्टि में सच्चे भारत का दर्शन कोलकाता, मुंबई, मद्रास या ऐसे दूसरे (शहरों) मे नहीं हो सकता है।
सच्चे भारत का दर्शन एकमात्र भारत के नागरिक ग्रामवासियों के बीच ही हो सकता है। भारत गाँवों का देश है, किसानों का देश है। अतः, भारतीय आत्मा का सही वास गाँवों में ही है। इसीलिए सच्चे भारत का दर्शन निश्छल, निर्मल निष्कलुष ग्रामीणों के बीच ही संभव है।
प्रश्न 3. भारत को पहचान करनेवाली दृष्टि की आवश्यकता किनके लिए वांछनीय है और क्यों?
उत्तर-लेखक के मतानुसार भारत को पहचान सकनवाली दृष्टि की आवश्यकता मैक्समूलर और यूरोपियन लोगों के लिए वांछनीय है क्योंकि भारत के पास विविध क्षेत्रों में ज्ञान का विपूल भंडार है।
         दर्शन का क्षेत्र हो, कला का क्षेत्र हो, ज्ञान-विज्ञान या भू-विज्ञान की बातें हो, वनस्पतिशास्त्र और वनस्पतियों को प्राप्त करना हो, तो भारत का दर्शन करना ही होगा।
           भारत-भू स्वर्ग सदृश है। यहाँ प्राकृतिक सुषमा है। खनिज भंडार है। कृषि की महत्ता है। यह तपस्वियों की साधना भूमि, जन्मभूमि, कर्मभूमि रही है।
              भारत में अनेक विदेशी सिक्कों का पिपुल भटार घा- ईरानी, बोरिवन, प्रेसियन पार्थियन चूनानी, मेकेडेनियन, शकी, रोमन और मुस्लिम शासकों के सिक्कं यहाँ प्रचुर मात्रा में मिल थे। दैवत विज्ञान, कहावतों, कथाओं का महासागर कप भारत में देखने को मिलता है। शन
निर्माण और यहद शब्द भंडार भी भारत के पास चिरकाल से व्यापहृत है।
       भारत में अनेक जातियाँ-आर्थ, द्रविड़, मुण्डा आदि हैं, जिनकी अपनी-अपनी निक विशेषताएं हैं-आचार-विचार है।
विधिशास्त्र, धर्मशास्त्र राजनीतिशास्त्र की जड़े भी भारत में ही हैं। भारतीय वाङमय और संस्कृत की महत्ता को सभी विदेशी स्वीकार करते हैं।
        संस्कृत का संबंध सैटिन से भी हैं। इस प्रकार संस्कृन, लैटिन, ग्रीक तीनों भाषाएँ एक ही उद्गम स्थल की है। हिन्दू, ग्रीक, यूनानी आदि शक्तिशाली जातियों में भी अनेकता के बावजूद एकता के बीज छिपे हुए हैं।
           इस प्रकार विविध क्षेत्रों में परिष्याप्त ज्ञान मंडार से परिचित होन के लिए यूरोपियन लोग के लिए भारत का महत्व अत्यधिक है।
       भारत प्राच्च विद्या, योग, धर्म-दर्शन का उद्गम स्थल है। दूसरा महत्त्व कल भी था और आज भी है। पूरे विश्व को बुद्ध ने अपने विचारों से आलोकित किया था।
प्रश्न 4. लेखक ने किन विशेष क्षेत्रों में अधिचि रखनेवालों के लिए भारत का प्रत्यक्ष ज्ञान आवश्यक बताया है?
उत्तर-लेखक ने भूविज्ञान, जनस्पति जगत, पुरातत्व-उत्खनन संबंधी, सिक्कों को जानकारी के लिए. दैवत विज्ञान के बारे में जानने के लिए, प्राचीन कथाओं, कहावतों को सुनने के लिए, भाषा विज्ञान समझाने के लिए विभिन्न जातियों आदिवासियों की सभ्यता संस्कृति जानने
के लिए कानून के बारे में जानने के लिए, धर्मशारज, और मानवशास्त्र को समझने के लिए रीति-रिजाब, विविध परंपराओं को देखने सुनने के लिए, इतिहास और भारतीय वाडमय का अवगाहन करने के लिए संस्कृत को महता, विशालतम रूप, साहित्य को देखने पढ़ने के लिए,
भारत का दर्शन आवश्यक है। भारत की यात्रा जरूरी है।
इस प्रकार भारतीय सभ्यता संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, प्राकृतिक सुषमा भाषा और साहित्य में विशेष अभिरुचि रखनेवालों के लिए भारत भ्रमर आवश्यक है। भारा विविधताओं में भी एकता को समेटे हुए है। यहाँ की संस्कृति दुनिया की पुरानी संस्कृति है। यहाँ के लोगों की योग-सामना आज भी विश्व के लिए अनुपम देन है। अति शोधनियों और विविध विषयों में विशेष रुचि रखनेवाले के लिए भारत-दर्शन आवश्यक है।
प्रश्न 5. लेखक ने वारेन हेस्टिंग्स से संबंधित किस दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना का हवाला दिया है और क्यों?
उत्तर-चारेन हेस्टिंग्स जब भारत का गवर्नर जनरल था तो उसे वाराणसी के पास 172 दारिस नामक सोने के सिक्कों से भरा एक भहा मिला था। वारेन हॉस्टेम्स ने अपने मालिक ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक मंडल की सेवा में सोने के सिक्कं यह समझ कर भिजवा दिए कि यह एक ऐसा उपहार होगा जिसकी गणना उसके द्वारा प्रेषित सर्वोत्तम दुर्लभ वस्तुओं में की जाएगी और इस प्रकार कह स्वयं को अपने मालिकों को दृष्टि में एक महान उदार व्यक्ति प्रमाणित होगा।
      स्मार्गमुद्राओं की यही नियति थी कि कंपनी के निदेशक उनका ऐतिहासिक महत्व समझ ही न पार और उन्होंने उन मुद्रा को गला डाला। जब बाल हॉस्टस इंगलैंड लौटा तो वे स्वयं मुद्राएँ नय हो चुकी थीं। वारेन को इस दुर्घटना से बहुत परचाताप हुआ।
    कंपनी के निदेशक उन सिक्कों के ऐतिहासिक महत्व को समज्ञ ही नहीं पाए और अनायास ही यह दुर्धटना घट गयी।वारेन हेस्टिंग्स उन सिक्कों की महत्ता ऐतिहासिकता को समझते थे। कंपनी के निदेशक की अदूरदर्शिता और नासमझी पर वारेन हेस्टिंग्स दुखित थे।
प्रश्न 6. लेखक ने नीतिकथाओं के क्षेत्र में किस तरह भारतीय अवदान को रेखांकित किया है?
उत्तर भारत में नीति कथाओं का विपुल भंडार है। नानाविध साधनों और भागों के द्वारा भारतीय नीति कथाएँ पूर्व से पश्चिम तक आती रहीं। बौद्ध-धर्म प्राचीन कहावतों और दन्तकथाओं का मूल स्रोत रहा है। अनेक कहानियाँ, नीतिकथाएँ रूपान्तरित होकर पश्चिम देशों में प्रचलित हुई।
इसके अनेक उदाहरण आज भी दिखते हैं।
   उदाहरण के लिए शेर की खाल में गधा की कहावत वाली कहानी-पूर्व से ही पश्चिम में पायी थी। यह पूर्व से उधार ली हुई है। यूनान के प्राचीनतम दार्शनिक प्लेटो के ऋटिलस में
यह कहानी प्राप्त है। कहावतें भी पूर्व से उधार ली गयीं है। नेवले या चूहे की कहानी को उदाहरण स्वरूप ले सकते हैं। यूनान में एफ्रोडाइट ने एक सुंदरी का रूप धारण कर लिया था। किन्तु एक चूहे को देखकर वह तत्काल उसकी ओर आकृष्ट हो गयी थी। यह कहानी संस्कृत के कथा से
सर्वांश मेल खाती है। लेकिन कौतुहल का विषय है कि ये कहानियाँ भारत से यूनान कैसे पहुंची। ईसा की चौथी सदी में ही स्ट्रटिस की कहानियों में भारतीय कथाओं का प्रवेश मिलता है।
          ‘शाहनामा’ (10वीं 11वीं सदी) के रचना काल तक भारत से सामुद्रिक मार्ग द्वारा व्यापार होते थे उन्हीं लोगों के माध्यम से ये कहानियाँ पहुँची हों। आर्य, द्रविड़, मुण्डा, आदि जातियों के भाषा विज्ञान के साथ यूनानी पूची-हूण-अरब, ईरानी और मुगल आक्रमणकारियों के भाषा-मिश्रण से भी यह कार्य संपन्न हुआ हो।
      धर्म के प्रचार-प्रसार से भी जातक कथाओं का विस्तार हुआ हो। इस प्रकार व्यापार, धर्म, विश्व-यात्रा आदि अनेक माध्यमों द्वारा भारतीय नीति कथाएँ पूर्व से पश्चिम तक पहुंची। इस प्रकार विश्व को नीति कथाओं के माध्यम से जो अवदान प्राप्त हुए हैं, वे उल्लेखनीय हैं। सोलोमन के समय में भारत, सीरिया और फ़िलस्तीन के मध्य आवागमन के साधन सुलभ हो चुके थे। कुछ संस्कृत शब्दों के आधार पर हाथी-दाँत, बंदर, और चन्दन आदि वस्तुओं के निर्यात से बाइबिल में इन्हें स्थान प्राप्त है। इस प्रकार भारतीय कथाएँ और शब्द-निर्यात अबाध गति से व्यापारियों के द्वारा ढोए जाते रहे और उनके प्रचार-प्रसार में योगदान मिला।
प्रश्न 7. भारत के साथ यूरोपीय के व्यापारिक संबंध प्राचीन प्रमाण लेखक ने क्या दिखाए हैं?
उत्तर-लेखक ने यह जोर देकर प्रमाणित करना चाहा है कि भारत से पश्चिम के देशों से व्यापारिक संबंध था। भारत तथा फारस की खाड़ी और लाल सागर व भू-मध्य सागर के बीच व्यापारिक संबंध बराबर बना रहा। उसके बंद होने का कोई सच्चा या ठोस प्रमाण नहीं मिलता।
                 यहाँ तक कि ‘शाहनामा’ के रचनाकाल तक (10 वीं-11 वीं सदी) में भी भारत और यूरोप के बीच ये व्यापारिक संबंध चलते रहे, बंद नहीं हुए। यहाँ प्रमाणित प्रमाण में ‘शाहनामा’ नामक कृति और उसके रचनाकाल को दिखाकर लेखन ने यह सिद्ध करना चाहा है कि भारत का यूरोपीय देशों से व्यापारिक संबंध सदैव बना रहा। उसमें कभी अवरोध उत्पन्न नहीं हुआ।
प्रश्न 8. भारत की ग्राम पंचायतों को किस अर्थ में और किनके लिए लेखक ने महत्त्वपूर्ण बताया है? स्पष्ट करें।
उत्तर-भारत की ग्राम पंचायतों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए यूरोपियन लोगों को लेखक ने अपना सुझाव दिया है। इसका मूल कारण है-प्राचीन युग के कानून के पुराने रूप को जानने के लिए अत्यंत सरल और राजनैतिक इकाईयों के निर्माण और विकास की पूरी जानकारी
प्राप्त करने के लिए ग्राम-पंचायतों की रूपरेखा को जानना अत्यावश्यक है। शासन-प्रणाली की विशिष्टताओं को जानने-समझने के लिए आज के भारत की ग्राम पंचायतों का प्रत्यक्ष दर्शन-करना आवश्यक है। भारत में प्राचीन स्थानीय शासन-प्रणाली या ग्राम पंचायत प्रथा के बारे में पूरी जानकारी सरलता से मिल जाएगी। ग्रामीण शासन-प्रणाली की जड़ें लोक जीवन में परिलक्षित होती है। इसका बहुत बड़ा क्षेत्र गाँवों में विद्यमान है।
            अतः, यूरोपीयनों को प्राचीन शासन प्रणाली या ग्राम-पंचायतों की विशिष्टताओं क्रियाकलापों को जानने समझने, देखने के लिए भारत के गाँवों का दौरा करना होगा। वहाँ की लोकरीतियों, नीतियों से रू-ब-रू होना होगा।
     आज की आधुनिक और विकसित लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की जड़े हमारे ग्रामीण व्यवस्था से गहरे रूप में जुड़ी हुई है।
प्रश्न 9. धर्म की दृष्टि से भारत का क्या महत्त्व है?
उत्तर-भारत विविध धर्मों की जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है। सनातन या ब्राह्मण धर्म की जन्मभूमि-भारत ही है। बौद्ध-धर्म और जैन-धर्म तथा सिक्ख-धर्म का प्रादुर्भाव भारत में ही हुआ था। पारसियों के जरथुस्ट धर्म की शरणस्थली भी भारत ही रहा है।
             भारत ही धर्म का वास्तविक उद्गम स्थल रहा है। धर्म का उद्भव और उसका प्राकृतिक विकास तथा उसके कई कारणों से छीजते रूप का प्रत्यक्ष परिचय भारत में ही देखा जा सकता है। इसी कारण भारत को धर्मभूमि या देवभूमि भी कहा जाता है। पूरे विश्व को भारतीय धर्मों
ने प्रभावित किया और उन्हें नयी रोशनी प्रदान कर दिशा देने का काम किया। भारत में रोज-रोज नये मत-मतान्दर प्रकट और विकसित होते रहते हैं। इन्हीं कारणों से भारत का महत्त्व है। सभी भारतीय धर्मों ने पूरे विश्व में समानता, विश्वबंधुत्व, एकता, प्रेम, अहिंसा और सत्यचित्रण के प्रचार-प्रसार में अमूल्य योगदान किया। अतः, धर्म प्रधान देश के रूप में भारत का सर्वाधिक महत्त्व है। अनेक मत-मतान्तर, अनेक धर्म, अनेक रूप-रंग, के बावजूद भारत के समन्वयवादी विचारों ने पूरी दुनिया को आलोकिया प्रभावित किया और (सुमार्ग दिखाया)।
प्रश्न 10. भारत, किस तरह अतीत और सुदूर भविष्य को जोड़ता है। स्पष्ट करें।
उत्तर-भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा अतीत काल से चली आ रही है। यहाँ प्राचीन के प्रति आस्था और विश्वास के भाव दिखते हैं। नवीन के प्रति आग्रह का भाव है। भारत एक प्रयोगशाला है-जहाँ पर किसी ज्वलंत समस्या का समाधान मिल सकता है।
       यहाँ संस्कृत भाषा और साहित्य में चिंतन की गहराई, प्राचीन, नवीन के बीच समन्वय आदि सहानुभूति, उदारता और अति सदाशयता प्रत्यक्ष रूप में दिखायी पड़ेगी।
बातें दिखेगी। भारत ही ऐसा देश है जहाँ मानव हृदय की निर्मलता, निष्कलुषता संवेदना, गहनतम भारत प्राचीनता-नवीनता के बीच खड़ा है। मानव मस्तिष्क के या उसके स्वरूप के अध्ययन में चाहे सच्चे आत्म रूप की पहचान में भारत का स्थान कोई दूसरा देश नहीं ले सकता।
मानव मस्तिष्क के चाहे किसी भी क्षेत्र को आप अपने विशिष्ट अध्ययन का विषय क्यों न बना लें, चाहे भाषा का क्षेत्र हो, धर्म का क्षेत्र हो, चाहे दैवति विज्ञान का क्षेत्र हो, दर्शन का हो चाहे विधिशास्त्र का हो, रीति-रिवाज, परंपराओं का, प्राचीन कला या शिल्प का क्षेत्र हो, पुरातन
विज्ञान का क्षेत्र हो, इनमें प्रत्येक का सम्यक ज्ञान प्राप्त करने के लिए भारत दर्शन अनिवार्य है।
            यहाँ की सांस्कृतिक विरासत का अपना महत्त्व है।
भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ प्राचीन के प्रति आस्था है, विश्वास है, भक्ति है, और नवीन के प्रति आग्रह है, लगाव है।
साहित्य का क्षेत्र हो, कला का क्षेत्र हो, संगीत का क्षेत्र हो, भाषा का क्षेत्र हो, लोक संस्कृति का क्षेत्र हो सभी जगह प्राचीन और नवीन का समन्वयवादी रूप देखने को मिलेगा। भाषा का उद्गमस्थल को ही लें तो पाएंगे कि भारत, यूनान, इटली, जर्मनी में बिखरे पड़े अवशेषों के आधार पर आर्यों की किस भाषा का ढाँचा बनाया गया है, वह भी उनलोगों की अत्यन्त दीर्घकालीन चिन्तन-प्रक्रियावादी ही उपलब्धि थी। हम उस मूल उद्गम संस्कृत, ग्रीक, लैटिन का मूल उद्गम
स्थल जानने के लिए हमें सुदूर पीछे हटना होगा तब हम उस संगम स्थल का पता जान पाएँगे।
        हिन्दू, ग्रीक, यूनानी शक्तिशाली जातियों का जन्म भी एक जगह हुआ था, कालान्तर में वे पृथक हुए। सुदूर अतीत में हमारी आर्य भाषा एक ऐसी चट्टान के रूप में दिखायी पड़ती हैं जो चिंतन प्रवाह के प्रवाहों के उतार-चढ़ाव से घिर मँजकर चिकनी और स्पष्ट हो सकी हैं। भारत की पुरातन भाषा संस्कृत सारभूत रूप से वही है जो ग्रीक, लैटिन या एंग्लो सेक्शन की भाषाएँ हैं। इस प्रकार यूरोपीय देशों के साथ सुदूर पूर्व से हमारा भाषिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक
एकात्मकता रही होगी तो आज परिवर्तित होकर भिन्न रूप में दिखायी पड़ती है। इस प्रकार रोम, जर्मन, रुसी, ग्रीक, लैटिन भाषाओं के रुझान भारत में एक भाषा बोली जाती थी। पूरे विश्व में हमारा जुड़ाव अतीत से था जो घिसते-पिटते नवीन रूप को ग्रहण कर लिया। अतः, हम प्रमाणों के आधार पर भाषा के आधार पर, साहित्य के आधार पर, कला और संस्कृति के आधार पर साबित कर सकते हैं भारत अतीत और सुदूर भविष्य को जोड़ने का काम करता है। यह एक ऐसा संगम सेतु है जहाँ पर प्राचीनतम रूप के परिवर्तित रूप हमें दिखायी पड़ते हैं-चाहे वे किसी भी क्षेत्र से संबंधित क्यों न हों।
प्रश्न 11. मैक्समूलर ने संस्कृत की कौन-सी विशेषताएँ और महत्त्व बताये हैं?
उत्तर-मैक्समूलर ने अपने लेख में संस्कृत की अनेक विशेषताओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।
मूस,
(i) संस्कृत की सबसे पहली विशेषता है-उसकी प्राचीनता ग्रीक भाषा से भी संस्कृत प्राचीन भाषा है।
           संस्कृत के साथ तालमेल बिठाने पर शोध करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ग्रीक-लैटिन के साथ इसका पारिवारिक संबंध है। गॉथिक, एंग्लो-सैक्शन जैसी ट्यूटानिक भाषाओं, पुरानी केल्टिक तथा स्लाव भाषाओं के अध्ययन के बाद यह पता चला कि इन सारी भाषाओं का पारस्परिक संबंध कहीं न कहीं संस्कृत से है। निश्चित ही संस्कृत इन सब भाषाओं की अग्रजा है।
(ii) संस्कृत का अग्नि, लैटिन का इग्निस, लिथ्वनियम का ‘उग्निस’ और स्कोटिक भाषा के ‘इंग्ले’ यह दर्शाता है कि इनमें भाषिक स्तर पर कहीं न कहीं समानता है। स्लाव और ट्यूटानिक भाषाएँ भी इस शब्द से परिचित थीं भले ही कालान्तर में ‘अग्नि’ के लिए दूसरा शब्द गढ़ लिया गया हो।
(iii) संस्कृत का मूस: ग्रीक में लैटिन में मूस, पुरानी स्लावॉनिक में माइस और पुरानी उच्च जर्मन में मूस कहा जाता है। इस प्रकार शब्द विज्ञान के आधार पर भी यह प्रतीत होता है कि ये भाषिक समानता अतीत में रही होगी।
(iv) भारत, यूनान, इटली और जर्मनी में बिखरे पड़े अवशेषों के आधार पर आर्यों की जिस भाषा का मूल ढाँचा खड़ा किया गया है वह उनलोगों की अत्यंत दीर्घकालीन चिन्तन-प्रक्रिया की ही उपलब्धि थी।
(v) संस्कृत, ग्रीक, लैटिन तीनों भाषाओं के उद्गम स्थल को जानने के लिए हिन्दू, यूनानी और ग्रीक जैसी शक्तिशाली जातियों की उत्पत्ति और बिखराव पर भी चिंतन एवं शोध
मूल तत्त्वों को खोजने में सहायक होगा।
(vi) प्रकृति और प्रत्यय के योग से बनी हुई संस्कृति की ‘अस्मि’ ग्रीक का ‘एस्मि’ आदि यौगिक क्रियाएँ मिलती हैं। इसमें चिन्तन परंपरा के उतार-चढ़ाव, घिसाव-पिटाव का रूप मिलता है। मैं हूँ जैसे भाव व्यक्त करने के लिए भला किन्हीं दूसरी भाषाओं में ‘अस्मि’ जैसा शुद्ध उपयुका शब्द कहाँ मिल पाएगा। ऐसी क्रियाएँ केवल आर्य भाषा में ही मिलती हैं।
(VII) भारत की पुरातन भाषा संस सार रूप से वही है जो ग्रीक, लैटिन या एप्स सेक्शन की भाषाएँ हैं जिसमें एकात्मकता का भाव छिपा हुआ है।
(viii) संस्कृत भाषा और उसका साहित्य तीन हजार से भी अधिक लंबे काल का साहित्य है। डॉ. बली के मतानुसार प्रोक और लैटिन ही नहीं जर्मन और रूसी के समान भी एक या भारत में बोली जाती थी। संस्कूल, ग्रीक और लैटिन के संख्यावाचक शब्द, सर्वनाम और समान धातुरूपों में काफी समानता दिखती है।
(ix) संस्कृत और दूसरी आर्य भाषाओं में मानव जाति के संपूर्ण इतिहास का वास्तविक रूप में प्रकट कर दिखाया गया है जो सबके लिए अनुकरणीय हैं।
(x) भाषा विज्ञान की सम्यक जानकारी बिना संस्कृत की सहायता के असंभव है।
(xi) मानव जाति का अतीत दर्शन, उसकी प्रकृति, प्रवृति का सम्यक् चित्रण हमें संस्कन भाषा और उसका साहित्य हो कराता है।
प्रश्न 12. लेखक वास्तविक इतिहास किसे मानता है और क्यों?
उत्तर-संस्कृत भाषा और दूसरी आर्य भाषाओं के साहित्य को वास्तविक इतिहास के रूप में मैक्समूलर ने मान्यता दी है।
           मैक्समूलर के मतानुसार संस्कृत भाषा का विपुल साहित्य उदार और व्यापक विचारों में संपन्न साहिल्प है। इस मानव जाति के बारे में विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है। संस्कृत की खोज ने वास्तविकता को सबके सामने लाकर रख दिया है। व्यापक इतिहास ज्ञान और सुनिश्चित शन प्राप्ति का उद्गम स्रोत संस्कृत को लेखक मानता है। वह संस्कृत भाषा और उसके साहित्य के जाता है।
प्रति चिर ऋणी है। यह उसकी भाषिक विशेषताओं एवं संरचनाओं से वाकिफ होकर मुग्ध हो ।
        संस्कृत भाषा ने अपनी उदारता का परिचय सारे विश्व को दिया है। इसके कारण ही मानव ने उदारता और व्यापकत्व को पाया है। इसी भाषा के कारण बर्बर और क्रूर जातियों की भी जानकारी लोगों को मिल पायी है।
मूल भी संस्कृत ही है। विश्व की सबसे प्राचीन भाषा होने, विविध ज्ञान मंडार से परिपूर्ण होने के कारण संस्कृत को लेखक वास्तविक इतिहास को संज्ञा से विभूषित करता
है। इसके भीतर विविध ज्ञान की विषयों की विशद् चर्चा है।
यह लगभग तीन हजार वर्ष से भी पुराना है। यह रोम, यूनान के.संपूर्ण साहित्य से ये कहीं अधिक विशाल और प्राचीन है। इसी कारण लेखक कहता है कि संस्कृत को मैं वास्तविक अों में इतिहास मानता हूँ क्योंकि यह एक ऐसा इतिहास है जो राज्यों दुराचारों और अनेक आतियाँ
की क्रूरताओं की अपेक्षा कहीं अधिक पठनीय है, ज्ञातव्य है। संस्कृत ने एशिया की उर्वर भूमि धर्म, राज, सरकारों, कानून, विधि हिता, रीति-रिवाजों, परंपराओं, भाषा, लोगों के रंग-रूप तथ आकार-प्रकार पूरे विश्व को अवगत कराया है।”
प्रश्न 13. संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं के अध्ययन के पाश्चात्य जगत् का प्रमुख लाभ क्या-क्या हुए?
उत्तर-लेखक के मतानुसार संस्कृत और दूसरी आर्य या भारतीय भाषाओं के अध्ययन पाश्चात्य देशों का बहुत लाभ मिला है।
             भारत के बारे में एक सुनिश्चिा ज्ञान की जानकारी संस्कृत के माध्यम से ही संभव है। संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं ने इलिदास के ज्ञान और उसको व्यापकता से पूरे विश्व की अवगत कराया।
       पाश्चात्य जगत की भाषाएँ भाषिक संरचना के आधार पर संस्कृत के करीब हैं। उनके शब्द, उनकी कथन की गम्भीरता सबकुछ संस्कृत से उधार ली हुई है।
            संस्कृत और दूसरी आर्य भाषाओं के अध्ययन से पाश्चात्य देशों के लोगों को भारत के विविध क्षेत्रों की सम्यक् जानकारी मिली। वे भारत की भू-संपदा, इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि विषयों के बारे में ठीक ढंग से जान सके। यह रीति रिवाज, लोक जीवन और प्राकृतिक रूपों की विधिवत् जानकारी-इन भाषाओं के माध्यम से हुआ। ये भाषाएँ हमारे ज्ञान-विज्ञान से पाश्चात्य जगत को परिचित कराया। उसकी विशेषताओं को दुनिया के समक्ष रखा।
प्रश्न 14. लेखक ने भारत के लिए नवागंतुक अधिकारियों को किसकी तरह सपने देखने के लिए प्रेरित किया है और क्यों?
उत्तर-लेखक ने सर विलियम जोन्स की तरह नवागंतुकों को सपने देखने के लिए प्रेरित किया है।
          37 वर्ष की उम्र में भारत-यात्रा पर जब विलियम जोन्स निकले थे तो संध्या बेला में सागर के मध्य जहाज के डेक पर खड़े होकर सूर्य को सागर में डूबते देखकर काफी अभिभूत हो उठे थे। उनके हृदय में इंगलैंड की सुमधुर स्मृतियाँ जाग उठीं और जन्मभूमि के प्रति भीतर मन में
अथाह प्रेम का सागर उमड़ पड़ा लेकिन विलियम जोन्स गैर जिम्मेदार थोडे थे। उनका लक्ष्य उन्हें सचेत किया और वे पुनः भारत-दर्शन की लालसा से आन्दोलित हो उठे। एक नये देश के नये रूप रंग और उसकी प्राकृतिक सुषमा के अवलोकन के लिए वे बेताब हो उठे। उनके हृदय में
अनेक भाव-तरंगें उठने लगीं। मन अतिशय प्रसन्न हो उठा। यह थी उनकी बलवती इच्छा, आत्मविश्वास।
          जोन्स के दिमाग में भारत का इतिहास, ईरान का इतिहास, वहाँ सम्राटों का रूप दर्शन, रेखांकित होने लगा था। वे ऐसे स्वप्नदर्शी थे जो अपने स्वप्नों को साकार और अपनी कल्पनाओं को मूर्त रूप देना जानते थे। उनमें उदारता थी, गंभीरता थी, गजब की जीवटता थी।
            जिस प्रकार यूनान का सिकन्दर युद्ध करते हुए सैनिकों के साथ कई देशों को पराजित करते हुए अपनी विजय यात्रा की ओर कदम बढ़ाया था ठीक उसी प्रकार नए सिकन्दर के रूप में विलियम जोन्स ने प्राच्य देशों के इतिहास और साहित्य में एक से बढ़कर एक शानदार जिवय प्राप्त की और विश्व के सामने अपनी कृतियों को रखा। उन्होंने अपने सपनों को साकार किया और भारतीय पुरातत्व, इतिहास में अतुलनीय योगदान कर मानव सभ्यता के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा।
प्रश्न 15. लेखक ने नया सिकन्दर किसे कहा है? ऐसा कहना क्या उचित है? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-लेखक ने सर विलियम जोन्स की तुलना सिकन्दर से करते हुए उसे नया सिकन्दर नाम दिया है। भाव एवं कार्य की दृष्टि से ऐसा कहना कोई अनुचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि लेखक की दृष्टि में विलियम जोन्स का कार्य भी साहस पूर्ण था, कष्टमय था, संघर्ष पूर्ण था।अपनी प्रियजन्म भूमि और प्रियजनों से विलग होकर वह नये देश के दर्शन के लिए यात्रा पर निकला था। अनेक सागरों को पारकर वह भारत-दर्शन करने के लिए यात्रा कर रहा था। सागर की लहरें, सूर्य का सागर में डूबना आदि दृश्य उसे उत्साहित तो कर ही रहे थे वह भी सपनों को साकार रूप देने के लिए लालायित था।
         जिस प्रकार सिकन्दर ने अनेक देशों को जीतता हुआ विजय अभियान को पूर्णता की और ले जाना चाह रहा था ठीक उसी प्रकार विलियम जोन्स भी अपने क्षेत्र में साहित्य और पुरातत्व के क्षेत्र में प्राच्य साहित्य से विश्व को अवगत कराने के क्षेत्र में संकल्पित होकर लगा हुआ था। इसी जीवटता, अदम्य साहस, स्वप्नदर्शी रूपों के कारण लेखक ने उसे नये सिकन्दर के नाम से संबोधित किया है।
           लेखक सिकन्दर से विलियम की तुलना की है तो कोई अपराध नहीं किया है। वह निर्दोष भाव से उसकी बहादुरी और कर्त्तव्यनिष्ठता से प्रभावित होकर ऐसा कहा है।
           अनेक क्षति पहुँचाकर सिकन्दर विश्व विजेता बनने चला था किन्तु विलियम जोन्स तो संहारक रूप में नहीं सृजक रूप में अपने अभियान में लगा रहा। उसने प्राच्य देशों के इतिहास और साहित्य के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य संपादित कर अपनी संकल्प शक्ति, एकाग्रता, एकनिष्ठ
भाव, कर्तव्यनिष्ठता का परिचय देकर पहचान बनायी।
                       पाठ के आस-पास
                  ___________________
प्रश्न 1. जनरल कनिंघम कौन थे और उनका क्या महत्त्व है?
उत्तर-जनरल कनिंघम अंग्रेज थे और पुरातत्व एवं उत्खनन संबंधी विज्ञान के विशेषज्ञ थे। नालंदा की प्राचीनता और महत्ता से संबंधित नालंदा विवरण को कनिंघम ने ही प्रकाशित करवाया था। इसके बाद तो दुनिया में नालंदा के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ती गयी और चीन, जापान,
स्याम, सिंहल, वर्मा और तिब्बत के लोग यानी बौद्ध यात्रियों की नालंदा-दर्शन की लालसा जगी और भीड़ बढ़ती चली गयी। फलस्वरूप नालंदा के जीर्णोद्धार के लिए 1915 ई. में खुदाई का काम शुरू हुआ। इस प्रकार नालंदा के खंडहर के भग्नावशेष विश्व के समक्ष आया और नालंदा की ख्याति सुदूर दुनिया के सभी देशों में फैली। बुद्ध, बौद्ध, और ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र नालंदा वि० वि० के प्रति लोगों की जिज्ञासा बढ़ी और लोग इसी महत्ता को स्वीकार करने लगे।
       1862 ई. में जनरल कनिंघम ने वैशाली की यात्रा की तब वैशाली गढ़ की लंबाई 1700 फुट, चौड़ाई 300 फुट थी। डीह की ऊँचाई सर्वत्र बराबर नहीं थी। गढ़ के चारों ओर बुर्ज के चिहन विद्यमान थे और चारों ओर की खाई भी पानी से भरा हुआ था। जनरल कनिंघम ने अपने वैशाली विवरण में गढ़ के द. में खाई पार करने के लिए ऊँची सड़क थी तथा उसकी ओर भी सूखी और ऊँची जमीन थी। अनुमान है कि वहाँ भी सड़क होगी। खाई की चौड़ाई 100-150 फुट तक थी।
प्रश्न 2. विलियम जोंस के बारे में अधिक-से-अधिक जानकारी प्राप्त पर लिखें।
उत्तर-विलियम् जोंस इंगलैंड के निवासी थे। उन्होंने आज से सौ वर्ष पूर्व इंगलैंड से समुद्र के माध्यम भारत की लंबी यात्रा समाप्त की थी।
          1783 ई. के अगस्त माह से उन्होंने भारत की यात्रा प्रारंभ की थी।
          विलियम जोंस समुद्री जहाज के द्वारा फारस या ईरान होते हुए अरब सागर के बीच से गुजरते हुए भारत के समुद्र तट तक यानी कोलकाता पहुँचे थे।
           विलियम जोन्स ने प्राच्य देशों के इतिहास और साहित्य में अतुलनीय योगदान किया।
           विलियम जोंस ने इस साहसिक समुद्री-यात्रा का जब शुभारंभ किया था तब उनकी आयु मात्र 37 वर्ष की थी। उनकी जीवटता और आत्मविश्वास को दाद देनी होगी। अपने इस सुखद यात्रा-क्रम में विलियम जोंस ने अनेक प्राकृतिक सुषमाओं का दर्शन किया। धरती के इस महत्त्वपूर्ण भू-भाग का प्रत्यक्ष दर्शन करते हुए उसकी महत्ता को स्वीकार किया साथ ही उसकी विशेषताओं
की चर्चा अपने यात्रा-साहित्य को विस्तृत रूप से की।
जांस साहब अंग्रेजी साहित्य के विशेषज्ञ तो थे ही भारतीय साहित्य के अवगाहन में भी उनकी गहरी रुचि थी। वे भारत की ज्ञान-संपदा से वाकिफ होकर अभिभूत हो उठे थे। “इसी
कारण जब वे पहले-पहल इस पावन भूमि का दर्शन किये तो यह कहे बिना नहीं रह सके कि कितना अधिक विशाल और महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अभी तक अनदेखा ही रह गया है और कितने बड़े व ठोस लाभे अभी तक प्राप्त नहीं किये जा सके हैं।” इन्हीं उपलब्धियों के कारण विलियम जोंस को नया सिकन्दर कहा गया है क्योंकि उन्होंने अपनी इस सांस्कृतिक यात्रा के माध्यम से विश्व के एक महत्त्वपूर्ण भू-भाग का सुखद दर्शन किया था और उसकी भाषा, जनरीति-रिवाज, परंपराओं, रूप-रंग, धर्म, मानव-प्रतिभा, ललित एवं उपयोगी कलाओं, राज्य सरकारें, विधि-संहिता, प्राकृतिक छटाओं से पूरे विश्व को अवगत कराया था।
प्रश्न 3. सिकन्दर कौन थे? भारत के प्रसंग में उनका किस तरह उल्लेख होता है? संक्षिप्त प्रकाश डालें।
उत्तर-सिकन्दर यूनान का रहनेवाला था। वह विश्व विजयी कहलाना चाहता था। इसी कारण वह अनेक देशों-मिस्र, एशिया, माइनर, सीरिया (ईरान), ईराक, कंधार, बुखारा पर विजय प्राप्त करते हुए भारत पर भी चढ़ाई कर दी। उस समय भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था। झेलम पाकर उसने सीमा के राजा अम्भि को हराकर पुरुया पोरस पर चढ़ाई कर दी जो प्रक्षशिला का राजा था। दोनों में यह युद्ध हुआ। पोरस पराजित हुआ। जब पोरस कैदी के रूप में सिकन्दर के समक्ष लाया गया तो सिकन्दर ने पोरस से पूछा-आपके साथ कैसा बर्ताव किया जाय। राजा पोरस ने निर्भीक होकर कहा कि “जैसे एक राजा दूसरे राजा के साथ बर्ताव करते हैं।” इस जवाब से सिकन्दर अति प्रसन्न हुआ और पोरस को ससम्मान उसका राज्य लौटा दिया
और मित्रता कायम कर ली। अनेक युद्धों में भाग लेने के कारण सिकन्दर के सैनिक थक चुके थे और मगध साम्राज्य (नंद महाराजा) की सैन्य शक्ति और बहादुरी का पता सिकन्दर को और उनके सैनिकों को लग चुका था। इसी कारण सिकन्दर के सैनिक व्यास नदी पार करने से मना
कर दिया और पीछे स्वदेश की ओर लौट गए। रास्ते में सिकन्दर की मृत्यु हो गयी।
प्रश्न 4. धर्म-सूत्र और समयाचारिक सूत्र क्या है? कुछ प्रमुख सूत्रों के नाम लिखें।
उत्तर-धर्मसूत्र मानव धर्मशास्त्र हैं। इनमें धर्म की व्याख्या सूत्रों के माध्यम से है। ये प्राचीन काल के नीति-नियम हैं जो धर्म की व्याख्या और महत्ता को सिद्ध करते हैं। कालान्तर
में ये ही धर्मसूत्र परवर्ती यानी बाद के विधि ग्रंथों के निर्माण में सहायक सिद्ध हुए और आधारभूत सामग्री भी उपलब्ध कराये।
      भारतीय धर्मसूत्र यूनान, रोम, यार्जमनी के विधि शास्त्रों के इतिहास से सर्वथा भिन्न होते हुए भी कई मायने में समानता और भिन्नता के कई उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
समयाचारिक सूत्र यानी समय + आचार + इक = समयाचारिक। इस शब्द से यह अर्थ घोषित होता है कि समय पर जो आचार-विचार व्यवहृत हो। भारत में ऐसे कई समयाचारिक सूत्रों की रचना हमारे पुरखों ने की है, जिनका हमारे जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। कुछ प्रमुख धर्मसूत्र
और समयाचारिक निम्न है।
प्रश्न 5. मैक्समूलर के जीवन और कार्यों के बारे में लिखें।
उत्तर-मैक्समूलर विश्वविख्यात विद्वान थे। उनका जन्म आधुनिक जर्मनी के डेसाउ नामक नगर में 6 दिसम्बर 1823 ई. में हुआ था। चार वर्ष की अवस्था में ही इनके पिता की मृत्यु हो गई। इनके पिता विल्हेल्म मूलर थे। पिता के मरने के बाद इनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गयी
फिर भी इन्होंने शिक्षा प्राप्त की। बचपन में ही ये संगीत, ग्रीक और लैटिन भाषा में दक्ष हो गए। इन्होंने लैटिन में कविताएँ भी लिखीं। 18 वर्ष की उम्र में लिपजिंग वि. वि. से इन्होंने संस्कृत की शिक्षा पायी।
          मैक्समूलर वैदिक विज्ञान को मानव सभ्यता का मूल स्रोत माना। वे विवेकानंद की दृष्टि में ‘वेदांतियों के वेदांती’ थे। भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रति उनका गहरा लगाव था। वे यूरोपीय और भारतीय खासकर संस्कृत और ऋग्वेद के प्रकांड विद्वान थे। वे भारत भक्त, संस्कृत
अनुरागी एवं वेदों के प्रति आस्थावान् प्रज्ञा पुरुष थे।
मैक्समूलर ने अपनी यशकायी कृतियों से समग्र विश्व को प्रभावित ही नहीं किया बल्कि उपकृत भी किया। मैक्समूलर ने 1994 ई० में हितोपदेश (संस्कृत) का जर्मनी भाषा में अनुवाद प्रकाशित करवाया। ‘कठ’ और ‘केन’ उपनिषदों का जर्मन भाषा में अनुवाद किया। ‘मेघदूत का
जर्मन पद्य में अनुवाद किया। वे ऐसे पाश्चात्य मनीषी हैं कि जिन्होंने वैदिक तत्त्व ज्ञान की विशेषताओं एवं महत्ता को
समझा। भारतीयों के पूर्वजों की चिंतन को यथार्थ रूप में विश्व पटल पर रखा। वे ऋग्वेद, संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं की तुलना आदि विषयों पर चिंतनपरक व्याख्यान दिए। उन्होंने भारत की प्राचीनता और विलक्षणता की महत्ता को सिद्ध किया और दुनिया को बताया कि विश्व की सभ्यता ने भारत से बहुत कुछ सीखा और ग्रहण किया है। उनके शोधों, अन्वेषी दृष्टि, व्याख्यानों, कृतियां से नयी पीढ़ी को देश की प्राचीन सभ्यता संस्कृति, ज्ञान-साधना, प्राकृतिक वैभव, आदि की महत्ता का प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त होता है। स्वदेश के प्रति घटते अनुराग, स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति के इस दौर में इनके लेख बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।
प्रश्न 6. पाठ में आए ऐतिहासिक जातियों और देशों की सूचक शब्दों को चुनकर उनके अर्थ मालूम करें।
उत्तर-यूनानी, रोमन, सेमेटिक, यहूदियों, ईरानी, केरियन, थ्रेसियन, पार्थियन, मेकेडियन, शकों, रोमन, मुस्लिम आदि जातियों
* भारत, सीरिया, फिलीस्तीन, फारस, इटली आदि देश।
* आर्य, द्रविण, मुण्डा, भारतीय जातियाँ
* यूनानी, पूची, हूण-अरब, ईरानी, मुगल आदि जातियाँ।
* यूनान, रोम, जर्मनी।
* ब्राह्मण, बौद्ध, पारसी (जरथुस धर्म)
* हिन्दू, ग्रीक, यूनानी आदि शक्तिशाली जातियाँ
* अमेरिका
* एशिया (महादेश)।
                           भाषा की बात
         _______________________________
प्रश्न 1. निम्नांकित वाक्यों से विशेष्य और विशेषण पद चुनें:
(क) उत्कृष्टतम उपलब्धियों का सर्वप्रथम साक्षात्कार।
(ख) प्लेटो और काण्ट जैसे दार्शनिकों का अध्ययन करनेवाले हम यूरोपियन लोग।
(ग) अगला जन्म तथा शाश्वत जीवन।
(घ) दो-तीन हजार वर्ष पुराना ही क्यों, आज का भारत भी।
(ङ) भूले-बिसरे बचपन की मधुर स्मृतियाँ।
(च) लाखों करोड़ों अजनबियों तथा बर्बर समझे जानेवाले लोगों को भी।
उत्तर-विशेष्य।                                विशेषण
उपलब्धि।                                   उत्कृष्टतम
प्लेटो/काण्ट-                                दार्शनिकों
लोग-                                           यूरोपियन
जन्म-                                          अगला
जीवन-                                         शाश्वत
भारत-                              दो-तीन हजार वर्ष पुराना
प्रश्न 2. ‘अग्रज’ की तरह ‘जा’ प्रत्यय जोड़कर तीन-तीन शब्द बताएँ।
उत्तर-उदाहरण- अग्र + जा = अग्रज।
1. तनु + जा = तनुजा।
2. नीर +जा = नीरज।
3. अंबु + जा = अम्बुज।
4. जल + जा = जलजा।
प्रश्न 3. निम्नलिखित उपसर्गों से तीन-तीन शब्द बनाएँ।
                  प्र, निः, अनु, अभि, वि
* प्र-प्रबल, प्रलय, प्रकंप।
* निः-निश्छल, निश्चल, निर्भर, निष्क्रिय।
* अनु-अनुगामी, अनुरागी, अनुपमा।
* अभि-अभिप्राय, अभिनय, अभिलाषा।
* वि-विकार, वियोग, विराग।
प्रश्न 4. वास्तविक में ‘इक’ प्रत्यय है। ‘इक’ प्रत्यय से पाँच शब्द बनाएँ।
‘इक’-वास्तव + इक = वास्तविक
(i) शरीर + इक = शारीरिक
(ii) परिवार + इक = शारीरिक
(iii) संसार + इक = सांसारिक
(iv) व्यवहार + इक = व्यावहारिक
(v) नगर + इक = नागरिक।

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