9th english

bihar board 9th class english solution | GANDHIJI’S PASSION

GANDHIJI’S PASSION FOR NURSING

bihar board 9th class english solution

class – 9

subject – english

lesson 2 – GANDHIJI’S PASSION FOR NURSING

GANDHIJI’S PASSION FOR NURSING

Introduction :  ‘This is a chapter taken from the life of Mahatma Gandhi who is the father of the Nation. He has number of experiments in his life with truth. He has narrated those experiments in his book ‘ My Experiments with Truth ‘.
In this essay Gandhiji’s experiment with the service to human being through nursing has been depicted.

                   SUMMARY

1. Gandhiji had a passion for nursing since his childhood. His father fell ill and Gandhiji would run back home after school hours to serve his father. He would give medicine to his father, dressed his would and prepared drugs as prescribed by the vaids. When he went to Africa, he continued with his passion for nursing. He started devoting two hours daily to nursing in a chari- table hospital in South Africa.
2. When he returned to India for a short period,  he came to learn about illness of his brother- in- law. His sister could not afford a nurse hence Gandhiji brought his brother-in- law to his house, put him in his own room and did the nursing.
3. In another episode Gandhiji nursed his eight year son for a month when he fractured his arm. He used to open the doctor’s bandage, washed the wound, applied a clean mud – poultice and tied up the arm till it heated. Gandhiji also nursed his ten year old son when he got an attack of typhoid. He took extra care of the patient. He used to wrap wet cloth and enclosed him in a dry blankets inspite of his intolerance and cries. He took utmost care of his patient including serving of proper diet. He did this purposely and did not leave this work to his mother as he thought the mother out of love would over feed the patient.
4. Once a beggar came to Gandhijee. He was suffering from leprosy. Gandhiji offered him shelter, dressed his wounds and lather sent him to hospital. He had no fear of infection. Once, a fellow prisoner developed symptoms of leprosy. Gandhiji started visiting the patient after taking permission from the jail authorities. Later he was kept in Sevagram for years where Gandhiji dressed his wound.
5. One two historic occasions Gandhiji rendered his service to the sick and wounded persons. One was the Boer war and other was Zulu Rebellion. On both the occasions, he raised an Indian Ambulance Corps and marched miles and miles to bring the wounded persons on stretcher. He took pleasure in nursing the Zulus , who were left unattended as the white sisters of mercy refused to serve them, For his pious services to the mankind he was awarded Zulu War Medal and the Kaisar – e- Hind gold medal.
6. Once plague broke out in the gold mines of South Africa. Manu Indian labourers fell ill. Gandhiji on hearing immediately rushed to the place. There was no hospital nearly. He turned a vacant godown into temprory hospital. A number of beds were arranged and the treatment started. Meanwhile the local municipality sent a nurse with some disinfectants. Gandhiji nursed the patient and started his earth treatment which cured two patients immediately. He had faith in mud treatment. Once he told a Japanese poet youer Neguchi. ” I sprang from Indian earth and so it is Indian earth that Crowns me.” Gandhiji served his wife Kasturba when she seriously fall ill in South Africa. Doctors had no hope of her recovery coffee for her, help her in cleaning her teeth, combed her hair, changed her bed and carried her out in the open get her fresh air and light.
7. It is was very difficult to get a trained Indian nurse in South Africa and there was every Possibility of a white coloured nurse refusing to serve a coloured woman.
When Kasturba was to give birth to a child, Gandhijee barnt midwifery and helped her in the safe delivery of his last son.

गाँधीजी का सेवा भाव [ गाँधीजी पैसन फाॅर नर्सिंग]

प्रस्तुत लेख महात्मा गांधी की जीवन का एक अंग है। गाँधीजी को इस देश का राष्ट्रपति माना जाता है। उनके द्वारा देश को दी गई अमूल्य सेवाओं के कारण यह सम्मान मिला।
उन्होंने अपने जीवन में सत्य के अनेक प्रयोग किये। बाद में उन्होंने अपने जीवन के प्रयोगों पर आधारित एक पुस्तक लिखी जिसका नाम — ‘ माई एक्सपेरिमेंट्स विथ टूथ ‘ । यह पुस्तक प्रकाशन के बाद चर्चित हुई।
इस आलेख में गाँधीजी द्वारा ‘ नर्सिंग ‘ द्वारा मानव समाज को दी गयी सेवाओं का वर्णन है। गाँधीजी  सेवा को धर्म मानते थे और सेवा भाव उनके जीवन का अंग था ।

                        सारांश

1. बाल्यकाल से ही गाँधीजी की प्रवृत्ति सेवा -भाव की ओर उन्मुख थी। सेवा के किसी अवसर को वे गँवाते नहीं थे — रोगी, दुखिया, लाचार , वृद्ध आदि की सेवा करने को वे तुरंत प्रस्तुत हो जाते थे।
एक बार उनके पिताजी बीमार हो गये । उस समय गाँधीजी स्कूल में पढ़ते थे। स्कूल से अवकाश मिलते ही गाँधीजी दौड़कर घर वापस आते और अपने पिता की सेवा – सुश्रुषा में लग जाते। अपने पिता के घावों की वे सफाई करते, उस पर पट्टी बांधते , दवा लगाते और फिर ‌वैद्द द्वारा बतायी विधी के अनुसार दवा तैयार करते।
बाद में जब वे अफ्रीका गये तो अपने इस सेवा – भाव को जारी रखा और वहाँ के एक दातव्य अस्तपताल में प्रतिदिन दो घंटा नर्सिंग का कार्य करने लगे। उनके इस सेवा भाव को वहाँ के लोगों ने बहुत पसंद किया।
2. बाद में कुछ दिनों के लिये वे अफ्रिका से भारत लौट आये । भारत आने पर गाँधीजी को अपनी बहन के पति के रुग्ण हो जाने का समाचार मिला। उनकी बहन आर्थिक दृष्टि से सबल महिला नहीं थी और उनके लिये एक नर्स या परिचारिका को सेवा के लिये रखना संभव नहीं था। गाँधीजी अपने बहनोई को अपने घर ले आये— उन्हें अपने कमरे में रखा और अपने उनकी सेवा उनके स्वास्थ होने तक की।
3. इसी प्रकार गाँधीजी ने अपने आठ वर्षीय पुत्र की  परिचर्चा का भार अपने ऊपर ले लिया जब उसके बाँह की हड्डी टूट गयी और वह  अपने दैनिक कार्य करने में असमर्थ हो गया। गाँधीजी पुत्र के हाथ में डाॅक्टर द्वारा बाँधी पट्टी खोलते, घाव की सफाई करते, उस पर मिट्टी की गीली पुलटिस लगाते और फिर पट्टी बाँधते। यह कार्य उन्होंने तब तक किया जब तक किया जब तक बालक पूर्ण स्वास्थ नहीं हो गया।
एक बार गाँधीजी का दस वर्षीय पुत्र टायफड ज्वर से पीड़ित हो गया। गाँधीजी अपने पुत्र की सेवा में तन- मन से लग गये। बालक कम्बल की गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाता और रोने लगता पर गाँधीजी की चिकित्सा पद्धति के आगे उसे यह सब सहन करना पड़ता । यह कार्य उसकी माँ पर नहीं छोड़ते क्योंकि उनको यह आशंका रहती कि माँ प्यार में अपने पुत्र को आवश्यकता से अधिक न खिला दे।
4. एक बार एक भिखारी गाँधीजी के पास आया । वह कोढ़ से पीड़ित था। गाँधीजी का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने उस रोगी के आवास व्यवस्था की। वे प्रतिदिन उसके घाव की सफाई अपने हाथों से करते और बाद में उसे अस्तपताल में दाखिल करवा दिया। गाँधीजी के भीतर छूत का भय बिल्कुल नहीं था। गाँधीजी ने तुरंत उसकी चिकित्सा आरंभ कर दी। वे जेल अधिकारियों से अनुमति लेकर प्रतिदिन उसके कक्ष में जाते और उसकी सुश्रुषा – सेवा करते। बाद में उन्होंने उस रोगी को सेवाग्राम स्थित अपने आश्रम में रखा और उसकी चिकित्सा की व्यवस्था की।
5. अपने जीवन के दो ऐतिहासिक अवसरों पर गाँधीजी ने बीमार और घायल व्यक्तियों की सेवा की। पहला अवसर था बोअर का युद्ध और दुसरा अवसर था जुलू  की की क्रांति । इन दोनों अवसरों पर घायल और बीमार लोगों की सेवा के लिये उन्होंने एक भारतीय एम्बुलेंस कोर का गठन किया, जो दूर – दूर से घायल सिपाहियों और नागरिकों को स्टैचर में बुलाकर लाता । गाँधीजी की इस नि: स्वार्थ मानवीय सेवा को सम्मान देते ‘ जूल वार मेडल’ तथा ‘ केसरे हिंद ‘ का स्वर्ण – पदक दिया गया।
6. एक बार दक्षिण अफ्रीका के ‘ गोल्ड माइनर्स  ‘ में काम करने वाले मजदूरों में प्लेग फैल गया। बहुत सारे भारतीय मजदूर प्लेग की चपेट में आ गये । गाँधीजी सुचना मिलते ही वहाँ चले गये। उन्होंने तुरंत एक खाली पड़े गोदाम को अस्तपताल में परिवर्तित कर दिया क्योंकि निकट में कोई अस्तपताल नहीं था। अस्तपताल में रोगियों के लिये बेड की व्यवस्था की गयी और चिकित्सा का काम आरंभ कर दिया गया। इस बीच स्थानीय नगरपालिका ने एक नर्स तथा कीटनाशक दवाओं की व्यवस्था की। गाँधीजी को इस प्राकृतिक चिकित्सा में असीम विश्वास था। वे स्वयं भी ‘ ब्लडप्रेशर ‘ को नियंत्रित रखने के लिए अपने माथे पर मिट्टी की पुल्टिस लगाते थे।
दक्षिण अफ्रीका में कस्तूरबा गम्भीर रूप से बीमार पड़ गयी । डाॅक्टरों को कस्तूरबा के बचने की उम्मीद नहीं थी पर गाँधीजी की लगन और परिश्रम से कस्तूरबा स्वास्थ हो गयीं। कभी – कभी वे कस्तूरबा को बाहर की खुली हवा और प्रकाश में बैठने या लेटने का इंतजाम स्वयं करते ।

7. दक्षिण अफ्रीका में एक भारतीय प्रशिक्षित नर्स की उपलब्धता  कठिन थी और श्वेत नर्सों द्वारा अश्वेत रोगी की सेवा करना संदिग्ध था। अतः गाँधीजी ने स्वयं यह कार्यभार अपने कंधों पर लिया और सफलतापूर्वक इसका निर्वाह किया ।

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