तीर्थस्थल

Darbhanga Shyama Kali Temple – दरभंगा श्यामा काली मंदिर

जानिए दरभंगा श्यामा काली मंदिर क्यों है मशहूर ??

Darbhanga Shyama Kali Temple

माँ श्यामा काली मंदिर बिहार के दरभंगा जिला में दरभंगा स्टेशन से १ किलोमीटर की दूरी पर मिथिला विश्वविद्यालय के परिसर में दरभंगा राजा  द्वारा १९३३ में बनवाया गया।।बहुत सी बातों में से इस मंदिर की एक अलग बात ये है कि,ये मंदिर दरभंगा के महाराजाधिराज राजा रामेश्वर सिंह की चिता पर बनाया गया है,जो की राज परिवार के महान साधक थे ।।

आमतौर पर हिन्दू रीती रिवाज के अनुसार किसी भी व्यक्ति का कोइ भी मांगलिक कार्ये होने के बाद उन्हें एक साल तक समसान नही जाना चाहिए लेकिन इस मंदिर में बहुत बड़ी संख्या में मांगलिक कार्ये भी होते है और नई नई शादी𓀦 के बाद जोड़े माँ का आशीर्वाद लेने भी आते है।।
इस विशालकाय और बहुत ही खूबसूरत मंदिर की स्थापना 1933 में दरभंगा महाराजा कामेश्वर सिंह ने की थी,बहुत लोगो का ये भी मानना है की इतनी बड़ी माँ श्यामा की प्रतिमा पूरे भारत मे कहीं और नही है।।।
मंदिर के अंदर में जहाँ एक तरफ माँ श्यामा के भव्य और मंत्रमुग्ध कर देने वाला दर्शन होता है वहीं दूसरी ओर प्रार्थना स्थल के मंडप में सूर्य,चंद्रमा ग्रह और नक्षत्रों सहित कई तान्त्रिक यंत्र मंदिर की दीवारों पर देखा जा सकता है।।
माँ श्यामा की विशाल रौद्र रूपी मूर्ति भगवन शिव की जांघ एवं वक्षस्थल पर अवस्थित है.माँ काली की दाहिनी तरफ महाकाल और बायीं ओर भगवान गणेश और बटुक की प्रतिमाएं स्थापित हैं और माँ के चार हाथों में से बायीं ओर के एक हाथ में खड्ग,दूसरे में मुंड तो वहीं दाहिनी ओर के दोनों हाथों से माँ अपने पुत्रों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में स्थापित है।यहाँ की आरती अन्य जगहों से अगल होती है और इसका एक विशेष महत्व है.
यहाँ आरती जल,अक्षत,पुष्प,चन्दन और नेवैद्य समेत 16 प्रकार की वस्तु से माँ की पूजा के उपरांत की जाती है और माना जाता है कि जो भी माँ श्यामा की इस आरती का गवाह जो भी सच्चे दिल से करता है और कुछ माँगता है उसकी मनोकामना माँ जरूर पूरा करती है और उसके जीवन के सारे अंधकार दूर कर देती है।।।
गर्भगृह में मां काली की विशाल प्रतिमा के दाहिनी ओर महाकाल और बाईं ओर गणपति एवं बटुकभैरव देव की प्रतिमा स्थापित है।मां के गले में जो मुंड माला है उसमें हिंदी वर्णमाला के अक्षर के बराबर मुंड हैं।श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि हिंदी वर्णमाला सृष्टि के प्रतीक हैं।मंदिर में होनेवाली आरती का विशेष महत्व है।यहां आए भक्तजन मंदिर आरती में शामिल होने के लिए घंटों इंतजार करते हैं। नवरात्र के दिनों में यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ जाती है..इस मंदिर में मां काली की पूजा वैदिक और तांत्रिक दोनों विधियों से की जाती है।जानकारों का कहना है कि श्यामा माई माता सीता का रूप हैं।इस बात की व्याख्या राजा रामेश्वर सिंह के सेवक रह चुके लालदास ने रामेश्वर चरित मिथिला रामायण में की है।यह वाल्मिकी द्वारा रचित रामायण से ली गई है।इसमें बताया गया है कि रावण का वध होने के बाद माता-सीता ने भगवान राम से कहा कि जो भी सहत्रानंद का वध करेगा वही असली वीर होगा।

इस पर भगवान राम उसका वध करने निकल पड़े।युद्ध के दौरान सहस्रानंद का एक तीर भगवान राम को लग गया।इस पर माता सीता बेहद क्रोधित हुईं और सहस्त्रानंद का वध कर दिया।क्रोध से सीता माता का रंग काला पड़ गया।वध करने के बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तो उन्हें रोकने के लिए भगवान शिव को स्वयं आना पड़ा।भगवान के सीने पर पैर पड़ते ही माता बहुत लज्जित हुईं और उनके मुख से जीह्वा बाहर आ गई।माता के इसी रूप की पूजा की जाती है और उन्हें यहां काली नहीं श्यामा नाम से पुकारा जाता है।

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