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rajguru biography in hindi – शिवराम हरी राजगुरु की जीवनी

rajguru biography in hindi – शिवराम हरी राजगुरु की जीवनी

rajguru biography in hindi

राजगुरू का पूरा नाम शिवराम हरी राजगुरू था और उनका जन्म पुणे के निकट खेड़ में हुआ थाl शिवराम हरि राजगुरू बहुत ही कम उम्र में वाराणसी आ गए थे जहां उन्होंने संस्कृत और हिंदू धार्मिक शास्त्रों का अध्ययन किया थाl वाराणसी में ही वह भारतीय क्रांतिकारियों के साथ संपर्क में आए। स्वभाव से उत्साही राजगुरू स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने के लिए इस आंदोलन में शामिल हुए और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) के सक्रिय सदस्य बन गएl राजगुरू महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए अहिंसक सिविल अवज्ञा आंदोलन में विश्वास नहीं करते थेl उनका मानना था कि उत्पीड़न के खिलाफ क्रूरता ब्रिटिश शासन के खिलाफ अधिक प्रभावी था, इसलिए वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल हुए थे, जिनका लक्ष्य भारत को किसी भी आवश्यक माध्यम से ब्रिटिश शासन से मुक्त करना थाl उन्होंने भारत की जनता को अंग्रेजों के क्रूर अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए इच्छुक नवयुवकों को इस क्रांतिकारी संगठन के साथ हाथ मिलाने का आग्रह कियाl राजगुरू शिवाजी और उनकी गुरिल्ला युद्ध पद्धति से काफी प्रभावित थेl इस महान स्वतंत्रता सेनानी के जन्मस्थान खेड़ का नाम बदलकर उनके सम्मान में राजगुरूनगर कर दिया गया हैl हरियाणा के हिसार में भी उनके नाम पर एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स का नाम रखा गया है।राजगुरू को उनकी निडरता और अजेय साहस के लिए जाना जाता था। उन्हें भगत सिंह की पार्टी के लोग “गनमैन” के नाम से पुकारते थेl

राजगुरू जन्म एवं परिचय:-

क्रमांक परिचय बिंदु (Introduction Points) परिचय (Introduction)
1. पूरा नाम (Full Name) शिवराम हरि राजगुरु
2. अन्य नाम (Other Name) एम महाराष्ट्र, रघुनाथ एवं राजगुरु
3. जन्म (Birth) 24 अगस्त, 1908
4. जन्म स्थान (Birth Place) गाँव खेड़ा, जिला पुणे बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत
5. पेशा (Profession) स्वतंत्रता सैनानी
6. मृत्यु (Death) 23 मार्च, 1931
7. मृत्यु स्थल (Death Place) लाहौर, ब्रिटिश भारत (वर्तमान में पंजाब पाकिस्तान)
8. मृत्यु के समय आयु (Age) 22 वर्ष
9. मृत्यु का कारण (Death Reason) फांसी (सजा-ए-मौत)
10. राष्ट्रीयता (Nationality) भारतीय
11. गृहनगर (Hometown) गाँव खेड़ा, जिला पुणे बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत
12. धर्म (Religion) हिन्दू
13. जाति (Caste) ब्राह्मण
14. राशि (Zodiac Sign) कन्या
15. वैवाहिक स्थिति (Marriage Status) अविवाहित

 शुरूआती जीवन एवं परिवारिक जानकारी:-

पिता का नाम (Father’s Name) हरि नारायण
माता का नाम (Mother’s Name) पार्वती बाई
भाई का नाम (Brother’s Name) दिनकर
बहनों के नाम (Sisters Name) चन्द्रभागा, वारिणी और गोदावरी

इनका जन्म महाराष्ट्र के एक साधारण से मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ. इनका गाँव खेड़ा महाराष्ट्र के पुणे शहर के पास भीमा नदी के किनारे स्थित है, जोकि तब ब्रिटिश भारत में था. इसी गांव में राजगुरु जी का बचपन बीता था. राजगुरु जी के पिता हरि नारायण ने दो शादियां की थी. इनके पहले विवाह से इन्हें कुल 6 बच्चे थे और इन्होंने दूसरी शादी पार्वती जी से किया थी और इस विवाह से इन्हें 5 बच्चे हुए थे और राजगुरु जी इनकी पांचवीं सन्तान थे.जब वे केवल 6 वर्ष के थे तब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया. तब उनके पिता की जगह उनके बड़े भाई ने ली, और घर को उन्होंने संभाला. राजगुरु जी अपने परिवार के सबसे छोटे सदस्य थे.अपने गांव के ही एक मराठी स्कूल में राजगुरु जी ने अपनी पढ़ाई की थी. कुछ सालों तक अपने गांव में रहने के बाद राजगुरू जी वाराणसी चले गए थे और वाराणसी में आकर इन्होंने विद्यानयन और संस्कृत विषय की पढ़ाई की थी. महज 15 वर्ष की आयु में राजगुरु जी को हिन्दू धर्म के ग्रंथो का अच्छी खासा ज्ञान  भी हो गया था और ये एक एक ज्ञानी व्यक्ति थे. कहा जाता है कि इन्होंने सिद्धान्तकौमुदी (संस्कृत की शब्द शास्त्र) को बेहद ही कम समय में याद कर लिया था..

राजगुरु का व्यक्तित्व

शिवराम राजगुरु सच्चे, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और देश के लिये खुद को न्यौछावर करने के लिये तैयार रहने वाले व्यक्ति थे। ये 15 वर्ष की आयु में ही परिवार को छोड़कर बनारस आ गये थे। यहीं इनकी मुलाकात क्रान्तिकारी आजाद से हुई। आजाद से मिलकर इन्हें ऐसा लगा कि जिस रास्ते पर चलकर ये अपना सारा जीवन देश सेवा के लिये समर्पित कर सकते हैं वो रास्ता खुद ही इनके पास आ गया हो।लेकिन चन्द्रशेखर आजाद जितने चुस्त और सतर्क थे राजगुरु उतने ही अधिक आलसी और लापरवाह थे। राजगुरु में केवल एक ही अवगुण था कि वो कुभंकर्ण की तरह सोते थे। इन्हें जब भी जहाँ भी मौका मिलता वो उसी जगह सो जाते थे। जब दल के सदस्य आगरा में क्रान्तिकारी गतिविधियों के लिये बम बनाने का कार्य कर रहे थे तो उस दौरान इन सभी सदस्यों के बीच खूब मस्ती-मजाक चलता था। ऐसे ही माहौल में एक दिन एक दूसरे की गिरफ्तारी को लेकर मजाक हो रहा था।सभी इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि यदि पुलिस की रेड पड़ी तो कौन कैसे पकड़ा जायेगा। पार्टी के सभी सदस्यों में प्रचलित था कि भगत सिंह कोई सिनेमा देखते हुये पकड़े जायेगें, बटुकेश्वर दत्त चांदनी रात को निहारते हुये, पंडित जी किसी का शिकार करते हुये और रघुनाथ (राजगुरु) सोते हुये। क्रान्तिकारी दल में शामिल होने के बाद राजगुरु के व्यक्तित्व में बहुत से बदलाव आये लेकिन वो अपने सोने की आदत को नहीं बदल पाये थे। अपनी इसी आदत के कारण वो कई बार संकट में पड़ने से बाल-बाल बचे थे। अन्त में अपनी इसी लापरावाही के कारण ये गिरफ्तार भी किये गये।

क्रांतिकारी के रूप में:-

राजगुरु जी ने अपने बचपन से ब्रिटिश सरकार द्वारा किये जा रहे क्रूर अत्याचारों को देखा था. जिससे उनके अंदर बचपन से ही अंग्रेजों के प्रति नफरत पैदा हो गई थी. इसके चलते उन्होंने कम उम्र में ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए क्रांतिकारियों के साथ हाथ मिलाने का फैसला कर लिया था. उस समय वे वाराणसी में अपनी पढ़ाई में लगे हुए थे. भारत स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एचएसआरए) ब्रिटिशों के खिलाफ काम करने वाला एक सक्रिय दल था. उनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिशों को डरा कर उन पर वार करना था, और इसके साथ ही यह लोगों में जागरूकता भी फैलाता था. सन 1924 में वे इसमें शामिल हुए. इस संगठन में कई क्रांतिकारी सम्मिलित थे, जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजादभगतसिंह, सुखदेव थापर का नाम मुख्य रूप से शामिल था. वे सभी मिलकर ब्रिटिशों के खिलाफ आंदोलन चलाने के कार्य में जुट गए थे. यहीं से इनकी पहचान एक क्रांतिकारी के रूप में होने लगी थी. वे महात्मा गाँधी जी के सौम्य एवं अहिंसावादी तरीके से किये गये आंदोलन में जरा भी दिलचस्पी नहीं रखते थे.

जेम्स ए स्कॉट की जगह सॉन्डर्स को मारा:-

राजगुरु जी और उनके साथियों द्वारा बनाई गई रणनीति के मुताबिक क्रांतिकारी जय गोपाल को स्कॉट की पहचान करनी थी. क्योंकि राजगुरु जी और उनके साथी स्कॉट को नहीं पहचानते थे. अपने इस प्लान को अंजाम दने के लिए इन्होंने 17 दिसंबर, 1928 का दिन चुना था. 17 दिसंबर के दिन राजगुरु जी और भगत सिंह जी लाहौर के जिला पुलिस मुख्यालय के बाहर स्कॉट का इंतजार कर रहे थे. इसी बीच जय गोपाल ने एक पुलिस अफसर की और इशारा करते हुए इन्हें बताया की वो स्टॉक हैं और इशारा मिलते ही इन्होंने गोलियां चलाकर उस व्यक्ति की हत्या कर दी. लेकिन जिस व्यक्ति की और जय गोपाल ने इशारा किया था, वो स्टॉक नहीं थे बल्कि जॉन पी सॉन्डर्स थे जो एक सहायक आयुक्त (assistant Commissioner) थे. जॉन पी सॉन्डर्स की हत्या होने के बाद अंग्रेजों ने पूरे भारत में उनके कातिलों को पकड़ने के लिए कवायद शुरू कर दी थी. कहा जाता है कि अंग्रेजों को पता था कि पी सॉन्डर्स की हत्या के पीछे भगत सिंह थे और अपने इसी शक के आधार पर पुलिस ने भगत सिंह को पकड़ने का कार्य शुरू कर दिया था.  अंग्रेजों से बचने के लिए भगत सिंह जी और राजगुरु जी ने लाहौर को छोड़ने का फैसला किया और इस शहर से निकलने के लिए एक रणनीति तैयार की. अपनी रणनीति को सफल बनाने के लिए इन दोनों ने दुर्गा देवी वोहरा की मदद ली थी. दुर्गा जी क्रांतिकारी भगवती चरन की पत्नी थी. इनकी रणनीति के अनुसार इन्हें लाहौर से हावड़ा तक जानेवाली ट्रेन को पकड़ना था.अंग्रेजों द्वारा भगत सिंह को पहचाना ना जाए इसलिए इन्होंने अपना वेश पूरी तरह से बदला लिया था. अपने वेश को बदलने के बाद सिंह वोहरा और उनके बच्चे के साथ ट्रेन में सवार हो गए थे. भगत जी के अलावा इस ट्रेन में राजगुरु जी भी अपना वेश बदल कर सवार हुए थे. जब ये ट्रेन लखनऊ पहुंची तो  राजगुरु जी यहां पर उतर गए और बनारस के लिए रवाना हो गए. वहीं भगत सिंह जी ने वोहरा और उनके बच्चे के साथ हावड़ा की ओर रूख किया था.

पूना में गिरफ्तारी:-

आजाद ने राजगुरु को बहुत समझाया और उन्हें कुछ समय के लिये पूना जाकर रहने के लिये कहा। राजगुरु उदास मन से पूना चले गये। असेम्बली बम कांड में बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। पूना जाकर इन्होंने नया क्रान्तिकिरी दल तैयार करने का निश्चय किया। ये जिस किसी से भी मिलते उससे ही अपने द्वारा सांडर्स को गोली मारने की घटना का वर्णन करते। अपनी लापरवाही के कारण और सब पर जल्दी से विश्वास कर लेने के कारण एक सी.आई.डी. अफसर शरद केसकर से इनकी मुलाकात हुई। उसने इन्हें विश्वास में लेकर मित्रता बढ़ाई और इन्होंने उस पर विश्वास करके सारी बाते बता दी। केसकर की सूचना पर राजगुरु को 30 सितम्बर 1929 में गिरफ्तार कर लिया गया।

राजगुरु की मौत:-

पकड़े जाने के बाद राजगुरु और उनके साथी भगत सिंह एवं सुखदेव जी को सन 1931 में फांसी की सजा सुनाई गई. और 23 मार्च 1931 को लाहौर के केन्द्रीय कारागार में हमारे देश के 3 महान क्रांतिकारियों को सूली पर चढ़ा दिया गया. जिन्हें आज भी याद करना हमारे लिए गर्व की बात है. इन तीनों की क्रांतिकारियों की उम्र उस समय काफी कम थी. राजगुरु जी सिर्फ 22 वर्ष के थे. अंग्रेज सरकार ने मृत्यु के पश्चात् इनके शरीर को उनके परिवारजनों को भी नहीं दिया और स्वयं पंजाब के फिरोजपुर जिले के सतलज नदी के तट पर हुसैनिवाला में उनका अंतिम संस्कार कर दिया।

रोचक बातें:-

  • सन 2013 को भारत सरकार ने इनकी पुण्यतिथि वाले दिन यानि 23 मार्च को उन्हें सम्मान देते हुए एक डाक टिकिट जारी किया.
  • राजगुरु जी की उनके साथी भगतसिंह एवं सुखदेव जी के साथ गहरी दोस्ती थे. वे कोई भी काम अक्सर साथ मिलकर ही करते थे.
  • राजगुरु जी को शूटिंग की शिक्षा क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद जी से प्राप्त हुई थी. आजाद जी बहुत ही कम उम्र के राजगुरु जी के कौशल से प्रभावित हुए थे.
  • अप्रैल सन 1929 में दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेकने के लिए कुछ क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसमें राजगुरु जी भी शामिल थे.
  • 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के खेड़ा (पूना) नामक स्थान पर जन्म।
  • जलियांवाला बाग हत्या कांड के बाद देश सेवा के लिये अपने आप को समर्पित करने का संकल्प।
  • 1923 को 15 वर्ष की अल्प आयु में घर का त्याग।
  • बनारस में रहकर संस्कृत और लघु कौमुदगी के सिद्धान्तों का अध्ययन।
  • 1924 में क्रान्तकारी दल से सम्पर्क और एच.एस.आर.ए. के कार्यकारी सदस्य बनें।
  • 17 दिसम्बर 1928 को लाला लाजपत राय पर लाठी से प्रहार करने वाले जे.पी.सांडर्स की गोली मारकर हत्या।
  • 20 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह के नौकर के रुप में लाहैर से फरारी।
  • 30 सितम्बर 1929 को पूना में गिरफ्तारी।
  • 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ फाँसी की सजा।
  • 23 मार्च 1931 को फाँसी पर चढ़कर शहीद हो गये।
  • इनकी मृत्यु के बाद भारत सरकार ने इनके जन्म स्थान खेड़ा का नाम बदलकर राजगुरु नगर रख दिया गया हैं।
  • 24 अगस्त 2008 को प्रसिद्ध लेखक अजय वर्मा (जज) ने राजगुरु के जन्म की 100वीं वर्षगाँठ पर “अजेय क्रान्तिकारी राजगुरु” नाम से किताब लिखकर प्रकाशित की।

 

 

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