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kavi Nagarjuna Biography in Hindi – जनकवि नागार्जुन की जीवनी

kavi Nagarjuna Biography in Hindi – नागार्जुन की जीवनी

kavi Nagarjuna Biography in Hindi

नागार्जुन हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध लेखक थे। वह अपने समकालीन लेखकों व प्रशंसको के द्वारा प्यार से नागार्जुन, ‘जनकवी’ कवि कहे जाते थे। नागार्जुन की कविताओं में मुख्य रूप से राजनीति, आम लोगों की समस्याएं, किसानों और श्रमजीवी वर्ग की समस्याओं का उल्लेख किया गया है। नागार्जुन का जन्म सन् 1911 में बिहार के दरभंगा जिले के तरानी के एक छोटे से गांव में एक मध्यम वर्ग के ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

नागार्जुन के माता-पिता ने उनका नाम वैद्यनाथ मिश्रा रखा था, परन्तु हिन्दी साहित्यिक में नागार्जुन के नाम से अधिक मशहूर थे। जब वह तीन साल के थे तभी उनकी मां का देहान्त हो गया था और उनके पिता अपने बेटे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण रूप से नहीं निभा पाये। परिणामस्वरूप नागार्जुन को पूर्णतया अपने हितेशी रिश्तेदारों पर निर्भर रहना पड़ा। नागार्जुन संस्कृत, प्रकृत और पाली जैसे प्राचीन भारतीय भाषाओं के विद्वान थे। उन्होंने पहली बार इन भाषाओं का ज्ञान ग्रामीण केद्रों से और बाद में वाराणसी और कलकत्ता के शहरी केद्रों से अर्जित किया। नागार्जुन ने अपराजिता देवी से शादी की थी और उनके पांच बच्चे थे।

जन्म

जन कवि नागार्जुन का जन्म 30 जून,1911 को सतलखा गांव, मधुबनी जिला बिहार में हुआ था। उनके पिता का नाम गोकुल मिश्र था तथा उनकी माता का नाम उमा देवी था। जनकवि नागार्जुन का बचपन का नाम ‘ठक्कन मिसर’ था। काफी दिनों के बाद इस ठक्कन का नामकरण हुआ और बाबा वैद्यनाथ की कृपा प्रसाद मानकर उनका नाम वैद्यनाथ मिश्र रख दिया गया। जन कवि नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था । उन्हे नागार्जुन और यात्री के नाम से भी जाना जाता था।

शिक्षा

वैद्यनाथ मिश्र की प्रारंभिक शिक्षा उक्त पारिवारिक स्थिति में लघु सिद्धांत कौमुदी और अमरकोश के सहारे प्रारंभ हुई। उस जमाने में मिथिलांचल के धनी अपने यहां निर्धन मेधावी छात्रों को जागरूक किया करते थे। उस उम्र में बालक वैद्यनाथ ने मिथिलांचल के कई गांवों को देख लिया। इसके बाद में उन्होने विधिवत संस्कृत की पढ़ाई बनारस जाकर शुरू की। वहीं उन पर आर्य समाज का गहरा प्रभाव पड़ा और फिर उनका बौद्ध दर्शन की ओर झुकाव हुआ। उन दिनों राजनीति में सुभाष चंद्र बोस उनके प्रिय थे। बौद्ध के रूप में उन्होंने राहुल सांकृत्यायन को अपने से बड़ा माना। बनारस से निकलकर कोलकाता और  इसके बाद फिर दक्षिण भारत घूमते हुए लंका के विख्यात ‘विद्यालंकार परिवेण’ में जाकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। राहुल और नागार्जुन ‘गुरु भाई’ हैं। लंका की उस विख्यात बौद्धिक शिक्षण संस्था में रहते हुए मात्र बौद्ध दर्शन का अध्ययन ही नहीं हुआ बल्कि विश्व राजनीति की ओर रुचि जगी और भारत में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन की ओर सजग नजर भी बनी रही। 1938  के बीच में वे लंका से वापस लौट आये और फिर उनके घुमक्कड़ जीवन की शुरुआत हुई। साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ नागार्जुन राजनीतिक आंदोलनों में भी प्रत्यक्षतः भाग लेते रहे। स्वामी सहजानंद से प्रभावित होकर उन्होंने बिहार के किसान आंदोलन में भाग लिया और मार खाने के अतिरिक्त जेल की सजा भी भुगती। चंपारण के किसान आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया। वस्तुतः वे रचनात्मक के साथ-साथ सक्रिय प्रतिरोध में विश्वास रखते थे। अप्रैल,1974 में जेपी आंदोलन में भाग लेते हुए उन्होंने कहा था “सत्ता प्रतिष्ठान की दुर्नीतियों के विरोध में एक जनयुद्ध चल रहा है, जिसमें मेरी हिस्सेदारी सिर्फ वाणी की ही नहीं, कर्म की हो, इसीलिए मैं आज अनशन पर हूँ, कल जेल भी जा सकता हूँ।” और सचमुच इस आंदोलन के सिलसिले में आपात् स्थिति से पूर्व ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और इसके बाद उन्हे काफी समय तक जेल में रहना पड़ा। जनकवि नागार्जुन परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत के शिक्षा प्राप्त की थी। उन्हें हिंदी, मैथिली, संस्कृत तथा बांग्ला भाषा का भी अच्छा ज्ञान प्राप्त था।

लेखन कार्य एवं प्रकाशन

नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था, लेकिन हिंदी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएं लिखी। काशी में रहते हुए उन्होंने वैद्य उपनाम से भी कविताएं लिखी। 1936 में सिंहल में ‘विद्यालंकार परिवेण’ में ही ‘नागार्जुन’ नाम ग्रहण किया। शुरुआत में उनकी हिन्दी कविताएँ भी ‘यात्री’ के नाम से ही छपी थीं। अपने कुछ साथियों के आग्रह पर 1941  के बाद उन्होंने हिन्दी में नागार्जुन के अतिरिक्त किसी नाम से न लिखने का निर्णय लिया था।

नागार्जुन की पहली प्रकाशित रचना एक मैथिली कविता थी जो कि 1929 में लहेरियासराय दरभंगा से प्रकाशित ‘मैथिली’ नामक पत्रिका में छपी। उनकी पहली हिंदी रचना ‘राम के प्रति’ नामक कविता थी जो कि 1934 मे लाहौर से निकलने वाले सप्ताहिक ‘विश्वबंधु’ में छपी थी ।

नागार्जुन  1929 से 1997 तक रचनाकर्म से जुड़े रहे।  उन्होने कविता, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, निबन्ध, बाल-साहित्य — सभी विधाओं में लिखा।  वे मैथिली तथा संस्कृत के अलावा बाङ्ला से भी जुड़े रहे। बाङ्ला भाषा और साहित्य से नागार्जुन का लगाव शुरू से ही रहा था। काशी में रहते हुए उन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में बाङ्ला साहित्य को मूल बाङ्ला में पढ़ना शुरू किया। उन्होने मौलिक रुप से बाङ्ला में फरवरी,1978 ई० में लिखना शुरू किया और सितंबर 1979 ई० तक लगभग 50 कविताएँ लिखी जा चुकी थीं। उनकी कई रचनाएँ बँगला की पत्र-पत्रिकाओं में भी छपीं। उनकी कई रचनाएँ हिंदी की लघु पत्रिकाओं में लिप्यंतरण और अनुवाद सहित प्रकाशित हुईं। मौलिक रचना के अलावा उन्होंने संस्कृत, मैथिली और बाङ्ला से अनुवाद कार्य भी किया। कालिदास उनके सर्वाधिक प्रिय कवि थे और ‘मेघदूत’ प्रिय पुस्तक मेघदूत का मुक्तछंद में अनुवाद उन्होंने 1953 ई० में किया था। जयदेव के ‘गीत गोविंद’ का भावानुवाद वे 1948 ई० में ही कर चुके थे। फलस्वरूप 1944 और 1954 ई० के मध्य नागार्जुन ने अनुवाद का काफी काम किया। बाङ्ला उपन्यासकार शरतचंद्र के कई उपन्यासों एवं कथाओं का हिंदी अनुवाद भी छपा । कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास ‘पृथ्वीवल्लभ’ का गुजराती से हिंदी में अनुवाद 1945 ई० में किया था।1965 ई० में उन्होंने विद्यापति के सौ गीतों का भावानुवाद किया था। इसके बाद में विद्यापति के और गीतों का भी उन्होंने अनुवाद किया। इसके अलावा उन्होंने विद्यापति की ‘पुरुष-परीक्षा’ (संस्कृत) की तेरह कहानियों का भी भावानुवाद किया था जो ‘विद्यापति की कहानियाँ’ नाम से 1964 में प्रकाशित हुई थी।

प्रसिद्ध रचनाएं

कविता-संग्रह-

  •  युगधारा
  •  सतरंगे पंखों वाली
  •  प्यासी पथराई आँखें
  •  तालाब की मछलियाँ
  •  तुमने कहा था
  •  खिचड़ी विप्लव देखा हमने
  •  हजार-हजार बाँहों वाली
  •  पुरानी जूतियों का कोरस
  •  रत्नगर्भ
  •  ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!!
  •  आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने
  •  इस गुब्बारे की छाया में
  •  भूल जाओ पुराने सपने
  •  अपने खेत में

प्रबंध काव्य-

  •  भस्मांकुर
  •  भूमिजा

उपन्यास-

  •  रतिनाथ की चाची
  •  बलचनमा
  •  नयी पौध
  •  बाबा बटेसरनाथ
  •  वरुण के बेटे
  •  दुखमोचन
  •  कुंभीपाक -1960 (1972 में ‘चम्पा’ नाम से भी प्रकाशित)
  •  हीरक जयन्ती -1962(1979 में ‘अभिनन्दन’ नाम से भी प्रकाशित)
  •  उग्रतारा
  •  जमनिया का बाबा – 1968 (उसी वर्ष ‘इमरतिया’ नाम से भी प्रकाशित)
  •  गरीबदास -1990 (1979 में लिखित)

संस्मरण-

  •  एक व्यक्ति: एक युग

कहानी संग्रह-

  • आसमान में चन्दा तैरे

आलेख संग्रह-

  •  अन्नहीनम् क्रियाहीनम्
  •  बम्भोलेनाथ

बाल साहित्य-

  •  कथा मंजरी भाग-1
  •  कथा मंजरी भाग-2
  •  मर्यादा पुरुषोत्तम राम -1955 के बाद में ‘भगवान राम’ के नाम से और अब ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के नाम से प्रकाशित हुई है।
  •  विद्यापति की कहानियाँ

मैथिली रचनाएँ-

  •  चित्रा (कविता-संग्रह)
  •  पत्रहीन नग्न गाछ
  •  पका है यह कटहल (“) -1995 (‘चित्रा’ तथा ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ की सभी कविताओं के साथ 52 असंकलित मैथिली कविताएँ हिंदी पद्यानुवाद सहित)
  •  पारो (उपन्यास)
  •  नवतुरिया

बाङ्ला रचनाएँ-

  • मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा -1997  में (देवनागरी लिप्यंतर के साथ हिंदी पद्यानुवाद)

संचयन एवं समग्र-

  •  नागार्जुन रचना संचयन – सं०-राजेश जोशी (साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली से)
  •  नागार्जुन : चुनी हुई रचनाएँ -तीन भाग (वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से)
  • नागार्जुन रचनावली- सात बृहत् खंडों में प्रकाशित नागार्जुन रचनावली है जिसका एक खंड ‘यात्री समग्र’, जो मैथिली समेत बांग्ला, संस्कृत आदि भाषाओं में लिखित रचनाओं का है। मैथिली कविताओं की अब तक प्रकाशित यात्री जी की दोनों पुस्तकें क्रमशः ‘चित्रा’ और ‘पत्राहीन नग्न गाछ’ समेत उनकी समस्त छुटफुट मैथिली कविताओं के संग्रह हैं

मा‌र्क्सवाद का प्रभाव

नागार्जुन मा‌र्क्सवाद से गहरे प्रभावित रहे, परंतु मा‌र्क्सवाद के तमाम रूप एवं रंग देखकर वे उदास थे। वह पूछते थे कौन से मा‌र्क्सवाद की बात कर रहे हो, मा‌र्क्स या चारु मजूमदार या चे ग्वेरा की? इसी तरह उन्होंने जयप्रकाश नारायण का समर्थन ज़रूर किया, लेकिन जब जनता पार्टी विफल रही तो नागार्जुन ने जयप्रकाश को भी नहीं छोड़ा-

खिचड़ी विप्लव देखा हमने
भोगा हमने क्रांति विलास
अब भी खत्म नहीं होगा क्या
पूर्णक्रांति का भ्रांति विलास।

क्रांतिकारिता में उनका जबरदस्त विश्वास था इसीलिए वे जयप्रकाश की अहिंसक क्रांति से लेकर नक्सलियों की सशक्त क्रांति तक का समर्थन करते थे-

काम नहीं है, दाम नहीं है
तरुणों को उठाने दो बंदूक
फिर करवा लेना आत्मसमर्पण

परंतु इसके लिए उनकी आलोचना भी होती थी कि नागार्जुन की कोई विचारधारा ही नहीं है, नागार्जुन कहीं टिकते ही नहीं हैं। नागार्जुन का मानना था कि वह जनवादी हैं। जो जनता के हित में है वही मेरा बयान है। मैंने किसी विचारधारा का समर्थन करने के लिए जन्म नहीं लिया है। मैं ग़रीबों, मज़दूरों, किसानों की बात करने के लिए ही हूं। उन्होंने ग़रीब को ग़रीब ही माना, उसे किसी जाति या वर्ग में विभाजित नहीं किया। तमाम आर्थिक अभावों के बावजूद उन्होंने विशद लेखन कार्य किया।

पुरस्कार

  • मैथिली में, ‘पत्र हीन नग्न गाछ’ के लिए 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार  से सम्मानित किया गया ।
  • उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा  भारत भारती सम्मान पुरस्कार  से सम्मानित किया गया
  • मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से सम्मानित किया गया
  • 1994 बिहार सरकार द्वारा राजेन्द्र शिखर सम्मान पुरस्कार
  •  साहित्य अकादमी की सर्वोच्च फेलोशिप से सम्मानित किया गया।
  •  पश्चिम बंगाल सरकार से राहुल सांकृत्यायन सम्मान से सम्मानित किया गया

नागार्जुन पर लिखी गई विशिष्ट साहित्य पुस्तक

  •  नागार्जुन का रचना-संसार – विजय बहादुर सिंह (प्रथम संस्करण-1982, संभावना प्रकाशन, हापुड़ से; पुनर्प्रकाशन-2009, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से)
  • नागार्जुन की कविता – अजय तिवारी, (संशोधित संस्करण-2005) वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से)
  • नागार्जुन का कवि-कर्म  खगेंद्र ठाकुर (प्रथम संस्करण-2013, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नयी दिल्ली से)
  • जनकवि हूँ मैं – संपादक- रामकुमार कृषक (प्रथम संस्करण-2012 {‘अलाव’ के नागार्जुन जन्मशती विशेषांक का संशोधित पुस्तकीय रूप}, इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, नयी दिल्ली से)
  •  नागार्जुन– अंतरंग और सृजन-कर्म – संपादक- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान {‘नया पथ’ के नागार्जुन जन्मशती विशेषांक का संशोधित पुस्तकीय रूप}, (लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद से)
  • आलोचना -सहस्राब्दी अंक 43 (अक्टूबर-दिसंबर 2011), संपादक- अरुण कमल
  • तुमि चिर सारथि -यात्री नागार्जुन आख्यान तारानंद वियोगी (मैथिली से अनुवाद-केदार कानन, अविनाश) (पहले ‘पहल’ पुस्तिका के रूप में फिर अंतिका प्रकाशन, दिल्ली से

मृत्यु

जनकवि नागार्जुन की मृत्यु 5 नवंबर,1998 को हुई थी

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