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K R Narayanan Biography in hindi | कोचेरिल रमण नारायण जीवनी

K R Narayanan Biography in hindi | कोचेरिल रमण नारायण की जीवनी

K R Narayanan Biography in hindi

भारत के दसवे राष्ट्रपति के.आर नारायणन  हुए | 1992 में उनकी नियुक्ती देश के नौवे उपराष्ट्रपति के रूप में की गयी, फिर 1997 में नारायण देश के राष्ट्रपति बने थे। दलित समुदाय से राष्ट्रपति बनने वाले वे पहले और एकमात्र राजनेता थे।उनकी प्रारम्भिक पृष्टभूमि राजनितिक नही थी | उनसे पहले के अधिकाँश राष्ट्रपतियों ने राजनीति को पुरी तरह जिया था | नारायणन  ने एक राजनयिक के रूप में अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्ष व्यतीत किये और भारतीय विदेश सेवा के सर्वोच्च पद विदेश सचिव से रिटायर हुए थे | उन्होंने अपने जीवन के अंतिम चरण में राजनीती में प्रवेश किया था |

क्रमांक जीवन परिचय बिंदु  के आर नारायण जीवन परिचय
1. पूरा नाम कोचेरिल रमण नारायण
2. जन्म 27 अक्टूबर 1920
3. जन्म स्थान पेरुमथॉनम उझावूर गाँव, जिला त्रावणकोर, केरल
4. माता – पिता पुन्नाथठुरावीथी पप्पियाम्मा,  कोचेरिल रमण विद्यार
5. पत्नी उषा नारायण (1951)
6. राजनैतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
7. मृत्यु 9 नवम्बर 2005 (नई दिल्ली)

के.आर.नारायणन का प्रारम्भिक जीवन

कोचेरिल रमण नारायणन का जन्म 27 अक्टूबर 1920 को केरल के कोट्टायम जिले के उजाउर गाँव में एक दलित परिवार में हुआ था | नारायाणन जिस घर में पैदा हुए थे उसमे खाने के भी लाले थे | उनके पिता कोचिरल रमण वैधम जड़ी बूटियों से इलाज कर अपनी जीविका चलाते थे | यह वैधम नाम शायद इसी कारण पड़ा था | उनकी माता का नाम पप्पी अम्मा था | नारायणन सात भाई-बहन थे | इनमे से तीन बहने और चार भाई थे | उनका परिवार फूस की झोपडी में रहता था |

आर्थिक बदहाली के बावजूद नारायणन  के मन में शुरू से ही शिक्षा पाने की ललक थी | स्कूल जाने के लिए उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था | गरीब पिता  कई बार उनकी स्कूल फीस समय पर नही दे पाते थे जिससे नारायणन को अपने शिक्षको और सहपाठियों के सामने अपमान का सामना करना पड़ता था | पांचवी से आठवी तक की पढाई उन्होंने उजाउर के सरकारी विद्यालय से की

इसके बाद कोराविल्नगद के सेंत मेरी बॉयज हाई स्कूल से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की | स्कूली पढाई के दौरान उन्हें गांधीजी के हरिजन सेवक संघ से भी सहायता मिली | उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने छात्रवृत्तियो के आलावा ट्यूशन का भी सहारा लिया | नारायण ने त्रावणकोर विश्वविद्यालय से अव्वल दर्जे में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया | त्रावणकोर जैसे पिछड़े प्रदेश में नौकरी की सम्भावना नही दिखने पर वे दिल्ली चले आये | यहाँ पर उन्हें सरकारी नौकरी मिल गयी |

इसी दौरान उन्हें इकोनॉमिक वीकली फॉर कॉमर्स एंड इंडस्ट्री में काम करने का प्रस्ताव मिला | यधपि वेतन कम था लेकिन कार्य रूचि का था इसलिए उन्होंने इस पत्र में काम करना शुरू कर दिया | इसी बीच उन्होंने आगे पढाई जारी रखने के बारे में भी सोचा | टाटा उद्योग समूह की छात्रवृति से उनका यह सपना भी साकार हुआ और ब्रिटेन के लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में अध्ययन करने का मौका मिला |

यही उनके भाग्य ने करवट बदली | यहाँ वे राजनीती के विख्यात विद्वान एवं लेखक प्रो.लास्की के सम्पर्क में आये | वे भी नारायणन से प्रभावित हुए बिना नही रह सके| पंडित जवाहरलाल नेहरु भी प्रो.लास्की के छात्र रह चुके थे | जब नारायणन स्वदेश लौटे तो प्रो.लास्की ने उन्हें पंडित नेहरु के नाम एक पत्र दिया , जिसमे उनकी योग्यता को सराहा गया था | नारायणन जब यह पत्र लेकर पंडित नेहरु से मिले तो उन्होंने नारायणन को भारतीय विदेश सेवा में नियुक्त करवा दिया | इस प्रकार नारायणन बिना किसी प्रतियोगिता का सामना किये 1949 में भारतीय विदेश सेवा में शामिल हो गये |

के आर नारायण करियर ( K.R. Narayanan Career)

1944-45 में के आर नारायण जी ने दी हिन्दू एवं दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पत्रकार के रूप में कार्य किया. इस दौरान 10 अप्रैल 1945 में उन्होंने महात्मा गांधी जी का इंटरव्यू भी लिया था. के आर नारायण जी को हमेशा से विदेश जा कर पढाई करने का मन था, किन्तु उनकी आर्थिक स्थिति उसकी इजाजत नहीं देती थी. स्कॉलरशिप  का भी उस समय प्राबधान नहीं था, सो के आर नारायण जी ने जे आर डी टाटा को एक चिठ्ठी लिख कर मदद मांगी. टाटा ने उनकी मदद की और वे राजनीति विज्ञान की शिक्षा के लिए लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स चले गए.

1948 में वे भारत लौट आए और उनके प्रोफेसर लास्की ने उन्हें जवाहर लाल नेहरूजी से मिलवाया. नेहरूजी ने उन्हें आईऍफ़एस  की नौकरी  दिलवाई, फिर के आर नारायण जी 1949  में  बर्मा  चले गए.  इस दौरान 1954 में दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में उन्होंने बच्चों को शिक्षा भी दी. 1978 में IFS के रूप में जब उनका कार्यकाल समाप्त हुआ, उसके बाद वे 1979 से 80 तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में उपकुलपति  रहे. इसके बाद 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जी ने उन्हें 1980 से 84 तक अमेरिका का भारतीय एम्बेसडर के लिए बना दिया.

के आर नारायण राजनैतिक सफ़र –

इंदिराजी जी के कहने पर 1984 में वे राजनीति में आ गए एवं लगातार तीन लोकसभा  चुनावों में ओट्टापलल (केरल) में कांग्रेस की सीट से विजयी होकर लोकसभा पहुंचे. 1985 में के आर नारायण को राजीव गांधी सरकार के केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में सम्मिलित किया गया. इन्होंने योजना, विज्ञान, विदेश से जुड़े मामले एवं तकनिकी से जुड़े कार्य को संभाला. 1989 में जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी, तब के आर नारायण जी एक विपक्षी सांसद के रूप में अपना कार्य देखते थे. किन्तु जब 1991 में कांग्रेस वापस सत्ता में आई, तब नारायण जी को कैबिनेट  में शामिल  नहीं किया गया.

राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा जी के कार्यकाल में, के आर नारायण जी को 1992 में उपराष्ट्रपति बनाया गया. 17 जुलाई 1997 में नारायण जी को राष्ट्रपति बना दिया गया. उन्होंने सर्वसम्मति से राष्ट्रपति पद हासिल किया. राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान उन्होंने दलित, अल्पसंख्य एवं गरीबों के लिए बहुत कार्य किया. 2002 में के आर नारायण जी का कार्यकाल समाप्त हो गया.

के आर नारायण की मृत्यू

जीवन के अंतिम दिनों में निमोनिया से पीड़ित हो गए थे। इलाज के लिए उन्हें आर्मी रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल, नई दिल्ली मं भर्ती किया गया था जहां 9 नवंबर, 2005 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 24 जनवरी 2008 को इनकी पत्नी उषा नारायणन का भी निधन हो गया।

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