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राजा हरिश्चन्द्र कौन थे?

राजा हरिश्चन्द्र कौन थे?

राजा हरिश्चन्द्र कौन थे?

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सत्यवादी – राजा हरिशचंद्र अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी (,अर्कवंशी, रघुवंशी) राजा थे उन्होंने अपने सत्य प्रतिज्ञा का पालन करने लिए केवल अपना राज- पाठ ही नहीं बल्कि अपनी पत्नी, बच्चे और स्वय को भी बेच दिया। हमारे प्रभु श्रीराम भी उनकी आगे की पीढ़ी में अयोध्या के राजा बने। ( इसमें आप राजा हरिशचंद्र के जीवन को पढ़कर जान पाएंगे कि किस तरह एक व्यक्ति अपने लिए “सत्य प्रतिज्ञा” को निभाने के लिए एक राजा से चांडाल का जीवन जीकर अपना राज पाठ पत्नी बच्चे और स्वय को भी बेच सकता है)

राजा हरिशचंद्र इशवाकु वंश के राजा (त्रिशंकु)पुत्र और अयोध्या के राजपाठ के उत्तराधिकारी थे।

एक बार जब वे अपने मंत्री के साथ शिकार के लिए निकले थे तभी शिकार के दौरान अचानक तेज बारिश और हवाएं चलने लगी तब राजा हरिश्चंद्र ने शरण पाने के लिए एक ब्राह्मण का घर चुना और रात गुजारने के बाद जब वे सुबह अपने महल लौटने लगे तब उन्होंने उस ब्राह्मण को किसी व्यक्ति का हाथ देखकर भविष्य बताते हुए देखा फिर उन्होंने अपना भविष्य जानने की इच्छा प्रकट की पहले तो ब्राह्मण ने उन्हें इसके लिए मना किया परंतु उनके कई बार आग्रह के बाद उस ब्राह्मण ने उनके हस्त रेखाओं को स्पर्श करते हुए

कहां कि ” आपने अपना परिचय(राजा होने का) छुपाया, हाथ की रेखाएं कहती है कि आप कोई साधारण पुरुष नहीं है ….राजवंशी, महाप्रतापी आर्यवृती के चक्रवर्ती नरेश, सम्राटों के सम्राट होंगे, गुड़ और पराक्रम में पूर्ण होंगे, सारे देश में आपकी कीर्ति ध्वज फहरा उठेगी, प्रतिष्ठा ऐसी कि स्वर्ग के देवगण भी आपसे इष्या करेंगे,(फिर थोड़ा विचलित होकर ब्राह्मण ने कहा)… अब खुल रहे हैं प्रतिष्ठा के पिछले भेदी द्वार अंधकार….. घोर… अंधकार राजपाट चला जाएगा भाग्यलक्ष्मी रुठ जाएगी, राजलक्ष्मी विलीन हो जाएंगी पुत्र परिवार सहित घर छोड़ना पड़ेगा, अपने इन हाथों से आपको अपने पुत्र पत्नी को बेचना पड़ेगा”

यह सब सुनकर राजा हरिश्चंद्र विचलित हो जाते हैं महल लौटने के बाद भी वह इसी चिंता में लगे रहते हैं और अपनी प्रेमिका तारावती को इस भविष्यवाणी के बारे में बताते हैं पर राजकुमारी तारावती अपना अंधकार भविष्य( कि भविष्यवाणी के अनुसार राजा हरिशचंद्र से विवाह के पश्तात उन्हें अपना महल छोड़कर दुख भोगना पड़ेगा) देखने के बाद भी वे राजा हरिश्चन्द्र से विवाह करना चाहती थी ।

पर विवाह के पश्चात भी पुत्र को विचलित देखकर राजा हरिश्चंद्र के पिता ने अपने महामंत्री से उनकी ( हरिश्चंद्र) चिंता का कारण पूछते हैं और महामंत्री उन्हें उस ब्राम्हण की भविष्यवाणी के बारे में बताते हैं। यह जानकर वे उस ब्राह्मण को अपने राजमहल में बुलाते हैं परंतु अब भी वह ब्राह्मण अपनी भविष्यवाणी पर अटल था

उसी समय राज्यसभा में वह व्यक्ति रोते हुए उस ब्राह्मण के पास आ पहुंचता है जिसके पुत्र के मृत्यु की भविष्यवाणी उस ब्राह्मण ने की थी और वह भविष्यवाणी सत्य निकली..

यह सब देखकर राजा त्रिशंकु(हरिश्चंद्र के पिता) कुछ अहंकार में आकर उस ब्राह्मण को कहते हैं कि “ठीक है यदि तुम्हारी भविष्यवाणी सत्य हुई तो हम तुम्हें राजपुरोहित पद देंगे लेकिन तब तक तुम्हें हमारे राज्य कारागार में रहना होगा”

कुछ समय बाद राजा हरिश्चंद्र का विवाह तारावती से हो जाता है उनको एक पुत्र प्राप्त होता है जिसका नाम वे रोहित रखते हैं और इसके कुछ समय बाद राजा हरिश्चंद्र के पिता की मृत्यु हो जाती है।

पर इसके बाद भी उनका विचलन समाप्त नहीं होता और फ़िर राजा हरिश्चंद्र रात्री में उस ब्राह्मण से मिलने कारागार में जाते हैं और कहते हैं —

“आपसे जीवन का एक गंभीर प्रश्न पूछने आया हूं आप तो जानते ही हैं कि पिता का स्वर्गवास हो गया है और आप मेरे लिए इतने वर्षों से कारागार की सजा भोग रहे हैं और अब यह मैं नहीं सहन कर सकता “

इसपर ब्राह्मण ने जवाब दिया —

“मेरी चिंता मत कीजिए महाराज मैं नहीं चाहता कि आपके हाथों से कारागार से मुक्ति पाकर आपके पिता को दिया वचन भंग करू और सत्य का साथ छोड़ दूं…… कहो राजा और कोई प्रश्न(थोड़ा रुक कर बोले)

फिर हरिश्चंद्र ने उत्तर दिया —

“जबसे आपने मेरा भविष्य बताया मन को शांति नहीं , तारावती से मेरा विवाह भी हुआ भगवान की कृपा से एक पुत्र रत्न भी हुआ अयोध्या की सिंहासन पर बैठ कर राजपाट संभाल रहा हूं फिर भी मन को शांति नहीं कोई ऐसा उपाय नहीं कि आने वाले अंधकार से अपने परिवार को बचा सकु”

ब्राह्मण ने कहा –

“होनी अगर हो जाए तो उसे होनी कौन कहेगा भाग्य का लिखा तो मनुष्य को भोगना ही पड़ता है”

इसपर हरिश्चंद्र ने पूछा —

“मैं जानता हूं गुरुदेव लेकिन जब जगत में शाप से बचने का उपाय होता है , विष उतारने की औषधि होती है तो भाग्य बदलने का कोई उपाय नहीं… तो फिर पहले भविष्य जान लेने से क्या लाभ?? “

ब्राह्मण ने उत्तर दिया —

“ताकि मनुष्य आने वाली विपत्ति का सामना कर सके,निधि और धर्म की आचरण से दुख सहने की शक्ति पा सके,”

इस पर हरिश्चंद्र में पूछा —

“तो बताइए गुरुदेव जगत की सर्वश्रेष्ठ नीति और धर्म क्या है मन ,वचन, कर्म से मैं उसका पालन करूंगा”

ब्राह्मण ने जवाब दिया —

“अपने आचरण से कभी किसी का मन ना दुखाना, संसार में सत्य के समान कोई और नीति नहीं है धर्मों में सर्वश्रेष्ठ धर्म “सत्य” ही है सर्वदा सत्य का पालन करने वाले का कभी कोई ही अहित नहीं होता”

और ये वचन सुनने के बाद राजा हरिश्चंद्र ने सत्य प्रतिज्ञा ली और कहां”मैं अयोध्यापति राजा हरिश्चंद्र आपके चरण छूकर प्रतिज्ञा करता हूं आज से सर्वदा मन वचन कर्म से सत्य का पालन करूंगा स्वप्न में भी असत्य का आचरण नहीं करूंगा और अपने कार्य से कभी किसी का मन नहीं दुखाऊंगा”

राजा हरिश्चंद्र की यह सत्य प्रतिज्ञा सुनकर देवलोक में राजा इंद्र की कुर्सी दमाडोल होकर हिलने होने लगी देवलोक में सभी देव विचलित हो उठे और प्रश्न किया “यह क्या हो रहा है” इस पर महर्षि वशिष्ठ ने उत्तर दिया की यह अयोध्या पति राजा हरिश्चंद्र की सत्य प्रतिज्ञा है जिससे देव लोग भी ठिठक उठा है … सत्य प्रतिज्ञा के आगे सैकड़ों वर्ष की तपस्या कुछ नहीं है”

इस पर महर्षि विश्वामित्र ने गुरू वशिष्ठ को उत्तर देते हुए कहा कि ” सत्य के केवल संकल्प मात्र से कुछ नहीं होता महर्षि वशिष्ठ मै भी देखता हूं …सत्य धर्म का वचन लेकर हरिश्चन्द्र को सी सिद्धि प्राप्त होती है “

उसके बाद हठ और अहंकार में महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र के सत्य प्रतिज्ञा को तोड़ने का विचार बना लिया।

और फिर महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र के सत्य प्रतिज्ञा को भंग करने के लिए स्वर्ग की एक अप्सरा को राजा के स्वप्न में भेजा और सपने में ही राजा हरिश्चंद्र ने अप्सरा के नृत्य से प्रसन्न होकर कहा” मांगो मेरे अधिकार का जो कुछ तुम मांगोगी मैं तुम्हें दूंगा”इस पर अप्सरा ने स्वय हरिश्चंद्र को ही मांग लिया इस पर राजा हरिश्चंद्र गुस्सा होकर बोले” मैंने तुम्हें अपने अधिकार की चीज मांगने को कहा था पर तुमने मुझे ही मांग लिया .. मुझ पर पहले ही मेरी पत्नी का अधिकार है ” इस पर अप्सरा ने कहा कि महाराज मेरी वाचनपूर्ती करनी है तो कीजिए तो नहीं तो अपना वचन वापस ले लीजिए और मैं यहां से चली जाती हूं ” इतने में स्वप्न में ही महर्षि विश्वामित्र आए और अप्सरा ने महर्षि विश्वामित्र से कहा कि “राजा हरिश्चंद्र ने मुझे वचन दिया और यह अपने वचन से मुंह फेर रहे हैं इनसे कहिए कि अपना दिया वचन स्वीकार कर मुझे अपनी पत्नी बना ले या अपने आपको मिठ्यवादी स्वीकार कर लें”

यह सुनकर महर्षि विश्वामित्र ने कहा “अप्सरा तुम महाराज के वचनों को नहीं समझती हो महाराज की पत्नी होने के बदले अगर तुमने महाराज का राजपाट भी मांग लिया होता तो भी वे अपने वचनों से पीछे नहीं हटते”

“रहने दीजिए यह बड़ी-बड़ी बातें राजपाठ देना कोई आसान बात थोड़ी ना है विश्वास नहीं तो आप ही मांग कर देखिए” अप्सरा ने कहा —

इसके बाद महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से उनका राजपाठ स्वप्न में ही मांग लिया …

सपने में राजपाठ दे देने के वचन के बाद अगली सुबह जब महाराजा हरिश्चंद्र उठे तो महर्षि विश्वामित्र उनके महल में आ पहुंचे और राजा हरिश्चंद्र से अपना स्वप्न में किए गए वचन पूरा करने के लिए कहा।

तब राजा हरिश्चंद्र ने उस ब्राह्मण के दिए गए सत्य प्रतिज्ञा के वचन को याद किया और की “मै हर स्तिथि में सत्य का साथ नहीं छोडूंगा ” और फिर राजा ने अपना सारा राजपाठ महर्षि विश्वामित्र को दे दिया।

पर महर्षि विश्वामित्र को तो हरिश्चंद्र की ली गई “सत्य प्रतिज्ञा” को तोड़ना था तो उन्होंने राजा से सारा राजपाठ लेने के बाद उन्हें अपनी पत्नी बच्चों सहित राज्य छोड़कर चले जाने को कहा । फिर जब राजा हरिश्चंद्र अपने परिवार संग सब कुछ छोड़कर महल से जाने लगे तब महर्षि विश्वामित्र ने राजा से कहा की ” ठहरिए राजा दक्षिणा दिए बिना दान कभी पूरा नहीं होता मेरी दक्षिणा अभी बाकी है”

राजा हरिश्चंद्र ने कहा कि महर्षि मैं मेहनत मजदूरी करके 20 वें दिन आपकी दक्षिणा अदा कर दूंगा । इसके बाद राजा राजपाठ छोड़ कर चले गए और एक मजदूर की तरह लकड़हारे का कार्य करने लगे तभी महर्षि विश्वामित्र अपनी दक्षिणा लेने के लिए 19 वें दिन उनके घर आ पहुंचे और अपनी दक्षिणा की मांग की इस पर राजा हरिश्चंद्र ने कहा कि”महर्षि आप कल आइए मैं आपकी दक्षिणा अदा कर दूंगा”

अगले दिन जब महर्षि विश्वामित्र अपनी दक्षिणा लेने राजा हरिश्चंद्र की झोपड़ी में पहुंचे तब दिनरात परिश्रम करने के बाद भी हरिश्चंद्र दक्षिणा इकत्रित नहीं कर पाए थे और फिर उन्होंने अपने वचन को पूरा करने के लिए अपने बीवी बच्चों सहित स्वय को भी बेच दिया और महर्षि को दक्षिणा की अदायी कर दी।

उनकी पत्नी और बच्चों को एक सेठ ने 700 मुद्राओं में खरीद लिया था और वहीं स्वय को उन्होंने एक चांडाल के हाथों 300 मुद्राओं में बेच दिया था । उनकी पत्नी बच्चे को एक नौकरानी की तरह यातना दुख दर्द सह कर काम करना पड़ रहा था और वह स्वय भी दिन रात मेहनत मजदूरी करके गुलाम की भांति चांडाल का जीवन जी रहें थे

महर्षि विश्वामित्र के इतने दुख देने के बाद भी राजा हरिश्चंद्र की सत्य प्रतिज्ञा तनिक भी कमजोर ना हुई क्योंकि अगर वे चाहते तो अभी भी महर्षि को दिए अपने वचनों को तोड़कर अपना राज पाठ वापस ले सकते थे पर वे अपने वचनों पर अडिग रहें यह देख महर्षि विश्वामित्र क्रोधित हुए और उन्होंने राजा हरिश्चंद्र को और अधिक दुख यातना देने का निश्चय किया ताकि राजा अपने सत्यवादी हठ को छोड़कर परिस्थतियो के आगे घुटने टेक दे ।

इसके लिए महर्षि विश्वामित्र ने हरिशचंद्र के बेटे को साप से डस्वाने की योजना बनाई

और जब रोहित (हरिशचंद्र पुत्र) अपने मित्रो केसाथ खेल रहा होता है तब उसे साप काट लेता है और जब मां तारावती को इसका पता चलता है तो वो व्याकुल होकर भागते हुए आती है और देखती है कि उनके बेटे की मृत्यु विष से हो चुकी है।

इस दुखद अवस्था में वह अपने बच्चे का शव लेकर एक घाट पर रो रही थी तभी एक चांडाल पीछे से आते हुए दिलासा देता है और कहता है कि ” जो जा चुका वो लौटने वाला नहीं इस समय कठोर हृदय होकर भगवान का नाम लो और शमशान का कर चुका के इसका अंतिम संस्कार पूरा करो( मालिक ने उन्हें यह कहा था कि जबतक कोई सवा गज कफ़न और 7 टके ना दे शव जलाने की अनुमति ना दे)”

दुखद स्वर में तारावती ने कहा —

क्या शमशान का कर (tax) ??

“हां शमशान का कर.. सवा गज कफ़न और 7 टके ” हरिश्चंद्र ने कहा

“सवा गज कफ़न और 7 टके मुझ अभागन के पास कहां से आए”

“यह तुम्हें देखना है दे सको तो दो वरना मुर्दा उठाओ और किसी और गंगा किनारे ले जाओ” चांडाल ऊंचे और कठोर स्वर में बोला

“क्या कहां मैं इस शव उठा ले जाऊं इसलिए की ये एक कंगाल मा का बेटा है, इस लिए की मै तुम्हारा कर नहीं दे सकती ,पत्थर का ह्रदय है तुम्हारा एक कफन के एक टुकड़े और 7 टके पैसों के लिए मेरे बेटे का दाह संस्कार नहीं होने वाला” यह बोलते हुए वह पीछे मुड़ती है और देखती है कि वह चांडाल और कोई नहीं उनके पति राजा हरिश्चंद्र है आकाश मैं बिजली कड़कती है और दोनों के चेहरे पर सफेद रोशनी पड़ती है राजा हरिश्चंद्र ने भी उन्हें पहचान लिया और डरे हुए मन से आश्चर्य से पूछते हैं कि” भगवान यह कैसे हुआ और “भरोसा रखो तारा” कहकर वे अपनी पत्नी को गले लगा लेते है

और तारावती कुछ थम कर कहती हैं —

“मै अभागान तो आपके पुत्र को नहीं संभाल सकी अब आप ही इसका अंतिम संस्कार कीजिए”

राजा हरिशचंद्र बोले — “इसका अंतिम संस्कार…… इसके अंतिम संस्कार के लिए तुम्हें घाट का कर देना ही होगा”

“परंतु ये आपका पुत्र है” तारावती बोली

“ठीक है लेकिन पुत्र की ममता मुझे मेरे कद कर्तव्य से नहीं गिरा सकती मैं चांडाल का दास… कर लिए बिना मुर्दा कैसे फूकने दू… कर्त्तव्य धर्म “

“तो क्या धर्म इतना निष्ठुर होता है ” तारावती ने कहा

निष्ठुर नहीं कठोर है.. तारा तुम सोचती हो मैं कठोर हो गया हूं मैं कठोर नहीं हूं तारा तुम्हारी यह दशा और अपने पुत्र का मृतक शव देखकर मेरा दिल टुकड़े टुकड़े हो रहा है पर मैं लाचार हूं प्रेम, भय या पराधीनता जैसी कोई वस्तु मुझे मेरे कर्तव्य से पीछे नहीं हटा सकता…जिस धर्म और व्रत को मैंने इतने दुख झेलने के बाद भी नहीं तोड़ा तुम चाहती हो कि मैं इसे कफन के एक टुकड़े के लिए तोड़ दू” राजा हरिशचंद्र दुखी मन से बोले।

“नहीं नाथ मैं आपका धर्म नहीं छुड़वाना चाहती पुत्र के दाह संस्कार के आगे कफन का एक टुकड़ा ही आपका धर्म बताता है ” बोले हुए तारावती ने अपनी धोती का टुकड़ा फाड़कर राजा हरिशचंद्र के हाथो में रख दिया

“और सात टके” हरीशचन्द्र कापते हुए बोले

“सात टके तो मेरे पास नहीं है” वो बोली

इस पर राजा हरिशचंद्र अपने हृदय को कठोर कर ऊंचे स्वर में बोले “तो अंतिम संस्कार नहीं हो सकता यह कफन लो और मुर्दा उठा ले जाओ”

तारावती शव के पास घुटने टेकते हुई बोली” क्या अयोध्या के राजकुमार का मुर्दा शमशान को भी भारी पड़ रहा है”

इतने में महर्षि विश्वामित्र अन्य देवों के साथ मरघट पर प्रकट हुए और बोले “बस महाराज हरिश्चंद्र आपके सत्य धर्म पालन के आगे मेरा मस्तिष्क झुक गया है मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं और अपने समस्त तपस्या का फल आपके चरणों में अर्पित करता हूं आज आपकी तपस्या पूरी हुई”

इसके बाद महर्षि विश्वामित्र ने हरिश्चंद्रपुत्र रोहित को जीवित कर दिया और उनका राज पाठ उन्हें वापस कर दिया

 

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