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उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द | Novel Emperor Munshi Premchand

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द | Novel Emperor Munshi Premchand

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द

गांधी जी ने भारतीय समाज को सुधारने के लिये जो कुछ कहा उसे सत्यं शिवं – सुन्दर के रूप में हिन्दी गद्य साहित्य में साकार रूप प्रदान करने वाला , गाँधी जी को जैसी भाषा प्रिय थी सी भाषा को लिखने वाला यदि कोई साहित्यकार हुआ तो वे प्रेमचन्द ही हैं । निःसन्देह वे जीवादी विचारधारा के अनन्य उपासक थे । गाँधी जी की भाँति प्रेमचन्द ने भी भारत की जनता को हृदय के नेत्रों से देखा था ।

जीवन वृत्त – उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई , सन् १८८० ई ० को काशी के निकट लहमी गाँव में हुआ था । इनके पिता का नाम अजयराय और माता का नाम आनन्दी देवी था । इनका स्वयं बचपन का नाम धनपत राय था । कायस्थ परिवार में जन्म होने के कारण उनको प्रारम्भिक शिक्षा एक मौलवी के द्वारा उर्दू से प्रारम्भ हुई । आर्थिक कठिनाइयों में रहते हुए किसी तरह सन् १८ ९९ के लगभग हाईस्कूल की परीक्षा पास की और प्रयाग आकर सी ० टी ० परीक्षा पास की । अर्थाभाव के कारण बीस रुपये मासिक पर एक स्कूल में अध्यापक हो गये और जीवन की विषमताओं से लड़ते हुए वहाँ रहकर बी . ए . पास किया । इसके पश्चात् ये शिक्षा विभाग में सब डिप्टी इन्स्पेक्टर हो गये । कुछ वर्षों बाद , महात्मा गाँधी के एक व्याख्यान से प्रभावित होकर सन् १ ९ २१ के असहयोग आन्दोलन में इन्होंने सरकारी नौकरी से त्याग – पत्र दे दिया ।

अब जीवन के संघर्षों ने और भी अधिक भयानक रूप धारण कर लिया था , धनाभाव तो पहले से था ही । इसके पश्चात् ये मारवाड़ी विद्यालय कानपुर तथा काशी विद्यापीठ के प्रधानाध्यापक रहे । इन पदों से भी त्याग – पत्र देने के पश्चात् इन्होंने ” मर्यादा ” और ” माधुरी ” नामक पत्रों का सम्पादन किया । कुछ समय बाद इन्होंने स्वतन्त्र रूप से ‘ हंस ‘ और ‘ जागरण ‘ पत्रों का प्रकाशन एवं सम्पादन प्रारम्भ किया परन्तु व्यवसाय में हानि के कारण धनाभाव बढ़ता ही गया । तब एक फिल्म कम्पनी का कथानक लिखने के लिये इन्हें मुम्बई बुला लिया गया परन्तु जलवायु की प्रतिकूलता के कारण वहाँ से भी लौट आये थे । अथक परिश्रम एवं अर्थाभाव के कारण उनका स्वास्थ्य उत्तरोत्तर गिरता गया और माँ सरस्वती का यह अमर साधक अपनी साधना की ज्योति को सदैव – सदैव के लिये बुझाकर ८ अक्टूबर , १ ९ ३६ ई . को दिवंगत हो गया ।

साहित्य सेवा – प्रेमचन्द जी ने साहित्य की बहुमुखी सेवा की थी । सम्पादन से लेकर बालोपयोगी साहित्य तक इन्होंने लिखा था । कुछ पुस्तकों का अनुवाद भी किया था , निबन्ध भी लिखे थे और नाटक भी । परन्तु इन्होंने उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द तथा कहानीकार प्रेमचन्द के रूप में ख्याति प्राप्त की । प्रेमचन्द जी निम्न रूपों में हमारे समक्ष आते हैं l

उपन्यासकार – सेवा सदन , प्रेमाश्रय , रंगभूमि , काया कल्प , कर्म भूमि , गबन , गोदाम , निर्मला , प्रतिज्ञा , वरदान ।

कहानीकार – सप्त सुमन , प्रेम द्वादशी , प्रेम – पूर्णिमा , सप्त सरोज , नवनिधि , प्रेम पचीसी , मानसरोवर ।

नाटककार – संग्राम , कर्बला , प्रेम की वेदी । निबन्धकार – कुछ विचार , साहित्य का उद्देश्य । सम्पादक – मन मोदक , गल्प समुच्चय , गल्प रल । अनुवाद कार्य – फिसाने आवाज , चाँदी की डिबिया , सृष्टि का आरम्भ , आदि ।
बालोपयोगी साहित्य निर्माता – मनमोहक , कुत्ते की कहानी , जंगल की कहानियाँ , राम चर्चा ।
विषय – प्रेमचन्द जी हिन्दी युगान्तरकारी कलाकार , विचारक और समाज – सुधारक थे । वे माहित्य में उपयोगितावाद तथा सामाजिक नव – जागरण के पक्षपाती थे । निरर्थक प्राचीन परम्पराओं और रूढ़ियों को उखाड़ फेंकना चाहते थे । इन्हीं के द्वारा हिन्दी साहित्य में चरित्र – प्रधान उपन्यास का सूत्रपात हुआ । वे केवल काल्पनिक न होकर जीवन कठोर सत्य वास्तविकताओं से युक्त हैं । प्रेमचर उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में न कोरे यथार्थवाद के पक्ष में थे और न कोरे आदर्शवाद के पक्ष में । उनकी मान्यता थी कि –
” नम्म यथार्थ तथा नग्न आदर्श दोनों ही अतियां । नग्न यथार्थ , पुलिस की रिपोर्ट भर कर सकता नग्न – आदर्श प्लेटफार्म का फतवा । ”

प्रेमचन्द कहते थे कि जो कमियाँ हमारे समाज हैं , हमारे व्यक्तिगत और राष्ट्रीय जीवन में हैं , वे सब समाज के सामने स्पष्ट रूप से रख दी जायें , साथ उस रोग को दूर करने की दवा भी बता दी जाये , जिससे समाज को कुछ लाभ हो । इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने अपने विषय एवं विषयानुकूल पात्रों का चयन किया । जीवन के संघर्ष और घात – प्रतिघात ही उपन्यास और कहानी का प्राण होता है । कठोर संघर्ष घात – प्रतिघात , वैषम्य अभाव की सुलगती हुई अग्नि उन्हीं लोगों से मिलती है , जो समाज के उपेक्षित , शोषित एवं तिरस्कृत अंग होते हैं । प्रेमचन्द जी ने ही सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य में इन उपेक्षित और समाज द्वारा सताये हये लोगों को अपना चरित्र – नायक बनाया । यही कारण है कि उनका प्रत्येक कथानक हृदय को एकदम स्पर्श कर लेता है । प्रेमचन्द जी सच्चे समाज सुधारक और क्रान्तिकारी लेखक थे । हम उनकी विषय – सामग्री को १ – समाज की कुत्सित प्रवृत्तियों का चित्रण निम्न भागों में विभाजित कर सकते हैं
१- समाज के कुत्सित प्रवृत्तियों का चित्रण एवं सुधार ।
२ – आर्थिक एवं धार्मिक शोषण के विरुद्ध अभियान ।
३ – नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान की प्रेरणा ।
४- गाँधीवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व ।

प्रेमचन्द गाँधीवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक एवं पोषक थे । वह युग राष्ट्रीय आन्दोलनों का युग था , अतः प्रेमचन्द जी का अधिकांश साहित्य गाँधी जी की विचारधारा का साकार रूप है ।

भाषा – प्रेमचंद्र ने जो कुछ लिखा हुआ साहित्य मर्मज्ञ के लिए नहीं था । वह सर्वसाधारण के लिए था । उनका उद्देश्य जनसाधारण का कल्याण था । प्रेमचंद्र इस उद्देश्य में सफल हुए । इनकी भाषा प्रसाद जी को ही भांति निश्चित भाषा ना होकर पात्रों के अनुकूल भाषा थी । पात्र यदि पंडित जी हैं , तो वे नेक धर्म को नियम धर्म कहेंगे और यदि पात्र अशिक्षित किसान महिला है तो वह नेक धरम ही कहेगी ।  इसी प्रकार पात्र यदि मुसलमान है , तो भाषा उर्दू होगी और यदि उच्च वर्ग का शिक्षित युवक है तो भाषा में दो – चार अंग्रेजी के शब्द आ जाने स्वाभाविक हैं । इसीलिए उर्दू के शेर , संस्कृत के श्लोक और हिन्दी के मुहावरे प्रेमचन्द की भाषा में साथ – साथ चलते दिखाई पड़ते हैं । क्लिष्टता , कठोरता , अबोधता और गहनता का कहीं नाम तक नहीं है ।

प्रेमचन्द जी की भाषा में जैसी चंचलता और चुलबुलाहट , मिठास और सजीवता है , लोच और चमत्कारिता है , वैसी प्रायः अन्य लेखकों में नहीं मिलती । इसका मुख्य कारण यह है कि प्रेमचन्द जी उर्दू से हिन्दी में आये थे । उर्दू के वे एक प्रतिष्ठित लेखक थे ; इनकी कहानियाँ उर्दू के ‘ जमाना पत्र में प्रकाशित होती थीं । इसलिये उर्दू भाषा – शैली की कुछ विशेषतायें प्रेमचन्द जी की भाषा – शैली में होना स्वाभाविक है और इसलिये इनकी भाषा में रवानगी है , रंगीनी है और चुलबुलापन है । इनकी भाषा भावों के सर्वथा अनुकूल चलती है और वह पात्र , समय , स्थान और अवसर के अनुकूल बदलती रहती है । प्रेमचन्द की भाषा वह भाषा है जिसे महात्मा गाँधी ने राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दुस्तानी के नाम से प्रतिपादित किया था ।

भाषा के विषय में प्रेमचन्द जी का निश्चित विचार था– कि- ” भाषा के लिये सबसे महत्त्व को चीज है कि ज्यादा – से – ज्यादा आदमी ; चाहे वे किसी प्रान्त के रहने वाले हों , समझें , बोलें , लिखें । ऐसी भावा न पंडिताऊ होगी और न मौलवियों की । उसका स्थान इन दो के बीच में है । ”

शैली – प्रेमचन्द हिन्दी कथा – साहित्य के सबसे पहले कथासार हैं जिन्होंने सर्वथा एक नवीन शैली को जन्म देकर कथा साहित्य को इतना लोकप्रिय और लोक – मंगलकारी बनाया । इनकी शैली हिन्दी उर्दू शैली का समन्वित रूप है , जिसमें गम्भीरता के साथ सजीवता और चंचलता है । सरलता , प्रभावोत्पादकता , अलंकारिकता , चित्रोपमता , नाटकीयता , व्यंग्यात्मकता तथा हास्य इनकी शैली को प्रमुख विशेषतायें हैं , जिनके कारण इनकी शैली अत्यन्त मार्मिक एवं कवित्वपूर्ण हो उठी है । सरलता इनकी शैली का प्रधान गुण है , बनावट इनसे कोसों दूर है । वातावरण , परिस्थिति तथा हृदयगत भावनाओं के चित्रण में प्रभावोत्पादकता लाने में प्रेमचन्द जी सिद्धहस्त थे । शब्दों , भावों और विचारों में स्थान – स्थान पर अलंकारिकता के दर्शन होते हैं । प्रेमचन्द जी ने प्रत्येक परिस्थिति का चित्र एक कुशल चित्रकार की भाँति खींचा है , चित्र खींचने में ये अत्यन्त कुशल थे । पात्रों के वार्तालाप में नाटकीय शैली का प्रयोग करके इन्होंने अपने वर्णन में रोचकता ही उत्पन्न नहीं की अपितु अद्वितीय मार्मिकता भी उत्पन्न कर दी है । व्यंग्यात्मकता और हास्य प्रेमचन्द जी की शैली के प्राण हैं , मुहावरों और सूक्तियों के प्रयोग ने इनकी शैली को और भी अधिक चमकाया है । प्रेमचन्द की सूक्तियाँ स्वयं निर्मित हैं । उन्होंने पुरानो लोकोक्तियों और मुहावरों का आश्रय कम लिया है और सिद्धान्तों और मान्यताओं को छोटे वाक्यों में सूत्रबद्ध करके बड़ी चमत्कारिकता और मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है , जो हृदय को बिना स्पर्श किये नहीं रहता । निस्सन्देह वे अनुभूतिमूलक एवं भावपूर्ण उक्तियाँ बड़ी महत्त्वपूर्ण है ।

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