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हरिवंश राय बच्चन | Essay in Hindi | Harivanshrai Bachchan

हरिवंश राय बच्चन | Essay in Hindi | Harivanshrai Bachchan

हरिवंश राय बच्चन

जीवन परिचय- हरिवंश राय ‘ बच्चन ‘ का जन्म प्रयाग में सन् १ ९ ०७ ई ० में हुआ । इन्होंने काशी और प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की । कैम्बिज विश्वविद्यालय से इन्होंने डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । कुछ समय ये प्रयाग विश्व विद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे । फिर दिल्ली में केन्द्रीय सरकार के विदेश मन्त्रालय में कार्य करते हुए वहीं से अवकाश ग्रहण किया ।

काव्यगत विशेषतायें – ‘ बच्चन ‘ जी उत्तर छायावादी काल के आस्थावादी कवि थे इनकी कविताओं में मानवीय भावनाओं की सामान्य एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति हुई है । सरलता संगीतात्मक प्रवाह और मार्मिकता इनके काव्य की विशेषतायें हैं और उन्हीं से इनको इतनी अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई । इन रचनाओं में बच्चन जी की भावनायें और तन्मयता पाठकों और श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर देती है ।

आरम्भ में बच्चन जी उमर खैयाम के जीवन दर्शन से बहुत प्रभावित रहे । इसी ने इनके जीवन को मस्ती से भर दिया । मधुशाला , मधुबाला , हाला और प्याला को इन्होंने प्रतीकों के रूप में स्वीकार किया है । ये सभी रचनायें अत्यधिक पसन्द की गईं । ‘ बच्चन ‘ जी साहित्य जगत में छा गये ।
पहली पत्नी की मृत्यु के बाद घोर विषाद और निराशा ने इनके जीवन को घेर लिया । इसके स्वर हमको ” निशा निमन्त्रण ” और “ एकान्त संगीत ” में सुनने को मिले । इसी समय से हृदय की गम्भीर वृत्तियों का विश्लेषण आरम्भ हुआ । किन्तु ” मतरागिणी ” में फिर नीड का निर्माण किया और जीवन का प्याला एक बार फिर उल्लास और आनन्द के आसव से छलकने लगा । ‘ बच्चन ‘ जी वास्तव में व्यक्तिवादी कवि रहे पर ” बंगाल का काल ” तथा इसी प्रकार की अन्य रचनाओं में इन्होंने अपने जीवन के बाहर विस्तृत जन – जीवन पर दृष्टि डालने का प्रयत्न किया । इन परवर्ती रचनाओं में कुछ नवीन विषय भी उठाए गये और कुछ अनुवाद भी प्रस्तुत किये गये । इनमें कवि की विचारशीलता तथा चिन्तन की प्रधानता रही । पथ की यहचान रचना में कवि देश के नवयुवकों को अर्थात् प्रत्येक मानव को साहस के साथ जीवन – पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है , जीवन मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को सहन करने के लिये प्रेरित करता है-
” पूर्व चलने के बटोही , वाट की पहचान करले । ”
x X X
है अनिश्चित , कब सुमन , कब कंटकों के शर मिलेंगे ,
कौन सहसा छूट जायेंगे , मिलेंगे कौन सहसा ,
आ पड़े कुछ भी , रुकेगा तू न , ऐसी आन करले । ”

आगे चलकर कवि महापुरुषों के जीवन दर्शन और आदर्शों का अनुसरण करने की प्रेरणा देता है –
” पर गये कुछ लोग इस पर , छोड़ पैरों की निशानी यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है , खोल इसका अर्थ पन्थी , पंथ का अनुमान कर ले । ”

भाषा – शैली – बच्चन जी की भाषा – शैली सरल , सरस , मधुर और प्रभावोत्पादक है । इनकी रचनाओं में संगीतात्मकता है । उनमें कोमलता के भी दर्शन होते हैं ।

रचनायें- बच्चन जी की कवितायें प्रायः पत्र – पत्रिकाओं में छपती रहती थी । इनकी रचनायें मधुशाला , मधुबाला , हाला और प्याला , निशा – निमन्त्रण , एकान्त संगीत , सतरंगिणी , बंगाल आ काल आदि हैं ।

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