hindi Essay

बाबू गुलाब राय | Essay in Hindi | Babu Gulab Rai

बाबू गुलाब राय | Essay in Hindi | Babu Gulab Rai

बाबू गुलाब राय

निबन्धों के क्षेत्र में द्विवेदी युग से लेकर वर्तमान युग तक उतार – चढ़ाव का स्पष्ट चित्र यदि एक ही लेखक में आप देखना चाहें तो बाबू गुलाबराय के निबन्ध साहित्य को देखें । इन्होंने भारतीय प्राचीन साहित्य सिद्धान्तों के साथ – साथ पाश्चात्य साहित्य सिद्धान्तों से भी छात्र समाज का परिचय कराया । निःसन्देह हिन्दी छात्र जगत गुलाबराय जी का चिरऋणी रहेगा ।

जीवन – वृत्त- बाबू गुलाबराय का जन्म इटावा में सन् १८८७ ई ० में हुआ था । इनके पिता श्री भवानी प्रसाद मैनपुरी की जजी कचहरी में एक उच्च अधिकारी एवं धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे । इनकी माता कृष्ण भक्त थीं । माता – पिता की धार्मिक प्रवृत्ति का बालक गुलाबराय पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही था । अत : बाल्यकाल से ही इनकी प्रवृत्ति धार्मिकता की ओर थी और आगे चलकर दर्शन शास्त्र के अध्ययन के लिए प्रवृत्त हुए । इन्होंने मैनपुरी के मिशन हाई स्कूल से सन् १ ९ ०५ में हाई स्कूल की परीक्षा पास की । उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये ये आगरा चले आये और आगरा कालेज से बी ० ए ० तथा सेन्ट जॉन्स कालेज से दर्शन शास्त्र में एम ० ए ० की परीक्षा उत्तीर्ण की । इसके पश्चात् इन्होंने एल – एल . बी . पास किया , परन्तु वकालत की ओर इनकी रुचि न थी । छतरपुर के महाराज को दर्शनशास्त्र का अध्ययन कराने के लिये इनकी नियुक्ति हुई । चार वर्ष बाद महाराजा ने इन्हें अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बना लिया । छतरपुर निवास के १७ वर्षों में इन्होंने सचिव , दीवान तथा प्रधान न्यायाधीश आदि प्रमुख पदों पर कार्य किया । वहां से लौटने के पश्चात् इन्होंने साहित्य – सृजन को अपना व्यवसाय बनाया । ये बहुत समय तक सेन्ट जॉन्स कालेज आगरा के हिन्दी विभाग में अवैतनिक रूप से कार्य करते रहे । आगरा से प्रकाशित ‘ साहित्य – निर्देश ‘ नामक पत्र का भी इन्होंने विद्वत्तापूर्वक सम्पादन किया । सन् १ ९ ६३ में इनकी मृत्यु हो गयी ।

साहित्य – सेवा – गुलाबराय जी निम्नलिखित तीन रूपों में हिन्दी जगत् के समक्ष आते हैं
( १ ) दार्शनिक , ( २ ) निबन्धकार , ( ३ ) आलोचक ।
इनमें से निबन्धकार और आलोचक इनके रूप हैं । हिन्दी में इनकी ख्याति सर्वप्रथम यद्यपि आलोचक के रूप में ही हुई फिर भी इनका निबन्धकार का रूप सर्वोत्कृष्ट है । इनके वैयक्तिक एवं आत्माभिव्यक्तिपूरक निबन्ध वर्तमान युग में महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं । बाबू गुलाबराय जी ने अनेक ग्रन्थों की रचना की है , कुछ ग्रंन्यों का सम्पादन भी किया है । रचनायें निम्नलिखित हैं –
दार्शनिक ग्रन्थ – तर्क शास्त्र ‘ , ‘ कर्तव्य शास्त्र । साहित्य – ग्रन्थ- ‘ सिद्धान्त और अध्ययन ‘ , ‘ काव्य के रूप ‘ आदि ।

इतिहास एवं आलोचनात्मक ग्रन्थ- ‘ हिन्दी नाट्य विमर्श ‘ ‘ प्रसाद की कला ‘ ‘ हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास ‘ आदि ।

निबन्ध ग्रन्थ – ‘ मेरी असफलतायें ‘ , ‘ मेरे निबन्ध , ‘ कुछ उथले कुछ गहरे ‘ , ‘ अध्ययन और आस्वाद ‘ , ‘ फिर निराश क्यों ‘ आदि ।

विषय- गुलाबराय जी की विषय सामग्री में विविधता के पर्याप्त दर्शन होते हैं । जहाँ इन्होंने एक ओर तर्कशास्त्र और दर्शन को अपना विषय बनाया वहाँ दूसरी ओर साहित्यशास्त्र पर भी पर्याप्त लिखा । इतिहास और आलोचना भी इनके प्रिय विषय रहे । ‘ सिद्धान्त और अध्ययन तथा ‘ काव्य के रूप ‘ ये दोनों ग्रन्थ हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं । निबन्ध के क्षेत्र में वैयक्तिक एवं आत्माभिव्यक्ति पर निबन्ध लिखने में गुलाबराय जी का महत्वपूर्ण स्थान है । इन्होंने इतिहास , राजनीति , मनोविज्ञान , धर्मदर्शन , समाज , पर्व – त्यौहार तथा सामयिक घटनाओं को भी अपने निबन्धों का विषय बताया है ।

भाषा- गुलाबराय जी की भाषा परिष्कृत एवं परिमार्जित विशुद्ध हिन्दी है , जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों तथा पारिभाषिक शब्दावली की प्रधानता है । पर इस गम्भीर भाषा का प्रयोग आलोचनात्मक समीक्षाओं में तथा विचारात्मक निबन्धों में ही किया गया है । भाषा का दूसरा रूप सरल है । इसको बोधगम्य बनाने के लिये उर्दू , फारसी तथा अंग्रेजी के व्यावहारिक शब्दों का भी
प्रयोग किया गया है । मुहावरों और कहावतों के प्रयोग ने भाषा के सौन्दर्य को और भी अधिक बढ़ा दिया है । शब्द चयन सुन्दर तथा वाक्य विन्यास व्यवस्थित है । भाषा भावों और विचारों के साथ परिवर्तित होती रहती है ।

शैली- बाबू गुलाबराय की रचनाओं को तीन शैलियों में विभक्त किया जा सकता है— विचारात्मक भावात्मक तथा वैयक्तिक शैली ।
( १ ) विचारात्मक शैली- इस शैली के निबन्धों तथा आलोचनाओं तथा अन्य साहित्य सिद्धान्त सम्बन्धी लेखों की भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त है । वाक्यविन्यास , लोकोक्तियों का सुन्दर प्रयोग , उपयुक्त स्थलों पर व्यंग – विनोद का पुट इस शैली की विशेषतायें हैं , जिनमें गम्भीर विषय भी दुर्बोध नहीं होने पाते ।
( २ ) भावात्मक शैली- यद्यपि भावात्मक शैली की रचनायें गुलाबराय जी की कम ही हैं फिर भी जो हैं उनमें अनुभूति की गहराई तथा संवेदनशीलता के दर्शन होते हैं । इस शैली में इनके वे निबन्ध आते हैं , जो स्वतन्त्र रूप से लिखे गये हैं जिनमें किसी साहित्य , दर्शन अथवा कला की समीक्षा नहीं है । इस शैली में काव्यमयता है , भाषा की निर्मलता , वाक्य – विन्यास की सरलता तथा अभिव्यक्ति की प्रभावोत्पादकता है । तीव्र व्यंग्य – विनोद इस शैली के प्राण हैं ।
( ३ ) वैयक्तिक शैली- इस शैली के निबन्धों से लेखक का अस्तित्व एवं व्यक्तित्व , उसका सामाजिक सम्पर्क और जीवन और जगत् के प्रति उसकी अनुभूतियाँ पाठक के निकट आ जाती हैं । इस शैली के निबन्धों की भाषा सरल , सुबोध , व्यावहारिक एवं रमणीय है । हास – परिहास एवं व्यंग्य – विनोद की भाषा भी पर्याप्त है । इस शैली में रोचकता एवं रमणीयता के साथ विचारोत्तेजकता भी सर्वत्र विद्यमान है । निस्सन्देह गुलाबराय जी की यह शैली बड़ी सशक्त एवं आकर्षक है ।

tense

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *