12-history

bseb class 12 history | भक्ति-सूफी परंपराएँ

bseb class 12 history | भक्ति-सूफी परंपराएँ

                             धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ
 6.                            (लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक )
                         BHAKTI-SUFI TRADITIONS CHANGES IN
                  RELIGIONS BELIEFS AND DEVOTIONAL TEXTS
                               (C. Eighth to Eighteenth Century)
                                        महत्वपूर्ण तथ्य एवं घटनायें
● संत कवियों की भाषा : क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से व्यक्त की गई ।
● मणिक्व चक्कार : ये शिव के अनुयायी थे और तमिल में भक्तिगान की रचना करते थे।
● जगन्नाथ : इसका शाब्दिक अर्थ सम्पूर्ण विश्व का स्वामी है, जिन्हें विष्णु के स्वरूप के रूप
में पुरी (उड़ीसा) में प्रस्तुत किया गया है।
● मारिची : एक बौद्ध देवी थी । इसकी 10वीं शताब्दी की एक मूर्ति बिहार में प्राप्त हुई है।
● तांत्रिक पूजा पद्धति : देवी की पूजा पद्धति को तांत्रिक पूजा पद्धति कहा जाता है ।
● सगुण भक्ति परम्परा : इसमें शिव, विष्णु तथा उनके अवतार और देवियों की पूजा मूर्त
रूप में होती थी।
● निर्गुण भक्ति परम्परा : इसमें अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना की जाती थी।
● अलवार : तमिल में विष्णु भक्तों को अलवार कहा जाता था ।
● नयनार: तमिल में शिव भक्तों को नयनार कहा जाता था ।
● नलयिरादिव्य प्रबंधम : यह अलवारों का काव्य संकलन है। इसको तमिल वेद के रूप में
माना जाता है।
● करइक्काल अम्मइयार : यह स्त्री शिवभक्त थी और अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए घोर
तपस्या की।
● चोल सम्राट : ब्राह्मणीय तथा भक्ति परम्परा का समर्थन किया और शिव तथा विष्णु के
सुन्दर मन्दिर बनवाये।
● वीर शैव परम्परा : इसका नेतृत्व बासन्ना (1106-68) नामक एक ब्राह्मण ने किया । इनके
अनुयायी वीर शैव कहलाये।
● लिंगायत : लिंग धारण करने वाले भक्तों को लिंगायत सम्प्रदाय का माना जाता था ।
● जिम्मी : वे लोग थे जो उद्घटित धर्मग्रंथ को मानने वाले थे ।
● शरिया : मुसलमान समुदाय को निर्देशित करने वाले कानून को शरिया कहा जाता है ।
● हदीस : पैगम्बर साहब से जुड़ी परम्पराएँ जिनके अंतर्गत उनके स्मृत शब्द और क्रियाकलाप
आते हैं, उन्हें हदीस कहा जाता है।
●  तसव्वुक : सूफीवाद के इस्लामी ग्रंथों में शब्द का इस्तेमाल होता है उसे तसव्वुक कहते हैं।
● खानकाह : सूफी समुदाय को खानकाह कहा जाता था ।
● सिलासिला : शेख और मुरीद के मध्य की कड़ी को सिलासिला कहते हैं।
● पद्मावत : जायसी का काव्य ।
● उलटबांँसी : इन रचनाओं में रोजमर्रा के अर्थ को उलट दिया गया है । यह कबीर की
रचनाओं में दिखाई देता है।
● खालसापंथ : गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की नींव डाली। इस पंथ में पांच प्रतीक थे।
                   एन.सी.आर.टी. पाठ्यपुस्तक एवं कुछ अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
  (NCERT Textbook & Some Other Important Questions for Examination)
                                                           बहुविकल्पीय प्रश्न
                                            (Multiple Choice Questions)
प्रश्न 1. प्रथम सहस्राब्दी के मध्य के आते-आते भारतीय उपमहाद्वीप का परिवेश जिन
धार्मिक इमारतों में चिन्हित हो गया वे तीन इमारते थीं :
(क) स्तूप, विहार और मंदिर
(ख) चर्च, मस्जिद और गुरुद्वारे
(ग) स्तूप, चैत्य तथा दरगाह
(घ) उपर्युक्त में से कोई भी ठीक नहीं ।                       उत्तर-(क)
प्रश्न 2. तमिल क्षेत्र से संबंधित मणिक्वचक्कार की दो विशेषताएँ थीं :
(क) कास्य मूर्तिकार, शैव अनुयायी भक्तिगीत गायक
(ख) शैव अनुयायी तथा तमिल में भक्तिगीत के रचनाकार
(ग) तमिल भक्ति गान तथा नृत्यकार
(घ) उपर्युक्त तीनों में प्रथम ठीक है ।                           उत्तर-(ख)
प्रश्न 3. सातवीं शताब्दी के भारतीय धार्मिक विश्वासों की सबसे प्रभावी विशेषता थी:
(क) परम्पराओं की उपेक्षा करते रहना
(ख) साहित्य और मूर्तिकला दोनों में कई देवता-देवियों का ज्यादा से ज्यादा दिखाई देना।
(ग) हिन्दुओं द्वारा अन्य धर्मावलम्बियों की निन्दा करते रहना
(घ) उपर्युक्त में से कोई भी नहीं ।                              उत्तर-(ख)
प्रश्न 4. जगन्नाथ का शाब्दिक अर्थ है:
(क) विष्णु एवं शिव का अवतार
(ख) सम्पूर्ण विश्व का स्वामी
(ग) सभी का हितैषी
(घ) उपर्युक्त में से कोई भी नहीं ।                              उत्तर-(ख)
प्रश्न 5. मारिची थी:
(क) बौद्ध देवी
(ख) जैन देवी
(ग) हिन्दू देवी
(घ) उपर्युक्त में से कोई भी नहीं ।                              उत्तर-(क)
प्रश्न 6. आठवीं से अठारहवीं शताब्दी तक वैदिक देवकुल के जो देवता पूरी तरह
गौन्डा हो गये, वे थे:
(क) अवरूण, वायु तथा इन्द्र
(ख) अग्नि, इन्द्र तथा सोम
(ग) ऊषा, सूर्य तथा अदिति
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं ।                                   उत्तर-(ख)
प्रश्न 7. धर्म के इतिहासकार, भक्ति परम्परा को जिन दो मुख्य वर्गों में बाँटते है,
वे हैं:
(क) सगुण और निर्गुण
(ख) आस्तिक एवं नास्तिक
(ग) अवतारवाद तथा यज्ञ-वेदवाद
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।                                   उत्तर-(क)
प्रश्न 8. प्रारंभिक भक्ति आन्दोलन अलवारों और नयनारों के नेतृत्व में जब उदय हुआ
उस समय शताब्दी थी:
(क) लगभग नवीं शताब्दी
(ख) लगभग छठी शताब्दी
(ग) लगभग दसवीं शताब्दी
(घ) लगभग तेरहवीं शताब्दी।                                   उत्तर-(क)
9. भारत में चिश्ती शाखा का प्रवर्तन सर्वप्रथम किसने किया था ? [B.M. 2009A]
(क) अबू-अब्दाल चिश्ती
(ख) ख्याजा मुइनुद्दीन चिश्ती
(ग) फर दुद्दीन गंजकर
(घ) कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी                      उत्तर-(ख)
10. सूफी मत की फिरदौसी शाखा निम्न में से कहाँ सबसे अधिक पनपी?[B.M.2009A]
(क) बंगाल
(ख) उड़ीसा
(ग) दिल्ली
(घ) बिहार                                      उत्तर-(घ)
11. अकबर निम्नलिखित में से किस भू-भाग पर विजय करने में सफल नहीं हो
सका?          [Board Exam. 2009][B.M.2009A, B.Exam.2012 (A)]
(क) चित्तौड़
(ख) बीकानेर
(ग) मेवाड़
(घ) जोधपुर                                    उत्तर-(ग)
12. ‘आइन-ए-अकबरी’ के लेखक थे- [B.M. 2009A,B.Exam. 2012 (A)]
(क) अबुल फजल
(ख) अब्दुल हमीद लाहौरी
(ग) शेख मुबारक
(घ) आकिल खाराजी                        उत्तर-(क)
13. मुगल साम्राज्य का संस्थापक था-                         [B.M.2009A]
(क) जहाँगीर
(ख) हुमायूँ
(ग) बाबर
(घ) फिरोज शाह तुगलक                     उत्तर-(ग)
14. पुष्टि मार्ग का संबंध किससे था ?                           [B.M.2009A]
(क) कबीर
(ख) शंकराचार्य
(ग) बल्लभाचार्य
(घ) रैदास                                        उत्तर-(ग)
15. उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के प्रारंभ का श्रेय किस संत को है ?
                 [Board Exam.2009][B.M.2009A,B.Exam.2013 (A)]
(क) कबीर
(ख) नानक
(ग) चैतन्य महाप्रभु
(घ) रामानंद                                      उत्तर-(घ)
16. शेख मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहाँ है ?
              [B.M.2009A,B.Exam.2010(A), B.Exam. 2012 (A)]
(क) दिल्ली
(ख) आगरा
(ग) फतेहपुर सिकरी
(घ) अजमेर                                     उत्तर-(घ)
17. ‘नयनार’ किस धर्म से संबंधित थे ?                      [B.M.2009A]
(क) आजीवक
(ख) बौद्ध
(ग) शैव
(घ) वैष्णव                                      उत्तर-(ग)
18. वीर शैव (लिंगायत) आंदोलन के जनक कौन थे ? [B.Exam.2010 (A)]
(क) कबीर
(ख) गुरु नानक
(ग) वासवन्न
(घ) कराहकल                                  उत्तर-(ग)
                                       अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर
                            (Very Short Answer Type Questions)
प्रश्न 1. प्रथम सहस्त्राब्दी के मध्य तक आते-आते भारतीय उपमहाद्वीप का परिवेश
जिन तीन तरह की इमारतों में चिह्नित हो गया, उनके नाम लिखिए।
उत्तर-1. स्तूप, 2. विहार और 3. मंदिर।
प्रश्न 2. उन सभी स्रोतों, इमारतों, ग्रंथों आदि का उल्लेख कीजिए जो आठवीं शताब्दी
में धार्मिक विश्वासों और आचरणों का प्रतीक एवं स्रोत हैं।
उत्तर-प्रथम सहस्राब्दी के मध्य तक आते-आते भारतीय उपमहाद्वीप का परिवेश धार्मिक
इमारतों-स्तूप, विहार और मंदिरों में चिह्नित हो गया। यदि यह इमारतें किसी विशेष धार्मिक
विश्वासों और आचरणों का प्रतीक हैं, वहीं अन्य धार्मिक विश्वासों का पुनर्निर्माण हम साहित्यिक
परंपरा जैसे पुराणों के आधार पर भी कर सकते हैं जिनका वर्तमान स्वरूप लगभग उसी समय
बनना आरंभ हो गया था। इसके अलावा ऐसे धार्मिक विश्वास भी हैं जो साहित्यिक और दृष्टि
दोनों ही दस्तावेजों में अत्यंत धूमिल हैं।
प्रश्न 3. जगन्नाथ का शाब्दिक अर्थ लिखकर उनकी बहन तथा भाई का नाम लिखिए।
उत्तर-जगन्नाथ का शाब्दिक अर्थ है सम्पूर्ण विश्व का स्वामी । उनकी बहन का नाम सुभद्रा
तथा भाई का नाम बलराम है।
प्रश्न 4. आठवीं सदी की नूतन साहित्यिक रचनाओं की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-इस काल के नूतन साहित्यिक स्रोतों में संत कवियों की रचनाएँ हैं जिनमें उन्होंने
जनसाधारण की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपने को व्यक्त किया था। यह रचनाएँ जो
अधिकतर संगीतबद्ध हैं संतों के अनुयायियों द्वारा उनकी मृत्यु के उपरांत संकलित की गईं। ये
परंपराएँ प्रवाहमान थीं अनुयायियों की कई पीढ़ियों ने मूल संदेश का न केवल विस्तार किया अपितु उन विचारों को, जो भिन्न राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में संदिग्ध व अनावश्यक लगे, उन्हें या तो परिवर्तित कर दिया अथवा त्याग दिया।
प्रश्न 5. मारिची का संक्षिप्त परिचय एवं महत्त्व बताइए।
उत्तर-यह बौद्ध (धर्म) देवी है। उनकी सुन्दर प्रतिमाएँ बिहार की दसवीं शताब्दी में बनाई
गईं। इसे महायान बौद्ध पूजते थे। यह देवी विभिन्न धार्मिक विश्वासों और क्रियाकलापों के
एकीकरण की प्रक्रिया का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
प्रश्न 6. तांत्रिक पूजा पद्धति का अर्थ एवं कुछ विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-अधिकांशतः देवी की आराधना पद्धति को तांत्रिक नाम जाना जाता है। तांत्रिक
पूजा पद्धति उपमहाद्वीप के कई भागों में प्रचलित थी-इसके अंतर्गत स्त्री और पुरुष दोनों ही शामिल हो सकते थे। इसके अतिरिक्त कर्मकांडीय संदर्भ में वर्ग और वर्ण के भेद की अवहेलना की जाती थी। इस पद्धति के विचारों ने शैव और बौद्ध दर्शन को भी प्रभावित किया खासतौर से उपमहाद्वीप के पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी भागों में । आगामी सहस्राब्दी में इन समस्त विश्वासों और आचारों का वर्गीकरण “हिन्दू” के रूप में हुआ।
प्रश्न 7.आठवीं शताब्दी के समय को ध्यान में रखकर बौद्धिक और पौराणिक परम्परा
के मध्य तुलना कीजिए।
उत्तर-आठवीं शताब्दी के काल में वैदिक और पौराणिक परम्पराओं के बीच तुलना करने
पर धार्मिक विश्वासों तथा आचारों की विषमता स्पष्ट रूप से उभरती हुई दिखाई पड़ती है। वैदिक
देवकुल के अग्नि, इंद्र और सोम जैसे देवता पूरी तरह गौण हो गए और साहित्य व मूर्तिकला दोनों
में ही उनका निरूपण नहीं दिखता। हालाँकि वैदिक मंत्रों में विष्णु, शिव और देवी की झलक
मिलती है, इसकी तुलना इनके विशद, पौराणिक मिथकों से कदापि नहीं की जा सकती। किन्तु
इन असंगतियों के बावजूद वेदों को प्रामाणिक माना जाता रहा।
प्रश्न 8. आठवीं शताब्दी में धार्मिक भेद-भाव के कारण संघर्ष की स्थिति का उल्लेख
कीजिए।
उत्तर-कभी संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती थी। वैदिक परिपाटी के प्रशंसक उन
सभी आचारों की निंदा करते थे जो ईश्वर की उपासना के लिए मंत्रों के उच्चारण के साथ यज्ञों
के संपादन से परे थे। इसके विपरीत, वे लोग थे जो तांत्रिक आराधना में लगे थे और वैदिक
सत्ता की अवहेलना करते थे। इसके अलावा भक्त अपने इष्टदेव विष्णु या शिव को भी कई बार
सर्वोच्च प्रक्षेपित करते थे। अन्य परंपराओं जैसे बौद्ध अथवा जैन धर्म से भी संबंध अक्सर
तनावपूर्ण हो जाते थे। यद्यपि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे।
प्रश्न 9. आठवीं शताब्दी में लिखी गयी उपासना की कविताओं का प्रारंभिक भक्ति
परम्परा पर क्या अच्छा प्रभाव पड़ा?
उत्तर-आठवीं शताब्दी में कभी-कभी आराधना के तरीकों के क्रमिक विकास के दौरान बहुत
बार संत कवि ऐसे नेता के रूप में उभरे जिनके आस-पास भक्तजनों के एक पूरे समुदाय का
गठन हो गया। यद्यपि बहुत सी भक्ति परंपराओं में ब्राह्मण, देवताओं और भक्तजन के बीच
महत्त्वपूर्ण बिचौलिए बने रहे तथापि इन परंपराओं ने स्त्रियों और “निम्न वर्णों” को भी स्वीकृति
व स्थान दिया। भक्ति परंपरा की एक और विशेषता इसकी विविधता है।
प्रश्न 10. इतिहासकार भक्ति परम्परा को किन दो प्रमुख वर्गों में बाँटते हैं ? उनका
अर्थ स्पष्ट कीजिए ?
उत्तर-दूसरे स्तर पर, धर्म के इतिहासकार भक्ति परंपरा को दो मुख्य वर्गों में बाँटते हैं :
सगुण (विशेषण सहित) और निर्गुण (विशेषण विहीन)। प्रथम वर्ग में शिव, विष्णु तथा उनके
अवतार व देवियों की आराधना आती है, जिनकी मूर्त रूप में अवधारणा हुई। निर्गुण भक्ति परंपरा में अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना की जाती थी।
प्रश्न 11. दसवीं शताब्दी में किये गये भक्ति साहित्य संकलन पर संक्षिप्त टिप्पणी
लिखिए।
उत्तर-दसवीं शताब्दी तक आते-आते बारह अलवारों की रचनाओं का एक संकलन कर
लिया गया जो नलयिरादिव्यप्रबंधम् (“चार हजार पावन रचनाएँ”) के नाम से जाना जाता है।
दसवीं शताब्दी में ही अप्पार संबंदर और सुंदरार की कविताएँ तवरम नामक संकलन में रखी गई
जिसमें कविताओं का संगीत के आधार पर वर्गीकरण हुआ।
प्रश्न 12.शरिया का अर्थ एवं स्रोत बताइए।
उत्तर-शरिया मुसलमान समुदाय को निर्देशित करने वाला कानून है। यह कुरान शरीफ और
हदीस पर आधारित है। हदीस का अर्थ है पैगम्बर साहब से जुड़ी परंपराएँ जिनके अंतर्गत उनके
स्मृत शब्द और क्रियाकलाप भी आते हैं। जब अरब क्षेत्र से बाहर इस्लाम का प्रसार हुआ जहाँ
के आचार-व्यवहार भिन्न थे तो कियास (सदृशता के आधार पर तर्क) और इजमा (समुदाय
की सहमति) को भी कानून का स्रोत माना जाने लगा। इस तरह शरिया, कुरान, हदीस, कियास
और इजमा उद्भूत हुआ।
प्रश्न 13. अकबर एक उदार धार्मिक नीति का समर्थक था। खम्बात में गिरजाघर के
सम्बन्ध में उसके फरमान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-भारतीय इतिहास में सभी मुगल सम्राटों में अधिकतर लोग अकबर को (1556-
1605) एक उदार धार्मिक नीति का पोषक सम्राट मानते हैं। यह उसका एक फरमान इसकी इस
बात की पुष्टि करता है।
यह उद्धरण उस फरमान (बादशाह के हुक्मनामे) का अंश है जिसे 1598 में अकबर
ने जारी किया :
हमारे बुलंद और मुकद्दस (पवित्र) जेहन में पहुँचा है कि यीशु की मुकद्दस जमात के पादरी
खम्बायत गुजरात के शहर में इबादत के लिए (गिरजाघर) एक इमारत की तामीर (निर्माण) करना चाहते हैं। इसलिए यह शाही फरमान. . . जारी किया जा रहा है. . . .खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ और उन्हें गिरजाघर की तामीर करने दें जिससे वे अपनी इबादत कर सकें। यह जरूरी है कि बादशाह के इस फरमान की हर तरह से तामील (पालन) हो।
प्रश्न 14. शाह हमदान मस्जिद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-श्रीनगर की झेलम नदी के किनारे बनी शाह हमदान मस्जिद कश्मीर की सभी मस्जिदों
में ‘मुकुट का नगीना’ समझी जाती है। इसका निर्माण 1395 में हुआ और यह कश्मीरी लकड़ी
की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसके शिखर और नक्काशीदार छज्जे पर गौर
कीजिए यह पेपरमैशी से सजाई गई है।
प्रश्न 15. सूफीवाद और तसत्वुफ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।[B.Exam.2012,2013 (A)]
उत्तर-सूफीवाद उन्नीसवीं शताब्दी में मुद्रित एक अंग्रेजी शब्द है। इस सूफीवाद के लिए
इस्लामी ग्रंथों में जिस शब्द का इस्तेमाल होता है वह है तसव्वुफ । कुछ विद्वानों के अनुसार यह
शब्द ‘सूफ’ से निकला है जिसका अर्थ ऊन है। यह उस खुरदुरे ऊनी कपड़े की ओर इशारा
करता है जिसे सूफी पहनते थे। अन्य विद्वान इस शब्द की व्युत्पत्ति ‘सफा’ से मानते हैं जिसका
अर्थ है साफ । यह भी संभव है कि यह शब्द ‘सफा’ से निकला हो जो पैगम्बर की मस्जिद के
बाहर एक चबूतरा था जहाँ निकट अनुयायियों की मंडली धर्म के बारे में जानने के लिए इकट्ठी
होती थी।
प्रश्न 16. असम के शंकरदेव पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में असम में शंकरदेव वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक के
रूप में उभरे । उनके उपदेशों को ‘भगवती धर्म’ कह कर संबोधित किया जाता है क्योंकि वे भगवद्गीता और भागवत पुराण पर आधारित थे। ये उपदेश सर्वोच्च देवता विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव पर केन्द्रित थे। शंकरदेव ने भक्ति के लिए नाम कीर्तन और श्रद्धावान भक्तों के सत्संग में ईश्वर के नाम उच्चारण पर बल दिया। उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार के लिए सत्र या मठ तथा नामघर जैसे प्रार्थनागृह की स्थापना को बढ़ावा दिया। इस क्षेत्र में ये संस्थाएँ और आचार आज भी पनप रहे हैं। शंकरदेव की प्रमुख काव्य रचनाओं में कीर्तनघोष भी है।
प्रश्न 17. सूफी सिलसिलों का नामकरण कैसे हुआ ?
उत्तर-ज्यादातर सूफी वंश उन्हें स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े । उदाहरणतः कादरी
सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर पड़ा। कुछ अन्य सिलसिलों का नामकरण
उनके जन्मस्थान पर हुआ जैसे चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से लिया गया ।
प्रश्न 18. अमीर खुसरो कौन था ? उनके नाम के साथ कौल शब्द कैसे जुड़ा है ?
उत्तर-अमीर खुसरो (1253-1323) महान कवि, संगीतज्ञ तथा शेख निजामुद्दीन औलिया
के अनुयायी थे। उन्होंने कौल (अरबी शब्द जिसका अर्थ है कहावत) का प्रचलन करके चिश्ती
समा को एक विशिष्ट आकार दिया। कौल को कव्वाली के शुरू और आखिर में गाया जाता
था। इसके बाद सूफी कविता का पाठ होता था जो फारसी, हिन्दवी अथवा उर्दू में होती थी और कभी-कभी इन तीनों ही भाषाओं के शब्द इसमें मौजूद होते थे। शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर गाने वाले कव्वाल अपने गायन की शुरुआत कौल से करते हैं। उपमहाद्वीप की सभी दरगाहों पर कव्वाली गाई जाती है।
प्रश्न 19. कश्फ-उल-महजुब का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर-सूफी खानकाहों के आस-पास अनेक ग्रंथों की रचना हुई जिनमें कश्फ-उल-महजुब
भी शामिल है। सूफी विचारों और आचारों पर प्रबंध पुस्तिका कश्फ-उल-महजुब इस विधा का
एक उदाहरण है। यह पुस्तक अली बिन उस्मान हुजविरी (मृत्यु 1071) द्वारा लिखी गई । साहित्य इतिहासकारों को यह जानने में मदद करता है कि उपमहाद्वीप के बाहर की परंपराओं ने भारत में सूफी चिंतन को किस तरह प्रभावित किया।
प्रश्न 20. गुरु नानक कौन थे ? उनके व्यक्तित्व के बारे में किसी एक इतिहासकार
का कथन लिखिए।
उत्तर-गुरु नानक (Guru Nanak)-पंजाब में भक्ति आन्दोलन का ज्वार लाने का श्रेय गुरु
नानक जी को है। वे जाति-पाँति, धर्म, वर्ग और मूर्ति पूजा के विरोधी थे । उन्होंने निष्काम भक्ति,
शुभ कर्म तथा शुद्ध जीवन को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बतलाया। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के
समर्थक थे।
“उनका स्वाभाविक मिठास और सबसे प्रेम करने की भावना के कारण हिन्दू और मुसलमान
दोनों उनका आदर करते थे। इसी कारण से वह दोनों धर्मों को एक-दूसरे के समीप लाने का
केन्द्र बन गए।”
प्रश्न 21. सूफीवाद और बौद्ध धर्म के बीच संपर्को कर वर्णन कीजिए।
उत्तर-सूफीवाद और बौद्ध धर्म के बीच प्रारंभिक संपर्क उत्तर पश्चिम फारस और मध्य
एशिया में हुआ। बाद में आक्सियाना के परे बौद्ध धर्म ने संभवतः सूफीवाद को प्रभावित किया।
साँस रोकना जैसे कुछ सूफी अभ्यास बौद्ध धर्म के मार्ग से यौगिक प्राणायाम से लिए गए। विद्वानों का मानना है कि मध्य एशिया में कुछ जियरत (कब्र या अवशेष) बौद्ध स्तूपों के अवशेषों पर खड़े हैं। उदाहरणार्थ बलख जो कि एक बौद्ध मठ केन्द्र था, बाद में एक सूफी गढ़ बन गया।
प्रश्न 22. अलवार और नयनार संतों की सामाजिक संरचना क्या थीं?
उत्तर-समाज के सभी वर्गों के लोगों ने अलवार और नयनार संतों के रूप में भक्ति कार्य
किया। वे क्रमशः वैष्णव एवं शैव भक्त सन्त थे।
प्रश्न 23. आप रामानंद के महानतम् अनुयायियों में किन्हें मानते हैं और क्यों ?
उत्तर-हम कबीर को रामानंद के महानतम् अनुयायियों में मानते हैं, क्योंकि वे महान धर्म
सुधारक और समाज सुधारक थे।
प्रश्न 24. महाराष्ट्र के प्रमुख भक्ति संत कौन थे और उनका क्या राजनीतिक महत्त्व है?
उत्तर-13वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य वैष्णव संत महाराष्ट्र में लोकप्रिय हो गए। वे
भगवान विठोवा के भक्त थे। दूसरा समूह 15वीं शताब्दी से पंजाब और राजस्थान के हिन्दीभाषी
क्षेत्रों में सक्रिय था तथा इसकी निर्गुण भक्ति में आस्था थी। विठोबा पंथ के संत तथा उनके
अनुयायी वरकरी या तीर्थयात्री, पंथी कहलाते थे क्योंकि वे हर वर्ष पंठरपुर की तीर्थयात्रा पर जाते थे। 500 वर्ष तक चले इस पंथ के कम-से-कम पचास संत हैं जिनमें सबसे प्रमुख हैं-ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम एवं उनके समकालीन रामदास जिनकी शिक्षा से शिवाजी प्रभावित हुए।
महाराष्ट्र के भक्ति आंदोलन ने मराठाओं को एक योद्धा समुदाय बना दिया ।
प्रश्न 25.इस्लाम में सूफीवाद किस तरह से गहराई से जुड़ा है ?
उत्तर-इस्लाम समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है। सूफीवाद भी मानवता और
प्रेम पर बल देता है। यह इस्लाम का रहस्यवादी रूप है।
प्रश्न 26. बंगाल में भक्ति आन्दोलन के विकास का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-बंगाल में श्री कृष्ण भक्ति की लहर चली, जहाँ पर उसके प्रारंभिक प्रतिपादों में
विद्यापति ठाकुर और चंडीदास थे। लेकिन वल्लभ के समकालीन चैतन्य (1485-1533) निश्चित
रूप से कृष्ण भक्ति के सबसे प्रसिद्ध प्रतिपादक थे । नभद्वीप में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे चैतन्य को स्वयं कृष्ण का अवतार माना जाता था। संन्यासी बनने के बाद वे बंगाल छोड़कर उड़ीसा में पुरी चले गए। जहाँ उन्होंने दो दशक तक भगवान जगन्नाथ की उपासना की। कहा जाता है कि उन्होंने गौड़ के हुसैन गौड़ के मुख्यमंत्री और मुख्य मुंशी सहित अनेक लोगों का धर्म
परिवर्तन किया।
                                         लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर
                              (Shori Answer Type Questions)
प्रश्न 1. मुलफुजात का क्या अर्थ है ? सूफी परंपरा के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए
एक स्रोत के रूप में इस पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-मुलफुजात का अर्थ है सूफी संतों की बातचीत । सूफी खानकाहों के आसपास अनेक
ग्रंथों की रचना हुई जिनमें यह ग्रंथ भी शामिल है।
सूफी परंपरा के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए विभिन्न स्रोत हैं जिनमें से ही मुलफुजात पर
एक आरंभिक ग्रंथ फवाइद-उल-फुआद है। यह शेख निजामुद्दीन औलिया की बातचीत पर
आधारित एक संग्रह है जिसका संकलन प्रसिद्ध फारसी कवि अमीर हसन जिजी देहलवी ने किया। स्रोत 9 में इस ग्रंथ से लिया एक अंश उद्धृत है। मुलफजात का संकलन विभिन्न सूफी सिसिलों के शेखों की अनुमति से हुआ। इनका उद्देश्य मुख्यतः उपदेशात्मक था । उपमहाद्वीप के अनेक भागों से जिसमें दक्कन शामिल है, अनेक उदाहरण इस तरह के मिलते हैं। कई शताब्दियों तक इनका संकलन होता रहा।
प्रश्न 2. मुक्तुबात पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-मक्तुबात (लिखे हुए पत्रों का संकलन)-ये वे पत्र थे जो सूफी संतों द्वारा अपने
अनुयायियों और सहयोगियों को लिखे गए। इन पत्रों से धार्मिक सत्य के बारे में शेख के अनुभवों
का वर्णन मिलता है जिसे वह अन्य लोगों के साथ बाँटना चाहते थे। वह इन पत्रों में अपने
अनुयायियों के लौकिक और आध्यात्मिक जीवन, उनकी आकांक्षाओं और मुश्किलों पर भी टिप्पणी करते थे। विद्वान बहुधा सत्रहवीं शताब्दी के नक्शबंदी सिलसिले के शेख अहमद सरहिन्दी (मृत्यु 1624) के लिखे मक्तुबात-ए-इमाम रब्बानी पर चर्चा करते हैं। इस शेख की विचारधारा का तुलनात्मक अध्ययन वे बादशाह अकबर की उदारवादी और असांप्रदायिक विचारधारा से करते हैं।
प्रश्न 3. संक्षेप में तजकिरा का ऐतिहासिक स्रोत के रूप में महत्त्व बताइए।
उत्तर-तजकिरा (सूफी संतों की जीवनियों का स्मरण)-भारत में लिखा पहला सूफी
तजकिरा मीर खुर्द किरमानी का सियार-उल-औलिया है। यह तजकिरा मुख्यतः चिश्ती संतों के
बारे में था। सबसे प्रसिद्ध तजकिरा- अब्दुल हक मुहाद्दिस देहलवी (मृत्यु 1642) का
अख्बार-उल-अखयार है। तजकिरा के लेखकों का मुख्य उद्देश्य अपने सिलसिले की प्रधानता स्थापित करना और साथ ही अपनी आध्यात्मिक वंशावली की महिमा का बखान करना था तजकिरे के बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय हैं किन्तु फिर भी वे इतिहासकारों के लिए
महत्त्वपूर्ण हैं और सूफी परंपरा के स्वरूप को समझने में सहायक सिद्ध होते हैं।
प्रश्न 4. उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या
अर्थ निकालते हैं?                                        [N.C.E.R.T. T.B.Q.1]
Explain with examples what historians mean by the integration of cults.
उत्तर-इतिहासकारों के अनुसार इतिहासकारों के समन्वय का अर्थ (Meaning of
communal harmony according to historians)-1. प्रजा प्रणालियों के समन्वय को ही इतिहासकार सम्प्रदाय समन्वय मानते हैं। इसके अंतर्गत वह विभिन्न सम्प्रदाय के लोगों के विश्वासों और आचरणों के मिश्रण और उनके पीछे छुपे निहित समान उद्देश्यों को लोगों के सामने रखते हैं। वे धार्मिक विकास की विभिन्न पद्धतियों और सम्प्रदायों के विकास को समझने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए, वे आठवीं शताब्दी के भारत में पूजा प्रणालियों के संबंध के बारे में अपने विचार लिखते हैं।
2. इतिहासकारों का सुझाव है कि यहाँ कम से कम दो प्रक्रियाएँ कार्यरत थीं। एक प्रक्रिया
ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की थी। इसका प्रसार पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन और
परिरक्षण द्वारा हुआ। ये ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में थे जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और
शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे।
3. इसी काल की एक अन्य प्रक्रिया थी स्त्री, शूद्रों व अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं
और आचरणों को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकृत किया जाना और उसे एक नया रूप प्रदान करना । वस्तुतः समाजशास्त्रियों का यह मानना है कि समूचे उपमहाद्वीप में अनेक धार्मिक विचारधाराएँ और पद्धतियाँ “महान” संस्कृत-पौराणिक परिपाटी तथा “लघु” परंपरा के बीच हुए अविरल संवाद का परिणाम है।
प्रश्न 5. किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय
परिपाटी और सार्वभौमिक आदेशों का सम्मिश्रण हैं? [N.C.E.R.T. T.B.Q.2]
To what extent do you think the architecture of mosques in the
subcontinent reflects a combinations of universal ideals and local
traditions?
उत्तर-इस्लाम के उदय के साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में नई इमारतों (पूजा अर्चना के
लिए) का निर्माण होने लगा। इन इमारतों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आठवीं से
अठाहरवीं शताब्दी तक पाई जाने वाली मस्जिदों का निर्माण स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक
इस्लामी स्थापत्य शैलियों से जुड़े आदर्शों का सम्मिश्रण था। एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय
आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवतः मस्जिदों की स्थापत्य कला में
दृष्टिगोचर होता है। मस्जिदों के कुछ स्थापत्य संबंधी तत्व सार्वभौमिक थे-जैसे इमारत का मक्का
की अनुस्थापन जो मेहराब (प्रार्थना का आला) और मिनबार (व्यासपीठ) की स्थापना से
लक्षित होता था। बहुत से तत्त्व ऐसे थे जिनमें भिन्नता देखने में आती है जैसे छत और निर्माण
का सामान ।
उदाहण-(i) उदाहरण के लिए केरल राज्य में बनाई गई तेरहवीं शताब्दी की मस्जिद के
शिखर के आकार की छत पर ध्यान देने पर लगता है इस पर भारतीय विशेषकर स्थानीय भवन निर्माण कला का स्पष्ट प्रभाव है।
(ii) भारतीय उपमहाद्वीप के एक देश-बंगाल देश में बनाई गई सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ
की अतिया नामक मस्जिद ईंटों की बनी है। इसकी बानी छत के तीनों उल्टे कटोरे के आकार
के नमूने अनेक भारतीय और अन्य देशों में बनी मस्जिदों के नमूने से मिलते हैं मस्जिद के चारों
और वनी मीनारें और उनकी आकृति भारतीय पूजा स्थलों के नमूनों से बहुत ही मिलती-जुलती है।
प्रश्न 6. बे शरिया और बा शरिया सूफी पंरपरा के बीच एकरूपता और अंतर दोनों
को स्पष्ट कीजिए।                                                  [N.C.E.R.T. T.B.Q.3]
What were the similarities and differences between the be-shari’a and
ba-shari’a sufi traditions ?
उत्तर-मुस्लिम कानूनों के संग्रह को शरिया कहते हैं। यह कुराण, हदीस, कियास और इजमा
से उत्पन्न हुआ है। कुछ रहस्यवादियों ने सूफी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नवीन
आंदोलनों की नींव रखी । खानकाह का तिरस्कार करके यह रहस्यवादी, फकीर की जिंदगी बिताते थे। निर्धनता और ब्रह्मचर्य को उन्होंने गौरव प्रदान किया। इन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता था-कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी इत्यादि । शरिया की अवहेलना करने के कारण उन्हें बे-शरिया कहा जाता था। इस तरह उन्हें शरिया का पालन करने वाले (बा-शरिया) सूफियों से अलग करके देखा जाता था।
प्रश्न 7. चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार और वीर शैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा
की आलोचना प्रस्तुत की?                                  [N.C.E.R.T. T.B.Q.4]
Discuss the ways in which the Alwars, Nayanars and Virashaivas
experessed critiques of the caste systems.
उत्तर-अलवार, नयनार और वीर शैव (Alvars, Nayanars and Virashaivas):
(i) प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय)
और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते हुए
तमिल में अपने ईष्ट की स्तुति में भजन गाते थे।
(ii) अपनी यात्राओं के दौरानं अलवार और नयनार संतों ने कुछ पावन स्थलों को अपने इष्ट
का निवासस्थल घोषित किया। इन्हीं स्थलों पर बाद में विशाल मंदिरों का निर्माण हुआ और वे
तीर्थस्थल माने गए । संत-कवियों के भजनों को इन मंदिरों में अनुष्ठानों के समय गाया जाता था
और साथ ही इन संतों की प्रतिमा की भी पूजा की जाती थी।
(iii) कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व
ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज उठाई। कुछ हद तक यह बात सत्य प्रतीत होती है क्योंकि भक्ति संत विविध समुदायों से थे जैसे ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और कुछ तो उन जातियों से आए थे जिन्हें “अस्पृश्य” माना जाता था।
(iv) बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नवीन आंदोलन का उद्भव हुआ जिसका नेतृत्व
बासवन्ना (1106-68) नामक एक ब्राह्मण ने किया । बासवन्ना प्रारंभ में जैन मत को मानने वाले
थे और चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे। इनके अनुयायी वीराशैव (शिव के वीर) व लिंगायत
(लिंग धारण करने वाले) कहलाए।
(v) आज भी लिंगायत समुदाय का इस क्षेत्र में महत्त्व है। वे शिव की आराधना लिंग के
रूप में करते हैं। इस समुदाय के पुरुष वाम स्कंध पर चाँदी के एक पिटारे में एक लघु लिंग
को धारण करते हैं। जिन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है उनमें जंगम अर्थात् यायावर भिक्षु
शामिल हैं। लिंगायतों का विश्वास है कि मृत्योपरांत भक्त शिव में लीन हो जाएँगे तथा इस संसार में पुनः नहीं लौटेंगे। धर्मशास्त्र में बताए गए श्राद्ध संस्कार का वे पालन नहीं करते और अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफनाते हैं। लिंगायतों ने जाति की अवधारणा और कुछ समुदायों के “दूषित” होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया। पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी उन्होंने
प्रश्नवाचक चिह्न लगाया।
प्रश्न 8. क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफी संतों से अपने संबंध बनाने
का प्रयास किया?                                                  [N.C.E.R.T. T.B.Q.7]
Examine how and why rulers tried to established connection with the
traditions of the Nayanars and the sufis.
उत्तर-(i) नयनार और अलवार संत वेल्लाल कृषकों द्वारा सम्मानित होते थे इसलिए
आश्चर्य नहीं कि शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया।
उदाहण-चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा किया और अपनी सत्ता के प्रदर्शन
के लिए सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया जिनमें पत्थर और धातु से बनी मूर्तियाँ सुसज्जित थीं।
इस तरह इन लोकप्रिय संत-कवियों की परिकल्पना को, जो जन-भाषाओं में गीत रचते व गाते
थे, मूर्त रूप प्रदान किया गया। इन सम्राटों ने तमिल भाषा के शैव भजनों का गायन इन मंदिरों
में प्रचलित किया। उन्होंने ऐसे भजनों का संकलन एक ग्रंथ (तवरम) के रूप में करने का भी
जिम्मा उठाया। 945 ईसवी के एक अभिलेख से पता चलता है कि चोल सम्राट परांतक प्रथम
ने संत कवि अप्पार संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं।
इन मूर्तियों को उत्सव में एक जुलूस में निकाला जाता था।
(ii) अजमेर स्थित ख्वाजा मुइनद्दीन की दरगाह पर मुहम्मद बिन तुगलक (1324-51) पहला
सुल्तान था जो इस दरगाह पर आया था किन्तु शेख की मजार पर सबसे पहली इमारत मालवा
के सुल्तान गियासुद्दीन खिलजी ने पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाई। चूँकि यह दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी अतः अनेक यात्री यहाँ आते थे। सोलहवीं शताब्दी तक आते-आते अजमेर की यह दरगाह बहुत ही लोकप्रिय हो गई थी। इस दरगाह को जानने वाले तीर्थयात्रियों के भजनों ने ही अकबर को यहाँ आने के लिए प्रेरित किया। अकबर यहाँ चौदह बार आया कभी तो साल में दो-तीन बार, कभी नयी जीत के लिए आशीर्वाद लेने अथवा संकल्प की पूर्ति पर या फिर पुत्रों के जन्म पर ।
उन्होंने यह परंपरा 1580 तक बनाए रखी। प्रत्यक यात्रा पर बादशाह दान-भेंट दिया करते
थे, जिनके ब्योरे शाही दस्तावेजों में दर्ज हैं। उदाहरण के लिए, 1568 में उन्होंने तीर्थयात्रियों के
लिए खाना पकाने हेतु एक विशाल देग दरगाह को भेंट की। उन्होंने दरगाह के अहाते में एक
मस्जिद भी बनवाई।
प्रश्न 9. रामानुज और रामानंद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-(i) रामानुज (Ramanuja)-शंकराचार्य के बाद प्रसिद्ध भक्त सन्त रामानुज हुए ।
उन्हें प्रथम वैष्णव आचार्य माना जाता है। उनका कार्य-काल बारहवीं शताब्दी था । उन्होंने सगुण
ब्रह्म की भक्ति पर जोर दिया तथा कहा कि उसकी सच्ची भक्ति ज्ञान तथा कर्म से ही मोक्ष प्राप्ति
का साधन है।
(ii) रामानन्द (Ramanand)-आचार्य रामनुज की पीढ़ी में स्वामी रामानन्द प्रथम सन्त थे
जिन्होंने भक्ति द्वारा जन-साधारण को नया मार्ग दिखाया। उनका समय चौदहवीं शताब्दी का
उत्तरार्द्ध और पंद्रहवीं शताब्दी के प्रथम पच्चीस वर्ष माने जाते हैं। उनका जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) में 1299 ई. में कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था उन्होंने एकेश्वरवाद पर जोर देकर हिन्दू मुसलमानों में प्रेम भक्ति सम्बन्ध के साथ सामाजिक समाधान प्रस्तुत किया। इससे भी अधिक उन्होंने हिन्दू समाज के चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) को पक्ति का उपदेश दिया
और निम्न वर्ग के लोगों के साथ खान-पान निषेध का घोर विरोध किया। उनके शिष्य सभी जातियों के लोग थे। इनमें शूद्र भी थे। इनके शिष्यों में रविदास चर्मकार थे। कबीर जुलाहे थे, सेना नाई थे, पीपा राजपूत थे और सन्तधना कसाई थे। उन्होंने ब्राह्मणों और क्षत्रियों की उच्चता का खण्डन किया और मानववाद तथा मानवीय समानता जैसे प्रगतिशील विचारों एवं सिद्धान्तों
का प्रचार किया उन्होंने अपने उपदेशों का प्रचार क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से किया ।
प्रश्न 10. कबीर पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-कबीर (Kabir)-मध्ययुगीन भारतीय संतों में कबीरदास की साहित्गिक एवं ऐतिहासिक
देन स्मरणीय है। वे मात्र भक्त ही नहीं बड़े समाज सुधारक थे। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों
का डटकर विरोध किया। अंधविश्वासों, तकियानूसी अमानवीय मान्यताओं तथा गली-सड़ी
रूढ़ियों की कटु आलोचना । उन्होंने समाज, धर्म तथा दर्शन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण विचारधारा को
प्रोत्साहित भी किया। कबीर ने जहाँ एक ओर बौद्धों, सिद्धों और नाथों की साधना पद्धति तथा
सुधार परम्परा के साथ वैष्णव सम्प्रदायों की भक्ति-भावना को ग्रहण किया वहाँ दूसरी ओर
राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक असमानता के विरुद्ध प्रतिक्रिया भी व्यक्त की। इस
प्रकार मध्यकाल में कबीर ने प्रगतिशील तथा क्रांतिकारी विचारधारा को स्थापित किया। कबीर
एकेश्वरवाद के समर्थक थे। वे मानसिक पवित्रता, अच्छे कर्मों तथा चरित्र की शुद्धता पर बल
देते थे। उन्होंने जाति, धर्म या वर्ग का प्रधानता नहीं दी। उन्होंने धार्मिक कुरीतियों, आडम्बरों,
अंधविश्वासी तथा कर्मकाण्डों को व्यर्थ बतलाया। उन्होंने मूर्ति पूजा का खंडन करने के उद्देश्य
से लिखा था-
“पाहन पूजें हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार।
ताते तो चाकी भली पीस खाय संसार ॥”
सारांश यह है कि कबीर धार्मिक क्षेत्र में सच्ची भक्ति का संदेश लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने
निर्गुण-निराकार भक्ति का मार्ग अपनाकर मानव धर्म के सम्मुख भक्ति का मौलिक रूप रखा।
यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि ” कबीर के राम दशरथ पुत्र राजा राम नहीं हैं अपितु घट-घट
में निवास करने वाली अलौकिक शक्ति है जिसे राम-रहीम, कृष्ण, खुदा वाहेगुरू कोई भी नाम
दिया जाए। उसका रूप एक है। उसकी प्राप्ति के लिए न मंदिर की आवश्यकता है न मस्जिद
की। वह सब में विद्यमान है और सभी उसे भक्ति तथा गुरु की कृपा से प्राप्त कर सकते हैं।”
कबीर जनसाधारण की भाषा में अपने उपदेश देते थे। उन्होंने अपने दोहों में धार्मिक
कुरीतियों, आडम्बरों, अन्धविश्वासों तथा कर्मकाण्डों को व्यर्थ बतलाया।
“कबीर का नाम भारतीय इतिहास में इस कारण लिया जाता है कि उन्होंने हिन्दू और
मुसलमानों के आपसी अंतर को दूर करने और एक मनुष्य के दूसरे से अंतर को दूर करने का
प्रयास किया।”
प्रश्न 11. सन्त नामदेव पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-नामदेव (Namdev)-(i) मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के विकास एवं लोकप्रियता
में महाराष्ट्र के सन्तों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। ज्ञानेश्वर, हेमाद्रि और चक्रधर से आरम्भ होकर रामनाथ, तुकाराम, नामदेव ने भक्ति पर बल दिया तथा एक ईश्वर की सम्पूर्ण मानव जाति सन्तान होने के नाते सबकी समानता के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित किया ।
(ii) नामदेव ने भरपूर कोशिश के साथ जाति प्रथा का खण्डन किया । नामदेव जाति से दर्जी
थे। वे अपने पैतृक व्यवसाय की और कभी भी आकृष्ट नहीं हुए तथा साधु संगत को ही उन्होंने
चाहा।
(iii) सन्त विमोवा खेचम उनके गुरु थे तथा वे सन्त ज्ञानेश्वर के प्रति गहरी निष्ठा रखते
थे। उन्होंने भक्त सन्त प्रचारक बनने के बाद अपने शिष्यों के चुनाव में विशाल हृदय से काम लिया।
(iv) उनका काव्य जो मराठी भाषा में है, ईश्वर के प्रति गहरे प्रेम और भक्ति को व्यक्त
करता है। उनके अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी, एकेश्वर तथा सर्वत्र है। वे समाज सुधारक तथा हिन्दू
मुस्लिम एकता के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने भरपूर कोशिश के साथ जाति प्रथा का खण्डन किया।
(v) कहा जाता है कि उन्होंने दूर-दूर तक यात्राएँ की और दिल्ली में सूफी सन्तों के साथ
विचार-विमर्श किया। वे प्रार्थना, भ्रमण, तीर्थयात्रा सत्संग तथा गुरु की सेवा के समर्थक थे।
उन्होंने आध्यात्मिक क्षेत्र में आचरण की शुद्धता, भक्ति की पवित्रता एवं सरसता और चरित्र की
निर्मलता पर बल दिया।
(vi) नामदेव की मराठी तथा हिन्दी रचनाओं में इनकी निर्गुणवादिता का रूप स्पष्ट देखा जा
सकता है। उन्होंने मराठी भाषा के माध्यम द्वारा महाराष्ट्र के सन्तों की न केवल धार्मिक तथा
सामाजिक उन्नति की अपितु मराठों के नीतिक उत्थान में बुनियादी काम किया। उनके विचारों
से महाराष्ट्र की जनता ने एक नवीन संगठन तथा एकता को महसूस किया है। इस प्रकार
मध्ययुगीन इतिहास पर महाराष्ट्र के सन्तों का महत्त्वपूर्ण प्रभाव देखा जा सकता है।
प्रश्न 12. भारतीय परम्परा में भक्ति का क्या स्थान था ?
उत्तर-भक्ति आन्दोलन को अधिकांशत इस्लाम के समानतावादी सन्देश तथा निम्न जातियों
में उसके विस्तार के खिलाफ हिन्दुओं का जवाब समझा जाता है लेकिन यह आकलन अपूर्ण है
क्योंकि हिन्दू व्यवस्था में भक्ति, साधना का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यह श्वेताम्बर उपनिषद
तथा भगवद् गीता में लिखा है जिसमें भगवान कृष्ण कहते हैं कि एक आम भक्त भी उन तक
भक्ति के रास्ते पहुँच सकता है।
छठी शताब्दी में भक्ति आन्दोलन की शुरुआत तमिल क्षेत्र से हुई जो कर्नाटक एवं महाराष्ट्र
में फैल गई तथा 15वीं शताब्दी के आस-पास यह उत्तर भारत एवं बंगाल पहुँची। इसकी विशेषता थी भक्त तथा उसके स्वयं के भगवान के बीच एक प्रेमपूर्ण संबंध पर जोर । भक्ति आंदोलन के नेता समाज के सभी वर्गों में से थे। इस आन्दोलन का विकास बारह अलवार वैष्णव सन्तों एंव तिरेसठ नयनार क्षेत्र सन्तों ने किया। भक्ति आन्दोलन के महान सन्त थे समबन्दर तथा
मणिक्कवसागर। भक्ति आन्दोलन को अक्सर शंकराचार्य का प्रत्युत्तर माना जाता है, लेकिन शंकर ने स्वयं अनेक भक्तिपूर्ण कार्यों की रचना की। इस आन्दोलन के विशिष्ट नेताओं में से एक रामानुज थे जो श्री वैष्णववाद के संस्थापक के रूप में लोकप्रिय हैं। दक्षिण में भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रचारकों में माधव का भी नाम है।
प्रश्न 13. सूफीवाद और कट्टर इस्लाम के बीच संबंध का वर्णन कीजिए।
उत्तर-12वीं शताब्दी तक अल-गज्जाली, अल-हल्लज और इब्न अल-अरबी के प्रयासों के
परिणामस्वरूप सूफीवाद पूरी तरह से कट्टर इस्लाम में सम्मिलित हो गया। भारतीय परिप्रेक्ष्य में सूफियों ने उलेमा के साथ अपने मतभेदों को अच्छी तरह से सुलझाकर शरियत का पालन करने की आवश्यकता पर बल दिया।
भारत में विभिन्न सूफी विचारधाराओं में चिश्ती और सुहरावर्दी विचारधाराएँ (सिलसिला)
प्रमुख थीं। भारत में चिश्ती विचारधारा की स्थापना मुइनुद्दीन चिश्ती ने की जो 1192 ई० में भारत पहुँचे तथा अजमेर में अपना केन्द्र स्थापित किया। भारत में अन्य प्रमुख सूफी सन्त थे-शेख कुतबुद्दीन बख्तियार काकी, शेख हमीदुद्दीन, शेख फरीदुद्दीन, मसूद गंज-ए-शकर तथा प्रसिद्ध शेख निजामुद्दीन औलिया।
प्रश्न 14. सुफी सन्त के प्रमुख सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए । इनका जन-जीवन पर
क्या प्रभाव पड़ा?                                                     [B.M.2009A]
उत्तर-1. एकेश्वरवाद (Mono God)-सूफी लोग इस्लाम धर्म को मानने के साथ
एकेश्वरवाद पर जोर देते थे। पीरों और पैगम्बरों के उपदेशों को वे मानते थे।
2. रहस्यवाद (Mistensue)-इनकी विचारधारा रहस्यवादी है। इनके अनुसार कुरान के
छिपे रहस्य को महत्त्व दिया जाता है। सूफी सारे विश्व के कण-कण में अल्लाह को देखते हैं।
3. प्रेम साधना पर जोर (Stress on Love and Meditation)-सच्चे प्रेम से मनुष्य
अल्लाह के समीप पहुँच सकता है। प्रेम के आगे नमाज, रोजे आदि का कोई महत्त्व नहीं।
4. भक्ति संगीत (Bhakti Music)-वे ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए गायन को विशेष
महत्त्व देते थे। मूर्ति पूजा के वे विरोधी थे।
5. गुरु या पीर का महत्त्व (Importance of Pir or Teacher)-गुरु या पीर को सूफी
लोग अधिक महत्त्व देते थे। उनके उपदेशों का वे पालन करते थे।
6. इस्लाम विरोधी कुछ सिद्धान्त (Some principles against Islam)-वे इस्लाम
विरोधी कुछ बातें-संगीत, नृत्य आदि को मानते थे। वे रोजे रखने और नमाज पढ़ने में विश्वास
नहीं रखते थे।
प्रश्न 15. चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिलों में क्या भेद था?
उत्तर-चिश्ती सिलसिला के सन्त-निजामुद्दीन औलिया और नसीरूद्दीन चिरारुद्दी-ए-दिल्ली
थे। वे संत जनता के निम्न वर्गों से जिनमें से हिन्दू भी थे, मुक्त रूप से मिलते थे। उनका जीवन
सादगी पूर्ण था और वे लोगों की भाषा हिन्दी में बात करते थे। सूफी सन्तों ने अपने प्रवचनों
में ईश्वर की निकटता का आभास उत्पन्न करने के लिए गीत-संगीत की पद्धति अपनाई, जिसे
समा कहा जाता है। वे अपने प्रवचनों में हिन्दी काव्य का प्रयोग करते थे, जिससे कि श्रोताओं
पर अधिक प्रभाव पड़े।
सुहरावर्दी सिलसिला का कार्य क्षेत्र पंजाब और मुल्तान रहा। इसके प्रसिद्ध सन्त शेख
शहबुद्दीन सुहरावर्दी और हमीद उद्दीन नागौरी हुए हैं। चिश्तियों की भाँति वे फक्कड़ जीवन नहीं
व्यतीत करते थे। वे राज्य की सेवा स्वीकार करते थे। चिश्ती शासन की राजनीति से दूर रहते
थे। दोनों ने ही जनता के सिलसिलों में विभिन्न वर्गों में जनमत बनाकर उनमें एक साथ रहने
की भावना उत्पन्न कर शासकों की सहायता की।
प्रश्न 16. भक्ति आन्दोलन में कबीर तथा गुरु नानक का क्या योगदान था ?
उत्तर-1. कबीर (Kabir)-कबीर एकेश्वरवाद के समर्थक थे। वे मानसिक पवित्रता, अच्छे
कर्मों तथा चरित्र की शुद्धता पर बल देते थे। उन्होंने जाति धर्म या वर्ग को प्रधानता नहीं दी।
उन्होंने धार्मिक कुरीतियों, आडम्बरों, अन्धविश्वासों तथा कर्मकाण्डों को व्यर्थ बतलाया। उन्होंने
मूर्ति पूजा का खण्डन करने के उद्देश्य से लिखा था-
“पाहन पूजें हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते वह चाकी यली, पीस खाय संसार ।”
कबीर जनसाधारण की भाषा में अपने उपदेश देते थे। उन्होंने अपने दोहों में धार्मिक
कुरीतियों, आडम्बरों, अन्धविश्वासों तथा कर्मकाण्डों को व्यर्थ बतलाया।
“कबीर का नाम भारतीय इतिहास में इस कारण लिया जाता है कि उन्होंने हिन्दू और
मुसलमानों के आपसी अन्तर को दूर करने और एक मुनष्य के दूसरे से अंतर को दूर करने का
प्रयास किया।”
2. गुरु नानक (Guru Nanak)-पंजाब में भक्ति आन्दोलन का ज्वार लाने का श्रेय
गुरु नानक का है। वे जाति-पद्धति, धर्म, वर्ग और मूर्ति पूजा के विरोधी थे। निष्काम भक्ति,
शुभ कर्म तथा शुद्ध जीवन को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बतलाया। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के
समर्थक थे।
“उनका स्वाभाविक मिठास और सबसे प्रेम करने की भावना के कारण, हिन्दू और मुसलमान
दोनों उनका आदर करते थे। इसी कारण से वह दोनों धर्मों को एक-दूसरे के समीप लाने का
केन्द्र बन गए।”
प्रश्न 17. गुरु रविदास पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-गुरु रविदास (Guru Ravidas)-गुरु रविदास मध्यकालीन भारत के महान संत और
उच्च कोटि के कवि थे।
जीवन इतिहास (Life History)-रविदास जी का जन्म 1377 ई० में बनारस के एक गाँव
मांढूर में हुआ था। कहा जाता है कि इनका जन्म रविवार के दिन हुआ था, अत: इनका नाम
रविदास रखा गया। इनके पिता का नाम भानदास और माता का नाम करमा देवी था। रविदास
के परिवार जन दलित जगत से सम्बन्धित थे। इसके विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है-
“जाति ओछी पाँति ओछी, ओछा जनम हमारा ।
राजा राम की सेवा कीन्हीं, कहि रविदास चमारा “
रविदास के माता-पिता धार्मिक विचारों के थे। इसका उन पर बहुत प्रभाव पड़ा और वे
बचपन से ही ईश्वर-भक्ति में मग्न रहने लगे। संसार के विषयों में लगाने के लिए उनके
माता-पिता ने उनका विवाह लोना नाम की एक लड़की से कर दिया लेकिन वे सांसारिक
बंधनों में नहीं फंस सके। वे प्रायः साधुओं की सेवा तथा सत्संग में ही अपना समय व्यतीत करते
थे। रविदास ने रामानंद से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी। वे अपने समय के प्रसिद्ध संतों और
भक्तों में सबसे लंबी आयु वाले थे। 1528 ई० में 151 वर्ष की आयु में चित्तौड़ में उनका देहांत
हुआ। उनकी स्मृति में बनवाई गई ‘रविदास की छतरी’ और ‘रविदास के चरण चिह’ आज भी
चित्तौड़ में विद्यमान हैं।
शिक्षाएँ (Teachings)―
1. रविदास जाति-पाँति के विरुद्ध थे। उनका कथन था कि सब लोग एक ईश्वर की संतान
हैं और सब समान हैं। अतः ब्राह्मण और शूद्र आदि के भेदभाव व्यर्थ हैं।
2. रविदास हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षपाती थे। उनके अनुसार मदिर और मस्जिद
एक हैं तथा राम और रहीम में कोई अंतर नहीं।
3. मनुष्य को संतोष और सदाचार को जीवन का आधार बनाना चाहिए और विषय-वासनाओं को छोड़ देना चाहिए।
“सत्त संतोष अरु सदाचार, जीवन को आधार ।
रविदास नर भये देवते, जिन तिओगे पंच विकार ।।
4. मनुष्य को सदा शुभ कार्य करने चाहिए लेकिन उनका परिणाम ईश्वर पर छोड़ देना
चाहिए।
प्रश्न 18. मीरा बाई पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।[B.M.2009A,B.Exam.2009 (A)]
उत्तर-मीरा बाई (Mira bai)-गिरिधर गोपाल की भक्त मीरा का मध्यकालीन संतों में
विशेष स्थान है। उसने भक्ति की जो मंदाकिनी (गंगा) अपने हृदय से निकाली, कविताओं द्वारा
प्रवाहित की, उसने केवल राजस्थान की मरुभूमि ही नहीं, अपितु सारे उत्तरी भारत को रसमग्न
कर दिया ।
मीरा बाई का जन्म लगभग 1516 ई. में राजस्थान के मेड़ता परगने के कुड़की या चौकड़ी
गाँव में हुआ था । मीरा जोधपुर के शासक रतनसिंह राठौर की पुत्री थी । मीरा अभी 4-5 वर्ष
की ही थी कि उसकी माता का देहांत हो गया । उसका पालन-पोषण उसके दादा ने किया ।
अपने दादा के धार्मिक विचारों से मीरा बहुत प्रभावित हुई ।
18 वर्ष की आयु में मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह के बड़े पुत्र भोजराज
से कर दिया गया लेकिन मीरा का वैवाहिक जीवन बहुत संक्षिप्त था । विवाह के लगभग एक
वर्ष बाद ही उसके पति की मृत्यु हो गई । इस तरह मीरा छोटी आयु में ही विधवा हो गई ।
कुछ समय बाद उसके ससुर राणा साँगा की भी मृत्यु हो गई । अब मीरा बेसहारा हो गई । अत:
वह संसार से मोह त्यागकर कृष्ण-भक्ति में लीन हो गई । वह साधुओं का सत्कार करती और
पैरों में घुँघरू बाँधकर भगवान कृष्ण की मूर्ति के सामने नाचने लगती ।
उसके ससुराल के लोगों ने उसके कार्यों को अपने कुल की मर्यादा के विपरीत समझा ।
अतः उसे कई प्रकार के अत्याचारों द्वारा मारने के प्रयास किए । लेकिन जहर का प्याला, साँप
और सूली आदि भी मीरा का बाल-बाँका न कर सके । इस विषय में मीरा ने स्वयं कहा है कि
“मारी मारी न मरूँ, मेरो राखणहार और” । इससे उसकी भक्ति-भावना और बढ़ गई, लेकिन
अत्याचार भी बढ़ते जा रहे थे । कहा जाता है कि मीरा ने अपने ससुराल वालों से तंग आकर
गोस्वामी तुलसीदास जी को पत्र लिखकर उनका सलाह माँगी । तुलसीदास जी ने मीरा को इस
प्रकार उत्तर दिया ।
“जाके प्रिय न राम वैदेही ।
तजिये ताहि कोटि वैरी सम, यद्यपि परम सनेही।”
इस उत्तर को पाकर मीरा ने घर-बार छोड़ दिया और वह वृंदावन चली गई । वहाँ कुछ
समय रहने के बाद मीरा द्वारिका चली गई। कहा जाता है कि मीरा को द्वारिका से लाने के लिए
उनकी ससुराल तथा मायके-दोनों स्थानों से ब्राह्मण आये लेकिन वह नहीं गई । द्वारिका में ही
1574 ई. में मीराबाई का देहांत हो गया ।
प्रश्न 19. चिश्ती सम्प्रदाय के तीन प्रमुख संतों का संक्षिप्त परिचय दें।[B.Exam.2010(A)]
उत्तर-भारत में चिश्ती सम्प्रदाय का प्रवर्तक रज्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को माना जाता है। ये
1192 ई० में भारत में आए।
चिश्ती सम्प्रदाय के तीन प्रमुख संतों का परिचय-
1. शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी-यह मुइनुद्दीन चिश्ती के प्रमुख शिष्य थे। इल्तुतमिश
के समय वे भारत आये। इनका जन्म 1235 ई० में फरगना के गौस नामक स्थान पर हुआ था।
बख्तियार (भाग्य-बन्धु) नाम मुइनुद्दीन का दिया हुआ था।
2. फरीदउद्दीन गंज एक शकर-इनका जन्म मुल्तान जिले के कठवाल शहर में 1175 में
हुआ था। ये बाबा फरीद के नाम से प्रसिद्ध थे। तीन पलियों में से एक, प्रथम पत्नी बलबन की
पुत्री थी जिसका नाम हुजैरा था।
3. शेख निजामुद्दीन औलिया-इनका वास्तविक नाम मुहम्मद-बिन-अहमद बिन-दनियल-अल
बुखारी था। इनका जन्म बदायूँ में 1236 ई० में हुआ था। इन्होंने अपने जीवन काल में दिल्ली
के सात सुल्तानों का राज्य देखा था। इनकी मृत्यु 1325 ई० में हुई।
                                  दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर
                            (Long Answer Type Questions)
प्रश्न 1. कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए । इन
उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ। [B.M.2009A] [N.C.E.R.T. T.B.Q.5]
Describe the major teachings of either Kabir or Baba Guru Nanak,
and the way in which these have been transmitted.
उत्तर-कबीर की शिक्षाएँ (Teachings of Kabir)-
(i) धार्मिक शिक्षाएँ (Religious teachings)-धर्म के संबंध में कबीर ने अत्यंत
महत्त्वपूर्ण विचार उपस्थित किए हैं। उन्होंने किसी धार्मिक विश्वास को इसलिए स्वीकार नहीं
किया कि वह धर्म का अंग बन चुका है अपितु अंधविश्वासों, व्रत, अवतारोपासना, ब्राह्मणों के
कर्मकांड तथा तीर्थ आदि पर कसकर व्यंग्य किए।
(i) अंधविश्वासों का घोर विरोध (Opposition of Superstitions)—कबीर ने
अंधविश्वासों का जोरदार विरोध किया। उनके विचार से यह स्पष्ट है कि उन्होंने हिन्दू मुस्लिम
दोनों सम्प्रदायों के अंधविश्वासों, मूर्तिपूजा, नमाज, अवतारोपासना, ब्राह्मणों के कर्मकांड, तीर्थ
इत्यादि पर कसकर व्यंग्य किए। उन्होंने काजियों और मुल्लाओं की रूढ़िवादी धार्मिक परम्पराओं एवं ब्राह्मणों के आडम्बरों का घोर विरोध किया ।
(iii) भक्ति मार्ग के समर्थक (Supporter of Bhakti path or way)-भक्ति भावना
का कबीर ने पूरा सर्मथन किया उन्होंने निर्गुण निराकार भक्ति का मार्ग अपनाकर मानव के सम्मुख भक्ति का मौलिक रूप रखा ।
(iv) कबीर के राम (Ram of Kabir)―यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि कबीर के राम
दशरथ पुत्र राजा रामचन्द्र नहीं बल्कि वह घट-घट में निवास करने वाली अलौकिक शक्ति है।
(v) समन्वयवादी दृष्टिकोण (Coordinational outlook)-कबीर ने तत्कालीन समाज
में हिन्दू तथा इस्लाम, धर्मों, संस्कृतियों एवं सभ्यताओं के संघर्ष का डटकर विरोध किया ।
(vi) गृहस्थ जीवन के त्याग का विरोध एवं यौगिक क्रियाएँ तथा पुस्तकालीन-ज्ञान
अनावश्यक (Opposed to leave family life and considered Yogic Actions and
Bookish Knowledge undesirable)-कबीर के विचारों के विचारानुसार साफ जीवन
अपनाने के लिए गृहस्थी का सामान्य जीवन त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं । निर्गुण भक्ति
घारा कबीर पहले थे जो संत होकर भी अंत तक शुद्ध गृहस्थ बने रहे एवं शारीरिक श्रम
की प्रतिष्ठा (Dignity of labout) को मानव की सफलताओं का आकार बताया ।
बाबा गुरु नानक की शिक्षाएँ (Teachings of Baba Guru Nanak)-
(i) एकेश्वरवाद (Monotheism)-कबीर की भांति नानक ने भी एंकेश्ववाद पर बल
दिया। उन्होंने ऐसे इष्टदेव की कल्पना की जो अकाल मृत, अजन्मा तथा स्वयंभू है । उनके
विचारानुसार ‘ईश्वर को न तो स्थापित किया जा सकता है और न ही निर्मित ।
(ii) भक्ति एवं प्रेम मार्ग तथा आदर्श चरित्र (Devotion Lover Path (way) and an
ideal character) गुरु नानक देश के अनुसार ईश्वर के प्रति और प्रेम से ही मुक्ति सम्भव
है। इसके लिए वर्ण, जाति और वर्ग का कोई भेद नहीं है। उनके अनुसार अच्छे व्यवहार एवं
आदर्श तथा उच्च-चिरत्र से ईश्वर की निकटता प्राप्त की जा सकती है।
(iii) गुरु की महत्ता अंगीकार तथा आंडम्बरों का विरोध (Accepted the great place
of Guru and opposed supersitions)-गुरु नानक ने भी मार्ग दर्शन के लिए गुरु की
अनिवार्यता को पहली शर्त माना । उन्होंने मूर्तिपूजा, तीर्थ यात्रा आदि धार्मिक आडम्बरों की कटु
आलोचना की । उन्होंने अवतारवाद का विरोध किया ।
(iv) जगत के कण-कण में ईश्वर है (God exist in each and every action)-
गुरु नानक ने संसार का माया से परिपूर्ण नहीं बल्कि इसके कण-कण में ईश्वरीय शक्ति को
देखा है।
(v) उपदेशों का सम्प्रेषण (Communtcation of the preachings)-कबीर और गुरु
नानक ने जनता की भाषा या भाषाओं का प्रयोग किया । कबीर की भाषा में हिन्दी, पंजाबी, फारसी, ब्रज, अवधी और स्थानीय बोलियों में अनेक शब्द प्रयोग किए गए, उनकी भाषा को खिचड़ी भाषा कहा जाता है । वे छोटे-छोटे समूहों में जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों थे, बड़े सरल ढंग से अपने उपदेश देते थे।
गुरु नानक देव ने हिन्दी, पंजाबी का प्रयोग करते हुए लोगों के सामने अपनी शिक्षाएँ उद्देश्य/विचार रखे । उन्होंने गीत गाए, दो चेले-बाला और मर्दाना उनके साथ होते थे। वे वाद्य यंत्र बजाते
थे, गुरु नानक देव जी ने अनेक देशों व स्थानों की यात्राएँ की ।
कबीर और गुरु नानक के अनेक दोहे, पद और गीत अनेक पुस्तकों में संकलित हैं जिन्हें
लोग आज भी पढ़ और सुनकर आध्यात्मिक और धार्मिक लाभ उठाते हैं ।
प्रश्न 2. सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए ।
Discuss the major beliefs and practices that characterised Sufism.
अथवा, सूफी मत के विश्वास (शिक्षाएँ अथवा सिद्धान्त) बताइए ।
                                                            [B.M.2009A]IN.C.E.R.T.T.B.Q.6]
उत्तर-सूफी मत के विश्वास (शिक्षाएँ) या सिद्धान्त (Faiths Teachings or
Principles of Sufism) –
(i) एकेश्वरवाद (Monotheism)-चूँकि सूफी मत इस्लाम की तरफ पूर्णतया झुका रहा
इसलिए इसने भी एकेश्वरवाद में विश्वास रखा । वे ईश्वर को अल्लाह अथवा रहीम कहते थे
लेकिन यह पैगम्बर मुहम्मद के उपदेशों के साथ-साथ अपने-अपने सिलसिले के पीरों के उपदेश
को भी महत्त्व देते थे । सूफी साधकों के अनुसार ईश्वर निरपेक्ष, अगोचर, अपरमित और नानात्व
से परे है।
(ii) आत्मा (The Soul)-सूफी साधकों ने आत्मा को ईश्वर माना है । आत्मा में पाँच
बाहा तथा पाँच आंतरिक तत्व हैं । उनके अनुसार आत्मा शरीर (जो एक पिंजरा है ।) में कैद
है । इसलिए सूफी साधक मृत्यु का स्वागत करते हैं परन्तु वे कहते हैं कि बिना परमात्मा की कृपा
के आत्मा का मिलन ईश्वर से नहीं हो सकता ।
(iii) जगत (The World)-सूफी साधकों के अनुसार परमात्मा ने जगत की सृष्टि की।
जगत माया से पूर्ण नहीं है । ईश्वर ने दुनिया को शीशा समझकर अपनी छाया को देखा है।
(iv) मानव (The Human being)-सूफी साधकों के अनुसार सभी जीवों में मानव श्रेष्ठ
है। सभी प्राणी मानव के स्तर को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं ।
(v) कुरान तथा रहस्यवाद (The Kuran and Secretism)-सूफी साधकों के अनुसार
कुरान एक महान ग्रंथ है लेकिन इसके शाब्दिक तथा बाह्य अर्थ को प्रधानता नहीं देनी चाहिए बल्कि उसके पीछे छिपे रहस्य को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए । सूफियों के रहस्यवाद के अनुसार अल्लाह के कहर से भय नहीं खाना चाहिए । चूँकि ईश्वर बड़ा दयालु है इसलिए मानव को उससे एकाकार तथा मिलन करना चाहिए ।
(vi) गुरु अथवा पीर का महत्त्व (Importance of Guruor Peer)-भक्त सन्तों की
तरह सूफी साधकों ने गुरु अथवा पीर का महत्त्व स्वीकार किया । सूफी साधक पूर्ण मानव को
अपना गुरु मानता है उसके विचारानुसार बिना गुरु के मानव कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता ।
आधुनिक इतिहासकार डॉ. ताराचन्द्र के अनुसार, “पैगम्बर मुहम्मद ने मानव को अल्लाह के समक्ष आत्मसमर्पण किया तथा सूफी मत ने मुर्शीद (गुरु) के समक्ष आत्मसमर्पण पर विशेष बल दिया।”
(vii) लक्ष्य की प्राप्ति (Attainment of Aim)-परमात्मा के साथ एकत्व प्राप्त करना
सूफी का चरम लक्ष्य है । इस लक्ष्य को प्राप्त करने के अनेक साधन हैं-जिक्र अर्थात् अल्लाह
के नाम को जोर से लेकिन दिल में स्मरण करना । सूफी साधक परमात्मा में पूर्ण लय हो जाने
को फना की अवस्था मानते हैं । इस अवस्था में साधक सांसरिक प्रपंचों से स्वयं को पृथक् होकर
अपने अस्तित्व को लय कर देता है । अहम् या अहंकार के मिटने पर ही फना की अवस्था मिल
जाती है।
(viii) प्रेम साधना पर बल (Emphasis on Love and Devotion)-सूफी प्रेम से
ईश्वर को प्राप्त करने की आज्ञा रखते हैं । उनके अनुसार प्रेम पूर्वक साधना से ईश्वर के
अधिक निकट पहुँचा जाता है । प्रेम से परमात्मा संबंधी रहस्यों का भेदन होता है तथा उसका
ज्ञान प्राप्त होता है । सूफी परमात्मा को प्रियतमा तथा साधक को माशूक मानते हैं । माशूक प्रियतमा से मिलने के लिए बेचैन रहता है। प्रेम से वह अनन्त सौन्दर्य का रसास्वादन करता है क्योंकि जहाँ सौंदर्य नहीं प्रेम का होना कठिन है । इसलिए प्रेमपूर्वक साधना ही ईश्वर की अनुभूति का एकमात्र साधन है। सूफी साधकों के अनुसार सच्चा प्रेम एवं भाव नमाज, रोजे आदि से
अधिक महत्त्वपूर्ण है । विद्वानों की राय है कि इसी सिद्धान्त एवं विचाराधारा के कारण सूफियों
का दृष्टिकोण उदार हुआ तथा अनेक गैर इस्लामी लोग सूफी सन्तों के निकट आए ।
प्रश्न 3. उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्या भक्ति और सूफी चिंतकों ने अपने
विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया ?
Analyse, with illustrations, why bhakti and sufi thinkers adopted a
variety of languages in which to express their opinions. [N.C.E.R.T.T.B.Q. 6]
उत्तर-I. भक्त संतों द्वारा विभिन्न भाषाओं का प्रयोग-
(i) सबसे प्रारंभिक भक्त संतों ने संस्कृत, पाली, प्राकृति, तमिल, मलयालम आदि भाषाओं
का प्रयोग किया । वह विभिन्न स्थानों, शहरों, कस्बों, गाँवों, उत्सवों, यज्ञों, पूजा उत्सवों आदि
में हिस्सा लेते थे। अनेक ब्राह्मण, वेदों के प्रचारक, बौद्ध और संतों का यहाँ उल्लेख किया जा सकता है।
(ii) तमिलनाडु तथा अन्य अनेक दक्षिण भारत के स्थानों पर अलवार और नयनार संतों ने
यज्ञ कराए, देवी देवताओं की पूजा के लिए मंदिर बनावाए, तीर्थ स्थानों पर । लोगों ने उनके
भजनों और गीतों को गाया । कालांतर में उन्हें तमिल वेद के रूप में संकलित किया गया । दक्षिण भारत के ब्राह्मणों ने स्थानीय भाषाओं के साथ-साथ संस्कृत में भी अपने उद्देश्य, विचार और दर्शन को रखा।
(iii) मध्यकालीन भक्त संतों के, कबीर ने पद और दोहों को स्थानीय भाषा और बोलियों
में रखे । उन्हें कुछ ग्रंधों की रचना का श्रेय दिया जाता है । उनकी भाषा खिचड़ी थी।
(iv) बाबा गुरु नानक देव, रविदास आदि ने हिन्दी और पंजाबी भाषाओं का प्रयोग किया।
(v) मीराबाई ने ब्रज भाषा में, राजस्थानी में और हिन्दी में पद और भजन गाए और लिखे।
(vi) महाराष्ट्र में कुछ संतों ने मराठी और गुजरात में कुछ भक्त संतों ने गुजराती का प्रयोग
किया । कुछ लोग सूरदास और तुलसीदास को भी भक्त संत मानते हैं जिन्होंने क्रमशः ब्रजभाषा
और अवधी में रचनाएँ की।
II. सूफी विचारक भी जनता के मध्य रहते थे। उन्होंने विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया।
अमीर खुसरो एक साहित्यकार कवि, गायक और सूफी पीरो की संगत में रहने वाले थे। उन्होंने
हिन्दवी या जन साधारण को हिन्दी के साथ-साथ फारसी भाषाओं का प्रयोग किया ।
(i) देहली में चिश्ती सम्प्रदाय और दरगाह के सूफियों ने लोगों की भाषा को और भी सरल
बनाकर उसे हिन्दवी का स्वरूप दिया । बाबा फरीद ने स्थानीय भाषा का प्रयोग किया । उनकी
भाषा में हिन्दी, फारसी, पंजाबी आदि को देखा जा सकता है। उनकी अनेक शिक्षाएँ सिक्खों
के धार्मिक ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर और गुरु नानक के साथ-साथ अन्य सन्तों की वाणी
के साथ संकलित हैं।
(ii) कुछ हिन्दी साहित्यकारों और विचारकों ने प्रेम को आधार मानकर ग्रंथों की रचना की।
मलिक मोहम्मद जायसी ने पदमावत नामक ग्रंथ लिखा जिसमें उसने पदमनी और चित्तौड़ के राजा रतनसून की प्रेम कहानी का उल्लेख किया है । बीजापुर, कर्नाटक के आसपास अनेक सूफी कव्वालियाँ, कविताओं और गीतों की रचना हो गई । दक्षिण भारत में जो सूफी संत रहते थे उन्होंने उर्दू भाषा से मिलती-जुलती दक्षिणी जन-साधारण द्वारा उपयोग की गई भाषा में अपने विचार व्यक्त किए और कविताएँ लिखी । कुछ महिलाओं ने चर्खा कातते हुए या घर पर चक्की चलाते हुए या कुछ अन्य घरेलू काम करते हुए या ऋतु परिवर्तन संबंधी त्योहारों पर भारत की विभिन्न भाषाओं में भजन, लोकगीत गाए ।
(iii) कुछ गाने शादी के गीतों के रूप में लिखे गए, कुछ बच्चों को नींद लाने के लिए लोरियाँ
माता के रूप में महिलाओं ने गाई और लिखी । कन्नड़, तेलगू, मलयालम भाषा में कुछ संतों ने
कुछ उपदेश दिए, गीत, कविताएँ और ग्रंथ लिखे ।
प्रश्न 4. इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें
निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए। [N.C.ER.T. TB.Q.9]
Read any five of the sources included in this chapter and discuss the
social and religious ideas that are expressed in them.
उत्तर-(i) प्रथम सहस्राब्दी के मध्य तक आते-आते भारतीय उपमहाद्वीप का परिवेश धार्मिक
इमारतों-स्तूप, विहार और मंदिरों में चिह्नित हो गया ।
(ii) यदि यह इमारतें किसी विशेष धार्मिक विश्वासों और आचरणों का प्रतीक हैं, वहीं अन्य
धार्मिक विश्वासों का पुनर्निर्माण हम साहित्यिक परंपरा जैसे पुराणों के आधार पर भी कर सकते हैं जिनका वर्तमान स्वरूप लगभग उसी समय बनना आरंभ हो गया था । इसके अलावा ऐसे धार्मिक विश्वास भी हैं जो साहित्यिक और दृष्टिक दोनों ही दस्तावेजों में अत्यंत धूमिल हैं।
(iii) इस काल के नूतन साहित्यिक स्रोतों में संत कवियों की रचनाएँ हैं जिनमें उन्होंने
जनसाधारण की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपने को व्यक्त किया था । यह रचनाएँ जो
अधिकतर संगीतबद्ध हैं संतों के अनुयायियों द्वारा उनकी मृत्यु के उपरांत संकलित की गईं। ये
परमपराएँ प्रवाहमान थीं-अनुयायियों की कई पीढ़ियों ने मूल संदेश का न केवल विस्तार किया
अपितु उन विचारों को, जो भिन्न राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में संदिग्ध व
अनावश्यक लगे, उन्हें या तो परिवर्तित कर दिया अथवा, त्याग दिया । इन स्रोतों का मूल्यांकन :
इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है ।
(iv) इतिहासकार इन संत कवियों के अनुयायियों (जो उनके संप्रदाय से थे) द्वारा लिखी गई
उनकी जीवनियों का भी इस्तेमाल करते हैं । हालाँकि यह जीवनियाँ -अक्षरशः सत्य नहीं हैं-
तथापि इनसे यह ज्ञात होता है कि अनुयायी इन पथ-प्रदर्शक स्त्री पुरुषों के जीवन को किस तरह
से देखते थे।
(v) अलवार और नयनार संतों की रचनाओं को वेद जितना महत्त्वपूर्ण बताकर इस परंपरा
को सम्मानित किया गया । उदाहरणस्वरूप, अलवार संतों के एक मुख्य काव्य संकलन
नलयिरादिव्यप्रबंधम् का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था । इस तरह इस ग्रंथ का महत्त्व संस्कृत के चारों वेदों जितना बताया गया जो ब्राह्मणों द्वारा पोषित थे ।
(vi) दसवीं शताब्दी तक आते-आते बारह अलवारों की रचनाओं का एक संकलन कर लिया
गया जो नलयिरादिव्यप्रबंधम् (“चार हजार पावन रचनाएँ”) के नाम से जाना जाता है । दसवीं
शताब्दी में ही अप्पार संबंदर और सुन्दरार की कविताएँ तवरम नामक संकलन में रखी गई जिसमें कविताओं का संगीत के आधार पर वर्गीकरण हुआ ।
(vii) शरिया मुसलमान समुदाय को निर्देशित करने वाला कानून है । यह कुरान शरीफ और
हदीस पर आधारित है । हदीस का अर्थ है पैगम्बर साहब से जुड़ी परंपराएँ जिनके अंतर्गत उनके
स्मृत शब्द और क्रियाकलाप भी आते हैं । जब अरब क्षेत्र से बाहर इस्लाम का प्रसार हुआ जहाँ
के आचार-व्यवहार भिन्न थे तो कियास (सदृशता के आधार पर तर्क) और इजमा (समुदाय
की सहमति) को भी कानून का स्रोत माना जाने लगा । इस तरह शरिया, कुम्न, हदीस, कियास
और इजमा से उद्भूत हुआ ।
(viii) पांडुलिपियाँ और शाही पत्र आठवीं से अठारहवीं शताब्दी तक अनगिनत हस्तलिखित
पुस्तकों या पांडुलिपियाँ और विभिन्न राजाओं, साम्राटों द्वारा समय-समय पर जारी किए गए
आदेश/फरमान/हुकमनामा इस काल के इतिहास को जानने के लिए उपयोगी रहे हैं । इस अध्याय में उदाहरण के लिए एक खोज की पांडुलिपि और मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा एक जोगी को लिखे एक पत्र के अंश का उल्लेख किया गया है जो इस प्रकार है । खोज की लिपि में लिपिबद्ध करने से पहले जीननक का मौखिक प्रेषण होता था । खोज की लिपि स्थानीय लंडा (व्यापारियों की संक्षिप्त लिपि) से निकली है । पंजाब, सिंध और गुजरात के खोजा लोग, सभी लंडा का प्रयोग करते थे।
(ix) धार्मिक ग्रंथ या साहित्य (Religious botlas and Literature) इस अध्याय में
वेदों, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब और सूफी सम्प्रदाय से जुड़े अनेक ग्रंथों का उल्लेख किया गया
है। इन्हें भी हम उस समय के धार्मिक विश्वासों, परम्पराओं, सम्प्रदायों, आचार-विचार, तीर्थ
स्थानों, दरगाहों आदि के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयोग कर सकते हैं ।
प्रश्न 5. भक्ति आन्दोलन से आप क्या समझते हैं ? इस आन्दोलन का क्षेत्र एवं इससे
जुड़े प्रमुख सन्तों के नाम बताइए ।
उत्तर-1. भक्ति आन्दोलन का अर्थ (Meaning of Bhakti Movement)-भक्ति
आन्दोलन से हमारा अभिप्राय उस आन्दोलन से है जो तुर्कों के आगमन (बारहवीं सदी से पूर्व
ही) से काफी पहले ही यहाँ चल रहा था । और जो अकबर के काल (इसका अन्त 1605 ई.
को हुआ ।) तक चलता रहा । इस आन्दोला ने मानव और ईश्वर के मध्य रहस्यवादी संबंधों
को स्थापित करने पर बल दिया । कुछ विद्वानों की राय है कि भक्ति भावना का प्रारम्भ उतना
ही पुराना है जितना कि आर्यों के वेद परन्तु इस आन्दोलन की जड़ें सातवीं शताब्दी से जमीं। शैव
नयनार और वैष्णव अलवार ने जैन और बौद्ध धर्म के अपरिग्रह सिद्धान्त को अस्वीकार कर ईश्वर
के प्रति व्यक्तिगत भक्ति को ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताया । उन्होंने वर्ण और जाति भेद को
अस्वीकार किया और प्रेम तथा व्यक्तिगत ईश्वर भक्ति का संदेश दिया । उत्तर भारत में भक्ति
आन्दोलन का प्रसार दक्षिण भारत से आया यद्यपि इस प्रसार में बहुत कम समय लगता । उत्तर
में संत और विचारक दोनों भक्ति दर्शन लाए ।
भक्ति आन्दोलन की परिभाषा देते हुए प्रसिद्ध विद्वान तथा इतिहासकार डॉ. यूसुफ हुसैन के
अनुसार, “भक्ति आंदोलन रूढ़िवादी, सामाजिक तथा धार्मिक विचारों के विरुद्ध हृदय की
प्रतिक्रिया तथा भावों का उद्गाह है। भारतीय परिवेश में भक्ति आन्दोलन का विकास इन्हीं
परिस्थितियों का परिणाम है।”
II. क्षेत्र तथा संत (Area and Saints) ―भक्ति आन्दोलन व्यापक था और सारे देश में
इसका प्रसार हुआ। यह आन्दोलन तेरहवीं शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी तक इस्लाम के सम्पर्क
में आया और इसकी चुनौतियों को अंगीकार करता हुआ इससे प्रभावित, उत्तेजित और आन्दोलिन हुआ । इस आन्दोलन ने शंकराचार्य जैसे महान दार्शनिक के अद्वैतवाद और ज्ञान-मार्ग के विरोध में भक्ति मार्ग पर अधिक जोर दिया । इस आन्दोलन के चार विभिन्न संस्थापकों ने चार मतों को जन्म दिया । वे थे-
(क) बारहवीं शताब्दी के रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैतवाद),
(ख) तेरहवीं सदी के मध्वाचार्य (द्वैतवाद),
(ग) तेरहवीं शताब्दी के विष्णु स्वामी (शुद्धाद्वैतवाद) और
(घ) तेरहवीं शताब्दी के निम्बार्काचार्य (द्वैताद्वैतवाद) । थोड़े बहुत अन्तर होते हुए भी इन
चारों मतों की मूल प्रवृत्ति सगुण भक्ति की ओर झुकी हुई थी । इन्होंने ब्रह्म और जीव की पूर्ण
एकता को स्वीकार नहीं किया । मध्यकाल में ये आन्दोलन विराट आन्दोलन के रूप में प्रकट हुआ और इसका प्रसार सोलहवीं सदी तक होता रहा ।
प्रश्न 6. मध्यकाल में भक्ति काल के उदय तथा प्रसार के कारणों पर विचार-विमर्श
कीजिए।
उत्तर-मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन के उदय एवं प्रसार के कारण (Causes of rise
and spread of Bhakti Movement)–(i) हिन्दू धर्म की बुराइयाँ (Wrong Practice of
Hinduism)-भक्ति आन्दोलन के व्यापार प्रसार से पूर्व हिन्दू धर्म में कुछ बुराइयाँ आ गयी थीं।
इसमें वर्ण व्यवस्था तथा अस्पृश्यता का बोलबाला था तथा इस्लाम के प्रचारक अपने भाईचारे एवं
छुआछूत के विरोधी दृष्टिकोण के आधार पर कुछ लोगों को हिन्दू धर्म से इस्लाम की और
आकर्षित कर रहे थे। इसलिए भक्तसन्तों ने हिन्दू धर्म की रक्षा तथा इस्लामी प्रचार एवं तबलीग
के आक्रमण से इसकी रक्षा करना चाहा ।
(ii) हिन्दू मुस्लिम समचय (Co-orination of the Hindus and the Muslims)-
इस युग में भक्ति आन्दोलन के प्रसार एवं अधिक लोकप्रियता का कारण यह था इसके अधिक
प्रचारकों ने देश के दो प्रमुख सम्प्रदायों हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों में एकता स्थापिता करना चाहा ।
उन्होंने लोगों को विश्वास दिलाया कि राम और रहीम एक ही हैं तथा जहाँ हिन्दू धर्म में मूर्ति
पूजा तथा उपवास एवं तीर्थ यात्राओं जैसी कुरीतियाँ हैं वहाँ इस्लाम में भी जोर-जोर से भाग देना,
हज करना, रोजे रखना आदि बुराइयाँ हैं । उन्होंने धर्मान्ध इस्लाम उलेमाओं की मानव-मानव के
मध्य घृणा को गलत बताया ।
(iii) मुस्लिम राजसत्ता (Muslin Rulers)-भक्ति आन्दोलन के अभ्युदय का एक
महत्वपूर्ण कारण इस्लाम की राजसत्ता तथा उसके प्रति भारतीय प्रतिक्रिया भी थी । जब मुस्लिम
सत्ता (जिसका आधार सैन्य बल था) भारत में स्थायी रूप से बस गयी तो हिन्दुओं ने उसके
विरुद्ध निष्क्रियता दिखाई । इन निष्क्रियता का कारण यह नहीं था कि तत्कालीन भारतीय शासक वर्ग में उन्हें बाहर निकालने की क्षमता नहीं थी, बल्कि इसलिए क्योंकि समकालीन समाज ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया क्योंकि भारतीय समाज धर्म के आधार पर श्रेणीबद्ध तथा सामन्ती व्यवस्था पर आधारित ग्रामीण कृषक-समाज के ढर्रे पर चलता आ रहा था । मुस्लिम शासक वर्ग तथा अमीर वर्ग की संख्या निरन्तर बढ़ रही थी । हिन्दुओं ने यह मान लिया कि उन्हें देश से बाहर निकालना कठिन था । दूसरी ओर मुसलमानों ने देखा कि हिन्दुओं की संख्या इतनी अधिक है कि उन सभी को इस्लाम में दीक्षित करना कठिन है। अत: दोनों ने एक-दूसरे के निकट आने का प्रयास शुरू किया । यह प्रयास शुरू करने वाले हिन्दू समाज की ओर से भक्त सन्त थे।
(iv) मोक्ष प्राप्ति का शंकर का ज्ञानमार्ग अथवा शंकराचार्य का ज्ञानमार्ग (Gyan
Marg of Shankaracharya or Path of Knowledge of Shankar to obtain
Mokshya) शंकर ने अद्वैतवाद (अर्थात् आत्मा तथा परमात्मा एक है) निर्गुण ब्रह्म की उपासना
तथा ज्ञान द्वारा मोक्ष पाने पर बल दिया। उनके निर्गुण अज्ञानवाद ने हिन्दुओं के मन में बैठी निराशा से मानव को मुक्ति नहीं दे सका । ज्ञान मार्ग सर्वसाधारण के लिए अधिक सरल नहीं था। इसलिए वैष्णव सन्तों ने सगुण भक्ति तथा भक्ति मार्ग पर अधिक जोर दिया । वैष्णवीं की सगुण भक्ति का भाधारण जनता पर बहुत प्रभाव पड़ा ।
(v) सूफी सन्तों के प्रचार कार्य (Preaching works of Sufi Saints)-भारत में
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, बख्त्यार काकी, फरीदउद्दीन-गंज-ए-शंकर, नियामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग दिल्ली आदि के प्रयासों के कारण भी भक्ति आन्दोलन के अनुकूल वातावरण तैयार हुआ ।
उन्होने कट्टर मुस्लिम लोगों की धर्मान्धता पर अंकुश लगाया। उनके द्वारा गीत-संगीत की पद्धति
को अपनाये जाने के कारण भी सगुण भक्ति विचाधारा को बल मिला ।
(vi) भक्त सन्तों का उदय (Rise of Bhakti Saints)-भक्ति आन्दोलन को 13वीं से
16वीं शताब्दी के लम्बे काल तक निरन्तर बढ़ने में जो सफलता मिली उसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि उस समय भारतीय समाज को एक के बाद एक महान सन्तों के प्रेरणादायक एवं प्रभावशाली विचार मिलते रहे । रामानुज, रामानन्द, चैतन्य महाप्रभु, कबीर, गुरुनानक, दादू, बल्लभाचार्य आदि ने अपने-अपने काल में अपने उपदेशों द्वारा भक्ति आन्दोलन को आगे बढ़ाया ।
प्रश्न 7. भक्ति आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ बताइए । [B.M.2009A]
उत्तर-भक्ति आन्दोलन की प्रमुख विशेषताएँ (Main Characteristics of Bhakti
Movement)–
(i) एकेश्वरवाद (Monotheism) अधिकांश भक्तसन्तों ने ‘ईश्वर एक है’ की विचारधारा
का प्रचार किया । उनके विचारानुसार ईश्वर को चाहे जिस नाम से पुकारा जाये, लेकिन वह नहीं बदलता । उन्होंने राम, रहीम, कृष्ण तथा विष्णु एवं अल्लाह को एक ईश्वर का रूप बताया ।
(ii) भक्ति मार्ग (Path (way) of Bhakti devotion)-इस आनदोलन ने ईश्वर भक्ति
पर अधिक महत्त्व दिया । रामानुज ने वेदान्त दर्शन के अन्तर्गत शक्ति सिद्धान्तों का प्रतिपादन
किया। कबीर ने भक्ति मार्ग का ज्ञान तथा कर्म दोनों मार्ग से श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि जब तक
ईश्वर के प्रति भक्ति भाव नहीं है तब तक जप, तप, संयम, ध्यान सभी व्यर्थ है।
(ii) धार्मिक सरलता पर बल (Emphasis on Religious simplicity)- भक्ति
आन्दोलन के सभी प्रचारकों ने धर्म से भी आडम्बर, अन्धविश्वास, दिखावे, रूढ़िवादी कर्मकाण्डों
तथा ढकोसलों को दूर करने पर बल दिया । उनके अनुसार सच्चा धर्म सरल होता है । इस धर्म
के प्रचारक मानवीय गुणों एवं नैतिकता पर जोर देते थे। उनके अनुसार वह व्यक्ति अधिक धार्मिक एवं पुण्य आत्मा है जिसका मन पवित्र है और आचरण शुद्ध उन्होंने लोगों को सच्चाई, ईमानदारी, न्याय, भाईचारे, सहयोग, दया आदि मानवीय गुण अपनाने का संदेश दिया ।
(iv) अनेक भक्त सन्तों द्वारा मूर्ति पूजा का विरोध (Several Bhakr Saints opposed
ldol-Worship)-भक्ति आन्दोलन के सभी प्रमुख प्रचारकों ने मूर्तिपूजा का विरोध किया ।
गुरुनानक तथा कबीर दोनों ही मूर्तिपूजा के विरोधी थे । कबीर ने खुले आम कहा-
पाथर पूजें हरि मिलें, तो मैं पूर्ण पहार ।
ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार ।।
(v) गुरु की भक्ति पर बल (Emphasis on devotion of teacher or Guru)-भक्ति
आन्दोलन के अनेक प्रचारकों, जैसे रामानुज, कबीर, नानक तथा चैतन्य ने मोक्ष के लिए गुरु की
आवश्यकता पर बल दिया । अनुसार गुरु के समक्ष आत्मा समर्पण ही मोक्ष
का सुलभ साधन है। बिना गुरु की कृपा के मोक्ष प्राप्ति असम्भव है । सन्त कबीर ने गुरु को गोविन्द (ईश्वर से) प्राथमिकता देते हुए कहा-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागो पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियौ मिलाय ॥
(vi) जन साधारण की भाषा का प्रयोग (Use of Language of Common People)-
भक्ति आन्दोलन के प्रचारकों ने संस्कृत अथवा अन्य किसी विशेष भाषा को श्रेष्ठ या पवित्र नहीं
माना और उन्होंने अपने विचार जन साधारण की भाषा में रखे वस्तुतः उनकी यह सही धारणा
थी कि भाषा केवल मात्र विचारों को आदान-प्रदान का साधन मात्र है। भाषा जितनी सरल होगी
लोग उतनी ही सरलता से विचारों को समझ सकेंगे । कबीर ने तो सभी भाषाओं के शब्दों को
अपनाया इसीलिए अनेक विद्वान उनकी भाषा को खिचड़ी भाषा कह देते हैं।
(vii) सम्पूर्ण आत्म सर्पण (Total or Complete self Submition)-भक्ति आन्दोलन
के अधिकांश प्रचारकों के अनुसार मानव को अपना सर्वस्व ईश्वर को समर्पण कर देना चाहिए
तथा ईश्वरी इच्छा को ही सर्वोत्तम निर्णय मानना चाहिए । मानव को ईश्वर की आराधना शुरू
करने से पूर्व काम, क्रोध, मोह लोभ, अंहकार आदि विकारों को छोड़ देना चाहिए ।
(viii) मानवतावदी दृष्टिकोण (Humanitatian outlooks)-भक्त सन्त मानववाद में
विश्वास करते थे। उन्होंने सभी लोगों को समान समझा तथा इन लोगों का विरोध किया जो
जन्म, लिंग, जाति, धर्म, आदि के आधार पर मानव में ऊँच-नीच की भावना का समर्थन करते
हैं । कबीर ने जीवन भर लोगों को समझाया कि जन्म से सभी मानव समान हैं। गुरु नानक ने
भी सभी जातियों सभी सम्प्रदायों के लोगों को एक ईश्वर की सन्तान बताया तथा ऊँच-नीच
एवं छुआछुत का विरोध किया ।
(ix) सौहार्द्रपूर्ण वातावरण या समन्वयवादी (Confinial atmosphere or
Coordination)-भक्ति आन्दोलन के अधिकांश प्रवर्तक एवं प्रचारकों ने हिन्दू-मुस्लिम
सम्प्रदायों के मध्य सौहार्दपूर्ण वातावरण पैदा करने का प्रयास किया । बल्लभाचार्य राजनीति से
अलग रहकर धर्म एवं संस्कृति के माध्यम से हिन्दू-मुसलमानों के बीच सामंजस्य चाहते थे। उनके
द्वारा शूद्रों, ब्राह्मणों, मुसलमानों तथा गरीब-अमीर सभी के लिए खुला रहता था ।
(x) समाज सुधार (Social Reforms)-अधिकांश भक्तसन्त धर्म सुधारक होने के
साथ- साथ समाज सुधारक भी थे। उन्होंने जाति प्रथा का घोर विरोध करने के साथ-साथ
अस्पृश्यता को ईश्वर तथा मानव के विरुद्ध अपराध बताया । उन्होंने स्त्रियों की दशा सुधारने के
लिए भी प्रयास किए । अनेक सन्तों ने सती प्रथा कन्या वध, दास प्रथा, आदि का भी विरोध
किया । बल्लभाचार्य ने समाज सुधार के लिए अत्यधिक धन संग्रह एवं आर्थिक विषमता का
भी विरोध किया । कबीर, नानक, चैतन्य आदि ने सभी जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाया।
(xi) दो भिन्न-भिन्न परम्पराएँ (Tiwo different Traditions)-भक्ति आन्दोलन हमें दो
भिन्न-भिन्न परम्पराएँ दृष्टिगोचर होती हैं-(क) निर्गुण सन्त परम्परा(Non-formal Traditions)
तथा (ख) सगुण सन्त परम्परा (Formal traditions) | निर्गुण सन्त परम्परा के सर्वाधिक
लोकप्रिय होने वाले थे कबीर तथा गुरुनानक । वे निराकार प्रभु में आस्था रखते थे । सगुण सन्त
परम्परा के सर्वाधिक लोकप्रिय होने वाले थे । बल्लभाचार्य, तुलसी, सूर, मीरा, चैतन्य आदि ।
सगुण परम्परा के सन्तों ने राम अथवा कृष्ण की पूजा पर बल दिया । निर्गुण सन्तों ने वैयक्तिक
साधना तथा तपस्या पर बल दिया जबकि सगुण भक्तिसन्तों ने मूर्तिपूजा, अवतारवाद, कीर्तन द्वारा उपासना इत्यादि पर बल दिया ।
प्रश्न 8. भक्ति आन्दोलन के प्रभाव (परिणाम) पर विचार-विमर्श कीजिए ।
                                             [B.Exam.2010(A),B.Exam.2012(A)]
उत्तर-भक्ति आन्दोलन का प्रभाव (Effect of Bhakti Movement)-सन्तों तथा
सुधारकों के प्रयासों से जो भक्ति आन्दोलन का आरम्भ हुआ उनसे मध्य भारत के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में एक नवीन शक्ति एवं गतिशीलता का संचार हुआ । प्रो. रानाडे के अनुसार
भक्ति-आंदोलन के परिणामें में साहित्य-रचना का आरम्भ, इस्लाम के साथ सहयोग के
परिणामस्वरूप साहिष्णुता की भावना का विकास जिसकी वजह से जाति-व्यवस्था के बंधनों में
शिथिलता आई और विचार तथा कर्म दोनों स्तरों पर समाज का उन्नयन ।
(i) सामाजिक प्रभाव (Social Impact)― भक्ति आन्दोलन के कारण जाति प्रथा,
अस्पृश्यता तथा सामाजिक ऊँच-नीच की भावना को गहरी चोट लगी । अधिकतर भक्त सन्तों
ने विभिन्न जातियों के लोगों को अपना शिष्य बनाना । उन्होंने जाति प्रथा का तीव्र विरोध किया
एवं ब्राह्मण तथा शूद्र को समान बताया । इस तरह समाज में जाति बन्धनों पर गहरा प्रहार हुआ
लेकिन यह मानना पड़ेगा कि भक्ति आन्दोलन भारतीय समाज से जाति प्रथा के दोष को पूर्णतया
समाप्त नहीं कर सका । भक्त सन्तों ने नारी को समाज में उच्च तथा सम्माननीय स्थान दिये जाने
का समर्थन किया । उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के साथ मिलकर सांसारिक बोझ उठाने का परामर्श
दिया। कबीर तथा नानक ने पुरुषों की तरह नारियों को अपनी शिक्षाएँ दी। उन्होंने सती प्रथा
जैसी सामाजिक बुराई का भी विरोध किया । इस आन्दोलन में समाज सेवा की भावना को
प्रोत्साहन मिला क्योंकि भक्त सन्तों ने लोगों को निर्धन, अनाथों, बेसहारा आदि की सेवा करने
का उपदेश दिया ।
(ii) धार्मिक प्रभाव (Religious Impact)-भक्ति आन्दोलन का सर्वाधिक प्रभाव धर्म
पर पड़ा । इस आन्दोलन के कारण ही इस्लाम तथा हिन्दू-धर्म के अनुयायियों में कर्मकांडों और
अन्धविश्वासों के विरुद्ध वातावरण तैयार हुआ । हिन्दुओं में मूर्तिपूजा की लोकप्रियता में कमी हुई। हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों में समन्वय तथा एकता की भावना को प्रोत्साहन मिला । भक्ति आन्दोलन के कारण ही सिख धर्म के रूप में नये धर्म का जन्म हुआ । गुरु नानक देव सिखों के प्रथम गुरु तथा गुरु ग्रंथ साहिब सिखों के लिए बाइबल है । गुरु गंथ साहिब में अधिकांश भक्ति-सन्तों की वाणी ही संकलित है । इससे धार्मिक सहिष्णुता को प्रोत्साहन मिला । हिन्दू तथा मुसलमानों में जो कटुता व्याप्त थी वह धीरे-धीरे इस आन्दोलन को गहरा आघात पहुँचा । धार्मिक कट्टरता कम हुई तथा धार्मिक सहनशीलता का प्रसार हुआ ।
(iii) सांस्कृतिक प्रभाव (Cultural Effects)–भक्ति आन्दोलन के कारण सर्वसाधारण
की भाषा एवं बोलियाँ अधिक लोकप्रिय हुई। अनेक प्रान्तीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं में अनेक भक्ति
सन्तों ने रचनाएँ की । कबीर की भाषा अनेक भाषाओं का सुन्दर समन्वय का अच्छा उदाहरण
है जो खिचड़ी भाषा कहलाती है । मलिक मुहम्मद जायसी, तुलसीदास आदि ने अवधि में अपनी
रचनाएँ कीं । सुरदास ने ब्रज तथा नानक ने पंजाब व हिन्दी को अपनाया । चैतन्य ने बंगला में
और अनेक भक्त सन्तों ने उर्दू में भी रचनाएँ की । यह रचनाएँ समय पाकर भारतीय भाषाओं
के साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई । साहित्य के साथ-साथ कला की प्रगति में भी इस
आन्दोलन का प्रभाव पड़ा क्योंकि अनेक स्थानों पर भक्त सन्तों के सुन्दर स्मारक बनाये गये ।
(iv) राजनैतिक प्रभाव (Political Efects)-भक्ति आन्दोलन का प्रभाव देश की
राजनीति पर भी पड़ा । अनेक सुल्तानों, शासकों एवं कालान्तर में मुगल सम्राटों ने धर्म तथा
राजनीति को दो पृथक् क्षेत्र समझकर हिन्दुओं के प्रति उदार नीति अपनायी । सम्राट अकबर के
काल में राज्य ने पूर्णतया धर्म निरपेक्षता की नीति अपनाई।
(v) आर्थिक प्रभाव (Economic Effects) भक्ति आन्दोलन के कारण भारतीय समाज
की आर्थिक विषमता पर करारा प्रहार किया । उदाहरणार्थ, कबीर ने आर्थिक ढाँचे पर भी कड़ा
प्रहार किया । जिस तथ्य को मार्क्स एवं एंजेल्स ने आधुनिक युग में पहचाना, कबीर ने उनसे
करीब तीन सौ वर्ष पूर्व ही बता दिया था कि राज्य एवं समाज में संघर्ष आर्थिक विषमता एवं
आर्थिक धन संचय का विरोध किया तथा मेहनत की कमाई का समर्थन किया ।
सारांश (Conclusion)-थोड़े शब्दों में भक्ति आन्दोलन के प्रभावों एवं परिणामों को प्रो.
रानाडे के शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है, “भक्ति के प्रति श्रद्धा का विश्वास लोक भाषाओं
में साहित्य रचना का आरम्भ, इस्लाम के साथ सहयोग के परिणामस्वरूप सहिष्णुता की भावना
का विकास जिसके कारण ही जाति-व्यवस्था के बन्धनों में शिथिलता आई और विचार एवं कर्म
दोनों स्तरों पर समाज की प्रगति हुई ।”
प्रश्न 9. चैतन्य पर एक लेख लिखिए ।
उत्तर-चैतन्य (Chaitanya) (क) वह वैष्णव सम्प्रदाय के सन्तों में सर्वाधिक महान्
एवं लोकप्रिय सन्त थे। उन्होंने अपने सुधारवादी आन्दोलन से बंगाल तथा उड़ीसा में एक नवीन
चेतना जाग्रत की । (उनका जन्म 18 फरवरी, 1486 ई. को जगन्नाथ मिश्र के यहाँ शची देवी
की कोख से हुआ।) जीवन के प्रारम्भ से ही उन्होंने उच्च कोटि की साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया। चौबीस वर्ष की अवस्था में वे संसार त्यागकर साधु हो गये और उन्होंने अपना शेष जीवन भक्ति एवं प्रेम के संदेश प्रसार में व्यतीत किया ।
(ख) कृष्ण भक्त (Devotee of Krishna)-उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य देव
माना । प्रारम्भिक सूफियों की भाँति ही उन्होंने संगीत मण्डलियाँ जोड़ी और कीर्तन को आध्यात्मिक अनुभूति के लिए प्रयुक्त किया, जिनमें ईश्वर का नाम लेने से बाह्य संसार की सुध नहीं रहती। वे बहुत समय तक वृंदावन भी रहे लेकिन अपना अधिकांश समय लगभग सारे भारत का भ्रमण करने तथा भक्ति प्रचार में व्यतीत किया।
(ग) शिक्षाओं का प्रभाव (Impact of Teachings)-उनका प्रभाव व्यापक था। उनके
कीर्तनों में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही जाते थे इनमें निम्न जाति के लोग भी होते थे। चैतन्य
ने कृष्ण भक्ति के साथ-साथ गुरु सेवा की महिमा का गुणगान किया। चाहे चैतन्य ने धार्मिक
ग्रंथों एवं मूर्ति पूजा का विरोध नहीं किया लेकिन उन्हें परम्परावादी नहीं कहा जा सकता क्योंकि
उन्होंने जाति प्रथा तथा वर्ण-व्यवस्था को नहीं माना । वे साम्प्रदायिक नहीं थे। उनकी सगुण भक्ति
में प्रेम भक्ति का स्वर प्रधान था।
(घ) प्रमुख उपदेश (Main Preachings)-चैतन्य के उपदेशों का सारांश संक्षेप में यह
है कि “यदि कोई व्यक्ति कृष्ण की उपासना करता है और गुरु की.सेवा करता है तो वह माया
के जाल से मुक्त हो जाता है और ईश्वर से एकीकृत हो जाता है।” उन्होंने ब्राह्मणवाद के
कर्मकाण्डों की निन्दा की। उनका मुख्य उद्देश्य सामाजिक असमानता को दूर कर पद दलित वर्ग
को ऊँचा उठाना था।
(क) धार्मिक सौहार्द्र के प्रति दृष्टिकोण (His outlook towards Communal
Harmony)-वे हिन्दू-मुस्लिम के बीच सौहार्द्र का वातावरण पैदा करना चाहते थे। वह
मानववादी थे तथा दलित वर्ग की दुर्दशा पर उन्हें बहुत दुःख होता था। श्रीमती बेबरिज के
अनुसार, “चैतन्य मार्टिन लूथर की भाँति धर्म में मूल परिवर्तन नहीं बल्कि जार्ज नाक्स की भाँति
धार्मिक एवं सामाजिक कुरीतियों को समाप्त कर सुधार करना चाहते थे।”
(च) निष्कर्ष (Conclusion)-वस्तुतः चैतन्यवाद कभी भी अधिक संख्यक जनता का
धर्म नहीं बना । यह आन्दोलन बंगाल से एक भावनात्मक लहर के रूप में उठा और रूढ़ परम्पराओं के अनुरूप वर्गीकृत रूप से ढलकर शान्त हो गया लेकिन इस आंदोलन की महत्त्वपूर्ण देन वह साहित्य है जो इस आंदोलन के भाग लेने वालों द्वारा रचा गया। डॉ. तपन राय चौधरी ने चैतन्यवाद का मूल्यांकन करते हुए लिखा है, “ऐसा जान पड़ता है कि शुष्क बुद्धिवादी व्यवस्था और गान के अतुष्टिकर मार्ग के विरुद्ध भावनात्मकता तथा सादगी का विद्रोह था, यह सुधारवादी आन्दोलन तंत्रवाद का विरोधी था।”
प्रश्न 10. वल्लभाचार्य और गोस्वामी तुलसीदास का परिचय लिखते हुए कुछ अन्य
भक्त संतों के नाम लिखिए।
उत्तर-(क) वल्लभाचार्य (Vallabhacharya)-भात कवियों को सबसे अधिक प्रभावित
करने वाले वेदान्तिक सम्भवत: बल्लभाचार्य थे। वह तेलंग ब्राह्मण थे, उनका समय 15वीं शताब्दी का अन्त और 16वीं शताब्दी का प्रारम्भ माना जाता है। उनके अनुसार ईश्वर या सृष्टिकर्ता के कण-कण में विद्यमान हैं। संसार माया से पूर्ण नहीं अपितु ईश्वरीय गुणों से पूर्ण है। आत्मा ब्रह्म का अंश है। उनके अनुसार मोक्ष के लिए गुरु की कृपा आवश्यक है। उन्होंने जन्म के
आधार पर बनी जाति प्रथा का खण्डन किया। वह धर्म और संस्कृति के माध्यम से
हिन्दू-मुसलमानों में समन्वय चाहते थे। उनका द्वार शूद्रों, अछूतों एवं मुसलमानों के लिए सदैव
खुला रहता था । वे अन्तर्जातीय सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप स्त्रियों की सामाजिक स्थिति चाहते थे। वह धन संग्रह के विरोधी थे। उन्होंने ईमानदारी से धनोपार्जन पर जोर दिया। उनके अनुसार
समाज सेवा एवं समाज प्रेम ही सच्ची ईश्वरीय सेवा तथा ईश्वरीय प्रेम है।
(ख) गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas)-
(i) उन्होंने राम को अपना आराध्यदेव मानकर हिन्दू सामाजिक व्यवस्था तथा तथा भक्ति मार्ग
से मोक्ष पाने पर बल दिया। उनके उपास्य देव सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके अनुसार
ब्रह्म पृथ्वी पर अवतार लेकर मानव के बीच आता है तथा स्वयं उनके कष्टों की अनुभूत करता है।
(ii) उनके अनुसार आत्मा शाश्वत, सत्य तथा ईश्वर का अंश है । मानव अपनी अज्ञानता
तथा मोह माया के कारण ही स्वयं के अस्तित्व को भूल जाता है । उन्होंने गुरु के महत्त्व को
स्वीकार किया ।
(iii) वे एक ऐसा समाज चाहते थे जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र परस्पर संघर्ष
त्यागकर परस्पर सहयोगी तथा सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें लेकिन तुलसीदास ने हिन्दू-मुस्लिम समन्वय एवं स्त्रियों की स्वतन्त्रता को विरोध कर अपने पिछड़े दृष्टिकोण को व्यक्त किया ।
(ग) अन्य भक्त सन्त (Other Bhaki Saints)- अन्य भक्तसन्तों में धन्ना, सन्त सेना
पीपा, रैदास, दादू, मलूकदास, रज्जब, बूला साहब, बुल्लेशाह आदि थे। धन्ना भगवान की दया
पर विश्वास रखता था । दादू ने एकेश्वरवाद तथा जातिप्रथा की कटु आलोचना की । उन्होंने हृदय
की पवित्रता पर जोर दिया ।
प्रश्न 11. भक्त संत कबीर के विचारों और शिक्षाओं का भारतीय समाज, आर्थिक
जीवन, साहित्य और भाषा पर पड़े प्रभाव पर चर्चा कीजिए ।
उत्तर-सामाजिक विचार एवं शिक्षाएँ तथा उनके प्रभाव (Social Thoughts and
Teachings and their Impact —कबीर मात्र भक्त ही नहीं, बड़े समाज सुधारक भी थे ।
उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों का डटकर विरोध किया । अंधविश्वासों, दकियानूसी मान्यताओं तथा गली-सड़ी रूढ़ियों की कटु आलोचना की । उन्होंने समाज, धर्म तथा दर्शन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण विचारधारा को प्रोत्साहित भी किया । कबीर ने जहाँ एक ओर बौद्धों, सिद्धों और नाथों की साधना तथा सुधार-परम्परा के साथ वैष्णव संप्रदायों की भक्ति-भावना को ग्रहण किया वहाँ दूसरी ओर राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक असमानता के विरुद्ध प्रतिक्रिया भी व्यक्त की। इस प्रकार मध्यकाल में कबीर ने प्रगतिशील तथा क्रांतिकारी विचारधारा को स्थापित किया।
निसन्देह पर्याप्त सीमा तक कबीर तत्कालीन स्थितियों को प्रभावित करने में सफल रहे ।
उन्होंने जनसाधारण के लिए धर्म की सहजता या भक्ति की सुगमता पर बल दिया । जन-
साधारण की ही भाषा में उन्होंने बताया कि निर्गुण प्रभु सबका है, उस पर किसी वर्ग, व्यक्ति
तथा धर्म-जाति आदि का एकाधिकार नहीं है । यह भी बड़ी बात है कि निर्गुण भक्ति-धारा में
कबीर पहले संत थे जो संत होकर भी अंत तक शुद्ध गृहस्थ बने रहे एवं शारीरिक श्रम की प्रतिष्ठा (Dignity of labour) को मानव की सफलताओं का आधार बताया ।
(i) जाति प्रथा का घोर विरोध (Strict opposition of Caste-system) कबीर
मानवतावादी विचारधारा के प्रति आस्थावान थे । उन्होंने मध्यकालीन विषय सामाजिक परिस्थितियों में इस कुप्रथा का घोर विरोध किया और बिखरे हिन्दू समाज को संगठित करने में अपना बहुमूल्य योगदान किया । कबीर की दृष्टि में धर्म तथा सम्प्रदाय का संबंध सम्पूर्ण मानव समा से था।
उन्होंने जीवन पर्यन्त हिन्दुओं को समझाया कि जन्म से सभी मनुष्य समान हैं उन्होंने कहा-
एक बूंँट एकै मल-मूतर एक चाम एक गूदा ।
एक ज्योति से सब उत्पन्ना को वामन को सूदा ॥
उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने अपने पवित्र कर्मों से भक्ति को अपनाया है उसकी जाति
पूछना व्यर्थ है-
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजियो ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, चढ़ि रहन दो म्यान ॥
(ii) अन्य सामाजिक बुराइयों का विरोध (Opposition of other Social evils)-
कबीर ने पर्दा प्रथा, बाल विवाह, वेश्यागमन, सामाजिक फूट आदि बराइयों का भी डटकर विरोध
किया । उन्होंने सती प्रथा की भी खुली आलोचना की । वस्तुतः कबीर ने सामाजिक कुरीतियों
के विरुद्ध खड़े होकर सारी मानव जाति के कल्याण एवं एकता के लिए अपने जीवन के सुखों
को त्याग दिया ।
आर्थिक प्रभाव (Economic Impact)-आर्थिक विषमता का घोर विरोध-कबीर को
मध्यकालीन भारत का कार्ल मार्क्स (Karl Marx) कहा जा सकता है। उन्होंने भारतीय समाज
के मार्क्स ने आधुनिक युग में पहचाना, कबीर ने उससे बहुत पहले स्पष्ट घोषणा की कि समाज
एवं सरकार या राष्ट्र में ज्यादातर संघर्ष का कारण आर्थिक असमानता है । कबीर ने जन समाज
के लिए धन को एक अनिवार्य तत्व माना और आवश्यकता के अनुकूल अर्जित करके उसके
उपयोग का संदेश दिया । उन्होंने अनावश्यक धन संग्रह को पाप तथा उसे (अनावश्यक धन को)
लोकहितार्थ व्यय को पुण्य कहा ।
साहित्य का भाषा पर प्रभाव (Impact on Literature and Language)-मध्यकालीन
संतों मे कबीरदास की साहित्यिक एवं ऐतिहासिक देन स्मरणीय है। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं से हिन्दी साहित्य को सम्पन्न किया। उनकी वाणी एवं विचारों का संग्रह ‘बीजक’ नाम से प्रसिद्ध है । इस संग्रह के तीन भाग हैं-रमैनी, सबद और साखी । रमैनी व सबद में पद हैं जबकि साखी में दोहे हैं । कबीर ने अपनी रचनाओं में राजस्थानी, गुजराती, उर्दू, पंजाबी, हिन्दी आदि सभी भाषाओं के शब्दों का उपयोग किया । उनकी भाषा खिचड़ी (मिली-जुली) तथा सधुक्कड़ी
कहलाती है।
निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में कहा जा सकता है कि काफी हद तक कबीर तत्कालीन
स्थितियों को प्रभावित करने में सफल रहे । उन्होंने जनसाधारण के लिए धर्म की सहजता या भक्ति की सुगमता पर बल दिया । जनसाधारण की ही भाषा में उन्होंने बताया कि निर्गुण प्रभु सबका है, उस पर किसी वर्ग व्यक्ति तथा धर्म-जाति आदि का अधिकार नहीं है । यह भी बड़ी बात है कि निगुर्ण भक्ति-धारा में कबीर पहले संत थे जो संत होकर भी अंत तक शुद्ध गृहस्थ बने रहे एवं शारीरिक श्रम की प्रतिष्ठा (Dignity of labour) को मानव की सफलताओं का आधार बताया।
कबीर ने जीवन के सभी क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण विचारधारा को बीजारोपण किया । मध्यगुगीन
समाज सुधारकों में उनका स्थान अग्रगण्य है । वे विचारों की सादगी, ताजगी और उच्चता से
परवर्ती विचारकों को बहुत पीछे छोड़ गए। वे अपने समय के सर्वाधिक प्रखर आलोचक कटु
उपदेशक, महान समाज सुधारक मानववादी तथा व्यावहारिक समाजवादी थे। वैसे तो उन्होंने .
मानव समाज को साहित्य, धर्म, समाज तथा आर्थिक जीवन जैसे अनेक पहलुओं में बहुत कुछ
दिया। उनका समन्वयक तथा मानवीय दृष्टिकोण सर्वाधिक प्रशंसनीय है।
उन्होंने धार्मिक जीवन में सच्चाई तथा सादगी को सर्वाधिक महत्त्व देकर उसे मानव के
अधिक नजदीक ला दिया। कबीर न केवल निर्गुण भक्ति ही था अपितु एक महान समाज
सुधारक प्रगतिशील विचारक, उपदेशक तथा साहित्यकार भी था। कबीर ने हिन्दू मुस्लिम
सामंजस्य की पृष्ठभूमि प्रदान करके अकबर, दाराशिकोह, महर्षि दयानन्द, महात्मा गाँधी आदि का पथ प्रदर्शन किया। उन्होंने देश को साम्प्रदायिकता तथा जाति प्रथा जैसी भयंकर कुरीतियों से बचाया।
प्रश्न 12. भारत एवं सूफी आंदोलन के विभिन्न रूप पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर-भारत एवं सूफी आंदोलन के विभिन्न रूप (Sufism in India or Different
Silsilas of Sufism)-बारहवीं शताब्दी में सूफी मत ने भारत में प्रवेश किया और तेरहवीं और
चौदाहवीं शताब्दी में यह मत बहुत लोकप्रिय हो गया । अफगानिस्तान के रास्ते अनेक सूफी सन्त
भारत में आए । ‘आइन-ए अकबरी’ के अनुसार भारत में चौदह सूफी सिलसिले स्थापित हुए इसमें से चार सिलसिले-चिश्ती, सुहारावर्दी, कादरी बहुत नक्शबन्दी अधिक लोकप्रिय हुए।’ सैयद
मुहम्मद हाफिर के अनुसार चिश्ती भारत का सर्वप्रथम प्राचीन सूफी सिलसिला है। चिश्ती
सिलसिले को भारत में स्थापना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने की थी। अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती
ने अपने शेष जीवन व्यतीत करते हुए नश्वर शरीर का त्याग 1236 में किया। आज भी अजमेर
में उनकी दरगाह लाखों संतों का तीर्थ स्थल है। उनके बाद के ख्वाजा बख्तियार काकी सुल्तान
इल्तुतमिश के समकालीन थे और उन्होंने ही बाबा फरूद को चिश्तिया-परम्परा में दीक्षित किया
था। निजामुद्दीन औलिया मध्यकालीन भारत के एक अन्य प्रसिद्ध सूफी सन्त थे। उन्होंने अपने
समय के प्रसिद्ध सूफी शेख फरीद से गुरुदीक्षा ली। वह स्वयं बड़ा सादा जीवन व्यतीत करते
थे। उनका प्रभाव दासवंश के सुल्तानों पर यथेष्ट रूप से बना रहा।
(i) सुहरावर्दी सिलसिला (Suharavardi Silsila)-सिलसिले के प्रथम नेता सिंध में
आकर बस गए और मुल्तान उनका मुख्य केन्द्र बना । इस मत के सर्वाधिक प्रसिद्ध सन्त शेख
शहबुद्दीन सुहरावर्दी और हमीद-उद्-दीन नागौरी हुए थे। चिश्तियों की भाँति सुहरावर्दी सन्त
फक्कड़ जीवन व्यतीत करने में विश्वास नहीं करते थे। वे राज्य की सेवा स्वीकार करते थे।
उनके खानकाह में कलदर और साधारण वर्ग का प्रवेश नहीं था, अपितु शासक और उच्च वर्ग
के लिए उनका द्वार सदा खुला रहता था। वे धन को आध्यात्मिक विकास में बाधक नहीं मानते
थे। चिश्ती सम्प्रदाय के सूफी साधक फकीरी जीवन पर जोर देते थे, जबकि सुहारवर्दी सूफी
साधन सुखमय जीवन पर । जीवन में उपवास और भूखे रहकर आध्यात्मिक साधना को उन लोगों ने अनावश्यक बताया। भारतीय समाज में सुहारवर्दी सूफी संतों का योगदान महत्त्वपूर्ण है। दिल्ली सल्तनत के पतन के बाद उन्होंने मुस्लिम समाज में आध्यात्मिक और नैतिकता को सजीव रखा।
(ii) कादिरी सिलसिला (Kadari Silsila)-सिलसिला के फारस में प्रवर्तक अबुलकादिर
अलजीलानी थे लेकिन भारत में इसे मुहम्मद गौंस ने प्रसारित किया। दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर
लोधी ने अपनी लड़की का विवाह उनसे कर दिया। उनके बाद उनके पुत्र अब्दुल कादिर द्वितीय
 इस सिलसिले के पीर बने। उन्होंने सादगी को पसन्द किया। उनके बाद शेख दाउद किरमानी
एवं शेख अबुल मामूली के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। शहजादा दाराशिकोह इसी
सिलसिले का अनुयायी था। इस सिलसिले का मुख्य उद्देश्य इस्लाम का प्रचार करना था।
(iii) नक्शबन्दी सिलसिला (Nakshabandi Silsila)-इस सिलसिले का प्रचार भारत में
शेख अहमद फारुकी सहहिन्दी ने किया। सम्राट जहाँगीर इसी सिलसिले का अनुयायी था। इस
सिलसिले के अन्य प्रमुख प्रचारक थे मुहम्मद मासूम, ख्वाजा नक्शबन्द, कयूम जुबैर तथा शाहवली उल्ला आदि । इस सिलसिले का मुख्य उद्देश्य इस्लाम की खोई प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना था।
इस सिलसिले के ज्यादातर साधक राजनीति में भाग लेते थे।
                                                  ★★★

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