12-sociology

bseb 12th class sociology notes -सांस्कृतिक विविधाता

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6 – सांस्कृतिक विविधाता की चुनौतियाँ

  (The Challenges of Unity in Diversity)

स्मरणीय तथ्य

*सांस्कृतिक विविधता (Cultural Diversity) : सांस्कृतिक विविधता से आशय देश के विविध समूहों की संस्कृति में अंतर से है। .

* सांस्कृतिक समुदाय (Cultural Community) : जाति, नृजातीय समूह, क्षेत्र या धर्म जैसी

सांस्कृतिक पहचानों पर आधारित समुदाय सांस्कृतिक कहलाते हैं। (एन.सी.ई.आर.टी. पाठ्यपुस्तक एवं अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर)

(क) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

(Objective Questions) .

  1. भारतीय समाज में ‘अनेकता में एकता’ का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आधार है
[M.Q.2009 A]

(क) प्राचीनता

(ख) धार्मिक सहिष्णुता

(ग) मौलिकता

(घ) उपर्युक्त कोई नहीं

उत्तर-(ग)

  1. “संस्कृतिकरण” की अवधारणा के प्रणेता कौन हैं ? [M.Q.2009A] .

(क) एस० जी० दुबे

(ख) आन्द्रे बेते (ग) योगेन्द्र

(घ) एम० एन० श्रीनिवास उत्तर-(घ) 3. क्षेत्रवाद, जातिवाद एवं संप्रदायवाद राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधक है।

[M.Q.2009A] (क) हाँ

(ख) नहीं

(ग) कह नहीं सकते

(घ) इनमें कोई नहीं

उत्तर-(क)

  1. संस्कृतिकरण द्वारा किस प्रकार के परिवर्तन की व्याख्या की जाती है ?
[M.Q.2009 A]

(क) जातीय परिवर्तन

(ख) राजनीतिक परिवर्तन

(ग) धार्मिक परिवर्तन

(घ) व्यावसायिक परिवर्तन

उत्तर-(क)

  1. भारत में राजनीतिक दलों को कौन मान्यता देता है ?

M.Q.2009A]

(क) राष्ट्रपति

(ख) उच्चतम न्यायालय

(ग) संसद

(घ) चुनाव आयोग

उत्तर-(घ)

  1. भारत में कितनी भाषाएँ हैं ?

(क) 179

(ख) 185

(ग) 220

(घ) 100

उत्तर-(क)

  1. भारत में कितनी बोलियाँ हैं ?

(क) 200

(ख) 344

(ग) 444

(घ) 544

उत्तर-(क)

  1. हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ

(क) 14 सितम्बर, 1950

(ख) 14 सितम्बर, 1949

(ग) 14 सितम्बर, 1951

(घ) 14 सितम्बर, 1947

उत्तर-(ख)

7.

  1. पंजाब और हरियाणा अलग-अलग राज्य बना

(क) 1966

(ख) 1953

(ग) 1965

(घ) 1980

उत्तर-(क)

  1. भाषा के आधार पर आन्ध्र प्रदेश की स्थापना कब हुई ?

(क) 1955

(ख) 1953

(ग) 1952

(घ) 1954

उत्तर-(ख)

(ख) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :

(1) ……………. से आशय देश के विविध समूहों की संस्कृति में अंतर से है।

(2) हिन्दू धर्मशास्त्रों में ……………. आश्रमों की व्यवस्था की गई है।

(3) भारतीय संसद के दो अंग हैं- ………….. तथा ……………

(4) लोकसभा में ……………. के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं।

(5) राज्यसभा में …………… से चुनकर आये हुए प्रतिनिधि होते हैं।

उत्तर-(1) सांस्कृतिक विविधता, (2) चार, (3) लोकसभा और राज्यसभा, (4) जनता,

(5) राज्यों ।

(ग) निम्नलिखित कथनों में सत्य एवं असत्य बताइये: .

(1) कोई भी समुदाय जो किसी राज्य के 50 प्रतिशत से अधिक न हो, अल्पसंख्यक माना

जाता है।

(2) अल्पसंख्यक वर्गों को राज्य से संख्या की जरूरत नहीं होती है।

(3) किसी देश की राष्ट्रीय एकता में भाषा का विशेष महत्त्व होता है।

(4) कम्प्यूटर के प्रयोग से लोग एक-दूसरे के निकट आ रहे हैं।

(5) जातिवाद हमारे समाज की एक बहुत बड़ी अच्छाई है।

उत्तर-(1) सत्य, (2) असत्य, (3) सत्य, (4) सत्य, (5) असत्य।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

(Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1. सांस्कृतिक विविधता का क्या अर्थ है ? भारत को एक अत्यंत विविधतापूर्ण देश क्यों माना जाता है ?

(NCERTT.B. Q. 1)

उत्तर-सांस्कृतिक विविधता शब्द असमानताओं की अपेक्षा अंतरों पर अधिक ध्यान देता है। जब हम यह कहते हैं कि भारत एक महान सांस्कृतिक विविधता वाला राष्ट्र है तो हमारा तात्पर्य यह होता है कि यहाँ अनेक प्रकार के सामाजिक समूह एवं समुदाय निवास करते हैं। यह समुदाय सांस्कृतिक चिन्हों जेस भाषा, धर्म, पंथ, प्रजाति या जाति द्वारा परिभाषित किए जाते हैं। इन्हीं सब कारणों से भारत भी एक अत्यन्त विविधतापूर्ण वाला देश है।

प्रश्न 2, सामुदायिक पहचान क्या होती है और वह कैसे बनती है ?

(NCERT T.B. Q. 2)

उत्तर-सामुदायिक पहचान जन्म तथा ‘संबंधित होने के भाव पर आधारित होती है, न कि किसी अजित योग्यता अथवा ‘उपलब्धि’ के आधार पर। यह ‘हम क्या हैं इस भाव की परिचायक है न कि ‘हम क्या बन गए हैं’ इसकी। किसी समुदाय में जन्म लेने के लिए हमें कुछ नहीं करना होता। वास्तविकता तो यह है कि किसी परिवार या समुदाय अथवा देश में उत्पन्न होने पर हमारा कोई वश नहीं है। इस प्रकार की पहचानें ‘प्रदत्त’ कही जाती हैं अर्थात् ये जन्म से निर्धारित होती हैं और संबंधित व्यक्तियों की पसंद अथवा नापसंद इसमें शामिल नहीं होती।

प्रश्न 3. राष्ट्र को परिभाषित करना क्यों कठिन है ? आधुनिक समाज में राष्ट्र और राज्य कैसे संबंधित हैं ?

(NCERT T.B. Q.3)

उत्तर-आज किसी राष्ट्र को परिभाषित करना अत्यंत कठिन है और इस संबंध में यही कहा जा सकता है कि राष्ट्र एक ऐसा समुदाय होता है जो अपना राज्य प्राप्त करने में सफल हो गया है। रुचिकर बात तो यह है कि इसके विपरीत रूप भी अधिकाधिक सच हो गए हैं। जिस प्रकार आज भावी अथवा आकांक्षी राष्ट्रीयताएँ अपना राज्य बनाने के लिए अधिकाधिक प्रयत्नशील हैं, वैसे ही वास्तविक राज्य यह दावा करना ज्यादा-से-ज्यादा जरूरी मान रहे हैं कि वे एक राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। आधुनिक युग का एक विशिष्ट लक्षण है राजनीतिक वैधता के प्रमुख स्रोतों के रूप में लोकतंत्र और राष्ट्रवाद की स्थापना। इसका अर्थ यह है कि आज एक राज्य के लिए ‘राष्ट्र’ एक सर्वाधिक स्वीकृत अथवा औचित्यपूर्ण आवश्यकता है, जबकि ‘लोग’ राष्ट्र की वैधता के चरम स्रोत हैं। दूसरे शब्दों में, राज्यों को राष्ट्र की उतनी ही या उससे भी अधिक ‘आवश्यकता होती है जितनी कि राष्ट्रों को राज्यों की।

प्रश्न 4. राज्य अक्सर सांस्कृतिक विविधता के बारे में शंकालु क्यों होते हैं ?

(NCERT T.B. Q. 4)

उत्तर-सांस्कृतिक विविधता के कारण अनेक समस्याएँ जैसे-क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद, जातिवाद जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस कारण राज्य सांस्कृतिक विविधता के विषय में शंकालु रहते हैं।

प्रश्न 5. आपकी राय में, क्या राज्यों के भाषाई पुनर्गठन ने भारत का हित या अहित किया है ?

(NCERT T.B.Q.6)

उत्तर-भाषाई पुनर्गठन ने भारत का अहित किया हैं इससे अलगाववाद की भावना को बल मिला है। आज दक्षिण के लोग हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने से इंकार करने लगे हैं।

प्रश्न 6. भारत में विभिन्नता में एकता से क्या अभिप्राय है?

उत्तर-भारत में अनेक प्रकार की विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन, बोलियाँ आदि में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। इसके होते हुए भी सारा भारत एक सूत्र में बँधा हुआ है। धार्मिक और जातीय विभिन्नताएँ होते हुए भी हम सब भारतवासी हैं और हमारे अंदर एकता की भावना है।

प्रश्न 7. राष्ट्रीय एकता में भाषा का क्या महत्व है ?

उत्तर-किसी देश की राष्ट्रीय एकता में भाषा का तत्व बहुत महत्वपूर्ण होता है। भाषा के माध्यम से लोग अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। राष्ट्रीय समस्याओं का निराकरण भाषा के माध्यम से करने का प्रयास करते हैं। भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। कला, साहित्य, रीति-रिवाज, परंपराएँ सभी भाषा पर आधारित हैं।

प्रश्न 8. भारत की भौगोलिक एकता को संक्षेप में स्पष्ट करें।

उत्तर-भारत एक उपमहाद्वीप है। इसके उत्तर में हिमालय पर्वत है, दक्षिण में तीन ओर समुद्र है। इसकी सदानीरा नदियों के जल से मैदानी भाग कृषि कार्य के लिए उपयुक्त है। इसमें रेगिस्तान, पठार और समुद्रतटीय मैदान हैं। सभी प्रकार की विविधता वाले इस देश की भौगोलिक एकता में उत्तर का हिमालय पर्वत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 9. भारत में विभिन्न धर्मों के लोग कितनी संख्या में हैं ?

उत्तर-भारत की जनसंख्या लगभग 102 करोड़ है जिसमें हिन्दू 82%, मुस्लिम 12.12%, ईसाई 2.34%, सिक्ख 1.94 प्रतिशत, बौद्ध 0.70 प्रतिशत, जैन 0.4 प्रतिशत तथा अन्य 0.44 प्रतिशत हैं जिनमें यहूदी, पारसी और जनजातियाँ सम्मिलित हैं।

प्रश्न 10, कर्म सिद्धान्त क्या है ?

उत्तर-कर्म सिद्धान्त के अनुसार जो कार्य पूर्व जन्म में किए हैं उनका फल इस जन्म में अवश्य मिलता है। इसी कारण लोग बुरे कर्म करने से डरते थे और अच्छे कर्मों पर जोर देते थे। बुरे कर्मों से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति नहीं मिलती।

प्रश्न 11. भारत में कितनी भाषाएँ हैं ?

उत्तर-भारत में लगभग 179 भाषाएँ और 544 बोलियाँ हैं। हिन्दी भाषा बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक है।

प्रश्न 12. आश्रम व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर-हिन्दू धर्मशास्त्रों में चार आश्रमों की व्यवस्था की गई हैं : ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम। इन चारों आश्रमों का मानव जीवन में बहुत अधिक महत्व है। मोक्ष प्राप्ति के लिए इन चारों आश्रमों का पालन करना चाहिए।

प्रश्न 13, भारत में राष्ट्रीय एकता के मार्ग में मुख्य समस्याएँ क्या हैं ?

उत्तर-भारत में पिछले कुछ वर्षों में भाषावाद, क्षेत्रवाद, आतंकवाद और अपने क्षेत्र के लिए अलग राज्य की मांग जोर पकड़ती जा रही है। हड़ताल, दंगे, सांप्रदायिक तनाव, गुटबाजी, राजनीति का अपराधीकरण जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। ये समस्याएँ राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ हैं।

प्रश्न 14. जनसंचार प्रौद्योगिकी ने एकीकरण को बढ़ाने में क्या सहयोग दिया है?

उत्तर-आधुनिक भारत में जनसंचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारी प्रगति हुई है। जन संचार की सुविधाओं के कारण रेलवे, सड़क परिवहन, नागरिक उड्डयन, डाक व तार घरों, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन, कंप्यूटर का जाल सारे भारत में फैल गया है। जन संचार क्षेत्र में क्रांति के कारण एकता को बढ़ाने में बहुत सहयोग मिला है। कंप्यूटर के प्रयोग से तो लोग एक दूसरे के निकट आ रहे हैं।

प्रश्न 15. भारतीय संविधान ने राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में क्या सहयोग दिया है?

उत्तर–स्वतंत्रता के पश्चात् 1950 में भारत का संविधान लागू हुआ। संविधान में भारत की अखंडता को कायम करने और उसे मजबूत करने के लिए विभिन्न संवैधानिक प्रावधान किए गए। भारतीय नागरिकों को मौलिक अधिकार देने के साथ-साथ उन्हें धार्मिक आजादी तथा न्याय दिलाने की व्यवस्था की गई। भारतीय संविधान भारत की एकता व अखंडता को सुरक्षित रखने का एक बहुत ही प्रभावशाली दस्तावेज है। भारतीयों को इसमें पूर्ण विश्वास है।

प्रश्न 16. प्रशासन को चलाने के लिए नौकरशाही की क्या भूमिका है?

उत्तर-देश की शासन व्यवस्था को चलाने में नौकरशाही की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। सरकारी अधिकारी व कर्मचारी, पुलिस, अध्यापक, इंजीनियर, वैज्ञानिक, डॉक्टर, पत्रकार आदि शासन चलाने में सहयोग करते हैं। देश में कानून व व्यवस्था लागू करके विभिन्न विकास कार्यों व परियोजनाओं को बनाने और उसे चलाने का उत्तरदायित्व इन नौकरशाहों पर होता है। सुरक्षा, युद्ध संचालन आदि का उत्तरदायित्व भी उन पर होता है। नौकरशाहों के निर्देशन में यदि चूक हो जाती है तो उसका नुकसान होता है। प्राकृतिक आपदा से निपटने और लोगों के पुनर्वास का काम भी नौकरशाहों के कंधों पर होता है।

प्रश्न 17. राजनीतिक व्यवस्था में सभी लोगों की भागीदारी क्यों आवश्यक है?

उत्तर-राष्ट्रीय एकीकरण के लिए आवश्यक है कि समाज के सभी वर्गों का राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश होना चाहिए। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ इतने विविध प्रकार के लोग रहते हैं। एकता की स्थापना इसी से हो सकती है कि सब तत्वों को राजनीतिक सत्ता के अधिकार में भाग लेने दिया जाए और सबको साथ लेकर चला जाए, इसके लिए आवश्यक है कि समाज के सब वर्गों का राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश हो। इस रचनात्मक भूमिका से राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 18. राष्ट्रीय एकता परिषद ने क्या सुझाव दिए हैं ?

उत्तर-नवंबर 1970 में राष्ट्रीय एकता परिषद ने एक संगठन समिति बनाई जिसने सुझाव दिया कि सांप्रदायिकता की भावना को किसी रूप में बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। सांप्रदायिक

संगठनों पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। आदिवासियों और अनुसूचित जातियों के प्रति विभेदकारी और अमानवीय व्यवहार को रोका जाए। राष्ट्र की एकता को तोड़ने वाले लोगों के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 19. भारतीय एकता के संबंध में हर्बर्ट रिजले के क्या विचार हैं ? –

उत्तर-हर्बर्ट रिजले का कथन है कि भारत में धर्म, रीति-रिवाज, भाषा, सामाजिक और भौतिक विभिन्नताओं के होते हुए भी जीवन की एक विशेषरूपता कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक देखी जा सकती है। वास्तव में भारत का एक अलग चरित्र और व्यक्तित्व है जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकती।

प्रश्न 20. समायोजन से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर-समायोजन भारतीय सभ्यता की एक अन्यतम विशेषता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें समाज के विभिन्न तत्व बिना अपना अस्तित्व खोये एकताबद्ध किए जाते हैं। भारतीय इतिहास और संस्कृति में नई पहचान पाने के लिए पुरानी पहचान को मिटाना आवश्यक नहीं समझा जाता। अनेकता का समायोजन भारतीय संस्कृति की स्थापित विचारधारा रही है।

प्रश्न 21. धर्म के आध्यात्मिक पक्ष से क्या अभिप्राय है? .

उत्तर-सभी धर्मों के सामान्य रूप से दो पक्ष होते हैं-आध्यात्मिक और लौकिक। सभी धर्मों के आध्यात्मिक पक्ष में बहुत समानता है। सभी धर्मों में नैतिक आचरण और स्वार्थों के अतिक्रमण को रोकने पर जोर दिया जाता है। धर्म के इस पक्ष को व्यक्तिगत उपासना और आचरण का मामला माना जाता है।

प्रश्न 22. साम्प्रदायिकता किस प्रकार भारतीय समाज के लिए खतरा है ? उत्तर-साम्प्रदायिकता भारतीय समाज के लिए निम्नलिखित तरीके से खतरा उत्पन्न करती है :

  1. समाज में राजनीतिक चुनावों में साम्प्रदायिकता की भावना महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। प्रायः सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चुनाव करते समय साम्प्रदायिकता को महत्व देते हैं।
  2. समाज में मतदाता भी अपने धर्म से प्रभावित होकर मतदान करते हैं। कई बार तो धार्मिक फतवे भी जारी किए जाते हैं कि अमुक सम्प्रदाय के लोग अमुक उम्मीदवार या अमुक पार्टी को ही वोट दें।
  3. धर्म के नाम पर देश में समय-समय पर राजनीतिक संघर्ष और साम्प्रदायिक झगड़े होते रहते हैं और देश में हिंसक वातावरण पैदा हो जाता है।

प्रश्न 23. साम्प्रदायिकता से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर-सांप्रदायिकता का अर्थ है अपना धर्म मानने वालों को अपना मित्र तथा अन्य धर्म मानने वालों को अपना शत्रु समझना। भारत में बहुत लम्बे समय से विभिन्न धर्मों के अनुयायी साथ-साथ रहते हैं परन्तु कालान्तर में भारतीय समाज में अनेक कुरीतियाँ व बुराइयों के साथ धार्मिक क्षेत्र में व्याप्त आपसी सहिष्णुता समाप्त हो गई और समय-समय पर साम्प्रदायिक दंगे होने लगे।

प्रश्न 24. भारतीय समाज पर जातिवाद के नकारात्मक प्रभाव बताइए।

उत्तर-समकालीन भारतीय समाज की राजनीति पर जातिवाद के नकारात्मक प्रभाव का वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है :

  1. जातिवाद की भावना हमारे संविधान द्वारा वर्णित लक्ष्यों जैसे देश की एकता और अखंडता की अवहेलना करती है जिससे समाज विघटित होता है।
  2. जातिवाद के कारण एक जाति दूसरी जाति के विरुद्ध कार्य करती है तथा इससे सामाजिक वातावरण दूषित बनता है।
  3. जातिवाद के कारण ही समाज में संकीर्ण निष्ठाओं को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 25. साम्प्रदायिकता को कैसे समाप्त किया जा सकता है ?

उत्तर-साम्प्रदायिकता को समाप्त करने के उपाय निम्नलिखित हैं : –

  1. समाज में साम्प्रदायिक बातें करने वाले राजनैतिक दलों पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।
  2. राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव के समय या उसके अलावा भी आचार संहिता का पालन करना चाहिए।
  3. शिक्षा का आधार नैतिक होना चाहिए न कि सांप्रदायिक।
  4. पाठ्यक्रम में ऐसी सामग्री नहीं होनी चाहिए, जिससे बच्चों (विद्यार्थियों) पर साम्प्रदायिक प्रभाव पड़ता है।
  5. शासन की नीति इस प्रकार की होनी चाहिए कि कोई भी साम्प्रदायिक माँग न मानी जाए तथा साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए विशेष पुलिस संगठन बनाये जाने चाहिए। साम्प्रदायिकता फैलाने वाले लोगों को कठोर दंड दिया जाना चाहिए। मीडिया को भी साम्प्रदायिकता फैलाने वाले समाचार प्रसारित नहीं करने चाहिए।

प्रश्न 26, जातिवाद से आपका क्या अभिप्राय है ?

अथवा,

जातिवाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर-जातिवाद हमारे समाज की एक बहुत बड़ी बुराई है। इसका उदय प्राचीनकाल की वर्ण व्यवस्था से लिया जा सकता है। प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर बनायी गयी थी, परन्तु धीरे-धीरे यह जाति प्रथा में बदलती गयी जो जन्म के आधार पर मानी जाने लगी। व्यक्ति का सामाजिक अस्तित्व, पेशे का चुनाव, शादी-विवाह, खानपान और जीवन के बहुत से अन्य प्रश्न जाति प्रथा के नियंत्रण में आ गए। जातिवाद की भावना हमारे संविधान द्वारा वर्णित लक्ष्यों (जैसे देश की एकता और अखंडता) की अवहेलना करती है। जाति वैमनस्य के कारण सामाजिक वातावरण दूषित होता है। जातिवाद के कारण ही संकीर्ण निष्ठाओं को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 27. भारत में जाति प्रथा को समाप्त करने के चार उपाय बताइए।

उत्तर-भारत में जातिवाद की भावना को दूर करने के चार उपाय निम्नलिखित हैं :

  1. जातिवाद के विरुद्ध जनमत तैयार किया जाना चाहिए।
  2. सभी राजनैतिक दलों को इस निर्णय के लिए तैयार किया जाना चाहिए कि वे जातिवाद को प्रोत्साहन नहीं देंगे।
  3. जातीय आधार पर सरकार द्वारा दी जाने वाली सभी सुविधाएँ समाप्त कर दी जानी चाहिए।
  4. सरकार को जातिवाद के विरुद्ध कानून बनाकर जातिवाद पर आधारित राजनैतिक दलों को समाप्त किया जाना चाहिए।
  5. अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

प्रश्न 28. क्षेत्रवाद से आप क्या समझते हैं ?

[B.M.2009 A]

उत्तर-क्षेत्रवाद (Regionalism): साधारण शब्दों में क्षेत्रवाद से अभिप्राय देश के किसी भाग में उस छोटे से क्षेत्र से है जो भौगोलिक, सामाजिक व आर्थिक कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए जागरूक है। राजनीति शास्त्र की भाषा में क्षेत्रवाद निम्न प्रकार से व्यक्त किया जाता है :

राष्ट्रवाद की तुलना में किसी क्षेत्र विशेष अथवा राज्य या प्रान्त की अपेक्षा एक छोटे से क्षेत्र से लगाव, उसके प्रति व्यक्ति का विशेष आकर्षण आदि रखना क्षेत्रीयवाद कहलाता है। भारत में क्षेत्रीयता की भावना सम्पूर्ण देश में व्याप्त है। संक्षेप में क्षेत्रीय असंतुलन से अभिप्राय ऐसी स्थिति से है जब किसी देश में सरी क्षेत्रों की उन्नति व विकास समान रूप से न हो। भारत में पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश पिछड़े क्षेत्र हैं जबकि पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकसित क्षेत्र हैं।

प्रश्न 29, भारत में क्षेत्रीय असंतुलन के किन्हीं दो परिणामों का उल्लेख करें।

उत्तर-भारत में क्षेत्रीय असंतुलन के दो मुख्य परिणाम निम्नलिखित हैं :

  1. क्षेत्रवाद के कारण राष्ट्रीय एकता में बाधा पहुँचती है। विभिन्न क्षेत्रों के लोग पृथक् राष्ट्र बनाने की मांग उठाने लगते हैं।
  2. क्षेत्रीय असंतुलन के कारण हिंसा को बल मिलता है जिससे अनेक बेगुनाहों की जान जाती है। राष्ट्रीय सम्पत्ति को भी हानि पहुँचती है।

प्रश्न 30. भारत में क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त करने के दो तरीकों का उल्लेख करें।

उत्तर-भारत में क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त करने के दो तरीके निम्नलिखित हैं

  1. भारत सरकार को देश के उन क्षेत्रों का अधिक विकास करने के लिए कार्य करना चाहिए, जहाँ सभी लोगों का जीवन स्तर बहुत नीचा है। वहाँ पर और अधिक सरकारी उद्योग लगाए जाने चाहिए।
  2. पिछड़े व अविकसित क्षेत्रों को शिक्षा प्राप्त करने की सुविधाएँ दी जानी चाहिए।

प्रश्न 31. क्षेत्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

उत्तर-क्षेत्र एक भू-भाग होता है जिसमें निवास करने वाले व्यक्ति सामूहिक तौर पर उस भू-भाग से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं। उनकी भाषा, रीति-रिवाज, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मामलों में एकाकीपन होता है। उनका जीवन जीने का एक सा ढंग होता है। यह भू-भाग राज्य का कुछ भाग हो सकता है अथवा एक से अधिक राज्यों के भू-भाग हो सकते हैं। किसी क्षेत्र के लोग भाषा, सम्प्रदाय, आर्थिक या अन्य किसी कारण से राष्ट्र की अपेक्षा अपने क्षेत्र के हितों को महत्व देने लगते हैं जिससे क्षेत्रवाद पनपने लगता है।

प्रश्न 32. आज नागरिक समाज संगठनों की क्या प्रासंगिकता है ?

(NCERT T.B. Q. 10)

उत्तर-नागरिक समाज उस व्यापक कार्यक्षेत्र को कहते हैं जो परिवार के निजी क्षेत्र से हटकर होता है, लेकिन राज्य और बाजार दोनों क्षेत्र से बाहर होता है। नागरिक समाज सार्वजनिक अधिकार का गैर-राजकीय तथा गैर-बाजारी भाग होता है जिसमें विभिन्न व्यक्ति संस्थाओं और संगठनों का निर्माण करने के लिए स्वेच्छा से परस्पर संबद्ध हो जाते हैं। यह सक्रिय नागरिकता का क्षेत्र है। यहाँ व्यक्ति मिलकर सामाजिक मुद्दों पर बातचीत करते हैं, राज्य को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं अथवा उसके समक्ष अपनी माँगे रखते हैं, अपने सामूहिक हितों को पूर्ण करने का प्रयास करते हैं या विभिन्न कार्यों के लिए समर्थन चाहते हैं। इस क्षेत्र में नागरिकों के समूहों द्वारा बनाए गए स्वैच्छिक संघ, संगठन या संस्थाएँ सम्मिलि होते हैं। इसमें राजनीतिक दल, जनसंचार की संस्थाएँ, मजदूर संघ, गैर-सरकारी संगठन, धाक संगठन और अन्य प्रकार के सामूहिक तत्व भी शामिल होते हैं।

नागरिक समाज में शामिल होने की मुख्य कसौटियाँ यह है कि संगठन राज्य नियंत्रित नहीं होना चाहिए और यह विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक लाभ कमाने वाले तत्व न हो। इस प्रकार, दूरदर्शन नागरिक समाज का हिस्सा नहीं है, जबकि निजी टेलीविजन चैनल हैं। एक कार निर्माता कंपनी नागरिक समाज का हिस्सा नहीं है लेकिन उसके कामगारों के मजदूर संघ इसके अंतर्गत आते हैं। वास्तव में यह कसौटियाँ बहुत से क्षेत्रों को स्पष्ट नहीं कर पातीं। उदाहरण के लिए, एक समाचारपत्र विशुद्ध रूप से एक वाणिज्यिक उद्यम के रूप में चलाया जा सकता है अथवा एक गैर-सरकारी संगठन को सरकारी निधियों से सहायता दी जा सकती है।

प्रश्न 33. भारतीय और यूरोपीय समाजशास्त्रियों के मत में एकता का आधार क्या है?

उत्तर-यूरोपीय समाजशास्त्री किसी समाज में एकता के सूत्र भाषाई राष्ट्रीयता या राजनीतिक संप्रभुता के आधार पर खोजते रहे हैं। एकता का प्राथमिक आधार राष्ट्र की सदस्यता माना जाता है।

भारतीय समाजशास्त्री यूरोपीय समाजशास्त्रियों के मत से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार भारत और दक्षिण एशिया में एकता का स्वरूप सभ्यता मूलक रहा है। सभ्यता के स्तर पर एकता देखने को मिलती है। विभिन्न समाजों और राष्ट्रों के बीच एकता रही है और आज भी वह है। साधु-संतों, व्यापारियों, कथा-वाचकों, शिल्पकारों, कारीगरों, संगीतकारों, नर्तकों, तीर्थाटन, मेले, सामाजिक-सांस्कृतिक त्योहारों जैसी संस्थाओं ने भी सांस्कृतिक एकता को बनाने व बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रश्न 34. भारत में भौगोलिक एकता को समझाइये।

उत्तर-भारत में भौगोलिक रूप से एक इकाई है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक यह एक स्वतंत्र भूखंड के रूप में फैला हुआ है। यहाँ समशीतोष्ण, उष्ण कटिबंधीय और ध्रुवीय तीनों प्रकार की जलवायु पाई जाती है। भौगोलिक विविधता और एकता दोनों ही तत्व भारत में शारीरिक बनावट, त्वचा, ऊँचाई, सुंदरता और व्यक्तित्व को निर्धारित करते हैं। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में खाद्य फसलों की अनेक किस्में उगाई जाती हैं। भौतिक संस्कृतियों के विकास में भौगोलिक कारकों का योगदान बहुत अधिक है। रीति-रिवाज, पूजा-पद्धति और सामाजिक संस्थाओं के विकास पर भी भौगोलिक कारकों ने भारत को एक सम्पूर्ण इकाई बनाए रखा है; तीन ओर समुद्र और उत्तर में हिमालय पर्वत इसकी प्राकृतिक सीमा बनाते हैं। इसकी आबादी की सभी आवश्यकताएँ देश के अन्दर पूर्ण हो जाती हैं। भौगोलिक एकता ने यहाँ के आर्थिक जीवन को भी प्रभावित किया है। .

प्रश्न 35. 1991 की जनसंख्या के अनुसार भारत में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग निवास करते हैं ?

उत्तर-सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत में विभिन्न धर्मों को मानने वालो लोग निवास करते हैं। इसकी संख्या अग्र प्रकार से है :

  1. हिन्दू धर्म 82 प्रतिशत
  2. मुस्मिल धर्म 12.12 प्रतिशत
  3. ईसाई धर्म                                         2.34 प्रतिशत

4 सिक्ख धर्म                                        1.94 प्रतिशत

  1. बौद्ध धर्म 0.76 प्रतिशत
  2. जैन धर्म 0.40 प्रतिशत
  3. अन्य । 0.44 प्रतिशत

प्रश्न 36. हिन्दू संतों और मुस्लिम संतों ने एकता को बढ़ाने में किस प्रकार योगदान दिया?

.. उत्तर-भक्ति और उपासना के क्षेत्र में हिन्दू संतों और सूफी संतों का योगदान बहुत अधिक रहा है। रामानन्द और कबीर जैसे साधु-संतों ने अच्छी बातों की सराहना की लेकिन धर्म के आडम्बरों और मिथ्या आचरणों और कुरीतियों पर प्रहार भी किए। फारसी सूफी परम्परा ने भारत में आकर नया स्वरूप ग्रहण किया। हिन्दू प्रेम कथाओं के माध्यम से उन्होंने आत्मा-परमात्मा के रहस्यों को समझाने का प्रयत्न किया। राजदरबारों में फारसी और राजपूताना की सांस्कृतिक परम्पराओं का समन्वय चित्रकला, काव्य, खान-पान और प्रेम आख्यानों में किया गया।

प्रश्न 37. सांप्रदायिकता किस प्रकार राष्ट्र की एकता में बाधक है ?

उत्तर-सांप्रदायिकता एक ऐसी विचारधारा है जिसमें एक संप्रदाय के लोग दूसरों की अपेक्षा अपने को श्रेष्ठ मानते हैं और अपने धर्म का सहारा लेकर अन्य धर्मों के मानने वाले लोगों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं। सांप्रदायिकता घृणा और हिंसा को जन्म देती है। जब लोग धर्म की मूलभूत भावनाओं को छोड़कर धर्म के बाहरी स्वरूप और अंधविश्वास को असली धर्म समझने की भूल करते हैं। यह प्रवृत्ति एक सोची-समझी शरारत होती है जो राजनीतिक सत्ता को हथियाने और आर्थिक सुविधा को पाने की अनाधिकार चेष्टा सदृश है। भोले-भाले लोगों की धार्मिक

भावनाओं को भड़काकर सांप्रदायिक मतभेद पैदा करने का प्रयत्न करते हैं। इस देश का भारत

और पाकिस्तान के रूप में बँटवारा धार्मिक-सांप्रदायिक आधार पर ही किया गया था। देश के बँटवारे के बाद भी सांप्रदायिकता की समस्या सिर उठाती रही है।

प्रश्न 38. भारत में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में सांस्कृतिक तत्वों का महत्त्व बताइये।

उत्तर-भारत में एकता स्थापित करने और उसे बनाए रखने में धर्म, दर्शन, कला और साहित्य की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बहुत सारे त्योहार सारे देश में लगभग सभी समुदायों और धर्मों के लोगों के द्वारा मनाए जाते हैं। इन त्योहारों की संरचना भी पूरे देश में करीब-करीब एक जैसी है। मन्दिरों और राजमहलों का वास्तुशिल्प, इनसे जुड़ी कलाएँ तथा सांस्कृतिक विन्यास भी पूरे देश में एक जैसा है। इन सबसे एकत्व की भावना बढ़ती है। सामाजिक व्यवस्था और स्थायित्व कायम करने में राज्य की भूमिका की तुलना में सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण रही है। .

प्रश्न 39. भारत में राजनीतिक एकता की दृष्टि से क्या प्रयत्न किये गये ?

उत्तर-सम्पूर्ण देश को एक केन्द्रीय शासन के अन्तर्गत लाने का विचार भारत के महान शासकों एवं राजनेताओं में हमेशा से रहा है। चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक, समुद्रगुप्त और हर्षवर्धन जैसे शासकों ने चक्रवर्ती नरेश बनने के प्रयत्न किए। अकबर और जहाँगीर ने भी राजनीतिक एकता के लिए प्रयास किये। अंग्रेजी शासनकाल में भी ऐसा प्रयास हुआ परन्तु इस समय भी भारत में 600 देशी रियासतें थीं जो अधिकतर मामलों में स्वतंत्र थीं। अंग्रेजों ने एक शक्तिशाली केन्द्रीय सत्ता के रूप में रक्षा, विदेशी मामलों और कुछ आर्थिक मामलों में पूरे देश में एक राजनीतिक एकता स्थापित करने का प्रयास किया। स्वतंत्रता के पश्चात् सभी देशी रियासतों को मिलाकर ‘भारत संघ’ का निर्माण किया गया। आज देश में राजनीतिक और प्रशासनिक एकता है परन्तु अनेक राजनीतिक दल और राजनीतिक विधारधाराएँ हैं।

प्रश्न 40. भारत में भाषाई विविधता का उल्लेख कीजिए।

उत्तर-भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है। भारत में 18 प्रमुख भाषाएँ हैं और उनकी कई क्षेत्रीय उपभाषाएँ और बोलियाँ हैं। भाषविदों ने भारत में 179 भाषाएँ और 544 बोलियों की पहचान की है। इन भाषाओं और बोलियों को तीन भाषा परिवारों इंडो-आर्यन, द्रविडियन तथा मुंडारी में बाँटा गया है। इन्डो-आर्यन भाषा परिवार में संस्कृत, हिन्दी, बंगाली, उड़िया, मराठी, गुजराती, पंजाबी आदि की बोलियाँ आती हैं। द्रविडियन भाषा परिवर में तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम भाषाएँ हैं तथा मुंडारी भाषा समूह में जन जातीय समुदायों की पारम्परिक भाषाएँ और बोलियाँ आती हैं। मध्यकाल में फारसी, अरबी और उर्दू जैसी भाषाएँ भारत में लोकप्रिय हुईं। अरबी और फारसी राजदरबारों की भाषा थी। अंग्रेजी शासन काल में अंग्रेजी ने महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया। अरबी, फारसी और अंग्रेजी के बहुत से शब्द भारतीय भाषाओं ने अपना लिए।

प्रश्न 41. स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में भाषा समस्या पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर-स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में भाषाई आधार पर राज्यों का निर्माण किया गया। उस समय भाषा के संबंध में प्रमुख समस्या थी कि भारत की राजभाषा कौन सी हो। नये बनाए गये प्रदेशों में अल्पसंख्यक भाषाओं की क्या स्थिति होनी चाहिए। यद्यपि अंग्रेजों ने भाषाई आधार को लेकर राज्यों की स्थापना नहीं की थी। काफी विचारविमर्श के बाद हिन्दी को सरकारी भाषा का दर्जा दिया गया परन्तु कुछ समय तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने का निर्णय हुआ। प्रारंभ में यह व्यवस्था 15 वर्षों के लिए जारी रखी गई परन्तु 1965 में अंग्रेजी को अतिरिक्त सहायक सरकारी भाषा के रूप में केन्द्र सरकार और विभिन्न प्रदेश सरकारों के बीच कामकाज और बोलचाल की भाषा के रूप में मान्यता दे दी गई। क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग संबंधित प्रदेशों में किया जाने लगा और इन्हें अन्य राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में भारतीय संविधान की आठवीं सूची में सम्मिलित किया गया। इस समय हिन्दी देश के सरकारी काम-काज की भाषा है परन्तु अतिरिक्त

सहायक सरकारी भाषा अंग्रेजी ने अपनी शक्ति प्रभाव और आकर्षण को बनाए रखा है।

प्रश्न 42. कला और स्थापत्य के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।

उत्तर-भारत में मध्यकाल में भवन निर्माण कला में हिन्दू-मुस्लिम तत्वों का मिश्रण देखने को मिलता है। अकबर के शासन काल में फारसी और भारतीय शैलियों के बीच सम्मिश्रण देखने को मिलता है। जहाँगीर के शासन काल में हिन्दू प्रभाव अधिक हो गया। सिकन्दरा में अकबर के मकबरे में मुस्लिम मेहराबों तथा गुम्बदों के बावजूद मिला-जुला प्रभाव देखने को मिलता है। फतेहपुर सीकरी और माउन्ट आबू के मंदिरों पर जैन प्रभाव देखने को मिलता है। मुगलकालीन भवन निर्माण कला की विशेषताओं में अपना नयापन है। मध्यकालीन पेंटिंग में भी तुर्की, ईरानी और पारंपरिक भारतीय शैली का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। अकबर ने हिन्दू और मुस्लिम कलाकारों को अपने दरबार में नियुक्त किया हुआ था। जहाँगीर के शासन काल में चित्रकला अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँच गई थी। गायकी के क्षेत्र में भी हमें हिन्दू-मुस्लिम एकता दिखाई पड़ती है। हिन्दू गायकों ने मुस्लिम राज दरबारों में और मुस्लिम भजन गायकों ने हिन्दू मन्दिरों में भजन गाये।

प्रश्न 43. भारतीय संसद के विषय में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर-भारतीय संसद भारत राष्ट्र की वह इकाई है जो राष्ट्रीय स्तर पर कानून का निर्माण करती है। संसद के प्रतिनिधियों का चुनाव आम जनता के द्वारा होता है। हर वयस्क नागरिक इस चुनाव में अपने मत द्वारा निर्णायक भूमिका अदा करता है। यह लोगों की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय संसद के दो अंग हैं : लोकसभा और राज्य सभा। लोक सभा में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं। राज्य सभा में राज्यों से चुनकर आये हुए प्रतिनिधि होते हैं।

प्रश्न 44. जातिवाद किस प्रकार समाज को प्रभावित करता है ?

उत्तर-जाति व्यवस्था भारतीय समाज का एक अटूट एवं महत्वपूर्ण अंग रहा है और इसने समय-समय पर लोगों के व्यक्तिगत, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया है। आधुनिक युग में राजनीतिक विज्ञान व समाजशास्त्र के कुछ विद्वानों का मत था कि भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना से समाज में जातिवाद का अन्त हो जाएगा किन्तु उनका यह विश्वास गलत सिद्ध हुआ है। वास्तव में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय समाज विशेषकर समाज के राजनीतिक क्षेत्र में इसका प्रभाव बहुत अधिक पड़ा है।

समाज के राजनीतिक परिदृश्य को जातिवाद ने निम्न प्रकार से प्रभावित किया है-

  1. निर्वाचन से पहले लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल द्वारा उम्मीदवार का चयन प्रायः जाति के आधार पर किया जाता है।
  2. चुनाव प्रचार में जाति का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। उम्मीदवार का जीतना या हारना काफी हद तक जाति पर आधारित प्रचार पर निर्भर करता है।
  3. चुनाव के बाद राजनीतिक नेतृत्व का निर्णय जाति के आधार पर निश्चित किया जाता है।
  4. जातीय धारणा के कारण भारतीय समाज में उग्रता व हिंसा ने स्थान ले लिया है। उदाहरणतया हरियाणा में जाट, अहीर और ब्राह्मणों में सत्ता ग्रहण करने के लिए संघर्ष बना रहता है।

प्रश्न 45. भारत में जाति की भूमिका की विवेचना करें।

उतर-भारत में जातिवाद के भयानक रूप ने व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाले हैं जो निम्न प्रकार हैं –

  1. भारतीय समाज जातिवाद पर आधारित हो गया है। सभी प्रकार के निर्णय लेते समय जातिवाद का ध्यान रखना अनिवार्य होता जा रहा है जिससे समाज में व्यवस्था बनाने वाले अच्छे व कुशल व्यक्ति कम होते जा रहे हैं तथा नीति-निर्माण में भी बाधा आती है।
  2. भारतीय समाज संकुचित बन गया है। इसमें शुद्ध जातिगत स्वार्थों को सामाजिक स्वार्थों की अपेक्षा वरीयता दी जा रही है।
  3. जातिवाद के कारण आज देश में सर्वत्र हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है। कहीं शिया-सुन्नी, तो कहीं अकाली और निरंकारी संघर्षरत हैं कहीं जाट व अनुसूचित जातियों में तो कहीं ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण में संघर्ष होता है। कश्मीरी पंडितों को अपने घर छोड़कर दूसरे राज्यों जैसे दिल्ली में शरणार्थी बनकर रहना पड़ता है।
  4. जातिवाद पर आधारित समाज में जातीय हितों का टकराव होने लगा है, जिसके कारण सारे समीकरण जातियों के आधार पर बनने लगे हैं। प्रत्येक जाति दूसरे जाति के लोगों को संदेह की दृष्टि से देखती है। इससे जातीय वैमनस्य बढ़ रहा है और पारंपरिक सद्भाव कम हो रहा है।

प्रश्न 46. भारत में बढ़ते हुए सम्प्रदायवाद पर किस प्रकार काबू पाया जा सकता है? . उत्तर-भारत में सांप्रदायिकता से बचने के चार उपाय निम्नलिखित हैं:

  1. शिक्षा संस्थाओं अर्थात् विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के विद्यार्थियों को सहनशीलता, आपसी सहिष्णुता और सभी धर्मों के प्रति आदर की भावना सिखलाई जानी चाहिए।
  2. समाचार-पत्र, रेडियो, टेलीविजन तथा सिनेमा आदि द्वारा जनता को आपसी भाईचारे व सहनशीलता की शिक्षा दी जानी चाहिए।
  3. विभिन्न मतों, धर्मों व सम्प्रदायों के गुरुओं एवं महापुरुषों को चाहिए कि वे अपने अनुयायियों को धार्मिक सहनशीलता की शिक्षा दें तथा दूसरे सम्प्रदायों के विरुद्ध घृणा की भावना का प्रचार न करें।
  4. भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने दल के लोगों में धार्मिक सहनशीलता व आपसी भाईचारे की भावना का प्रचार करना चाहिए।

प्रश्न 47. “क्षेत्रीय असंतुलन क्षेत्रवाद का एक बड़ा कारण है।” इस कथन का विस्तार कीजिए।

उत्तर-साधारण शब्दों में क्षेत्रीय असंतुलन का अर्थ एक देश के किसी भाग के उस छोटे से क्षेत्र से है जो भौगोलिक, सामाजिक व आर्थिक कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए जागरूक है। भारतीय समाज में क्षेत्रीयवाद निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है :

“राष्ट्रवाद की तुलना में किसी क्षेत्र विशेष अथवा राज्य या प्रांत की अपेक्षा एक छोटे से क्षेत्र से लगाव, उसके प्रति भक्ति या विशेष आकर्षण आदि रखना क्षेत्रीयवाद कहलाता है।”

क्षेत्रीय असंतुलन प्राकृतिक या बनावटी हो सकता है। यह आर्थिक असंतुलन या गलत आर्थिक नीति के कारण हो सकता है। भारत में कई राज्यों में आमदनी अधिक व कई राज्यों में बहुत कम है। उदाहरण के लिए दिल्ली में प्रत्येक व्यक्ति की आमदनी अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक है। भारत में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में औद्योगिक विकास अधिक हुआ है परन्तु बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि में औद्योगिक विकास इतना नहीं हुआ और ये क्षेत्र पिछड़े रह गये। इन भेदों के कारण भारत में क्षेत्रवाद की समस्या पनपने लगी।

प्रश्न 48. क्षेत्रवाद और पृथकतावाद में अंतर स्पष्ट कीजिए। उत्तर-क्षेत्रवाद और पृथकतावाद में निम्नलिखित अन्तर हैं

क्षेत्रवाद का अर्थ है किसी निश्चित क्षेत्र में रहने वाले लोग जो अपनी विशिष्ट भाषा, रीति-रिवाज, धर्म आदि के कारण स्वयं को देश के अन्य लोगों से भिन्न समझते हों तथा अपने क्षेत्र के विकास की कामना तथा प्रयत्न करना। भारत में अधिकतर क्षेत्र भाषा के आधार पर ही बने हुए हैं। भाषा के आधार पर ही अनेक राज्य बनाए गए हैं। जैसे पंजाब और हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात। इसी प्रकार नदी जल के बँटवारे के बारे में या भारत सरकार द्वारा लगाए जाने वाले किसी बड़े योजना कार्य को अपने क्षेत्र में लगवाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष हो जाता है ‘परन्तु क्षेत्रवाद राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग नहीं होना चाहता।

पृथकतावाद राष्ट्रीय एकता और अखंडता, स्वतंत्रता तथा संप्रभुता के लिए चुनौती होता है। वह राष्ट्र की मुख्यधारा से बिल्कुल अलग होकर अपने लिए एक स्वतंत्र सार्वभौम राज्य की मांग करता है।

प्रश्न 49. क्षेत्रीयवाद से आप क्या समझते हैं ? इसे नियंत्रित करने के दो सुझाव दें।

अथवा,

क्षेत्रीय असमानता से आप क्या समझते हैं ? औपनिवेशिक प्रशासन इसके लिए कहाँ तक उत्तरदायी था?..

उत्तर-क्षेत्रवाद का अर्थ है किसी निश्चित क्षेत्र में रहने वाले लोग जो अपनी विशिष्ट भाषा, रीति-रिवाज या धर्म आदि के कारण देश के अन्य लोगों से भिन्न समझते हैं, तथा अपने क्षेत्र के विकास की कामना तथा प्रयास करते हैं। भारत में अधिकतर क्षेत्र भाषा के आधार पर बने हुए हैं। क्षेत्रवाद के आधार पर ही कई नए राज्य बनाए गए हैं। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात आदि भाषा के आधार पर बने हैं। झारखंड, उत्तरांचल (उत्तराखंड) तथा छत्तीसगढ़ भी क्षेत्रवाद के कारण ही अस्तित्व में आए। अभी भी गोरखालैंड, बोरोलैंड तेलंगाना, विदर्भ, हरित प्रदेश आदि नए राज्य बनाने की मांग उठती रहती है परन्तु क्षेत्रवाद राष्ट्र की मुख्य धारा से बिल्कुल अलग होकर स्वतंत्र तथा सार्वभौम राज्य बनाने की बात का समर्थक नहीं होता।

क्षेत्रवाद को नियंत्रित करने के दो सुझाव निम्नलिखित हैं:

  1. केन्द्र सरकार को देश के उन क्षेत्रों का अधिक विकास करने के लिए कार्य करना चाहिए जहाँ अभी लोगों का जीवन स्तर नीचा है। वहाँ पर अधिक सरकारी उद्योग लगाए जाएँ।
  2. पिछड़े व अविकसित क्षेत्रों के विकास के लिए निजी उद्योग स्थापित करने और अधिक लोगों को रोजगार सुलभ कराये जाने चाहिए।
  3. पिछड़े क्षेत्रों में नए महाविद्यालय तथा विद्यालय खोले जाने चाहिए जिससे वहाँ के लोगों की शिक्षा प्राप्त करने की सुविधाएँ मिल सके।

क्षेत्रीय असमानता या असंतुलन में प्रति व्यक्ति आय, साक्षरता दर, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की उपलब्धि के आधार पर भिन्नताएँ पाई जाती हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने या तो क्षेत्रीय आधार पर इस प्रकार की असमानता पैदा की या जहाँ पर इस प्रकार की क्षेत्रीय असमानताएँ थीं उनमें वृद्धि की।

प्रश्न 50. भारत में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का परीक्षण कीजिए।

उत्तर-क्षेत्री असंतुलन संपूर्ण समाज को प्रभावित करता है। अत: इसे दूर करने के लिए देश में शान्ति एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए

  1. सभी क्षेत्रों का आर्थिक विकास (Economic Development in each region): सभी क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए केन्द्र द्वारा आर्थिक व तकनीकी सहायता दी जानी चाहिए।
  2. क्षेत्रों की माँगों का निराकरण (Fulfilment of regional demands): विभिन्न क्षेत्रों की जो आवश्यक माँगें हैं उनकी पूर्ति की जानी चाहिए। केन्द्रीय सरकार का दायित्व है कि इस प्रकार की मांगों को शीघ्रता से पूरा करे।
  3. केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में मधुरता (Good Relationship between Centre and States): क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए केन्द्र और राज्यों की सरकारों के बीच मधुर सम्बन्ध होने चाहिए।
  4. पिछड़े राज्यों के विकास के विशेष प्रयास (Special Attention to the Development of Backward States): जो राज्य अधिक पिछड़े हुए हैं, उनकी ओर केन्द्र सरकार विशेष ध्यान दे और उनका आर्थिक विकास ठीक ढंग से किया जाए। केन्द्र सरकार उन राज्यों को विशेष वित्तीय सहायता एवं अनुदान दे।
  5. रोजगार प्रदान करना (To provide Employment): भारत की केन्द्रीय सरकार द्वारा सभी क्षेत्रों में रोजगार के अधिक-से-अधिक अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
  6. राष्ट्रीय एकीकरण (Nation Unity) : शिक्षा संस्थाओं एवं संचार माध्यमों के द्वारा देश के सभी नागरिकों में एकता और अखण्डता की भावना विकसित की जाए जिससे देश के नागरिक क्षेत्रीय हितों की अपेक्षा राष्ट्रीय हितों को अधिक महत्व देंगे।
  7. क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहन (Encourage Regional Languages) : क्षेत्रीय भाषाओं को भी पूरा सम्मान दिया जाना चाहिए ताकि किसी भी क्षेत्र के लोग अपने को हीन न समझें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

(Long Answer Type.Questions)

प्रश्न 1. भारत में एकता और विविधता की विवेचना कीजिए। [B.M.2009A]

– अथवा,

भारत में अनेकता में एकता पर एक लेख लिखिए।

उत्तर-भारत एक प्राचीन देश है। इस देश में अनेक प्रकार की विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। भौगोलिक रूप से भारत एक विशाल इकाई है, जो पूर्व असम से पश्चिम में कच्छ तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। यह आकार में ब्रिटेन से 14 गुना बड़ा देश है। भारत में जलवायु की विभिन्नता पाई जाती है। शारीरिक बनावट और जनसंख्या संबंधी अनेक बातों में विभिन्नता दिखाई देती है। भाषा, बातचीत, व्यवहार, रीति-रिवाज, मूल्यों, आदर्शों, संस्कारों और प्रतिमानों की दृष्टि से विविधता पाई जाती है। रीति-रिवाज, पूजा-पद्धति और सामाजिक संस्थाओं के विकास पर भौगोलिक प्रभाव देखा जा सकता है। भारतीय एकता और भारतीयता की भावना को कायम रखने में भौगोलिक कारकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इसकी भौगोलिक सीमा के अंदर देश को बाँटने या इसकी सीमा का अतिक्रमण करने की राजनीतिक-सैनिक कोशिश असफल रही है। भौगोलिक एकता ने यहाँ के आर्थिक जीवन को प्रभावित किया है। भारतीय संस्कृति और कृषि पर निर्भर व्यक्तियों से परिवारों और समूहों से जुड़े पवित्र स्थलों, इमारतों और स्तूपों ने भौगोलिक एकता को सांस्कृतिक आयाम दिया है।

पारम्परिक रूप से भारत में सभी धार्मिक समुदाय आपसी सद्भाव से रहते आये हैं। सभी धर्मों के आध्यात्मिक पक्ष में बहुत समानता है। भारत में न केवल धार्मिक सद्भाव रहा है बल्कि कुछ धार्मिक स्थलों का स्वरूप धीरे-धीरे सभी धर्मों के मानने वाले लोगों के लिए श्रद्धा और उपासना का माध्यम रहा है। धार्मिक उत्सवों में सभी समुदायों के लोग उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। भक्ति और उपासना के क्षेत्र में हिन्दू संतों और मुस्लिम सूफी-संतों के बीच बहुत समानता रही है। जब लोग धर्म की आत्मा को भूलकर धर्म के बाहरी स्वरूप और अंधविश्वास को असली धर्म समझने की भूल करने लगते हैं तो साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न हो जाते हैं। भोले-भाले धार्मिक लोगों की भावनाओं का शोषण किया जाता है।

भारतीय संस्कृति में विविधता होते हुए भी एकता के तत्व विद्यमान हैं। शक्तिशाली साम्राज्यों ने भारत में सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता की रक्षा की। मध्यकाल में विभिन्न सम्प्रदायों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान से एक सांझी विरासत मजबूत हुई है। सभी समुदायों ने अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान भी बनाए रखी है। भारत में एकता स्थापित करने में यहाँ पाये जाने वाले धर्म, दर्शन, कला और साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। जाति और संयुक्त परिवार जैसी सामाजिक संस्थाएँ भारत के प्रत्येक क्षेत्र और कोने में लगभग सभी समुदायों में पाई जाती हैं। मंदिरों, राजमहलों के वास्तुशिल्प में कला और सांस्कृतिक विन्यास भी एक-दूसरे से प्रभावित हैं। इस देश की विशालता और यहाँ पाई जाने वाली विषमताओं और अनेकताओं के कारण भारत में अखिल भारतीय साम्राज्य स्थापित करना कठिन रहा है। अंग्रेजी शासन काल में भी लगभग 600 देशी रियासतें थीं जो परस्पर संगठित नहीं थीं। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत एक सर्वप्रभुत्व सम्पन्न इकाई के रूप में स्थापित है। स्वतंत्रता आन्दोलन ने भारत में एकता के सूत्र विकसित किए।

प्रश्न 2. भारत की एकता में भौगोलिक कारकों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर-भौगोलिक कारक (Geographical factors): भातीय संस्कृति में अनेक विविधताएँ पाई जाती हैं। भौगोलिक विविधता भी उनमें से एक है। भौगोलिक दृष्टि से भारत .

भिन्न-भिन्न खंडों और उपखंडों में बँटा हुआ है। यह उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम हजारों किलोमीटर तक फैला हुआ है। भारत का कुल क्षेत्रफल 3287263 वर्ग किलोमीटर है जो कि संसार का 2.42 प्रतिशत है। इसके तीन मुख्य भाग हैं : 1. हिमालय का विस्तृत पर्वतीय प्रदेश, 2. गंगा-सिन्धु का मैदान, 3. दक्षिणी पठारी भाग। सभी खंडों के निवासियों की भाषा, रहन-सहन, तौर-तरीके, वेशभूषा, संस्कृति और सामाजिक संगठन अलग-अलग हैं। भूमि, वर्षा, खान-पान आदि में भी विभिन्नता पाई जाती है।

भारत की भौगोलिक दशाओं ने निश्चित सीमाएँ प्रदान की हैं। भौगोलिक विविधता और अनेकरूपता ने भारतीय संस्कृति को अधिक प्रभावित किया है। भारत के उत्तर में स्थित हिमालय पर्वत भारत को एशिया के अन्य देशों से पृथक् करता है। दक्षिण के तीन ओर समुद्र है जिसके कारण इसकी सीमाएँ सुरक्षित हैं। प्राचीन काल से ही भारत पर अनेक आक्रमण होते रहे हैं, परन्तु भारत की भौगोलिक एकता और प्रादेशिक अखंडता को स्थायी रूप से भंग करने में आज तक कोई सफल नहीं हुआ है। भौगोलिक दृष्टि से भारत एक है।

विभिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्ति विभिन्न रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और अपनी-अपनी संस्कृति की रक्षा करते हैं। अपने-अपने रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। क्षेत्रीय विभिन्नता के कारण भारत में संस्कृति, भाषा, प्रदेश, धर्म, क्षेत्र आदि को लेकर वाद-विवाद उठाये जाते हैं। भारत को प्रकृति ने एक दुर्ग के समान बनाया है। उत्तर में विशाल और अजेय हिमालय, दक्षिण में हिन्द महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा बर्मा की पहाड़ियाँ और पश्चिम में अरब सागरं इसकी सीमाओं के रक्षक हैं। चारों ओर से प्राकृतिक सीमाओं से घिरा हुआ देश भारत अपनी संस्कृति की रक्षा करने में सफल रहा है। भौगोलिक परिस्थितियों ने क्षेत्रीय संस्कृतियों के विकास में योगदान दिया है। रीति-रिवाज, पूजा-पद्धति और सामाजिक संस्थाओं के विकास पर भी भौगोलिक कारकों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। भारत के विस्तृत भू-भाग ने जिसमें विविधता पाई जाती है, भारतीय लोगों को अनेकता और विभिन्नता को आसानी से स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति विकसित करने में सहायता की है। भौगोलिक एकता ने यहाँ के आर्थिक जीवन को प्रभावित किया है। भूमि की गुणवत्ता तथा कृषि भूमि की उपलब्धता ने पाँच हजार वर्षों से इस भूमि को कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित किया है। कृषि पर आधारित व्यक्तियों, परिवारों और समूहों में कुछ मौलिक समानताएँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 3. भारत में धार्मिक एकता के कारकों की व्याख्या कीजिए।

अथवा;

भारत में विभिन्न भाव (अर्थ) कौन-से हैं जिनमें धर्म निरपेक्षता या धर्म निरपेक्षतावाद को समझा जाता है?

(NCERT T.B.Q.9)

उत्तर-भारत एक ऐसा देश है जिसमें विविध धर्मों के मानने वाले लोग निवास करते हैं। 1991 की जनगणना के अनुसार हिन्दू समुदाय 82%, मुस्लिम 12.12%, ईसाई 2.34%, सिक्ख 1. 94%, बौद्ध 0.75%, जैन 0.4% तथा अन्य 0.44% हैं। जिनमें यहूदी, पारसी तथा जनजातियाँ सम्मिलित हैं। भारतीय समाज में धर्म से एकता और विविधता दोनों आती हैं। पारम्परिक रूप से भारत में सभी धर्म समुदाय आपसी सद्भाव से रहते आये हैं। सभी धर्मों के आध्यत्मिक पक्ष में बहुत समानता है। सभी धर्म नैतिकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। इसमें व्यक्तिगत उपासना और आचरण पर बहुत जोर दिया जाता है। इसके रीत धर्म के लौकिक पक्ष का संबंध समूह की पहचान और संगठन व्यवस्था से है। धार्मिव विश्वास और कर्मकांड के द्वारा सामाजिक व्यवस्था कायम रखना काफी उपयोगी होता है। कुछ धार्मिक स्थलों में सभी धर्मों के मानने वाले श्रद्धा के साथ जाते हैं और सेवा भाव दिखाते हैं।

हिन्दू संतों और सूफी सतों के बीच बहुत समानता देखने को मिलती है। विभिन्न उत्सवों में सभी धर्मों की साझेदारी देखने को मिलती है। कबीर दास, अकबर, दारा शिकोह और महात्मा

गांधी ने आपसी सद्भाव को बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है। रामानन्द और कबीर जैसे संतों ने हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों की अच्छी बातों की सराहना की और समाज में फैली हुई कुरीतियों को दूर करने का प्रयत्न किया। मुसलमानों ने हिन्दू जाति प्रथा को ग्रहण किया और हिन्दुओं ने पर्दा प्रथा को अपनाया।

धर्म का दुरुपयोग भी किया गया है। आपसी संघर्ष को बढ़ाने में धर्म की भूमिका प्रमुख रही है। भारत और पाकिस्तान का बँटवारा, समय-समय पर साम्प्रदायिक दंगे, परस्पर घृणा और हिंसा, धर्म का दुरुपयोग है। अज्ञान के साथ जब सोची-समझी शरारत होती है तो भोले-भाले धार्मिक लोगों की भावनाओं को भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे कराये जाते हैं। इससे समाज बिखरता है, परस्पर सद्भाव कम होता है और अशांति के वातावरण में देश प्रगति नहीं कर पाता।

आपस में चाहे, जितने भी मतभेद हों परंतु सबके सामने भारतवासी एक ही हैं। प्रत्येक धर्म के अपने-अपने विश्वास, दर्शन, उपासना और पूजा-विधियाँ अलग-अलग हैं परन्तु सभी धर्मों को मानने वाले लोग भारत-भूमि में निवास करते हैं। भारत की धार्मिक एकता का यह अच्छा उदाहरणं है। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया गया। भारत में विद्यमान धर्मों के भिन्न मूलभूत सिद्धांत हैं। सभी धर्मों के लोग एक दूसरे के धार्मिक ग्रन्थों का आदर करते हैं। मन्दिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे देश में चारों ओर फैले हुए हैं। यह भारत की धार्मिक एकता का एक अच्छा उदाहरण है।

प्रश्न 4. भाषा किस प्रकार एकता का एक स्रोत है ?

उत्तर-भारत एक ऐसा देश है जिसमें विभिन्न भाषाएँ और उपभाषाएँ हैं। भारतीय संविधान में 18 भाषाओं की चर्चा की गई है। सभी महत्वपूर्ण भाषाओं की कई क्षेत्रीय उपभाषाएँ हैं और बोलियाँ हैं। हिन्दी देश में पढ़ी और बोली जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण भाषा है जिसमें अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगधी, बुन्देली पहाड़ी, मैथिली जैसी कई उपभाषाएँ हैं। भाषाविदों ने भारत में 179 भाषाएँ और 544 बोलियों की पहचान की है। इन भाषाओं को तीन भाषा परिवारों इंडो-आर्यन, द्रविडियन तथा मुंडारी में बाँटा गया है। इंडो-आर्यन भाषा परिवार के अंतर्गत संस्कृत तथा अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं जैसे हिन्दी, बंगाली, उड़िया, मराठी, गुजराती, पंजाबी और इनकी बोलियाँ आती हैं। द्रविडियन भाषा परिवार में तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम आती हैं। मुंडारी भाषा समूह में जनजातीय समुदायों की बोलियाँ शामिल की जाती हैं।

भारत में मध्यकाल में फारसी, अरबी और उर्दू जैसी भाषाएँ लोकप्रिय हुई। हिन्दुस्तानी भाषा के रूप में हिन्दी और उर्दू का विकास साथ-साथ ही हुआ। इन दोनों की लिपियों में अन्तर है। हिन्दी पर संस्कृत का प्रभाव है और उर्दू पर अरबी और फारसी का। मध्यकाल में अरबी-फारसी राजदरबार की भाषा थी। आधुनिक काल में अंग्रेजी ने राजकाज की भाषा का रूप ग्रहण किया हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ परन्तु केन्द्रीय सरकार और न्यायालयों की भाषा अभी भी अंग्रेजी ही बनी हुई है। उच्च शिक्षा और शोध की भाषा अभी भी अंग्रेजी ही बनी हुई है। अंग्रेजी का प्रभाव भारतीय भाषाओं और साहित्य पर बहुत अधिक पड़ा है। अंग्रेजी बोलने वाला वर्ग प्रभावशाली हो गया है और न बोलने वाला सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा ही रह गया है।

भारतीय संस्कृति की एकता में भाषाओं का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। यद्यपि भाषाएँ अलग-अलग हैं परन्तु विचारों और विषयों की दृष्टि से इसमें एकरूपता देखने को मिलती है। कभी-कभी भाषाई विविधता संघर्ष और मतभेद का कारण भी बन जाती है और अलगाववादी प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं। सरकारी भाषा को मान्यता के मामले में मत र उभर कर सामने आये। भाषा के आधार पर प्रदेशों के पुनर्गठन का मामला, कभी-कभी राजनीतिक मतभेदों का कारण बन जाते हैं। सरकार ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया लेकिन अंग्रेजी का उपयोग जारी रखने का निश्चय किया ग1 1965 में अंग्रेजी को अतिरिक्त सहायक सरकारी भाषा के रूप

में केन्द्र सरकार और विभिन्न प्रदेश सरकारों के बीच काम-काज की भाषा के रूप में मान्यता दे दी गई। अतः अंग्रेजी का प्रभाव और आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है।

प्रश्न 5. परंपरागत भारत में एकता के तत्वों की विवेचना कीजिए।

उत्तर-भारत में भौगोलिक एकता और सांस्कृतिक-आर्थिक क्रियाओं में गतिशीलता के कारण विभिन्न क्षेत्रों के बीच कुछ ऐसे तत्वों का विकास हुआ जो भारत की अपनी विशेषता को प्रकट करते हैं।

  1. भारतीय परम्परा में मार्गी या शास्त्रीय संस्कृति की धारणा विकसित हुई। देशी संस्कृति एक विशेष क्षेत्र तक सीमित रही और मार्गी संस्कृति का विकास करने में संस्कृत, प्राकृत, पाली और तमिल का प्रमुख स्थान है।
  2. संस्कृत और ब्राह्मी लिपि भाषा, साहित्य और संवाद का माध्यम बनी।
  3. प्रत्येक भाषा क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करने वाली जातियाँ थीं। ग्रामीण क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण स्थान था। शहरी क्षेत्रों में उद्योग-व्यवसाय प्रचलित थे। यहाँ व्यापारी, शिल्पकार और अन्य जातियों के लोग निवास करते थे।
  4. प्रशासन और रक्षा संस्थानों में गतिशीलता पाई जाती थी। संगीत और नृत्य के घरानों में गुरु-शिष्य परम्परा का प्रचलन था। चिकित्सा, उच्च शिक्षा, धार्मिक पीठ और उपासना, सम्प्रदायों के अखाड़ों का चरित्र अखिल भारतीय मानदंडों से नियंत्रित होता रहा है।
  5. तीर्थयात्रा केन्द्रों ने भी अखिल भारतीय स्तर पर एकता बढ़ाने में सहायता की है। 6. आध्यात्मिक और कर्मफल के आधार पर सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी जाती थी। 7. अखिल भारतीय स्तर के महाकाव्यों का रूपांतरण भारत के प्रत्येक भाग में किया गया।
  6. पुरुषार्थ की भावना, ऋण, दान, व्रत, प्रायश्चित, जन्म-मृत्यु और विवाह के अवसर पर संस्कारों की विधि का स्वरूप अखिल भारतीय रहा है।
  7. पारम्परिक उत्तराधिकारी कानून और अन्य सामाजिक रीति-रिवाज और परम्पराओं में अखिल भारतीय स्तर पर समानता देखने को मिलती है।
  8. अधिकांश भारतीय स्वर्ग-नर्क की अवधारणा में विश्वास करता हैं और मुक्ति तभी हो सकती है जबकि इच्छाओं का अंत हो जाता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि संपूर्ण भारत में परम्परागत एकता के सूत्र समान हैं जो कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक एकता को स्पष्ट करते हैं।

प्रश्न 6. आधुनिक भारत में एकता के तत्वों की विवेचना कीजिए।

उत्तर-भारत में लम्बे समय तक औपनिवेशिक शासन रहा है। देश के विभिन्न भागों पर अंग्रेज, पुर्तगाली, फ्रांसीसी कब्जा जमाए बैठे थे। भारतीय सभ्यता के एकता के सूत्र औपनिवेशिक शासन काल में कमजोर पड़ते गये। आधुनिक शिक्षण प्रणाली के प्रसार से भारतीय संस्कृति पर पश्चिमीकरण कर प्रभाव बढ़ने लगा। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) ने भारतीय समाज में एकता के नये स्रोत विकसित किए। भारत के सभी धर्मों के मानने वाले लोगों ने मिलकर विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की भावना की भूमिका धर्म और संस्कृति की तुलना में ज्यादा प्रमुख होती गई। स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संविधान ने भारत की एकता को बढ़ाने के लिए उसे समानता, भ्रातृत्व, पंथ निरपेक्षता और न्याय जैसे मूल्यों के साथ जोड़ दिया। आधुनिक भारत में एकता के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं :

  1. भारतीय संविधान : संविधान भारत में एकता का सबसे मौलिक स्रोत है। भारतीय इसकी रूपरेखा को एकता का आधार मानते हैं।
  2. भारतीय संसद : यह भारतीय राष्ट्र की वह इकाई है जो राष्ट्रीय स्तर पर कानून का निर्माण करती है। इसके प्रतिनिधियों का चुनाव आम जनमत के द्वारा किया जाता है। यह लोगों की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है।
  3. भारत में सर्वोच्च पद राष्ट्रपति का है जो प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद की सलाह से शासन चलाते हैं।
  4. न्यायपालिका इस देश की जनता को कानूनी संरक्षण देती है। यह भारतीय संविधान की परिरक्षक है। –
  5. नौकरशाही, पुलिस तथा अन्य प्रशिक्षित व्यवसायों के लोग जैसे इंजीनियर, वैज्ञानिक, चिकित्सक, शिक्षक, पत्रकार, सैनिक आदि इस देश की एकता के लिए निरन्तर प्रयत्न करते हैं।
  6. जनसंचार के साधन : जनसंचार के साधनों जैसे रेल, सड़क, वायुयान, जलयान, डाकघर, पत्र-पत्रिकाएँ, रेडियो, टेलीविजन आदि ने राष्ट्रीयता की भावना को फैलाने का कार्य किया है।
  7. औद्योगीकरण-शहरीकरण : इन कारकों ने देश में मध्य वर्ग को जन्म दिया है। सेवा क्षेत्र का तेजी से विकास हुआ है जिसने राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रश्न 7. भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ाने हेतु कौन से निर्णय लिए गए हैं?

उत्तर-स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ाने के लिए सरकार ने विभिन्न प्रकार के कार्य किए हैं। अल्पसंख्यक धार्मिक समूह, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति और अन्य पिछड़े वर्ग की मांगों के निराकरण का प्रयास भारतीय संविधान में किया गया। भाषा के आधार पर प्रदेशों का पुनर्गठन किया गया।

सरकार ने पारम्परिक रूप से वंचित और शोषित वर्गों की भलाई के लिए आरक्षण की नीति अपनाई। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए एक विस्तृत राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ाने के लिए टेलीविजन, समाचार-पत्रों, पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

प्रश्न 8. क्षेत्रीय विभिन्नताओं का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव समझाइये।

उत्तर-भारत एक विशाल देश है, इसकी भूमि चार भागों में बंटी हुई है : विस्तृत हिमालय प्रदेश, सिन्धु और गंगा का मैदान, रेगिस्तानी क्षेत्र और दक्षिणी प्रायद्वीप।

हिमालय पर्वत भारत के उत्तर में स्थित है। इस पर्वतीय क्षेत्र में कश्मीर घाटी, सिक्किम, भूटान, गढ़वाल, कुमायूँ और उत्तर पूर्व के क्षेत्र सम्मिलित हैं। यह पर्वतीय दीवार 2400 किलोमीटर लम्बी है।

सिन्धु और गंगा के मैदान में अनेक छोटी-बड़ी नदियाँ बहती हैं और वे इस क्षेत्र का उपजाऊ बनाती हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा के भू-भाग इस क्षेत्र में स्थित हैं। यह क्षेत्र 2400 किमी. लम्बा और 250 किलोमीटर चौड़ा है।

रेगिस्तानी क्षेत्र राजस्थान में है। यह क्षेत्र कच्छ के रन के पास से उत्तर की ओर लूणी नदी तक फैला हुआ है।

दक्षिणी प्रायद्वीप का क्षेत्र 460 से 1220 मीटर तक ऊँचाई वाला क्षेत्र है। विन्ध्याचल पर्वत उत्तर और दक्षिण भारत को अलग करता है। इस क्षेत्र में नर्मदा, ताप्ती, महानदी, गोदावरी आदि नदियाँ बहती हैं। भारत के पश्चिम और पूर्व में समुद्र है इसलिए समुद्री किनारे का क्षेत्र पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट कहलाता है।

भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में जलवायु की विभिन्नता पाई जाती है। यहाँ जलवायु की विभिन्नता तो है ही, साथ ही वनस्पति और खान-पान और रहन-सहन के तरीके भी भिन्न-भिन्न हैं। क्षेत्रीय विभिन्नता के कारण भारत के विभिन्न भागों में जनसंख्या का घनत्व समान नहीं है। मैदानी भागों में जनसंख्या का घनत्व पहाड़ी प्रदेशों और रेगिस्तानों की अपेक्षा अधिक है। व्यवसाय भी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार ही पनपते हैं। समुद्री किनारों पर मछली पकड़ना, रेगिस्तान में खजूर पैदा करना और पहाड़ों पर जड़ी-बूटी का व्यवसाय इसी विभिन्नता के कारण है। क्षेत्रीय विभिन्नताओं ने लोगों के शारीरिक लक्षणों को भी प्रभावित किया है।

भारतीय संस्कृति पर क्षेत्रीय विभिन्नताओं का प्रभाव : भारतीय विभिन्नताओं ने भारतीय संस्कृति को अनेक प्रकार से प्रभावित किया है :

  1. देश की सुरक्षा : तीन ओर समुद्र होने और उत्तर की ओर हिमालय पर्वत के कारण बहुत समय तक भारतीय सीमाओं की सुरक्षा बनी रही।
  2. संस्कृति की रक्षा : विभिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्ति विभिन्न रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और अपनी संस्कृति की रक्षा करते हैं। 2. 3. सामाजिक समस्याएँ : क्षेत्रीय विभिन्नताओं के कारण भारत में संस्कृति, भाषा, धर्म, प्रदेश, क्षेत्र आदि के विषय को लेकर कभी-कभी विवाद उठ खड़े होते हैं। कभी-कभी क्षेत्रीय भावना के कारण एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र की संस्कृति की उपेक्षा करने लगते हैं।

क्षेत्रीय विभिन्नताओं के कारण देश में राष्ट्रीयता की भावना का विकास नहीं हो पाया है। आज भी भाषावाद, नदियों के जल का बंटवारा जैसी समस्याएं भारत में प्रजातंत्र के विकास में बाधा पहुँचा रही हैं।

प्रश्न 9. भारतीय जाति प्रथा की मुख्य विशेषताएँ बताइए। लोकतंत्र पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है ?

उत्तर-जातिवाद भारतीय समाज की एक बहुत बड़ी बुराई है। इसका जन्म प्राचीनकाल की वर्ण व्यवस्था से लिया जा सकता है। प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर बनायी गयी थी, परन्तु धीरे-धीरे इसका आधार कर्म के स्थान पर जन्म ने ले लिया और फिर वर्ण व्यवस्था जाति प्रथा में परिवर्तित होती गयी। इसका सबसे भयंकर परिणाम छुआछूत के रूप में हुआ। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद तथा महात्मा गांधी ने ऊँच-नीच के भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया परन्तु यह अभी तक समाज में विद्यमान है। वोट बैंक की राजनीति ने तो इसको और भी दूषित बना दिया है। भारतीय राजनीति आज की जाति प्रथा से अत्यधिक प्रभावित है।

समाज पर जातिवाद का प्रभाव (Impact of Casteism on Society): भारतीय समाज पर जाति प्रथा के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन निम्न प्रकार है

  1. समाज के विकास आदि की योजनाएं जातिगत आधार पर बनाई जाने लगी हैं। •
  2. दुर्बल वर्ग के शैक्षिक और आर्थिक हितों की वृद्धि के लिए विधानमंडल, नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
  3. जातीय विद्वेष के कारण समाज में उग्रता व हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ गई है। असामाजिक तत्वों की सहायता से ताकतवर लोग विशेषकर ग्रामीण इलाकों में अपनी-अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं।
  4. चुनाव गठबन्धनों में पिछड़ी जातियों को भी शामिल किया जाता है। इसका एक लाभ यह हुआ कि इन जातियों में भी स्वाभिमान जागा और उनको भी राजनीतिक लाभ मिलने लगा।
  5. समाज में राजनीतिक नेतृत्व का निर्णय जाति के आधार पर निश्चित किया जाता है। मंत्रिमंडलों का गठन और राजकीय पदों का वितरण जातीयता के आधार पर किया जाता है।

जातिवाद की भावना को समाप्त करने के उपाय (Methods to remove the feelings of Casteism):

  1. जातिवाद के विरुद्ध जनमत तैयार किया जाना चाहिए।
  2. सभी राजनैतिक दलों को यह निर्णय करना चाहिए कि वे जातिवाद को प्रोत्साहन नहीं देंगे।
  3. जातीय आधार पर सरकार द्वारा दी जाने वाली सभी सुविधाएँ तुरन्त समाप्त कर दी जानी. चाहिए।
  4. सरकार को जातिवाद के विरुद्ध कानून बनाकर जातिवाद पर आधारित राजनीतिक दलों को समाप्त कर देना चाहिए।

प्रश्न 10. साम्प्रदायिकता की समस्या लगातार क्यों बनी हुई है ? भारत में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता से कैसे निपटा जा सकता है

[B.M.2009 A]

 

अथवा,

भारत में साम्प्रदायिकता के उदय और विकास के कारक एवं कारणों का वर्णन कीजिए।

.                                                                                               अथवा,

सम्प्रदायवाद या साम्प्रदायिकता क्या है ?

(NCERT T.B.Q.8)

उत्तर-संक्षेप में साम्प्रदायिकता का अर्थ है-अपना धर्म मानने वालों को अपना मित्र तथा अन्य धर्म और सम्प्रदाय मानने वालों को अपना शत्रु समझना। भारत में बहुत लम्बे समय से विभिन्न धर्मों के अनुयायी साथ-साथ रहते हैं परन्तु कालान्तर में भारतीय समाज में अनेक कुरीतियों व बुराइयों के साथ धार्मिक कट्टरता ने भी जन्म लिया जिसके परिणामस्वरूप धार्मिक क्षेत्र में व्याप्त आपसी सहिष्णुता समाप्त हो गई और समय-समय पर साम्प्रदायिक दंगे होने लगे जिनसे समाज की शान्ति भंग होने लगी। दो सम्प्रदाय अपने असहिष्णु व्यवहार के कारण झगड़ने लगे। शिया-सुन्नी का संघर्ष, अकालियों व निरंकारियों का संघर्ष, सनातनी और आर्य समाजियों की रस्साकसी इसी के प्रमुख उदाहरण हैं।

भारत में साम्प्रदायिकता के प्रमुख कारण (Main reasons of communalism in India):

  1. कट्टरपंथी धर्म व संप्रदायों का उदय (Emergence of funatism of religion and cults) : भारत में विभिन्न कालों व परिस्थितियों में अनेक गुरु व धर्म प्रचारक हुए जिन्होंने भगवत प्राप्ति के लिए नए मार्गों का अवलम्बन किया। उनके अनुयायियों ने उसे नया पंथ स्वीकार किया। धीरे-धीरे समाज में अनेक शक्तिशाली सम्प्रदाय बन गए जो धार्मिक कट्टरता को अपने सम्प्रदाय के संगठन का आधार मान कर अपने अनुयायियों को एक विशिष्ट प्रकार से जीवन व्यतीत करने का आग्रह करने लगे। इस कारण साम्प्रदायिक दंगे होने लगे।
  2. विभिन्न सम्प्रदायों की आपसी असहिष्णुता के विचार (The views of mutual intolerance of the different religious cults): भारत में बहुत से धार्मिक सम्प्रदाय विद्यमान हैं। विभिन्न सम्प्रदायों के लोग एक विशिष्ट प्रकार से जीवन व्यतीत करते हैं और उनके विचार भी अलग-अलग हैं। समय-समय पर विभिन्न सम्प्रदायों में जब आपसी सहिष्णुता नहीं रहती तो उनमें साम्प्रदायिक दंगे होने लगते हैं।
  3. लोगों की अशिक्षा और अज्ञानता (Illiteracy and ignorance of the people): भारत में साम्प्रदायिक दंगों का एक मुख्य कारण यह है कि अधिकतर लोग अशिक्षित व अज्ञानी हैं। अशिक्षित होने के कारण नागरिकों में उचित गुणों का विकास नहीं हो पाता। अशिक्षित व्यक्तियों में आत्मविश्वास की कमी होती है और वे स्वयं निर्णय नहीं ले सकते। इसलिए ये लोग अपने-अपने नेता के कहने पर दूसरे सम्प्रदाय वालों को हर प्रकार से हानि पहुंचाने की कोशिश करते हैं। परिणामस्वरूप साम्प्रदायिक दंगे भड़कते हैं तथा बहुत से निर्दोष व्यक्ति अपनी जान गंवा बैठते हैं।

भारत में साम्प्रदायिकता रोकने के उपाय (Methods to curb communalism in India): भारत में साम्प्रदायिकता बहुत तेजी से फैल रही है। इसे रोकने के अनेक उपाय हैं जिनमें से निम्नलिखित का उल्लेख किया जा सकता है:

  1. ऐसे राजनीतिक दलों की मान्यता समाप्त कर दी जाए जो साम्प्रदायिकता का प्रचार करते हैं।
  2. ऐसे पुलिस कर्मचारियों को दंड दिया जाना चाहिए जो साम्प्रदायिक दंगों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दोषी पाए जाते हैं।
  3. विद्यालयों की शिक्षण सामग्री में साम्प्रदायिक अभिमुखी तत्वों का उन्मूलन किया जाना चाहिए।
  4. दूरदर्शन व आकाशवाणी पर साम्प्रदायिक विचारों के प्रसारण पर रोक लगाई जानी चाहिए।
  5. समाचार पत्रों इत्यादि में ऐसे विचारों तथा समाचारों को प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए जिनसें साम्प्रदायिक विद्वेष फैलने की सम्भावना हो।

प्रश्न 11. क्षेत्रवाद क्या होता है ? आम तौर पर यह किन कारकों पर आधारित होता

B.M.2009A]

उत्तर-क्षेत्रवाद (Regionalism): क्षेत्रवाद किसी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के नागरिकों की एक संकुचित धारणा है जिसके कारण किसी क्षेत्र विशेष के व्यक्ति राष्ट्र की तुलना में अपने ही क्षेत्र के हितों और स्वार्थों की पूर्ति की मांग करने लगते हैं। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश के सभी क्षेत्रों का विकास संतुलित रूप से नहीं हो पाया जिसके कारण क्षेत्रीय भावनाओं को बल मिला और क्षेत्रवाद का उदय हुआ। स्वतंत्र कश्मीर, खालिस्तान, पृथक् नागालैण्ड आदि की मांग उठने लगी। दक्षिण भारत में भी भाषा एवं अन्य कारणों से पृथक् राज्यों की मांग उठने लगी। प्रारम्भ में द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) पार्टी ने भारत से पृथक होने की धमकी देना शुरू किया। 1963 में भारत सरकार ने कानून को पास करके विघटनकारी शक्तियों को नियंत्रित किया। इससे द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने संघ से अलग होने की माँग छोड़ दी परन्तु राज्य के लिए अधिक अधिकारों की मांग की। इसी प्रकार अकाली दल ने 1950 से 1960 तक पंजाबी सूबे की मांग की जाने लगी। 1983 से 1992 तक उग्रवादियों द्वारा हिंसक कार्यवाही की जाती रही। असम राज्य के मिजो पहाड़ी नेता भारत संघ से अलग होने की मांग कर रहे हैं। क्षेत्रवाद के कारण समय-समय पर भाषां के आधार पर भी राज्य की मांग की जाती रही है। 1953 में भाषा के आधार पर आन्ध्र प्रदेश की स्थापना हुई। 1956 में भाषा के आधार पर 19 राज्यों का गठन हुआ और बाद में कई राज्यों की स्थापना की गई।

क्षेत्रीय असंतुलन क्षेत्रवाद का कारण : (Regional imbalance is responsible for regionalism): क्षेत्रीय असंतुलन ही क्षेत्रवाद का सबसे बड़ा कारण है। देश का कोई भाग उपजाऊ है तो कोई पथरीला, कोई रेगिस्तानी है तो कोई पहाड़ी। देश के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं। क्षेत्र के असंतुलन से क्षेत्र के लोगों में असंतोष पैदा होते हैं। क्षेत्रीय असंतुलन के कारण ही क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जन्म होता है और वे राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा क्षेत्रीय हितों की पूर्ति की मांग करने लगते हैं। असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड आदि देश के कुछ ऐसे भाग हैं जहाँ आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं हुआ। सीमाओं और नदी जल बँटवारे के कारण भी वैमनस्य पैदा होता है और इस प्रकार क्षेत्रीय असन्तुलन क्षेत्रवाद को बढ़ावा देता है।

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