11- psychology

Bihar board solutions for class 11th psychology chapter 4

Bihar board solutions for class 11th psychology chapter 4

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मानव विकास
                                                    [Human Development]
                                                          पाठ के आधार-बिन्दु
● विकास, गतिशील, क्रमबद्ध तथा पूर्व कथनीय परिवर्तनों का प्रारूप है।
● विकास जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है ।
● विकास अत्यधिक लचीला या संशोधन योग्य होता है।
● विकास अनेक शैक्षणिक विद्यालयों के लिए एक सरोकार है।
● परिपक्वता उन परिवर्तनों को इंगित करता है जो एक निश्चित क्रम का अनुसरण
    करता है।
● आनुवंशिकता विशेषताओं को हस्तांतरण करने की प्रक्रिया है।
● विकास सदैव एक विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में सन्निहित होता है ।
● गर्भाधान से लेकर जन्म तक की अवधि को प्रसव पूर्व काल कहा जाता है ।
● ग्यारह वर्ष की उम्र से लेकर तेरह वर्ष तक की उम्र वाले बच्चे को तरुण कहा जाता है।
● प्रौढ़ावस्था के बाद वृद्धावस्था का आ जाना माना जाता है।
● नवजात शिशु सामान्य हाव-भाव का अनुकरण कर सकता है ।
● 2-7 वर्ष की आयु के बच्चों में प्रतीकात्मक विचार विकसित होते हैं।
● जीवन का प्रथम वर्ष आसक्ति के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण समय होता है।
● जिस सर्वाधिक शक्तिशाली भूमिका में लोगों का समाजीकरण हुआ है वह है लिंग
   भूमिका ।
● बच्चे के विकास का एक प्रमुख पक्ष है मानवीय क्रियाओं के सही या गलत होने
    के मध्य अंतर करना सीखना ।
● किशोरावस्था में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के परिवर्तन को विकास का
    आधार माना जाता है।
● किशोर के विचार अधिक अमूर्त, तर्कपूर्ण एवं आदर्शवादी होते हैं।
● किशोरों की पहचान निर्माण का एक प्रमुख कारक व्यावसायिक प्रतिबद्धता भी है।
● सभी प्रौढ़ प्रज्ञा नहीं होते हैं ।
● वृद्धावस्था में शक्तिहीनता, अनुभव एवं स्वास्थ्य, वित्तीय संपत्तियों का क्षीण होना,
    असुरक्षा एवं निर्भरता को जन्म देता है।
                                          पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर
Q. 1. विकास किसे कहते हैं ? यह संवृद्धि तथा परिपक्वता से किस प्रकार
भिन्न है?
Ans. विकास का अर्थ-विकास जैविक संज्ञानात्मक तथा समाज सांवेगिक प्रक्रियाओं की
परस्पर क्रिया प्रभावित होने वाली वैसी दशा है जो प्रगतिशील परिवर्तनों के अन्तर्गत गतिशील,
क्रमबद्ध तथा पूर्वकथनीय परिवर्तनों का प्रारूप होता है तथा जो प्रक्रिया गर्भाधान से प्रारम्भ होता
है तथा जीवन पर्यन्त चलता रहता है और परिपक्वता की ओर निर्देशित रहता है।
विकास की विशेषताएँ-(i) विकास जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है जो परिपक्वता प्राप्ति
की ओर निर्देशित रहता है ।
(ii) विकास सम्बन्धी विभिन्न प्रक्रियाएँ (जैविक, संज्ञानात्मक समाज-संवेगात्मक) किसी।
व्यक्ति के विकास में एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित रहते हैं।
(iii) विकास बहु-दिश है अर्थात् विकास के एक आयाम का कुछ अन्य आयामों में वृद्धि
या ह्रास का प्रदर्शन किया जा सकता है।
(iv) विकास अत्यधिक लचीला या संशोधन योग्य होता है।
(v) विकास ऐतिहासिक दशाओं से प्रभावित होते हैं।
(vi) विकास, अनेक शैक्षणिक विधाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण सरोकार है ।
(vii) सकारात्मक घटनाएँ और प्रकट की गई अनुक्रिया से विकास प्रभावित हो सकता है।
विकास को प्रभावित करने वाले कारक-शारीरिक लक्षण, बुद्धि, अधिगम योग्यता,
स्मृति, मानसिक लक्षण, आनुवंशिकता, आनुवंशिक कूट, प्रपंच परिवेश या पर्यावरण आदि को
विकास से संबंधित कारक मान सकते हैं । अर्थात् माता-पिता से प्राप्त जीव के अनुकूल परिवेश
मिलने पर अच्छे विकास की संभावना बढ़ जाती है।
जीवन भर निरन्तर होने वाले विविध परिवर्तनों के रूप में विकास-क्रम चलता रहता है।
विकास बहुदिश के साथ-साथ बहुआयामी भी माना जाता है । लोग किसी व्यक्ति के विकास
का आधार अलग-अलग दृष्टिकोण को मानते हैं। कोई कद की लम्बाई के बढ़ जाने को विकास
मानता है तो कोई मोटापा को । कोई वर्ग-संख्या को तो कोई लब्धांक को विकास कहता है।
बैंक में लॉकरों की संख्या बढ़ा देने पर लोग समझते हैं कि वह अब विकास कर रहा है। कोई
अतिथि सत्कार को महान मानता है तो उसे मानसिक रूप से विकसित माना जाता है।
विकास-क्रम में विविध स्थितियाँ आती हैं जिनसें से दो प्रमुख स्थितियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण हैं-
(i) संवृद्धि और (ii) परिपक्वता ।
(i) संवृद्धि -शारीरिक अंगों अथवा सम्पूर्ण जीव की बढ़ोतरी को संवृद्धि कहा जाता है।
संवृद्धि का मापना अथवा मात्राकरण किया जा सकता है। उदाहरणार्थ कोई व्यक्ति कितना लम्बा
हो गया, या कितना भारी हो गया? इन प्रश्नों के उत्तर मीटर या किलोग्राम में दिये जा सकते
हैं । संवृद्धि विकास का मात्र एक पक्ष है।
(ii) परिपक्वता-परिपक्वता शारीरिक एवं मानसिक विकास का कारण माना जाता है
अतः परिपक्वता उन परिवर्तनों को इंगित करता है जो एक निर्धारित क्रम का अनुसरण करते हैं
तथा प्रधानतः उस आनुवंशिक रूपरेखा से सुनिश्चित होते हैं जो हमारी संवृद्धि एवं विकास में
समानता उत्पन्न करते हैं । अर्थात् मनुष्य के अन्दर उत्पन्न उन विशेषताओं से संबंधित परिवर्तन
को परिपक्वता मानते हैं जो माता-पिता एवं अन्य पूर्वजों से ग्रहण किये जाते हैं । चेहरे पर एकाएक
दाढ़ी मूंँछ का उग जाना, आवाज में भारीपन का अनुभव होना, बच्चों का दौड़ना, खड़ा हो जाना
आदि परिपक्वता के उदाहरण हैं।
इस प्रकार माना जा सकता है कि विकास एक लम्बी प्रक्रिया है तथा संवृद्धि और परिपक्वता
उस विकास क्रम के दो निश्चित पड़ाव मात्र है । विकास से अनेक
कायिक-मानसिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों का बोध होता है जबकि संवृद्धि और परिपक्वता
विकास संबंधी दो लक्षण मात्र हैं । संवृद्धि और परिपक्वता को विकास क्रम से जोड़ा जा सकता
है, लेकिन सभी विकास क्रम के साथ इन दोनों पदों की व्याख्या करना आवश्यक नहीं होता है।
Q.2. विकास के जीवनपर्यंत परिप्रेक्ष्य की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Ans. मानव जीवन भर धनात्मक या ऋणात्मक परिवर्तन के अधीन जीता है। परिवर्तन
की एक नियत दिशा होती है तथा मानव विकास कुछ विशिष्ट विशेषताओं के साथ मानव को
प्रभावित करते रहता है। विकास के जीवनपर्यंत परिप्रेक्ष्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्न वर्णित हैं-
(i) विकास एक नियत प्रणाली का अनुसरण करता है-मानव का विकास मनचाहे ढंग
से नहीं होता है बल्कि विकास नियमित और सुव्यवस्थित प्रणाली के आधार पर परिवर्तन लाता
है। आदमी किस उम्र में चलना प्रारम्भ करेगा, कब वह पढ़ने जायेगा, यह लगभग पूर्व निर्धारित
अवधि के अनुसार परिवर्तन के रूप में देखा जाता है । यहाँ तक कि अब विकास से संबंधित
ऊँचाई-उम्र, मानसिक दशा, सामाजिक विकास-उम्र इत्यादि की भविष्यवाणी की जा सकती है।
(ii) विकास जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है-गर्भाधान से वृद्धावस्था एक सभी स्तरों
पर कुछ-न-कुछ परिवर्तन होते ही रहते हैं चाहे उससे लाभ मिले या हानि, कभी घुटने के बल
खिसकने वाला बच्चा लम्बी दौड़ में प्रथम स्थान पाता है तो कभी गन्ना चुसने वाला युवक दाँत
गंवाकर खाने के लिए मजबूर हो जाता है । अर्थात् सम्पूर्ण जीवन-विस्तार में गत्यात्मक विधियों
से होनेवाला परिवर्तन मानव व्यवहार और क्षमता को प्रभावित करते रहता है ।
(iii) विकास-प्रक्रमों में पारस्परिक संबंध होते हैं-जन्म से मृत्यु के बीच मनुष्य जीने के
क्रम से जैविक, संज्ञानात्मक तथा समाज-सवेगात्मक परिवर्तन से जूझता रहता है । इन विभिन्न
प्रक्रियाओं के प्रभाव और परिणाम में भिन्नता अवश्य होती है लेकिन विकास क्रय में ये हानिप्रद
रूप से संबंधित रहते हैं । एक व्यक्ति से मित्रता बढ़ाने से हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति नाराज
हो जाए । टहलने से स्वास्थ्य-लाभ मिलता है । लेकिन समय की क्षति होने से पूर्व निर्धारित काम
अधूरा रह जा सकता है जो कर्मठता को अविश्वसनीय स्थिति में ला देता है।
(iv) विकास बहुदिश अथवा बहुआयामी होता है-विकास क्रम में होने वाला कोई एक
परिवर्तन मानवीय क्रिया के एक घटक को लाभ पहुँचाता है तो यह भी संभावना रहती है कि कोई
दूसरा घटक क्षति की दशा में पहुँच जाए । एक की बुद्धि दूसरे घटक के हास का कारण बन
सकता है। उम्र से अनुभव बढ़ता है, लेकिन शारीरिक क्षमता कमी आ जाने से वह पहले की
तरह दौड़ नहीं सकता है । मानसिक वृद्धि और शारीरिक क्षमता में कमी दोनों साथ-साथ होने
वाले परिवर्तन हैं।
(v) विकास अत्यधिक लचीला या संशोधन के योग्य होता है-विकास क्रम में होने वाला
परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से मान्य नहीं भी हो सकता है। अत: एक व्यक्ति परिवर्तन
में वृद्धि चाहता है तो दूसरा उस परिवर्तन पर अंकुश लगा देना चाहता है। कुछ ऐसे परिवर्तन
होते हैं जो हमारी इच्छा के अनुसार अपना रूप या प्रभाव बदल सकते हैं। आज जो छात्र कम
अंक पाता है, स्वभाव से चोर है वही बालक अभ्यास और प्रयास करके आदर्श छात्र तथा इंसान
बनकर उपस्थित होता है । कला, कौशल, आदत, योग्यता आदि से संबंधित परिवर्तन को मानव
अपने अधीन रखकर वांछनीय संशोधन करके उसे लचीला होने का प्रयास जुटा लेता है।
(vi) विकास ऐतिहासिक दशाओं से प्रभावित होता है-विकास क्रम में होने वाला कोई
परिवर्तन जो पहले के जमाने में प्रशंसा पाता था वही परिवर्तन अप मजाक एवं हँसी का विषय
बन जाता है । पैर छूकर प्रणाम करने की प्रवृत्ति पहले जितना ही भला माना जाता था आधुनिक
काल में पिछाड़ापन का संकेत देता है। पूर्व में प्राप्त की गई उपाधि रोजगार का अवसर देने में
पूर्णत: सक्षम था लेकिन आज बड़ी-बड़ी उपाधि लेकर भी मनुष्य बेरोजगारी का शर्मीन्दगी झेल
रहा है। पहले के जमाने में 20 वर्ष का युवक जो अनुभव और योग्यता रखता था वह आज से
काफी अलग है।
(vii) विकास अनेक शैक्षणिक संस्थाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण सरोकार है-शिक्षण
संस्थाओं में मनोविज्ञान, मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, तंत्रिका विज्ञान के साथ-साथ अब यौन शिक्षा
की व्यवस्था किए जाने का अर्थ है कि जानकर लोग मानव विकास के पक्षधर हैं और वे चाहते
हैं कि मानव में इतनी क्षमता आ जाए कि वह किसी भी परिवर्तन को अपने अनुकूल बनाने की
क्षमता बना ले।
(viii) एक व्यक्ति परिस्थिति अथवा संदर्भ के आधार पर अनुक्रिया करता है-मानव
अपने जीवन में सदा विकास की आकांक्षा करता है । वह अवरोधक के प्रति असंतोय एवं क्षोभ
प्रकट करने के लिए स्वतंत्र होता है । इस संदर्भ के अंतर्गत वंशानुगत रूप से प्राप्त विशेषताएंँ
(भौतिक पर्यावरण, सामाजिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक) शामिल हो जाती हैं । जैसे
माता-पिता की मृत्यु, दुर्घटना, भूकम्प, बाढ़, प्राकृतिक आपदा आदि हमारी खुशी और शान्ति को
छीन लेते हैं तो दूसरी ओर सफलता, जीत, पुरस्कार, नौकरी आदि हमारी प्रकृति में उत्साह का
संचार कर देता है । अतः नकारात्मक और सकारात्मक परिवर्तन हमारे विकास को प्रभावित करते
हैं । आदमी परिवर्तन का कारण, दशा, परिणाम को जान-समझकर अपने आप को अनुकूलित
कर लेने का प्रयास जमकर करता है
Q.3. विकासात्मक कार्य क्या है ? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए ।
Ans. मानव जीवन विविधताओं के भण्डार का मालिक होता है । तरह-तरह के परिवर्तन,
आकांक्षाएँ, कला, व्यवहार एवं अवस्था के साथ वह बाल्यावस्था से वृद्धावस्था को प्राप्त कर
लेता है । भिन्न-भिन्न मानव अपने परिवेश, आनुवंशिकता, परिस्थिति और अवस्था के वशीभूत
होकर अलग-अलग विकास परिणाम को पाता है। मानवीय विकास सामान्यतया अवधि या
अवस्थाओं के रूप में सम्पन्न होता है। लोग तरह-तरह के आचरण और परिणाम के हकदार
बनकर जीते हैं।
एक ही घटना का प्रभाव बच्चे, युवा, वृद्ध पर अलग-अलग देखा जाता है । मानव जीवन
विभिन्न अवस्थाओं से होते हुए आगे बढ़ता है । युवा फिल्म देखना पसन्द करता है तो वृद्ध भजन
में तल्लीन रहता है। विकासात्मक अवस्थाएँ अस्थायी रूप से कार्यरत होते हैं तथा प्रभावी लक्षण
के द्वारा पहचाने जाते हैं। कारण-परिणाम की व्याख्या अवधि और अवस्था के आधार पर की
जा सकती है। कोई वर्तमान की दशा से संतुष्ट रहता है तो कोई भविष्य कामना में साधना करता
हुआ देखा जाता है । निःसंदेह विकास की एक अवस्था से दूसरी अवस्था के मध्य विकास के
समय और दर के सापेक्ष व्यक्ति निश्चित रूप से भिन्न होते हैं। यह भी सत्य है कि कला, कौशल,
प्रशिक्षण और निपुणता एक विशिष्ट अवस्था को अनुकूल माना जाता है । संबंधित कार्य का
विकासात्मक कार्य माना जाता है। विकासात्मक कार्य व्यक्ति की अवस्था एवं निपुणता पर
आधारित होता है जो अवधि, अवस्था एवं परिवेश के कारण कम और अधिक, मंद और तीव्र
अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है।
Q. 4. ‘बच्चों के विकास में बच्चे के परिवेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका है ।’ उदाहरण
की सहायता से अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
Ans. बच्चों के विकास पर वंशानुक्रम कारक के अलावा परिवेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका
होती है। आधुनिक मत के अनुसार दोनों कारकों को अपर्याप्त माना जाता है । अर्थात् दोनों कारक
एक-दूसरे के पूरक हैं। पूर्वजों से प्राप्त जीन विकास की सीमाओं का निर्धारण मात्र करते हैं।
और परिवेश वांछनीय विकास को प्रत्यक्षतः प्रभावित करता है। बच्चों के विकास में जिन एक
विशिष्ट रूपरेखा तथा समय-सारणी प्रदान करते हैं, लेकिन जीन का अलग से कोई अस्तित्व नहीं
माना जाता है। बच्चों के विकास में बच्चे के परिवेश का महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है । जीन तो
स्वयं परिवेश के कारण अपना प्रभाव प्रदर्शित कर पाता है।
पूर्वजों के जीन के कारण कोई नाटा कद का बच्चा जब जन्म लेता है तो वह बच्चा किसी
भी विधि से लम्बा नहीं होगा। परिवेश उस नाटे बच्चे को बहुर्मुखी बनाने में सक्षम होता है।
आनुवंशिक तौर पर यदि कोई बच्चा मंद बुद्धि वाला होता है तो परिवेश के प्रयास से वह बुद्धिमान
बन सकता है। अत: जीन के कारण आने वाली कमी को परिवेश संभवत: विकास के पथ पर
ला सकता है। बुद्धिमान अभिभावक अपने बच्चे को अच्छा संस्कार, बुद्धि, निर्णय क्षमता सभी
कुछ देने में समर्थ है। जीन के प्रभाव से उत्पन्न आवश्यकताओं या रुचि को परिवेश उत्तम अवसर
दे सकता है। संगीत या खेलकूद में रुचि रखने वाले बच्चे को परिवेश के माध्यम से उचित साधन
और अवसर मिल सकते हैं।
एक ग्रामीण क्षेत्र का बुद्धिमान बच्चा उन्नत परिवेश में नहीं पलने के कारण किसी
प्रतियोगिता में असफल हो जा सकता है । कम्प्यूटर की जानकारी नहीं होने के कारण बच्चा
बुद्धिमान होने पर भी सही भावना को अभिव्यक्त नहीं कर पाता है । यदि बच्चे को विकसित करना
होता है तो उसे उचित अवसर और अच्छा परिवेश दिया जाता है । अच्छी शिक्षण पद्धति, सीखने
के योग्य अनुकूल परिवेश पाकर बच्चा उस स्थिति से पूर्णतः अवगत हो जाता है और वांछनीय
विकास का पात्र बन जाता है । अर्थात् पूर्वजों से मिले ज्ञान की उपयोगिता अनुकूल दशा में तभी
होती है जब परिवेश अभ्यर्थी को योग्य बनाकर सक्षम यात्र के रूप में उपस्थित होता है और
परिवेशीय वातावरण में उसकों विकास करने का अवसर देने में सक्षम होता है।
Q.5. विकास को सामाजिक-सांस्कृतिक कारक किस प्रकार प्रभावित करते हैं ?
Ans. किसी व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन काल में अभिलाषा, आवश्यकता और परिवेश के
प्रभाव से संबंधित असंख्य अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिलता है। जैसे, अच्छे विद्यालय में
प्रवेश पाकर योग्य नागरिक बनने की अभिलाषा, नौकरी पाने की आवश्यकता के साथ-साथ
किशोर बनना, विवाह करना, पिता कहलाना, समाज सेवक जैसा कार्य करना, उद्घाटन करना जैसे
कार्य साहसी विकास और परिवर्तन से प्रभावित होना पड़ता है। ज्ञात है कि विकास निर्वात में
किसी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में सन्निहित होना है । यह भी सत्य है कि जीवन काल
में परिवेश और परिणाम में कभी भी परिवर्तन हो सकते हैं।
युरी ब्रानफेन ब्रेनर के विचार से व्यक्ति के विकास में परिवेशीय कारकों की भूमिका अधिक
महत्त्वपूर्ण होती है। उसके विचार के निरूपन निम्नांकित आरेख से स्पष्ट हो जाता है-
प्रस्तुत आरेख के विभिन्न पहलुओं से निम्न सूचनाएँ प्राप्त होती हैं-
लघु मंडल-यह परिवेश के महत्त्व का समर्थन करते हुए साथी-सहयोगी, अध्यापक,
परिवार, पड़ोस आदि का प्रभाव प्रदर्शित करता है । इसके अनुसार व्यक्ति अपने निकटतम परिवेश
से प्रत्यक्षतः अन्तःक्रिया करता है।
                                           
मध्य मंडल-इसके अन्तर्गत प्रमुख सामाजिक गुणों को अपनाये जाने के लिए परिवेशक के
मध्य संबंध की पुष्टि होती है। अध्यापक, अतिथि, पड़ोसी के साथ किये जाने वाले उत्तम व्यवहार
की शिक्षा एवं अनुभव किसी व्यक्ति को परिवेश के बीच पलने-बढ़ने से मिलता है।
बाह्य मंडल-बाह्य मंडल के अन्तर्गत ऐसे अनुभवों का अध्ययन किया जाता है जो
सामाजिक परिवेश की वे घटनाएँ होती हैं जिसमें कोई बच्चा या व्यक्ति प्रत्यक्षत: प्रतिभागिता नहीं
करता है किन्तु घटना का प्रभाव उसके जीवन-विधि पर अवश्य पड़ता है । पिता का कार्यालय
दूर हो जाने पर पिता तो चिन्तित होते ही हैं लेकिन बच्चों या आश्रितों के कार्यक्रम एवं सुविधा
में परिवर्तन से नहीं बच पाते हैं। वे भी तनाव एवं चिन्ता महसूस करते हैं। साथी, खेलकूद,
पठन-पाठन, पुस्तकालय, बाजार की आवश्यकता एवं उपयोगिता जीवन-विधि पर बुरा प्रभाव
छोड़ने लगता है।
वृहत मंडल-यह सांस्कृतिक व्यवहार की ओर ध्यान ले जाता है । इसके अनुसार हमारे
आचरण पर परिवेश का सीधा प्रभाव पड़ता है । अहिंसक, सत्यवादी, आदर्श छात्र, कार्यकुशल
सभी कुछ बनना परिवेश से प्राप्त अनुभव का ही प्रतिफल होता है।
घटना मंडल-किसी आकस्मिक घटना कारण हमारे विकास की गति किस प्रकार
प्रभावित होती है, इसका सही अध्ययन इसी संदर्भ में संभव है। जैसे, माता-पिता के तलाक, पिता
का नौकरी से निलम्बन, घर में चोरी हो जाना, आर्थिक क्षति पहुँचना आदि हमारे विकास क्रम
में अवरोध बनकर आते हैं।
सारांशतः यह माना जाता है कि किसी व्यक्ति के विकास क्रम पर परिवेश का धनात्मक
तथा ऋणात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं । परिवेश से प्राप्त अनुभवों, साधनों (खिलौना,
 गेन्द), संस्थाओं (विद्यालय, चिड़ियाघर, पुस्तकालय) में से प्रत्येक का प्रभाव हमारे विकास पथ
पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। कुछ अनुभव हमें उत्साहित कर धनात्मक विकास की स्थिति में ला
देता है तो कुछ विषय परिस्थिति में उत्पन्न कर असुविधाजनक दशा में पहुँचाकर विकासात्मक
अवरोध जैसा काम करते हैं। फलतः सीखने-पढ़ने-बढ़ने में कई कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
महान मनोवैज्ञानिक दुर्गानंद सिन्हा (1977) ने भी विकास के क्रम में परिवेश को ही
महत्त्वपूर्ण कारक माना है । उनके द्वारा एक पारिस्थितिक मॉडल प्रस्तुत किया गया था जिसके
आधार पर ‘ऊपरी एवं अधिक दृश्य परत’ तथा आसपास की परतें के रूप में दो परिवेशीय स्थिति
की कल्पना की गई थी। पहली दशा में ये निम्न स्थितियों का अध्ययन किया था-
(i) घर में रहने वाले लोगों की अत्यधिक संख्या से उत्पन्न कठिनाइयाँ (स्थान,खेल,
मनोरंजन आदि में उपलब्धता की कमी)
(ii) विद्यालय के पठन-पाठन संबंधी अनियमितता तथा गुणवत्ता में कमी ।
(iii) अवस्था के कारण व्यवहार में लाये गये अन्तर ।
दूसरी दशा में निम्न कारकों को विकास का आधार बतलाया गया है-
(i) भौगोलिक परिवेश (क्षेत्रफल, जनसंख्या, नदी, पहाड़)
(ii) जाति, वर्ग, धर्म, रुचि के कारण परिवेश के स्वभाव में उत्पन्न स्थिति ।
(iii) आवश्यक सुख-सुविधा के साधन (पीने का जल,खेल का मैदान, बिजली, सिनेमाघर)
दृश्य एवं आसपास की परत से सम्बद्ध कारक अच्छा-बुरा दाना प्रकार के कार्य करते हैं।
अतः परिवेश का प्रभाव व्यक्ति की प्रकृति पर भी निर्भर करता है। कोई व्यक्ति परिवेश को कितना
समझता है, परिवेश का उपयोग किस प्रकार करता है, इसपर भी विकास की गति आश्रित होती
है।
Q.6. विकसित हो रहे बच्चों में होने वाले संज्ञानात्मक परिवर्तन की विवेचना कीजिए।
Ans. विकसित हो रहे बच्चे संसार के संबंध में अपनी समझ की रचना सक्रिय रूप से
करते हैं। जान पियाजे के अनुसार बच्चे परिवेश से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर नए विचारों
को जन्म देते हैं। वे स्वयं परिवेश के प्रति अनुकूलित हो जाना चाहते हैं। उनकी समझ में लगातार
सुधार होता है । संज्ञानात्मक विकास की विभिन्न अवस्थाओं को पियाजे द्वारा प्रतिपादित निम्न
तालिका से विचारों की श्रृंखला का ज्ञान हो जाता है ।
                                                                तालिका
                                पियाजे द्वारा प्रतिपादित संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ
अवस्था                         सन्निकट आय                                               विशेषताएँ
संवेदी-प्रेरक 1                    0-2 वर्ष                 शिशु संवेदी अनुभवों का शारीरिक क्रियाओं के साथ
                                                                      समन्वय करते हुए संसार के अन्वेषण करता है।
पूर्व-संक्रियात्मक                 2-7 वर्ष                 प्रतीकात्मक विचार विकसित होते हैं; वस्तु स्थायित्व
                                                                      उत्पन्न होता है; बच्चा वस्तु के विभिन्न भौतिक
                                                                       गुणों को समन्वित नहीं कर पाता है ।
मूर्त सक्रियात्मक                 17-11 वर्ष              बच्चा मूर्त घटनाओं के संबंध में युक्तिसंगत तर्क ना
                                                                       कर सकता है और वस्तुओं को विभिन्न समूहों में|
                                                                       वर्गीकृत कर सकता है । वस्तुओं की मानस प्रतिमाओं
                                                                       पर प्रतिवर्तनीय मानसिक संक्रियाएँ करने में सक्षम
                                                                       होता है।
औपचारिक सक्रियात्मक        11-15 वर्ष            किशोर तर्क का अनुप्रयोग अधिक अमूर्त रूप से
                                                                       कर सकते हैं; परिकल्पनात्मक चिंतन विकसित होते
प्रस्तुत तालिका से स्पष्ट हो जाता है कि बच्चों के सोचने का तरीका अलग होता है। दो
वर्ष की अवस्था पाने तक कोई बच्चा देखने, सुनने, मुँह चलाने, वस्तुओं को पकड़ने जैसे कार्य
में स्वयं को सक्षम मानते हैं तथा क्रियां-अनुक्रिया द्वारा अपनी चतुराई सिद्ध करने का प्रयास करते
हैं। नवजात शिशु अपने वर्तमान में जाकर भूत-भविष्य की कल्पना तक नहीं कर पाता है। उसके
द्वारा प्राप्त अनुभव एवं प्रतिक्रिया उसके दृष्टि क्षेत्र और मन को अप्रभावित रखता है। किन्तु बच्चे
तात्कालिक संवेदी अनुभवों से मुक्त नहीं रह पाते हैं। उनमें वस्तु स्थापित नामक चेतना का उदय
हो जाता है । आठ माह तक बच्चा छिपाई गई चीजों को पाने का प्रयास करने लगता है। बच्चे
मानसिक प्रतीकों का उपयोग करना सीखने लगते हैं । ये शारीरिक कार्यों को मानसिक रूप से
पूरा करने की कोशिश करने लगते हैं। पूर्व बाल्यावस्था में संज्ञानात्मक विकास पियाजे के
पूर्व-सक्रियात्मक विचार की अवस्था पर ध्यान केन्द्रित करता है।
                                                                     तालिका
                                         स्थूल एवं सूक्ष्म पेशीय कौशलों में प्रमुख उपलब्धियाँ
आयु वर्ष में                   स्थूल पेशीय कौशल                          सूक्ष्म पेशीय कौशल
12 वर्ष                         उछलना, कूदना, दौड़ना            ब्लॉक बनाना, तर्जनी एवं अंँगूठे की सहायता
                                                                                  से वस्तुओं को उठाना
4 वर्ष                          प्रत्येक पादान पर एक-              चित्रात्मक पहेलिया को भली-भाँति जोड़ना
                                  एक पैर रखते हुए सीढ़ियों
                                   पर चढ़ना एवं उतरना
 5 वर्ष                     तेज दौड़ना, दौड प्रतिस्पर्धा का           हाथ, भुजा एवं शरीर ये सभी आँख की गति
                                       आनंद लेना                                         के साथ समन्वित होते हैं
परिणामतः बच्चे किसी वस्तु को प्रत्यक्षतः नहीं देख पाने की स्थिति में उसे मानसिक रूप
से निरूपित लेते हैं । वे सोची गई वस्तुओं को चित्र या आकृति प्रदान करके उसमें संलग्न रहने
की स्थिति में स्वयं को पहुँचा देता है। पूर्ण संक्रियात्मक विचार की एक प्रमुख विशेषता के रूप
में अहं केन्द्रवाद का जन्म हो जाता है जिसके कारण बच्चे जीववाद में लिप्त हो जाते हैं । वे
निर्जीव वस्तुओं के साथ सजीवों के साथ किये गये व्यवहार को थोपना चाहता है । किवाड़ से
चोट लगने के कारण रोने वाले बच्चे किवाड़ को पीटने पर रोना बन्द कर देते हैं ।
आयु के बढ़ने के साथ-साथ उनमें जिज्ञासा की प्रवृत्ति भी बढ़ने लगती है । वे अपने परिवेश
की प्रत्येक घटना (वर्षा होना, वृक्ष का बढ़ना, आकाश का नीला रंग) के संबंध में कारण और
परिणाम समझ लेना चाहता है । पियाजे के विचार से बच्चों की इस जिज्ञासु अवस्था को अन्तः
प्रज्ञात्मक विचार के रूप में मान्यता मिली है। बच्चों के विचार के संबंध में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति
का स्थान भी महत्त्वपूर्ण है। बच्चे आकार को ज्यादा महत्त्व देते । उसे मात्रा का ज्ञान बहुत
कम होता है । चौड़े ग्लास और लम्बे पतले गिलास में अन्तर बतलाना बच्चों के सामर्थ्य के बाहर
की बात है । जब बच्चे की उम्र 7-11के करीब पहुँचता है तो अंतर्बोधक विचार बदलकर तार्किक
विचार के रूप में प्रकट हो जाता है। उसे मूर्त संक्रिया का विचार कहा जाता है जो प्रतिक्रमणीय
मानसिक क्रिया का एक विशिष्ट रूप से है । इस अवस्था में बच्चों के अहंकेन्द्रवाद में कमी आने
लगती है । फलतः चिंतन अधिक लचीला हो जाता है । बच्चे किसी वस्तु के संबंध में अधिकाधिक
जानकारी पाना चाहता है । वह भौगोलिक तथा गणितीय समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास
करने लगता है।
बच्चों की बढ़ती हुई संज्ञानात्मक योग्यताएँ भाषा अर्जन के लिए सुगम स्थिति उत्पन्न करती
है। बच्चे अपने अनुभव एवं ज्ञान को बोलकर बतलाने का प्रयास करने लगता है।
इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि बच्चे अपने परिवेश के प्रति जागरूक होकर ज्ञान अर्जन
करता है । विचार, केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति, अंतर्बोधक विचार, तार्किक विचार, मूर्त से क्रियात्मक
विचार, प्रतिक्रमणीय मानसिक क्रियाएँ, वस्तु स्थायित्व वाचिक संप्रेषण के साथ-साथ चिंतन जैसे
प्रमुख तत्वों के प्रति सतर्क व्यवहार करने लगता है।
Q.7. ‘बचपन में विकसित हुए आसक्तिपूर्ण बंधनों का दूरगामी प्रभाव होता है।’
दिन-प्रतिदिन के जीवन के उदाहरणों से इनकी व्याख्या कीजिए।
Ans. आसक्ति (attachment) का सामान्य अर्थ किसी सजीव (माता-पिता, मित्र) अथवा
निर्जीव (खिलौना, गेन्द, पोशाक, गाड़ी) के प्रति उत्पन्न लगाव समझा जाता है । आसक्ति एक
विशिष्ट प्रकार का सामाजिक-संवेगात्मक विकास के अन्तर्गत उत्पन्न संवेदनात्मक संबंध है ।
शिशु एवं उनके माता-पिता के बीच स्नेह का जो सांवेगिक बंधन विकसित होता है, उसे आसक्ति
कहते हैं । उत्पन्न आसक्ति का प्रत्यक्ष प्रभाव तब देखा जा सकता है जब कोई बच्चा अपने
पालनकर्ता के घनिष्ठ संबंधियों को देखते ही मुस्कराकर उनसे लिपटने के लिए हाथ-पैर चलाने
पालता है । डरकर चौंकना, रोना या पीड़ा की अभिव्यक्ति आदि आसक्ति के अभाव का प्रमाण
होता है।
आसक्ति उत्पन्न होने में प्यार-दुलार, सहानुभूति, प्रशंसा, प्रोत्साहन के साथ-साथ आभार
प्रदान करना जैसी प्रक्रियाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
आसक्ति उत्पन्न होने पर सम्पर्क सुख नामक लक्षण प्रकट होता है। बच्चे को अपने खिलौनों
के प्रति आसक्त होते हम सबों ने देखा-समझा है। बच्चों को सख-संतोष एवं भयमुक्त वातावरण
देने वाले के प्रति आसक्त हो जाना स्वाभाविक बात है’ एरिक एरिक्सन नामक मनोवैज्ञानिक के
मतानुसार आसक्ति के विकास के लिए जीवन का प्रथम वर्ष सबसे उपयुक्त समय होता है। इस
उम्र में बच्चे प्यार-दुलार के संकेतों का उपयुक्त प्रत्योत्तर देते हैं। सरक्षा और विश्वास के आधार
पर सुख का अनुभूति प्रकट होती है जो आसक्ति उत्पन्न करने का प्रमुख कारक माना जाता है।
आसक्ति के लक्षण का निर्धारण सम्पर्क के व्यक्ति (माता-पिता) के ज्ञान और संवेदनशीलता
के कारण बदल जाते हैं । सतर्क माता-पिता की देखरेख और निर्देशन में बच्चे में अच्छे संस्कार
को पाकर स्वाभिमान और सक्षमता का बोध उत्पन्न होता है तथा इसके विपरीत असंवेदनशील
अज्ञानी माता-पिता के कारण बच्चे में आत्मसंदेह की भावना जग जाती है। बच्चों के भविष्य
के लिए आवश्यक आत्मबोध का जन्म सम्पर्क के व्यक्तियों पर आधारित होता है । अत: बच्चे
के स्वस्थ विकास के लिए संवदेनाशील एवं स्नेहिल प्रौढ़ों के साथ घनिष्ठ अंतः क्रियात्मक संबंध
का होना अति आवश्यक होता है।
बचपन में उदय होने वाले भावनाओं में से स्व, लिंग तथा नैतिक विकास से संबंधित भावना
को प्रमुख रूप से प्रभावकारी माना जाता है । बच्चे को आत्म सम्मान तथा स्वयं की क्षमता पर
गौरव महसूस करना सिखलाया जाता है । उसे ऐसे कामों से बचाकर रखा जाता है जिससे भय,
आत्मग्लानि, हीनता के भाव उत्पन्न होते हैं । उदाहरणार्थ, बच्चों को साथी या खेल चुनने में मात्र
परामर्श दिया जाना चाहिए । अभिभावक हो या अध्यापक सभी को बच्चे के लक्षण और
क्रियाकलाप पर दूर से ही निरीक्षण करते रहना चाहिए । माता-पिता को धार्मिक अनुष्ठान में भाग
लेते हुए देखकर बच्चा भजन प्रेमी हो जाता है । विद्यालय में संचालित समारोहों से बच्चे
समाज-सेवक बनकर उपयोगी कार्य करने की प्रेरणा पाते हैं । प्रतियोगिता, आदर्श तथा जनन
संबंधी उचित शिक्षा के माध्यम से किसी भी बच्चे का चरित्र निर्माण किया जा सकता है जो
भविष्य में उसे प्रभावशाली नागरिक बनाने में सहयोग करता है।
विद्वान एरिक्सन ने भी माना है कि बच्चों को स्वप्रेरित क्रियाओं के प्रति माता-पिता जिस
प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं वही पहला शक्ति बोध अथवा अपराध बोध को विकसित करता है।
अतः आसक्ति से जुड़े व्यक्तियों अथवा साधनों से सुप्रभाव द्वारा अच्छे भविष्य का निर्माण
किया जा सकता है जिसके लिए संवेदनशीलता, व्यवहार, कुशल, दक्ष एवं निपुण व्यक्तियों के
सहयोग एवं निर्देशन की आवश्यकता होती है । अर्थात् यह सत्य है कि बचपन में विकसित हुए
आसक्तिपूर्ण बंधनों का दूरगामी प्रभाव होता है ।
Q.8. किशोरावस्था क्या है ? अहं केन्द्रवाद के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए।
Ans. किशोरावस्था-मानव जीवन विभिन्न अस्थायी अवस्थाओं से होते हुए वृद्धावस्था को
पाता है। जब कोई बच्चा 12 वर्ष की उम्र पार कर जाता है तो किशोरावस्था प्रारम्भ हो जाता
है। किशोरावस्था किसी व्यक्ति के जीवन में बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था के मध्य का संक्रमण
काल है । इस अवस्था में व्यक्ति को ‘परिपक्व रूप में विकसित’ माना जाता है जिसका प्रारम्भ
यौवनारंभ कहलाता है तथा व्यक्ति को यौन परिपक्वता वाला मान लिया जाता है। किशोरावस्था
का मुख्य लक्षण या विशेषताएँ निम्नलिखित होते हैं-
(i) किशोरावस्था में प्रजनन करने की क्षमता प्राप्त कर ली जाती है।
(ii) किशोरावस्था को जैविक तथा मानसिक दोनों ही रूप से तीव्र परिवर्तन की अवधि मानी
जाती है।
(iii) क्रमिक प्रक्रिया के अंग माने जाने वाले यौवनारंभ की अवस्था में स्रावित होनेवाले
हार्मोन के कारण मूल एवं गौण लैंगिक लक्षण विकसित होते हैं।
(iv) त्वरित संवृद्धि, चेहरों पर बालों का उगना तथा स्वर में भारीपन का आभास होना
किशोरावस्था में पहुँचे हुए बालकों के साथ मिलता है।
(v) लड़कियों की ऊँचाई में तीव्र संवृद्धि, मासिक धर्म प्रारम्भ, शारीरिक संरचना में विकास
आदि लक्षण देखे जाते हैं।
(vi) किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक विकास के साथ मानसिक परिवर्तन भी होते हैं।
(vii) किशोर यौन संबंधी मामलों में अधिक रुचि का प्रदर्शन करते हैं।
(viii) अपने शारीरिक-स्व अथवा शारीरिक परिपक्वता को स्वीकार करना किशोरावस्था
का विकासात्मक कार्य है।
(ix) किशोर के विचार अधिक अमूर्त, तर्कपूर्ण एवं आदर्शवादी होते हैं ।
(x) किशोर अमूर्त रूप से चिंतन एवं तर्कना प्रारम्भ कर देते हैं।
(xi) उन्हें चिंतन की परिकल्पनात्मक निगमनात्मक तर्कना आदि पर विश्वास हो जाता है तथा
नैतिक तर्कना पर बल देने लगते हैं।
(xii) किशोरों का नैतिक चिंतन लचीला होता है।
(xiii) डेविड एलकाइड के अनुसार काल्पनिक श्रोता एवं व्यक्तिगत दंतकथा किशोरों के अहं
केन्द्रवाद के दो घटक हैं।
(xiv) किशोर अपने माता-पिता से अलग पहचान बनाना चाहते हैं।
(xv) किशोरों में उत्पन्न पहचान-भ्रम नकारात्मक परिणाम वाले होते हैं।
(xvi) आत्मविश्वास और असुरक्षा की भावना के बीच शीघ्रता से परिवर्तित होते रहना
किशोरावस्था की एक विशिष्टता है।
(xvii) किशोरावस्था पाकर व्यक्ति उपचार, मादक द्रव्यों का दुरुपयोग तथा आहार ग्रहण
करने संबंधी विकारों को प्रमुख चुनौतियाँ मानते हैं ।
(xviii) किशोरवस्था में व्यक्ति सस्ते मनोरंजन को पसन्द करने लग जाते हैं।
(xix) किशोरावस्था में अहम्, क्रोध, बल-प्रयोग जैसे कई अवगुण विकास को अनियमित
कर देते हैं।
अहं केन्द्रवाद के संप्रत्यय-अंह केन्द्रवाद को पूर्व-संक्रियात्मक विचार की एक प्रमुख
विशेषता के रूप में पहचाना जाता है । इस विशेषता के कारण बच्चे दुनिया को केवल अपने
दृष्टिकोण से देखते हैं । ये दूसरों के विचार, परामर्श क्षमता को उद्देश्यहीन मानकर ठुकरा देते
हैं । किशोर भी एक विशिष्ट प्रकार के अहं केन्द्रवाद विकसित करते हैं जिसके दो प्रमुख घटक
(i) काल्पनिक श्रोता तथा
(ii) व्यक्तिगत दंतकथा होते हैं । काल्पनिक श्रोता किशोरों का एक विश्वास है कि दूसरे
लोग उनसे काफी आकर्षित हैं तथा उनका निरीक्षण कर स्वयं को बहलाना चाहते हैं । जैसे कुछ
लड़के अपने शर्ट के धब्बे से तथा कुछ लड़कियाँ मुँहासे से काफी चिन्तित रहते हैं, क्योंकि उन्हें
लगता है कि लोग क्या कहेंगे जो किशोर को आत्म सचेत बना देता है। व्यक्तिगत दंतकथा किशोरों
की अहं केन्द्रवाद का एक प्रमुख भाग है जिसमें किशोर स्वयं को अद्वितीय समझता है तथा दूसरे
को नासमझ, अज्ञानी, स्वार्थी, पिछड़ा हुआ तथा संकुचित विचार वाला व्यक्ति मानने की भूल करता
है । अपनी अच्छाई और विशिष्टता को सही प्रमाणित करने के लिए वह तरह-तरह की काल्पनिक
घटनाओं की चर्चा करके अपना प्रभाव जमाना चाहता है।
यही कारण है कि अब किशोरों को माता-पिता से यह कहते सुनना आम बात हो गई है।
कि आप मुझे समझ नहीं पाते हैं, हमारी क्षमता आपसे कई गुना अधिक है।
इस आधार पर माना जा सकता है कि अहं केन्द्रवाद किसी किशोर को अच्छाई की ओर
ले जाने वाला प्रेरक बल हो सकता है लेकिन इसके कुप्रभाव से बचे रहने की बहुत जरूरत
Q.9. किशोरावस्था में पहचान निर्माण को प्रभावित करने वाले कौन-कौन-से कारक
हैं । उदाहरण की सहायता से अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए ।
Ans. अपने माता-पिता से अलग अपनी पहचान बनाने की प्रवृत्ति प्राय: सभी किशोरों में
पाई जाती है। किशोरावस्था में विलग्नता या अनासक्ति के द्वारा एक किशोर अपने व्यक्तिमत
विश्वासों को पूरे समाज पर थोपकर सर्वमान्य बन जाने का प्रयास करता है। पहचान-युक्त नामक
विसंगति या द्वन्द्व के बावजूद वह पीछे रहने को तैयार नहीं होता है । किशोर नहीं चाहता है कि
कोई उसे असमर्थ या अक्षम माने या उसे सदैव बच्चा ही समझा जाए । इसी समझ से ऊबकर
वह अपनी अलग पहचान बनाने को तत्पर रहता है।
किशोरावस्था में पहचान का निर्माण अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव के कारण संभव होता
है । इस काम में उसे सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, पारिवारिक जटिलता, सामाजिक मूल्य, सजातीय
पृष्ठभूमि तथा सामाजिक-आर्थिक स्तर के माध्यम से किया जाने वाला प्रभावी प्रयास है । इसके
अतिरिक्त व्यावसायिक प्रतिबद्धता भी पहचान बनाने के लिए किशोरों को प्रेरित करता है । एक
किशोर जनसेवा में अपना बहुमूल्य समझ दे पाने के लिए माता-पिता से अलग पहचान बनाना
चाहता है । परिवार में व्यवस्था या साधनों के चलते उठने वाले विवादों से मुक्ति पाने के लिए
किशोर अपनी पहचान बनाने के लिए उत्सुक हो जाता है । बार-बार अच्छे साथियों से तुलना
करने के क्रम में उदासीनता प्रकट करने लगता है । जीविकोपार्जन के लिए जब किशोर घर से
बाहर जाता है तो सहकर्मी का व्यवहार परिवार के सदस्यों के व्यवहार से अधिक प्रिय प्रतीत होता
है । अपने ज्ञान और कौशल का स्वतंत्रतापूवर्क प्रदर्शन करने के लिए लोभ में वह अपनी पहचान
कायम करना चाहता है।
कभी-कभी समकक्षियों के साथ अन्तः क्रिया उन्हें अपने पारिवारिक संबंध कम करने को
बाध्य कर देते हैं । माता-पिता के साथ संघर्षपूर्ण परिस्थितियों के कारण किशोर अपने समकक्षियों
से सहायता लेने को बाध्य हो जाता है । बड़े होकर भविष्य में कोई किशोर क्या बनेगा ? कहाँ
और कैसे रहेगा? जैसे प्रश्न किशोरों में व्यावसायिक प्रतिबद्धता की भावना जग जाती है। वह
भविष्य की योजना को स्वयं अपने अनुकूल निर्धारित करना चाहता है । एक किशोर जब
माता-पिता तथा समकक्षियों के प्रति भरोसा खोने लगता है तो उसके पास अलग पहचान के निर्माण
के सिवा कोई अलग विकल्प नहीं बचता है । किशोरों में उत्पन्न होने वाली मृगतृष्णा को रोकने
के लिए अभिभावकों को मित्रवत आचरण करते हुए उसकी समस्या को समझना चाहिए तथा
समस्या समाधान में अधिक-से-अधिक सहयोग करना चाहिए ।
Q. 10. प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करने पर व्यक्तियों को कौन-कौन-सी चुनौतियों का
सामना करना पड़ता है ?                                                [B.M.2009A]
Ans. कोई व्यक्ति जब 21 वर्ष से अधिक उम्र वाला हो जाता है तो उसे प्रौढ़ मान लिया
जाता है । प्रौढ़ावस्था प्राप्त व्यक्ति को अधिकतम सामर्थ्य वाला सम्पूर्ण मानव मानकर उससे अनेक
प्रकार की आकांक्षाओं को पूरा करने की आशा जग जाती है । प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करने पर
व्यक्तियों को तरह-तरह की निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है-
(i) एक नया अनुभव-प्रौढावस्था में प्रवेश करने पर व्यक्तियों को सामाजिक, सांस्कृतिक,
शारीरिक, मानसिक परिवर्तनों के लिए नया अनुभव मिलता है । परिवर्तन संबंधी नये अनुभव के
क्रम में अपने आपको संतुलन की अवस्था में रख पाना एक गंभीर चुनौती है।
(ii) दायित्व-किसी प्रौढ़ व्यक्ति को परिवार और समाज के प्रति कई आवश्यक दायित्वों
के निर्वहन के बोझ को ढोना पड़ता है ।
(iii) परिपक्व और स्वावलम्बी-समाज में सम्मानजनक स्थान पाने के लिए प्रौढ़ में
परिपक्व और स्वावलम्बी की भूमिका अदा करना होता है ।
(iv) अध्ययन और नौकरी साथ-साथ-समाज और परिवार की आवश्यकताओं तथा
आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रौढ़ को अध्ययन और नौकरी साथ-साथ करने की नौबत आ जाती
है।
(v) महत्त्वपूर्ण घटनाओं से संस्कृति में बदलाव-विवाह, नौकरी तथा बच्चों को जन्म देना
ऐसी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं जो संस्कृति से स्वरूप में भिन्नता ला देते हैं। संस्कृति के बदल जाने
पर भी विकास-क्रम को पूर्ववत गतिमान रखना प्रौढ़ों के लिए कठिन चुनौती है।
(vi) दो मुख्य कार्यों का सम्पादन-प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था के दो मुख्य कार्य होते हैं-
(क) प्रौढ़ जीवन की संभावना को तलाशना तथा
(ख) स्थायी जीवन की संरचना का विकास करना ।
शिक्षा, पेशा एवं व्यवहार के द्वारा प्रौढ़ इन दोनों कार्यों को पूरा करने को बाध्य रहता है।
(vii) निर्भरता से स्वंतत्रता की ओर-प्रौढ़ावस्था के पूर्व व्यक्ति आश्रित बनकर माता-पिता
पर निर्भर रहता है । किन्तु प्रौढावस्था में वही व्यक्ति विवाह बंधन में बंधकर पिता बन जाता है
और निर्भरता को छोड़कर स्वतंत्र जीवन जीने को बाध्य हो जाता है ।
(viii) जीविका एवं कार्य-परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
प्रौढ़ को किसी-न-किसी व्यवसाय का चयन करना होता है तथा कठोर श्रम करके निर्धारित कार्य
को पूरा करके संसाधन जुटाना होता है । इसमें उसे अपनी दक्षता और निष्पादन को सिद्ध करने
के लिए प्रत्याशाओं के प्रति समायोजन स्थापित करना पड़ता है। जीविका विकसित करके उसका
सही मूल्यांकण करना प्रौढ़ व्यक्ति के लिए वांछनीय हो जाता है।
(ix) विवाह, मातृ-पितृत्व एवं परिवार-किसी दूसरे परिवेश में पली-बढ़ी कन्या से
विवाह करके कोई प्रौढ़ व्यक्ति भिन्न संस्कार अथवा संस्कृति के अनुकूल बनकर सुखमय जीवन
जोने का प्रयास करता है। पति-पत्नी में स्पष्ट समझ एवं सहयोग की भावना को बनाये रखना
प्रौढ़ के लिए एक चुनौती होती है । पिता बन जाने के बाद किसी प्रौढ़ को बच्चों की संख्या,
सामाजिक आलम्बन की उपलब्धता तथा विवाहित युगल की प्रसन्नता को ध्यान में रखते हुए
जीवन-क्रम को आगे बढ़ाना पड़ता है।
(x) तलाक-तलाक अथवा मृत्यु के कारण कभी-कभी प्रौढ़ों को एकाकी जीवन जीने के
लिए बाध्य होना पड़ता है । संरक्षण और देख-रेख सम्बन्धी आवश्यकता प्रौढ़ को परेशान करने
लगती है जिससे समाधान का रास्ता पाना एक चुनौती भरा काम है ।
(xi) शारीरिक परिवर्तन-कभी-कभी दृष्टिकोण या विकलांगता या आकस्मित रोग प्रोढ़
को संकट में डाल सकता है । कुछ कामों में निपुणता का अभाव, स्मृति में कमी आदि संकट
बनकर प्रौढ़ की क्षमता को ललकारने लगते हैं।
अत: उम्र अथवा अवस्था बदलने से वैयक्तिक भिन्नता बढ़ जाती है। स्वभाव, साधन,
तकनीकी ज्ञान आदि में आने वाले अन्तर गंभीर चुनौतियों के रूप में प्रौढ़ों को सक्षम प्रमाणित करने
के लिए बाध्य करने लगते हैं क्योंकि सभी प्रौढ़ प्रज्ञानी नहीं होते हैं । अर्थात् प्रौढ़ावस्था में प्रवेश
पाना गंभीर चुनौतियों का सामना करना स्वाभाविक दशा है ।
                                           अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
                                                            वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
                                   (OBJECTIVE ANSWER TYPE QUESTIONS)
1. मानव का सर्वाधिक विकास किस अवस्था में होता है ?           [B.M.2009A]
(a) गर्भावस्था में
(b) शैशवावस्था
(c) जन्म के बाद
(d) बाल्यावस्था में                                    (उत्तर-A)
2. बच्चों का पूर्व पाठशालीय अवस्था को कब से कबतक मानी जाती है ?    [B.M.2009 A]
(a) दो वर्ष से पांच वर्ष,
(b) तीन से छ: वर्ष
(c) चार से सात वर्ष
(d) पांच से आठ वर्ष                                 (उत्तर-B)
                                             अति लघु उत्तरीय प्रश्न
                  (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)
Q. 1. क्या शरीर की लम्बाई, वजन तथा मोटापा में वृद्धि को ही विकास माना
जाता है ?
Ans. नहीं, विकास का वास्तविक अर्थ शारीरिक विकास के साथ मानसिक तथा सांस्कृतिक
परिवर्तनों पर भी निर्भर करता है ।
Q.2. विकास से संबंधित दो प्रमुख मान्यताओं का उल्लेख करें ।
Ans. (i) विकास जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है।
(ii) विकास अत्यधिक लचीला अथवा संशोधन योग्य होता है ।
Q.3. संवृद्धि क्या है ? दो उदाहरण दें।
Ans. शारीरिक अंगों की माप में होनेवाली वृद्धि संवृद्धि कहलाती है । जैसे-
(i) शरीर की ऊँचाई (कद) का बढ़ना
(ii) शरीर के वजन में वृद्धि ।
Q.4. प्राकृतिक चयन क्या है ? यह किसे लाभ पहुँचाती है ?
Ans. प्राकृतिक चयन एक विकासवादी प्रक्रिया है । यह उन व्यक्तियों या प्रजातियों को
लाभ पहुँचाता है जो अपनी जीवन रक्षा तथा प्रजनन करने के लिए सर्वश्रेष्ठ रूप से अनुकूलित
होते हैं।
Q.5. यूरी ब्रानफेन बेनर का व्यक्ति के विकास के संबंध में क्या दृष्टिकोण है ?
Ans. विकास का परिस्थितिपरक दृष्किोण के अनुसार विकास में परिवेशीय कारकों की
भूमिका महत्त्वपूर्ण है।
Q.6. विकास का परिस्थितिपरक दृष्टिकोण का निरूपण का निरूपण किन-किन
खण्डों में किया गया है ?
Ans. (i) लघु मंडल
(ii) मध्य मंडल
(iii) बाह्य मंडल
(iv) वृहत् मण्डल और
(v) घटना मंडल ।
Q.7.विकास के अध्ययन की दो विधियों के नाम बतायें ।
Ans. बच्चों के विकास संबंधी अध्ययन करने के लिये दो विधियों का उपयोग किया जाता
है जिनके नाम इस प्रकार हैं-
(i) बड़े समूह का मापन
(ii) पुनः परीक्षण ।
Q.8. संवेदी विकास से क्या तात्पर्य है ?
Ans. संवेदी विकास से तात्पर्य वैसे विकास से होता है जिसमें नवजात शिशु के ज्ञानेन्द्रियों
का इतना विकास हो जाता है कि वह अपने वातावरण की चीजों की सही-सही प्रत्यक्षीकरण कर
सके।
Q.9. संवेदी विकास पर किन कारकों का प्रभाव पड़ता है ?
Ans. बच्चों के संवेदी विकास पर पारिवारिक वातावरण, यौन, बुद्धि आदि कारकों का
प्रभाव पड़ता है।
Q. 10. संवेदी विकास के मुख्य प्रकार कौन-कौन है ?
Ans. संवेदी विकास पाँच प्रकार के होते हैं-दृष्टि संवेदना, श्रवण संवेदना, प्राण संवेदना,
स्वाद संवेदना एवं त्वक् संवेदना ।
Q. 11. क्रियात्मक विकास की क्या विशेषताएँ हैं ?
Ans. क्रियात्मक विकास परिपक्वता पर निर्भर होता है, तंत्रिका विकास,वैयक्तिक भिन्नता
मस्तकाधोमुखी क्रम, निकट दूर का क्रम आदि क्रियात्मक विकास की विशेषताएंँ हैं।
Q.12. बच्चों में क्रियात्मक विकास का क्रम क्या होता है ?
Ans. बच्चों के क्रियात्मक विकास के क्रम में सिर के भाग में क्रियात्मक विकास, धड़
के क्षेत्र में क्रियात्मक विकास, बाँह और हाथ में क्रियात्मक विकास तथा पैरों एवं अंगुलियों में
क्रियात्मक विकास आदि आते हैं।
Q. 13. क्रियात्मक विकास से क्या तात्पर्य है ?
Ans. क्रियात्मक विकास वैसे विकास को कहा जाता है जिसके सहारे बच्चे अपने
मांसपेशियों एवं तत्रिकाओं को समन्वित करके अपने शरीर के अंगों द्वारा किये जाने वाले गतियों
पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करते हैं।
Q. 14. क्रियात्मक विकास पर किन कारकों का प्रभाव पड़ता है ?
Ans. बच्चों के क्रियात्मक विकास पर शारीरिक गठन, बौद्धिक स्तर, माता-पिता द्वारा
प्रोत्साहन, जन्म-क्रम, यौन आदि कारकों का प्रभाव पड़ता है।
Q. 15. क्रियात्मक विकास का पैटर्न क्या है ?
Ans. बच्चों में क्रियात्मक विकास का क्रम दो प्रकार होता है-मस्तकाधोमुखी विकास क्रम
तथा निकट-दूरस्थ विकास क्रम ।
Q. 16. मस्तकाधोमुखी विकास क्रम क्या है ?
Ans. मस्तकाधोमुखी विकास क्रम में पहले सिर तथा गर्दन के भाग में, फिर बाँह तथा हाथ
के हिस्सों में, फिर धड़ में और अन्त में पैर तथा उनकी उँगलियों में विकास होता है।
Q.17. सामाजिक विकास की विभिन्न अवस्थाएँ क्या हैं ?
Ans. सामाजिक विकास की अवस्थाओं में मौखिक अवस्था, गुदावस्था, अव्यक्तावस्था,
किशोरावस्था, वयस्कावस्था तथा वृद्धावस्था आदि मुख्य हैं ।
Q.18. विकास का क्या अर्थ है ?
Ans. विकास उन प्रगतिशील परिवर्तनों को कहते हैं जिनका प्रारम्भ नियमित एवं क्रमिक
रूप से होता है तथा परिपक्वता प्राप्ति की ओर निर्देशित रहता है ।
Q.19. विकासात्मक मनोविज्ञान की समुचित परिभाषा क्या है ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है, जिसमें गर्भाधान से मृत्यु तथा
मनुष्यों के विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन किया
जाता है।
Q.20. विकास की गति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
Ans. बच्चे को शारीरिक एवं मानसिक विकास उसके जीवन कोष की बनावट पर निर्भर
करता है जैसा जीवकोष (germ cell) होगा बच्चे का विकास भी वैसा ही होगा फिर भी बच्चों
की क्रियायें, भोजन, अभ्यास, शिक्षा इत्यादि का भी उसकी विकास गति पर काफी पड़ता है।
Q.21. बाल्यावस्था क्या है?
Ans. सामान्य रूप से जन्म से लेकर अपरिपक्वता तक की अवस्था को बाल्यावस्था कहा
जाता है अर्थात् 2 वर्ष से लेकर 11 वर्ष तक की अवस्था को ही बाल्यावस्था कहते हैं।
Q.22. वयस्कावस्था क्या है?
Ans. वयस्कावस्था 17-21 वर्ष तक के बीच होती है। इस अवस्था में बच्चे का विकास
पूर्ण हो जाता है । इस अवस्था को प्राप्त करने पर व्यक्ति समाज एवं कानून के दृष्टिकोण से
परिपक्व हो जाता है।
Q.23. विकास की प्रक्रिया कब से प्रारम्भ होती है ?
Ans. व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया गर्भाधान से प्रारंभ होती है।
Q.24. किशोरावस्था तक विकास की कौन-कौन अवस्थाएँ हैं ?
Ans. किशोरावस्था तक विकास की मुख्य अवस्थाएँ-पूर्व प्रसूतिकाल, शैशवावस्था,
बचपनावस्था, बाल्यावस्था, तरुणावस्था एवं किशोरावस्था है।
Q.25. पूर्व प्रसूतिकाल कब से कब तक होता है ?
Ans. गर्भधारण से प्रारम्भ होकर जन्म होने तक के काल को पूर्व प्रसूतिकाल कहा जाता है।
Q.26. शैशवावस्था में बच्चा कितने दिनों तक रहता है ?
Ans. जन्म से लेकर चौदह दिन तक बच्चा शैशवावस्था में रहता है।
Q.27. बचपनावस्था कब से कब तक रहती है?
Ans. बचपनावस्था चौदह दिनों के बाद से प्रारम्भ होकर दो वर्ष की उम्र तक रहता है।
Q.28. बाल्यावस्था किस उम्र से प्रारंभ होती है ?
Ans. बाल्यावस्था दो वर्ष की उम्र से ग्यारह वर्ष उम्र तक होती है।
Q.29. तरुणावस्था की अवधि क्या होती है ?
Ans. तरुणावस्था की अवधि ग्यारह से तेरह वर्ष की उम्र तक होती है।
Q.30. किशोरावस्था किस उम्र को कहते हैं ?
Ans. किशोरावस्था तेरह साल से उन्नीस-बीस साल तक की उम्र को कहते हैं ।
Q.31. शैशवावस्था से आप क्या समझते हैं ?
Ans. जन्म से लेकर 10-14 दिनों की अवस्था को ही शैशवावस्था कहा जाता है। इस
अवस्था के बच्चे को नवजात शिशु कहा जाता है ।
Q.32. किशोरावस्था से आप क्या समझते हैं ?
Ans. सामान्य बच्चों में तरुणावस्था की शुरुआत से लेकर परिपक्वावस्था को ही
किशोरावस्था कहा जाता है अर्थात् 11-13 वर्ष के बीच की उम्र से शुरू होकर 21 वर्ष तक की
अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है ।
Q.33. बुढ़ापा की अवस्था क्या है ?
Ans. जब व्यक्ति 50 वर्ष से ऊपर आयु का हो जाता है तो बुढ़ापा की अवस्था प्रारंभ हो
जाती है ! बुढ़ापा की अवस्था में व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक गति धीरे-धीरे कम होने
लगती है । वह शरीर से अस्वस्थ होने लगता है।
Q.34. शिशुओं के दृष्टि विकास कितनी उम्र में होती है ?
Ans. नवजात शिशु का दृष्टिपटल, दृष्टि-स्नायु, आँख के लेन्स को नियंत्रित करने वाली
मांसपेशियाँ जन्म के समय परिपक्व नहीं होती, परन्तु छ:-सात माह की उम्र में परिपक्व हो जाती
है और दृष्टि संवेदना विकसित हो जाती है ।
Q. 35. शिशुओं में बैठने की क्रिया कितनी उम्र में होती है ?
Ans. शिशु नौ महीने की उम्र में बिना सहारा के ही बैठना प्रारंभ कर देता है ।
Q.36. बच्चे कितनी उम्र से चलना प्रारंभ करते हैं ?
Ans. सामान्यत: बच्चे ग्यारह से पन्द्रह महीने की उम्र से चलना प्रारंभ कर देते हैं।
Q.37. विकासात्मक अवस्थाओं की भारतीय अवधारणा क्या है ?
Ans. भारतीय अवधारणा के अनुसार विकास की चार अवस्थाएँ हैं-ब्रह्मचर्य या शिक्षार्थी
अवस्था, गृहस्थ या पालक अवस्था, वाणप्रस्थ या प्रत्याहार की अवस्था तथा संन्यास या परित्याग
की अवस्था।
Q.38. बाल अपराध से क्या तात्पर्य है?
Ans. बाल अपराध से तात्पर्य किसी स्थान-विशेष के नियमों के अनुसार एक निश्चित उम्र
से कम के बच्चे या किशोर द्वारा किया जाने वाला अपराध है।
Q. 39. पुनः परीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं ?
Ans. पुनः परीक्षण एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा एक ही व्यक्ति या कई व्यक्तियों का
अध्ययन बार-बार कुछ-कुछ समय के बाद किया जाता है । यह पुनः परीक्षण हरेक दिन के बाद
या हर एक सप्ताह या हर एक महीने या हर एक साल के बाद किया जा सकता है।
Q.40. तलाक की अवस्था क्या है ?
Ans. जब पति-पत्नी के बीच मतभेद उत्पन्न हो जाता है और वे वैवाहिक संबंध-विच्छेद
कर लेते हैं और उनके बीच पति-पत्नी का सम्बन्ध समाप्त हो जाता है तो इस स्थिति को तलाक
कहा जाता है। पति-पत्नी कोई भी एक दूसरे से तलाक ले सकते हैं।
Q.41. विकासात्मक मनोविज्ञान की उपयोगिता किसके लिए है ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान की उपयोगिता बच्चों, बच्चों के माता-पिता, शिक्षक
बाल-सुधारकों, समाज एवं बाल न्यायालयों के लिए है।
Q.42. विकासात्मक मनोविज्ञान का क्षेत्र क्या है ?
Ans. प्रसव पूर्व विकास, नवजात शिशु, ज्ञानात्मक भाषा, शारीरिक, संवेदी क्रियात्मक,
संवेगात्मक एवं सामाजिक विकास आदि विकासात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र हैं ।
Q.43. विकासात्मक मनोविज्ञान में व्यक्ति का अध्ययन कब-से-कब तक किया
जाता है?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति का अध्ययन गर्भावस्था से लेकर मृत्यु
तक किया जाता है।
Q.44. एक सामान्य महिला में किस प्रकार का गुणसूत्र पाया जाता है ?
Ans. एक सामान्य महिला में x x का गुणसूत्र पाया जाता है ।
Q.45. आनुवंशिकता से क्या तात्पर्य है?
Ans. आनुवंशिकता से तात्पर्य एक प्रजाति में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विशेषताओं
को पहुँचाने की प्रक्रिया है।
Q.46. सामाजिक विकास से क्या तात्पर्य है ?
Ans. सामाजिक विकास से तात्पर्य सामाजिक प्रत्याशाओं के अनुरूप व्यवहार करने की
क्षमता से होती है।
Q.47. बच्चों के समाजीकरण पर किन कारकों का प्रभाव पड़ता है ?
Ans. बच्चों के सामाजीकरण पर उसके स्वास्थ्य, बुद्धि, शारीरिक बनावट, पारिवारिक
वातावरण, स्कूल आदि कारकों का प्रभाव पड़ता है ।
Q.48. बच्चों में होने वाले प्रारंभिक सामाजिक विकास के मुख्य प्रकार कौन हैं?
Ans. प्रारंभिक सामाजिक विकास के अन्तर्गत अनुकरण, सहयोग, मित्रता, सहानुभूति
प्रतिद्वन्द्विता आदि आते हैं।
Q.49. किसी घर में क्षमता से अधिक लोगों के रहने से क्या-क्या कठिनाइयाँ उत्पन्न
होती हैं?
Ans. प्रयुक्त किये जाने वाले साधनों (खिलौने,टी. वी.) के लिए छीना-झपटी होने लगता
है । पठन-पाठन एवं व्यवस्था संबंधी महाअभाव कष्ट देता है ।
Q.50. प्रमस्तिष्क की महत्त्वपूर्ण भूमिका क्या होती है ?
Ans. भाषा, प्रत्यक्षण एवं बुद्धि के संचालन में सक्रिय योगदान करता है ।
Q.51. शैशवावस्था में भी संवेदी योग्यताएँ होती हैं, इसका एक लक्षण बतावें ।
Ans. जन्म के कुछ घंटे बाद बच्चे अपनी माँ की आवाज को पहचान सकते हैं । मुँह की
आकृति बदलकर तथा हाथ-पैर हिलाकर वह अपनी खुशी को प्रकट करता है ।
Q.52. आसक्ति किसे कहते हैं ?
Ans. किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आंतरिक लगाव या स्नेह से उत्पन्न सांवेगिक बंधन
को आसक्ति कहते हैं।
Q.53. लिंग प्ररूपण कब उत्पन्न होता है ?
Ans. जब किसी समाज के महिला एवं पुरुष के लिए उचित व्यवहार के अनुरूप सूचनाओं
को कूट संकेतिक तथा संगठित करने के लिए तैयार समझा जाता है ।
Q.54. डेविड एलकाइड के अनुसार किशोरों के अहं केन्द्रवाद के दो मुख्य घटक
क्या हैं?
Ans. (क) काल्पनिक श्रोता तथा
(ख) व्यक्तिगत दंतकथा ।
Q.55. किशोरों की पहचान निर्माण का कारक ‘व्यावसायिक प्रतिबद्धता’ का आधार
कहलाने योग्य एक प्रश्न का उल्लेख करें ।
Ans. बड़े होकर आप क्या करेंगे?
Q.56. उपचार से संबंधित दो प्रमुख पद बतावें ।
Ans. (i) अपराध तथा (ii) कर्त्तव्य विमुखता ।
Q.57. मादक द्रव्यों का दुरुपयोग मनुष्य के किस अवस्था में अधिक पाया जाता है ?
Ans. किशोरावस्था का समय ।
Q.58. आहार ग्रहण संबंधी विकार का एक उदाहरण दें।
Ans. मनोग्रस्ति अवस्था भूखा रहकर शरीर को दुबला एवं आकर्षक बनाने का कठिन
प्रयास आहार संबंधी एक प्रचलित विकार है।
Q.59. पति-पत्नी की तलाक का प्रभाव पति पर किस प्रकार पड़ता है ?
Ans. पति अकेलापन महसूस करता है तथा बच्चों की देख-रेख तथा भोजन निर्माण संबंधी
समस्याओं में उलझ जाता है ।
Q.60. परम्परागत रूप से सेवा-निवृत्ति को व्यक्ति की किस अवस्था से जोड़ा जाता है ?
Ans. सेवा-निवृत्ति को वृद्धावस्था से जोड़ा जाता है ।
Q.61. विधवाओं तथा विधुरों में किसकी संख्या अधिक होती है ?
Ans. विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक होती है ।
Q.62. मेडागास्कर की टनाला संस्कृति में मृत्यु का कारण किसे माना जाता है ?
Ans. टनाला संस्कृति में मृत्यु का कारण प्राकृतिक शक्तियों को माना जाता है ।
Q.63. बच्चों में सामाजिक विभेदन की क्षमता किस उम्र में विकसित होती हैं ?
Ans. बच्चों में सामाजिक विभेदन की क्षमता 12-13 साल की उम्र में होती है।
Q.64. भारत में किस उम्र के व्यक्ति द्वारा अपराध करने पर उसे बाल अपराध के
अन्तर्गत रखा जाता है ?
Ans. भारत में 14 से 18 वर्ष की उम्र के लोगों द्वारा अपराध करने पर उसे बाल अपराध
के अन्तर्गत रखा जाता है ।
Q.65. बाल अपराध के मुख्य कारक क्या हैं ?
Ans. बाल अपराध के मुख्य कारकों में मनोवैज्ञानिक कारक, पारिवारिक कारक, सामाजिक
कारक तथा आर्थिक कारक आदि आते हैं।
                                                          लघु उत्तरीय प्रश्न
                                  (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)
Q.1. विकास से आप क्या समझते हैं ?
Ans. विकास का अर्थ (Meaning of Development)-विकास उन प्रगतिशील
परिवर्तनों को कहते हैं, जिनका प्रारम्भ नियमित एवं क्रमिक होता है तथा परिपक्वता-प्राप्ति की
ओर निर्देशत रहता है । ‘विकासात्मक क्रम’ (Development sequence) की हर अवस्था और
इसके बाद वाली अवस्था में एक निश्चित प्रकार का सम्बन्ध है। विकास एक ऐसे प्रकार के
‘परिवर्तन’ (types of change) हैं जिनके द्वारा बच्चों में नई ‘विशेषताओं’ (characteristics)
एवं ‘योग्यताओं’ (abilities) का समावेश हो जाता है । बच्चे के जीवन की प्रारम्भिक अवस्था
में उसके बाद के जीवन की अपेक्षा अधिक तेजी से परिवर्तन होता है, परन्तु सबसे अधिक तेजी
से परिवर्तन ‘जन्म के पूर्व की अवस्था’ (prenatal stage) में हो जाता है । इस अवस्था में
होनेवाले परिवर्तन, विकास के उन्हीं नियमों (principles of development) का अनुसरण करते
हैं, जिनका अनुसरण ‘जन्म के बाद होनेवाले विकास करते हैं । बच्चे में सामान्य विकास किस
तरह होते हैं, उसकी जानकारी से कई ‘लाभ’ (advantages) हैं-
(क) इससे इस बात का ज्ञान हो जाता है कि बच्चे का हर उम्र (all ages) में कितना
विकास होना चाहिए और बच्चे के विभिन्न प्रकार के व्यवहार कब शुरू होंगे और किस अवस्था
में परिपक्व (matured) हो जाएँगे;
(ख) चूँकि प्रत्येक बच्चे में समान प्रकार की विकास प्रणाली पाई जाती है, इसलिए यह
जानना आसान हो जाता है कि किस बच्चे का विकास सामान्य (normal) ढंग और किसका
असामान्य (abnormal) ढंग का हो रहा है;
(ग) उचित विकास के लिए इस ज्ञान के आधार पर बच्चों को समय-समय पर निर्देशित
(guided) किया जाना सम्भव हो जाता है।
Q.2. बड़े समूहों का मापन क्या है ?
Ans. बड़े समूहों का मापन (Measurement of large groups)-इस विधि द्वारा
विभिन्न उम्र-स्तर (age-levels) के बच्चों के बड़े समूहों का अध्ययन किया जाता है । ऐसा करने
का लक्ष्य (aim) है एक विशिष्ट उम्र-स्तर (age-level) में बच्चों में होनेवाले प्रामाणिक विकास
(standard develoment) का पता लगाना | इस विधि का उपयोग विशेषकर बच्चों के शारीरिक
विकास-ऊंँचाई, वजन तथा सामान्य बुद्धि-के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने हेतु ही किया गया
है । यह ‘पुनः परीक्षण’ (re-examination) विधि से, जिसकी चर्चा आगे की जाएगी, आसानी
से उपयोग में लाया जा सकता है और इसमें ज्यादा समय भी नहीं लगता। इसमें पुनर्निरीक्षण-विधि
की तरह प्रत्येक वर्ष बच्चों के एक ही समूह का अध्ययन बार-बार नहीं किया जाता, इसलिए ।
इसके उपयोग में समय भी कम लगता है।
परन्तु, इस विधि में भी ‘त्रुटियाँ’ हैं। इस विधि की सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि करीब-करीब
बराबर संख्या में भिन्न-भिन्न उम्र के बच्चों का मिलना मुश्किल है । अत: इस प्रश्न का कोई
निश्चित उत्तर देना कठिन है कि क्या एक बार चार वर्ष के बच्चों के समहों की जाँच प्रत्येक
एक वर्ष के बाद करने पर उनमें वे सभी शारीरिक एवं मानसिक विकास पाए जाएंगे, जैसा कि
विभिन्न उम्र के भिन्न-भिन्न समूहों के बच्चों में पाए गए थे और जिनके आधार पर उस
उम्र-विशेष में होनेवाले प्रामाणिक, शारीरिक एवं मानसिक विकास (standard, physical and
mental development) का पता लगाया गया ।
यदि हम इस विधि के आधार पर किसी सही निष्कर्ष पर पहुँचना चाहें तो हमें काफी संख्या
में प्रत्येक उम्र-स्तर (age-level) के बच्चों को विभिन्न समुदायों (different community) से
‘अनियमित ढंग से चुनकर’ (random sampling) उनका अध्ययन करना पड़ेगा । तत्पश्चात् जो
प्रदत्त प्राप्त होंगे, उनके आधार पर हम प्रत्येक उम्र-स्तर (age-level) में होनेवाले शारीरिक एवं
मानसिक विकास का पता लगाएंगे और उन्हें हम प्रामाणिक (standard) मान सकते हैं । इसके
आधार पर हम किसी एक खास बच्चे के विकास के संबंध में सही एवं विश्वसनीय निष्कर्ष
निकाल सकते हैं।
Q.3. विकासात्मक मनोविज्ञान क्या है ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान मनोविज्ञान की ऐसी शाखा है जो गर्भधारण से मृत्यु तक
मनुष्यों में होनेवाले विकास का अध्ययन करता है तथा जिसमें जीवन-अवधि के विभिन्न
अवस्थाओं में होनेवाले परिवर्तनों पर बल डाला जाता है । इस मनोविज्ञान में 19-20 साल तक
होनेवाले कुछ खास-खास विकासात्मक परिवर्तन, जैसे दैहिक विकास में परिवर्तन, संवेदी तथा
क्रियात्मक विकास में परिवर्तन, भाषा विकास में परिवर्तन, सामाजिक विकास में परिवर्तन, खेल
विकास में परिवर्तन, नैतिक एवं चारित्रिक विकास में परिवर्तनों आदि के अध्ययन पर अधिक बल
डाला जाता है।
Q.4. विकासात्मक मनोविज्ञान की विषय-वस्तु क्या है ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान की विषय-वस्तु विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन करना
है। प्राणी के विकास से तात्पर्य समय बीतने के साथ उनमें होनेवाले एक क्रमिक परिवर्तन से
होता है। विकास से संबंधित परिवर्तनों को विकासात्मक परिवर्तन कहा जाता है। ऐसे तो मानव
व्यवहार में विकासात्मक परिवर्तन जीवन अवधि के सभी अवस्थाओं (stages) में होता है, परन्तु
19-20 साल तक की अवधि तक ऐसे परिवर्तन बहुत ही स्पष्ट रूप से होते हैं। इन परिवर्तनों में
संवेदी विकास में परिवर्तन, क्रियात्मक विकास में परिवर्तन, भाषा विकास में परिवर्तन, सांवेगिक
विकास में परिवर्तन, सामाजिक विकास में परिवर्तन, खेल विकास में परिवर्तन, दैनिक परिवर्तन आदि
प्रमुख हैं। इन परिवर्तनों के अलावा विकासात्मक मनोविज्ञान में विकास के सामान्य नियमों का
भी गहन रूप से अध्ययन किया जाता है।
Q.5. विकासात्मक मनोविज्ञान के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के जीवन अवधि के भिन्न-भिन्न
अवस्थाओं में होनेवाले विकासात्मक परिवर्तनों को समझना तथा उसके बारे में भविष्यवाणी करना
है। विकासात्मक मनोवैज्ञानिक बच्चों के जीवन के विभिन्न अवस्थाओं विशेषकर 19-20 साल
तक की अवधि में होनेवाले विकासात्मक परिवर्तनों को समझने की कोशिश करते हैं तथा उसके
आधार पर वे उनके द्वारा आगे चलकर किये जाने वाले व्यवहारों की भविष्यवाणी भी करते हैं।
इस तरह से विकासात्मक मनोवैज्ञानिक बच्चों के वर्तमान विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन
करके उनके सामाजिक विकास, सांवेगिक विकास, भाषा विकास, खेल विकास, चारित्रिक विकास
आदि के बारे में उत्तम भविष्यवाणी कर पाते हैं । इससे उन्हें विकास के क्रम (sequence) को
समझने में भी विशेष मदद मिलती है।
Q.6. मानव विकास को प्रभावित करने वाली प्रमुख क्रियाओं के लिए एक-एक
उदाहरण दें।
Ans. मानव विकास को प्रभावित करने वाली तीन प्रमुख क्रियाएँ निम्नलिखित है:-
(i) जैविक क्रिया-लम्बाई, वजन, हृदय एवं फेफड़ों का विकास ।
(ii) संज्ञानात्मक क्रिया-ज्ञान, अनुभव, समस्या समाधान से जुड़े विकास ।
(iii) समाज-सांवेगिक क्रिया-बच्चों का माँ से लिपट जाने की प्रवृत्ति,      हारने पर दुःख
व्यक्त करने की लत ।
Q.7. संवृद्धि का संबंध किस स्तर की वृद्धि से है ?
Ans. हाथ, पैर, वजन, मोटापन जैसे शारीरिक अंगों की वृद्धि का संबंध संवृद्धि से
है। संवृद्धि सम्पूर्ण जीव की बढ़ोतरी को भी कहते हैं। एक बच्चा कम समय में ही यदि काफी
लम्बा हो जाता है तो माना जाता है कि बच्चे में शारीरिक संवृद्धि हुई है
Q.8. पुनः परीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं ?
Ans. पुनः परीक्षण-विधि (Re-examination)-इस विधि द्वारा एक ही व्यक्ति या कई
व्यक्तियों का अध्ययन बार-बार कुछ-कुछ समय के बाद किया जाता है । यह ‘पुन: परीक्षण’
हर एक दिन के बाद या हर एक सप्ताह या हर एक महीने या हर एक साल के बाद किया जा
सकता है । यह विधि पहली विधि की अपेक्षा अधिक समय लेती है और इसके उपयोग करने
में काफी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है । इस विधि द्वारा एक खास उम्र के बच्चों
के एक बड़े समूह का अध्ययन न कर, एक ही बच्चे का अध्ययन बार-बार किया जाता है।
अतः इससे बच्चों की विभिन्न अवस्थाओं में होनेवाले शारीरिक एवं मानसिक विकास का समुचित
ज्ञान प्राप्त हो जाता है । इस विधि द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि सामान्य बच्चों
में होनेवाले विकास का क्रम एवं गति करीब-करीब एकसमान होते हैं । इसलिए बच्चों के बड़े
समूहों का अध्ययन करना अनिवार्य नहीं है किन्तु, इस विधि को उपयोग में लाने के समय कुछ
कठिनाइयाँ सामने आती हैं; जैसे-प्रत्येक वर्ष पुनः परीक्षण के लिए अध्ययन किए गए उन्हीं सारे
बच्चों के मिलने में काफी दिक्कत होती है।
बच्चों की ‘बुद्धि का विकासात्मक अध्ययन’ करने के लिए टरमन (Terman) ने इस विधि
का उपयोग किया है । गेंसेल (Gensell) ने भी येल साइकोलॉजिकल क्लिनिक (Yale
Psychological Clinic) में इस विधि द्वारा 100 बच्चों का अध्ययन हर एक महीने के बाद किया
और विकास-नियम (development norms) की भी स्थापना की । इसके अतिरिक्त, शर्ली
(Shirley). बर्नसाइड (Burnside) तथा हालवरसन (Halverson) ने भी इस विधि का उपयोग
बच्चों के अध्ययन हेतु किया, जिसकी विशद व्याख्या करना यहाँ अभीष्ट नहीं है ।
Q.9. परिपक्वता से आप क्या समझते हैं ?
Ans. परिपक्वता (Maturation) शारीरिक एवं मानसिक गुणों के विकास का कारण
इन गुणों की परिपक्वता’ (maturation) भी है । परिपक्वता का अर्थ है मनुष्य के अन्दर वर्तमान
उन गुणों का विकास होना, जो वे अपने माता-पिता एवं अन्य पूर्वजों से ग्रहण करते हैं । परिपक्वता
के द्वारा जिन गुणों का आविर्भाव होता है वे एकाएक (suddenly) आते है; जैसे-ज्योंही बच्चे
युवावस्था को प्राप्त करते हैं उनके चेहरे पर एकाएक बाल उग आते हैं और उनकी बोली भी
भारी हो जाती है । शारीरिक परिवर्तनों के साथ-साथ उनकी मनोवृत्ति (attitudes) में भी परिवर्तन
हो जाता है। विशेषकर विषमलिंगियों (oppositesex) के प्रति उनकी मनोवृत्ति में काफी परिवर्तन
होता है । यही कारण है कि इस उम्र में लड़के लड़कियों को और लड़कियाँ लड़कों को चाहने
लगती हैं।
Q.10. पर्यावरण से आप क्या समझते हैं ?
Ans. पर्यावरण क्या है, इस संदर्भ में अनेक मनोवैज्ञानिकों ने इसे परिभाषित करने का प्रयास
किया है।
पर्यावरण दो शब्दों के मेल से बना है परि और आवरण । परि का तात्पर्य चारों ओर तथा
आवरण का अर्थ ढंका हआ होता है । इस अर्थ में हम कह सकते हैं कि पर्यावरण वह है जो
व्यक्ति को चारों ओर से घेरे हुए है। जिस्वर्ट ने पर्यावरण को परिभाषित करते हुए लिखा है-
“पर्यावरण वह है जो वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता।”
रॉस के शब्दों में,”पर्यावरण कोई भी बाहरी शक्ति है, जो हमें प्रभावित करती है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से पर्यावरण का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। वस्तुतः, पर्यावरण एक
विस्तृत अवधारणा है । यह व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करता है।
Q. 11. वंशानुक्रम से आप क्या समझते हैं ? व्यक्ति पर वंशानुक्रम के पड़ने वाले
प्रभावों का वर्णन करें ।
Ans. व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास पर मुख्य रूप से दो कारकों का प्रभाव पड़ता है ये
कारक हैं, वंशानुक्रम एवं वातावरण । मनोवैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों ने दोनों कारकों की भूमिका
तथा प्रभाव का उल्लेख किया है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व विकास के लिए सिर्फ वंशानुक्रम
को ही महत्त्वपूर्ण माना है और कहा है कि जैसी वंश-परंपरा होगी वैसी ही उसकी संतानें भी
होंगी । जबकि इसके विपरीत कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास पर
पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है । वाटसन ने वातावरण के महत्त्व को स्थापित करते हुए कहा है
कि “मुझे एक दर्जन स्वस्थ बच्चे दीजिए मैं उसे किसी भी रूप में विकसित कर सकता हूँ ।
उसे डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, नेता, व्यापारी अथवा चोर बना सकता हूँ।”
उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट हो जाता है कि मनोवैज्ञानिक में एक मत का अभाव है । अत:
वंशानुक्रम एवं वातावरण के अध्ययन से स्पष्ट हो सकता है कि किसका प्रभाव सर्वाधिक होता
है।
वंशानुक्रम से तात्पर्य व्यक्तियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक एवं
अन्य व्यक्तित्व के शीलगुणों से है। इस मान्यता के अनुसार जिस प्रकार के माता-पिता होंगे संतानें
भी उसी के अनुरूप होंगी । बेंकन ने वंशानुक्रम को परिभाषित करते हुए कहा है, “दो पीढ़ियों
को जोड़ने वाली श्रृंखला को वंशानुक्रम कहते हैं ।
जिंसबर्ट के अनुसार, “वंशानुक्रम का तात्पर्य माता-पिता द्वारा संतानों के जैवकीय अथवा
मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के हस्तांतरण से है।”
रूथ बेनेडिक्ट ने कहा है, “माता-पिता से सन्तान को हस्तांतरित होने वाले गुणों को
वंशानुक्रम कहते हैं।”
उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि वंशानुक्रम का गुण बच्चों को माता-पिता से प्राप्त होता
है । इसमें माता-पिता जो गुण अपने पीढ़ियों से प्राप्त करते हैं उसे अपनी संतान तक पहुँचाने का
कार्य करते हैं।
Q. 12. विकास की गति को प्रभावित करनेवाले कारक का वर्णन कीजिए ।
Ans. बच्चे का शारीरिक एवं मानसिक विकास उसके जीवकोष (germ-cell) की बनावट
(structure) पर निर्भर करता है । जैसा जीवकोष होगा, बच्चे का विकास भी वैसा ही होगा ।
फिर भी, ‘बच्चों की क्रियाएँ’ (activiries), ‘भोजन’ (food), ‘अभ्यास’ (exercise), ‘शिक्षा’
(education) इत्यादि का भी उसकी विकास गति पर काफी प्रभाव पड़ता है। चिकित्सकों ने
इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि बचपन का ‘पौष्टिक भोजन’ बच्चों के विकास में काफी
सहायक होता है। बच्चे के विकास की गति में परिवर्तन एवं परिमार्जन, उसकी विकास प्रक्रिया
(growth- process) की गति को बढ़ाकर या घटाकर या इसको प्रभावित करनेवाले अंगों
(factors) को नियंत्रित (conrol) कर लाया जा सकता है ।
Q. 13. जन्म के पूर्व की अवस्था से आप क्या समझते हैं ?
Ans. जन्म के पूर्व की अवस्था (pre-natal period) यह ‘गर्भाधान (conception)
से लेकर जन्म होने (birth) तक की अवस्था’ है । यह अवस्था करीब-करीब 9 महीने या 280
दिन की होती है । इतनी छोटी अवधि होने पर भी इस अवस्था में विकास किसी भी अन्य अवस्था
की अपेक्षा अधिक तेजी से होता है । इस अवस्था में बच्चे का विकास एक सूक्ष्म जीवकोष
(germ-cell) से 9 महीने के अन्दर की छह से आठ पौण्ड के वजन (weight) और करीब-करीब
20 इंच की लम्बाई में हो जाता है । निस्सन्देह, इस विकास को हम एक ‘तीव्र विकास’ (rapid
development) कहेंगे । इस समय होनेवाले विकास अधिकतर शारीरिक (physiological) ही
होते हैं।
Q.14.शैशवावस्था क्या है?
Ans. शैशवावस्था (Infancy)-‘जन्म से लेकर 10-14 दिनों की अवस्था’ को ही
शैशवावस्था (infancy) कहते हैं । इस अवस्था के बच्चों को नियोनेट या नवजात शिशु
(newborn infant) कहते हैं । इस अवस्था में बच्चे में कोई विकास नहीं होता है, क्योंकि इस
समय वह अपने नए वातावरण से अपने को अभियोजित करने में व्यस्त रहता है।
Q.15. बचपनावस्था का अर्थ बतायें ।
Ans. बचपनावस्था (Babyhood)-‘दो सप्ताह से लेकर करीब दो वर्ष तक’ की
अवस्था को ही बचपनावस्था (babyhood) कहते हैं । इस अवस्था में बच्चा बिल्कुल निस्सहाय
(helpless) रहता है । वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इस अवस्था में दूसरों पर
ही निर्भर रहता है। धीरे-धीरे बच्चा अपनी मांसपेशियों को नियंत्रित करना सीख लेता है । फलतः
वह अधिक आत्मनिर्भर (Self-dependent) हो जाता है तथा स्वयं खाने, चलने, पोशाक पहनने
और खेलने लगता है।
Q.16. बाल्यावस्था पर संक्षिप्त नोट लिखें।
Ans. बाल्यावस्था (Childhood) साधारणतः ‘जन्म से लेकर अपरिपक्वता (immaturity)
तक की अवस्था’ को बाल्यावस्था (childhood) कहा जाता है, परन्तु वस्तुत: ‘2 वर्ष से लेकर
11 वर्ष की अवस्था’ (जिसे तरुणावस्था भी कहते हैं) को ही बाल्यावस्था कहा जाता है। इस
अवस्था का सबसे प्रथम विकास होता है, वातावरण पर नियंत्रण (control of environment)
इस अवस्था में बच्चा सामाजिक अभियोजन (social adjustment) करना भी सीख लेता है।
छह वर्ष की उम्र के करीब से ‘समाजीकरण’ (socialisation) का स्थान महत्त्वपूर्ण रहता है।
6 से लेकर 11 वर्ष की अवस्था को गैंग एज (gange age) या दल की अवस्था कहते हैं । इस
अवस्था का बच्चे के जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है।
Q.17.किशोरावस्था पर प्रकाश डालें।
Ans. किशोरावस्था (Adolescence) सामान्य बच्चों (normal children) में ‘तरुणावस्य’
(puberty) की शुरूआत से लेकर परिपक्वावस्था (maturity) को ही किशोरावस्था (adolescence)
कहते हैं, अर्थात् ’11 से 13 वर्ष के बीच की उम्र से शुरू होकर 21 वर्ष तक की अवस्था’ को
किशोरावस्था कहा जाता है चूँकि यह एक बहुत लम्बी अवस्था है और इस अवस्था के विभिन्न
उम्रों में विभिन्न प्रकार के विकास होते हैं, इसलिए इस अवस्था को भी निम्नलिखित भागों में बाँटा
गया है-
(i) किशोरावस्था के पूर्व की अवस्था (Pre-adolescence)—यह ‘किशोरावस्था के
एक वर्ष की पूर्व की अवस्था’ है । ल कयों में साधारणत: यह अवस्था 11 से 13 वर्ष के बीच
होती है और लड़कों में यह लगभग इसके एक वर्ष बाद आती है । इस अवस्था को बुलहर
(Buhler) ने निषेधात्मक अवस्था (Negative phase) कहा है।
(ii) प्रारम्भिक किशोरावस्था (Early adolescence)- किशोरावस्था के पूर्व की अवस्था
(pre-adolescence) के बाद अर्थात् ’13 से लेकर 16-17 वर्ष की अवस्था’ को प्रारम्भिक
किशोरावस्था (early adolescence) कहते हैं । इस अवस्था में शारीरिक और मानसिक विकास
में पूर्णता (completeness) आ जाती है ।
(iii) किशोरावस्था की अन्तिम अवस्था (Lateadolescence)-विकासात्मक अवस्थाओं
की यह सबसे अन्तिम अवस्था है, जो ’17-21 वर्ष तक’ होती है । इस अवस्था में लड़के और
लड़कियाँ सदा इस बात पर ध्यान देते हैं कि वे दूसरों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन जाएँ । इस
अवस्था में लड़के और लड़कियाँ एक-दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसी अवस्था
में बच्चे का विकास हर तरह से ‘पूर्ण’ (complete) हो जाता है और वह एक वयस्क (adult)
का रूप धारण कर लेता है और पूर्णरूपरेण स्वावलम्बी (completely self-dependent) हो
जाता है तथा अपने जीवन की योजना (plan of life) अपने मनोनुकूल बनाता है । संक्षेप में, हम
कह सकते हैं कि विकास के लम्बे क्रम में, जो गर्भाधान के समय से शुरू होता है, यह सबसे
अन्तिम अवस्था है । इस अवस्था को प्राप्त करने पर व्यक्ति समाज एवं कानून (society and
law) के दृष्टिकोण से परिपक्व (matured) हो जाता है।
Q. 18. आप किस आधार पर कह सकते हैं कि ‘नवजात शिशु’ उतना असहाय नहीं
होता है जितना कि आप सोचते हैं ?
Ans. नवजात शिशु जीवन की कार्य-प्रणाली को बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक
क्रियाओं को व्यवहार में लाना जानता है । जैसे, वह माँ का दूध पीना जानता है, चममच से पिलाने
पर किसी भी द्रव को निगलना जानता है, आवश्यकतानुसार वह मल-मूत्र त्याग करने की कला
भी सीख चुका होता है।
नवजात शिशु जीवन के प्रथम सप्ताह में ही ध्वनि की दिशा पहचानता है। अपनी माँ की
आवाज को पहचान लेता है । खुशी या गम को बताने के लिए रोना-हँसना, जीभ बाहर निकालना
तथा मुँह खोलना सभी तरह का ज्ञान हासिल कर लेता है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि
नवजात शिशु अनुमान से अधिक जानकारी ग्रहण करके असहाय कहलाने से बचने के योग्य बन
जाता है।
Q, 19. वस्तु स्थायित्व का अर्थ सोदाहरण बतावें ।
Ans. वस्तु स्थायित्व एक संवेदी अनुभव की स्थिति होती है जिसमें बच्चों को वस्तु के
छिपा दिये जाने का आभास नहीं होता है, लेकिन उसका अस्तित्व उसके दिमाग में बना रहता है।
बच्चा उस वस्तु के नष्ट हो जाने का भाव व्यक्त करने पर भी उस वस्तु की प्राप्ति के लिए प्रयास
करता रहता है । इस विशिष्ट चेतना या जानकारी की आवश्यकता तब होती है जब वस्तु स्पष्ट
रूप से नजर के सामने नहीं रहता है।
जब कोई बच्चा कलम लेकर उसे तोड़ना चाहता है तो हम यह कहकर कलम को छिपा
देते हैं कि कलम को कौआ लेकर भाग गया । कभी-कभी हम कलम को दूर फेकने का अभिनय
भी करते हैं।
Q. 20. वृद्धावस्था में होने वाले शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन का वर्णन करें ।  [B.M.2009 A]
Ans. वृद्धावस्था में पारिवारिक संरचना में परिवर्तन तथा नयी भूमिकाओं से समायोजन की
आवश्यकता होती है वृद्धावस्था में व्यक्ति शक्तिहीनता का अनुभव एवं स्वास्थ्य तथा वित्तीय
संपत्तियों का क्षणी होना, असुरक्षा एवं निर्भरता को जन्म देता है सक्रियता व्यावसायिक जीवन से
सेवानिवृत होना महत्वपूर्ण होता है । पति या पत्नी की मृत्यु होने पर वे दुःख का अनुभव करते
हैं इन्हें अकेलापन, अवसाद वित्तीय क्षति से समायोजन स्थापित करना होता है।
Q.21. वृद्धावस्था को क्यों नहीं पसन्द किया जाता है
Ans. वृद्धावस्था प्राप्त व्यक्ति को लोग भयावह स्थिति में पहुँच जाने वाला व्यक्ति मान
लेते हैं । वृद्धावस्था अनेक समस्याओं को साथ लाता है-
(i) वृद्धावस्था सेवानिवृत हो जाने का प्रमुख कारण माना जाता है । इससे व्यक्ति को समय
काटना मुश्किल हो जाता है।
(ii) आर्थिक सहयोग तथा अकेलापन दूर करने के लिए वृद्ध अपने बच्चे पर निर्भर हो जाते
हैं।
(iii) बीमारी और शक्ति क्षीणता के साथ संवेदी अंगों में आनेवाली विसंगति या वृद्ध व्यक्ति
को असहाय जैसी जिन्दगी दे देता है।
(iv) वृद्ध स्वतंत्रता, मृत्यु और सुरक्षा की दृष्टि से स्वयं को आश्रित मान लेते हैं ।
(v) नयी पीढ़ी के आचरण, मूल्य एवं आदत से वे सदा चिंतित रहते हैं।
अतः स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वतंत्रता, स्वावलंबन की दृष्टि से कमजोर अवस्था को कोई पसन्द
नहीं करता है।
                                                  दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
                             (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)
Q.1. विकास से आप क्या समझते हैं ? विकास से होने वाले परिवर्तनों का प्रकारों  
का वर्णन करें।
Ans. विकास का तात्पर्य गर्भावस्था से प्राणी में होने वाले निरंतर रूपान्तरण है । प्रारंभ
में बच्चों के विकास का अध्ययन जन्मकाल से किया जाता था । परन्तु आधुनिक युग में गर्भावस्था
से ही उसके विकास का अध्ययन किया जाता है । विकास प्रगतिशील परिवर्तनों की वह नियमित
और संगठित प्रणाली है जो व्यक्ति को परिपक्वता की ओर अग्रसर करती है । विकास से परिवर्तन
होता है जिसमें एक निश्चित दिशा होती है । ये परिवर्तन नियमित और संगठित होते हैं । विकास
के क्रम एक-दूसरे से संबंधित हैं अर्थात् विकास का पहला क्रम दूसरे क्रम पर आधारित होता
है।
विकास के परिणामस्वरूप बच्चों में नयी-नयी विशेषताएँ आती हैं। विकास को परिभाषित
करते हुए वाटसन ने कहा है, “निषेचित अण्डाणु से माता-पिता के समान प्राणी के रूप में होने
वाले रूपान्तरण को विकास की प्रक्रिया कहते हैं।”
विकास की प्रक्रिया को दो भागों में बाँटा जा सकता है-
(i) जन्म के पूर्व विकास की अवस्था,
(ii) जन्म के बाद विकास की अवस्था ।
जन्म के पूर्व बच्चों का विकास माँ के गर्भ में होता है । 280 दिनों तक गर्भ में शिशु का
पूर्ण विकास हो जाता है तब उसका जन्म होता है ।
विकास से होने वाले परिवर्तन-विकास की अवस्था में बच्चों में अनेक प्रकार के परिवर्तन
होते हैं । इन परिवर्तनों का विवरण निम्नलिखित है-
1.आकार में परिवर्तन-विकास का सबसे पहला लक्षण है कि बच्चों के शरीर के आकार
में वृद्धि होती है । जन्म के समय बच्चे अठारह इंच के होते हैं जो बढ़कर बारह वर्षों में 48 इंच
के हो जाते हैं । इसी प्रकार जन्म के समय उसमें बोलने की क्षमता नहीं होती है, एक वर्ष में
दो-तीन शब्दों को बोलने लगता है।
2. अनुपात में परिवर्तन-अनुपात में परिवर्तन से तात्पर्य यह है कि शरीर के विभिन्न अंगों
का विकास समान अनुपात में नहीं होता है। किसी अंग का विकास अधिक और किसी अंग का
कम विकास होता है । जन्म के बाद सिर का जितना विकास होता है उससे बहुत ज्यादा विकास
पैरों का होता है।
3. पुरानी विशेषताओं का लुप्त होना-विकास में केवल शरीर का विकास ही नहीं बल्कि
बचपन की अनेक विशेषताएँ लुप्त होने लगती हैं । उसमें थाइमस ग्रन्थि का स्राव क्रमशः कम
होते जाता है । जन्म के समय शिशु के शरीर पर रोएँ होते हैं जो धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं ।
दूध के दाँत अपने-आप समय आने पर टूट जाते हैं । इसी प्रकार चूसना, मुट्ठी बाँधना आदि
क्रियाएँ धीरे-धीरे समाप्त होती जाती हैं । चिन्तन करते समय बच्चे बोलते हैं, उम्र वृद्धि के साथ
यह क्रिया भी धीरे-धीरे लुप्त हो जाती है।
4. नई विशेषताओं की प्राप्ति-बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उनमें नई-नई विशेषताएंँ
उत्पन्न होती चली जाती हैं। नई विशेषताओं का उत्पन्न होना परिपक्वता और शिक्षण पर निर्भर
करता है । परिपक्वता के आधार पर जो नई विशेषताएँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें रोका नहीं जा सकता
है । परन्तु जो परिवर्तन प्रयास के फलस्वरूप होते हैं उसे बच्चे वातावरण के प्रभाव से सीखते
हैं । दाढ़ी-मूंछ निकलना, दाँत टूटने के बाद नए दाँत निकलना आदि परिपक्वता के कारण होता
है, जबकि भाषा का सीखना, मनोवृत्तियों का निर्माण आदि शिक्षण के आधार पर होता है ।
Q.2. भारत में मनोविज्ञान के विकास का वर्णन करें ।               [B. M. 2009 A]
Ans. भारतीय मनोविज्ञान का आधुनिक काल कलकता विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग
में 1915 में प्रारंभ हुआ जहाँ प्रायोगिक मनोविज्ञान का प्रथम पाठ्यक्रम प्रयोगशाला स्थापित हुई।
दुर्गानंद सिन्हा ने अपनी पुस्तक साइकोलॉजी इन ए थर्ड वर्ल्ड कन्ट्री दि इंडियन एन स्पीरियन्स
में भारत में सामाजिक विज्ञान के रूप में चार चरणों में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास को खोजा
है प्रथम चरण में प्रयोगात्मक, मनोविश्लेषणात्मक एवं मनोवैज्ञानिक अनुसंधान पर बहुत बल था,
जिसने पाश्चात्य देशों का मनोविज्ञान के विकास में योगदान परिलक्षित हुआ था द्वितीय चरण में
भारत में मनोविज्ञान की विविध शाखाओं में विस्तार का समय था । इस चरण में मनोवैज्ञानिकों
की इच्छा थी कि भारतीय सन्दर्भ में जोड़ा जाय । फिर भी, भारत में मनोविज्ञान 1960 के बाद
भारतीय समयज के लिए समस्या केन्द्रित अनुसंधान द्वारा सार्थक हुआ । चतुर्थ चरण के रूप
में 1970 के अंतिम समय में देशज मनोविज्ञान का उदय हुआ। इसमें भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने
ऐसी समझ विकसित करने का आवश्यकता पर बल दिया जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से
सार्थक ढाँचे पर आधारित था । इस रुझान की झलक उन प्रयासों में दिखी, जिनसे पारंपरिक
भारतीय मनोविज्ञान पर आधारित उपागों का विकास हुआ, इस प्रकार इस चरण की विशेषता
को देशज मनोविज्ञान के विकास, जो भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ से उत्पन्न हुआ था तथा भारतीय
मनोविज्ञान एवं समाज के लिए सार्थकता ।
Q.3. विकास की विशेषताओं का वर्णन करें।
Ans. मानव-विकास की बहुत-सारी विशेषताएँ (characteristics) हैं, जो उसे प्रभावित
करती रहती हैं । उन सबकी व्याख्या करना यहाँ सम्भव नहीं । अतः उनमें से कुछ मुख्य
विशेषताओं की चर्चा उनकी ‘प्रधानता’ (importance) के अनुसार एक-एक नीचे की जाती है-
1. विकास एक प्रणाली का अनुसरण करता है (Development follows a patten)-
हर प्रकार के जीव में, चाहे वह जानवर हो या मनुष्य, विकास की एक ‘विशिष्ट प्रणाली’ होती
है । हर जाति (species) का प्रत्येक जीव इस विकास प्रणाली का अनुसरण करता है ।
मानव-शिशु का विकास अनियमित और अव्यवस्थित ढंग का नहीं होता, वरन् यह ‘नियमित और
सुव्यवस्थित’ होता है । बच्चों के जन्म के पूर्व एवं बाद में होनेवाले विकास-दोनों के संबंध में
ये बातें पाई जाती हैं । गेसेल (Gesell) ने बाल विकास-संबंधी येल क्लीनिक (Yale Clinic of
Child Development) द्वारा प्राप्त प्रदत्तों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि बच्चों के
व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन एक ‘क्रमिक प्रणाली’ का अनुसरण करते हैं और इन पर अनुभवों
(experiences) का अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है । चूँकि विकास प्रणाली की विभिन्न
‘अवस्थाएँ’ (stages) इस तरह स्थायी ढंग से एक खास उम्र में एक-दूसरे के बाद आती हैं कि
एक खास उम्र में होनेवाले विकास के संबंध में ‘नियम’ (srandard or norm) भी बनाए जा
सकते हैं और इनके आधार पर किसी एक सामान्य बालक विशेष में किस उम्र में कितना विकास
होगा, इस संबंध में ‘सही भविष्यवाणी’ करना भी सम्भव है । यही कारण है कि अब वजन-उम्र
(weight-age), ऊँचाई-उम्र (height-age), मानसिक उम्र, सामाजिक विकास-उम्र इत्यादि से
सम्बद्ध प्रामाणिक मापदण्ड (standard scale) हमें उपलब्ध है।
विकास निम्नलिखित दो ‘क्रमों’ (sequences) का अनुसरण करता है-
(क) मस्तकाधोमुखी क्रय या सेफालोकाउडल सीक्वेन्स (Cephalocaudal sequence) तथा
(ख) निकट-दूर का विकासक्रम (proximo-distal sequence)| नीचे संक्षेप में इन दोनों
की चर्चा की जाती है।
(क) मस्तकाधोमुखी क्रय (Cephalocaudal sequence)-प्रायः बच्चों के विकास के
संबंध में यह प्रश्न उठता है-उनका विकास किस ‘दिशा’ (direction) में होता है-पहले विकास
सिर में होता है या धड़ में या पैर में? मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के आधार पर यह प्रमाणित
कर दिया है कि बच्चों के जन्म के पूर्व (prenatal) तथा जन्म के बाद (postnatal) होनेवाले
दोनों प्रकार के विकास मस्तकाधोमुखी क्रम (cephalocaudal sequence) यानी ‘सिर से पैर
की ओर’ का अनुसरण करते हैं । अर्थात् पहले सिर में विकास होता है, तब धड़ में और सबसे
अन्त में पैर में। यदि किसी शिशु को पेट के बल (आँधै) जमीन पर सुला दिया जाए, तो पहले
वह अपने सिर को उठाने में समर्थ होता है, तब गर्दन को, फिर छाती को और उसके बाद ही
वह बैठ जाता है। बच्चे में अपने धड़ (trunk) की मांसपेशियों पर नियंत्रण करने की क्षमता अपनी
बाँहों और पैर की मांसपेशियों से पहले तथा हाथ-पैर की मांसपेशियों पर नियंत्रण की क्षमता इसके
बाद आती है।
(ख) निकट-दूर का विकासक्रम (Proximo-distal sequence) यह विकास-प्रणाली
न सिर्फ मस्तकाधोमुखी क्रम (cephalocaudal sequence) का अनुसरण करती है। इसका अर्थ
यह हुआ कि विकास शरीर के उन अंगों में पहले होता है जो शरीरकेन्द्र (body-axis) के निकट
होते हैं और जो इससे दूर होते हैं उनमें विकास बाद में होता है; जैसे-पहले विकास पेट के अंगों
में होता है, तब जाँघ में और उसके बाद पैर में । ठीक इसी तरह, बच्चा पहले कन्धे (shoulders)
और बाँहों (arms) की मांसपेशियों प नियंत्रण कर पाता है, तभी हाथ और अंगुलियों पर ।
यहाँ पर स्मरण रखने योग्य बात है कि विकास के क्रम में विकास की गति के द्वारा कोई
परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है-ऐसा गेसेल (Geséll) ने अपने अध्ययनों के आधार पर पाया
है । इसी बात का समर्थन एमिस (Ames) ने भी किया है । विकास का क्रम ‘परिपक्वता’
(maturation) से निर्धारित होता है । इस पर अनुभव (experience) का प्रभाव नहीं पड़ता ।
इस संबंध में स्मरणीय दूसरी बात यह है कि बच्चों में होनेवाले सभी विशिष्ट प्रकार के
विकास-संवेगात्मक (emotional), सामाजिक (social), क्रियात्मक (motor) इत्यादि भी एक
विकासक्रम का अनुसरण करते हैं ।
2. सामान्य से विशिष्ट प्रतिक्रिया की ओर विकास होता है (Development
proceeds from general to specifc responses) बच्चों के सभी प्रकार के शारीरिक एवं
मानसिक विकास में बच्चों की प्रतिक्रियाएँ आरम्भ में ‘सामान्य प्रकार’ (general type) की होती
हैं और बाद में ये विशिष्ट’ (specific) हो जाती है । यह बात सर्वप्रथम बच्चों की स्नायविक
प्रतिक्रियाओं (muscular respones) के संबंध में देखी जाती है । बच्चा पहले अपने सारे शरीर
में गति लाता है और उसके बाद ही उसके शरीर के विभिन्न अंगों में गति देखी जाती है । वह
शुरू में अपने हाथ और पाँव को अनियमित ढंग से फेंकता है। धीरे-धीरे उसके शरीर के विभिन्न
अंगों की मांसपेशियों के परिपक्व होने पर वह किसी खास कमांसपेशियों पर नियंत्रण कर
पाता है और उसके पश्चात् ही उसकी प्रतिक्रियाएँ विशिष्ट ढंग (specufic type) की हो जाती
हैं। किसी चीज को पकड़ने के लिए बच्चा पहले अपने शरीर से कोशिक करता है। वह अपने
दोनों हाथों से उसे पकड़ना है और बाद में धीरे-धीरे एक ही हाथ से पकड़ने की समर्थता उसमें
आ जाती है । ठीक यही बात पैरों की गति के साथ पाई जाती है। पहले बच्चा अनियमित ढंग
से अपने दोनों पैरों को फेंकता है, बाद में वह रेंगने, खिसकने और चलने लगता है।
ठीक यही बात बच्चों के ‘प्रत्यय-विकास’ (concept development) के साथ भी पाई
जाती है। बच्चों का प्रत्यय-विकास भी सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है।
बच्चों के संवेगात्मक विकास के सम्बन्ध में भी विकास का यह क्रम पाया जाता है । जन्म
के समय बच्चे संवेगात्मक उत्तेजनाओं के प्रति कोई विशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं करते हैं, वरन् उनकी
प्रतिक्रियाएँ सामान्य ढंग की होती हैं और धीरे-धीरे उनमें विशिष्ट संवेगों-भय, क्रोध, प्रेम
आदि-का विकास होता है।
3. अविराम गति से विकास होता है (Development is continuous)–गर्भधारण
(conception) के समय से परिपक्वता (maturity) तक बच्चे का विकास ‘अविराम गति’ से
होता रहता है । हालाँकि बच्चों के विकास को कई ‘विकासात्मक कालों’ (developmental
periods) में बाँट दिया गया है, फिर भी उनका विकास अविराम गति से होता रहता है । यह
वर्गीकरण सिर्फ उनमें होनेवाले शारीरिक एवं मानसिक विकास को समुचित ढंग से समझने के
हेतु ही किया जाता है तथा यह स्पष्ट करने के लिए किया जाता है कि कौन विशिष्ट प्रकार का
विकास किस अवस्था में होता है । यह समझना बिल्कुल गलत है कि किसी भी शारीरिक या
मानसिक गुण का विकास ‘एकाएक’ (suddenly) होता है। बच्चे में दाँत का विकास पाँच महीने
के गर्भस्थ शिशु में ही शुरू हो जाता है, पर जन्म के पाँच महीने बाद के पहले ये मसूढ़े से बाहर
नहीं निकल पाते हैं । बच्चे का भाषा-विकास भी एकाएक नहीं होता, वरन् यह भी धीरे-धीरे
जन्म-क्रन्दन से शुरू होकर विकास की कई अवस्थाओं को पार कर होता है। अतः स्पष्ट होता
है कि बच्चे में शारीरिक और मानसिक विकास अविराम गति से होते हैं, परन्तु यह सही है कि
शुरू में विकास की गति तेज होती है और बाद में मन्द पड़ जाती है । चूँकि विकास की गति
अविराम (continuous) है, एक अवस्था में होनेवाले विकास और इसके बाद वाली अवस्था में
होनेवाले विकास में परस्पर संबंध है और यह दूसरी अवस्था के विकास को भी प्रभावित करता
है।
4. विकास की गति में होनेवाले वैयक्तिक विभिन्नताएँ स्थायी ढंग की होती हैं
(Individual differences in rate of development remain constant)-विकास की गति
में सदा एकरूपता (consistency) पाई जाती है। जिन बच्चों का विकास आरम्भ में तीव्र गति
से होता है, उनका विकास आगे चलकर भी इसी तरह होता है । इसके विपरीत, जिन बच्चों का
प्रारम्भिक विकास मन्द गति से होता है, उनमें आगे चलकर होनेवाले विकास की गति भी मन्द
होती है; जैसे-जो बच्चा सामान्य उम्र के पहले बैठने लगता है, वह सामान्य उम्र के बच्चों से
पहले चलने भी लगेगा और जो बच्चा सामान्य उम्र में देर से बैठता है, वह सामान्य अवस्था
(standard period) के बाद में ही चल सकेगा । परन्तु, यह बात तब नहीं पाई जाती है जब
बच्चे में विकास के मन्द पड़ जाने का कारण कोई ऐसी बीमारी है, जिसकी चिकित्सा हो सकती
है । चिकित्सा के पश्चात् उसके विकास की गति फिर से सामान्य ढंग की हो जाती है । गेसेल
(Gesell) तथा टरमन (Terman) ने भी यही एकरूपता (consistency) बच्चों के मानसिक
विकास (mental growth) के संबंध में पाई है ।
5. शरीर के विभिन्न अंगों का विकास भिन्न-भिन्न गति से होता है (Development
occurs at different rate for different parts of the body)-शरीर के विभिन्न अंगों का
विकास एक ही गति से नहीं होता है ठीक इसी प्रकार मानसिक विकास (mental growth) की
गति भी एकसमान नहीं होती है। यही कारण है कि सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक विकास
एक ही समय परिपक्वता (maturity) नहीं प्राप्त करते । मस्तिष्क छह से लेकर आठ वर्ष तक
के अन्दर परिक्वता आकार (matured size) प्राप्त कर लेता है । पैर, हाथ, नाक का पूर्ण विकास
किशोरावस्था के प्रारम्भ में हो जाता है । हृदय (heart), पाचन-संस्थान (digestive system),
यकृत (liver) इत्यादि भी किशोरावस्था (adolescence) में ही अपना विकसित रूप धारण कर
लेते हैं । अध्ययनों द्वारा यह स्पष्ट हो चुका है कि बच्चा प्रथम छह वर्ष की अवस्था में अन्य
किसी अवस्था से अधिक नई-नई चीजें सीखता है । खेलने-कूदने की क्रिया सबसे अधिक
बाल्यावस्था (childhood) में पाई जाती है। विकासक्रम की इस विशेषता की पुष्टि के लिए इसी
तरह के कई-एक ओर भी उदाहरण दिए जा सकते हैं।
6. अधिकांश गुणों के विकास में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है (Most traits are co-
related in development)-पहले लोग बच्चे के विकास के सम्बन्ध में क्षतिपूति (compensar
tion) के सिद्धान्त को मानते थे । अर्थात्, जो बच्चा एक गुण (trait) में औसत से कम (below
the average) है, वह इस क्षति की पूर्ति दूसरे गुण में औसत से बढ़कर रकता है । दूसरी ओर,
जो बच्चा एक गुण में औसत से ज्यादा (above the average) रहता है, उसम दूसरे गुण का
विकास औसत से कम होता है। परन्तु, यह विचार गलत साबित हुआ है । वास्तविकता तो यह
है कि जिन बच्चों का विकास एक गुण में औसत से बढ़ कर होता है, उनमें दूसरे गुणों का विकास
भी औसत से बढ़कर होता है। जिन बच्चों का मानसिक विकास औसत से बढ़कर होता है, उनका
शारीरिक विकास भी औसत से बढ़कर होता है और ठीक इसके विपरीत, जिनका मानसिक विकास
औसत से कम होता है, उनका शारीरिक विकास भी औसत से कम होता है। अतः स्पष्ट है कि
अधिकांश गुणों के विकास में पारस्परिक सम्बन्ध (corelation) है।
7. विकास के संबंध में भविष्यवाणी करना सम्भव है (Development is
predictable) सभी सामान्य बच्चों में एक खास उम्र में ही एक प्रकार का विकास होता है।
और उनके विकास की गति भी एकसमान होती है । अतः एक विशिष्ट बच्चे की विभिन्न
अवस्थाओं (different ages) में होनेवाले शारीरिक और मानसिक विकास के संबंध में
भविष्यवाणी करना सम्भव है । इसके आधार पर बच्चा को उचित शिक्षा दी जा सकती है और
उन्हें उनकी योग्यताओं के अनुरूप प्रशिक्षण (training) भी दिया जाना सम्भव है । गेसेल
(Gesell), टरमन (Terman) आदि के अध्ययन इस दिशा में उल्लेखनीय हैं । यहाँ पर यह ध्यान
देने योग्य है कि सही भविष्यवाणी सिर्फ ‘सामान्य विकास’ (normal development) के संबंध
में ही की जा सकती है, सामान्य विकास के संबंध में नहीं ।
8. प्रत्येक विकासात्मक अवस्था का अपना-अपना गुण होता है (Each developmental
phase has characteristic of it) बच्चे के विकास की प्रत्येक अवस्था में कुछ गुणों का
विकास अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक तेजी से होता है। विकास की अन्य अवस्थाओं (periods)
की अपेक्षा जन्म के पूर्व की अवस्था (pre-natal period), बचपनकाल (babyhood) और
किशोरावस्था (adolescence) में शारीरिक विकास (physical development) की प्रधानता
रहती है । शरीर के ऊपर नियोजन का विकास बचपन काल (babyhood) की एक मुख्य
विशेषता है और सामाजिकता (sociability) का विकास बाल्यावस्था के अन्तिम काल (late
childhood) की विशेषता (characteristic) है । अतः उपर्युक्त बातों से यह स्पष्ट है कि विकास
की विभिन्न अवस्थाओं (development periods or phases) का अपना-अपना विशिष्ट गुण
होता है।
9. बहुत प्रकार के व्यवहार, जिन्हें अनुचित समझा जाता है, जिस अवस्था-विशेष में
पाए जाते हैं, उस अवस्था के लिए सामान्य व्यवहार हैं (Many norms of so-called
problem behaviour’ are normal behaviour of the age in which they occur)-
प्रत्येक ‘विकासात्मक अवस्था’ (developmental stage) में कुछ ऐसे अनुचित व्यवहार बच्चों
में पाए जाते हैं, जो उस अवस्था-विशेष के लिए सामान्य व्यवहार (normal behaviour) हैं।
परन्तु उस अवस्था-विशेष को पार करते ही उन व्यवहारों का लोप हो जाता है। जैसे-बाल्यावस्था
के प्रारम्भिक दिनों में बच्चे बहुत जिद्दी स्वभाव (obstinate nature) के रहते हैं, परन्तु
बाल्यावस्था के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते सामान्यत: इसका लोप हो जाता है। प्राथमिक स्कूल
अवस्थाओं (elementary school years) में अधिकांश लड़कियाँ लड़कों से घृणा करती हैं,
परन्तु थोड़े ही समय के बाद जब वे किशोरावस्था में प्रेवश करती हैं, मदों की ओर उनकी
अभिरुचि विशेष रूप से देखी जाती है।
10. प्रत्येक व्यक्ति सामान्यतः विकास की हर प्रमुख अवस्था से गुजरता है (Each
individual normally passes through each major stage of development)—यह
सत्य है कि एक अवस्थाविशेष में होनेवाले विशिष्ट विकास को पूरा होने के लिए कितने समय
की आवश्यकता होती है, इस संबंध में वैयक्तिक विभिन्नता (indivisual difference) पाई जाती
है । फिर भी, यह देखा जाता है कि सामान्यतः विकास का काम 21 वर्ष की अवस्था में पूरा
हो जाता है । बहुत निम्न कोटि की बुद्धिवाले व्यक्तियों में ही यह बात नहीं पाई जाती, चूँकि वे
विकास की सभी अवस्थाओं से नहीं गुजर पाते हैं । अनुपयुक्त वातावरण, क्षीण स्वास्थ्य, विकास
के लिए प्रेरणा का अभाव इत्यादि के कारण भी विकास की सामान्य गति में बाधा पहुँच सकती
है। परन्तु, इन सभी का प्रभाव ‘क्षणिक’ होता है ।
अन्त में, यह कह देना अभीष्ट होगा कि विकास के नियमों (principles of development)
की जानकारी से मुख्यतः ‘दो लाभ’ (advantages) हैं-
(क) यह हमें इस बात की जानकारी कराता है कि बच्चे में कब (when) और किस
(what) तरह के विकास की आशा रखनी चाहिए । इसके अभाव में हम बच्चों से वैसी बातों
की आशा करने लगते हैं जो उनके लिए करना असम्भव है और इसके ठीक विपरीत, जब किसी
बच्चे से किसी बात की आशा करनी चाहिए तब हम ऐसा नहीं करते । ये दोनों ही बातें बच्चों
के आगे के विकास में हानिकारक हैं ।
(ख) इससे दूसरा लाभ यह है कि हमें इस बात का ज्ञान हो जाता है कि कब बच्चे के
विकास की गति को बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए और कब नहीं । उचित समय में दिए गए
प्रशिक्षण से बच्चे के विकास में वृद्धि होती है । जब बच्चे के बोलने की क्षमता (ability to
speak) का विकास हो जाता है तो उसे बोलने के लिए सिखाने पर उसके भाषा-विकास की
गति बढ़ती है । उसका भाषा-विकास समुचित ढंग का हो पाता है ।
Q.4. विकास को प्रभावित करनेवाले कारकों का वर्णन कीजिए ।
Ans. विकास की प्रणाली (Pattern of development) एवं इसकी गति (rate) को
प्रभावित करनेवाले अंग शरीर के अन्दर (within) और बाहर (outside) भी पाए जाते हैं ।
शारीरिक विकास (physical growth) को प्रभावित करनेवाले मुख्य अंग हैं-भोजन, सामान्य
स्वास्थ्य की स्थिति तथा सूर्य की रोशनी, स्वच्छ हवा और जलवायु । पर, यहाँ पर स्मरण रखने
योग्य बात यह है कि विकास किसी एक ही अंग (factor) द्वारा प्रभावित नहीं होता है, वरन् इस
पर कई-एक अंगों का प्रभाव पड़ता है, जो स्वयं एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रित (interdependent)
परन्तु यह सत्य है कि विकास के ऊपर कुछ अंगों का प्रभाव दूसरों की अपेक्षा अधिक पड़ता
है । विकास को प्रभावित करनेवाले कुछ अंगों की चर्चा इनकी महत्ता के अनुसार (in order of
importance) नीचे की जा रही है-
1. बुद्धि (Intelligence)-विकास को प्रभावित करने में इसका स्थान सबसे प्रमुख है।
प्रखर बुद्धिवाले व्यक्तियों का शारीरिक विकास भी मन्द बुद्धिवालों की अपेक्षा तेजी से होता है।
टरमन (Terman) के अध्ययनों के आधार पर यह पाया गया है कि प्रखर बुद्धि के बालक मन्द
बुद्धि के बच्चों की अपेक्षा पहले चलने (walking) और बोलने (talking) लगते हैं।
2. यौन (Sex) यौन (sex) का भी स्थान विकास को प्रभावित करने में कम नहीं है।
यह सही है कि जन्म के समय लड़कियाँ लड़कों से छोटी रहती हैं, किन्तु बाद में उनका विकास
लड़कों की अपेक्षा तेजी से होता है और वे लड़कों से जल्द परिपक्वता (maturity) भी प्राप्त कर
लेती हैं। सामान्यतः लैंगिक परिपक्वता (sexual maturity) लड़कियों में लड़कों से एक वर्ष पूर्व
होती है और वे उनसे पहले ही मानसिक परिपक्वता (mental maturity) प्राप्त कर लेती हैं।
3. अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine glands)-आधुनिक काल में यह प्रमाणित हो चुका
है कि अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का भी बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास को प्रभावित करने
में मुख्य स्थान है । इसका प्रभाव जन्म के पूर्व तथा बाद दोनों ही अवस्थाओं में होनेवाले विकास
के ऊपर पड़ता है। कैल्शियम (Calcium) जो पाराथायरायड (parathyroid) ग्रान्थ का स्राव
है, में कमी हो जाने पर शरीर की हड्डियों (bones) का समुचित विकास नहीं हो पाता है।
आयोडीन (lodine) थायरायड-ग्रन्थि (thyroid gland) का स्त्राव है । इसका भी शारीरिक और
मानसिक विकास को प्रभावित करने में मुख्य स्थान है। थायरायड-ग्रन्थि के ठीक से काम नहीं
करने पर बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। फलस्वरूप, उसमें क्रटिनिज्म
(cretinism) नामक रोग हो जाता है । थायमस-ग्रन्थि (thymus gland) और पिनियल-ग्रन्थि
(pineal gland) के अत्यधिक क्रियाशील हो जाने पर बच्चों के सामान्य शारीरिक एवं मानसिक
विकास में बाधा पहुंँच जाती है और बहुत दिनों तक वह सामान्य बचचों से शारीरिक तथा मानसिक
विकास में पिछड़ा रहता है। गोनैड्स (gonads) के अत्यधिक क्रियाशील हो जाने पर बच्चे को
समय से पहले दाढ़ी-मूंछ हो जाती है और उसमें लैंगिक परिपक्वता (sexual maturity) भी आ
जाती है।
4. पोषाहार (Nutrition)-बच्चों के प्रारम्भिक जीवन में पौष्टिक आहार का शारीरिक
विकास में बहुत बड़ा स्थान है। भोजन की मात्रा (quantity) के साथ-साथ भोजन के सार-तत्त्व
(vitamin content) का भी काफी महत्त्व है । बचपन की बीमारियों, रिकट्स (ricketa),
त्वचा-रोग (skin diseases) आदि का कारण असन्तुलित भोजन ही है।
5. स्वच्छ हवा और सूर्य की रोशनी (Fresh air and sunlight) सामान्य स्वास्थ्य की
स्थिति, शरीर के आकार, बच्चों की परिपक्व (matured) होने की उम्र इत्यादि को स्वच्छ हवा
और सूर्य की रोशनी भी प्रभावित करती है । इनका प्रभाव विकास के प्रारम्भिक दिनों में विशेष
रूप से पड़ता है । इनके अभाव में बच्चों में नाना प्रकार के रोग (disease) पाए जाते हैं
6. रोग तथा आघात (Diseases and injuries)-बच्चे किसी रोग (disease) से पीड़ित
रहते हैं अथवा किसी आघात (injury) के शिकार होते हैं तो इसका उनके मानसिक एवं शारीरिक
विकास पर बुरा प्रभाव (bad effect) पड़ता है । जब बच्चे के मस्तिष्क (brain) में या किसी
अन्य अंग में किसी तरह का आघात (injury) पहुँचता है, तब उनके शारीरिक और मानसिक
विकास में बाधा पहुँचती है । परन्तु, विशेषकर शारीरिक विकास में ही बाधा पहुँचती है ।
7. प्रजाति (Race)—प्रजाति-विभिन्नता (racial difference) का भी बच्चे के शारीरिक
एवं मानसिक विकास को प्रभावित करने में मुख्य स्थान है । यह देखा गया है कि सामान्य
(normal) नीग्रो (Negro) तथा भारतीय (Indian) बच्चों का विकास अँगरेज (Whites) के बच्चों
की अपेक्षा धीरे-धीरे होता है। कारण यह है कि दोनों की जाति (race) में अन्तर (difference)
है।
8. संस्कृति (Culture)-इस संबंध में डेनिस (Dennis) के अध्ययन (study) उल्लेखनीय
हैं । उन्होंने बच्चों के विकास के ऊपर उनकी ‘सास्कृतिक विभिन्नता’ (cultural difference)
के पड़नेवाले प्रभावों का अध्ययन किया । उन्होंने होपी-संस्कृति (Hopiculture) तथा अमरीकी
बच्चों (American children) का तुलनात्मक अध्ययन (comparative study) किया । उनका
‘निष्कर्ष यह है कि सांस्कृतिक विभिन्नता के होते पर भी होपी तथा अमरीकी बच्चों के विकास
में कोई खास अन्तर दृष्टिगोचर नहीं हुआ।
9.परिवार में स्थान (Position in the family)-परिवार में बच्चे का कौन-सा स्थान
(position) है, इसका भी उसके विकास पर प्रभाव पड़ता है ।
साधारणत: परिवार के दूसरे, तीसरे और चौथे बच्चों का विकास पहले बच्चे की अपेक्षा
तेजी से होता है।
परन्तु स्मरण रखना चाहिए कि यह प्रभाव ‘आनुवंशिक’ (hereditary) नहीं है, वरन
वातावरण में अन्तर के कारण ही इनके विकास में अन्तर होता है। छोटे बच्चों (younger
children) को बड़े बच्चों (older children) के व्यवहारों का अनुकरण कर नई-नई बातों को
सीखने का अवसर प्राप्त होता है। परिवार के सबसे छोटे बच्चे का विकास अन्य बच्चों की अपेक्षा
अधिक देर से और मन्द गति से होता है; चूँकि परिवार में सबसे छोटा होने के कारण परिवार
के सभी लोग उसे अत्यधिक प्यार करते हैं और उसे पूर्णरूप से विकसित होने का मौका ही नहीं
देते ।
0.5. बच्चों के नैतिक विकास को क्यों और कैसे उपयोगी बनाया जा सकता है ?
Ans. समाजीकरण और संस्कृतिकरण का पाठ समझाकर बच्चों के नैतिक विकास को
आसान बनाया जा सकता है । समाज में प्रचलित परम्पराओं, प्रथाओं, आदतों को गलत या सही
समझने की योग्यता बढ़ाकर बच्चे को आदर्श नागरिक बनाया जा सकता है । जैसे, विवाह में
दहेज प्रथा, समाज में भ्रूण हत्या का बढ़ता प्रचलन, प्रौढ़ शिक्षा, बंधुआ मजदूर, बाल श्रमिक जैसे
अनेक विन्दु हैं जिस पर विचार करके उचित निर्णय लेने की आवश्यकता है । प्रयत्न और परिणाम
की शिक्षा देकर बच्चों की मानसिक दक्षता बढ़ाई जा सकती है।
आज के बच्चे कुछ विशिष्ट स्थितियों में द्वन्द्व की चपेट में पड़ जाते हैं। कुछ बच्चे खेल
को विकास का माध्यम मानते हैं तो कुछ इसे समय और श्रम का दुरुपयोग समझते हैं। बच्चों
को सही व्याख्या के माध्यम से किसी भी कार्य के दोनों पक्षों (लाभ-हानि) का ज्ञान देकर उसे
निर्णय लेने के मामले में परिपक्व बना देना चाहिए ।
मानवीय क्रियाओं के सही या गलत होने के मध्य अन्तर करने की योग्यता को बढ़ाना
अभिभावक या अध्यापक ही कुशलतापूर्वक करने में सक्षम होते हैं ।
बच्चे में अपराधबोध, नशा की लत, अहंकार, छल की प्रवृत्ति, दिखावा का शौक आदि
से बचाने के लिए उचित अवसर, उदाहरण और निर्देशन की आवश्यकता होती है ।
बच्चों को दया, स्नेह, सहयोग, एकता आदि की उत्तम शिक्षा देनी चाहिए । लॉरेन्स कोहल्वर्ग
के मतानुसार, बच्चे नैतिक विकास के भिन्न-भिन्न स्तरों से गुजरते हैं तथा नैतिक विकास को आयु
की एक माँग के रूप में स्वीकारते हैं । लोककथाएँ, बातचीत, पुस्तकालय जैसी संस्था या साधन
के माध्यम से उन्हें महापुरुषों के आचरण से प्रेरणा लेने की सीख देनी चाहिए । दण्ड एवं पुरस्कार,
प्रोत्साहन एवं दुतकार तथा सामान्य और विशिष्ट के बीच अन्तर समझने का परामर्श देते रहना
चाहिए।
पूर्व अर्जित ज्ञान, स्थापित नियमों, प्रचलित विधियों से विकासात्मक अंशों को चुनकर ग्रहण
करने से उनका नैतिक बल सामर्थ्यवान बनेगा । दूसरों को छोटा, अक्षम, आलसी, कर्त्तव्यहीन
समझकर उससे घृणा, द्वेष पालने की प्रवृत्ति से मुक्ति का मार्ग बताना चाहिए । तुलना अथवा
अनुकरण करना सही है जब उसमें अच्छे विकार को शामिल कर लिया जाए ।
अर्थात् उचित शिक्षण, प्रशिक्षण, निर्देशन के द्वारा बच्चों में उत्पन्न दोष को हटाकर सद्गुणों
को भरा जा सकता है । नैतिक शिक्षा पाकर कोई भी बच्चा समाज का हितैषी बनकर गौरव ग्रहण
कर सकता है।
Q.6. जन्म के पूर्व विकास की प्रमुख अवस्थाओं का वर्णन करें।
Ans. विकास क्रम में जन्म के पूर्व बच्चों के विकास की अवस्था का बहुत अधिक महत्त्व
है । यह अवस्था गर्भाधान से जन्मकाल तक होती है । स्त्री और पुरुष के सम्भोग से स्त्री के
रजःकोष और पुरुष के शुक्रकीट के मिलने से निषेचन होता है जो 280 दिनों में शिशु के रूप
में जन्म ग्रहण करता है। बच्चों का शारीरिक विकास उसकी गर्भावस्था से प्रारम्भ होता है।
गर्भावस्था में यह विकास बहुत तीव्र गति से होता है । गर्भावस्था में शिशुओं का अध्ययन अल्ट्रा
साउंड, कार्डियों-ग्राफ, एक्स-रे आदि यंत्रों के माध्यम से किया जाता है । इन यंत्रों के सहारे
गर्भस्थ शिशुओं की स्थिति, चलना, दिल का धड़कना इत्यादि क्रियाओं का अध्ययन किया जाता
है। साधारणतः लोग माँ के रिपोर्ट से बच्चे की स्थिति और उसकी गति का अध्ययन करते हैं।
गर्भ की अवस्था में बच्चों को विभिन्न अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। जन्म के पूर्व विकास
की अग्रलिखित अवस्थाएँ हैं-
1.बीजावस्था (Germinal Period)-यह विकास की प्रारम्भिक अवस्था है । इसकी
अवधि गर्भाधान से लेकर पंद्रह दिनों तक होती है। इस स्थिति में शिशु का अस्तित्व केवल
डिम्बकोष की तरह होता है। इसे बाहर से किसी प्रकार का पोषण प्राप्त नहीं होती है। इसके
अन्दर के कोष-पुंज भ्रूण के रूप में विकसित होने लगता है। यह उर्वरीकृत बीजकोष गर्भाशय
की दीवार से मुक्त रहता है । इस बीजकोष को पोषण प्राप्त करने के लिए विशेष प्रकार के
हारमोन्स की आवश्यकता होती है जो गर्भाशय के अन्दर अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं। इसके
प्रभाव से गर्भाशय की दीवारें मोटी और मुलायम बन जाती हैं और उससे निकलने वाले स्राव से
बीजकोष का पोषण होता है । लगभग दस दिनों के बाद यह उर्वरीकृत बीजकोष गर्भाशय की
दीवार से सम्बन्धित हो जाता है और इस प्रकार सम्बद्ध शरीर के द्वारा पोषक तत्त्व प्राप्त करना
है। कभी-कभी रजःकोष फ्लोपियन ट्यूब में ही शुक्र कोष के द्वारा उर्वरीकृत हो जाता है।जब
यह उर्वरीकृत बीजकोष वहाँ से गर्भाशय तक नहीं आ पाता है तब इस स्थिति को नलीय गर्भाधान
कहते हैं।
2. भ्रूणावस्था (Embryonic period)—यह अवस्था जन्म के पूर्व विकास की दूसरी
अवस्था है जो दो से छः सप्ताह तक रहती है। भ्रूण एक निश्चित रूप ग्रहण करता है तथा गर्भाशय
में उसका निश्चित स्थान हो जाता है और नाभि रज्जु के सहारे माँ के शरीर से सम्बन्धित हो
जाता है । इस समय उसके शरीर में नए-नए परिवर्तन होते रहते हैं । इसका रूप अमरलत्ती की
तरह हो जाता है । इसका पोषण यहीं से होता है । अब तक इसके निजी स्नायुमंडल की रूप-रेखा
तैयार हो जाती है और स्थान निरूपण हो जाता है ।
3. गर्भावस्था (Fatal Period)- जन्म के पहले विकास की यह अन्तिम अवस्था है। यह
दूसरे महीने के अन्त से लेकर जन्म होने तक की अवस्था है । इस अवस्था में बच्चों को गर्भस्थ
शिशु कहा जाता है । गर्भस्थ शिशु विकास की सबसे लम्बी अवस्था है। इसका विस्तार दूसरे
से नौवें महीने के अन्त तक होता है । भ्रूणावस्था के बाद की अवस्था में ही किसी नयी आकृति
का निर्माण हो जाता है । गर्भस्थ शिशु पाँच महीने में दस इंच लम्बा तथा नौ से दस औंस वजन
का हो जाता है । आठवें महीने के अन्त तक इसकी लम्बाई सोलह से अठारह इंच लम्बी और
वजन में चार से पाँच पौण्ड का हो जाता है । इस अवस्था में विकास की गति बहुत तेज होती
है । बच्चे की लम्बाई तीन महीने में जीतनी होती है उनसे सात गुणा अधिक जन्म के समय हो
जाती है । गर्भस्थ शिशुकाल में विकास की गति प्रारंभिक दिनों की अपेक्षा बाद की अवस्था में
मन्द रहता है। बच्चों में अंगों के आपसी अनुपात में भी परिवर्तन होता है । इस अवस्था में चेहरा
पहले की अपेक्षा थोड़ा चौड़ा हो जाता है ।
तीसरे महीने के पहले बाँहों की लम्बाई पैरों की अपेक्षा अधिक होती है । परन्तु बाद में
पैरों की लम्बाई बाँहों की लम्बाई से अधिक हो जाती है । इस अवस्था में ही वह अपना कार्य
भी करना प्रारंभ कर देता है । पाँचवें महीने के अन्त तक इसका विकास वयस्कों के समान हो
जाता है। तीसरे महीने के अन्त में ही स्नायु आकृतियों का भी विकास हो जाता है। शरीर की
मांसपेशियों का विकास भी इस समय तक काफी हो जाता है। परन्तु उसकी गति अनियमित एवं
अव्यवस्थित रहती है । इसके एक महीने बाद ही इसकी गति पहले की अपेक्षा अधिक नियमित
हो जाती है और सातवें महीने के अन्त में शिश रहने योग्य हो जाता है । यानि सातवें महीने में
जन्म लेने के बाद भी बच्चा जिन्दा रह सकता है।
इस प्रकार, स्पष्ट है कि गर्भस्थ शिशु का विकास इन तीन अवस्थाओं में सभी बाह्य एवं
आन्तरिक दोनों तरह की आकृतियों का निर्माण हो जाता है। भ्रूणावस्था में ही सभी आकृतियों
 का निर्माण हो जाता है और गर्भस्थ शिशुकाल में सभी आकृतियों का विकास धीरे-धीरे
होता है।
Q.7. विकास की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन करें । विकास की प्रक्रिया में
परिपक्वता के महत्त्व का उल्लेख करें।                                     [B.M. 2009A]
अथवा, विकास की परिभाषा दें। उनकी आवश्यक अवस्थाओं को स्पष्ट करें ।    [B.M. 2009A]
Ans. बाल विकास में कई अवस्थाएँ होती हैं । उनका अपना विशेष लक्षण होता है । इसे
अवस्था या स्तर भी कहते हैं। प्रत्येक अवस्था का अपना विशेष लक्षण होता है । इस समय
बालक की कुछ विशेष समस्याएँ रहती हैं और वह उसका समाधान अपनी सीमित शक्तियों से
करता रहता है । इसी सन्दर्भ में उसके भावी विकास में परिवर्तन का निर्धारण होता है । यद्यपि
इन विभिन्न विकासात्मक अवस्थाओं के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती
है तथापि अध्ययनों के आधार पर इसकी सत्यता प्रमाणित होती है । अवस्था-विशेष में
लक्षण-विशेष की प्रधानता होती है । अवस्था बदलते ही वह लक्षण समाप्त हो जाता और दूसरी
अवस्था का दूसरा लक्षण विकसित होता है । इस प्रकार इसके निम्नांकित विभाग किए गए हैं-
1. जन्म पूर्वकाल (Pre-natal)—यह गर्भाधान से लेकर जन्म काल तक की अवधि है।
यह सामान्यतः दो सौ अस्सी दिनों का होता है । इसे भी गर्भाधान, काल, भ्रूणकाल, गर्भावस्था
में बाँटा गया है । इस अवस्था में विकास की गति बड़ी तीव्र रहती है । इस समय वह प्रायः
बीस इंच लम्बा और आठ पौण्ड वजन का होता है और अपनी सारी जैव-क्रियाओं का सम्पादन
कर वह जीवित रहता है।
2. शैशव काल (Infancy)—यह अवस्था जन्म से चौदह दिनों की होती है । इस समय
बालक को नवजात शिशु कहा जाता है । इस समय उसमें एक भी नया विकास नहीं होता, वरन्
पूर्व विकसित गुणों के आधार पर वातावरण से अभियोजित होने का क्रम होता है । गर्भावस्था
में उसे अपने लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं रहती । माँ के स्वस्थ जीवन-यापन से
ही उसका विकास होता रहता है, किन्तु जन्म के बाद उसे अपने लिए स्वयं सब कुछ करना पड़ता
है अन्यथा वह जीवित नहीं रह सकता है । इस समय उसका विकास सर्वथा रुक जाता है ।
अभियोजनात्मक योग्यता विकसित हो जाने के बाद पुनः विकास का क्रम प्रारम्भ हो जाता है।
इसे आराम की अवस्था कहते हैं। ग्राफ खींच कर भी विकास का पठार बनाया जा सकता है।
3. बचपन काल (Bahyhood) यह दो सप्ताह से लेकर प्रायः दो वर्ष की अवस्था तक
की अवधि है । इस समय बालक नितान्त असहाय एवं परावलम्बी होता है । आयु की वृद्धि के
साथ ही उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती जाती हैं, किन्तु स्वयं शक्ति एवं क्षमता के अभाव में वह
कुछ कर नहीं सकता । अत: उसे दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है । क्रमशः परिपक्वता के आधार
पर उसी क्रियात्मक क्षमताओं एवं ज्ञानात्मक योग्यताओं का आविर्भाव होता है । इसी अनुपात में
उसमें आत्मनिर्भरता का उदय होता है ।
4. बाल्यकाल (Childhood)- यह दो साल से लेकर प्रायः चार साल तक की अवधि
होती है। यह बाल विकास की महत्त्वपूर्ण अवस्था है । इस समय वातावरण के सन्दर्भ से बालक
अपने को समझने का सफल प्रयास करता है । वातावरण पर नियंत्रण प्राप्त करता है । समाज,
समुदाय, मित्रता, नेतृत्व, सहानुभूति, प्रतियोगिता आदि ध्यानात्मक सामाजिक प्रतिक्रियाओं का
आविर्भाव होता है । साथ ही झूठ बोलना, हठ करना, गाली पढ़ना, चोरी, अवज्ञा, अनुशासनहीनता
आदि निषेधात्मक सामाजिक प्रतिक्रियाओं का भी उदय होता है । परिवार, समाज तथा पाठशाला
की विभिन्न परिस्थितियों से अभियोजन में वह सर्वथा व्यस्त रहता है ।
5. किशोरकाल (Adolescence)-इसकी अवधि तेरह साल से प्रायः इक्कीस साल तक
की होती है । यह अवस्था लैंगिक चेतना से प्रारम्भ होती है । इस समय विपरीत लिंग (Opposite
sex) की ओर बच्चों का ध्यान जाता है, किन्तु अवसर एवं सुविधा के अभाव में समलिंगियों से
सम्पर्क अधिक रहता है । यह सम्पूर्ण विकास प्रायः निषेधात्मक कोटि का होता है । मानसिक
तनाव, अन्तर्द्वन्द्व साधनों से कन्नी काटना, अन्धाधुन्ध मनमाना व्यवहार, किसी मौके पर
दुस्साहसपूर्ण उत्साह के साथ मिल जाना, उत्तरदायित्वहीन काम करना आदि इस अवस्था के प्रधान
लक्षण हैं। एक शब्द में इसे तूफानी अवस्था कह सकते हैं। गौण लैंगिक लक्षणों (मूछ, स्तन)
के विकास इसी काल में होते हैं। इससे उसमें कामुकता की प्रवृत्ति की वृद्धि होती है । विपरीत
लिंगियों के प्रति आकर्षण वृत्ति से उसमें और अधिक तीव्रता आती है। उसमें गुणात्मक, भावात्मक
एवं क्रियात्मक योग्यता का सर्वथा असफल, संयमविहीन, अनियंत्रित एवं अवांछित माना जाता है,
किन्तु उसे अपने आप पर अजीव मिथ्या विश्वास रहता है । आत्म प्रवंचना तथा मिथ्या
प्रतिष्ठा-ज्ञान के अंधकार में वह अत्यन्त जटिल स्थिति में उलझन पूर्ण जीवन व्यतीत करता है।
इन सम्पूर्ण अवस्था के कई उप-विभाजन किए जा सकते हैं।
(क) पूर्व किशोरकाल (Pre-adolescence) यह अवस्था किशोरावस्था का प्रथम
चरण है। यह बहुत कम समय का होता है। लड़कियों में ग्यारह से तेरह साल तक तथा लड़कों
में तेरह साल से चौदह साल तक की अवधि होती है । इसमें यौन विकास हो जाता है। इसे
निषेधात्मक अवगुण माना जाता है । गौण लैंगिक लक्षणों के विकास होते हैं। संवेगात्मक विकृत
का उदय होता है। अत: सामाजिक अभियोजन का भंग होना प्रारम्भ हो जाता है। बाद में आनेवाली
तूफानी अवस्था का बीजारोपण इसी समय हो जाता है।
(ख) प्रारम्भिक किशोरावस्था (Earlyadolescence)- यह तेरह से लेकर सोलह-सत्रह
साल की अवधि होती है। यह बालकों की पाठशालीय अवस्था होती है। उनका शारीरिक,
मानसिक विकास प्रायः पूर्ण हो जाता है । लड़कियाँ पूर्ण परिपक्व हो जाती हैं । लड़कों में यह
परिपक्वता बहुत बाद में आती है । प्रायः पच्चीस वर्ष में वह पूर्णता प्राप्त करता है तथापि उसका
सबल पृष्ठाधार इसी समय पूर्ण हो जाता है । अतः आवश्यकतानुकूल वह छोटे-बड़े, हल्के मोटे,
सरल-जटिल, सभी तरह के कार्य स्वयं करने की योग्यता की हामी भरने लगता है । यह बेढंगी,
अजीबो-गरीब अवस्था है । इस समय वह कुछ भी नहीं रहता है और सब कुछ करने का दावा
करता है । उत्तरदायित्व उठा नहीं सकता है, किन्तु अपने माथे पर दुनिया उठाए नाचता फिरता
है। अभिभावक के सहयोग एवं सहानुभूति के बिना एक कदम नहीं बढ़ा सकता है, किन्तु उनकी
परछाई भी देखना पसन्द नहीं करता है । इस समय उसका जीवन पूरा बेतरतीब और उजड्ड गँवार,
असभ्य कोटि का होता है । सचेष्ट एवं संज्ञान अभिभावक अपनी सूझबूझ एवं सचेष्टा से ही उसे
इस दलदल से निकाल कर भावी सफल जीवन की ओर ले जाने में समर्थ होते हैं।
(ग) उत्तर किशोरावस्था-यह इस काल की अन्तिम अवस्था है । यह सतरह से लेकर
इक्कीस वर्ष की अवधि की है । इसके बाद वह वयस्क हो जाता है। इस समय वह विश्वविद्यालय
 का छात्र रहता है उच्च शिक्षा में लगा रहता है । अब वह चुस्त-दुरुस्त, सजग, सचेष्ट एवं चैतन्य
रहता है । निर्णय, विचार, समझ में परिपक्व होता है । विषमलिंगियों के प्रति रुचि, ध्यान एवं झुकाव
बढ़ जाता है।
अवसर एवं सुविधा के अनुसार उसका ध्यान उस पर स्थित हो जाता है । उत्तरदायित्व,
संतुलन एवं परिपक्वता का उसमें स्पष्ट प्रमाण पाया जाता है । इसके बाद ही वह सभ्य सुव्यवस्थित
नागरिक बनकर सफल अभियोजन करता है।
Q.8. गर्भस्थ शिशु को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का वर्णन करें ।
Ans. अध्ययनों के द्वारा यह पता चलता है कि गर्भस्थ शिशु के विकास को प्रभावित
करनेवाले कई कारक (Factors) हैं, परन्तु यहाँ हम उनमें से सिर्फ मुख्य कारकों (main factors)
की चर्चा एक-एक कर करेंगे।
1. भोजन (Food) भोजन का प्रभाव गर्भस्थ शिश के विकास पर काफी पड़ता है।
निषेचन काल (Fertilization) के दस दिन बाद से ही अण्डाणु (ovum) अपन माँ के गर्भाशय
की दीवारों से सट जाता है और यह पराश्रयी (parasitic) हो जाता है अर्थात् अपनी माँ से इसे
पोषाहार (Nourishment) मिलना शुरू हो जाता है। माँ के भोजन का बच्चे के विकास पर काफी
प्रभाव पड़ता है । यदि माँ के भोजन में आवश्यक विटामिन पर्याप्त मात्रा में न हो तो गर्भावस्था
में बच्चे में तन्तुओं का निर्माण ठीक से नहीं होता और उनका विकास भी सामान्य ढंग का नहीं
हो पाता । यही कारण है कि गर्भावस्था में माँ के भोजन के पर काफी ध्यान दिया जाता है और
विटामिन से युक्त भोजन खाने को दिया जाता है । अतः स्पष्ट है कि बच्चों के सामान्य विकास
पर गर्भावस्था में माँ जैसा भोजन करती है उसका प्रभाव काफी पड़ता है।
2. बीमारी (Disease)- माता की बीमारियों का भी असर गर्भस्थ शिशु के विकास पर
काफी पड़ता है । इन बीमारियों में प्रमुखं है सिफलिस (Syphilis), गोनोरिया (Gonorrhoea),
अन्तःस्रावी पिंडों (ग्रथियों) में गड़बड़ी (Endocrinal disorders)। क्षय रोग इत्यादि । गर्भाधान
अथवा गर्भावस्था में यदि माताएँ इन बीमारियों से पीड़ित रहती हैं तो इसका बच्चों के विकास
पर बुरा असर पड़ता है।
3. मदिरा (Alcohol) साधारण लोगों का विचार है कि मदिरा का भी गर्भस्थ शिशु के
विकास पर प्रभाव पड़ता है परन्तु इस सम्बन्ध में कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है । जो माताएँ
मदिरापान करती हैं उनके बच्चों में मानसिक दुर्बलता पायी जाती हैं, परन्तु यह भी देखा जाता है
जिन बच्चों की माताएँ मदिरापान कभी नहीं किया है, उनके बच्चों में भी दुर्बलता पायी जाती है।
इसका कारण यह है कि माताएँ जो मदिरापान नहीं करती हैं, परन्तु पति करते हैं जिससे उनके
जीव कोश (Germ-Cell) गर्भाधान (Conception) के पहले ही कमजोर पड़ जाते हैं । अतः हम
कह सकते हैं कि मदिरापान का गर्भस्थ शिशु पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है ।
4. तम्बाकू (Tobacco) तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट का गर्भस्थ शिशु के विकास पर बुरा
प्रभाव पड़ता है । यह इसलिए होता है कि तम्बाकू में निकोटिन (Nicotine) नामक एक विषैला
पदार्थ रहता है जो रक्त चाप (Blood Pressure) तथा हृदय की गति (Hart action) में असंतुलन
ला देता है । जानवरों के साथ प्रयोग करने पर देखा गया है कि निकोटिन का सेवन न करने पर
दूध देने की क्रिया में कमी आ जाती है, परन्तु गर्भावस्था में माताओं पर इस तरह का प्रभाव पड़ता
है या नहीं, इसका कोई निश्चित वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
5. माताओं का संवेगात्मक अनुभव (Emotional Experiences of the mother)-
माताओं के संवेगात्मक अनुभव का प्रभाव गर्भस्य शिशु-विकास पर पड़ता है । कुछ लोगों का
तो यहाँ तक विचार है कि गर्भावस्था में माताओं के चिन्ताग्रस्त रहने पर बच्चे भी जन्म के बाद
दुःखी रहने लगते हैं और वे अन्तर्मुखी (Introvert) स्वभाव के हो जाते हैं । इसके विपरीत यदि
गर्भावस्था में माताएँ हँसमुख रहें, तो उनके बच्चे भी हँसमुख स्वभाव के हो जाते हैं, लेकिन इस
सम्बन्ध में बहुत थोड़ा वैज्ञानिक प्रमाण है, अर्थात् यह निश्चित रूप से कहना सम्भव नहीं है कि
माताओं के संवेगात्मक अनुभवों (Emotional experiences of mother) का गर्भस्थ शिशु के
विकास (Pre-natal development) पर क्या प्रभाव पड़ता है ।
6. माता-पिता की उम्र (Age of Parents)—माता-पिता की उम्र का गर्भस्थ शिशु
विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस सम्बन्ध में कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है । अतः इस सम्बन्ध
में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है । फिर भी इस सम्बन्ध में किये गये कुछ
अध्ययनों से पता चलता है कि कम उम्र वाले माता-पिता के बच्चे अधिक उम्र वाले माता-पिता
के बच्चे से कम बुद्धिमान होते हैं । परन्तु यह भिन्नता दोनों प्रकार के बच्चों के माता-पिता की
उम्र के कारण नहीं, बल्कि उनके सामाजिक स्तर (Social Status) के अन्तर के कारण भी होती
है।उच्च सामाजिक स्तर तथा प्रखर बुद्धि वाले स्त्री-पुरुषों के शादी कम उम्र में ही हो जाती
है, अतः उनसे उत्पन्न बच्चों की बुद्धि मैं अन्तर होता है । एलिस (Ellis), गाल्टन (Galton),
टरमन (Terman) इत्यादि के अध्ययनों से स्पष्ट है कि जिन माता-पिता की उम्र में अन्तर कम
होता है, वे उन बच्चों की बुद्धिवाले होते हैं जिनके माता-पिता की उम्र में अधिक का अन्तर होता
है हालाँकि ऊपर कई कारकों (Factors) का वर्णन किया गया है, जिनका गर्भस्थ शिशु-विकास
पर प्रभाव पड़ता है। फिर भी वैज्ञानिक अध्ययनों के अभाव में बहुत-से कारकों के सम्बन्ध में
यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि उनका गर्भस्थ शिशु विकास पर कसा प्रभाव
पड़ता है।
Q.9. वृद्धा मनोविकृति के लक्षण एवं कारणों की व्याख्या करें ।
Or, वृद्धा मनोविकृति से आप क्या समझते हैं ? वृद्धा अवस्था की मुख्य समस्याओं
का वर्णन करें।
Ans. विकास की अन्य प्रक्रियाओं की तरह वृद्ध होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।कोई
बच्चा जन्म लेता है, बाल्यावस्था, युवावस्था को पार करता हुआ वृद्धा अवस्था में पहुंँचता है। इस
अवस्था में शारीरिक शक्ति का ह्रास हो जाता है। उसकी मांसपेशियों में समन्वय की कमी हो
जाती है, हड्डियों तथा जोड़ों का लचीलापन कम जाता है। पूरे शरीर की त्वचा में झुर्रियाँ पड़
जाती हैं। ज्ञानेन्द्रियों की कार्य क्षमता कम हो जाती है उसके मस्तिष्क में स्नायुओं का एक परत
जम जाता है जो मस्तिष्क की क्रियाओं को प्रभावित करता है। इन शारीरिक परिवर्तनों के अलाव
मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी होते हैं, जिसमें स्मृति की कमी, चिन्तन की योग्यता में कमी आदि
प्रमुख हैं।
वृद्धा मनोविकृति का मुख्य कारण अधिक उम्र का बीत जाना है। मनोविकृति व्यवहार में
विकृति हैं। यदि यह विकृति अधिक उम्र के लोगों को होता है तो इसे वृद्धा मनोविकृति कहते हैं।
इस प्रकार के व्यवहार विकृति के अनेक कारण हैं, इनमें एक कारण वृद्धा अवस्था या अधिक
उम्र बीत जाना है। इसलिए वृद्धा अवस्था के कारण जो व्यवहार में विकृति आती है उसे Senile
Psychosis या Senile brain disease कहा जाता है। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि वृद्धा
अवस्था के कारण दूसरी अन्य विकृतियाँ भी होती हैं। इस प्रकार की विकृति को Arteriosclerosis
कहा जाता है। इसके अलावा वृद्धा अवस्था में अन्य मानसिक बीमारियाँ, जैसे-उत्साह, विषाद,
मनोविकृति, मनोविदलता, स्थिर व्यामोह आदि के लक्षण भी देखे जाते हैं। कुछ लोगों में चिन्ता,
उन्माद, झक, बाध्यता आदि के लक्षण विकसित होने की संभावना भी रहती है।
वृद्धा मनोविकृति के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं-
(A) वृद्धा अवस्था मनोह्रास मनोविकृति-यह भी वृद्धा अवस्था की एक प्रमुख समस्या
है। अधिक उम्र बीत जाने के पश्चात् मस्तिष्क में एक प्रकार की विकृति उत्पन्न हो जाती है जिसके
कारण व्यक्ति में कुछ ऐसे लक्षण विकसित हो जाते हैं जो मनोविदलता के लक्षणों के समान होते
हैं । इस सम्बन्ध में अमेरिका में एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन किया गया जिससे पता चलता है कि
यह रोग साठ से लेकर नब्बे वर्ष के व्यक्तियों को अधिक होता है। यह लक्षण स्त्रियों में
अधिक विकसित होता है। सर्वेक्षण के अनुसार पुरुषों में लगभग 11% और स्त्रियों में 30% लोग
को इस रोग के होने की संभावना रहती है। कोलमैन ने वृद्धा अवस्था में होने वाले इस रोग को
पाँच प्रमुख भागों में बाँटा है-
(i) साधारण मानसिक ह्रास (ii) स्थिर व्यामोह प्रतिक्रिया (iii) तीव्र प्रकार (iv) अति तीव्र
प्रकार (v) उत्साह-विषाद् प्रकार।
(i) साधारण मानसिक हास-यह वृद्धा मनोविकृति का एक सामान्य लक्षण है। इस
अवस्था में व्यक्ति अपना सम्बन्ध सीमित कर लेता है। उसका सम्पर्क बाह्य वातावरण से कम
होने लगता है। वृद्धा अवस्था आने पर व्यक्ति की स्मरण शक्ति क्षीण होने लगती है। उसमें
परिवर्तनों को स्वीकार करने की क्षमता में कमी आने लगती है। उसकी बेचैनी बढ़ जाती है, नींद
की कमी हो जाती है, निर्णय लेने की क्षमता का अभाव हो जाता है। एक मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षण
से पता चलता है कि लगभग पचास प्रतिशत वृद्ध व्यक्तियों में इस प्रकार के लक्षण विकसित हो
जाते हैं।
(ii) स्थिर व्यामोह प्रतिक्रिया-स्थिर व्यामोह प्रतिक्रिया वृद्धा अवस्था में विकसित होने
वाला एक गंभीर मनोविकृति है। इस प्रकार की विकृति का शिकार होने पर व्यक्ति में विभिन्न
प्रकार के व्यामोह देखे जाते हैं । इस व्यामोह में, दण्ड-सम्बन्धी व्यामोह, यौन से सम्बन्धित व्यामोह
और उच्च विचार सम्बन्धी व्यामोह की अधिकता रहती है। इसमें व्यक्ति को यह विश्वास हो
जाता है कि उसके परिवार के लोग उसके विरुद्ध हो गए हैं और उसे जान से मार देने का षड्यंत्र
बना रहे हैं। इस प्रकार के रोगियों में विभ्रम के लक्षण भी देखे जाते हैं। Rothschild ने एक
चौरासी वर्षीय अविवाहित महिला का अध्ययन किया । उस महिला को यह भ्रम हो गया था कि
वह विवाहित है और उसके बच्चे हैं। इस प्रकार का लक्षण पन्द्रह से पच्चीस प्रतिशत वृद्ध लोगों
में देखा जाता है।
(iii) तीव्र प्रकार-वृद्धा अवस्था मनोविकृति का यह भी एक गंभीर लक्षण है। इस प्रकार
के व्यक्तियों में स्मृति बहुत अधिक क्षीण हो जाती है। रोगी हमेशा सतर्क मुद्रा में दिखाई देता
है। वह निरुद्देश्य कार्यों में लगा रहता है तथा उसकी बातों में विरोधाभास देखा जाता है।
कभी-कभी उसमें आक्रामक व्यवहार भी देखे जाते हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक, इस प्रकार के
लक्षण लगभग आठ प्रतिशत लोगों में देखा जाता है।
(iv) अति तीव्र प्रकार-यह वृद्धा अवस्था मनोविकृति का बहुत अधिक गंभीर लक्षण है।
इस अवस्था में व्यक्ति बुरी तरह बेचैन हो जाता है, बात-बात में जिद्द करता है, बातें असंगत होती
हैं। रोगी को स्थान और समय का ज्ञान भी नहीं रहता है। यह लक्षण बहुत कम लोगों में देखा
जाता है।
(v) उत्साह-विषाद् प्रकार-इस प्रकार के व्यक्तियों में वही लक्षण विकसित हो जाते हैं जो
उत्साह-विषाद के रोगियों में पाया जाता है। रोगी कभी उत्साह की अवस्था में रहता है तो कभी
विषाद की अवस्था में। कभी-कभी व्यक्ति ऐसा समझता है कि उसे कोई भयानक रोग हो गया
है, जिससे उसकी मृत्यु निश्चित है। कभी वह समझता है कि वह बहुत बड़ा पापी है और उसे
आत्महत्या कर लेनी चाहिए। रोगी को यह विश्वास हो जाता है कि परिवार के सभी लोग उससे
नफरत करते हैं और उसके मरने की कामना करते हैं।
(B) वृहत्मस्तिष्क धमनी-काठिन्युक्त मनोविकृति-व्यक्ति जब वृद्धा अवस्था में पहुँचता
है तो उसके मस्तिष्क की क्रियाओं में ह्रास होने लगता है। मानव मस्तिष्क में असंख्य कोष पाए
जाते हैं जिसका पोषण मस्तिष्कीय रक्तवाहिनी धमनियों के माध्यम से होता है। जब व्यक्ति
अधिक उम्र का हो जाता है तो मस्तिष्क के कोषों के नष्ट होने से व्यक्ति में cerebral
arteriosecterotic psychosis के लक्षण विकसित हो जाते हैं। इससे मस्तिष्क के कार्यों में
विकृति आने लगती है | Rothschild and Yalam ने बताया है कि छोटी रक्त धमनियों के नष्ट
होने से वृहत् मस्तिष्क का पोषक तत्त्व अवरुद्ध हो जाता है जिससे व्यक्ति रोग का शिकार हो
जाता है। जब छोटी धमनियाँ अचानक नष्ट होती हैं तो रोगी में अस्थायी लक्षण विकसित होते
हैं। परन्तु जब बड़ी धमनी नष्ट होती है तो इसका आघात भयानक होता है। वह मूर्च्छित रहने
लगता है। अस्पतालों में इस प्रकार के रोगियों की संख्या लगभग पन्द्रह प्रतिशत होती है। इस
रोग का प्रभाव 55 वर्ष के बाद ही देखा जाता है।
इस प्रकार के रोग से रोगी चिड़चिड़ा हो जाता है तथा उसकी मानसिक क्षमता समाप्त हो
जाती है। कुछ रोगी लकवाग्रस्त होकर पड़ा रहता है। इसमें कमजोरी थकान, सिरदर्द, खिन्नता
आदि लक्षण देखे जाते हैं। इस रोग के विकसित होने पर रोगी अधिक दिनों तक जीवित नहीं
रह पाता है।
कारण (Causes)-पहले के मनोचिकित्सकों का विचार था कि यह मानसिक रोग मस्तिष्क
की क्षति के कारण होता है, परन्तु आधुनिक अनुसंधानों से पता चलता है कि इसका एक कारण
मस्तिष्क की क्षति है परन्तु इसके अलावा भी कई कारण हैं जिसके चलते व्यक्ति इस मानसिक
रोग का शिकार हो जाता है । इसके कारणों को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है
1. जैविक कारक 2. मनोवैज्ञानिक कारक 3. सामाजिक कारक ।
1. जैविक कारक (Biological factors)-मनोविकृति चाहे कोई भी हो इसके पीछे
जैविक कारकों का आवश्यक रूप से हाथ होता है, ऐसा अध्ययनों से स्पष्ट हो चुका है।अतः
इस मनोविकृति के विकास में भी जैविक कारक की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इस सम्बन्ध
में Post ने एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन किया है। उन्होंने जुड़वा बच्चों पर अध्ययन करके पाया कि
वृद्धा अवस्था में मनोविकृति का कारण शरीर के कोषों का बनना और टूटना है I Post ने 78
वृद्धा मनोविकृति से पीड़ित व्यक्तियों का अध्ययन किया और इस बात की पुष्टि की है कि इस
रोग की उत्पत्ति में वंश परम्परा का हाथ होता है। Mayer के अध्ययन से भी Post के विचारों
का समर्थन होता है। इन्होंने अपना अध्ययन 100 लोगों पर किया । जैविक कारकों के अन्तर्गत
शारीरिक बनावट, दैहिक रसायन, गर्भावस्था में भोजन की कमी, जन्म के पश्चात् उचित मात्रा
में विटामिन और कैलोरी नहीं प्राप्त होना आदि आते हैं।
अनेक मनोवैज्ञानिकों ने कहा है कि अधिक उम्र बीत जाने पर वृहत् मस्तिष्क की धमनियों
में परिवर्तन से कोषों के टूटने का प्रभाव पड़ता है जिसके कारण व्यक्ति का मानसिक ह्रास होने
लगता है। इस सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी होती है कि रक्त संचार में बाधा के चलते
ऑक्सीजन की खपत में कमी आ जाती है स्नायुकोषों की क्षति से मनोभ्रंश को शिकायत हो जाती
है। कोषों का टूटना अन्तःस्रावी ग्रंथियों के दोष या भोजन में विटामिन की कमी के कारण भी
होता है। यदि व्यक्ति को भोजन में समुचित मात्रा में प्रोटीन नहीं मिलता है तो वृद्धा मनोविकृति
की संभावना अधिक रहती है। कुछ आधुनिक अनुसंधानों से पता चलता है कि व्यक्ति में बहुत
ज्यादा तनाव, अधिक वसायुक्त भोजन आदि की वृद्धि मनोविकृति का एक कारक है
2. मनोवैज्ञानिक कारक-वृद्धा मनोविकृति के विकास में मनोवैज्ञानिक कारकों का
महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। व्यक्ति उस वक्त अपने को बूढ़ा समझने लगता है जब उसे जीवन का
सबसे आघातपूर्ण अनुभव होता है। यह व्यक्ति के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि परिस्थितियों
के साथ किस प्रकार से अभियोजन करता है। वृद्धा मनोविकृति के विकास में जिन मनोवैज्ञानिक
कारकों का प्रभाव पड़ता है, वे निम्नलिखित हैं-
(i) व्यक्तिगत कारक-कुछ ऐसे व्यक्तित्व कारक होते हैं जो senile psychosis के लिए
जिम्मेवार होते हैं। Post ने इस रोग से पीड़ित कई व्यक्तियों का अध्ययन किया। उन्होंने देखा
कि अधिकांश रोगी ऐसे थे जिनकी युवा अवस्था कुसमायोजित थी। अर्थात् जवानी में ही वे
कुसमायोजन का शिकर हो गए थे। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति जिनकी
आयु के मध्य भाग में कुसमायोजन हो जाता है या वे परिस्थितियों के साथ सफलतापूर्वक
अभियोजन में सफल नहीं हो पाते हैं, वे वृद्धा अवस्था में senile psychosis के शिकार हो जाते
हैं।
(ii) चिन्तापूर्ण स्थिति-इस रोग के होने की संभावना अधिक होती है, जब वृद्धा अवस्था
में तनाव पूर्ण वातावरण झेलना पड़ता है। जब व्यक्ति बुढ़ापा की अवस्था में आ जाता है तो उसमें
असुरक्षा के भाव विकसित हो जाते हैं। आर्थिक संकट के अलावा सामाजिक मान-मर्यादा में भी
कमी आ जाती है। इन परिस्थितियों में व्यक्ति को senile psychosis होने की पूरी संभावना
रहती है।
(iii) निर्भरता तथा व्यर्थता का भाव-वृद्धा अवस्था में व्यक्ति कमजोर हो जाता है, वह
धन कमाने योग्य नहीं रह जाता है। ऐसी स्थिति में वह परिवार के दूसरे सदस्यों पर या
सगे-सम्बन्धियों पर निर्भर हो जाता है। अत: उसमें आश्रित होने का भाव जागृत हो जाता है जो
व्यक्ति अपने जवानी की अवस्था में काफी स्वतंत्र रहा है उस व्यक्ति में यह भाव विशेष रूप
से देखा जाता है। वह अपने को परिवार का बोझ समझने लगता है तथा उसे जीवन व्यर्थ लगने
लगता है। इस प्रकार की परिस्थिति में व्यक्ति वृद्धा मनोविकृति का शिकार हो जाता है।
(iv) लैंगिकता का अभाव-व्यक्ति के यौन इच्छाओं में क्रमिक ढंग से ह्रास होता है। परन्तु
इसमें वैयक्तिक भिन्नता होता है। किन्स ने अपने अध्ययनों के आधार पर बताया है कि
अधिकांश वृद्ध व्यक्तियों में यौन इच्छाओं में कमी नहीं आती है। जिन लोगों में लैंगिकता की कमी
होती है वे लोग इसके लिए चिन्तित रहा करते हैं जिससे उनका शारीरिक आकर्षण कम हो जाता
है। इस प्रकार की परिस्थितियों को वृद्ध व्यक्ति झेलने में असमर्थ हो जाते हैं और वे वृद्धा
मनोविकृति के शिकार हो जाते हैं।
(v) अलगाव या एकाकीपन-अलगाव भी इस मानसिक रोग का एक प्रमुख कारण है।
वृद्धा अवस्था में उसके सभी पुराने साथी बिछुड़ जाते हैं तथा नये लोगों के साथ उनका समायोजन
नहीं हो पाता है। फलतः वे एकाकी जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं। उनके बच्चे बड़े
होकर अलग परिवार के साथ अन्यत्र जीवन-यापन के लिए चले जाते हैं। उनकी अभिरुचियों में
कमी आ जाती है। Busse ने कहा है कि वृद्ध व्यक्ति अपने को महत्त्वपूर्ण नहीं समझते हैं। उनका
संसार से नाता टूट जाता है और वे वृद्धा मनोविकृति के शिकार हो जाते हैं।
3. सामाजिक कारक-वृद्धा अवस्था मनोविकृति के विकास में सामाजिक कारकों की भी
महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। कुछ मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चलता है कि यह रोग ग्रामीण
लोगों की तुलना में शहरी लोगों को अधिक होती है। कोलमेन ने कहा है कि ग्रामीण की तुलना
में शहरी लोगों को यह रोग दुगुनी संख्या में होती है। इसका मुख्य कारण कह है कि शहर के
लोग अपने-अपने काम में ज्यादा व्यस्त रहते हैं जिससे वृद्ध अकेलापन महसूस करता है। इसके
अलावा शहर का प्रदूषण, कोलाहलपूर्ण वातावरण, भीड़ आदि का भी प्रभाव पड़ता है। जबकि
ग्रामीण क्षेत्र में वृद्धों को परिवार के लोग भार नहीं समझते हैं, उनकी सेवा करते हैं, उनकी
सामाजिक मयांदा बनी रहती है, फलत: वे इस प्रकार के वातावरण में अपने को अभियोजित करने
में कठिनाई का अनुभव नहीं करते हैं। वे अधिक उम्र तक कार्य में व्यस्त रहते हैं, उनकी बातों
का महत्त्व होता है। सामाजिक कारकों के अलावा सांस्कृतिक कारक भी वृद्धा मनोविकृति को
बढ़ाने में अपना योगदान करते हैं। इस प्रकार का रोग उस संस्कृति में अधिक देखा जाता है जहाँ
भौतिकता अधिक होती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि वृद्धा मनोविकृति के अनेक कारण हैं। यदि इन कारणों पर
विशेष रूप से ध्यान दिया जाए तो वृद्धों को इस प्रकार के मनोविकृति से बचाया जा सकता है।
Q.10.किशोरावस्था में उत्पन्न पहचान-भ्रम का कारण और प्रभाव का उल्लेख करें।
Ans. अपनी एक अलग पहचान बनाने की प्रक्रिया में किशोर अपने माता-पिता के साथ
तथा स्वयं अपने अन्दर द्वन्द्व का अनुभव कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में किशोर अनेक प्रकार के
दायित्वों के बोझ से दबने लगता है। उसमें एक नया आत्म-बोध प्रकट हो जाता है। जो किशोर
नये आत्मबोध को समझने में यह स्वीकार करने में सक्षम नहीं होते हैं वे पूर्णतः भ्रमित हो
जाते हैं।
एरिक्सन के अनुसार यह पहचान-भ्रम व्यक्ति को अपने साथियों तथा परिवार से स्वयं को
अलग कर लेने के लिए प्रेरित कर सकता है अथवा वे भीड़ में अपनी पहचान खा सकते हैं।
किशोर स्वतंत्र सत्ता बनाने का पक्षधर बनने के साथ-साथ माता-पिता के संरक्षण के अभाव में
स्वयं को संभालने से डरते भी हैं। आत्मविश्वास और असुरक्षा की भावना के बीच शीघ्रता से
परिवर्तित होते रहना इस अवस्था की एक विशिष्ट सत्ता है। एक अलग पहचान प्राप्त करने में
किशोर को स्वयं में निरंतरता और एकरूपता की खोज करना, अधिक उत्तरदायित्वों का वहन
करना तथा पहचान का स्पष्ट बोध प्राप्त करना सन्निहित है। इसके लिए वांछनीय कठिन प्रयास
में अस्थिर होते ही पहचान-भ्रम उत्पन्न हो जाता है। फलत: किशोर हतप्रभ होकर गलत निर्णय
लेकर अपने भविष्य को अर्धकारमय बना लेता है । वह माता-पिता की सहायता एवं निर्णय से
वंचित हो जाता है। उसे भयमुक्त आत्मबोध के लिए तैयार होना होता है। किशोरावस्था में पहचान
का निर्माण अनेक कारकों से प्रभावित होता है। सांस्कृतिक पृष्ठभूभि पारिवारिक तथा सामाजिक
मूल्य, सजातीय पृष्ठभूमि, आर्थिक स्तर आदि को एक साथ एक स्थान पर उपलब्ध करने के लिए
किशोरों को अधिक प्रयास करना होता है। रोजी-रोटी की खोज में किशोरों को घर से दूर जाना
पड़ सकता है जिसके कारण उसे पारिवारिक सुख एवं संरक्षण से वंचित हो जाना पड़ता है।
माता-पिता से संघर्षपूर्ण स्थितियों में संबंध रखना होता है। किशोरों को आर्थिक समस्या का
स्थायी एवं सुपरिणामी हल खोजने के लिए व्यावसायिक प्रतिबद्धता के लिए तैयार होना होता है।
भविष्य निर्माण की चिन्ता बढ़ जाती है तथा अकेले उस खाई से निकलना बड़ा कठिन प्रतीत होता
है।
अतः पहचान निर्माण में पहचान-भ्रम का उत्पन्न होना एक स्वाभाविक स्थिति बन जाती
है। किशोर अकेला अलग पहचान निर्माण करने के क्रम में स्वयं को अकेला बना लेता है। वह
बार-बार पूर्व की खुशी को हासिल करने में प्रयासरत हो जाता है। गलत निर्णय और तीखा अनुभव
किशोर के लिए एक चुनौती बनकर खड़ा हो जाता है।
Q. 11. प्रौढ़वस्था की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं ?
Ans. प्रौढ़ावस्था में किसी व्यक्ति की दायित्वों का निर्वाह की दृष्टि से सक्षम माना जाता
है। उसे स्वावलम्बी बनकर समाज से जुड़ना होता है। प्रौढ़ के गुणों के विकास में भिन्नता पाई
जाती है। प्रौढ़ावस्था की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) प्रौढ़ को वैवाहिक बंधन में बंध जाना आवश्यक माना जाता है।
(ii) माता-पिता के रूप में प्रौढ़ को बच्चों के लालन-पालन और सुरक्षा का भार उठाना
पड़ता है।
(iii) प्रौढ़ों को जीवन की संभावनाओं को तलाशना होता है।
(iv) प्रौढों को स्थायी जीवन की संरचना का विकास करना होता है।
(v) प्रौढ़ को जीवन क्रम में निर्भरता से स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाना होता है।
(vi) प्रौढ़ों को व्यावसायिक जीवन में प्रवेश पाने को बाध्य होना पड़ता है।
(vii) प्रौढ़ों को अपनी कुशलता तथा दक्षता के प्रदर्शन के लिए तैयार होना होता है।
(vii) प्रौढ़ों को अपने एवं नियोजक की प्रत्याशाओं के बीच संतुलन बनाकर रखना होता है।
(ix) प्रौढ़ों को विवाह, मातृ-पितृत्व एवं परिवार के प्रति आदर्श दायित्व निभाने का अवसर
अवश्य मिलता है।
(x) परिवार के अन्य बच्चों के साथ भी अपने की तरह बिना भेद-भाव किये स्नेहमयी
व्यवहार करना होता है।
(xi) प्रौढ़ों को सामाजिक एवं सांस्कृति व्यवहारों के लिए लोगों की प्रशंसा पाने के लिए
निरन्तर प्रयास करते रहना पड़ता है।
अतः प्रौढ़ावस्था में पहुंँचकर व्यक्ति अपने प्रभावकारी आचरण तथा परिणामी प्रयास के द्वारा
सम्पर्क के अन्य व्यक्तियों को सभी आकांक्षाओं का ख्याल रखना होता है।
0.12. किशोरों को व्यवहार संबंधी किन चुनौतियों का सामना करना होता है ?
Or, किशोरावस्था से संबंधित प्रमुख चिन्ताओं को स्पष्ट करें ।
Ans.किशोरावस्था की अवधि में विभिन्न प्रकार के द्वन्द्रों, अनिश्चितताओं और कुछ विशेष
दशा में अकेलापन की पीड़ा को सहन करते समय मानना पड़ता है कि किशोरावस्था अति
संवेदनशील अवधि है। इस अवधि में किसी भी किशोर को समकक्षियों का प्रभाव, नयी अर्जित
स्वतंत्रता और अनेक अनुसुलक्षी समस्याएँ कठिनाइयाँ उत्पन्न करने में सफल हो जाते हैं। किशोरों
की समकक्षियों के दबाव में चलने की बाध्यता होती है। किशोरों को गलत आदतों का शिकार
बनाने और परिवार के मधुर रिश्ते में दरार पड़ने जैसी समस्याओं को जूझना पड़ता है। इस अवस्था
में माता-पिता द्वारा बनाये गये नियमों को तोड़ने में अपनी खशी खोजते हैं।
किशोरावस्था में भिन्न-भिन्न प्रकार की चिन्ताओं को बर्दास्त करना होता है। जैसे-किशोरी
के जीवन विधि में अनिश्चितता, अकेलापन, आत्मसंदेह, दुश्चिंता तथा स्वयं एवं स्वयं के भविष्य
के प्रति दुश्चिंता आदि का सामना करना पड़ता है। कुछ आंतरिक विसंगतियाँ भी पैदा हो जाती
हैं। जैसे-उत्तेजना, हर्ष तथा समक्षमता आदि ।
कुछ गलत पदार्थों के प्रयोग तथा विकार उत्पन्न करनेवाले कारकों के अनुप्रयोग से उत्पन्न
कुप्रभाव । अपचार, मादक द्रव्यों का दुरुपयोग तथा आहार ग्रहण करने संबंधी विकार का उत्पन्न
हो जाना आदि चुनौतियों के रूप में व्यवहार करते हैं।
(i) अपचार-सामाजिक रूप से अस्वीकार किये जाने वाले व्यवहारों को अपराध तथा
आपराधिक कृत्य का कारण बना दिया जाता है। कर्त्तव्य विमुखता, घर से भाग जाना, चोरी या
सेंधमारी, बर्बरतापूर्ण व्यवहार को विसंगतियाँ या दोष कहलाते हैं। अपचार प्रायः माता-पिता के
कम सहयोग, अनुप्रयुक्त अनुशासन का निर्वाह करना किशोरों की मजबूरी मान ली जाती है।
किशोरावस्था में माता-पिता के कम सहयोग, मिलना, अनुप्रयुक्त अनुशासन घटना या साधन को
गलत प्रयोग में लाना तथा पारिवारिक विवाद आदि समस्याओं से उलझना पड़ता है। अपचार के
धनात्मक या ऋणात्मक परिणामों से कुछ भी मिल सकता है। यदि सम्पर्क का व्यक्ति या उसका
परिवार संस्कारहीन कार्यों (चोरी, पॉकेटमारी, शराबी, दुष्ट) कर्मों से जुड़ा होता तो बच्चे के बिगड़
जाने का भय बढ़ जाता है।
विकारों का अनुकरण करना अहितकारी होता है।
अपचार सकारात्मक तथा नकारात्मक लक्षण वाले होते हैं।
(ii) मादक द्रव्यों का दुरुपयोग-किशोरावस्था में व्यक्ति मादक पदार्थों के सेवन को शान
का प्रतीक मानते हैं लेकिन मादक द्रव्य का सेवन व्यक्ति को संवेदनशील होने से रोकता है। शराब,
सिगरेट, चरस, अफीम, ब्राउन सुगर आदि का प्रयोग व्यक्ति की नैतिकता को अक्रिय बना देता है।
(iii) आहार ग्रहण सम्बन्धी विकार-समकक्षियों की नकल करके तुलनात्मक महान
कहलाने के लिए फास्ट-फूड जैसे हानिकारक आहर को ग्रहण करने में संकोच नहीं करते हैं।
आहार ग्रहण संबंधी विकार आर्थिक, मानसिक, शारीरिक सभी प्रकार की क्षति पहुँचाने के लिए
सक्रिय साधन माना जाता है। एनोरेक्सिया समोसा एक ऐसा ही आहार ग्रहण संबंधी विकार है
जिसमें स्वयं को भूखा रखते हुए दुबला बनने की असहनशील प्रवृत्ति होती है। किशोरावस्था वाले
व्यक्ति को ऐसे खतरनाक निर्णय से बचकर रहना चाहिए।
Q.13. विकासात्मक मनोविज्ञान को परिभाषित करें।                 [B.M.2009A]
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान जो पहले बाल मनोविज्ञान के नाम से जाना जाता था,
मनोविज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसमें बच्चों के व्यवहारों अर्थात् उनके शारीरिक एवं मानसिक
क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। पहले ऐसी धारणा थी कि इस मनोविज्ञान में बच्चों की
शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं का अध्ययन जन्मोपरांत प्रारंभ किया जाता है तथा उनका अध्ययन
वयस्क होने तक किया जाता है। परंतु इस तरह की धारणा को गलत साबित कर दिया गया है
और आधुनिक विकासात्मक मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि चूँकि शिशुओं के शारीरिक एवं
मानसिक क्रियाओं का विकास गर्भधारण से ही प्रारंभ हो जाता है, अतः विकासात्मक परिवर्तनों
का अध्ययन जन्म से नहीं बल्कि गर्भधारण से ही किया जाना चाहिए। इसे ध्यान में रखते हुए
आधुनिक विकासात्मक मनोवैज्ञानिकों, जैसे हरलॉक (Hurlock), लाइबर्ट (Liebert) तथा उनके
सहयोगियों ने विकासात्मक मनोविज्ञान को मनुष्य में गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक होने वाले
विकासात्मक परिवर्तनों के अध्ययन का एक विज्ञान माना है।
यदि हम विकासात्मक मनोविज्ञान की एक परिभाषा देना चाहें, तो इस प्रकार दे सकते
हैं-विकासात्मक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें गर्भधारण से मृत्यु तक मनुष्यों
के विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों का एक वैज्ञानिक अध्ययन किया
जाता है।
(Development Psychology is that branch of psychology in which a
scientific study of developmental changes of the different stages of human
beings taking place from conception to death is done.)
यदि हम इस परिभाषा का विश्लेषण करें तो हमें निम्नांकित प्रमुख तथ्य प्राप्त होते हैं-
(i) विकासात्मक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक प्रमुख शाखा है-इस शाखा का
स्वरूप कुछ ऐसा है कि इसे एक समर्थ विज्ञान (Positive science) माना गया है, क्योंकि यह
बच्चों के व्यवहारों में होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों का ज्यों-का-त्यशे अध्ययन करता है।
(ii) विकासात्मक मनोविज्ञान गर्भधारण से मृत्यु तक होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों
का अध्ययन करता है-विकासात्मक मनोविज्ञानी शिशुओं के शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं
का अध्ययन गर्भधारण से ही प्रारंभ कर देते हैं तथा इस बात की कोशिश करते हैं कि मृत्यु तक
ऐसे होने वाले पर्तिनों का अध्ययन किया जाए। इस कोशिश के बावजूद एक सफल
विकासात्मक मनोविनों किशोरावस्था तक होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों को अधिक गहन
रूप से अध्ययन करता है, क्योंकि यह परिवर्तन बहुत ही तीव्र होता है तथा इसी के स्वरूप पर
वयस्कावस्था तथा वृद्धावस्था का विकासात्मक परिवर्तन आधारित होता है।
विकासात्मक मनोवैज्ञानिकों ने गर्भधारण से किशोरावस्थां की भवधि को कई छोटी-छोटी
अवस्थाओं, जैसे पूर्वप्रसूति काल, शैशवावस्था, बचपनावस्था (babyhood), बाल्यावस्था
(childhood) आदि में बाँटकर प्रत्येक में होने वाले शारीरिक विकास में परिवर्तन, क्रियात्मक
विकास में परिवर्तन, सामाजिक विकास में परिवर्तन, खेल विकास में परिवर्तन, नैतिक एवं चारित्रिक
विकास में परिवतर्तन आदि का अध्ययन करते हैं। विकासात्मक मनोविज्ञान चूँकि गर्भधारण से
लेकर मृत्यु तक होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन करने की कोशिश करता है । यही
कारण है कि इसे जीवन-अवधि विकासात्मक मनोविज्ञान (Life-span development
Psychology) की संज्ञा भी दी गयी है।
(iii) विकासात्मक मनोविज्ञान मनुष्यों के विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन वैज्ञानिक
दृष्टिकोण से करता है-विकासात्मक मनोविज्ञान का विषय-वस्तु विकासात्मक परिवर्तन
(Development change) है, जिसका अध्ययन वैज्ञानिक विधियों द्वारा किया जाता है।
प्रयोगात्मक विधि, अनुदैर्ध्य विधि (longitudinal method), साक्षात्कार विधि, प्रश्नावली विधि
तथा प्रेक्षण विधि आदि द्वारा विकासात्मक मनोवैज्ञानिक बच्चों के विकासात्मक परिवर्तनों का
वैज्ञानिक अध्ययन करते हैं। ध्यान रहे कि ऐसे अध्ययनों में विकासात्मक मनोवैज्ञानिक का
दृष्टिकोण हमेशा विकासात्मक होता है। वे व्यक्ति के भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में विकास की
प्रक्रियाओं, उनपर पड़ने वाले प्रभावों एवं विकास की परिवर्तनशीलता का अध्ययन करते हैं।
स्पष्ट हुआ कि विकासात्मक मनोविज्ञान व्यक्ति के गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक होने वाले
विकासात्मक प्रक्रियाओं एवं परिवर्तनों का सामान्य रूप से तथा गर्भधारण से 19-20 साल तक
के विकासात्मक प्रक्रियाओं एवं परिवर्तनों को विशिष्ट रूप से वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला
मनोविज्ञान है
Q.14. विकासात्मक मनोविज्ञान की विषय-वस्तु का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करें।
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसमें गर्भधारण से
लेकर जन्म लेने के बाद परिपक्वता (मृत्यु तक) तक मनुष्यों के व्यवहारों का वैज्ञानिक अध्ययन
विकासात्मक के दृष्टिकोण से किया जाता है। विकासात्मक मनोविज्ञान का मुख्य विषय-वस्तु
विकासात्मक परिवर्तनों (developmental changes) का अध्ययन करना होता है। विकासात्मक
मनोविज्ञानी बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं में होनेवाले परिवर्तनों, उन पर पड़ने वाले
प्रभावों, रुकावटों आदि का अध्ययन करते हैं। ऐसे परिवर्तनों को पूर्णरूपेण समझने के लिए वे
विकास के कई अवस्थाओं, जैसे पूर्व-प्रसूतिकाल (pre-natal period), शैशवावस्था (infancyhood),
बाल्यावस्था (babyhood), बचपनावस्था (childhood), किशोरावस्था (adolescence), युवावस्था
(adulthood), वृद्धावस्था (oldage) का भी वर्णन किये हैं। इनमें से किशोरावस्था तक
विकासात्मक मनोवैज्ञानिकों को सक्रियता तुलनात्मक रूप से अधिक होती है।
विकासात्मक मनोविज्ञान की विषय-वस्तु (subject-matter) की सबसे उत्तम व्याख्या
निम्नांकित बिन्दुओं पर प्रकाश डालने से हो पाता है-
(i) विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन (Study of developmental
changes)-विकासात्मक मनोविज्ञान का सबसे प्रमुख अध्ययन विषय मनुष्यों में होनेवाले विभिन्न
विकासात्मक परिवर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन करना है। विकास से तात्पर्य व्यक्ति में उन सभी
परिवर्तनों से होता है जो धीरे-धीरे क्रमबद्ध एवं संगत पैटर्न (pattern) पर होता है। विकासात्मक
परिवर्तन से तात्पर्य उन सारे शारीरिक एवं मानसिक परविर्तनों से होता है जिसका स्वरूप गुणात्मक
(qualitative) तथा परिमाणात्मक (quantitative) कुछ भी हो सकता है । शारीरिक आकार में
परिवर्तन परिमाणात्मक मनोवैज्ञानिक भिन्न-भिनन प्रकार के विकासात्मक परिवर्तनों, जैसे भाषा
विकास, सांवेगिक विकास, सामाजिक विकास, क्रियात्मक विकास, संवेदी विकास आदि का
वैज्ञानिक अध्ययन करते हैं।
(ii) गर्भधारण से मृत्यु तक सामान्य रूप से परंतु गर्भधारण से किशोरावस्था तक
विशिष्ट रूप से शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं का अध्ययन (Study of physical and
mental activities from conception to death in general and from conception to
adolescence in particular)-विकासात्मक मनोविज्ञान में ऐसे तो गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक
मनुष्यों के शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं का अध्ययन विकासात्मक दृष्टिकोण से किया जाता
है परंतु गर्भधारण से लेकर किशोरावस्था (19-20 साल) तक होने वाले शारीरिक एवं मानसिक
क्रियाओं के अध्ययन पर अधिक बल डाला जाता है। इस अवस्था में बच्चों में होने वाले शारीरिक
परिवर्तन, संज्ञानात्मक परिवर्तन, सामाजिक परिवर्तन, संवेगात्मक परिवर्तन आदि का विशेष रूप से
अध्ययन विकासात्मक मनोवैज्ञानिक द्वारा किया जाता है।
(iii) विकास के नियमों एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन (Formulation of principles
and theories of development)-विकासात्मक मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के जीवन के विभिन्न
अवस्थाओं में होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन ही नहीं करते हैं बल्कि उसके आधार
पर वे विकास के नियमों एवं सिद्धान्तों का भी प्रतिपादन करते हैं। इन नियमों एवं सिद्धांतों के
सहारे वे बच्चों के विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं को समझते हैं, उसकी व्याख्या करते
हैं तथा उसके बारे में पूर्वानुमान (prediction) लगाते हैं। प्रत्येक अवस्था के व्यक्तियों से विशेष
प्रकार की सामाजिक उम्मीदें (social expectations) बना सकने में वे सफल हो पाते हैं, जिससे
यह पता चल जाता है कि अमुक उम्र में व्यक्ति से किस तरह की अनुक्रियाएँ (responses) की
उम्मीद की जा सकती हैं। हेभिगहर्ट (Havighurst) ने इसे विकासात्मक पाठ (developmental
task) कहा है, जिसका निर्धारण विकासात्मक मनोविज्ञान की विषय-वस्तु का एक मुख्य
पहलू है।
स्पष्ट हुआ कि विकासात्मक मनोविज्ञान की विषय-वस्तु बच्चों के विकासात्मक परिवर्तनों
का अध्ययन करना है तथा साथ-ही-साथ उससे संबंधित नियमों एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन करके
उसे एक ठोस रूप देना होता है।
Q. 15. विकासात्मक मनोविज्ञान के विषय-विस्तार या क्षेत्र का वर्णन करें।
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की ऐसी शाखा है जिसमें विकासात्मक परिवर्तनों
का अध्ययन गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक सामान्य रूप से, परंतु गर्भधारण से लेकर किशोरावस्था
तक विशिष्ट रूप से किया जाता है। यह मनोविज्ञान शिशुओं, बच्चों एवं किशोरों के शारीरिक
परिवर्तनों तथा मानसिक परिवर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन विकासात्मक दृष्टिकोण से करता है।
अतः, इसके विषय-विस्तार का क्षेत्र (scope or field) में वे सभी परिस्थितियाँ आती हैं जो
शिशुओं, बच्चों तथा किशोरों के शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं से संबंधित होती हैं।
सुविधा के लिए विकासात्मक मनोविज्ञान के विषय-विस्तार या क्षेत्र को निम्नांकित चार प्रमुख
भागों में बाँटकर प्रस्तुत किया जा सकता है-
(क) विभिन्न विकासात्मक प्रक्रियाएँ (Different developmental process)-
विकासात्मक मनोविज्ञान में व्यक्ति के जीवन के भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के विकासात्मक प्रक्रियाओं
(developmental process) का अध्ययन किया जाता है। ये सारी विकासात्मक प्रक्रियाएंँ
गर्भधारण से ही प्रारंभ हो जाती हैं। विकासात्मक मनोवैज्ञानिकों द्वारा अध्ययन किये जानेवाले
प्रमुख प्रक्रियाओं का वर्णन निम्नांकित हैं-
(i) प्रसवपूर्व विकास (Pre-natal development)-गर्भधारण से जन्म तक शिशुओं में
होनेवाले विकास को प्रसवपूर्व विकास कहा जाता है । इस अवस्था में शिशुओं का शारीरिक
विकास मुख्य रूप से होता है।
(ii) नवजात शिशु का विकास (Neonatal development)—इसमें तुरंत के जन्मे
शिशुओं के शारीरिक एवं मानसिक विकास का अध्ययन किया जाता है।
(iii) संज्ञानात्मक विकास (Cognitive development) -संज्ञानात्मक विकास से तात्पर्य
बच्चों में किसी संवेदी सूचनाओं को ग्रहण करके उसपर चिन्तन करने तथा क्रमिक रूप से उसे
इस लायक बना देने से होता है जिसका प्रयोग विभिन्न परिस्थितियों में करके वह कई समस्याओं
का समाधान आसानी से कर लेता है।
(iv) भाषा विकास (Language development) बच्चों में विकास कई चरणों में होता
है और विकासात्मक मनोवैज्ञानिक उन सभी चरणों का विस्तृत रूप से अध्ययन करते हैं । भाषा
विकास से तात्पर्य एक ऐसी क्षमता से होती है जिसके माध्यम से बच्चे अपनी भावों, इच्छाओं
एवं विचारों को दूसरे तक पहुंचाते हैं तथा दूसरे के भावों एवं इच्छाओं को ग्रहण भी करते हैं।
(v) शारीरिक विकास (Physical development) विकासात्मक मनोवैज्ञानिक बच्चों
के शारीरिक विकास का भी अध्ययन विस्तृत ढंग से करते हैं। शारीरिक विकास से तात्पर्य बच्चों
के उम्र के अनुसार शारीरिक आकार, शारीरिक अनुपात, हड्डियों, मांसपेशियों एवं स्नायुमंडल
(nervous system) के समुचित विकास से होता है।
(vi) संवेदी विकास (Sensory development)- बच्चों के संवेदी विकास का अध्ययन
भी इसके विषय-विस्तार का एक प्रमुख पहलू है । संवेदी विकास में बच्चों के संवेदी पहलुओ
जैसे दृष्टि प्रत्यक्षण, श्रव्य प्रत्यक्षण, प्राण प्रत्यक्षण, स्वाद प्रत्यक्षण तथा त्वक् प्रत्यक्षण आदि का
अध्ययन किया जाता है।
(vii) क्रियात्मक या पेशीय विकास (Motor development)-क्रियात्मक विकास से
तात्पर्य मांसेपशियों, तंत्रिकाओं एवं तंत्रिका केन्द्रों के समन्वित क्रियाओं द्वारा शारीरिक गति,
जैसे-चलने, दौड़ने, लिखने, बोलने आदि पर नियंत्रण पाने से होता है ।
(viii) संप्रत्ययात्मक विकास (Conceptual development)-वस्तुओं के सामान्य
गुणों के आधार पर बनने वाले मानसिक प्रारूप को संप्रत्यय कहा जाता है। विकासात्मक
मनोविज्ञान में बच्चों में विभिन्न तरह के विकसित होने वाले संप्रत्ययों के विकास का विस्तृत
अध्ययन करते हैं।
(ix) खेल विकास (Play development) बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
के विकास के लिए खेल को विकासात्मक मनोविज्ञानिकों द्वारा अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है
और उसी के अनुसार खेल को प्रभावित करने वाले कारकों तथा उनके सिद्धान्तों का अध्ययन
विकासात्मक मनोवैज्ञानिक करते हैं ।
(1) नैतिक एवं चारित्रिक विकास (Moral and character development)–बच्चों
में नैतिक विकास एवं चारित्रिक विकास का अध्ययन भी विकासात्मक मनोविज्ञान के विषय-विस्तार
का एक प्रमुख भाग है । इसमें बच्चों में नैतिकता तथा चरित्र-संबंधी व्यवहारों का विकास
किन-किन परिस्थितियों में अधिक होता है, उसके अध्ययन पर बल डाला जाता है ।
(xi) संवेगात्मक विकास (Emotional development) बच्चों में किन-किन अवस्थाओं
में किस तरह का संवेग उत्पन्न होता है तथा उसका विकास होता है, इसका भी अध्ययन
विकासात्मक मनोविज्ञान में गहन रूप से किया जाता है।
(xii) सामाजिक विकास (Social development) बच्चों का समाजीकरण तथा उनके
सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का विस्तृत रूप से अध्ययन विकासात्मक
मनोविज्ञान में किया जाता है।
(xiii) यौन-भूमिका विकास (Sex-role development) लड़के या लड़कियों को
अपने यौन के अनुसार कुछ कार्य सीखना आवश्यक हो जाता है और वे इन भूमिकाओं को किन
परिस्थितियों में उत्तम ढंग से सीखते हैं, इसका अध्यन विकासात्मक मनोविज्ञान में विस्तृत ढंग
से किया जाता है।
(ख) विकास की अवस्थाएँ (Stages of development) विकासात्मक मनोवैज्ञानिक
विकासात्मक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के ख्याल से विकास की कई अवस्थाओं का निर्धारण
किये हैं, जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं-
(i) पूर्व प्रसूति काल (Pre-naral period)-यह अवस्था गर्भधारण से प्रारंभ होकर जन्म
तक की होती है।
(ii) शैशवावस्था (Infancyhood) यह अवस्था जन्म से लेकर प्रथम 14 दिनों तक की
होती है।
(ii) बचपनावस्था (Babyhood)-यह अवस्था जन्म के दो सप्ताह बाद प्रारंभ होकर 2
साल तक की होती है।
(iv) बाल्यावस्था (Childhood)-यह अवस्था 2 साल से प्रारंभ होकर 12 साल होती है।
2 साल से 6 साल की अवस्था को आरंभिक बाल्यावस्था (early childhood) तथा 6 साल से
12 साल की अवस्था को उत्तर बाल्यावस्था (later childhood) कहा जाता है।
(v) तरुणावस्था या प्राक् किशोरावस्था (Puberty or pre-adolescence)-यह अवस्था
11 से 13 साल की होती है।
(vi) किशोरावस्था (Adolescence)-यह अवस्था 13 साल से 19-20 साल की होती है।
इस अवस्था में शारीरिक एवं मानसिक विकास बहुत तेजी से होता है।
(ग) बाल मार्गदर्शन (Child guidance)-बाल मार्गदर्शन को विकासात्मक मनोविज्ञान
का एक प्रमुख कार्य क्षेत्र माना गया है। इसमें विकासात्मक मनोवैज्ञानिक विभिन्न नियमों एवं
सिद्धान्तों के सहारे बाल समस्याओं की पहचान करते हैं तथा उसके समाधान के लिए उपयुक्त
सलाह देते हैं तथा उनका सही मार्गदर्शन करते हैं।
(घ) असामान्य बच्चों की समस्याओं का अध्ययन (Study of problems of
abnormal children)-विकासात्मक मनोविज्ञान का विषय-विस्तार या क्षेत्र का एक प्रमुख भाग
असामान्य बच्चों के व्यवहारों का भी अध्ययन करना है। विकासात्मक मनोविज्ञान में बाल
मनोविदलता (childhood schizophrenia), शैशव आत्म विमोह (infantile autism), किशोर
अपराध (juvenile delinquency) आदि जैसे व्यवहारों का भी अध्ययन किया जाता है।
स्पष्ट हुआ कि विकासात्मक मनोविज्ञान का विषय-विस्तार या क्षेत्र काफी विस्तृत है, जिसमें
मुख्य रूप से बालकों एवं किशोरों की समस्याओं एवं उनके विकासात्मक प्रक्रियाओं के अध्ययन
पर बल डाला जाता है।
Q.16. विकासात्मक मनोविज्ञान के उद्देश्य या लक्ष्य का वर्णन करें।
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान में गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक की प्रक्रियाओं का सामान्य
रूप से तथा गर्भधारण से किशोरावस्था तक की प्रक्रियाओं का विशिष्ट रूप से विकासात्मक
दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है। विकासात्मक मनोविज्ञान के लक्ष्य या उद्देश्य को दो भागों
में बाँटकर उपस्थित किया जा सकता है-
(क) सामान्य उद्देश्य (general aims)
(ख) विशिष्ट उद्देश्य (specific aims)
इन दोनों का वर्णन निम्नांकित है-
(क) सामान्य उद्देश्य (General aims)-विकासात्मक मनोविज्ञान का सामान्य उद्देश्य
बाल व्यवहारों की भविष्यवाणी (predicition), मार्गदर्शन (guidance) तथा नियंत्रण (control)
करना होता है।
इन तीनों का वर्णन इस प्रकार है-
(i) भविष्यवाणी (Prediction)-विकासात्मक मनोविज्ञान बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक
क्रियाओं का विकासात्मक दृष्टिकोण से अध्ययन करके यह भविष्वाणी करता है कि बच्चों का
भविष्य में भाषा विकास, संवेगात्मक विकास, सामाजिक विकास, संज्ञानात्मक विकास आदि कैसा
होगा।
(ii) मार्गदर्शन (Guidance)-मार्गदर्शन का अर्थ होता है बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक
योग्यता के अनुरूप उन्हें जीवन क्षेत्र में सही रास्ता अपनाने की सलाह देना। विकासात्मक
मनोविज्ञान का मुख्य उद्देश्य बच्चों की बौद्धिक क्षमता, कल्पनाशक्ति, संवेगात्मक एवं संज्ञानात्मक
व्यवहारों को ध्यान में रखकर उन्हें जिन्दगी में ठीक ढंग से समायोजन करने के लिए निर्देशन
देना होता है।
(iii) नियंत्रण (Control)-बच्चों में स्वस्थ शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं के विकास
के लिए कुछ अवांछित कारकों को नियंत्रित करके रखना आवश्यक हो जाता है। चूँकि विकास
की प्रक्रिया गर्भ से ही प्रारंभ हो जाती है, अतः गर्भ के दौरान शिशुओं के विकास को खराब
ढंग से प्रभावित करने वाले कारक जैसे माँ का मानसिक तनाव, कुपोषण आदि को नियंत्रित करना
या इसे दूर करने के उपाय बतलाना विकासात्मक मनोविज्ञान का एक मुख्य उद्देश्य है। इतना ही
नहीं जन्म के बाद बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास को अवरुद्ध करने वाले कारकों को
भी नियंत्रित करना विकासात्मक मनोविज्ञान का एक प्रमुख उद्देश्य है।
(ख) विशिष्ट उद्देश्य (Specific aims) हरलॉक (Hurlock) के अनुरूप विकासात्मक
मनोविज्ञान के निम्नांकित पाँच विशिष्ट उद्देश्य हैं-
(i) विभिन्न विकासात्मक कालों में होनेवाले परिवर्तनों का अध्ययन करना (To studj
changes takingplace in different developmental period)-विकासात्मक मनोविज्ञानियों
द्वारा विभिन्न विकासात्मक कालों जैसे पूर्वप्रसूति काल, शैशवावस्था, बचपनावस्था, बाल्यावस्था
तथा किशोरावस्था आदि में होनेवाले विशिष्ट परिवर्तनों का अध्ययन गहन रूप से किया जाता
है ताकि उसके विकासात्मक स्वरूप को ठीक ढंग से समझा जाए ।
(ii) विकासात्मक अवधि में होने वाले परिवर्तनों के समय का पता लगना (To fial
out time when changes during developmental period take place)-विभिन्न
विकासात्मक काल में बच्चे अलग-अलग व्यवहार करते हैं। हरलॉक के अनुसार विकासात्मक
मनोविज्ञान का एक उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि किसी अमुक अवस्था के शरू होने पर
बच्चे कब कैसा व्यवहार करते हैं।
(iii) उन परिस्थितियों या कारकों का पता लगाना जिससे विकासात्मक परिवर्तन
प्रभावित होते हैं (To locate those factors or situations which influence
development)-बच्चों में पर्याप्त विकासात्मक परिवर्तन (developmental changes) कुछ
खास परिस्थिति में ठीक ढंग से होता है। जैसे, बच्चों में भाषा विकास तभी ठीक ढंग से होता
है जब उसके वागिन्द्रिय (vocal organ) परिपक्व हो गए हों तथा उसमें मानसिक परिपक्वता आ
गयी हो । विकासात्मक मनोविज्ञानी उपयुक्त विकासात्मक परिवर्तन के लिए उपयुक्त परिस्थिति की
पहचान करते हैं।
(iv) बच्चों के व्यवहार पर विकासात्मक परिवर्तन के पड़ने वाले प्रभावों का पता
लगाना (To find out the impact of develomental changes upon the behaviour of
the children)-विकासात्मक मनोवैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि विकासात्मक
परिवर्तन का प्रभाव बच्चों पर कैसा पड़ता है। इस तरह के प्रभाव के बारे में ज्ञान प्राप्त कर
विकासात्मक मनोवैज्ञानिक प्रत्येक अवस्था में बच्चों द्वारा किये जाने वाले व्यवहार का अनुमान
लगा पाते हैं।
(v) विकासात्मक परिवर्तन के बारे में पूर्वानुमान लगाना (To predict about
developmental changes)-विकासात्मक मनोविज्ञान जीवन के विभिन्न अवस्थाओं में होनेवाले
विकासात्मक परिवर्तन के बारे में पूर्वानुमान लगा पाते हैं। कुछ परिवर्तन स्पष्ट एवं सभी बच्चों
में एक समान होते हैं। अतः, ऐसे परिवर्तनों का तो पूर्वानुमान आसानी से लगा लिया जाता है।
परंतु, कुछ परिवर्तन अस्पष्ट होते हैं तथा भिन्न-भिन्न बच्चों में अलग-अलग ढंग से होते हैं।
विकासात्मक मनोविज्ञान में ऐसे परिवर्तनों के बारे में भी पूर्वानुमान लगाते हैं।
स्पष्ट हुआ कि विकासात्मक मनोविज्ञान के कई उद्देश्य हैं। उनके सामान्य उद्देश्य तथा
विशिष्ट उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि विकासात्मक मनोविज्ञान बालकों
के व्यवहारात्मक परिवर्तन का विकासात्मक दृष्टिकोण से अध्ययन करने का एक बहुत ही उपयोगी
विज्ञान है।
Q.17. विकासात्मक मनोविज्ञान की उपयोगिता का वर्णन करें।
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान मनोविज्ञान की एक ऐसी शाखा है जो बच्चों के शारीरिक
एवं मानसिक क्रियाओं का अध्ययन गर्भधारण से परिपक्वता तक विकासात्मक दृष्टिकोण से करता
है। अतः, इसकी उपयोगिताएँ काफी हैं। इसकी प्रमुख उपयोगिताएँ निम्नांकित हैं-
(i) माता-पिता के लिए उपयोगिता (Uses for parents)
(ii) शिक्षकों के लिए उपयोगिता (Uses for teachers)
(iii) शोधकर्ताओं के लिए उपयोगिता (Uses for research workders)
(iv) बच्चों के लिए उपयोगिता (Uses for childrens)
(v) बाल सुधारकों के लिए उपयोगिता (Uses for child reformers)
(vi) समाज के लिए उपयोगिता (Uses for society)
(vii) बाल न्यायालयों के लिए उपयोगिता (Uses for juvenile courts)
इन सबों का वर्णन निम्नांकित हैं-
(i) माता-पिता के लिए उपयोगिता (Uses for parents)-विकासात्मक मनोविज्ञान की
उपयोगिता माता-पिता के लिए काफी है। विकासात्मक मनोविज्ञान के सिद्धान्तों, नियमों तथा तथ्यों
की जानकारी होने से माता-पिता अपने बच्चों के मानसिक एवं शारीरिक विकास के क्रम
(sequence) के बारे में सही-सही अनुमान लगा पाते हैं तथा उन्हें सही मार्गदर्शन करके उनके
व्यक्तित्व विकास करने में योगदान करते हैं।
(ii) शिक्षकों के लिए उपयोगिता (Uses for teachers)-शिक्षकों के लिए विकासात्मक
मनोविज्ञान की उपयोगिता दोहरी बतलायी गयी है। इस मनोविज्ञान से शिक्षकों को यह पता चल
जाता है कि बच्चों का संज्ञानात्मक विकास, भाषा विकास तथा सांवेगिक विकास किस स्तर तक
हुआ है। इससे वे इसकी अभिक्षमता तथा अभिरुचि के अनुरूप शिक्षा दे पाते हैं। दूसरा,
विकासात्मक मनोविज्ञान से यह भी पता चल जाता है कि बच्चा प्रतिभाशाली है या कम बुद्धि का
है। इन दोनों तरह के बच्चों को वे सामान्य बच्चों से अलग कक्षा में प्रशिक्षण देकर उनहें शिक्षित
करते हैं।
(iii) शोधकत्ताओं के लिए उपयोगिता (Uses for research workers)-विकासात्मक
मनोविज्ञान की उपयोगिता इस क्षेत्र के शोधकर्ताओं के लिए भी काफी है। शोधकर्ता बच्चों के
भाषा विकास, सांवेगिक विकास, संज्ञानात्मक विकास, संप्रत्ययात्मक विकास (conceptual
development), खेल का विकास, नैतिक एवं चारित्रिक विकास के मूल तत्वों एवं नियमों का
गहन अध्ययन कर संबंधित क्षेत्र में नये-नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं जिससे विकासात्मक
मनोविज्ञान का कार्य क्षेत्र में तेजी से विस्तार होता पाया गया है।
(iv) बच्चों के लिए उपयोगिता (Uses for childrens)-विकासात्मक मनोविज्ञान की
उपयोगिता स्वयं बच्चों के लिए भी काफी अधिक है। यदि बच्चों का पालन-पोषण एवं उनके
व्यवहारों का नियंत्रण विकासात्मक नियमों के आधार पर किया जाता है, तो इससे पूर्वानुमान लगाने
में काफी आसानी होती है कि वयस्क होने पर बच्चे का व्यक्तित्व कैसा होगा। यह आसानी से
समझा जा सकता है कि वयस्कता आने पर उनके व्यक्तित्व में सामाजिक शीलगुण (social
traits) अधिक होंगे या असामाजिक शीलगुण (asocial traits) अधिक होंगे।
(v) बाल-सुधारकों के लिए उपयोगिता (Uses for child reformers)-विकासात्मक
मनोविज्ञान की उपयोगिता बाल-सुधारकों के लिए काफी अधिक है । प्रायः देखा गया है कि बच्चे
कुछ विशेष कारण से अपराधी या समस्यात्मक (Preblematic) हो जाते हैं । इन बच्चों को
सुधारने के ख्याल से बाल-सुधारकों को विकासात्मक मनोविज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक है।
विकासात्मक मनोविज्ञान के सिद्धान्त, नियम तथा तथ्यों की जानकारी से बाल-सुधारक ऐसे बच्चों
की समस्याओं के कारण का पता लगा पाते हैं तथा फिर उनके समुचित सुधार के लिए कदम
उठा पाते हैं।
(vi) समाज के लिए उपयोगिता (Uses for society)-विकासात्मक मनोविज्ञान के ज्ञान
से यह पता लगाना आसान हो जाता है कि किसी बच्चे का उत्तम सामाजिक विकास कैसे हो
सकता है और यदि ऐसा विकास ठीक ढंग से नहीं हुआ है तो फिर उसे समाजीकृत (socialize)
कैसे किया जा सकता है । यदि समाज या कोई अन्य सामाजिक संस्थान रन कारकों पर
अधिक ध्यान देता है जिससे बच्चे समाजीकृत (socialize) हो पाते हैं, तो इससे इस बात की
संभावना काफी बढ़ जाती है कि बच्चे का सामाजिक विकास ठीक ढंग से हो पाएगा और फिर
ऐसे बच्चे समाज का उत्थान कर सकने में धनात्मक भूमिका निभाएँगे ।
(vii) बाल-न्यायालयों के लिए उपयोगिता (Uses for juvenile courts) सामान्यतः
बाल अपराधियों के मुकदमे की सुनवाई सामान्य न्यायालयों में नहीं करके बाल-न्यायालयों में किया
जाता है। ऐसे न्यायालयों के न्यायाधीश विकासात्मक मनोविज्ञान के नियमों, तथ्यों तथा सिद्धान्तों
की सहायता लेकर अपराध संबंधी कारणों का पता लगाते हैं तथा अपना निर्णय उसी के आलोक
में देते हैं। क्योंकि उनका प्रयास यही होता है कि बच्चों के आपराधिक प्रवत्ति को नियंत्रित करने
का पूरा-पूरा मौका कारावास में दी जाए ।
निष्कर्षत यह कहा जा सकता है कि विकासात्मक मनोविज्ञान की उपयोगिता कई तरह के
लोगों के लिए है।

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