11- psychology

Bihar board solutions for class 11th psychology chapter 4

Bihar board solutions for class 11th psychology chapter 4

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मानव विकास
                                                    [Human Development]
                                                          पाठ के आधार-बिन्दु
● विकास, गतिशील, क्रमबद्ध तथा पूर्व कथनीय परिवर्तनों का प्रारूप है।
● विकास जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है ।
● विकास अत्यधिक लचीला या संशोधन योग्य होता है।
● विकास अनेक शैक्षणिक विद्यालयों के लिए एक सरोकार है।
● परिपक्वता उन परिवर्तनों को इंगित करता है जो एक निश्चित क्रम का अनुसरण
    करता है।
● आनुवंशिकता विशेषताओं को हस्तांतरण करने की प्रक्रिया है।
● विकास सदैव एक विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में सन्निहित होता है ।
● गर्भाधान से लेकर जन्म तक की अवधि को प्रसव पूर्व काल कहा जाता है ।
● ग्यारह वर्ष की उम्र से लेकर तेरह वर्ष तक की उम्र वाले बच्चे को तरुण कहा जाता है।
● प्रौढ़ावस्था के बाद वृद्धावस्था का आ जाना माना जाता है।
● नवजात शिशु सामान्य हाव-भाव का अनुकरण कर सकता है ।
● 2-7 वर्ष की आयु के बच्चों में प्रतीकात्मक विचार विकसित होते हैं।
● जीवन का प्रथम वर्ष आसक्ति के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण समय होता है।
● जिस सर्वाधिक शक्तिशाली भूमिका में लोगों का समाजीकरण हुआ है वह है लिंग
   भूमिका ।
● बच्चे के विकास का एक प्रमुख पक्ष है मानवीय क्रियाओं के सही या गलत होने
    के मध्य अंतर करना सीखना ।
● किशोरावस्था में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के परिवर्तन को विकास का
    आधार माना जाता है।
● किशोर के विचार अधिक अमूर्त, तर्कपूर्ण एवं आदर्शवादी होते हैं।
● किशोरों की पहचान निर्माण का एक प्रमुख कारक व्यावसायिक प्रतिबद्धता भी है।
● सभी प्रौढ़ प्रज्ञा नहीं होते हैं ।
● वृद्धावस्था में शक्तिहीनता, अनुभव एवं स्वास्थ्य, वित्तीय संपत्तियों का क्षीण होना,
    असुरक्षा एवं निर्भरता को जन्म देता है।
                                          पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर
Q. 1. विकास किसे कहते हैं ? यह संवृद्धि तथा परिपक्वता से किस प्रकार
भिन्न है?
Ans. विकास का अर्थ-विकास जैविक संज्ञानात्मक तथा समाज सांवेगिक प्रक्रियाओं की
परस्पर क्रिया प्रभावित होने वाली वैसी दशा है जो प्रगतिशील परिवर्तनों के अन्तर्गत गतिशील,
क्रमबद्ध तथा पूर्वकथनीय परिवर्तनों का प्रारूप होता है तथा जो प्रक्रिया गर्भाधान से प्रारम्भ होता
है तथा जीवन पर्यन्त चलता रहता है और परिपक्वता की ओर निर्देशित रहता है।
विकास की विशेषताएँ-(i) विकास जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है जो परिपक्वता प्राप्ति
की ओर निर्देशित रहता है ।
(ii) विकास सम्बन्धी विभिन्न प्रक्रियाएँ (जैविक, संज्ञानात्मक समाज-संवेगात्मक) किसी।
व्यक्ति के विकास में एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित रहते हैं।
(iii) विकास बहु-दिश है अर्थात् विकास के एक आयाम का कुछ अन्य आयामों में वृद्धि
या ह्रास का प्रदर्शन किया जा सकता है।
(iv) विकास अत्यधिक लचीला या संशोधन योग्य होता है।
(v) विकास ऐतिहासिक दशाओं से प्रभावित होते हैं।
(vi) विकास, अनेक शैक्षणिक विधाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण सरोकार है ।
(vii) सकारात्मक घटनाएँ और प्रकट की गई अनुक्रिया से विकास प्रभावित हो सकता है।
विकास को प्रभावित करने वाले कारक-शारीरिक लक्षण, बुद्धि, अधिगम योग्यता,
स्मृति, मानसिक लक्षण, आनुवंशिकता, आनुवंशिक कूट, प्रपंच परिवेश या पर्यावरण आदि को
विकास से संबंधित कारक मान सकते हैं । अर्थात् माता-पिता से प्राप्त जीव के अनुकूल परिवेश
मिलने पर अच्छे विकास की संभावना बढ़ जाती है।
जीवन भर निरन्तर होने वाले विविध परिवर्तनों के रूप में विकास-क्रम चलता रहता है।
विकास बहुदिश के साथ-साथ बहुआयामी भी माना जाता है । लोग किसी व्यक्ति के विकास
का आधार अलग-अलग दृष्टिकोण को मानते हैं। कोई कद की लम्बाई के बढ़ जाने को विकास
मानता है तो कोई मोटापा को । कोई वर्ग-संख्या को तो कोई लब्धांक को विकास कहता है।
बैंक में लॉकरों की संख्या बढ़ा देने पर लोग समझते हैं कि वह अब विकास कर रहा है। कोई
अतिथि सत्कार को महान मानता है तो उसे मानसिक रूप से विकसित माना जाता है।
विकास-क्रम में विविध स्थितियाँ आती हैं जिनसें से दो प्रमुख स्थितियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण हैं-
(i) संवृद्धि और (ii) परिपक्वता ।
(i) संवृद्धि -शारीरिक अंगों अथवा सम्पूर्ण जीव की बढ़ोतरी को संवृद्धि कहा जाता है।
संवृद्धि का मापना अथवा मात्राकरण किया जा सकता है। उदाहरणार्थ कोई व्यक्ति कितना लम्बा
हो गया, या कितना भारी हो गया? इन प्रश्नों के उत्तर मीटर या किलोग्राम में दिये जा सकते
हैं । संवृद्धि विकास का मात्र एक पक्ष है।
(ii) परिपक्वता-परिपक्वता शारीरिक एवं मानसिक विकास का कारण माना जाता है
अतः परिपक्वता उन परिवर्तनों को इंगित करता है जो एक निर्धारित क्रम का अनुसरण करते हैं
तथा प्रधानतः उस आनुवंशिक रूपरेखा से सुनिश्चित होते हैं जो हमारी संवृद्धि एवं विकास में
समानता उत्पन्न करते हैं । अर्थात् मनुष्य के अन्दर उत्पन्न उन विशेषताओं से संबंधित परिवर्तन
को परिपक्वता मानते हैं जो माता-पिता एवं अन्य पूर्वजों से ग्रहण किये जाते हैं । चेहरे पर एकाएक
दाढ़ी मूंँछ का उग जाना, आवाज में भारीपन का अनुभव होना, बच्चों का दौड़ना, खड़ा हो जाना
आदि परिपक्वता के उदाहरण हैं।
इस प्रकार माना जा सकता है कि विकास एक लम्बी प्रक्रिया है तथा संवृद्धि और परिपक्वता
उस विकास क्रम के दो निश्चित पड़ाव मात्र है । विकास से अनेक
कायिक-मानसिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों का बोध होता है जबकि संवृद्धि और परिपक्वता
विकास संबंधी दो लक्षण मात्र हैं । संवृद्धि और परिपक्वता को विकास क्रम से जोड़ा जा सकता
है, लेकिन सभी विकास क्रम के साथ इन दोनों पदों की व्याख्या करना आवश्यक नहीं होता है।
Q.2. विकास के जीवनपर्यंत परिप्रेक्ष्य की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Ans. मानव जीवन भर धनात्मक या ऋणात्मक परिवर्तन के अधीन जीता है। परिवर्तन
की एक नियत दिशा होती है तथा मानव विकास कुछ विशिष्ट विशेषताओं के साथ मानव को
प्रभावित करते रहता है। विकास के जीवनपर्यंत परिप्रेक्ष्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्न वर्णित हैं-
(i) विकास एक नियत प्रणाली का अनुसरण करता है-मानव का विकास मनचाहे ढंग
से नहीं होता है बल्कि विकास नियमित और सुव्यवस्थित प्रणाली के आधार पर परिवर्तन लाता
है। आदमी किस उम्र में चलना प्रारम्भ करेगा, कब वह पढ़ने जायेगा, यह लगभग पूर्व निर्धारित
अवधि के अनुसार परिवर्तन के रूप में देखा जाता है । यहाँ तक कि अब विकास से संबंधित
ऊँचाई-उम्र, मानसिक दशा, सामाजिक विकास-उम्र इत्यादि की भविष्यवाणी की जा सकती है।
(ii) विकास जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है-गर्भाधान से वृद्धावस्था एक सभी स्तरों
पर कुछ-न-कुछ परिवर्तन होते ही रहते हैं चाहे उससे लाभ मिले या हानि, कभी घुटने के बल
खिसकने वाला बच्चा लम्बी दौड़ में प्रथम स्थान पाता है तो कभी गन्ना चुसने वाला युवक दाँत
गंवाकर खाने के लिए मजबूर हो जाता है । अर्थात् सम्पूर्ण जीवन-विस्तार में गत्यात्मक विधियों
से होनेवाला परिवर्तन मानव व्यवहार और क्षमता को प्रभावित करते रहता है ।
(iii) विकास-प्रक्रमों में पारस्परिक संबंध होते हैं-जन्म से मृत्यु के बीच मनुष्य जीने के
क्रम से जैविक, संज्ञानात्मक तथा समाज-सवेगात्मक परिवर्तन से जूझता रहता है । इन विभिन्न
प्रक्रियाओं के प्रभाव और परिणाम में भिन्नता अवश्य होती है लेकिन विकास क्रय में ये हानिप्रद
रूप से संबंधित रहते हैं । एक व्यक्ति से मित्रता बढ़ाने से हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति नाराज
हो जाए । टहलने से स्वास्थ्य-लाभ मिलता है । लेकिन समय की क्षति होने से पूर्व निर्धारित काम
अधूरा रह जा सकता है जो कर्मठता को अविश्वसनीय स्थिति में ला देता है।
(iv) विकास बहुदिश अथवा बहुआयामी होता है-विकास क्रम में होने वाला कोई एक
परिवर्तन मानवीय क्रिया के एक घटक को लाभ पहुँचाता है तो यह भी संभावना रहती है कि कोई
दूसरा घटक क्षति की दशा में पहुँच जाए । एक की बुद्धि दूसरे घटक के हास का कारण बन
सकता है। उम्र से अनुभव बढ़ता है, लेकिन शारीरिक क्षमता कमी आ जाने से वह पहले की
तरह दौड़ नहीं सकता है । मानसिक वृद्धि और शारीरिक क्षमता में कमी दोनों साथ-साथ होने
वाले परिवर्तन हैं।
(v) विकास अत्यधिक लचीला या संशोधन के योग्य होता है-विकास क्रम में होने वाला
परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से मान्य नहीं भी हो सकता है। अत: एक व्यक्ति परिवर्तन
में वृद्धि चाहता है तो दूसरा उस परिवर्तन पर अंकुश लगा देना चाहता है। कुछ ऐसे परिवर्तन
होते हैं जो हमारी इच्छा के अनुसार अपना रूप या प्रभाव बदल सकते हैं। आज जो छात्र कम
अंक पाता है, स्वभाव से चोर है वही बालक अभ्यास और प्रयास करके आदर्श छात्र तथा इंसान
बनकर उपस्थित होता है । कला, कौशल, आदत, योग्यता आदि से संबंधित परिवर्तन को मानव
अपने अधीन रखकर वांछनीय संशोधन करके उसे लचीला होने का प्रयास जुटा लेता है।
(vi) विकास ऐतिहासिक दशाओं से प्रभावित होता है-विकास क्रम में होने वाला कोई
परिवर्तन जो पहले के जमाने में प्रशंसा पाता था वही परिवर्तन अप मजाक एवं हँसी का विषय
बन जाता है । पैर छूकर प्रणाम करने की प्रवृत्ति पहले जितना ही भला माना जाता था आधुनिक
काल में पिछाड़ापन का संकेत देता है। पूर्व में प्राप्त की गई उपाधि रोजगार का अवसर देने में
पूर्णत: सक्षम था लेकिन आज बड़ी-बड़ी उपाधि लेकर भी मनुष्य बेरोजगारी का शर्मीन्दगी झेल
रहा है। पहले के जमाने में 20 वर्ष का युवक जो अनुभव और योग्यता रखता था वह आज से
काफी अलग है।
(vii) विकास अनेक शैक्षणिक संस्थाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण सरोकार है-शिक्षण
संस्थाओं में मनोविज्ञान, मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, तंत्रिका विज्ञान के साथ-साथ अब यौन शिक्षा
की व्यवस्था किए जाने का अर्थ है कि जानकर लोग मानव विकास के पक्षधर हैं और वे चाहते
हैं कि मानव में इतनी क्षमता आ जाए कि वह किसी भी परिवर्तन को अपने अनुकूल बनाने की
क्षमता बना ले।
(viii) एक व्यक्ति परिस्थिति अथवा संदर्भ के आधार पर अनुक्रिया करता है-मानव
अपने जीवन में सदा विकास की आकांक्षा करता है । वह अवरोधक के प्रति असंतोय एवं क्षोभ
प्रकट करने के लिए स्वतंत्र होता है । इस संदर्भ के अंतर्गत वंशानुगत रूप से प्राप्त विशेषताएंँ
(भौतिक पर्यावरण, सामाजिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक) शामिल हो जाती हैं । जैसे
माता-पिता की मृत्यु, दुर्घटना, भूकम्प, बाढ़, प्राकृतिक आपदा आदि हमारी खुशी और शान्ति को
छीन लेते हैं तो दूसरी ओर सफलता, जीत, पुरस्कार, नौकरी आदि हमारी प्रकृति में उत्साह का
संचार कर देता है । अतः नकारात्मक और सकारात्मक परिवर्तन हमारे विकास को प्रभावित करते
हैं । आदमी परिवर्तन का कारण, दशा, परिणाम को जान-समझकर अपने आप को अनुकूलित
कर लेने का प्रयास जमकर करता है
Q.3. विकासात्मक कार्य क्या है ? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए ।
Ans. मानव जीवन विविधताओं के भण्डार का मालिक होता है । तरह-तरह के परिवर्तन,
आकांक्षाएँ, कला, व्यवहार एवं अवस्था के साथ वह बाल्यावस्था से वृद्धावस्था को प्राप्त कर
लेता है । भिन्न-भिन्न मानव अपने परिवेश, आनुवंशिकता, परिस्थिति और अवस्था के वशीभूत
होकर अलग-अलग विकास परिणाम को पाता है। मानवीय विकास सामान्यतया अवधि या
अवस्थाओं के रूप में सम्पन्न होता है। लोग तरह-तरह के आचरण और परिणाम के हकदार
बनकर जीते हैं।
एक ही घटना का प्रभाव बच्चे, युवा, वृद्ध पर अलग-अलग देखा जाता है । मानव जीवन
विभिन्न अवस्थाओं से होते हुए आगे बढ़ता है । युवा फिल्म देखना पसन्द करता है तो वृद्ध भजन
में तल्लीन रहता है। विकासात्मक अवस्थाएँ अस्थायी रूप से कार्यरत होते हैं तथा प्रभावी लक्षण
के द्वारा पहचाने जाते हैं। कारण-परिणाम की व्याख्या अवधि और अवस्था के आधार पर की
जा सकती है। कोई वर्तमान की दशा से संतुष्ट रहता है तो कोई भविष्य कामना में साधना करता
हुआ देखा जाता है । निःसंदेह विकास की एक अवस्था से दूसरी अवस्था के मध्य विकास के
समय और दर के सापेक्ष व्यक्ति निश्चित रूप से भिन्न होते हैं। यह भी सत्य है कि कला, कौशल,
प्रशिक्षण और निपुणता एक विशिष्ट अवस्था को अनुकूल माना जाता है । संबंधित कार्य का
विकासात्मक कार्य माना जाता है। विकासात्मक कार्य व्यक्ति की अवस्था एवं निपुणता पर
आधारित होता है जो अवधि, अवस्था एवं परिवेश के कारण कम और अधिक, मंद और तीव्र
अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है।
Q. 4. ‘बच्चों के विकास में बच्चे के परिवेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका है ।’ उदाहरण
की सहायता से अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
Ans. बच्चों के विकास पर वंशानुक्रम कारक के अलावा परिवेश की महत्त्वपूर्ण भूमिका
होती है। आधुनिक मत के अनुसार दोनों कारकों को अपर्याप्त माना जाता है । अर्थात् दोनों कारक
एक-दूसरे के पूरक हैं। पूर्वजों से प्राप्त जीन विकास की सीमाओं का निर्धारण मात्र करते हैं।
और परिवेश वांछनीय विकास को प्रत्यक्षतः प्रभावित करता है। बच्चों के विकास में जिन एक
विशिष्ट रूपरेखा तथा समय-सारणी प्रदान करते हैं, लेकिन जीन का अलग से कोई अस्तित्व नहीं
माना जाता है। बच्चों के विकास में बच्चे के परिवेश का महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है । जीन तो
स्वयं परिवेश के कारण अपना प्रभाव प्रदर्शित कर पाता है।
पूर्वजों के जीन के कारण कोई नाटा कद का बच्चा जब जन्म लेता है तो वह बच्चा किसी
भी विधि से लम्बा नहीं होगा। परिवेश उस नाटे बच्चे को बहुर्मुखी बनाने में सक्षम होता है।
आनुवंशिक तौर पर यदि कोई बच्चा मंद बुद्धि वाला होता है तो परिवेश के प्रयास से वह बुद्धिमान
बन सकता है। अत: जीन के कारण आने वाली कमी को परिवेश संभवत: विकास के पथ पर
ला सकता है। बुद्धिमान अभिभावक अपने बच्चे को अच्छा संस्कार, बुद्धि, निर्णय क्षमता सभी
कुछ देने में समर्थ है। जीन के प्रभाव से उत्पन्न आवश्यकताओं या रुचि को परिवेश उत्तम अवसर
दे सकता है। संगीत या खेलकूद में रुचि रखने वाले बच्चे को परिवेश के माध्यम से उचित साधन
और अवसर मिल सकते हैं।
एक ग्रामीण क्षेत्र का बुद्धिमान बच्चा उन्नत परिवेश में नहीं पलने के कारण किसी
प्रतियोगिता में असफल हो जा सकता है । कम्प्यूटर की जानकारी नहीं होने के कारण बच्चा
बुद्धिमान होने पर भी सही भावना को अभिव्यक्त नहीं कर पाता है । यदि बच्चे को विकसित करना
होता है तो उसे उचित अवसर और अच्छा परिवेश दिया जाता है । अच्छी शिक्षण पद्धति, सीखने
के योग्य अनुकूल परिवेश पाकर बच्चा उस स्थिति से पूर्णतः अवगत हो जाता है और वांछनीय
विकास का पात्र बन जाता है । अर्थात् पूर्वजों से मिले ज्ञान की उपयोगिता अनुकूल दशा में तभी
होती है जब परिवेश अभ्यर्थी को योग्य बनाकर सक्षम यात्र के रूप में उपस्थित होता है और
परिवेशीय वातावरण में उसकों विकास करने का अवसर देने में सक्षम होता है।
Q.5. विकास को सामाजिक-सांस्कृतिक कारक किस प्रकार प्रभावित करते हैं ?
Ans. किसी व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन काल में अभिलाषा, आवश्यकता और परिवेश के
प्रभाव से संबंधित असंख्य अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिलता है। जैसे, अच्छे विद्यालय में
प्रवेश पाकर योग्य नागरिक बनने की अभिलाषा, नौकरी पाने की आवश्यकता के साथ-साथ
किशोर बनना, विवाह करना, पिता कहलाना, समाज सेवक जैसा कार्य करना, उद्घाटन करना जैसे
कार्य साहसी विकास और परिवर्तन से प्रभावित होना पड़ता है। ज्ञात है कि विकास निर्वात में
किसी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में सन्निहित होना है । यह भी सत्य है कि जीवन काल
में परिवेश और परिणाम में कभी भी परिवर्तन हो सकते हैं।
युरी ब्रानफेन ब्रेनर के विचार से व्यक्ति के विकास में परिवेशीय कारकों की भूमिका अधिक
महत्त्वपूर्ण होती है। उसके विचार के निरूपन निम्नांकित आरेख से स्पष्ट हो जाता है-
प्रस्तुत आरेख के विभिन्न पहलुओं से निम्न सूचनाएँ प्राप्त होती हैं-
लघु मंडल-यह परिवेश के महत्त्व का समर्थन करते हुए साथी-सहयोगी, अध्यापक,
परिवार, पड़ोस आदि का प्रभाव प्रदर्शित करता है । इसके अनुसार व्यक्ति अपने निकटतम परिवेश
से प्रत्यक्षतः अन्तःक्रिया करता है।
                                           
मध्य मंडल-इसके अन्तर्गत प्रमुख सामाजिक गुणों को अपनाये जाने के लिए परिवेशक के
मध्य संबंध की पुष्टि होती है। अध्यापक, अतिथि, पड़ोसी के साथ किये जाने वाले उत्तम व्यवहार
की शिक्षा एवं अनुभव किसी व्यक्ति को परिवेश के बीच पलने-बढ़ने से मिलता है।
बाह्य मंडल-बाह्य मंडल के अन्तर्गत ऐसे अनुभवों का अध्ययन किया जाता है जो
सामाजिक परिवेश की वे घटनाएँ होती हैं जिसमें कोई बच्चा या व्यक्ति प्रत्यक्षत: प्रतिभागिता नहीं
करता है किन्तु घटना का प्रभाव उसके जीवन-विधि पर अवश्य पड़ता है । पिता का कार्यालय
दूर हो जाने पर पिता तो चिन्तित होते ही हैं लेकिन बच्चों या आश्रितों के कार्यक्रम एवं सुविधा
में परिवर्तन से नहीं बच पाते हैं। वे भी तनाव एवं चिन्ता महसूस करते हैं। साथी, खेलकूद,
पठन-पाठन, पुस्तकालय, बाजार की आवश्यकता एवं उपयोगिता जीवन-विधि पर बुरा प्रभाव
छोड़ने लगता है।
वृहत मंडल-यह सांस्कृतिक व्यवहार की ओर ध्यान ले जाता है । इसके अनुसार हमारे
आचरण पर परिवेश का सीधा प्रभाव पड़ता है । अहिंसक, सत्यवादी, आदर्श छात्र, कार्यकुशल
सभी कुछ बनना परिवेश से प्राप्त अनुभव का ही प्रतिफल होता है।
घटना मंडल-किसी आकस्मिक घटना कारण हमारे विकास की गति किस प्रकार
प्रभावित होती है, इसका सही अध्ययन इसी संदर्भ में संभव है। जैसे, माता-पिता के तलाक, पिता
का नौकरी से निलम्बन, घर में चोरी हो जाना, आर्थिक क्षति पहुँचना आदि हमारे विकास क्रम
में अवरोध बनकर आते हैं।
सारांशतः यह माना जाता है कि किसी व्यक्ति के विकास क्रम पर परिवेश का धनात्मक
तथा ऋणात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं । परिवेश से प्राप्त अनुभवों, साधनों (खिलौना,
 गेन्द), संस्थाओं (विद्यालय, चिड़ियाघर, पुस्तकालय) में से प्रत्येक का प्रभाव हमारे विकास पथ
पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। कुछ अनुभव हमें उत्साहित कर धनात्मक विकास की स्थिति में ला
देता है तो कुछ विषय परिस्थिति में उत्पन्न कर असुविधाजनक दशा में पहुँचाकर विकासात्मक
अवरोध जैसा काम करते हैं। फलतः सीखने-पढ़ने-बढ़ने में कई कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
महान मनोवैज्ञानिक दुर्गानंद सिन्हा (1977) ने भी विकास के क्रम में परिवेश को ही
महत्त्वपूर्ण कारक माना है । उनके द्वारा एक पारिस्थितिक मॉडल प्रस्तुत किया गया था जिसके
आधार पर ‘ऊपरी एवं अधिक दृश्य परत’ तथा आसपास की परतें के रूप में दो परिवेशीय स्थिति
की कल्पना की गई थी। पहली दशा में ये निम्न स्थितियों का अध्ययन किया था-
(i) घर में रहने वाले लोगों की अत्यधिक संख्या से उत्पन्न कठिनाइयाँ (स्थान,खेल,
मनोरंजन आदि में उपलब्धता की कमी)
(ii) विद्यालय के पठन-पाठन संबंधी अनियमितता तथा गुणवत्ता में कमी ।
(iii) अवस्था के कारण व्यवहार में लाये गये अन्तर ।
दूसरी दशा में निम्न कारकों को विकास का आधार बतलाया गया है-
(i) भौगोलिक परिवेश (क्षेत्रफल, जनसंख्या, नदी, पहाड़)
(ii) जाति, वर्ग, धर्म, रुचि के कारण परिवेश के स्वभाव में उत्पन्न स्थिति ।
(iii) आवश्यक सुख-सुविधा के साधन (पीने का जल,खेल का मैदान, बिजली, सिनेमाघर)
दृश्य एवं आसपास की परत से सम्बद्ध कारक अच्छा-बुरा दाना प्रकार के कार्य करते हैं।
अतः परिवेश का प्रभाव व्यक्ति की प्रकृति पर भी निर्भर करता है। कोई व्यक्ति परिवेश को कितना
समझता है, परिवेश का उपयोग किस प्रकार करता है, इसपर भी विकास की गति आश्रित होती
है।
Q.6. विकसित हो रहे बच्चों में होने वाले संज्ञानात्मक परिवर्तन की विवेचना कीजिए।
Ans. विकसित हो रहे बच्चे संसार के संबंध में अपनी समझ की रचना सक्रिय रूप से
करते हैं। जान पियाजे के अनुसार बच्चे परिवेश से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर नए विचारों
को जन्म देते हैं। वे स्वयं परिवेश के प्रति अनुकूलित हो जाना चाहते हैं। उनकी समझ में लगातार
सुधार होता है । संज्ञानात्मक विकास की विभिन्न अवस्थाओं को पियाजे द्वारा प्रतिपादित निम्न
तालिका से विचारों की श्रृंखला का ज्ञान हो जाता है ।
                                                                तालिका
                                पियाजे द्वारा प्रतिपादित संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ
अवस्था                         सन्निकट आय                                               विशेषताएँ
संवेदी-प्रेरक 1                    0-2 वर्ष                 शिशु संवेदी अनुभवों का शारीरिक क्रियाओं के साथ
                                                                      समन्वय करते हुए संसार के अन्वेषण करता है।
पूर्व-संक्रियात्मक                 2-7 वर्ष                 प्रतीकात्मक विचार विकसित होते हैं; वस्तु स्थायित्व
                                                                      उत्पन्न होता है; बच्चा वस्तु के विभिन्न भौतिक
                                                                       गुणों को समन्वित नहीं कर पाता है ।
मूर्त सक्रियात्मक                 17-11 वर्ष              बच्चा मूर्त घटनाओं के संबंध में युक्तिसंगत तर्क ना
                                                                       कर सकता है और वस्तुओं को विभिन्न समूहों में|
                                                                       वर्गीकृत कर सकता है । वस्तुओं की मानस प्रतिमाओं
                                                                       पर प्रतिवर्तनीय मानसिक संक्रियाएँ करने में सक्षम
                                                                       होता है।
औपचारिक सक्रियात्मक        11-15 वर्ष            किशोर तर्क का अनुप्रयोग अधिक अमूर्त रूप से
                                                                       कर सकते हैं; परिकल्पनात्मक चिंतन विकसित होते
प्रस्तुत तालिका से स्पष्ट हो जाता है कि बच्चों के सोचने का तरीका अलग होता है। दो
वर्ष की अवस्था पाने तक कोई बच्चा देखने, सुनने, मुँह चलाने, वस्तुओं को पकड़ने जैसे कार्य
में स्वयं को सक्षम मानते हैं तथा क्रियां-अनुक्रिया द्वारा अपनी चतुराई सिद्ध करने का प्रयास करते
हैं। नवजात शिशु अपने वर्तमान में जाकर भूत-भविष्य की कल्पना तक नहीं कर पाता है। उसके
द्वारा प्राप्त अनुभव एवं प्रतिक्रिया उसके दृष्टि क्षेत्र और मन को अप्रभावित रखता है। किन्तु बच्चे
तात्कालिक संवेदी अनुभवों से मुक्त नहीं रह पाते हैं। उनमें वस्तु स्थापित नामक चेतना का उदय
हो जाता है । आठ माह तक बच्चा छिपाई गई चीजों को पाने का प्रयास करने लगता है। बच्चे
मानसिक प्रतीकों का उपयोग करना सीखने लगते हैं । ये शारीरिक कार्यों को मानसिक रूप से
पूरा करने की कोशिश करने लगते हैं। पूर्व बाल्यावस्था में संज्ञानात्मक विकास पियाजे के
पूर्व-सक्रियात्मक विचार की अवस्था पर ध्यान केन्द्रित करता है।
                                                                     तालिका
                                         स्थूल एवं सूक्ष्म पेशीय कौशलों में प्रमुख उपलब्धियाँ
आयु वर्ष में                   स्थूल पेशीय कौशल                          सूक्ष्म पेशीय कौशल
12 वर्ष                         उछलना, कूदना, दौड़ना            ब्लॉक बनाना, तर्जनी एवं अंँगूठे की सहायता
                                                                                  से वस्तुओं को उठाना
4 वर्ष                          प्रत्येक पादान पर एक-              चित्रात्मक पहेलिया को भली-भाँति जोड़ना
                                  एक पैर रखते हुए सीढ़ियों
                                   पर चढ़ना एवं उतरना
 5 वर्ष                     तेज दौड़ना, दौड प्रतिस्पर्धा का           हाथ, भुजा एवं शरीर ये सभी आँख की गति
                                       आनंद लेना                                         के साथ समन्वित होते हैं
परिणामतः बच्चे किसी वस्तु को प्रत्यक्षतः नहीं देख पाने की स्थिति में उसे मानसिक रूप
से निरूपित लेते हैं । वे सोची गई वस्तुओं को चित्र या आकृति प्रदान करके उसमें संलग्न रहने
की स्थिति में स्वयं को पहुँचा देता है। पूर्ण संक्रियात्मक विचार की एक प्रमुख विशेषता के रूप
में अहं केन्द्रवाद का जन्म हो जाता है जिसके कारण बच्चे जीववाद में लिप्त हो जाते हैं । वे
निर्जीव वस्तुओं के साथ सजीवों के साथ किये गये व्यवहार को थोपना चाहता है । किवाड़ से
चोट लगने के कारण रोने वाले बच्चे किवाड़ को पीटने पर रोना बन्द कर देते हैं ।
आयु के बढ़ने के साथ-साथ उनमें जिज्ञासा की प्रवृत्ति भी बढ़ने लगती है । वे अपने परिवेश
की प्रत्येक घटना (वर्षा होना, वृक्ष का बढ़ना, आकाश का नीला रंग) के संबंध में कारण और
परिणाम समझ लेना चाहता है । पियाजे के विचार से बच्चों की इस जिज्ञासु अवस्था को अन्तः
प्रज्ञात्मक विचार के रूप में मान्यता मिली है। बच्चों के विचार के संबंध में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति
का स्थान भी महत्त्वपूर्ण है। बच्चे आकार को ज्यादा महत्त्व देते । उसे मात्रा का ज्ञान बहुत
कम होता है । चौड़े ग्लास और लम्बे पतले गिलास में अन्तर बतलाना बच्चों के सामर्थ्य के बाहर
की बात है । जब बच्चे की उम्र 7-11के करीब पहुँचता है तो अंतर्बोधक विचार बदलकर तार्किक
विचार के रूप में प्रकट हो जाता है। उसे मूर्त संक्रिया का विचार कहा जाता है जो प्रतिक्रमणीय
मानसिक क्रिया का एक विशिष्ट रूप से है । इस अवस्था में बच्चों के अहंकेन्द्रवाद में कमी आने
लगती है । फलतः चिंतन अधिक लचीला हो जाता है । बच्चे किसी वस्तु के संबंध में अधिकाधिक
जानकारी पाना चाहता है । वह भौगोलिक तथा गणितीय समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास
करने लगता है।
बच्चों की बढ़ती हुई संज्ञानात्मक योग्यताएँ भाषा अर्जन के लिए सुगम स्थिति उत्पन्न करती
है। बच्चे अपने अनुभव एवं ज्ञान को बोलकर बतलाने का प्रयास करने लगता है।
इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि बच्चे अपने परिवेश के प्रति जागरूक होकर ज्ञान अर्जन
करता है । विचार, केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति, अंतर्बोधक विचार, तार्किक विचार, मूर्त से क्रियात्मक
विचार, प्रतिक्रमणीय मानसिक क्रियाएँ, वस्तु स्थायित्व वाचिक संप्रेषण के साथ-साथ चिंतन जैसे
प्रमुख तत्वों के प्रति सतर्क व्यवहार करने लगता है।
Q.7. ‘बचपन में विकसित हुए आसक्तिपूर्ण बंधनों का दूरगामी प्रभाव होता है।’
दिन-प्रतिदिन के जीवन के उदाहरणों से इनकी व्याख्या कीजिए।
Ans. आसक्ति (attachment) का सामान्य अर्थ किसी सजीव (माता-पिता, मित्र) अथवा
निर्जीव (खिलौना, गेन्द, पोशाक, गाड़ी) के प्रति उत्पन्न लगाव समझा जाता है । आसक्ति एक
विशिष्ट प्रकार का सामाजिक-संवेगात्मक विकास के अन्तर्गत उत्पन्न संवेदनात्मक संबंध है ।
शिशु एवं उनके माता-पिता के बीच स्नेह का जो सांवेगिक बंधन विकसित होता है, उसे आसक्ति
कहते हैं । उत्पन्न आसक्ति का प्रत्यक्ष प्रभाव तब देखा जा सकता है जब कोई बच्चा अपने
पालनकर्ता के घनिष्ठ संबंधियों को देखते ही मुस्कराकर उनसे लिपटने के लिए हाथ-पैर चलाने
पालता है । डरकर चौंकना, रोना या पीड़ा की अभिव्यक्ति आदि आसक्ति के अभाव का प्रमाण
होता है।
आसक्ति उत्पन्न होने में प्यार-दुलार, सहानुभूति, प्रशंसा, प्रोत्साहन के साथ-साथ आभार
प्रदान करना जैसी प्रक्रियाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
आसक्ति उत्पन्न होने पर सम्पर्क सुख नामक लक्षण प्रकट होता है। बच्चे को अपने खिलौनों
के प्रति आसक्त होते हम सबों ने देखा-समझा है। बच्चों को सख-संतोष एवं भयमुक्त वातावरण
देने वाले के प्रति आसक्त हो जाना स्वाभाविक बात है’ एरिक एरिक्सन नामक मनोवैज्ञानिक के
मतानुसार आसक्ति के विकास के लिए जीवन का प्रथम वर्ष सबसे उपयुक्त समय होता है। इस
उम्र में बच्चे प्यार-दुलार के संकेतों का उपयुक्त प्रत्योत्तर देते हैं। सरक्षा और विश्वास के आधार
पर सुख का अनुभूति प्रकट होती है जो आसक्ति उत्पन्न करने का प्रमुख कारक माना जाता है।
आसक्ति के लक्षण का निर्धारण सम्पर्क के व्यक्ति (माता-पिता) के ज्ञान और संवेदनशीलता
के कारण बदल जाते हैं । सतर्क माता-पिता की देखरेख और निर्देशन में बच्चे में अच्छे संस्कार
को पाकर स्वाभिमान और सक्षमता का बोध उत्पन्न होता है तथा इसके विपरीत असंवेदनशील
अज्ञानी माता-पिता के कारण बच्चे में आत्मसंदेह की भावना जग जाती है। बच्चों के भविष्य
के लिए आवश्यक आत्मबोध का जन्म सम्पर्क के व्यक्तियों पर आधारित होता है । अत: बच्चे
के स्वस्थ विकास के लिए संवदेनाशील एवं स्नेहिल प्रौढ़ों के साथ घनिष्ठ अंतः क्रियात्मक संबंध
का होना अति आवश्यक होता है।
बचपन में उदय होने वाले भावनाओं में से स्व, लिंग तथा नैतिक विकास से संबंधित भावना
को प्रमुख रूप से प्रभावकारी माना जाता है । बच्चे को आत्म सम्मान तथा स्वयं की क्षमता पर
गौरव महसूस करना सिखलाया जाता है । उसे ऐसे कामों से बचाकर रखा जाता है जिससे भय,
आत्मग्लानि, हीनता के भाव उत्पन्न होते हैं । उदाहरणार्थ, बच्चों को साथी या खेल चुनने में मात्र
परामर्श दिया जाना चाहिए । अभिभावक हो या अध्यापक सभी को बच्चे के लक्षण और
क्रियाकलाप पर दूर से ही निरीक्षण करते रहना चाहिए । माता-पिता को धार्मिक अनुष्ठान में भाग
लेते हुए देखकर बच्चा भजन प्रेमी हो जाता है । विद्यालय में संचालित समारोहों से बच्चे
समाज-सेवक बनकर उपयोगी कार्य करने की प्रेरणा पाते हैं । प्रतियोगिता, आदर्श तथा जनन
संबंधी उचित शिक्षा के माध्यम से किसी भी बच्चे का चरित्र निर्माण किया जा सकता है जो
भविष्य में उसे प्रभावशाली नागरिक बनाने में सहयोग करता है।
विद्वान एरिक्सन ने भी माना है कि बच्चों को स्वप्रेरित क्रियाओं के प्रति माता-पिता जिस
प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं वही पहला शक्ति बोध अथवा अपराध बोध को विकसित करता है।
अतः आसक्ति से जुड़े व्यक्तियों अथवा साधनों से सुप्रभाव द्वारा अच्छे भविष्य का निर्माण
किया जा सकता है जिसके लिए संवेदनशीलता, व्यवहार, कुशल, दक्ष एवं निपुण व्यक्तियों के
सहयोग एवं निर्देशन की आवश्यकता होती है । अर्थात् यह सत्य है कि बचपन में विकसित हुए
आसक्तिपूर्ण बंधनों का दूरगामी प्रभाव होता है ।
Q.8. किशोरावस्था क्या है ? अहं केन्द्रवाद के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए।
Ans. किशोरावस्था-मानव जीवन विभिन्न अस्थायी अवस्थाओं से होते हुए वृद्धावस्था को
पाता है। जब कोई बच्चा 12 वर्ष की उम्र पार कर जाता है तो किशोरावस्था प्रारम्भ हो जाता
है। किशोरावस्था किसी व्यक्ति के जीवन में बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था के मध्य का संक्रमण
काल है । इस अवस्था में व्यक्ति को ‘परिपक्व रूप में विकसित’ माना जाता है जिसका प्रारम्भ
यौवनारंभ कहलाता है तथा व्यक्ति को यौन परिपक्वता वाला मान लिया जाता है। किशोरावस्था
का मुख्य लक्षण या विशेषताएँ निम्नलिखित होते हैं-
(i) किशोरावस्था में प्रजनन करने की क्षमता प्राप्त कर ली जाती है।
(ii) किशोरावस्था को जैविक तथा मानसिक दोनों ही रूप से तीव्र परिवर्तन की अवधि मानी
जाती है।
(iii) क्रमिक प्रक्रिया के अंग माने जाने वाले यौवनारंभ की अवस्था में स्रावित होनेवाले
हार्मोन के कारण मूल एवं गौण लैंगिक लक्षण विकसित होते हैं।
(iv) त्वरित संवृद्धि, चेहरों पर बालों का उगना तथा स्वर में भारीपन का आभास होना
किशोरावस्था में पहुँचे हुए बालकों के साथ मिलता है।
(v) लड़कियों की ऊँचाई में तीव्र संवृद्धि, मासिक धर्म प्रारम्भ, शारीरिक संरचना में विकास
आदि लक्षण देखे जाते हैं।
(vi) किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक विकास के साथ मानसिक परिवर्तन भी होते हैं।
(vii) किशोर यौन संबंधी मामलों में अधिक रुचि का प्रदर्शन करते हैं।
(viii) अपने शारीरिक-स्व अथवा शारीरिक परिपक्वता को स्वीकार करना किशोरावस्था
का विकासात्मक कार्य है।
(ix) किशोर के विचार अधिक अमूर्त, तर्कपूर्ण एवं आदर्शवादी होते हैं ।
(x) किशोर अमूर्त रूप से चिंतन एवं तर्कना प्रारम्भ कर देते हैं।
(xi) उन्हें चिंतन की परिकल्पनात्मक निगमनात्मक तर्कना आदि पर विश्वास हो जाता है तथा
नैतिक तर्कना पर बल देने लगते हैं।
(xii) किशोरों का नैतिक चिंतन लचीला होता है।
(xiii) डेविड एलकाइड के अनुसार काल्पनिक श्रोता एवं व्यक्तिगत दंतकथा किशोरों के अहं
केन्द्रवाद के दो घटक हैं।
(xiv) किशोर अपने माता-पिता से अलग पहचान बनाना चाहते हैं।
(xv) किशोरों में उत्पन्न पहचान-भ्रम नकारात्मक परिणाम वाले होते हैं।
(xvi) आत्मविश्वास और असुरक्षा की भावना के बीच शीघ्रता से परिवर्तित होते रहना
किशोरावस्था की एक विशिष्टता है।
(xvii) किशोरावस्था पाकर व्यक्ति उपचार, मादक द्रव्यों का दुरुपयोग तथा आहार ग्रहण
करने संबंधी विकारों को प्रमुख चुनौतियाँ मानते हैं ।
(xviii) किशोरवस्था में व्यक्ति सस्ते मनोरंजन को पसन्द करने लग जाते हैं।
(xix) किशोरावस्था में अहम्, क्रोध, बल-प्रयोग जैसे कई अवगुण विकास को अनियमित
कर देते हैं।
अहं केन्द्रवाद के संप्रत्यय-अंह केन्द्रवाद को पूर्व-संक्रियात्मक विचार की एक प्रमुख
विशेषता के रूप में पहचाना जाता है । इस विशेषता के कारण बच्चे दुनिया को केवल अपने
दृष्टिकोण से देखते हैं । ये दूसरों के विचार, परामर्श क्षमता को उद्देश्यहीन मानकर ठुकरा देते
हैं । किशोर भी एक विशिष्ट प्रकार के अहं केन्द्रवाद विकसित करते हैं जिसके दो प्रमुख घटक
(i) काल्पनिक श्रोता तथा
(ii) व्यक्तिगत दंतकथा होते हैं । काल्पनिक श्रोता किशोरों का एक विश्वास है कि दूसरे
लोग उनसे काफी आकर्षित हैं तथा उनका निरीक्षण कर स्वयं को बहलाना चाहते हैं । जैसे कुछ
लड़के अपने शर्ट के धब्बे से तथा कुछ लड़कियाँ मुँहासे से काफी चिन्तित रहते हैं, क्योंकि उन्हें
लगता है कि लोग क्या कहेंगे जो किशोर को आत्म सचेत बना देता है। व्यक्तिगत दंतकथा किशोरों
की अहं केन्द्रवाद का एक प्रमुख भाग है जिसमें किशोर स्वयं को अद्वितीय समझता है तथा दूसरे
को नासमझ, अज्ञानी, स्वार्थी, पिछड़ा हुआ तथा संकुचित विचार वाला व्यक्ति मानने की भूल करता
है । अपनी अच्छाई और विशिष्टता को सही प्रमाणित करने के लिए वह तरह-तरह की काल्पनिक
घटनाओं की चर्चा करके अपना प्रभाव जमाना चाहता है।
यही कारण है कि अब किशोरों को माता-पिता से यह कहते सुनना आम बात हो गई है।
कि आप मुझे समझ नहीं पाते हैं, हमारी क्षमता आपसे कई गुना अधिक है।
इस आधार पर माना जा सकता है कि अहं केन्द्रवाद किसी किशोर को अच्छाई की ओर
ले जाने वाला प्रेरक बल हो सकता है लेकिन इसके कुप्रभाव से बचे रहने की बहुत जरूरत
Q.9. किशोरावस्था में पहचान निर्माण को प्रभावित करने वाले कौन-कौन-से कारक
हैं । उदाहरण की सहायता से अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए ।
Ans. अपने माता-पिता से अलग अपनी पहचान बनाने की प्रवृत्ति प्राय: सभी किशोरों में
पाई जाती है। किशोरावस्था में विलग्नता या अनासक्ति के द्वारा एक किशोर अपने व्यक्तिमत
विश्वासों को पूरे समाज पर थोपकर सर्वमान्य बन जाने का प्रयास करता है। पहचान-युक्त नामक
विसंगति या द्वन्द्व के बावजूद वह पीछे रहने को तैयार नहीं होता है । किशोर नहीं चाहता है कि
कोई उसे असमर्थ या अक्षम माने या उसे सदैव बच्चा ही समझा जाए । इसी समझ से ऊबकर
वह अपनी अलग पहचान बनाने को तत्पर रहता है।
किशोरावस्था में पहचान का निर्माण अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव के कारण संभव होता
है । इस काम में उसे सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, पारिवारिक जटिलता, सामाजिक मूल्य, सजातीय
पृष्ठभूमि तथा सामाजिक-आर्थिक स्तर के माध्यम से किया जाने वाला प्रभावी प्रयास है । इसके
अतिरिक्त व्यावसायिक प्रतिबद्धता भी पहचान बनाने के लिए किशोरों को प्रेरित करता है । एक
किशोर जनसेवा में अपना बहुमूल्य समझ दे पाने के लिए माता-पिता से अलग पहचान बनाना
चाहता है । परिवार में व्यवस्था या साधनों के चलते उठने वाले विवादों से मुक्ति पाने के लिए
किशोर अपनी पहचान बनाने के लिए उत्सुक हो जाता है । बार-बार अच्छे साथियों से तुलना
करने के क्रम में उदासीनता प्रकट करने लगता है । जीविकोपार्जन के लिए जब किशोर घर से
बाहर जाता है तो सहकर्मी का व्यवहार परिवार के सदस्यों के व्यवहार से अधिक प्रिय प्रतीत होता
है । अपने ज्ञान और कौशल का स्वतंत्रतापूवर्क प्रदर्शन करने के लिए लोभ में वह अपनी पहचान
कायम करना चाहता है।
कभी-कभी समकक्षियों के साथ अन्तः क्रिया उन्हें अपने पारिवारिक संबंध कम करने को
बाध्य कर देते हैं । माता-पिता के साथ संघर्षपूर्ण परिस्थितियों के कारण किशोर अपने समकक्षियों
से सहायता लेने को बाध्य हो जाता है । बड़े होकर भविष्य में कोई किशोर क्या बनेगा ? कहाँ
और कैसे रहेगा? जैसे प्रश्न किशोरों में व्यावसायिक प्रतिबद्धता की भावना जग जाती है। वह
भविष्य की योजना को स्वयं अपने अनुकूल निर्धारित करना चाहता है । एक किशोर जब
माता-पिता तथा समकक्षियों के प्रति भरोसा खोने लगता है तो उसके पास अलग पहचान के निर्माण
के सिवा कोई अलग विकल्प नहीं बचता है । किशोरों में उत्पन्न होने वाली मृगतृष्णा को रोकने
के लिए अभिभावकों को मित्रवत आचरण करते हुए उसकी समस्या को समझना चाहिए तथा
समस्या समाधान में अधिक-से-अधिक सहयोग करना चाहिए ।
Q. 10. प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करने पर व्यक्तियों को कौन-कौन-सी चुनौतियों का
सामना करना पड़ता है ?                                                [B.M.2009A]
Ans. कोई व्यक्ति जब 21 वर्ष से अधिक उम्र वाला हो जाता है तो उसे प्रौढ़ मान लिया
जाता है । प्रौढ़ावस्था प्राप्त व्यक्ति को अधिकतम सामर्थ्य वाला सम्पूर्ण मानव मानकर उससे अनेक
प्रकार की आकांक्षाओं को पूरा करने की आशा जग जाती है । प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करने पर
व्यक्तियों को तरह-तरह की निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है-
(i) एक नया अनुभव-प्रौढावस्था में प्रवेश करने पर व्यक्तियों को सामाजिक, सांस्कृतिक,
शारीरिक, मानसिक परिवर्तनों के लिए नया अनुभव मिलता है । परिवर्तन संबंधी नये अनुभव के
क्रम में अपने आपको संतुलन की अवस्था में रख पाना एक गंभीर चुनौती है।
(ii) दायित्व-किसी प्रौढ़ व्यक्ति को परिवार और समाज के प्रति कई आवश्यक दायित्वों
के निर्वहन के बोझ को ढोना पड़ता है ।
(iii) परिपक्व और स्वावलम्बी-समाज में सम्मानजनक स्थान पाने के लिए प्रौढ़ में
परिपक्व और स्वावलम्बी की भूमिका अदा करना होता है ।
(iv) अध्ययन और नौकरी साथ-साथ-समाज और परिवार की आवश्यकताओं तथा
आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रौढ़ को अध्ययन और नौकरी साथ-साथ करने की नौबत आ जाती
है।
(v) महत्त्वपूर्ण घटनाओं से संस्कृति में बदलाव-विवाह, नौकरी तथा बच्चों को जन्म देना
ऐसी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं जो संस्कृति से स्वरूप में भिन्नता ला देते हैं। संस्कृति के बदल जाने
पर भी विकास-क्रम को पूर्ववत गतिमान रखना प्रौढ़ों के लिए कठिन चुनौती है।
(vi) दो मुख्य कार्यों का सम्पादन-प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था के दो मुख्य कार्य होते हैं-
(क) प्रौढ़ जीवन की संभावना को तलाशना तथा
(ख) स्थायी जीवन की संरचना का विकास करना ।
शिक्षा, पेशा एवं व्यवहार के द्वारा प्रौढ़ इन दोनों कार्यों को पूरा करने को बाध्य रहता है।
(vii) निर्भरता से स्वंतत्रता की ओर-प्रौढ़ावस्था के पूर्व व्यक्ति आश्रित बनकर माता-पिता
पर निर्भर रहता है । किन्तु प्रौढावस्था में वही व्यक्ति विवाह बंधन में बंधकर पिता बन जाता है
और निर्भरता को छोड़कर स्वतंत्र जीवन जीने को बाध्य हो जाता है ।
(viii) जीविका एवं कार्य-परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
प्रौढ़ को किसी-न-किसी व्यवसाय का चयन करना होता है तथा कठोर श्रम करके निर्धारित कार्य
को पूरा करके संसाधन जुटाना होता है । इसमें उसे अपनी दक्षता और निष्पादन को सिद्ध करने
के लिए प्रत्याशाओं के प्रति समायोजन स्थापित करना पड़ता है। जीविका विकसित करके उसका
सही मूल्यांकण करना प्रौढ़ व्यक्ति के लिए वांछनीय हो जाता है।
(ix) विवाह, मातृ-पितृत्व एवं परिवार-किसी दूसरे परिवेश में पली-बढ़ी कन्या से
विवाह करके कोई प्रौढ़ व्यक्ति भिन्न संस्कार अथवा संस्कृति के अनुकूल बनकर सुखमय जीवन
जोने का प्रयास करता है। पति-पत्नी में स्पष्ट समझ एवं सहयोग की भावना को बनाये रखना
प्रौढ़ के लिए एक चुनौती होती है । पिता बन जाने के बाद किसी प्रौढ़ को बच्चों की संख्या,
सामाजिक आलम्बन की उपलब्धता तथा विवाहित युगल की प्रसन्नता को ध्यान में रखते हुए
जीवन-क्रम को आगे बढ़ाना पड़ता है।
(x) तलाक-तलाक अथवा मृत्यु के कारण कभी-कभी प्रौढ़ों को एकाकी जीवन जीने के
लिए बाध्य होना पड़ता है । संरक्षण और देख-रेख सम्बन्धी आवश्यकता प्रौढ़ को परेशान करने
लगती है जिससे समाधान का रास्ता पाना एक चुनौती भरा काम है ।
(xi) शारीरिक परिवर्तन-कभी-कभी दृष्टिकोण या विकलांगता या आकस्मित रोग प्रोढ़
को संकट में डाल सकता है । कुछ कामों में निपुणता का अभाव, स्मृति में कमी आदि संकट
बनकर प्रौढ़ की क्षमता को ललकारने लगते हैं।
अत: उम्र अथवा अवस्था बदलने से वैयक्तिक भिन्नता बढ़ जाती है। स्वभाव, साधन,
तकनीकी ज्ञान आदि में आने वाले अन्तर गंभीर चुनौतियों के रूप में प्रौढ़ों को सक्षम प्रमाणित करने
के लिए बाध्य करने लगते हैं क्योंकि सभी प्रौढ़ प्रज्ञानी नहीं होते हैं । अर्थात् प्रौढ़ावस्था में प्रवेश
पाना गंभीर चुनौतियों का सामना करना स्वाभाविक दशा है ।
                                           अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
                                                            वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
                                   (OBJECTIVE ANSWER TYPE QUESTIONS)
1. मानव का सर्वाधिक विकास किस अवस्था में होता है ?           [B.M.2009A]
(a) गर्भावस्था में
(b) शैशवावस्था
(c) जन्म के बाद
(d) बाल्यावस्था में                                    (उत्तर-A)
2. बच्चों का पूर्व पाठशालीय अवस्था को कब से कबतक मानी जाती है ?    [B.M.2009 A]
(a) दो वर्ष से पांच वर्ष,
(b) तीन से छ: वर्ष
(c) चार से सात वर्ष
(d) पांच से आठ वर्ष                                 (उत्तर-B)
                                             अति लघु उत्तरीय प्रश्न
                  (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)
Q. 1. क्या शरीर की लम्बाई, वजन तथा मोटापा में वृद्धि को ही विकास माना
जाता है ?
Ans. नहीं, विकास का वास्तविक अर्थ शारीरिक विकास के साथ मानसिक तथा सांस्कृतिक
परिवर्तनों पर भी निर्भर करता है ।
Q.2. विकास से संबंधित दो प्रमुख मान्यताओं का उल्लेख करें ।
Ans. (i) विकास जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है।
(ii) विकास अत्यधिक लचीला अथवा संशोधन योग्य होता है ।
Q.3. संवृद्धि क्या है ? दो उदाहरण दें।
Ans. शारीरिक अंगों की माप में होनेवाली वृद्धि संवृद्धि कहलाती है । जैसे-
(i) शरीर की ऊँचाई (कद) का बढ़ना
(ii) शरीर के वजन में वृद्धि ।
Q.4. प्राकृतिक चयन क्या है ? यह किसे लाभ पहुँचाती है ?
Ans. प्राकृतिक चयन एक विकासवादी प्रक्रिया है । यह उन व्यक्तियों या प्रजातियों को
लाभ पहुँचाता है जो अपनी जीवन रक्षा तथा प्रजनन करने के लिए सर्वश्रेष्ठ रूप से अनुकूलित
होते हैं।
Q.5. यूरी ब्रानफेन बेनर का व्यक्ति के विकास के संबंध में क्या दृष्टिकोण है ?
Ans. विकास का परिस्थितिपरक दृष्किोण के अनुसार विकास में परिवेशीय कारकों की
भूमिका महत्त्वपूर्ण है।
Q.6. विकास का परिस्थितिपरक दृष्टिकोण का निरूपण का निरूपण किन-किन
खण्डों में किया गया है ?
Ans. (i) लघु मंडल
(ii) मध्य मंडल
(iii) बाह्य मंडल
(iv) वृहत् मण्डल और
(v) घटना मंडल ।
Q.7.विकास के अध्ययन की दो विधियों के नाम बतायें ।
Ans. बच्चों के विकास संबंधी अध्ययन करने के लिये दो विधियों का उपयोग किया जाता
है जिनके नाम इस प्रकार हैं-
(i) बड़े समूह का मापन
(ii) पुनः परीक्षण ।
Q.8. संवेदी विकास से क्या तात्पर्य है ?
Ans. संवेदी विकास से तात्पर्य वैसे विकास से होता है जिसमें नवजात शिशु के ज्ञानेन्द्रियों
का इतना विकास हो जाता है कि वह अपने वातावरण की चीजों की सही-सही प्रत्यक्षीकरण कर
सके।
Q.9. संवेदी विकास पर किन कारकों का प्रभाव पड़ता है ?
Ans. बच्चों के संवेदी विकास पर पारिवारिक वातावरण, यौन, बुद्धि आदि कारकों का
प्रभाव पड़ता है।
Q. 10. संवेदी विकास के मुख्य प्रकार कौन-कौन है ?
Ans. संवेदी विकास पाँच प्रकार के होते हैं-दृष्टि संवेदना, श्रवण संवेदना, प्राण संवेदना,
स्वाद संवेदना एवं त्वक् संवेदना ।
Q. 11. क्रियात्मक विकास की क्या विशेषताएँ हैं ?
Ans. क्रियात्मक विकास परिपक्वता पर निर्भर होता है, तंत्रिका विकास,वैयक्तिक भिन्नता
मस्तकाधोमुखी क्रम, निकट दूर का क्रम आदि क्रियात्मक विकास की विशेषताएंँ हैं।
Q.12. बच्चों में क्रियात्मक विकास का क्रम क्या होता है ?
Ans. बच्चों के क्रियात्मक विकास के क्रम में सिर के भाग में क्रियात्मक विकास, धड़
के क्षेत्र में क्रियात्मक विकास, बाँह और हाथ में क्रियात्मक विकास तथा पैरों एवं अंगुलियों में
क्रियात्मक विकास आदि आते हैं।
Q. 13. क्रियात्मक विकास से क्या तात्पर्य है ?
Ans. क्रियात्मक विकास वैसे विकास को कहा जाता है जिसके सहारे बच्चे अपने
मांसपेशियों एवं तत्रिकाओं को समन्वित करके अपने शरीर के अंगों द्वारा किये जाने वाले गतियों
पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करते हैं।
Q. 14. क्रियात्मक विकास पर किन कारकों का प्रभाव पड़ता है ?
Ans. बच्चों के क्रियात्मक विकास पर शारीरिक गठन, बौद्धिक स्तर, माता-पिता द्वारा
प्रोत्साहन, जन्म-क्रम, यौन आदि कारकों का प्रभाव पड़ता है।
Q. 15. क्रियात्मक विकास का पैटर्न क्या है ?
Ans. बच्चों में क्रियात्मक विकास का क्रम दो प्रकार होता है-मस्तकाधोमुखी विकास क्रम
तथा निकट-दूरस्थ विकास क्रम ।
Q. 16. मस्तकाधोमुखी विकास क्रम क्या है ?
Ans. मस्तकाधोमुखी विकास क्रम में पहले सिर तथा गर्दन के भाग में, फिर बाँह तथा हाथ
के हिस्सों में, फिर धड़ में और अन्त में पैर तथा उनकी उँगलियों में विकास होता है।
Q.17. सामाजिक विकास की विभिन्न अवस्थाएँ क्या हैं ?
Ans. सामाजिक विकास की अवस्थाओं में मौखिक अवस्था, गुदावस्था, अव्यक्तावस्था,
किशोरावस्था, वयस्कावस्था तथा वृद्धावस्था आदि मुख्य हैं ।
Q.18. विकास का क्या अर्थ है ?
Ans. विकास उन प्रगतिशील परिवर्तनों को कहते हैं जिनका प्रारम्भ नियमित एवं क्रमिक
रूप से होता है तथा परिपक्वता प्राप्ति की ओर निर्देशित रहता है ।
Q.19. विकासात्मक मनोविज्ञान की समुचित परिभाषा क्या है ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है, जिसमें गर्भाधान से मृत्यु तथा
मनुष्यों के विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन किया
जाता है।
Q.20. विकास की गति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
Ans. बच्चे को शारीरिक एवं मानसिक विकास उसके जीवन कोष की बनावट पर निर्भर
करता है जैसा जीवकोष (germ cell) होगा बच्चे का विकास भी वैसा ही होगा फिर भी बच्चों
की क्रियायें, भोजन, अभ्यास, शिक्षा इत्यादि का भी उसकी विकास गति पर काफी पड़ता है।
Q.21. बाल्यावस्था क्या है?
Ans. सामान्य रूप से जन्म से लेकर अपरिपक्वता तक की अवस्था को बाल्यावस्था कहा
जाता है अर्थात् 2 वर्ष से लेकर 11 वर्ष तक की अवस्था को ही बाल्यावस्था कहते हैं।
Q.22. वयस्कावस्था क्या है?
Ans. वयस्कावस्था 17-21 वर्ष तक के बीच होती है। इस अवस्था में बच्चे का विकास
पूर्ण हो जाता है । इस अवस्था को प्राप्त करने पर व्यक्ति समाज एवं कानून के दृष्टिकोण से
परिपक्व हो जाता है।
Q.23. विकास की प्रक्रिया कब से प्रारम्भ होती है ?
Ans. व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया गर्भाधान से प्रारंभ होती है।
Q.24. किशोरावस्था तक विकास की कौन-कौन अवस्थाएँ हैं ?
Ans. किशोरावस्था तक विकास की मुख्य अवस्थाएँ-पूर्व प्रसूतिकाल, शैशवावस्था,
बचपनावस्था, बाल्यावस्था, तरुणावस्था एवं किशोरावस्था है।
Q.25. पूर्व प्रसूतिकाल कब से कब तक होता है ?
Ans. गर्भधारण से प्रारम्भ होकर जन्म होने तक के काल को पूर्व प्रसूतिकाल कहा जाता है।
Q.26. शैशवावस्था में बच्चा कितने दिनों तक रहता है ?
Ans. जन्म से लेकर चौदह दिन तक बच्चा शैशवावस्था में रहता है।
Q.27. बचपनावस्था कब से कब तक रहती है?
Ans. बचपनावस्था चौदह दिनों के बाद से प्रारम्भ होकर दो वर्ष की उम्र तक रहता है।
Q.28. बाल्यावस्था किस उम्र से प्रारंभ होती है ?
Ans. बाल्यावस्था दो वर्ष की उम्र से ग्यारह वर्ष उम्र तक होती है।
Q.29. तरुणावस्था की अवधि क्या होती है ?
Ans. तरुणावस्था की अवधि ग्यारह से तेरह वर्ष की उम्र तक होती है।
Q.30. किशोरावस्था किस उम्र को कहते हैं ?
Ans. किशोरावस्था तेरह साल से उन्नीस-बीस साल तक की उम्र को कहते हैं ।
Q.31. शैशवावस्था से आप क्या समझते हैं ?
Ans. जन्म से लेकर 10-14 दिनों की अवस्था को ही शैशवावस्था कहा जाता है। इस
अवस्था के बच्चे को नवजात शिशु कहा जाता है ।
Q.32. किशोरावस्था से आप क्या समझते हैं ?
Ans. सामान्य बच्चों में तरुणावस्था की शुरुआत से लेकर परिपक्वावस्था को ही
किशोरावस्था कहा जाता है अर्थात् 11-13 वर्ष के बीच की उम्र से शुरू होकर 21 वर्ष तक की
अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है ।
Q.33. बुढ़ापा की अवस्था क्या है ?
Ans. जब व्यक्ति 50 वर्ष से ऊपर आयु का हो जाता है तो बुढ़ापा की अवस्था प्रारंभ हो
जाती है ! बुढ़ापा की अवस्था में व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक गति धीरे-धीरे कम होने
लगती है । वह शरीर से अस्वस्थ होने लगता है।
Q.34. शिशुओं के दृष्टि विकास कितनी उम्र में होती है ?
Ans. नवजात शिशु का दृष्टिपटल, दृष्टि-स्नायु, आँख के लेन्स को नियंत्रित करने वाली
मांसपेशियाँ जन्म के समय परिपक्व नहीं होती, परन्तु छ:-सात माह की उम्र में परिपक्व हो जाती
है और दृष्टि संवेदना विकसित हो जाती है ।
Q. 35. शिशुओं में बैठने की क्रिया कितनी उम्र में होती है ?
Ans. शिशु नौ महीने की उम्र में बिना सहारा के ही बैठना प्रारंभ कर देता है ।
Q.36. बच्चे कितनी उम्र से चलना प्रारंभ करते हैं ?
Ans. सामान्यत: बच्चे ग्यारह से पन्द्रह महीने की उम्र से चलना प्रारंभ कर देते हैं।
Q.37. विकासात्मक अवस्थाओं की भारतीय अवधारणा क्या है ?
Ans. भारतीय अवधारणा के अनुसार विकास की चार अवस्थाएँ हैं-ब्रह्मचर्य या शिक्षार्थी
अवस्था, गृहस्थ या पालक अवस्था, वाणप्रस्थ या प्रत्याहार की अवस्था तथा संन्यास या परित्याग
की अवस्था।
Q.38. बाल अपराध से क्या तात्पर्य है?
Ans. बाल अपराध से तात्पर्य किसी स्थान-विशेष के नियमों के अनुसार एक निश्चित उम्र
से कम के बच्चे या किशोर द्वारा किया जाने वाला अपराध है।
Q. 39. पुनः परीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं ?
Ans. पुनः परीक्षण एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा एक ही व्यक्ति या कई व्यक्तियों का
अध्ययन बार-बार कुछ-कुछ समय के बाद किया जाता है । यह पुनः परीक्षण हरेक दिन के बाद
या हर एक सप्ताह या हर एक महीने या हर एक साल के बाद किया जा सकता है।
Q.40. तलाक की अवस्था क्या है ?
Ans. जब पति-पत्नी के बीच मतभेद उत्पन्न हो जाता है और वे वैवाहिक संबंध-विच्छेद
कर लेते हैं और उनके बीच पति-पत्नी का सम्बन्ध समाप्त हो जाता है तो इस स्थिति को तलाक
कहा जाता है। पति-पत्नी कोई भी एक दूसरे से तलाक ले सकते हैं।
Q.41. विकासात्मक मनोविज्ञान की उपयोगिता किसके लिए है ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान की उपयोगिता बच्चों, बच्चों के माता-पिता, शिक्षक
बाल-सुधारकों, समाज एवं बाल न्यायालयों के लिए है।
Q.42. विकासात्मक मनोविज्ञान का क्षेत्र क्या है ?
Ans. प्रसव पूर्व विकास, नवजात शिशु, ज्ञानात्मक भाषा, शारीरिक, संवेदी क्रियात्मक,
संवेगात्मक एवं सामाजिक विकास आदि विकासात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र हैं ।
Q.43. विकासात्मक मनोविज्ञान में व्यक्ति का अध्ययन कब-से-कब तक किया
जाता है?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति का अध्ययन गर्भावस्था से लेकर मृत्यु
तक किया जाता है।
Q.44. एक सामान्य महिला में किस प्रकार का गुणसूत्र पाया जाता है ?
Ans. एक सामान्य महिला में x x का गुणसूत्र पाया जाता है ।
Q.45. आनुवंशिकता से क्या तात्पर्य है?
Ans. आनुवंशिकता से तात्पर्य एक प्रजाति में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विशेषताओं
को पहुँचाने की प्रक्रिया है।
Q.46. सामाजिक विकास से क्या तात्पर्य है ?
Ans. सामाजिक विकास से तात्पर्य सामाजिक प्रत्याशाओं के अनुरूप व्यवहार करने की
क्षमता से होती है।
Q.47. बच्चों के समाजीकरण पर किन कारकों का प्रभाव पड़ता है ?
Ans. बच्चों के सामाजीकरण पर उसके स्वास्थ्य, बुद्धि, शारीरिक बनावट, पारिवारिक
वातावरण, स्कूल आदि कारकों का प्रभाव पड़ता है ।
Q.48. बच्चों में होने वाले प्रारंभिक सामाजिक विकास के मुख्य प्रकार कौन हैं?
Ans. प्रारंभिक सामाजिक विकास के अन्तर्गत अनुकरण, सहयोग, मित्रता, सहानुभूति
प्रतिद्वन्द्विता आदि आते हैं।
Q.49. किसी घर में क्षमता से अधिक लोगों के रहने से क्या-क्या कठिनाइयाँ उत्पन्न
होती हैं?
Ans. प्रयुक्त किये जाने वाले साधनों (खिलौने,टी. वी.) के लिए छीना-झपटी होने लगता
है । पठन-पाठन एवं व्यवस्था संबंधी महाअभाव कष्ट देता है ।
Q.50. प्रमस्तिष्क की महत्त्वपूर्ण भूमिका क्या होती है ?
Ans. भाषा, प्रत्यक्षण एवं बुद्धि के संचालन में सक्रिय योगदान करता है ।
Q.51. शैशवावस्था में भी संवेदी योग्यताएँ होती हैं, इसका एक लक्षण बतावें ।
Ans. जन्म के कुछ घंटे बाद बच्चे अपनी माँ की आवाज को पहचान सकते हैं । मुँह की
आकृति बदलकर तथा हाथ-पैर हिलाकर वह अपनी खुशी को प्रकट करता है ।
Q.52. आसक्ति किसे कहते हैं ?
Ans. किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आंतरिक लगाव या स्नेह से उत्पन्न सांवेगिक बंधन
को आसक्ति कहते हैं।
Q.53. लिंग प्ररूपण कब उत्पन्न होता है ?
Ans. जब किसी समाज के महिला एवं पुरुष के लिए उचित व्यवहार के अनुरूप सूचनाओं
को कूट संकेतिक तथा संगठित करने के लिए तैयार समझा जाता है ।
Q.54. डेविड एलकाइड के अनुसार किशोरों के अहं केन्द्रवाद के दो मुख्य घटक
क्या हैं?
Ans. (क) काल्पनिक श्रोता तथा
(ख) व्यक्तिगत दंतकथा ।
Q.55. किशोरों की पहचान निर्माण का कारक ‘व्यावसायिक प्रतिबद्धता’ का आधार
कहलाने योग्य एक प्रश्न का उल्लेख करें ।
Ans. बड़े होकर आप क्या करेंगे?
Q.56. उपचार से संबंधित दो प्रमुख पद बतावें ।
Ans. (i) अपराध तथा (ii) कर्त्तव्य विमुखता ।
Q.57. मादक द्रव्यों का दुरुपयोग मनुष्य के किस अवस्था में अधिक पाया जाता है ?
Ans. किशोरावस्था का समय ।
Q.58. आहार ग्रहण संबंधी विकार का एक उदाहरण दें।
Ans. मनोग्रस्ति अवस्था भूखा रहकर शरीर को दुबला एवं आकर्षक बनाने का कठिन
प्रयास आहार संबंधी एक प्रचलित विकार है।
Q.59. पति-पत्नी की तलाक का प्रभाव पति पर किस प्रकार पड़ता है ?
Ans. पति अकेलापन महसूस करता है तथा बच्चों की देख-रेख तथा भोजन निर्माण संबंधी
समस्याओं में उलझ जाता है ।
Q.60. परम्परागत रूप से सेवा-निवृत्ति को व्यक्ति की किस अवस्था से जोड़ा जाता है ?
Ans. सेवा-निवृत्ति को वृद्धावस्था से जोड़ा जाता है ।
Q.61. विधवाओं तथा विधुरों में किसकी संख्या अधिक होती है ?
Ans. विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक होती है ।
Q.62. मेडागास्कर की टनाला संस्कृति में मृत्यु का कारण किसे माना जाता है ?
Ans. टनाला संस्कृति में मृत्यु का कारण प्राकृतिक शक्तियों को माना जाता है ।
Q.63. बच्चों में सामाजिक विभेदन की क्षमता किस उम्र में विकसित होती हैं ?
Ans. बच्चों में सामाजिक विभेदन की क्षमता 12-13 साल की उम्र में होती है।
Q.64. भारत में किस उम्र के व्यक्ति द्वारा अपराध करने पर उसे बाल अपराध के
अन्तर्गत रखा जाता है ?
Ans. भारत में 14 से 18 वर्ष की उम्र के लोगों द्वारा अपराध करने पर उसे बाल अपराध
के अन्तर्गत रखा जाता है ।
Q.65. बाल अपराध के मुख्य कारक क्या हैं ?
Ans. बाल अपराध के मुख्य कारकों में मनोवैज्ञानिक कारक, पारिवारिक कारक, सामाजिक
कारक तथा आर्थिक कारक आदि आते हैं।
                                                          लघु उत्तरीय प्रश्न
                                  (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)
Q.1. विकास से आप क्या समझते हैं ?
Ans. विकास का अर्थ (Meaning of Development)-विकास उन प्रगतिशील
परिवर्तनों को कहते हैं, जिनका प्रारम्भ नियमित एवं क्रमिक होता है तथा परिपक्वता-प्राप्ति की
ओर निर्देशत रहता है । ‘विकासात्मक क्रम’ (Development sequence) की हर अवस्था और
इसके बाद वाली अवस्था में एक निश्चित प्रकार का सम्बन्ध है। विकास एक ऐसे प्रकार के
‘परिवर्तन’ (types of change) हैं जिनके द्वारा बच्चों में नई ‘विशेषताओं’ (characteristics)
एवं ‘योग्यताओं’ (abilities) का समावेश हो जाता है । बच्चे के जीवन की प्रारम्भिक अवस्था
में उसके बाद के जीवन की अपेक्षा अधिक तेजी से परिवर्तन होता है, परन्तु सबसे अधिक तेजी
से परिवर्तन ‘जन्म के पूर्व की अवस्था’ (prenatal stage) में हो जाता है । इस अवस्था में
होनेवाले परिवर्तन, विकास के उन्हीं नियमों (principles of development) का अनुसरण करते
हैं, जिनका अनुसरण ‘जन्म के बाद होनेवाले विकास करते हैं । बच्चे में सामान्य विकास किस
तरह होते हैं, उसकी जानकारी से कई ‘लाभ’ (advantages) हैं-
(क) इससे इस बात का ज्ञान हो जाता है कि बच्चे का हर उम्र (all ages) में कितना
विकास होना चाहिए और बच्चे के विभिन्न प्रकार के व्यवहार कब शुरू होंगे और किस अवस्था
में परिपक्व (matured) हो जाएँगे;
(ख) चूँकि प्रत्येक बच्चे में समान प्रकार की विकास प्रणाली पाई जाती है, इसलिए यह
जानना आसान हो जाता है कि किस बच्चे का विकास सामान्य (normal) ढंग और किसका
असामान्य (abnormal) ढंग का हो रहा है;
(ग) उचित विकास के लिए इस ज्ञान के आधार पर बच्चों को समय-समय पर निर्देशित
(guided) किया जाना सम्भव हो जाता है।
Q.2. बड़े समूहों का मापन क्या है ?
Ans. बड़े समूहों का मापन (Measurement of large groups)-इस विधि द्वारा
विभिन्न उम्र-स्तर (age-levels) के बच्चों के बड़े समूहों का अध्ययन किया जाता है । ऐसा करने
का लक्ष्य (aim) है एक विशिष्ट उम्र-स्तर (age-level) में बच्चों में होनेवाले प्रामाणिक विकास
(standard develoment) का पता लगाना | इस विधि का उपयोग विशेषकर बच्चों के शारीरिक
विकास-ऊंँचाई, वजन तथा सामान्य बुद्धि-के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने हेतु ही किया गया
है । यह ‘पुनः परीक्षण’ (re-examination) विधि से, जिसकी चर्चा आगे की जाएगी, आसानी
से उपयोग में लाया जा सकता है और इसमें ज्यादा समय भी नहीं लगता। इसमें पुनर्निरीक्षण-विधि
की तरह प्रत्येक वर्ष बच्चों के एक ही समूह का अध्ययन बार-बार नहीं किया जाता, इसलिए ।
इसके उपयोग में समय भी कम लगता है।
परन्तु, इस विधि में भी ‘त्रुटियाँ’ हैं। इस विधि की सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि करीब-करीब
बराबर संख्या में भिन्न-भिन्न उम्र के बच्चों का मिलना मुश्किल है । अत: इस प्रश्न का कोई
निश्चित उत्तर देना कठिन है कि क्या एक बार चार वर्ष के बच्चों के समहों की जाँच प्रत्येक
एक वर्ष के बाद करने पर उनमें वे सभी शारीरिक एवं मानसिक विकास पाए जाएंगे, जैसा कि
विभिन्न उम्र के भिन्न-भिन्न समूहों के बच्चों में पाए गए थे और जिनके आधार पर उस
उम्र-विशेष में होनेवाले प्रामाणिक, शारीरिक एवं मानसिक विकास (standard, physical and
mental development) का पता लगाया गया ।
यदि हम इस विधि के आधार पर किसी सही निष्कर्ष पर पहुँचना चाहें तो हमें काफी संख्या
में प्रत्येक उम्र-स्तर (age-level) के बच्चों को विभिन्न समुदायों (different community) से
‘अनियमित ढंग से चुनकर’ (random sampling) उनका अध्ययन करना पड़ेगा । तत्पश्चात् जो
प्रदत्त प्राप्त होंगे, उनके आधार पर हम प्रत्येक उम्र-स्तर (age-level) में होनेवाले शारीरिक एवं
मानसिक विकास का पता लगाएंगे और उन्हें हम प्रामाणिक (standard) मान सकते हैं । इसके
आधार पर हम किसी एक खास बच्चे के विकास के संबंध में सही एवं विश्वसनीय निष्कर्ष
निकाल सकते हैं।
Q.3. विकासात्मक मनोविज्ञान क्या है ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान मनोविज्ञान की ऐसी शाखा है जो गर्भधारण से मृत्यु तक
मनुष्यों में होनेवाले विकास का अध्ययन करता है तथा जिसमें जीवन-अवधि के विभिन्न
अवस्थाओं में होनेवाले परिवर्तनों पर बल डाला जाता है । इस मनोविज्ञान में 19-20 साल तक
होनेवाले कुछ खास-खास विकासात्मक परिवर्तन, जैसे दैहिक विकास में परिवर्तन, संवेदी तथा
क्रियात्मक विकास में परिवर्तन, भाषा विकास में परिवर्तन, सामाजिक विकास में परिवर्तन, खेल
विकास में परिवर्तन, नैतिक एवं चारित्रिक विकास में परिवर्तनों आदि के अध्ययन पर अधिक बल
डाला जाता है।
Q.4. विकासात्मक मनोविज्ञान की विषय-वस्तु क्या है ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान की विषय-वस्तु विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन करना
है। प्राणी के विकास से तात्पर्य समय बीतने के साथ उनमें होनेवाले एक क्रमिक परिवर्तन से
होता है। विकास से संबंधित परिवर्तनों को विकासात्मक परिवर्तन कहा जाता है। ऐसे तो मानव
व्यवहार में विकासात्मक परिवर्तन जीवन अवधि के सभी अवस्थाओं (stages) में होता है, परन्तु
19-20 साल तक की अवधि तक ऐसे परिवर्तन बहुत ही स्पष्ट रूप से होते हैं। इन परिवर्तनों में
संवेदी विकास में परिवर्तन, क्रियात्मक विकास में परिवर्तन, भाषा विकास में परिवर्तन, सांवेगिक
विकास में परिवर्तन, सामाजिक विकास में परिवर्तन, खेल विकास में परिवर्तन, दैनिक परिवर्तन आदि
प्रमुख हैं। इन परिवर्तनों के अलावा विकासात्मक मनोविज्ञान में विकास के सामान्य नियमों का
भी गहन रूप से अध्ययन किया जाता है।
Q.5. विकासात्मक मनोविज्ञान के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
Ans. विकासात्मक मनोविज्ञान का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के जीवन अवधि के भिन्न-भिन्न
अवस्थाओं में होनेवाले विकासात्मक परिवर्तनों को समझना तथा उसके बारे में भविष्यवाणी करना
है। विकासात्मक मनोवैज्ञानिक बच्चों के जीवन के विभिन्न अवस्थाओं विशेषकर 19-20 साल
तक की अवधि में होनेवाले विकासात्मक परिवर्तनों को समझने की कोशिश करते हैं तथा उसके
आधार पर वे उनके द्वारा आगे चलकर किये जाने वाले व्यवहारों की भविष्यवाणी भी करते हैं।
इस तरह से विकासात्मक मनोवैज्ञानिक बच्चों के वर्तमान विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन
करके उनके सामाजिक विकास, सांवेगिक विकास, भाषा विकास, खेल विकास, चारित्रिक विकास
आदि के बारे में उत्तम भविष्यवाणी कर पाते हैं । इससे उन्हें विकास के क्रम (sequence) को
समझने में भी विशेष मदद मिलती है।
Q.6. मानव विकास को प्रभावित करने वाली प्रमुख क्रियाओं के लिए एक-एक
उदाहरण दें।
Ans. मानव विकास को प्रभावित करने वाली तीन प्रमुख क्रियाएँ निम्नलिखित है:-
(i) जैविक क्रिया-लम्बाई, वजन, हृदय एवं फेफड़ों का विकास ।
(ii) संज्ञानात्मक क्रिया-ज्ञान, अनुभव, समस्या समाधान से जुड़े विकास ।
(iii) समाज-सांवेगिक क्रिया-बच्चों का माँ से लिपट जाने की प्रवृत्ति,      हारने पर दुःख
व्यक्त करने की लत ।
Q.7. संवृद्धि का संबंध किस स्तर की वृद्धि से है ?
Ans. हाथ, पैर, वजन, मोटापन जैसे शारीरिक अंगों की वृद्धि का संबंध संवृद्धि से
है। संवृद्धि सम्पूर्ण जीव की बढ़ोतरी को भी कहते हैं। एक बच्चा कम समय में ही यदि काफी
लम्बा हो जाता है तो माना जाता है कि बच्चे में शारीरिक संवृद्धि हुई है
Q.8. पुनः परीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं ?
Ans. पुनः परीक्षण-विधि (Re-examination)-इस विधि द्वारा एक ही व्यक्ति या कई
व्यक्तियों का अध्ययन बार-बार कुछ-कुछ समय के बाद किया जाता है । यह ‘पुन: परीक्षण’
हर एक दिन के बाद या हर एक सप्ताह या हर एक महीने या हर एक साल के बाद किया जा
सकता है । यह विधि पहली विधि की अपेक्षा अधिक समय लेती है और इसके उपयोग करने
में काफी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है । इस विधि द्वारा एक खास उम्र के बच्चों
के एक बड़े समूह का अध्ययन न कर, एक ही बच्चे का अध्ययन बार-बार किया जाता है।
अतः इससे बच्चों की विभिन्न अवस्थाओं में होनेवाले शारीरिक एवं मानसिक विकास का समुचित
ज्ञान प्राप्त हो जाता है । इस विधि द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि सामान्य बच्चों
में होनेवाले विकास का क्रम एवं गति करीब-करीब एकसमान होते हैं । इसलिए बच्चों के बड़े
समूहों का अध्ययन करना अनिवार्य नहीं है किन्तु, इस विधि को उपयोग में लाने के समय कुछ
कठिनाइयाँ सामने आती हैं; जैसे-प्रत्येक वर्ष पुनः परीक्षण के लिए अध्ययन किए गए उन्हीं सारे
बच्चों के मिलने में काफी दिक्कत होती है।
बच्चों की ‘बुद्धि का विकासात्मक अध्ययन’ करने के लिए टरमन (Terman) ने इस विधि
का उपयोग किया है । गेंसेल (Gensell) ने भी येल साइकोलॉजिकल क्लिनिक (Yale
Psychological Clinic) में इस विधि द्वारा 100 बच्चों का अध्ययन हर एक महीने के बाद किया
और विकास-नियम (development norms) की भी स्थापना की । इसके अतिरिक्त, शर्ली
(Shirley). बर्नसाइड (Burnside) तथा हालवरसन (Halverson) ने भी इस विधि का उपयोग
बच्चों के अध्ययन हेतु किया, जिसकी विशद व्याख्या करना यहाँ अभीष्ट नहीं है ।
Q.9. परिपक्वता से आप क्या समझते हैं ?
Ans. परिपक्वता (Maturation) शारीरिक एवं मानसिक गुणों के विकास का कारण
इन गुणों की परिपक्वता’ (maturation) भी है । परिपक्वता का अर्थ है मनुष्य के अन्दर वर्तमान
उन गुणों का विकास होना, जो वे अपने माता-पिता एवं अन्य पूर्वजों से ग्रहण करते हैं । परिपक्वता
के द्वारा जिन गुणों का आविर्भाव होता है वे एकाएक (suddenly) आते है; जैसे-ज्योंही बच्चे
युवावस्था को प्राप्त करते हैं उनके चेहरे पर एकाएक बाल उग आते हैं और उनकी बोली भी
भारी हो जाती है । शारीरिक परिवर्तनों के साथ-साथ उनकी मनोवृत्ति (attitudes) में भी परिवर्तन
हो जाता है। विशेषकर विषमलिंगियों (oppositesex) के प्रति उनकी मनोवृत्ति में काफी परिवर्तन
होता है । यही कारण है कि इस उम्र में लड़के लड़कियों को और लड़कियाँ लड़कों को चाहने
लगती हैं।
Q.10. पर्यावरण से आप क्या समझते हैं ?
Ans. पर्यावरण क्या है, इस संदर्भ में अनेक मनोवैज्ञानिकों ने इसे परिभाषित करने का प्रयास
किया है।
पर्यावरण दो शब्दों के मेल से बना है परि और आवरण । परि का तात्पर्य चारों ओर तथा
आवरण का अर्थ ढंका हआ होता है । इस अर्थ में हम कह सकते हैं कि पर्यावरण वह है जो
व्यक्ति को चारों ओर से घेरे हुए है। जिस्वर्ट ने पर्यावरण को परिभाषित करते हुए लिखा है-
“पर्यावरण वह है जो वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता।”
रॉस के शब्दों में,”पर्यावरण कोई भी बाहरी शक्ति है, जो हमें प्रभावित करती है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से पर्यावरण का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। वस्तुतः, पर्यावरण एक
विस्तृत अवधारणा है । यह व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करता है।
Q. 11. वंशानुक्रम से आप क्या समझते हैं ? व्यक्ति पर वंशानुक्रम के पड़ने वाले
प्रभावों का वर्णन करें ।
Ans. व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास पर मुख्य रूप से दो कारकों का प्रभाव पड़ता है ये
कारक हैं, वंशानुक्रम एवं वातावरण । मनोवैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों ने दोनों कारकों की भूमिका
तथा प्रभाव का उल्लेख किया है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व विकास के लिए सिर्फ वंशानुक्रम
को ही महत्त्वपूर्ण माना है और कहा है कि जैसी वंश-परंपरा होगी वैसी ही उसकी संतानें भी
होंगी । जबकि इसके विपरीत कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास पर
पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है । वाटसन ने वातावरण के महत्त्व को स्थापित करते हुए कहा है
कि “मुझे एक दर्जन स्वस्थ बच्चे दीजिए मैं उसे किसी भी रूप में विकसित कर सकता हूँ ।
उसे डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, नेता, व्यापारी अथवा चोर बना सकता हूँ।”
उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट हो जाता है कि मनोवैज्ञानिक में एक मत का अभाव है । अत:
वंशानुक्रम एवं वातावरण के अध्ययन से स्पष्ट हो सकता है कि किसका प्रभाव सर्वाधिक होता
है।
वंशानुक्रम से तात्पर्य व्यक्तियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक एवं
अन्य व्यक्तित्व के शीलगुणों से है। इस मान्यता के अनुसार जिस प्रकार के माता-पिता होंगे संतानें
भी उसी के अनुरूप होंगी । बेंकन ने वंशानुक्रम को परिभाषित करते हुए कहा है, “दो पीढ़ियों
को जोड़ने वाली श्रृंखला को वंशानुक्रम कहते हैं ।
जिंसबर्ट के अनुसार, “वंशानुक्रम का तात्पर्य माता-पिता द्वारा संतानों के जैवकीय अथवा
मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के हस्तांतरण से है।”
रूथ बेनेडिक्ट ने कहा है, “माता-पिता से सन्तान को हस्तांतरित होने वाले गुणों को
वंशानुक्रम कहते हैं।”
उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि वंशानुक्रम का गुण बच्चों को माता-पिता से प्राप्त होता
है । इसमें माता-पिता जो गुण अपने पीढ़ियों से प्राप्त करते हैं उसे अपनी संतान तक पहुँचाने का
कार्य करते हैं।
Q. 12. विकास की गति को प्रभावित करनेवाले कारक का वर्णन कीजिए ।
Ans. बच्चे का शारीरिक एवं मानसिक विकास उसके जीवकोष (germ-cell) की बनावट
(structure) पर निर्भर करता है । जैसा जीवकोष होगा, बच्चे का विकास भी वैसा ही होगा ।
फिर भी, ‘बच्चों की क्रियाएँ’ (activiries), ‘भोजन’ (food), ‘अभ्यास’ (exercise), ‘शिक्षा’
(education) इत्यादि का भी उसकी विकास गति पर काफी प्रभाव पड़ता है। चिकित्सकों ने
इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि बचपन का ‘पौष्टिक भोजन’ बच्चों के विकास में काफी
सहायक होता है। बच्चे के विकास की गति में परिवर्तन एवं परिमार्जन, उसकी विकास प्रक्रिया
(growth- process) की गति को बढ़ाकर या घटाकर या इसको प्रभावित करनेवाले अंगों
(factors) को नियंत्रित (conrol) कर लाया जा सकता है ।
Q. 13. जन्म के पूर्व की अवस्था से आप क्या समझते हैं ?
Ans. जन्म के पूर्व की अवस्था (pre-natal period) यह ‘गर्भाधान (conception)
से लेकर जन्म होने (birth) तक की अवस्था’ है । यह अवस्था करीब-करीब 9 महीने या 280
दिन की होती है । इतनी छोटी अवधि होने पर भी इस अवस्था में विकास किसी भी अन्य अवस्था
की अपेक्षा अधिक तेजी से होता है । इस अवस्था में बच्चे का विकास एक सूक्ष्म जीवकोष
(germ-cell) से 9 महीने के अन्दर की छह से आठ पौण्ड के वजन (weight) और करीब-करीब
20 इंच की लम्बाई में हो जाता है । निस्सन्देह, इस विकास को हम एक ‘तीव्र विकास’ (rapid
development) कहेंगे । इस समय होनेवाले विकास अधिकतर शारीरिक (physiological) ही
होते हैं।
Q.14.शैशवावस्था क्या है?
Ans. शैशवावस्था (Infancy)-‘जन्म से लेकर 10-14 दिनों की अवस्था’ को ही
शैशवावस्था (infancy) कहते हैं । इस अवस्था के बच्चों को नियोनेट या नवजात शिशु
(newborn infant) कहते हैं । इस अवस्था में बच्चे में कोई विकास नहीं होता है, क्योंकि इस
समय वह अपने नए वातावरण से अपने को अभियोजित करने में व्यस्त रहता है।
Q.15. बचपनावस्था का अर्थ बतायें ।
Ans. बचपनावस्था (Babyhood)-‘दो सप्ताह से लेकर करीब दो वर्ष तक’ की
अवस्था को ही बचपनावस्था (babyhood) कहते हैं । इस अवस्था में बच्चा बिल्कुल निस्सहाय
(helpless) रहता है । वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इस अवस्था में दूसरों पर
ही निर्भर रहता है। धीरे-धीरे बच्चा अपनी मांसपेशियों को नियंत्रित करना सीख लेता है । फलतः
वह अधिक आत्मनिर्भर (Self-dependent) हो जाता है तथा स्वयं खाने, चलने, पोशाक पहनने
और खेलने लगता है।
Q.16. बाल्यावस्था पर संक्षिप्त नोट लिखें।
Ans. बाल्यावस्था (Childhood) साधारणतः ‘जन्म से लेकर अपरिपक्वता (immaturity)
तक की अवस्था’ को बाल्यावस्था (childhood) कहा जाता है, परन्तु वस्तुत: ‘2 वर्ष से लेकर
11 वर्ष की अवस्था’ (जिसे तरुणावस्था भी कहते हैं) को ही बाल्यावस्था कहा जाता है। इस
अवस्था का सबसे प्रथम विकास होता है, वातावरण पर नियंत्रण (control of environment)
इस अवस्था में बच्चा सामाजिक अभियोजन (social adjustment) करना भी सीख लेता है।
छह वर्ष की उम्र के करीब से ‘समाजीकरण’ (socialisation) का स्थान महत्त्वपूर्ण रहता है।
6 से लेकर 11 वर्ष की अवस्था को गैंग एज (gange age) या दल की अवस्था कहते हैं । इस
अवस्था का बच्चे के जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है।
Q.17.किशोरावस्था पर प्रकाश डालें।
Ans. किशोरावस्था (Adolescence) सामान्य बच्चों (normal children) में ‘तरुणावस्य’
(puberty) की शुरूआत से लेकर परिपक्वावस्था (maturity) को ही किशोरावस्था (adolescence)
कहते हैं, अर्थात् ’11 से 13 वर्ष के बीच की उम्र से शुरू होकर 21 वर्ष तक की अवस्था’ को
किशोरावस्था कहा जाता है चूँकि यह एक बहुत लम्बी अवस्था है और इस अवस्था के विभिन्न
उम्रों में विभिन्न प्रकार के विकास होते हैं, इसलिए इस अवस्था को भी निम्नलिखित भागों में बाँटा
गया है-
(i) किशोरावस्था के पूर्व की अवस्था (Pre-adolescence)—यह ‘किशोरावस्था के
एक वर्ष की पूर्व की अवस्था’ है । ल कयों में साधारणत: यह अवस्था 11 से 13 वर्ष के बीच
होती है और लड़कों में यह लगभग इसके एक वर्ष बाद आती है । इस अवस्था को बुलहर
(Buhler) ने निषेधात्मक अवस्था (Negative phase) कहा है।
(ii) प्रारम्भिक किशोरावस्था (Early adolescence)- किशोरावस्था के पूर्व की अवस्था
(pre-adolescence) के बाद अर्थात् ’13 से लेकर 16-17 वर्ष की अवस्था’ को प्रारम्भिक
किशोरावस्था (early adolescence) कहते हैं । इस अवस्था में शारीरिक और मानसिक विकास
में पूर्णता (completeness) आ जाती है ।
(iii) किशोरावस्था की अन्तिम अवस्था (Lateadolescence)-विकासात्मक अवस्थाओं
की यह सबसे अन्तिम अवस्था है, जो ’17-21 वर्ष तक’ होती है । इस अवस्था में लड़के और
लड़कियाँ सदा इस बात पर ध्यान देते हैं कि वे दूसरों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन जाएँ । इस
अवस्था में लड़के और लड़कियाँ एक-दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसी अवस्था
में बच्चे का विकास हर तरह से ‘पूर्ण’ (complete) हो जाता है और वह एक वयस्क (adult)
का रूप धारण कर लेता है और पूर्णरूपरेण स्वावलम्बी (completely self-dependent) हो
जाता है तथा अपने जीवन की योजना (plan of life) अपने मनोनुकूल बनाता है । संक्षेप में, हम
कह सकते हैं कि विकास के लम्बे क्रम में, जो गर्भाधान के समय से शुरू होता है, यह सबसे
अन्तिम अवस्था है । इस अवस्था को प्राप्त करने पर व्यक्ति समाज एवं कानून (society and
law) के दृष्टिकोण से परिपक्व (matured) हो जाता है।
Q. 18. आप किस आधार पर कह सकते हैं कि ‘नवजात शिशु’ उतना असहाय नहीं
होता है जितना कि आप सोचते हैं ?
Ans. नवजात शिशु जीवन की कार्य-प्रणाली को बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक
क्रियाओं को व्यवहार में लाना जानता है । जैसे, वह माँ का दूध पीना जानता है, चममच से पिलाने
पर किसी भी द्रव को निगलना जानता है, आवश्यकतानुसार वह मल-मूत्र त्याग करने की कला
भी सीख चुका होता है।
नवजात शिशु जीवन के प्रथम सप्ताह में ही ध्वनि की दिशा पहचानता है। अपनी माँ की
आवाज को पहचान लेता है । खुशी या गम को बताने के लिए रोना-हँसना, जीभ बाहर निकालना
तथा मुँह खोलना सभी तरह का ज्ञान हासिल कर लेता है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि
नवजात शिशु अनुमान से अधिक जानकारी ग्रहण करके असहाय कहलाने से बचने के योग्य बन
जाता है।
Q, 19. वस्तु स्थायित्व का अर्थ सोदाहरण बतावें ।
Ans. वस्तु स्थायित्व एक संवेदी अनुभव की स्थिति होती है जिसमें बच्चों को वस्तु के
छिपा दिये जाने का आभास नहीं होता है, लेकिन उसका अस्तित्व उसके दिमाग में बना रहता है।
बच्चा उस वस्तु के नष्ट हो जाने का भाव व्यक्त करने पर भी उस वस्तु की प्राप्ति के लिए प्रयास
करता रहता है । इस विशिष्ट चेतना या जानकारी की आवश्यकता तब होती है जब वस्तु स्पष्ट
रूप से नजर के सामने नहीं रहता है।
जब कोई बच्चा कलम लेकर उसे तोड़ना चाहता है तो हम यह कहकर कलम को छिपा
देते हैं कि कलम को कौआ लेकर भाग गया । कभी-कभी हम कलम को दूर फेकने का अभिनय
भी करते हैं।
Q. 20. वृद्धावस्था में होने वाले शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन का वर्णन करें ।  [B.M.2009 A]
Ans. वृद्धावस्था में पारिवारिक संरचना में परिवर्तन तथा नयी भूमिकाओं से समायोजन की
आवश्यकता होती है वृद्धावस्था में व्यक्ति शक्तिहीनता का अनुभव एवं स्वास्थ्य तथा वित्तीय
संपत्तियों का क्षणी होना, असुरक्षा एवं निर्भरता को जन्म देता है सक्रियता व्यावसायिक जीवन से
सेवानिवृत होना महत्वपूर्ण होता है । पति या पत्नी की मृत्यु होने पर वे दुःख का अनुभव करते
हैं इन्हें अकेलापन, अवसाद वित्तीय क्षति से समायोजन स्थापित करना होता है।
Q.21. वृद्धावस्था को क्यों नहीं पसन्द किया जाता है
Ans. वृद्धावस्था प्राप्त व्यक्ति को लोग भयावह स्थिति में पहुँच जाने वाला व्यक्ति मान
लेते हैं । वृद्धावस्था अनेक समस्याओं को साथ लाता है-
(i) वृद्धावस्था सेवानिवृत हो जाने का प्रमुख कारण माना जाता है । इससे व्यक्ति को समय
काटना मुश्किल हो जाता है।
(ii) आर्थिक सहयोग तथा अकेलापन दूर करने के लिए वृद्ध अपने बच्चे पर निर्भर हो जाते
हैं।
(iii) बीमारी और शक्ति क्षीणता के साथ संवेदी अंगों में आनेवाली विसंगति या वृद्ध व्यक्ति
को असहाय जैसी जिन्दगी दे देता है।
(iv) वृद्ध स्वतंत्रता, मृत्यु और सुरक्षा की दृष्टि से स्वयं को आश्रित मान लेते हैं ।
(v) नयी पीढ़ी के आचरण, मूल्य एवं आदत से वे सदा चिंतित रहते हैं।
अतः स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वतंत्रता, स्वावलंबन की दृष्टि से कमजोर अवस्था को कोई पसन्द
नहीं करता है।
                                                  दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
                             (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)
Q.1. विकास से आप क्या समझते हैं ? विकास से होने वाले परिवर्तनों का प्रकारों  
का वर्णन करें।
Ans. विकास का तात्पर्य गर्भावस्था से प्राणी में होने वाले निरंतर रूपान्तरण है । प्रारंभ
में बच्चों के विकास का अध्ययन जन्मकाल से किया जाता था । परन्तु आधुनिक युग में गर्भावस्था
से ही उसके विकास का अध्ययन किया जाता है । विकास प्रगतिशील परिवर्तनों की वह नियमित
और संगठित प्रणाली है जो व्यक्ति को परिपक्वता की ओर अग्रसर करती है । विकास से परिवर्तन
होता है जिसमें एक निश्चित दिशा होती है । ये परिवर्तन नियमित और संगठित होते हैं । विकास
के क्रम एक-दूसरे से संबंधित हैं अर्थात् विकास का पहला क्रम दूसरे क्रम पर आधारित होता
है।
विकास के परिणामस्वरूप बच्चों में नयी-नयी विशेषताएँ आती हैं। विकास को परिभाषित
करते हुए वाटसन ने कहा है, “निषेचित अण्डाणु से माता-पिता के समान प्राणी के रूप में होने
वाले रूपान्तरण को विकास की प्रक्रिया कहते हैं।”
विकास की प्रक्रिया को दो भागों में बाँटा जा सकता है-
(i) जन्म के पूर्व विकास की अवस्था,
(ii) जन्म के बाद विकास की अवस्था ।
जन्म के पूर्व बच्चों का विकास माँ के गर्भ में होता है । 280 दिनों तक गर्भ में शिशु का
पूर्ण विकास हो जाता है तब उसका जन्म होता है ।
विकास से होने वाले परिवर्तन-विकास की अवस्था में बच्चों में अनेक प्रकार के परिवर्तन
होते हैं । इन परिवर्तनों का विवरण निम्नलिखित है-
1.आकार में परिवर्तन-विकास का सबसे पहला लक्षण है कि बच्चों के शरीर के आकार
में वृद्धि होती है । जन्म के समय बच्चे अठारह इंच के होते हैं जो बढ़कर बारह वर्षों में 48 इंच
के हो जाते हैं । इसी प्रकार जन्म के समय उसमें बोलने की क्षमता नहीं होती है, एक वर्ष में
दो-तीन शब्दों को बोलने लगता है।
2. अनुपात में परिवर्तन-अनुपात में परिवर्तन से तात्पर्य यह है कि शरीर के विभिन्न अंगों
का विकास समान अनुपात में नहीं होता है। किसी अंग का विकास अधिक और किसी अंग का
कम विकास होता है । जन्म के बाद सिर का जितना विकास होता है उससे बहुत ज्यादा विकास
पैरों का होता है।
3. पुरानी विशेषताओं का लुप्त होना-विकास में केवल शरीर का विकास ही नहीं बल्कि
बचपन की अनेक विशेषताएँ लुप्त होने लगती हैं । उसमें थाइमस ग्रन्थि का स्राव क्रमशः कम
होते जाता है । जन्म के समय शिशु के शरीर पर रोएँ होते हैं जो धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं ।
दूध के दाँत अपने-आप समय आने पर टूट जाते हैं । इसी प्रकार चूसना, मुट्ठी बाँधना आदि
क्रियाएँ धीरे-धीरे समाप्त होती जाती हैं । चिन्तन करते समय बच्चे बोलते हैं, उम्र वृद्धि के साथ
यह क्रिया भी धीरे-धीरे लुप्त हो जाती है।
4. नई विशेषताओं की प्राप्ति-बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उनमें नई-नई विशेषताएंँ
उत्पन्न होती चली जाती हैं। नई विशेषताओं का उत्पन्न होना परिपक्वता और शिक्षण पर निर्भर
करता है । परिपक्वता के आधार पर जो नई विशेषताएँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें रोका नहीं जा सकता
है । परन्तु जो परिवर्तन प्रयास के फलस्वरूप होते हैं उसे बच्चे वातावरण के प्रभाव से सीखते
हैं । दाढ़ी-मूंछ निकलना, दाँत टूटने के बाद नए दाँत निकलना आदि परिपक्वता के कारण होता
है, जबकि भाषा का सीखना, मनोवृत्तियों का निर्माण आदि शिक्षण के आधार पर होता है ।
Q.2. भारत में मनोविज्ञान के विकास का वर्णन करें ।               [B. M. 2009 A]
Ans. भारतीय मनोविज्ञान का आधुनिक काल कलकता विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग
में 1915 में प्रारंभ हुआ जहाँ प्रायोगिक मनोविज्ञान का प्रथम पाठ्यक्रम प्रयोगशाला स्थापित हुई।
दुर्गानंद सिन्हा ने अपनी पुस्तक साइकोलॉजी इन ए थर्ड वर्ल्ड कन्ट्री दि इंडियन एन स्पीरियन्स
में भारत में सामाजिक विज्ञान के रूप में चार चरणों में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास को खोजा
है प्रथम चरण में प्रयोगात्मक, मनोविश्लेषणात्मक एवं मनोवैज्ञानिक अनुसंधान पर बहुत बल था,
जिसने पाश्चात्य देशों का मनोविज्ञान के विकास में योगदान परिलक्षित हुआ था द्वितीय चरण में
भारत में मनोविज्ञान की विविध शाखाओं में विस्तार का समय था । इस चरण में मनोवैज्ञानिकों
की इच्छा थी कि भारतीय सन्दर्भ में जोड़ा जाय । फिर भी, भारत में मनोविज्ञान 1960 के बाद
भारतीय समयज के लिए समस्या केन्द्रित अनुसंधान द्वारा सार्थक हुआ । चतुर्थ चरण के रूप
में 1970 के अंतिम समय में देशज मनोविज्ञान का उदय हुआ। इसमें भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने
ऐसी समझ विकसित करने का आवश्यकता पर बल दिया जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से
सार्थक ढाँचे पर आधारित था । इस रुझान की झलक उन प्रयासों में दिखी, जिनसे पारंपरिक
भारतीय मनोविज्ञान पर आधारित उपागों का विकास हुआ, इस प्रकार इस चरण की विशेषता
को देशज मनोविज्ञान के विकास, जो भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ से उत्पन्न हुआ था तथा भारतीय
मनोविज्ञान एवं समाज के लिए सार्थकता ।
Q.3. विकास की विशेषताओं का वर्णन करें।
Ans. मानव-विकास की बहुत-सारी विशेषताएँ (characteristics) हैं, जो उसे प्रभावित
करती रहती हैं । उन सबकी व्याख्या करना यहाँ सम्भव नहीं । अतः उनमें से कुछ मुख्य
विशेषताओं की चर्चा उनकी ‘प्रधानता’ (importance) के अनुसार एक-एक नीचे की जाती है-
1. विकास एक प्रणाली का अनुसरण करता है (Development follows a patten)-
हर प्रकार के जीव में, चाहे वह जानवर हो या मनुष्य, विकास की एक ‘विशिष्ट प्रणाली’ होती
है । हर जाति (species) का प्रत्येक जीव इस विकास प्रणाली का अनुसरण करता है ।
मानव-शिशु का विकास अनियमित और अव्यवस्थित ढंग का नहीं होता, वरन् यह ‘नियमित और
सुव्यवस्थित’ होता है । बच्चों के जन्म के पूर्व एवं बाद में होनेवाले विकास-दोनों के संबंध में
ये बातें पाई जाती हैं । गेसेल (Gesell) ने बाल विकास-संबंधी येल क्लीनिक (Yale Clinic of
Child Development) द्वारा प्राप्त प्रदत्तों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि बच्चों के
व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन एक ‘क्रमिक प्रणाली’ का अनुसरण करते हैं और इन पर अनुभवों
(experiences) का अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है । चूँकि विकास प्रणाली की विभिन्न
‘अवस्थाएँ’ (stages) इस तरह स्थायी ढंग से एक खास उम्र में एक-दूसरे के बाद आती हैं कि
एक खास उम्र में होनेवाले विकास के संबंध में ‘नियम’ (srandard or norm) भी बनाए जा
सकते हैं और इनके आधार पर किसी एक सामान्य बालक विशेष में किस उम्र में कितना विकास
होगा, इस संबंध में ‘सही भविष्यवाणी’ करना भी सम्भव है । यही कारण है कि अब वजन-उम्र
(weight-age), ऊँचाई-उम्र (height-age), मानसिक उम्र, सामाजिक विकास-उम्र इत्यादि से
सम्बद्ध प्रामाणिक मापदण्ड (standard scale) हमें उपलब्ध है।
विकास निम्नलिखित दो ‘क्रमों’ (sequences) का अनुसरण करता है-
(क) मस्तकाधोमुखी क्रय या सेफालोकाउडल सीक्वेन्स (Cephalocaudal sequence) तथा
(ख) निकट-दूर का विकासक्रम (proximo-distal sequence)| नीचे संक्षेप में इन दोनों
की चर्चा की जाती है।
(क) मस्तकाधोमुखी क्रय (Cephalocaudal sequence)-प्रायः बच्चों के विकास के
संबंध में यह प्रश्न उठता है-उनका विकास किस ‘दिशा’ (direction) में होता है-पहले विकास
सिर में होता है या धड़ में या पैर में? मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के आधार पर यह प्रमाणित
कर दिया है कि बच्चों के जन्म के पूर्व (prenatal) तथा जन्म के बाद (postnatal) होनेवाले
दोनों प्रकार के विकास मस्तकाधोमुखी क्रम (cephalocaudal sequence) यानी ‘सिर से पैर
की ओर’ का अनुसरण करते हैं । अर्थात् पहले सिर में विकास होता है, तब धड़ में और सबसे
अन्त में पैर में। यदि किसी शिशु को पेट के बल (आँधै) जमीन पर सुला दिया जाए, तो पहले
वह अपने सिर को उठाने में समर्थ होता है, तब गर्दन को, फिर छाती को और उसके बाद ही
वह बैठ जाता है। बच्चे में अपने धड़ (trunk) की मांसपेशियों पर नियंत्रण करने की क्षमता अपनी
बाँहों और पैर की मांसपेशियों से पहले तथा हाथ-पैर की मांसपेशियों पर नियंत्रण की क्षमता इसके
बाद आती है।
(ख) निकट-दूर का विकासक्रम (Proximo-distal sequence) यह विकास-प्रणाली
न सिर्फ मस्तकाधोमुखी क्रम (cephalocaudal sequence) का अनुसरण करती है। इसका अर्थ
यह हुआ कि विकास शरीर के उन अंगों में पहले होता है जो शरीरकेन्द्र (body-axis) के निकट
होते हैं और जो इससे दूर होते हैं उनमें विकास बाद में होता है; जैसे-पहले विकास पेट के अंगों
में होता है, तब जाँघ में और उसके बाद पैर में । ठीक इसी तरह, बच्चा पहले कन्धे (shoulders)
और बाँहों (arms) की मांसपेशियों प नियंत्रण कर पाता है, तभी हाथ और अंगुलियों पर ।
यहाँ पर स्मरण रखने योग्य बात है कि विकास के क्रम में विकास की गति के द्वारा कोई
परिवर्तन नहीं लाया जा सकता है-ऐसा गेसेल (Geséll) ने अपने अध्ययनों के आधार पर पाया
है । इसी बात का समर्थन एमिस (Ames) ने भी किया है । विकास का क्रम ‘परिपक्वता’
(maturation) से निर्धारित होता है । इस पर अनुभव (experience) का प्रभाव नहीं पड़ता ।
इस संबंध में स्मरणीय दूसरी बात यह है कि बच्चों में होनेवाले सभी विशिष्ट प्रकार के
विकास-संवेगात्मक (emotional), सामाजिक (social), क्रियात्मक (motor) इत्यादि भी एक
विकासक्रम का अनुसरण करते हैं ।
2. सामान्य से विशिष्ट प्रतिक्रिया की ओर विकास होता है (Development
proceeds from general to specifc responses) बच्चों के सभी प्रकार के शारीरिक एवं
मानसिक विकास में बच्चों की प्रतिक्रियाएँ आरम्भ में ‘सामान्य प्रकार’ (general type) की होती
हैं और बाद में ये विशिष्ट’ (specific) हो जाती है । यह बात सर्वप्रथम बच्चों की स्नायविक
प्रतिक्रियाओं (muscular respones) के संबंध में देखी जाती है । बच्चा पहले अपने सारे शरीर
में गति लाता है और उसके बाद ही उसके शरीर के विभिन्न अंगों में गति देखी जाती है । वह
शुरू में अपने हाथ और पाँव को अनियमित ढंग से फेंकता है। धीरे-धीरे उसके शरीर के विभिन्न
अंगों की मांसपेशियों के परिपक्व होने पर वह किसी खास कमांसपेशियों पर नियंत्रण कर
पाता है और उसके पश्चात् ही उसकी प्रतिक्रियाएँ विशिष्ट ढंग (specufic type) की हो जाती
हैं। किसी चीज को पकड़ने के लिए बच्चा पहले अपने शरीर से कोशिक करता है। वह अपने
दोनों हाथों से उसे पकड़ना है और बाद में धीरे-धीरे एक ही हाथ से पकड़ने की समर्थता उसमें
आ जाती है । ठीक यही बात पैरों की गति के साथ पाई जाती है। पहले बच्चा अनियमित ढंग
से अपने दोनों पैरों को फेंकता है, बाद में वह रेंगने, खिसकने और चलने लगता है।
ठीक यही बात बच्चों के ‘प्रत्यय-विकास’ (concept development) के साथ भी पाई
जाती है। बच्चों का प्रत्यय-विकास भी सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है।
बच्चों के संवेगात्मक विकास के सम्बन्ध में भी विकास का यह क्रम पाया जाता है । जन्म
के समय बच्चे संवेगात्मक उत्तेजनाओं के प्रति कोई विशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं करते हैं, वरन् उनकी
प्रतिक्रियाएँ सामान्य ढंग की होती हैं और धीरे-धीरे उनमें विशिष्ट संवेगों-भय, क्रोध, प्रेम
आदि-का विकास होता है।
3. अविराम गति से विकास होता है (Development is continuous)–गर्भधारण
(conception) के समय से परिपक्वता (maturity) तक बच्चे का विकास ‘अविराम गति’ से
होता रहता है । हालाँकि बच्चों के विकास को कई ‘विकासात्मक कालों’ (developmental
periods) में बाँट दिया गया है, फिर भी उनका विकास अविराम गति से होता रहता है । यह
वर्गीकरण सिर्फ उनमें होनेवाले शारीरिक एवं मानसिक विकास को समुचित ढंग से समझने के
हेतु ही किया जाता है तथा यह स्पष