8TH SST

bihar board 8th history | ब्रिटिश शासन एवं शिक्षा

bihar board 8th history | ब्रिटिश शासन एवं शिक्षा

bihar board 8th history | ब्रिटिश शासन एवं शिक्षा

ब्रिटिश शासन एवं शिक्षा
पाठ का सारांश-अंग्रेजों ने भारत में पूर्व की प्रचलित शिक्षा व्यवस्था में अपने स्वार्थ के मद्देनजर बदलाव कर दिया था।
अंग्रेज शिक्षा को किस तरह से देखते थे :- अंग्रेजों ने अपने शासन के पहले 60 वर्षों के दौरान शिक्षा के क्षेत्र में कोई भी नया काम नहीं किया। दरअसल शुरू में अंग्रेज भारत के प्रचलित कानूनों और परम्पराओं को जानना चाहते थे। इसलिए 1781 में कलकत्ता में स्थापित ‘मदरसा’ और बनारस में स्थापित ‘संस्कृत कॉलेज’ को प्रश्रय दिया गया।
विलियम जोन्स जैसे अंग्रेज एवं अन्य अधिकारी व कर्मचारी अपनी रुचि के लिए भारतीय साहित्य, धर्म, दर्शन और संस्कृति को पूरी तरह जानना चाहते थे। किन्तु बाद में कुछ भारतीयों को शासन के काम के लायक अंग्रेजी में शिक्षित करना जरूरी समझा गया।
शिक्षा नीति संबंधी विवाद:- 1813 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक कानून बनाकर भारत के शिक्षा क्षेत्र में प्रति वर्ष एक लाख रुपया खर्च करना निश्चित किया था। विलियम जोन्स जैसे अंग्रेज चाहते थे कि यह पैसा भारतीय विद्या और ज्ञान के प्रसार में खर्च करना चाहिए। राजा राममोहन राय ने भी इंगलैंड में प्रचलित शिक्षा का ही भारत में प्रसार करने की वकालत की।
जबकि जेम्स मिल और मैकाले जैसे अंग्रेज अधिकारी मानते थे कि भारतीय शास्त्र अवैज्ञानिक और गलत सूचनाओं से भरे हुए हैं। वे भारतीयों को अंग्रेजी में, व्यावहारिक शिक्षा देना चाहते थे। वे चाहते थे कि भारतीय जानें कि इंगलैंड एवं अन्य यूरोपीय देश किस प्रकार वैज्ञानिक एवं तकनीकी सफलता हासिल कर सके । मैकाले ने कहा कि भारतीयों को अंग्रेजी भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा देनी चाहिए। अंग्रेजी भाषा पढ़ने से भारतीयों को दुनिया की श्रेष्ठ जानकारी मिल पाएगी।
अंग्रेज सरकार ने मैकाले के पक्ष को मानते हुए 1835 में एक अधिनियम पारित कर भारत में ऊँची शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी निश्चित कर दिया । तय हुआ कि भारतीय भाषाओं वाली शिक्षा को प्रोत्साहित नहीं किया जाएगा और स्कूल स्तर की शिक्षा को छेड़ा नहीं जाएगा।
व्यवसाय के लिए शिक्षा:-1854 में अंग्रेजों ने शिक्षा संबंधी एक और नीति बनाई । इसका उद्देश्य था कि भारतीयों को अंग्रेजी में आधुनिक शिक्षा इस प्रकार दी जाए कि उनका मानस भारतीय से बदलकर यूरोपीय हो जाए और भारतीय अंग्रेजी प्रशासन के काम में आने लायक बन सकें।
1854 की नीति का महत्व:- प्राथमिक शिक्षा की भाषा भारतीय रही जबकि उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनाया गया। 1857 में, कलकत्ता, मुम्बई और मद्रास में तीन विश्वविद्यालय बनाये गये । हम जिस प्रकार का पाठ्यक्रम एवं पढ़ाई का तौर-तरीका देख रहे हैं, वह 1854 के बाद से ही अस्तित्व में आया है।
स्थानीय पाठशालाओं का क्या हुआ—तब स्थानीय पाठशालाएँ आपकी तरह नियमित तौर पर चलने वाले स्कूलों में नहीं होती थी। गुरुजन अपने घरों के एक हिस्से में, पेड़ के नीचे, मंदिर पर आदि स्थानों पर बच्चे पढ़ते थे। शिक्षा मौखिक दी जाती थी। अमीर बच्चों से ज्यादा फीस ली जाती थी जबकि गरीब बच्चों से कम । फसलों की कटाई के समय कक्षाएँ बंद हो जाती थीं।
गाँव के बच्चे प्रायः खेतों में काम करते थे।
नई दिनचर्या, नए नियम:-1854 के बाद कंपनी ने उच्च शिक्षा के बाद प्राथमिक शिक्षा में सुधार का फैसला किया। पाठशाला बनवाए गए। पंडितों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया । अव अध्ययन पाठ्यपुस्तकों पर आधारित होने लगा। विद्यार्थियों से नियमित शुल्क लिया गया, नियमित रूप से कक्षाएँ चलने लगीं। जो पाठशाला अंग्रेजी नियमों को नहीं मानती थी उन्हें अनुदान से वंचित कर दिया गया ।
राष्ट्रीय शिक्षा की कार्यसूची:-कुछ भारतीयों का भी मानना था कि पश्चिमी शिक्षा भारत का आधुनिकीकरण कर सकती है। जबकि महात्मा गाँधी का मानना था कि-“अंग्रेजी शिक्षा ने हमें गुलाम बना दिया है।” गाँधी एक ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो भारतीयों के भीतर प्रतिष्ठा और स्वाभिमान का भाव पुनर्जीवित करें। उनकी मान्यता थी कि भारत में शिक्षा केवल भारतीय भाषाओं में ही दी जानी चाहिए । गाँधीजी के अनुसार अंग्रेजी शिक्षा पाठ्यपुस्तकों पर तो जोर देती है लेकिन जीवन के अनुभवों और व्यावहारिक ज्ञान की उपेक्षा करती है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1901 में अपना स्कूल ‘शांति निकेतन’ शुरू किया था। उनके अनुसार स्कूल मुक्त और रचनाशील होने चाहिए, जहाँ वे अपने विचारों और आकांक्षाओं को समझ सकें।
वह अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गई शिक्षा व्यवस्था के कड़े और बंधनकारी अनुशासन से उसे मुक्त करना चाहते थे । शिक्षक कल्पनाशील हों, बच्चों को समझते हों और उनके अंदर उत्सुकता, जानने की चाह विकसित करने में मदद दें। टैगोर के मुताबिक, वर्तमान स्कूल बच्चों की रचनाशीलता, कल्पनाशील होने के उसके स्वाभाविक गुण को मार देते हैं।
कुछ भारतीय विचारक शिक्षा की एक वैकल्पिक व्यवस्था चाहते थे ताकि लोगों को सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय संस्कृति की शिक्षा दी जा सके।
आधुनिक शिक्षा और बिहार:-शिक्षा के क्षेत्र में किये जा रहे सारे प्रयास सबसे पहले बंगाल में हुए। 1911 ई. तक बिहार, बंगाल का ही हिस्सा था इसलिए वहाँ जो कुछ भी हो रहा था उससे बिहार अलग नहीं रहा। 1835 ई० में शुरू हुई नई शिक्षा नीति के बाद बिहार में भी आधुनिक शिक्षा का ढाँचा विकसित होने लगा । कई स्कूल और कॉलेज खोले गये । अंग्रेजों द्वारा भी और जमींदारों व अन्य बड़े परिवारों द्वारा भी। ईसाई धर्मप्रचारकों ने भारत के साथ-साथ बिहार के कई हिस्सों में स्कूलों को स्थापित कर आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया गया। ईसाईयों ने सबसे पहले बेतिया फिर पटना और दानापुर में शिक्षा का कार्य आरंभ किया। उनके द्वारा स्थापित पटना स्थित संत जोसेफ कॉन्वेन्ट स्कूल (1853) एवं संत माइकल स्कूल (1854) आज भी बिहार के गिने-चुने अच्छे स्कूलों में आते हैं। इन स्कूलों का आधुनिक शिक्षा के प्रसार में काफी बड़ा योगदान है। वर्तमान भारत के शैक्षणिक ढांचे की पृष्ठभूमि अंग्रेजों द्वारा स्थापित अंग्रेजों की आधुनिक शिक्षा ही रही।
पाठ के अन्दर आए प्रश्नों के उत्तर
1. मदरसा से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर—अरबी भाषा में जहाँ सिखाया-पढ़ाया जाता है, उस स्थान को मदरसा कहा जाता है। यह स्कूल, कॉलेज के समान संस्था हो सकती है जहाँ बच्चे पढ़ते हैं।
2. गतिविधि-जोन्स प्राचीन भारतीय ग्रंथों को पढ़ना जरूरी क्यों समझते थे – सोचें?
उत्तर-विलियम जोन्स मानते थे कि प्राचीन काल में भारत अपने वैभव के शिखर पर था। वे भारत के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखते थे। उनका मानना था कि अगर भारत की श्रेष्ठता को जानना है तो भारतीय ग्रंथों को पढ़ना जरूरी है।
3. गतिविधि-कल्पना करें, अंग्रेज भारतीय लोगों के मानस को अपने अनुसार क्यों ढालना चाहते थे?
उत्तर-अंग्रेज भारत में शासन करने के लिए अपनी शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई भारतीयों को अपनी सेवा में लेना चाहते थे। इसके लिए जरूरी था कि ये भारतीय अंग्रेजी भाषा के जानकार हों और यूरोपीय भारतीयों को हीन समझें और यूरोपीयों को श्रेष्ठ । इसी कारण, अंग्रेज भारतीय लोगों के मानस को अपने अनुसार ढालना चाहते थे।
अभ्यास
आइए फिर से याद करें-
1. सही विकल्प को चुनें।
(i) विलियम जोंस भारतीय इतिहास, दर्शन और कानून के अध्ययन को क्यों जरूरी मानते थे?
(क) भारत में बेहतर अंग्रेजी शासन स्थापित करने के लिए
(ख) प्राचीन भारतीय पुस्तकों के अनुवाद (अंग्रेजी में) के लिए
(ग) अपने भारत प्रेम के कारण ।
(घ) भारतीय ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने लिए।
(ii) आधुनिक शिक्षा की भाषा किसको बनाया गया ?
(क) हिन्दी
(ख) बांगला
(ग) अंग्रेजी
(घ) मराठी
(iii) एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना किसने की?
(क) मैकाले
(ख) विलियम जोंस
(ग) कोलब्रुक
(घ) वारेन हेस्टिंग्स
(iv) औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के मस्तिष्क में हीनता का बोध पैदा कर दिया ? गाँधीजी ऐसा क्यों मानते थे?
(क) भारतीयों द्वारा पश्चिमी सभ्यता को श्रेष्ठ मानने के कारण
(ख) अंग्रेजी भाषा में शिक्षा के कारण
(ग) पाठ्य पुस्तकों पर शिक्षा को केन्द्रित करने के कारण
(घ) भारतीयों का अंग्रेजी शासन के समर्थन करने के कारण
उत्तर-(i) (ग), (ii) (ग), (iii) (ख), (iv) (क)।

2. निम्नलिखित के जोड़े बनाएँ-
(क) विलियम जोंस                            (क) अंग्रेजी शिक्षा को प्रोत्साहन
(ख) रवीन्द्रनाथ टैगोर                      (ख) प्राचीन  संस्कृतियोंकासम्मान।
(ग) टॉमस मेकॉले                           (ग) गुरु।
(घ) महात्मा गाँधी                           ( घ)  प्राकृतिक परिवेश में शिक्षा।
(ङ) पाठशालाएँ                             (ङ)   अंग्रेजी शिक्षा के विरुद्ध ।

उत्तर-(क) विलियम जोंस               (ख) प्राचीन संस्कृतियों का सम्मान ।
(ख) रवीन्द्रनाथ टैगोर                      (घ)  प्राकृतिक परिवेश में शिक्षा ।
(ग) टॉमस मेकॉले                            (क)  अंग्रेजी शिक्षा को प्रोत्साहन।
(घ) महात्मा गाँधी                            (ङ)    अंग्रेजी शिक्षा के विरुद्ध ।
(ङ) पाठशालाएँ                               (ग)   गुरु।
आइए विचार करें :
(i) भारत के विषय में विलियम जोंस के विचार कैसे थे? संक्षेप में बताएँ।
उत्तर-विलियम जोन्स भारत के प्रति आदर और सम्मान का भाव अपने मन में रखते थे। वे मानते थे कि प्राचीन काल में भारत का वैभव शिखर पर था । वे मानते थे कि अगर भारत की श्रेष्ठता को जानना है तो उस समय लिखे जाने वाले महान् भारतीय ग्रन्थों जैसे वेद, उपनिषद्, स्मृति, धर्म-सूत्र को पढ़ना जरूरी है। उनका मानना था कि अगर भारत में एक बेहतर अंग्रेजी शासन कायम करना है तो इन भारतीय ग्रंथों को पढ़ना और समझना आवश्यक होगा।
(ii) टॉमस मेकॉले भारत में किस प्रकार की शिक्षा शुरू करना चाहते थे, इस सम्बन्ध में उनके क्या विचार थे?
उत्तर-टॉमस मेकाले भारत में अंग्रेजी शिक्षा शुरू करना चाहते थे। उनका मानना था कि भारतीय शास्त्र अवैज्ञानिक और गलत सूचनाओं से भरे पड़े हैं। इसलिए पुरातन भारतीय शिक्षा पर इंग्लैंड का पैसा खर्च करना अनुचित है। उनका मानना था कि भारतीयों को व्यावहारिक जीवन की शिक्षा देनी चाहिए। उन्हें यह बताना आवश्यक है कि इंग्लैंड एवं अन्य यूरोपीय देश किस प्रकार एवं तकनीकी शिक्षा का प्रसार रत में भी जरूरी है जो अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से ही मिल सकती है।
(iii) भारत में अंग्रेजी शिक्षा का उद्देश्य क्या था? उसका स्वरूप कैसा था?
उत्तर-1813 तक भारत में अंग्रेजी शासन का क्षेत्र काफी फैल चुका था। इस बड़े क्षेत्र पर शासन संचालन के लिए कर्मचारियों की एक बड़ी संख्या की आवश्यकता थी। इतने लोग इंगलैंड से नहीं आ सकते थे। सरकार को भारत में ही कर्मचारियों को तैयार करना था। अत: शासन के लायक काम के लिए उन्हें शिक्षित करना आवश्यक था। यह भारत में अभी तक प्रचलित शिक्षा से पूरा नहीं हो सकता था। इस बात ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नया करने को अंग्रेजी सरकार को बाध्य किया । अत: अंग्रेजों ने अपने लिए कर्मचारियों की फौज खड़ी करने के लिए भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार करने के उद्देश्य से शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करना शुरू किया।
(iv) शिक्षा के विषय में महात्मा गाँधी एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों को बताएँ।
उत्तर-महात्मा गाँधी एक ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो भारतीयों के भीतर प्रतिष्ठा और स्वाभिमान का भाव पुनर्जीवित करें। उनकी दृढ़ मान्यता थी भारत में शिक्षा केवल भारतीय भाषाओं में ही दी जानी चाहिए। उनके मुताबिक, अंग्रेजी में दी जा रही शिक्षा भारतीयों को अपाहिज बना देती है, अपने सामाजिक परिवेश से काट देती है और उन्हें “अपनी ही भूमि पर अजनबी” बना दे रही है। उनकी राय में, विदेशी भाषा बोलने वाले, स्थानीय संस्कृति से घृणा करने वाले अंग्रेजी शिक्षित भारतीय अपनी जनता से जुड़ने के तौर-तरीके भूल चुके हैं। उनका मानना था कि शिक्षा मौखिक भी हो, जीवन के अनुभवों और व्यावहारिक ज्ञान भी हो । शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का मस्तिष्क एवं आत्मविकास होना चाहिए। केवल साक्षरता ही शिक्षा नहीं होती। हाथ से काम करना सीखना और हुनर भी सीखना जरूरी है, तभी मस्तिष्क और समझने की क्षमता, दोनों विकसित होंगे। टैगोर का मानना था कि स्कूल मुक्त और रचनाशील हों, जहाँ विद्यार्थी अपने विचारों और आकांक्षाओं को समझ सकें। टैगोर का मानना था कि सृजनात्मक शिक्षा को केवल प्राकृतिक परिवेश में ही प्रोत्साहित किया जा सकता है।
टैगोर को लगता था कि बचपन का समय अपने-आप सीखने का समय होना चाहिए। वह अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गई शिक्षा व्यवस्था के कड़े और बंधनकारी अनुशासन से उसे मुक्त करना चाहते थे। उनका मानना था कि शिक्षक कल्पनाशील हों, बच्चों को समझाते हों और उनके अंदर उत्सुकता, जानने की चाह विकसित करने में मदद करें। टैगोर के मुताबिक, वर्तमान स्कूल के बच्चे की रचनाशीलता, कल्पनाशील होने के उसके स्वाभाविक गुण को मार देते हैं।
गाँधीजी पश्चिमी सभ्यता और मशीनों व प्रौद्योगिकी की उपासना के कट्टर आलोचक थे। टैगोर आधुनिक पश्चिमी सभ्यता और भारतीय परंपरा के श्रेष्ठ तत्वों का सम्मिश्रण चाहते थे। उन्होंने शांति निकेतन में कला, संगीत और नृत्य के साथ-साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शिक्षा पर भी जोर दिया।
(v) अंग्रेज विद्वानों के बीच शिक्षा नीति के विषय में किस प्रकार के विवाद थे। इस सम्बन्ध में आप क्या सोचते हैं। बताएँ।
उत्तर-1813 में ब्रिटिश संसद ने एक कानून बनाकर भारत में शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिवर्ष एक लाख रुपए खर्च करने का निर्देश दिया । शिक्षा के क्षेत्र में खर्च करने के लिए पैसा तो मिल गया पर अब विवाद उठा कि इस पैसे को किस रूप में खर्च किया जाए। विलियम जोन्स जैसे कुछ अन्य अंग्रेज विद्वानों का मानना था कि इस पैसे को भारतीय विद्या और ज्ञान के प्रसार में खर्च करना चाहिए। इनका कहना था कि भारतीयों को उनकी भाषा में ही पढ़ाया जाए इससे कर्मचारियों की आपूर्ति भी हो जाएगी साथ ही भारत की परम्परा को भी अंग्रेजों को जानने में सहायता मिलेगी। जबकि जेम्स मिल और मैकॉले जैसे अंग्रेज विद्वानों का मत था कि भारतीयों को अंग्रेजी में शिक्षा देकर उनके मानस को यूरोपीय सांचे में ढालने की शुरुआत करनी चाहिए। इससे अंग्रेजों को भारत में दक्ष अनगिनत भारतीय कर्मचारी मिल जाएंगे।

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