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bihar board 11 class geography | प्राकृतिक आपदाएँ और संकट

bihar board 11 class geography | प्राकृतिक आपदाएँ और संकट

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bihar board 11 class geography | प्राकृतिक आपदाएँ और संकट

प्राकृतिक आपदाएँ और संकट
(NATURAL HAZARDS AND DISASTERS)
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उसके आदर्श उत्तर
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न :
(i) इनमें से भारत के किस राज्य में बाढ़ अधिक आती है?
(क) बिहार
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) असम
(घ) उत्तर प्रदेश
उत्तर-(ग)
(ii) उत्तरांचल के किस जिले में मालपा भूस्खलन आपदा घटित हुई थी?
(क) बागेश्वर
(ख) चंपावत
(ग) अल्मोड़ा
(घ) पिथौरागढ़
उत्तर-(घ)
(iii) इनमें से कौन-से राज्य में सर्दी के महीनों में बाढ़ आती है?
(क) असम
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर-(घ)
(iv) इनमें से किस नदी में मजौली नदीय द्वीप स्थित है?
(क) गंगा
(ख) ब्रह्मपुत्र
(ग) गोदावरी
(घ) सिंधु
उत्तर-(ख)
(v) बर्फानी तूफान किस तरह की प्राकृतिक आपदा है?
(क) वायुमंडलीय
(ख) जलीय
(ग) भौमिकी
(घ) जीवमंडलीय
उत्तर-(क)
(vi) निम्नलिखित में से कौन से भारतीय क्षेत्रों में भूकम्प के आने की संभावना सर्वाधिक होती है?
(क) उत्तर-पूर्वी राज्य
(ख) दक्कन का पठार
(ग) कोरामण्डल तट
(घ) गंगा का मैदान
उत्तर-(क)
2. निम्नलिखित प्रश्नों के लगभग 30 शब्दों में उत्तर दें-
(i) संकट किस दशा में आपदा बन जाती है?
उत्तर- प्राकृतिक संकट या मानव निर्मित संकट द्वारा जब धन-जन दोनों को नुकसान पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है तब वह संकट आपदा बन जाती है।
(ii) हिमालय और भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अधिक भूकंप क्यों आते हैं?
उत्तर-इंडियन प्लेट प्रतिवर्ष उत्तर-पूर्व दिशा में एक सेंटीमीटर खिसक रही है। लेकिन उत्तर में स्थित यूरेशियन प्लेट इसके लिए अवरोध पैदा करती है। परिणाम स्वरूप इन प्लेटों के किनारे लॉक हो जाते हैं। ऊर्जा संग्रह से तनाव बढ़ता है प्लेटों के लॉक टूट जाते हैं और भूकम्प आ जाता है।
(ii) उष्ण कटिबंधीय तूफान की उत्पत्ति के लिए कौन-सी परिस्थितियाँ अनुकूल हैं?
उत्तर-उष्ण कटिबंधीय तूफान की उत्पत्ति के लिए कम दबाव वाले उग्र मौसम तंत्र जो 30° उत्तर तथा 30° दक्षिण अक्षांशों के बीच पाए जाते हैं। तीव्र कोरियोलिस बल, क्षोभ मण्डल में अस्थिरता, तथा मजबूत ऊर्ध्वाधर वायु फान (wedge) की अनुपस्थिति आदि स्थितियाँ अनुकूल हैं।
(iv) पूर्वी भारत की बाढ, पश्चिमी भारत की बाढ़ से अलग कैसे होती है?
उत्तर-पूर्वी भारत की बाढ अंधाधुंध वन कटाव तथा प्राकृतिक अपवाह तंत्रों के अवरुद्ध होने तथा बाढकृत मैदानों पर मानवन बसाव के कारण आती है जबकि राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और पंजाब आदि में मानसूनी वर्षा तथा मानवीय क्रियाकलापों के द्वारा बाढ़ आती है।
(v) पश्चिमी और मध्य भारत में सूखे ज्यादा क्यों पड़ते हैं?
उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत में कम वर्षा होती है जिसके कारण भूतल पर जल की कमी हो जाती है। कम वर्षा, अत्यधिक वाष्पीकरण और जलाशयों तथा भूमिगत जल के अत्यधिक प्रयोग से सूखे की स्थिति पैदा होती है।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दें-
(i) भारत में भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करें और इस आपदा के निवारण कुछ उपाय बताएं।
उत्तर-ज्यादा अस्थिर हिमालय की युवा पर्वत श्रृंखलाएँ, अंडमान और निकोबार, पश्चिमी घाट और नीलगिरी में अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, भूकंप प्रभावी क्षेत्र और अत्यधिक मानव क्रियाकलापों वाले क्षेत्र, जिसमें सड़क और बाँध निर्माण इत्यादि आते हैं, अत्यधिक भूस्खलन सुभेद्यता क्षेत्रों में रखे जाते हैं। हिमालय क्षेत्र के सारे राज्य और उत्तर-पूर्वी भाग (असम को छोड़कर) इस क्षेत्र में शामिल हैं।
पार हिमालय के कम वृष्टिवाले क्षेत्र लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में स्पिति, अरावली पहाड़ियों में कम वर्षा वाला क्षेत्र, पश्चिमी व पूर्वी घाट के व दक्कन पठार के वृष्टिछाया क्षेत्र ऐसे इलाके हैं, जहाँ कभी-कभी भूस्खलन होता है। इसके अतिरिक्त झारखण्ड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आँध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और केरल में खादानों और भूमि धंसने से भूस्खलन होता रहता है। राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल (दार्जलिंग जिले को छोड़कर), असम (कार्बी अनलोंग को छोड़कर) और दक्षिण प्रान्तों के तटीय क्षेत्र भूस्खलन युक्त हैं।
भूस्खलन आपदा के निवारण के कुछ उपाय-भूस्खलन से निपटने के लिए
अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग उपाय होने चाहिए। अधिक भू-स्खलन संभावी क्षेत्रों में सड़क और बड़े बाँध बनाने जैसे निर्माण कार्य तथा विकास कार्य पर प्रतिबंध होना चाहिए।
इन क्षेत्रों में कृषि नदी घाटी तथा कम ढाल वाले क्षेत्रों तक सीमित होनी चाहिए तथा बड़ी विकास परियोजनाओं पर नियंत्रण होना चाहिए। सकारात्मक कार्य जैसे-बृहत् स्तर पर वनीकरण को बढ़ावा और जल बहाव को कम करने के लिए बाँध का निर्माण भू-स्खलन के उपायों के पूरक है। स्थानातरी कृषि वाले उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि की जानी चाहिए।
(ii) सुभेद्यता क्या है? सूखे के आधार पर भारत को प्राकृतिक आपदा भेद्यता क्षेत्रों में विभाजित करें और इसके निवारण के उपाय बताएँ।
उत्तर- अधिक अस्थिर हिमालय की युवा पर्वत शृंखलाएँ, अंडमान और निकोबार, पश्चिमी घाट और नीलगिरी में अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, भूकंप प्रभावी क्षेत्र और अत्यधिक मानव क्रियाकलापों वाले क्षेत्र जिसमें सड़क और बाँध निर्माण इत्यादि आते हैं, अत्यधिक भूस्खलन सुभेद्यता क्षेत्रों में रखे जाते हैं। सूखा एक जटिल परिघटना है जिसमें कई प्रकार के मौसम विज्ञान संबंधी तथा अन्य तत्त्व, जैसे-वृष्टि, वाष्पीकरण, वाष्पोत्सर्जन, भौम जल, मृदा में नमी, जल भंडारण व भरण कृषि पद्धतियाँ, विशेषतः उगाई जाने वाली फसलें, सामाजिक-आर्थिक गतिविधियाँ पारिस्थितिकी शामिल हैं।
भारत में सूखाग्रस्त क्षेत्र—भारतीय जलवायु तंत्र में सूखा और बाढ़ महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। कुछ अनुमानों के अनुसार भारत में कुल भौगोलिक क्षेत्र का 19 प्रतिशत भाग और जनसंख्या का 12 प्रतिशत हिस्सा हर वर्ष सूखे से प्रभावित होता है। देश का लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र सूखे से प्रभावित हो सकता है 5 करोड़ लोग इससे प्रभावित हो सकते हैं। सूखे की तीव्रता के आधार पर भारत को निम्नलिखित क्षेत्रों में बाँटा गया है
अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र-राजस्थान में अधिकतर भाग, विशेषकर अरावली के पश्चिम में स्थित मरुस्थल और गुजरात का कच्छ क्षेत्र अत्यधिक सूखा प्रभावित है। इसमें राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर जिले भी शामिल हैं, जहाँ 90 मिलीलीटर से कम वार्षिक औसत वर्षा होती है।
अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र-इसमें राजस्थान के पूर्वी भाग, मध्य प्रदेश के अधिकतरबभाग, महाराष्ट्र के पूर्वी भाग, आंध्र प्रदेश के अदरुनी भाग, कर्नाटक का पठार, तमिलनाडु का उत्तरी भाग, झारखंड का दक्षिणी भाग और उड़ीसा का आंतरिक भाग शामिल है।
मध्यम सूखा प्रभावित क्षेत्र-राजस्थान के उत्तरी भाग, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के दक्षिणी जिले, गुजरात के बचे हुए जिले, कोंकण को छोड़कर महाराष्ट्र, झारखंड, तमिलनाडु में कोयंबटूर पठार और आंतरिक कर्नाटक शामिल हैं।
निवारण के उपाय-सूखे की स्थिति में तात्कालिक सहायता में सुरक्षित पेयजल वितरण, दवाइयाँ, पशुओं के लिए चारे और जल की उपलब्धता तथा लोगों और पशुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुंचना शामिल है। दीर्घकालिक योजनाओं में विभिन्न कदम उठाए जा सकते हैं, जैसे-भूमिगत जल के भण्डारण का पता लगाना, जल अधिक्य क्षेत्रों से अल्पजल
क्षेत्रों में पानी पहुंचना, नदियों को जोड़ना और बांध व जलाशयों का निर्माण इत्यादि। द्रोणियों की पहचान तथा भूमिगत जल भण्डारण की संभावना का पता लगाने के लिए सुदूर संवेदन और उपग्रहों से प्राप्त चित्रों का प्रयोग करना। सूखा प्रतिरोधी फसलों के बारे में प्रचार-प्रसार।
वर्षा जल सलवन (Rain water harvesting) सूखे का प्रभाव कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
(iii) किस स्थिति में विकास कार्य आपदा का कारण बन सकता है?
उत्तर-तकनीकी विकास ने मानव को, पर्यावरण को प्रभावित करने की बहुत क्षमता प्रदान कर दी है। परिणामतः मनुष्य ने आपदा के खतरे वाले क्षेत्रों में गहन क्रियाकलाप शुरू कर दिया है और इस प्रकार आपदाओं की सुभेद्यता को बढ़ा दिया है। अधिकांश नदियों में, बाढ़-मैदानों में भू-उपयोग तथा भूमि की कीमतों के कारण तथा तटों पर बड़े नगरों एवं बंदरगाहों, जैसे-मुंबई तथा चेन्नई आदि के विकास ने इन क्षेत्रों को चक्रवातों, प्रभंजनों तथा सुनामी आदि के लिए सुभेद्य बना दिया है।
देश की आर्थिक उन्नति के लिए औद्योगिक और परमाणु विकास कभी-कभी आपदा का कारण बन जाता है। किसी जहरीली गैस का रिसाव (उदाहरण भोपाल गैस कांड में हजारों लोगों की मौत, हजारों अपंग एवं बीमार), बाँध जलाशयों का निर्माण कार्य, आग तथा विस्फोट आदि हजारों लोगों की जान ले सकते हैं और लोगों को प्रभावित कर सकते हैं।
परियोजना/क्रियाकलाप
नीचे दिए गए विषयों पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करें-
(i) मालपा भूस्खलन,
(ii) सुनामी,
(iii) उड़ीसा चक्रवात और गुजरात चक्रवात,
(iv) नदियों को आपस में जोड़ना,
(v) टिहरी बाँध या सरदार सरोवर बाँध,
(vi) भुज/लातूर भूकंप,
(vii) डेल्टा या नदीय द्वीप में जीवन,
(viii) छत वर्षा जल संचयन का मॉडल तैयार करें।
उत्तर- -इस अध्याय को ध्यान से पढ़ें और अपने अध्यापक की मदद से या किसी अन्य पाठ्य-पुस्तक या अपने कक्षा की पाठ्य-पुस्तक से जानकारियाँ इकट्ठी करके इस परियोजना की रिपोर्ट तैयार करें। लगभग सभी जानकारियाँ आपको पाठ्य-पुस्तक में ही मिल जायेंगी।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उसके आदर्श उत्तर
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
1. भारत में प्रभाव डालने वाले प्राकृतिक आपदाओं के नाम लिखें।
उत्तर-बाढ़, सूखा, भूकम्प तथा भू-स्खलन।
2. प्राकृतिक आपदाओं का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर-आकस्मिक भूगर्भिक हलचलें।
3. वर्तमान समय में भारत में आये विनाशकारी भूचाल का नाम लिखें।
उत्तर-भुज, गुजरात-26 जनवरी, 2001.
4. विभिन्न भूकम्पीय तरंगों के नाम लिखें।
उत्तर-P-Waves,S-Waves, L-Waves.
5. भूकम्पमापक यन्त्र को क्या कहते हैं?
उत्तर-सिज्मोग्राफ।
6. भूकम्प की तीव्रता किस पैमाने पर मापी जाती है?
उत्तर-रिक्टर पैमाने पर।
7. लाटूर भूकम्प (महाराष्ट्र) का क्या कारण था?
उतार-भारतीय प्लेट का उत्तर की ओर खिसकना।
8. भूकम्प किस सिद्धान्त से सम्बन्धित है?
उत्तर-प्लेट टेक्टानिक।
9. रिक्टर पैमाने पर कितने विभाग होते हैं?
उत्तर-1-9 तक।
10. कोएना भूकम्प का क्या कारण था?
उत्तर-कोएना जलाशय में अत्यधिक जलदाब।
11. सूखा किसे कहते हैं?
उत्तर- वर्षा की कमी के कारण खाद्यान्नों की कमी होना।
12. भारत में सूखे का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर-अनिश्चित वर्षा।
13. भारत में कितना क्षेत्रफल भाग बाढ़ों तथा सूखे से प्रभावित है?
उत्तर-सूखे से 10% भाग तथा बाढ़ों से 12% भाग।
14. भारत में बाढ़ों का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर-भारी मानसून वर्षा तथा चक्रवात।
15. दक्षिणी प्रायद्वीप में बाढ़ कम आती हैं। क्यों?
उत्तर-मौसमी नदियों के कारण।
16. भू-स्खलन किसे कहते हैं?
उत्तर-जब कोई जलभृत भाग किसी ढलान से अचानक नीचे गिरती हैं।
17. तीन प्रदेशों के नाम लिखो जो चक्रवातों से प्रभावित हैं।
उत्तर-उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु।
18. प्राकृतिक आपदायें किसे कहते हैं?
उत्तर-पृथ्वी के धरातल पर आन्तरिक हलचलों द्वारा अनेक परिवर्तन होते रहते हैं। इनसे मानव पर हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं। इन्हें प्राकृतिक आपदायें कहते हैं।
19. कुछ सामान्य आपदाओं के नाम बताएँ।
उत्तर-सामान्य आपदाएं इस प्रकार है-ज्वालामुखी विस्फोट, भूकम्प, सागरकम्प, सूखा, बाढ़, चक्रवात, मृदा अपरदन, अपवाहन, पंकप्रवाह, हिमधाव।
20. संकट किसे कहते हैं?
उत्तर-अंग्रेजी भाषा में प्राकृतिक आपदाओं को प्राकृतिक संकट भी कहा जाता है। फ्रेंच भाषा में डेस (Des) का अर्थ बुरा (Bad) तथा (Aster) का अर्थ सितारे (Stars) से है। मानवीय जीवन और अर्थव्यवस्था को भारी हानि पहुंचाने वाली प्राकृतिक आपदाओं को संकट और महाविपत्ति कहते हैं।
21. भूकम्प का परिणाम क्या होता है?
उत्तर-भूकम्प की शक्ति को रिक्टर पैमाने पर मापा जाता है जिसे परिमाण कहते हैं। यह भूकम्प द्वारा विकसित भूकम्पीय ऊर्जा की माप होती है।
22. भूकम्प की तीव्रता किसे कहते हैं?
भूकम्प द्वारा होने वाली हानि की माप को तीव्रता कहते हैं।
23. भारत के अधिक तथा अत्यधिक भूकम्पीय खतरे वाले क्षेत्रों के नाम बताएँ। भूकम्प की दृष्टि से भारत के अत्यधिक खतरे वाले क्षेत्रों के नाम है-हिमालय पर्वत, उत्तरपूर्वी भारत, कच्छ रत्नागिरी के आस-पास का पश्चिमी तटीय तथा अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह। अधिक खतरे वाले क्षेत्र है-गंगा का मैदान, पश्चिमी राजस्थान।
24. चक्रवात की उत्पत्ति के लिए आधारभूत आवश्यकताएंँ कौन-सी है?
उत्तर-जब कमजोर रूप से विकसित कम दबाव क्षेत्र के चारो और तापमान की क्षैतिज प्रवणता बहुत अधिक होती है तब उष्ण कटिन्धीय चक्रवात बन सकता है। चक्रवात उष्मा का इंजन है तथा इसे सागरीय तल से ऊष्मा मिलती है।
25. चक्रवात की गति और सामान्य अवधि कितनी होती है?
उत्तर-चक्रवात की गति 150km प्रति घटा तथा अवधि एक सप्ताह तक होती है।
26. भारत के बाढ़ प्रवण क्षेत्रों के नाम बताएं।
उत्तर-(i) गंगा बेसिन, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिमी बगाल, (ii) आसाम में ब्रह्मपुत्र घाटी, (iii) उड़ीसा प्रदेश।
27. भू-स्खलन किसे कहते हैं?
उत्तर-आधार शैलों का भारी मात्रा में तेजी से खिसकना भू-स्खलन कहलाता है। तीव्र पर्वतीय ढलानों पर भूकम्प के कारण अचानक शैलें खिसक जाती है।
28. आपदा प्रबन्धन किसे कहते हैं?
उत्तर-आपदाओं को सुरक्षा के उपाय, तैयारी तथा प्रभाव को कम करने की क्रिया को आपदा प्रबन्धन कहते हैं। इसमें राहत कार्यों की व्यवस्था भी शामिल की जाती है।
                           लघु उत्तरीय प्रश्न
1. प्रमुख प्राकृतिक आपदाएंँ कौन-सी है?
उत्तर-प्राकृतिक आपदाएंँ वे भूगर्भिक हलचलें है जो अचानक ही भू-तल पर परिवर्तन लाकर जन, धन व सम्पत्ति की हानि करती है। सूखा, बाद, चक्रवात, भू-स्खलन,भूकम्प  विभिन्न प्रकार की मुख्य प्राकृतिक आपदाए हैं।
2. प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली जन-धन की हानि का वर्णन करो।
उत्तर-विश्व में प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओ से एक लाख व्यक्तियों की जाने जाती है तथा 20,000 करोड़ रुपये की सम्पत्ति की हानि होती है। यह मानवीय विकास के लिए
रुकावट है। U.N.O. के अनुसार 1990-99 के दशक को प्राकृतिक आपदाओ से सुरक्षा का दशक घोषित किया गया। प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त विश्व के प्रमुख 10 देशों में से भारत एक देश है। प्रति वर्ष 6 करोड़ लोग इनसे प्रभावित होते है। विश्व की 50% प्राकृतिक आपदाएं भारत में अनुभव की जाती है। फिर भी भारत में इन आपदाओं से सुरक्षा के लिए
एक व्यापक प्रबन्ध किया गया है जिसमें भूकम्पीय स्टेशन, चक्रवात, बाद, रडार, जल प्रवाह के बारे सूचानाएं प्राप्त की जाती है तथा सुरक्षा के प्रबन्ध किए जाते है।
3. भू-स्खलन से क्या अभिप्राय है? इनके प्रभाव बताओ।
उत्तर-भू-स्खलन (Landslides)-भूमि के किसी भाग के अचानक फिसल कर पहाड़ी से नीचे गिर जाने की क्रिया को भू-स्खलन कहते है। कई बार भूमिगत जल चट्टानों में भर कर उनका भार बढ़ा देता है। यह जल मूल चट्टानी दलान के साथ नीचे फिसल जाती है। इनके कई प्रकार होते हैं।
(i) स्लम्प (Slumps)-जब चट्टाने थोड़ी दूरी से गिरती है।
(ii) रॉक स्लाइड (Rockslide)-जब चट्टानें अधिक दूरी से अधिक भाग में गिरती है।
(iii) रॉक फाल (Rockfalm-जब किसी मूल से चट्टानें टूट कर गिरती है।
कारण (Causes)-
(i) जब वर्षा का जल या पिघलती हिम एक स्नेहक (Lubricant) के रूप में कार्य करता है।
(ii) तीव्र ढलान के कारण।
(iii) भूकम्प के कारण।
(iv) किसी सहारे के हट जाने पर।
(v) भ्रंशन या खदानों के कारण।
(vi) ज्वालामुखी विस्फोट के कारण।
प्रभाव (Effects)-
(i) भवन, सड़कें, पुल आदि का नष्ट होना।
(ii) चट्टानों के नीचे दबकर लोगों की मृत्यु हो जाना।
(iii) सड़क मार्गों का अवरुद्ध हो जाना।
(iv) नदियों के मार्ग अवरुद्ध होने से बाद आना।
(v) 1957 में कश्मीर में भू-स्खलन से राष्ट्रीय मार्ग बन्द हो गया था।
(vi) गत वर्ष में टेहरी-गढ़वाल में बादल फटने से भूस्खलन हुआ।
4. भारत में उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों पर नोट लिखें।
उत्तर-चक्रवात (Cyclones)-भारत में उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात खाड़ी बंगाल तथा अरब सागर में उत्पन्न होते हैं। चक्रवात पवनों का एक भंवर होता है जो मूसलाधार वर्षा प्रदान करता है। ये प्रायः अक्टूबर-नवम्बर के महीनों में चलते है। इनकी दिशा परिवर्तनशील होती है। ये प्रायः पश्चिम की ओर तथा उत्तर-पश्चिम, उत्तर पूर्व की ओर चलते हैं। इनका
प्रभाव तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा के तटों पर होता है।
प्रभाव (Effects)-(i) ये चक्रवात मूसलाधार वर्षा, तेज पवनें तथा घने मेघ लाते हैं। औसत रूप से 50 सेमी वर्षा एक दिन में होती है। (ii) ये चक्रवात जन-धन की हानि व्यापक रूप से करते है। (iii) खाड़ी बगाल में निम्न वायु दाब केन्द्र बनने से ये चक्रवात उत्पन्न करते हैं। (iv) ये चक्रवात एक दिन में पूर्वी तट से गुजर कर प्रायद्वीप को पार करके पश्चिमी
तट पर पहुंँच जाते है। (v) गोदावरी, कृष्णा, काबेरी डेल्टाओं में भारी हानि होती है।
(vi) सुन्दरवन डेल्टा तथा बंगला देश में भी भारी हानि होती है।
5. आपदाएंँ एवं संकट में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-आपदाएँ एवं संकट में अंतर-
                                      आपदाएं
(i) जिन प्राकृतिक परिवर्तनों का मानव जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ता है, वह
आपदाएँ कहलाती है।
(ii) यह एक आशंका है।
(iii) इसमें ऐसा कुछ नहीं है।
(iv) मृदा अपरदन, अपवाहन, हिमछाप, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट आदि।
                                        संकट
(i) अल्पावधि में होने वाली ऐसी घटना जो देश की या मानव जीवन की
अर्थव्यवस्था को भारी हानि पहुँचाती है।
(ii) यह एक घटना है।
(iii) यह त्रासदी या आपदा का परिणाम है।
(iv) इसके उदाहरण हैं उदाहरण हैं फसलों की महामारियाँ, टिड्डी दल का आक्रमण, औद्योगिक घटना आदि।
6. शुष्कता और सूखा में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-शुष्कता और सूखा में अंतर-
                                      शुष्कता
(i) शुष्कता एक स्थायी दशा है जो कि मानसून की विफलता के कारण मृदा की नमी में हमेशा बनी रहती है।
(ii) शुष्क व अर्ध-शुष्क सूखा प्रवाह होते है।
                                        सूखा
(i) सूखा एक अस्थायी दशा है जो मानसून का देर से या जल्दी या बिना
वर्षा किए वापस लौट जाने से जो स्थिति रहती है वह सूखा है।
(ii) इसमें ऐसा कुछ भी नहीं होता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. भारत में बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का वर्णन करो। वाढ़ों के कारणों का उल्लेख करते हुए इनसे होने वाली क्षति का वर्णन करो। बाढ़ नियन्त्रण के उपाए बताओ।
उत्तर-बाढ़ समस्या (Flood Problem)-सूखे की भान्ति बाढ़ भी एक प्राकृतिक विपदा है। प्रत्येक वर्ष भारत के किसी-न-किसी भाग में बाढ़ों द्वारा विस्तृत क्षेत्रों से धन-जन की हानि होती है। कई बार देश के एक भाग में भयानक सूखे की स्थिति तो दूसरे भाग में बाढ़ की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इससे समस्या अधिक गम्भीर हो जाती है। भारत में बाढ एक मौसमी समस्या है जब मानसून की अनियमित वर्षा से नदियों में बाढ़ आ जाती है। जब नदी के किनारों के ऊपर से पानी बह कर समीपवर्ती क्षेत्रों में दूर-दूर तक फैल जाता है तो इसे बाढ़ का नाम दिया जाता है।
भारत ‘नदियों का देश है जहा अनेक छोटी-बड़ी नदियाँ बहती है। ये नदियां वर्षा ऋतु में भरपूर बहती है, परन्तु शुष्क ऋतु में इनमें बहुत कम जल होता है। निरन्तर भारी वर्षा के कारण बाढ़े उत्पन्न हाती है। वर्षा की तीव्रता तथा वर्षाकाल की अवधि अधिक होने से बाढ़ों को सहायता मिलती है। मानसून के पूर्व आरम्भ या देर तक समाप्त होने से बाढ़ उत्पन्न
होती है। ब्रह्मपुत्र नदी में मई-जून मास में बाढ़ साधारण बात है। उत्तरी भारत की नदियाँ वर्षा ऋतु में बाढ़ आती है। नर्मदा नदी में अचानक बाढ़ (Flash floods) आती है। तटीय भागों में चक्रवातो के कारण मई तथा अक्टूबर मास में भयानक बाढ़ आती है। सन् 1990 में मई
मास में आन्ध्र प्रदेश में खाड़ी बंगाल के चक्रवात से भारी क्षति हुई जिसमे लगभग 1000 व्यक्ति मर गए।
बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र (Flood Affected Areas)-भारत में मैदानी भाग में नदी घाटियों में अधिक बाढ़े आती है। देश का लगभग 1/8 भाग बाढ़ों से प्रभावित रहता है। 60 प्रतिशत बाढ़ अधिक वर्षा के कारण उत्पन्न होती है। असम, बिहार, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बंगाल राज्य स्थायी रूप से बाढ़ ग्रस्त रहते है। इन प्रदेशे में अधिक वर्षा तथा
बड़ी-बड़ी नदियों के कारण बाढ़ समस्या गम्भीर है। एक अनुमान के अनुसार देश में 78 लाख हेक्टेयर भूमि पर प्रति वर्ष बाढ़ आती है। नदी घाटियों के अनुसार बाढ़ क्षेत्रों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है-
(i) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ (The Rivers of the Himalayas)-इस भाग में गंगा तथा ब्रह्मपुत्र दो प्रमुख नदियाँ है जिनमें प्रत्येक वर्ष बाढ़ें आती है।
गंगा घाटी में यमुना, घाघरा, गंडक तथा कोसी जैसी सहायक नदियांँ शामिल है। इन नदियों में जल की मात्रा अधिक होती है। इनकी ढलान तीव्र होती है तथा इन नदियों के मार्ग में परिवर्तन होता रहता है। उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विस्तृत क्षेत्रों में बाढ़ों से भारी क्षति पहुंँचती है। देश में बाढ़ों से कुछ क्षति का 33% भाग उत्तर प्रदेश में तथा 27% भाग बिहार
में होता है। कोसी नदी को वाढ़ों के कारण “शोक की नदी” (River of Sorrow) कहा जाता है।
ब्रह्मपुत्र नदी असम, मेघालय तथा बंगलादेश में बाढ़ों से हानि पहुचती है। ब्रह्मपुत्र घाटी भारत में सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है। यहाँ अधिक वर्षा तथा रेत व मिट्टी के जमाव से बाढ़ उत्पन्न होती है। भूकम्पा के आने के कारण नदियां अपना मार्ग बदल लेती है तब बाढ़ की समस्या अधिक गम्भीर हो जाती है। दामोदर घाटी में दामोदर नदी के कारण भयंकर
बाढ़ें आती रही है। इस नदी को “बंगाल का शोक” भी कहा जाता था परन्तु दामोदर घाटी योजना के पूरा होने के बाद भी बाद समस्या कम हो गई है।
(ii) उत्तर-पश्चिमी भारत (North-Western India)-इस भाग में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश शामिल है। यहाँ झेलम, चिनाब, सतलुर
व्यास तथा रावी नदियों के कारण बाढ़ें उत्पन्न होती हैं। बरसाती नदियों में भी बाद आती है
(iii) मध्य भारत (Central India)- इस भाग में मध्य प्रदश, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश तथा उड़ीसा शामिल है। यहाँ ताप्ती, नर्मदा तथा चम्बल नदियों में कभी-कभी बाढ़े आती है।
यहांँ अधिक वर्षा के कारण बाढ़ उत्पन्न होती है।
(iv) प्रायद्वीपीय क्षेत्र (Peninsular Region)- इस क्षेत्र में महानदी. गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी, नदियों में उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों के कारण बाढ़ आती है। कई बार ज्वार-भाटा के कारण डेल्टाई क्षेत्रों में रेत और मिट्टी के जमाव से भी बाढ़ आती है।
बाड़ों के कारण (Causes of Floods)-भारत एक उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी देश है। यहाँ मानसूनी वर्षा के अधिक होने से बाढ़ की समस्या गम्भीर हो जाती है। बाढ़ निम्नलिखित
कारणों से आती है-
(i) भारी वर्षा (Heavy Rain) -किसी भाग में एक दिन में निरन्तर वर्षा की मात्रा 15 से•मी•से अधिक होने से बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
(ii) चक्रवात (Cyclones)-भारत के पूर्वी तट पर खाड़ी बंगाल के तीव्र गति के चक्रवातों से भयानक बाढ़ आती है। जैसे-मई. 1990 में आन्ध्र प्रदेश में चक्रवातों द्वारा निरन्तर वर्षा से नदी क्षेत्रों में बाढ़ उत्पन्न होने से भारी हानि हुई।
(iii) वनों की कटाई (Deforestation)-नदियों के ऊपरी भागों में वृक्षों की अंधाधुध कटाई से अचानक बाढ़ उत्पन्न हो जाती है। शिवालिक की पहाड़ियों, असम, मेघालय तथा छोटा नागपुर के पठार में वृक्षों की कटाई के कारण बाढ़ की समस्या गम्भीर है।
(iv) नदी तल का ऊंँचा उठना (Rising of the River Bed)-रेत तथा बजरी जमाव से नदी तल ऊंँचा उठ जाता है जिससे समीपवर्ती क्षेत्रों में बाढ़ का जल फैल जाता है।
(v) अपर्याप्त जल प्रवाह (Inadequate Drainage)-कई निम्न क्षेत्रों में जल प्रवाह प्रवन्ध न होने से बाढ़ उत्पन्न हो जाती है।
बाढ़ से क्षति (Damage due to Floods)-बाद से कृषि क्षेत्र में फसलों की हानि होती है। मकानों,संचार साधनों तथा रेलों,सड़कों को क्षति पहुँचती है।बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में कई बीमारियों फैल जाती है। देश में लगभग 2 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ग्रस्त क्षेत्र है जिसमें से 25 लख हेक्टेयर भूमि में फसले नष्ट हो जाती है। प्रतिवर्ष औसत रूप से 1 करोड़
जनसंख्या पर बाढ़ से क्षति का प्रभाव पड़ता है। लगभग 50 हजार पशुओं की हानि होती है। एक अनुमान है कि औसत रूप से प्रति वर्ष 505 व्यक्तियों की बाढ़ के कारण मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार देश में लगभग 1500 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति पहुंँचती है। सन्
1990 में देश में कुल क्षति 41.25 करोड़ रुपए का घी तथा 50 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ग्रस्त 162 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। 28 करोड़ रुपये की फसलें नष्ट हुई। 862 जाने गई तथा 1,22,498 पशु नष्ट हो गये।
वाढ़ से रोकथाम (Flood Control)-भारत में प्राचीन समय से ही याद की रोकथाम के लिए उपाया किए जाते है। प्रायः नदियों के साथ-साथ तटबंध बनाकर बाढ़ नियन्त्रण किया जाता था। सन् 1951 में राष्ट्रीय बाढ़ नियन्त्रण योजना शुरू की गई। इस योजना के अधीन बाढ़ नियन्त्रण के लिए कई उपाय किए गए।
(i) नदियों के जल सम्बन्धी आंकड़े इकठ्ठे किए गए।
(ii) नदियों के साथ तटबन्ध बनाये गए। देश में लगभग 15.467 किमी लम्बे तटबन्धों का निर्माण किया गया।
(iii) निम्म क्षेत्रों में लगभग 30,199 किमी लम्बी जल प्रवाह नलिकायें बनाई गई है।
(iv) 762 नगरो तथा 4,700 गांवों को यादों से सुरक्षित किया गया है।
(v) कई नदियों पर जलाशय बना कर बादों पर नियन्त्रण किया गया है। जैसे-दामोदर घाटी बहुमुखी योजना तथा भाखड़ा नंगल योजना।
(vi) देश में बाढ़ों का पूर्व अनुमान लगाने के लिए (Flood Forecasting) 157 केन्द्र स्थापित किए गए है।
(vii) नदियों के ऊपरी भागों में वन रोपण किया गया है।
(viii) सातवी पंचवर्षीय योजना के अन्त तक 2710 करोड़ रुपए बाढ़ नियन्त्रण पर व्यय किए गए जबकि आठवीं योजना पर 9470 करोड़ रुपये के व्यय का अनुमान है।
(ix) केरल तट पर सागरीय प्रभाव से बचाव के लिए 42 किमी लम्बी समुद्री दीवारों का निर्माण किया गया तथा कर्नाटक तट पर 73 किमी लम्बी समुद्री दीवार बनाई गई।
(x) देश में बाढ़ के पूर्व निर्माण संगठन (Flood Fore-casting Organisation) की स्थापना की गई है। इसके अधीन 157 केन्द्र स्थापित किए गए है जिनकी संख्या इस शताब्दी के अन्त तक 300 हो जायगी।
(xi) महानदी घाटी में हीराकुड बांध, दामोदर घाटी में कई बांध, सतलुज नदी पर भाखड़ा डैम, ब्यास नदी पर पौग डैम तथा ताप्ती नदी पर डकई राध बनाकर बाढ़ों की रोकथाम की गई है।
2. सूखा क्या है? भारत में इसके कारणों एवं प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर-जब जल तथा नमी की उपलब्धता कुछ देर के लिये सामान्य से काफी कम होती है तो सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।
High Powered Committce on Disaster Management के अनुसार कृषि, पशुधन, उद्योग अथवा मानवीय जनसंख्या की आवश्यकताओं से कम जल उपलब्ध होने की सूखा कहा जाता है।
सूखे का मुख्य कारण-भारत में वर्षा वा अपर्याप्त होना तथा असमान वितरण के कारण मुख्य रूप से सूखा होता है। पश्चिमी और मध्य भारत को मौनसूनी वर्षा की अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। यही नहीं यहाँ वर्षा केवल अनिश्चित ही नहीं अपर्याप्त भी है। वर्षा की कमी जल विज्ञान संबंधी और कृषीय सूखे को प्रेरित करती है।
भारत के कुल क्षेत्रफल के 19% भाग को सूखे की भार झेलनी पड़ती है। इस क्षेत्र में देश की 12% जनसंख्या रहती है। भारत के कुछ राज्यों में सूखा एक स्थायी लक्षण है। देश का लगभग 30% क्षेत्र सूखा प्रदेश है।
सूखे का प्रभाव-सूखे के कारण खाद्यान्नो जल और चारे की कमी हो जाती है, इन्हें क्रमश: अकाल, जलकाल और तिनकोण कहते है। कभी-कभी तीनों की कमी एक साथ हो जाती है तब इसे त्रिकाल कहते है।
(2) सूखे के बाद होनेवाले अकाल के कारण मानवों एव पशुधन का भारी मात्रा में पलायन आरंभ हो जाता है।
(3) सन् 1987 में भारत के आध्रप्रदेश, गुजरात, हिमाचल, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश आदि 12 राज्यों में भयंकर सूखा पड़ा था।
(4) सन् 2002 में मानसूनी वर्षा के न होने के से भारत के मध्यवर्ती पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में भयंकर सूखा पड़ा।
3. भारत के सूखाग्रस्त इलाकों का वर्णन करते हुए सूखे के अर्थव्यवस्था पर होनेवाले प्रभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर-भारत में सूखे का सर्वाधिक प्रभाव राजस्थान और इसके निकटवर्ती हरियाणा एवं मध्यप्रदेश के क्षेत्र, गुजरात का अधिकांश भाग, मध्यवर्ती महाराष्ट्र, पूर्वी व मध्यवर्ती कर्नाटक, पश्चिमी व मध्य तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश में पड़ता है। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी कभी-कभी सूखा पड़ जाता है। इन क्षेत्रों में 100 cm. से भी कम वर्षा होती है और पर्याप्त सिंचाई की उपलब्धता भी नहीं है। यद्यपि देश के किसी भी भाग में वर्षा कम होने पर सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अनुमानत: भारत का 19% क्षेत्र तथा देश का 12% जनसंख्या प्रतिवर्ष सूखे की चपेट में रहती है।
सूखे का अर्थव्यवस्था पर भयानक परिणाम होते हैं। जब फसलें नष्ट होती है तो अन्न की कमी हो जाती है और अकाल पड़ जाता है। पशुओं के लिए चारा कम हो जाता है तो ऋण अकाल पड़ जाता है। जल की कमी की अवस्था को जल अकाल कहा जाता है। जब तीनों परिस्थितियाँ ढक साथ उत्पन्न हो जाती है तो त्रि-अकाल कहलाती है जो सबसे भयंकर
होती है। भीषण अकाल पड़ने पर भारी संख्या में स्त्री, पुरुष तथा बच्चे एवं जीव-जन्तुओं का भोजन के अभाव में मृत्यु को प्राप्त हो जाते है। सूखाग्रस्त क्षेत्रों से मानव प्रवास तथा पशु पलायन एवं सामान्य सी घटना बन जाती है। जलाभाव में लोग दुषित जल पीने को बाध्य होते हैं। जिस कारण पेयजल संबंधी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
4. भूकम्प की परिभाषा दें। भारत में भूकम्प क्षेत्रों का वितरण का वर्णन करें।
उत्तर-भूकम्प (Earthquake)-पृथ्वी के किसी भाग के अचानक हिलने को भूकम्प कहते हैं। इस हलचल से भूपृष्ठ पर झटके (Tremors) अनुभव किए जाते हैं। भूकम्पीय तरंगे सभी दिशाओं में लहरों की भान्ति आगे बढ़ती हैं। ये तरंगे उद्गम (Focus) से आरंभ होती हैं। ये तरंगें तीन प्रकार की होती हैं-P-Waves,S-Waves, L-Waves. भूकम्प के कारण (Causes of Earthquake)-भूकम्प के सामान्य कारण ज्वालामुखी
विस्फोट, भू-हलचलें, चट्टानों का लचीलापन तथा स्थानीय कारण है। भारत में सामान्य रूप से भारतीय प्लेट तथा यूरेशियन प्लेट आपस में टकराती है। ये एक दूसरे के नीचे धंँसने का प्रयत्न करती हैं। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में इनका सम्बन्ध वलन एवं भ्रंशन क्रिया से है। दक्षिणी
भारत एक स्थिर भूखण्ड है तथा भूकम्प बहुत कम होते हैं। भूकम्पों की तीव्रता रिक्टर पैमाने से मापी जाती है जिसका मापक 1 से 9 तक होता है। अधिक तीव्र भूकम्प भारत के निम्नलिखित क्षेत्रों में अनुभव किए जाते हैं-
(i) हिमलायाई क्षेत्र (Himalayan Zone)-क्षेत्र में क्रियाशील भूकम्प जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में आते हैं जिनसे बहुत हानि होती है। यह भूकम्प भारतीय प्लेट तथा यूरेशियम प्लेट के आपसी टकराव के कारण उत्पन्न होते हैं।
भारतीय प्लेट प्रति वर्ष 5 से मी० की गति से उत्तर तथा उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ रही है। यहाँ 1905 में कांगड़ा में, 1828 में कश्मीर में, 1936 में क्वेटा में तथा 1950 में असम में भयानक भूकम्प अनुभव किए गए।
(ii) सिन्धु-गंगा प्रदेश (Indo-Gangetion Zone) – इस क्षेत्र में सामान्य तीव्रता के भूकम्प अनुभव किए जाते हैं। इनकी तीव्रता 6 से 6.5 तक होती है। परन्तु इन सघन बसे क्षेत्रों में बहुत हानि होती है।
(iii) प्रायद्वीपीय क्षेत्र (Peninsular Zone) यह एक स्थिर क्षेत्र है परन्तु फिर भी यहां भूकम्प अनुभव किए जाते हैं। 1967 में कोयना, 1993 में लातूर, 2001 में भुज के भूकम्प बहुत विनाशकारी थे। कोयना भूकम्प कोयला डैम के जलाशय में जल के अत्यधिक दबाव के कारण आया परन्तु भूकम्प भारतीय प्लेट की उत्तर की ओर गति के कारण आए है।
(iv) अन्य भूकम्पीय क्षेत्र (Other Sesonic Zones)-(i) बिहार-नेपाल क्षेत्र, (ii) उत्तर-पश्चिमी हिमालय, (iii) गुजरात क्षेत्र, (iv) कोयना क्षेत्र।
भारत के प्रमुख विनाशकारी भूकम्प-
केन्द्र-
कच्छ
कच्छ
मेघालय
बंगाल
असम
कांगड़ा
असम
कोयना
हिमाचल प्रदेश
लातूर
भुज
तीव्रता-
8.0
7.5
8.7
8.5
8.0
8.0
8.7
6.3
7.5
6.0
8.0
वर्ष
1819
1869
1865
1885
1897
1905
1950
1967
1973
1993
2001
भूकम्प के परिणाम-केवल बसे हुए क्षेत्रों के आने वाला भूकम्प ही आपदा या संकट बनता है। भूकम्प का प्रभाव सदैव विध्वंसक होता है। भूकम्प के कारण प्राकृतिक पर्यावरण में कई तरह से परिवर्तन हो जाते हैं। भूकम्पीय तरंगों से धरातल में दरारें पड़ जाती है जिनसे कभी-कभी पानी के फब्बारे छूटने लगते हैं। इसके साथ बड़ी भारी मात्रा में रेत बाहर आ जाता है तथा इससे रेत के बांध बनते हैं। क्षेत्र के अपवाह तन्त्र में उल्लेखनीय परिवर्तन भी देखे जा सकते हैं। नदियों के मार्ग बदल जाने से बाढ़ आ जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन हो जाते है तथा इनके साथ भारी मात्रा में चट्टानी मलबा नीचे आ जाता है। इससे वहतक्षरण होता है। हिमानियाँ फट जाती है तथा इनके हिमधाव सुदूर स्थित स्थानों पर बिखर जाते है। नए जल प्रपातों और सरिताओं की उत्पत्ति भी हो जाती है। भूकम्पीय आपदाओं से मनुष्य निर्मित भवन बच नहीं पाते हैं। सड़कें, रेलमार्ग, पुल और टेलीफोन की लाइने टूट जाती है। गगनचुम्बी भवनों और सघन जनसंख्या वाले कस्बों और नगरों पर भूकम्पों का सबसे बुरा असर होता है।
सुनामी लहरें (Tsunami Tadial Waves)-समुद्री तल पर भूकम्प उत्पन्न होने से 30 मीटर तक ऊँची ज्वारीय लहरें (सुनामी) उत्पन्न होती है। 26 दिसम्बर, 2004 को हिन्द महासागर में इण्डोनेशिया के निकट उत्पन्न भूकम्प के कारण भयंकर सुनामी लहरें उत्पन्न हुई। इनका प्रभाव इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड, म्यानमार, भारत तथा श्रीलंका के तटों पर अनुभव किया गया। इन भयकर लहरों के कारण इन क्षेत्रों में लगभग 2 लाख लोगों की जाने गई तथा करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति की हानि हुई है। यह पृथ्वी के इतिहास में सबसे भयंकर प्राकृतिक आपदा थी।
भूकम्प के प्रभाव को कम करना- के प्रभाव को कम करने का सबसे अच्छा तरीका है। इसकी निरन्तर खोज-खबर रखना तथा लोगों को इसके आने की सम्भावना की सूचना देना। इससे आशंकित क्षेत्रों से लोगों को हटाया जा सकता है। भूकम्प से अत्यधिक खतरे वाले क्षेत्र में भूकम्परोधी भवन बनाने की आवश्यकता है। भूकम्प की आशंका वाले क्षेत्रों में लोगों को भूकम्परोधी भवन और मकान बनाने की सलाह दी जा सकती है।
5. आपदा प्रबन्धन पर एक लेख लिखें।
उत्तर-आपदा प्रबन्धन (Disaster Management)-आपदा प्रबंधन में निवारक और संरक्षी उपाय, तैयारी तथा मानवों पर आपदा के प्रभाव को कम करने की व्यवस्था तथा आपदा प्रवण क्षेत्रों के सामाजिक आर्थिक पक्ष शामिल किए जाते हैं। आपदा प्रबन्ध की सम्पूर्ण प्रक्रिया को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है। प्रभाव चरण, पुनर्वास और पुननिर्माण चरण तथा समन्वित दीर्घकालीन विकास और तैयारी चरण।
प्रभाव चरण के तीन अंग हैं-(i) आपदा की भविष्यवाणी करना, (ii) आपदा के प्रेरक कारकों की बारीकी से खोजबीन, तथा (iii) आपदा आने के बाद प्रबन्धन के कार्य। जलग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा का अध्ययन करके बाद की भविष्यवाणी की जा सकती है। उपग्रहों के द्वारा चक्रवातों के मार्ग, गति आदि की खोज-खबर ली जा सकती है। इस प्रकार प्राप्त सूचनाओं के आधार पर पूर्व चेतावनी तण लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के प्रयत्न शुरू किए जा सकते हैं। आपदा के लिए जम्मेदार कारकों की बारीकी से की गई खोजबीन लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, भोजन, वस और पेय जल की आपूर्ति के लिए कार्यदल नियुक्त किए जा सकते हैं। आपदाएं मृत्यु और विनाश के चिह्न छोड़ जाती है। प्रभावित लोगों को चिकित्सा सुविधा और अन्य विभिन्न प्रकार की सहायता की जरूरत होती है। दीर्घकालीन विकास के चरण के अन्तर्गत विविध प्रकार के निवारक और सुरक्षात्मक उपायों की योजना बना लेनी चाहिए संसार के लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए यूनेस्का ने 1990-2000 के दौरान प्राकृतिक आपदा राहत दशक मानाया था। संसार के अन्य देशों के साथ भारत ने भी दशक के दौरान अक्टूबर में विश्व आपदा राहत दिवस मनाया था। इस अवसर पर भूकंप, बाढ़ और चक्रवात प्रवण क्षेत्रों के लागो के लिए भारत सरकार ने जो करणीय और अकरणीय कर्म प्रचारित किए थे, वे बहुत उपयोगी है।
6. ‘भूकम्प आने पर करणीय’ एवं अकरणीय कर्मों का विवरण कीजिए।
उत्तर-तत्काल कार्यवाही घर के अन्दर –
बाहर मत भागिए, अपने परिवार को दरवाजों और मेजों के नीचे, पलंगों पर लेटे व्यक्ति को पलंगों के नीचे ले आइऐ, खिड़कियों और चिमनियों से दूर रहिए।
घर के बाहर:-
 भवनों, ऊंची दीवारों, बिजली के झूलते तारे से दूर रहिए। क्षतिग्रस्त भवनों में दूबारा मत जाइए।
वाहन चलाते समय:-
 अगर कार या बस यात्रा करते समय भूकम्प के झटके महसूस होने लगें तो ड्राइवर को वाहन रोकने के लिए कहिए। वाहन में ही बैठे रहिए।
तत्काल करने योग्य कार्य:-
घर में सभी आग बुझा दीजिए तथा हीटर बन्द कर दीजिए।
यदि घर क्षतिग्रस्त हो गया है, तो बिजली, गैस और पानी बन्द कर दीजिए।
यदि घर में लगी आग को तत्काल न बुझाया जा सके, तो तुरन्त घर छोड़ दीजिए।  गैस जलाने के बाद याद गैस.के रिसाव का पता चले तो घर से निकल जाइए संभव हो तो रेगुलेटर बंद कर दें।।
पालतू और घरेलू जीव-जन्तुओं (कुत्ता बिल्ली और गोपशु) को बन्धन से मुक्त कर दीजिए।
7. बाढ़ आने पर करणीय एवं अकरणीय कर्मों का विवरण कीजिए।
उत्तर-अग्रिम सूचना और सलाह के लिए रेडियो सुनिए।
बिजली के सभी उपकरण बन्द कर दीजिए। घर के सभी कीमती सामान और कपड़े बाढ़ के पानी की पहुंच से दूर रखिए। ऐसा तभी कीजिए जब बाढ़ की चेतावनी मिली हो या आपको आशंका हो कि बाढ़ का पानी आपके घर में घुस जायगा।
वाहनों, फार्म के पशुओं तथा आसानी से उठाई जा सकने वाली वस्तुओं को निकट की ऊंची भूमि पर पहुंचा दीजिए।
खतरनाक प्रदूषण को रोकिए।
 सभी कीटनाशकों को पानी की पहुंच से दूर रखिए।
यदि आपको घर छोड़ना पड़े तो बिजली और गैस बन्द कर दीजिए।
 घर छोड़ने की मजबूरी में सभी बाहरी खिड़कियों और दरवाजों पर ताले लगा दीजिए।
 यदि आप बच सकते हैं, तो बाढ़ के पानी में पैदल या कार में बैठकर प्रवेश मत कीजिए।
अपने आप बाद ग्रस्त क्षेत्र के इधर-उधर मत घूमिए।
8. चक्रवात आने पर करणीय एवं अकरणीय कर्मों का विवरण कीजिए।
उत्तर- अग्रिम सूचना और सलाह के लिए रेडियो सुनते रहिए। बचाव के लिए पर्याप्त समय दीजिए। चक्रवात कुछ घण्टों में मार्ग की दिशा, गति तथा तीव्रता बदल सकता है। अतः नवीनतम सूचना के लिए रेडियो को निरन्तर चलाए रखिए।
यदि आपके क्षेत्र के लिए तूफानी पवनों या प्रबल झंडा की भविष्यवाणी की गई हो तो खुले तख्ते. नालीदार, टीन, खाली डिब्बे या ऐसी ही अन्य वस्तुएँ, जो पवन के साथ उड़कर खतरा बन सके, बांध दीजिए या स्टोर में रख दीजिए।
खिड़कियों को टूटने से बचाने के लिए उन्हें बन्द रखिए।
 निकट के सुरक्षित स्थान में चले जाइए या किसी अधिकार प्राप्त सरकारी संस्था के आदेश पर क्षेत्र को छोड़ दीजिए।
जब तूफान आ ही जाए, तो घर के अन्दर रहिए। अपने घर के सबसे मजबूत भाग में शरण लीजिए।
 रेडियो सुनिए और निर्देशों का पालन कीजिए।
 यदि छत उडने लग, तो मकान के सुरक्षित भाग की खिड़की को खोल दीजिए। यदि आप खुले में फंस गए हैं, तो शरण खोजिए।
तूफान के दौरान पवनों के शान्त होने पर घर से बाहर या पुलिन (beach) पर मत जाइए। चक्रवातों के साथ प्रायः या झील में ऊंची-ऊंची लहरें उठती हैं।
9. चक्रवात किसे कहते हैं? चक्रवातों द्वारा क्षति का वर्णन करें।
उत्तर-चक्रवात (Cyclones)-600 किमी या इससे अधिक व्यास वाले चक्रवात, पृथ्वी के वायुमंडलीय तूफानों में सबसे अधिक विनाशक और भयकर होते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप संसार में चक्रवातों द्वारा सबसे अधिक दुष्प्रभावित क्षेत्र हैं। संसार में अपने वाले चक्रवातों में से 6 प्रतिशत यहीं आते हैं।
उत्पत्ति-जब कमजोर रूप से विकसित कम दबाव के क्षेत्र के चारों ओर तापमान की क्षैतिज प्रवणता बहुत अधिक होती है, तब उष्ण कटिबंधीय चक्रवात बन सकता है। चक्रवात ऊष्मा का इंजिन है तथा इसे सागरीय तल से ऊष्मा मिलती है। संघनन के बाद मुक्त ऊष्मा, चक्रवात के लिए गतिज उर्जा (kineticenergy) में बदल जाती हैं।
चक्रवात की उत्पत्ति की निम्नलिखित अवस्थाएँ है-
(i) महासागरीय तल का तापमान 26° से अधिक।
(ii) बन्द समदाब रेखाओं का आविर्भाव।
(ii) निम्न वायु दाब, 1,000 मि•बा• से कम होना।
(iv) चक्रीय गति के क्षेत्रफल, प्रारम्भ में इसके अर्धव्यास 30 से 50 किमी फिर क्रमशः 100-200 किमी और 1,000 किमी तक भी बढ़ जाते हैं।
(v) ऊर्ध्वाधर रूप में पवन की गति का प्रारम्भ में 6 किमी की ऊंँचाई तक बढ़ना तथा इसके बाद और भी ऊंँचा उठाना।
चक्रवातों द्वारा क्षति-प्रभंजन की गति वाली पवनों, प्रभंजन की लहरों तथा मूसलाधार वर्षा से उत्पन्न बाढ़ों के कारण ऊष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।
अधिकतर तूफान अत्यन्त तेज पवनों और तूफाीन लहरों के द्वारा भारी क्षति पहुंँचाते हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में ढाल पर अत्यन्त तीव्रता से बहने वाला वर्षा जल अपने सामने आने वाली हर वस्तु को अपनी चपेट में लेकर भारी नुकसान करता है। तूफानी लहरों की तीव्रता, पवन की गति, दाब प्रवणता, समुद्र की तली की स्थलाकृतियाँ तथा तटरेखा की बनावट पर निर्भर करती है। अनेक क्षेत्रों में चक्रवातों की चेतावनी व्यवस्था के बावजूद, ऊष्ण कटिबंधीय चक्रवात धन-जन को अपार क्षति पहुंँचाते हैं।
10. भारत के प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं का वर्गीकरण कर किसी एक का वर्णन करें।
उत्तर-प्राकृतिक आपदा, महाविनाशकारी, अप्रत्याशित और अनियंत्रणीय परिघटना है।
ये आपदाये-(i) जैव (ii) भू-वैज्ञानिक (iii) भूकम्पीय (iv) जल विज्ञान या मौसमी दशाएँ या प्राकृतिक पर्यावरण की प्रतिक्रियाएंँ होती है?
भूकम्प, चक्रवाती तूफान, आकस्मिक बाढ़, बादलों का फटना, सूखा आदि प्राकृतिक आपदायें कही जाती हैं।
चक्रवात-600 कि. मी. या इससे अधिक व्यास तूफानों में सबसे विनाशक या भयंकर होते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप संसार में चक्रवातों द्वारा सर्वाधिक दुष्प्रभावित क्षेत्र है।
उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति के विषय में कोई भी सर्वमान्य सिद्धांत नहीं बना है। जब कमजोर रूप से विकसित कम दबाव के क्षेत्र में चारों ओर तापमान की क्षतीज प्रवणता बहुत कम होती है तब उष्ण कटिबंधीय चक्रवात बन सकता है।
अधिकांशत: चक्रवातीय क्षति, तेज पवनों, मुसलाधार वर्षा और समुद्र में उठने वाली ऊंँची तूफानों ज्वारीय लहरों के द्वारा होती है। पवनों की तुलना में चक्रवातीय वर्षा के कारण आई बाढ़ अधिक विनाशकारी होती है। वर्तमान संयम में चक्रवातों की चेतावनी व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार होने से तथा प्रर्याप्त और सामूहिक कार्यवाही से चकवात में मरने वालों
की संख्या में कमी आयी है।

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