9th sanskrit

bseb 9th class sanskrit notes | ज्ञानं भारः क्रियां विना

ज्ञानं भारः क्रियां विना

bseb 9th class sanskrit notes

वर्ग – 9

विषय – संस्कृत

पाठ 7 – ज्ञानं भारः क्रियां विना

ज्ञानं भारः क्रियां विना

स्तत्रनामकस्य संस्कृतनीतिकथाग्रन्थस्य अन्तिमे तन्त्रे विद्यमानायाः कथायाः अंशोऽयं पाठ:। अस्या कथाया व्यवहार विना शुर्कस्य ज्ञानस्य निरर्थकता ता। उक्तं च- ‘शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः, यस्तु क्रियावान पुरुषः स विद्वान् नोपदेशो लभ्यते यत् व्यवहारों बुद्धिः क्रिया व ज्ञानस्य परिणामः भवति। व्यवहारं विना
पाण्डित्यं व्यर्थ भारभूतं च| )

( यह पाठ पञ्चतन्त्र नामक संस्कृत भाषा के नीतिकथा ग्र्थ के अन्तिम तन्त्र में विद्यमानाया कथा से सम्पादित अंश है। इस कथा में व्यवहार के विना शुष्क ज्ञान की दिखाई गयी है। कहा भी गया है- शास्त्रों को पढ़ कर भी लोग मूर्ख होते हैं। जो क्रियावान् (कर्मशील) व्यक्ति है वही विद्वान है। इस पाठ से यह उपदेश प्राप्त होता है कि व्यावहारिक बुद्धि ही क्रिया या ज्ञान का परिणाम है। व्यवहार विना तो पाण्डित्य व्यर्थ और भार स्वरूप है।)

1. वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा ।
बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिंहकारकाः ।॥

संधि विच्छेद : बुद्धिर्न = बुद्धिः + न। बुद्धिरु्तमा = बुद्धि: + उत्तमा।

शब्दार्थ : विद्याया = विद्या से। उत्तमा = श्रेष्ठ। विनश्यन्ति = नष्ट हो जाते हैं। वरं = श्रेष्ठ।

अन्वय : बुद्धि: वरं (भवति) सा विद्या न, विद्याया बुद्धिः उत्तमा (भवति)। यथा १ सिंहकारका (विनश्यन्ति) (तथा एव) बुद्धिहीना: विनश्यन्ति।

हिन्दी अनुवाद : बुद्धि श्रेष्ठ होती है, विद्या नहीं। विद्या से बुद्धि उत्तम होती है। वस व सिंह बनाने वाले विनष्ट हो गये वैसे ही बुद्धिहीन विनष्ट हो जाते हैं।

2.एकस्मिन् नगरे चत्वार: यवानः परस्पर मित्रभावेन निवसन्ति स्म। तेषां त्रयः आास्त्रपारंगताः, परन्तु बद्धिरहिताः। एकस्तु बुद्धिमान् केवलं शास्त्रपराङ्मुखः। अथ तः कदाचिन्मित्रैर्मन्त्रितम ‘को गुणो विद्यायाः येन देशान्तरं गत्वा भूपतीन् परितोष्य अथपाजना न क्रियते? तत्पर्वदेशं गच्छामः तथानुष्ठिते किञ्चिन्मार्गं गत्वा तेषां हतर प्राह- ‘अहो! अस्माकमेकश्चतुर्था मूढ: कवल बुद्धिमान्। न च राजप्रतिग्रहो

बुद्धया लभ्यते विद्यां विना। तन्नास्मै स्वोपार्जितं दास्यामः। तद्गच्छतु गृहम्।’ ततो द्वितीयेनाभिहितम्- ‘भोः सुबुद्धे! गच्छ त्वं स्वगृहम, यतस्ते विद्या नास्ति।’

ततस्तृतीयेनाभिहितम्- ‘अहो, न युज्यते एवं कर्तुम्। यतो वयं बाल्यात्पभत्येकत्र क्रीडिताः। तदागच्छतु महानुभावोऽस्मदुपर्जितवित्तस्य समभागी भविष्यतीति। उक्तञ्च-

संधि विच्छेद :कदाचिन्मित्रैमन्त्रितम् = कदाचित् + मित्रैः + मन्त्रितम्। अर्थोपार्जना = अर्थ + उपार्जना। तत्पूर्वदेशम् = तत् + पूर्व + देशम्। तथानुष्ठिते = तथा + अनुष्ठिते। किञ्चिन्मार्गम् = किञ्चित् + मार्गम्। अस्माकमेकश्चतुर्थो + अस्माकम् +एक: + चतुर्थ:। तन्नास्मै = तत् + न + अस्मै । स्वोपर्जितम् = स्व + उपार्जितम् द्वितीयेनाभिहितम् = द्वितीयेन +अभिहितम्। यतस्ते = यतः + ते । ततस्तृतीयेनाभिहितम् = ततः + तृतीयेन + अभिहितम्। बाल्यात्प्रभृत्येकत्र = बाल्यात् + प्रभृति + एकत्र। तदागच्छतु = तदा + आगच्छतु महानुभावोऽस्मदुपार्जितवित्तस्य =महानुभाव: + अस्मत् + उपार्जित वित्तस्य। भविष्यतीति =भविष्यति + इति। एकस्तु = एक: + तु।

शब्दार्थ : कदाचित् = कभी, किसी समय शास्त्रमारंगता: = शास्त्र में निपुण। शास्त्रपराङ्मुख कर। अर्थोपार्जना ज्येष्ठतरः= शास्त्र से विमुख। मन्त्रितम् = विचार किया गया परितोष्य = तुष्ट = धन का उपार्जन (कमाना)। तथानुष्ठिते = वैसा करते हुए। (उनमे) बड़ा। मूढ: = विद्यारहित। राजप्रतिग्रह =राजअनुकम्पा।
क्योंकि। ते = तुम्हें। युज्यते दास्याम: = देंगे। अभिहितम् = कही गया। यतः उचित। बाल्यात्प्रभृति = बचपन से ही। एकत्र = एक साथ। अस्मदुपार्जितवित्तस्य = हमारे द्वारा कमाये धन का।

हिन्दी अनुवाद : एक नगर में चार युवक मित्र भाव से रहते थे उनमें तीन शास्त्र निपुण, परन्तु बुद्धिरहित थे। एक बुद्धिमान तो था किन्तु शास्त्रविमुख था। उसके बाद भी उनके द्वारा विचार किया गया- जा को सन्तुष्ट कर धन नहीं उपार्जित किया जाय। तब पूर्व देश को चलते हैं। वैसा रते हुए कुछ दूर जाने पर उनमें बड़ा बोला- अरे! हममें चौथा विद्याहीन है केवल द्धिमान है। और विद्या के विना केवल बुद्धि से राजा की अनुकम्पा नहीं मिलती। हम पने द्वारा उपार्जित धन उसे नहीं देंगे। वह धर जाये तब दूसरे ने कहा- अरे सुबुद्धे! में अपने घर जाओ, क्योंकि तुम्हारे पास विद्या नहीं है।

वैसी विद्या का क्या लाभ जिससे दूसरे देश जाकर अहो! ऐसा करना उचित नहीं है। क्योंकि हमलोग बचपन से क-साथ खेले हैं। तब महानुभाव चले। हमारे द्वारा उपार्जित धन का बराबर का भागा तब तीसरे ने कहा- गा। कहा गया है-

3.अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

संधि विच्छेद : उदारचरितानान्तु = उदारचरितानाम् + तु। वसुधैव = वसुधा + एव। वेति = वा + इति।

शब्दार्थ : उदारचरितानाम् = उदार चरित्र वालों का। तु = तो। वसुधा = पृथ्वी, कुटुम्बकम् = परिवार। लघुचेतसाम् = छोटी बुद्धि वालों का।

अवय : अयं निजः वा परः इति गणना लघुचेतसाम् (भवति)। उदाचरितानाम् कुटुम्बकम् तु वसुधा एव (भवति) ।

हिन्दी अनुवाद : यह मेरा है या दूसरे का है ऐसी गणना तो छोटी बुद्धि वालों की होती है। विशाल हृदय वालों का तो पूरी पृथ्वी ही परिवार होती है। व्याख्या : प्रस्तुत श्लक पञ्चतेन्त्र से संकलित कर ‘ज्ञानं भार: क्रियां विना पाठ में रखा गया है। इसके माध्यम से ग्रन्थकार हमें यह बोध कराना चाहते हैं कि हमें पूरी वसुधा को
अपना परिवार मानना चाहिए, क्योंकि हम सभी एक ही परमात्मा के अंश हैं। अयं और निजः में बाँटने वाले क्षुद्रबुद्धि मानव हैं परन्तु विशाल-हृदय व्यक्ति सभी प्राणियों को आत्मब्त् देखते हैं। यही हमारी संस्कृति का मूल संदेश भी है।

4. तदागच्छतु एषोऽपि इति। तथानुष्ठिते तै: मार्गा्ितैरटव्यां कतिचिदस्थीनि दृष्टानि। ततश्चैकेनाभिहित्तम् -‘अहो! अद्य विद्यापरीक्षा क्रियते कतिचिदेतानि मृतसत्त्वस्यास्थीनि तिष्ठन्ति तद्विद्याप्रभावेण जीवनसहितानि कुर्म:। अहमस्थिसञ्चयं करोमि ततश्च तेनीत्सुक्यात् अस्थिसञ्चयः कृतः। द्वितीबेन चर्ममांसरुधिरं संयोजितम्। तृतीयोऽपि
याबज्जीवनं सञ्चारयति तावत्सुबुद्धिना वारितः- ‘भो: तिष्ठतु भवान्, एष सिंहो निष्पाद्यते। यद्येनं सजीवं करिष्यसि ततः सर्वानपि व्यापादयिष्यति, इति तेनाभिहितः से आह- ‘धिङ मुर्ख! नाहूं विद्याया विफलतां करोमि ।’ ततस्तेनाभिहितम्- ‘तहिँ
अतাक्षिस्व क्षणं यावदहं वृक्षमारोहामि ।’ तथानुष्ठिते यावत् सजीवः कृतस्तावते त्रयोऽपि सिंहहेनोत्थाय व्यापादिताः। से च पुनर्वृक्षादबतीर्य गृहं गतः। अतः उच्यते-

संधि विच्छेद : तदागच्छतु = तत् + आगच्छतु। एषोऽपि = एष: + अपि। तथानुष्ठिते = त: + अनुष्टिते। माग्गा्रितैरटव्यां = मार्ग + आश्रितैः + अटव्याम् कतिचिदस्थीनि = कतिचित् + अस्थीनि ततश्चैकेनाभिहितम् तरः + च + एकेन + अभिहितम्।।
कतिचिदेतानि = कतिचित् + एतानि। मृतसत्वस्यास्थीनि = मृतसत्त्वस्य + अस्थीनि। तद्विद्याप्रभावेण = तत् + विद्या प्रभावेण। अहमस्थिसज्चय = अहम् + अस्थिसञ्चयम्। तेनौत्सक्यात = तेन + औत्सुक्यात् । अपि। यावज्जीवनं = यावत् + जीवनं। यद्येनं = यदि + एनम्। ततश्तेनाभिहितम =ततः + तेन + अभिहितम्। यावदहं = यावत् + अहम्। वृक्षमारोहामि = वृक्षम् + आरोहामि । कृतस्तावत्ते = कृतः + तावत् + ते। सिंहेनोत्थाय = सिंहेन + उत्थाय। पुनर्वृक्षादवतीर्य = पुन: + वृक्षात् + अवतीर्य।

शब्दार्थ : तदा = तब। एषः = यह। तथा = वैसा, इस प्रकार। मार्गाश्रितै: = में आगे बढ़ते हुए। अटव्यां = वन में। कतिचित् = किसी, कोई, कुछ। अस्थीनि = हड्डियाँ। अभिहितम् = कहा गया। मृतसत्त्वस्य = मरे हुए जीव की। औत्सुक्यात् = उत्सुकता पूर्वक। वारितः = रोका गया। निष्पाद्यते = बनता है। [(यहाँ) बना है।। यद्येनं = यदि इसको। सजीवनं = जीवन के साथ, जीवित। व्यापादयिष्यति = खा लेगा। तर्हि = तब, तो। यावत् = जब तक। आरोहामि = चढता हूँ। अवतीर्य = उतर कर।

हिन्दी अनुवाद : तब यह भी आये। वैसा करते हुए मार्ग में आगे बढ़ने पर वन में उनको कुछ हड्डियाँ दिखीं। और तब एक ने कहा- ‘अरे, आज विद्या की परीक्षा करते हैं। ये किसी मृत जीव की हड्डियाँ पड़ी हैं। उसे हम अपनी विद्या के प्रभाव से जीवित करें। मैं हड्डियों का सञ्चय करता हूँ। दूसरे के द्वारा चमड़ा, मांस और रक्त से युक्त किया गया तीसरे के द्वारा जब वह सजीव किया जाने लगा तब सुबुद्धि द्वारा रोका गया। ‘अरे, आप ठहरें, यह सिंह है । यदि यह सजीव होगा तब हम सभी को खा जायेगा’ ऐसा उसके द्वारा कहा गया। वह (तीसरा) बोला- मूर्ख! तुम्हे धिक्कार है। मैं अपनी विद्या को विफल नहीं करूँगा। तब उस सुबुद्धि द्वारा कहा गया- ‘तब कुछ क्षण प्रतीक्षा करो, जब तक मैं वृक्ष पर चढ़ जाऊँ। वैसा करते हुए जब वह सजीव किया गया तब सिंह उठ कर सबों को खा गया। (सिंह द्वारा सभी खा लिये गये। ) और वह
(सुबुद्धि) वृक्ष से उतर कर घर चला गया। इस लिये कहा गया है-

5. अवशेन्द्रियचित्तानां हस्तिस्नानमिव क्रिया ।
दुर्भगाभरणप्रायो ज्ञानं भारः क्रियां विना ॥

संधि विच्छेद : अवशेन्द्रियचित्तानां = अवश + इन्द्रियचित्तानां। हस्तिस्नानमिव = हस्तिस्नानम् + इव। दुर्भगाभरणप्रायो = दुर्भगा + आभरण + प्राय: ।

शब्दार्थ : अवशेन्द्रियचित्तानाम् = जिनकी इन्द्रियों और मन वश में नहीं है उनकी। हस्तिस्नानमिव = हाथी के स्नान की तरह। दुर्भगाभरणप्रायः = कुरूप को आभूषण से लादना।

अन्वय : अवशेन्द्रियचित्तानां क्रिया हस्तिस्नानम् इव (भवति) (एवं) क्रियां विन ज्ञानं भार: (यथा) दुर्भगा आभरण प्रायः।

हिन्दी अनुवाद : जिनकी इन्द्रिया तथा चित्त (मन) निवन्त्रण में नहीं हैं उनका कार्य हाथी के स्नान की तरह व्यर्थ होता है । इसी प्रकार कर्म के विना ज्ञान भारस्वरूप। होता है जैसे कुरूप को गहनों से लादना।

व्याख्या : यह श्लोक ‘ज्ञानं भार: क्रियां विना’ पाठ से लिया गया है जा मूलतः। विष्णु शर्मा द्वारा रोचित पञ्चतन्त्र ग्रन्थ का है। इसमें कर्म की प्रधानता बतायी गयी है। लेखन का कहना है कि जैसे हाथी की स्नान कराना निरर्थक है उसी प्रकार की, जिनका अपने मन पर नियन्त्रण नहीं है, क्रियाएँ निरर्थंक होती हैं। उनका
कोई कार्य संतुलित और लाभप्रद नहीं होता। इस प्रकार आचरण एवं व्यवहार में लाये विना ज्ञान भारस्वरूप एवं निरर्थक होता है, जैसे किसी कुरूप को गहनों से सजाना निशर्थक और भारस्वरूप होता है। अर्थति ज्ञान तभी सफल होता जब वह व्यावहारिक है। और यह व्यावहारिक ज्ञान बुद्धि से ही सम्भव हैं । शास्त्रपारंगत होकर ज्ञान से जुड़ता भी व्यावहारिक ज्ञान अर्थात बुद्धि से रहित होने के कारण तीनों ब्राह्मण कुमार सिंह का
भोजन बन गये जब कि चौथा शास्त्र विमुख होकर भी अपनी बुद्धि अर्थात व्यावहारिक सूझ-बूझ के कारण सुरक्षित रह गया।

सारांश

चार ब्रह्मण मित्रों की कथा के द्वारा व्यावहारिक बुद्धि के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही हमारी प्राचीन संस्कृति के अमर संदेश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को भी हमारे सामने रखा गया है।
कोरा शास्त्रज्ञान निरर्थक कभी-कभी हानिकारक भी होता है। कार्य में
परिणत किये बिना किसी भी ज्ञान का कोई मूल्य नहीं। और ज्ञान को कार्य में परिणत करने के लिये बुद्धि आवश्यक है। इसी कारण बुद्धि को विद्या से श्रेष्ठ माना गया हैं। क्याकि बुद्धिहीनों का वैसे ही विनाश हो जाता है जैसे सिंह बनाने वालों का विनाश ही गया। केवल शुष्क ज्ञान भार स्वरूप होता है।

व्याकरण

1. समास विग्रहः

धनहीनः = धनेन हीनः (तत्पुरुष तृतीया)
बुद्धिहीना: = बुद्धया हीना: (तत्पुरुष तृतीया)
बुद्धिरांहता: = बुद्ध्या रहिताः (तृतीया तत्पु०)
शास्त्रपराङ्गमुखः=शास्त्रेभ्यः पराङ्मुख (पञ्चमीतत्पु० )
देशान्तरम् = अन्य: देशः (कर्मधारय)
अ्थोपार्जना = अर्थस्य उपार्जना (षष्ठी तत्पु०)
महानुभावः = महान् चासौ अनुभावः (कर्मधारय)
लघुचेतसाम् = लघु चेतो येषां ते (बहुव्रीहि) तेषाम्
उदारचरितानाम् = उदारं चरितं येषां ते (बहुव्रीहि) तेषाम्
मार्गाश्रितैः = मार्गम् आश्रित: (द्वितीया: तत्पु०) तै:
अस्थिसञ्चयः = अस्थीनां सञ्चयः (षष्ठी तत्पु० )
चर्ममांसरुधिरम् = चर्म च मांसं च रुधिरं तेषां समाहारः (द्वन्द्व:)
अवशेन्द्रियचित्तानाम् = न वशे सन्ति इन्द्रियाणि चित्तं च येषाम् (ब०व्री०)
दुर्भगामभरणम् = दुर्भगानाम् आभरणम् (षष्ठी त्पु०)
सजीव = जीवनेन सह बर्तमान: (सहार्थ बहुव्रीहि)

2. प्रकृति-प्रत्ययविभाग-व्युत्पतिः-

परितोष्य = परि +√तुष् + णिच् + ल्यप्।
कर्तुम् = √कृ + तुमुन्
मूढ: = √मुह + क्त
एकत्र = एक + त्रल् (तद्वित)
व्यापादितः = वि + आ + √पद + णिच + क्त
अवतीर्य = अब + √तु + ल्यप्
अभिहितम् = अभि + √धा + क्त
अनुष्टितः = अनु + √स्था + क्त
उपार्जित: = उप + √अ्जु + क्त
आश्रितः = आ. + √श्रि + क्त

अभ्यासः (मौखिकः )

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तरम् एकपदेन वदत–

(क) तेषां त्रय: केन व्यापादिताः?
(ख) तेषां त्रय: शास्त्रपारंगताः किन्तु कीदृशाः आसन्?
(ग) प्रथमः युवकः किम् अकरोत्?
(घ) चर्ममांसरु
(ड) चतुर्थः वृक्षादवतीर्य कुत्र गतः?
संयोजितम्?

उत्तर– (क) सिंहेन
(ख) बुद्धिहीनाः
(ग) अस्थि संचयं
(घ) द्वितीयेन
(ङ) गृहम्

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तरम् एकवाक्येन बदत

(क) अयं निजः पर: वा इति कर्य गणना भवति ?
(ख) विद्याया: का उत्तमा?
(ग) त्रयोऽपि केन व्यापादिता:?
(घ) मार्गाश्रितैः तै: अटव्यां कानि दृष्टानि?
(ङ) किं सिंहः वन्यपशुः अस्ति?

उत्तर–(क) अंयनिज: परः वा इति लघुचेतसाम् गणना भवति।
(ख) विद्याया: बुद्धिः उत्तमा।
(ग) त्रयोऽपि सिंहेन व्यापादिताः ।
(घ) मार्गाश्रितै: तै: अटव्यां अस्थीनि दृष्टानि।
(ङ) आम् ! सिंहः वन्यपशुः अस्ति।

अभ्यासः (लिखितः )

1. संधिविच्छेदं कुरुत-

एकस्तु = एक: + तु
मित्रैमन्त्रितम् = मित्रैः + मन्त्रितम्
भविष्यतीति = भविष्यति + इति
मार्गाश्रितैः = मार्ग + आश्रितैः
ततश्च = तत: + च
यावज्जीवनम् = यावत् + जीवनम्

2. समासविग्रहं कुरुत-

बुद्धिहीना: = बुद्धया हीनाः तृतीया तत्पुरुष
देशान्तरम् = अन्यः देशः कर्मधारय
अर्थोपार्जना = अर्थस्य उपार्जना पष्ठी तेत्पुरुष
उदारचरित: = उदार: चरित: यस्य स बहुव्रीहि
अस्थिसञ्वयः = अस्थीनां संचयः षष्ठी तत्पुरुष
सजीवः = जीवनेन सह वर्तमानः सहार्थ बहुव्रीहि

3. प्रकृति प्रत्ययविभागं कुरुत–

मूढ: = मुहू + क्त
कर्त्तुम् = Vकृ + तुमुन्
अवतीर्य = अव + √तृ + ल्यप्
एकत्र = एक + त्रल्
अभिहितम् = अभि + √धा + क्त
आश्रितः = आ + √श्रि + क्त

4. संस्कृत भाषया अनुवादं कुरुत-

(क) किसी गाँव में चार युवक रहते थे।
(ख) वे परस्पर मित्रभाव से रहते थे।
(ग) अर्थोपार्जन के लिए वे दूसरे देश में गए।
(घ) उन्होंने एक स्थान पर अस्थियाँ देखी।
(ङ) वे अस्थियाँ एक सिंह की थीं।

उत्तर-(क) कस्मिश्चिद् ग्रामे चत्वार: युवान: निवसन्ति स्म।
(ख) ते परस्परं मित्रभावेन निवसन्ति स्म।
(ग) अर्थोपार्जनाय ते देशान्तरं गतः।
(घ) ते एकस्मिन् स्थाने अस्थीनि अपश्यन्।
(ङ) तानि अस्थीनि एकस्य सिंहस्य आसन् ।

5. अधोलिखितेषु कोष्ठपदेन समुचितेन रिक्तस्थानं पूरयत-

(क) कदाचित तै: ….मन्त्रितम्। (बिप्रैःसाधुभिः मित्रैः)
(ख) राजपरिग्रह: ….विना न लभ्यते। (धनं/बुद्धिं/विद्यां)
(ग)……चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्। (उदार/विशाल)
(घ) त्रयोऽपि …..व्यापादिताः। (दस्युना/सिंहेन)
(ङ) तृतीयः पुरुषः सुबुद्धिना …… (वारित: प्रेरितः)

उत्तर-(क) मित्रैः
(ख) विद्यां
(घ) सिंहेन
(ग) उदार
(ङ) वारितः

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