9th sanskrit

Bihar board 9th class sanskrit notes | यक्षयुधिष्ठिर-संवादः

Bihar board 9th class sanskrit notes | यक्षयुधिष्ठिर-संवादः

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Bihar board 9th class sanskrit notes

वर्ग – 9

विषय – संस्कृत

पाठ 3  – यक्षयुधिष्ठिर-संवादः

यक्षयुधिष्ठिर-संवादः

 

(अयं पाठः व्यासरचितस्य महाभारतस्य वनप्रव्रणः (अध्याय-813) संकलितः। महाभारत संस्कृतभाषायाः विशालतमो ग्रन्थः लक्षश्लोकात्मकः। अस्मिन् ग्रन्थे अष्टादश पर्वाणि सन्ति। तेषु वनपर्व अन्यतमम्। तत्र पाण्डवाः बने विचरन्तिा एकदा ते एकं सरोवर गताः। तस्य स्वामी यक्षः। ये सरोवरात् जलं पातुम् इच्छन्ति, तान् स यक्षः प्रश्नान कराति। उत्तरम् अदत्त्वा ये जलं पिबन्ति ते मूर्छिताः पतन्ति। सैव गतिः भीमस्य अर्जुनस्य नकुलस्य सहदेवस्य च जाता। अन्ततः युधिष्ठिरः तत्र गतः। स एव यक्षप्रश्नानां समुचितम् उत्तरं ददाति। प्रश्नोत्तरेषु नीतिः सदाचारश्च वर्णिती।)

(यह पाठ वेदव्यास रचित महाभारत के वन पर्व (अ0-313) से संकलित है। महाभारत संस्कृत भाषा का करीब एक लाख श्लोकों वाला सबसे विशाल ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में 18 पर्व हैं। उनमें बन पर्व सबसे अलग है। इसमें पाण्डवों के वनवास की कथा है। एक बार वे एक सरोवर के पास गये। जब उन्होंने सरोवर से जल पीने की इच्छा की तो यक्ष ने उनसे कुछ प्रश्न पूछा तथा यह चेतावनी दी कि जो बिना उत्तर दिये जल पीने का प्रयास करेगा, वह मूर्छित हो कर गिर जायेगा। भीम, अर्जुन, नकुन और सहदेव बिना उत्तर दिये जल पीने के प्रयास के कारण मूर्छित होकर गिर पड़े। अन्ततः वहाँ युधिष्टिर आये उन्होंने यक्ष के प्रश्नों का समुचित उत्तर दिया। वही प्रश्नोत्तर इस पाठ में संकलित है। इस प्रश्नोत्तर के माध्यम से नीति और सदाचार का वर्णन किया गया है।)

यक्ष-

केनस्विदावृतो लोकः केनस्विन प्रकाशते ।
केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्ग न गच्छति

सन्धि विच्छेद : केनस्विदावृतो लोक; – केनस्वित् + आवृतः + लोकः केनस्विन्न
= केनस्वित् + ना

शब्दार्थ ; केनस्वित् = किससे, किस चीज से, किस कारण से। आवृतः = हका
हुआ, आच्छन्ना

अन्वय : लोक; केनस्वित् आवृतः (च अयम्) केनस्वित् न प्रकाशते। (पुरुषः)
केन त्यजति मित्राणि (च) केन स्वर्ग न गच्छति।

हिन्दी अनुवाद : यक्ष ने पूछा संसार किस चीज से ढंका है और यह किस कारण प्रकाशित नहीं होता है? व्यक्ति मित्रों का त्याग किस कारण करता है और किस कारण स्वर्ग नहीं जा पाता है?

युधिष्ठिर –

अज्ञानेनावृतो लोकस्तमसा न प्रकाशते ।
लोभात् त्यजति मित्राणि सङ्गात् स्वर्ग न गच्छति ।। 2॥

सन्धि विच्छेद : अज्ञानेनावृतो = अज्ञानेन + आवृतः। लोकस्तमसा = लोक: +तमसा।

शब्दार्थ : तमसा = अंधेरा के कारण। सङ्गात् = संग दोष से, आसक्ति (से) के कारण।

अन्वय : लोकः अज्ञानेन आवृतः तमसा (च) न प्रकाशते। (पुरुषः) लोभात् मित्राणि त्यजति सङ्गात् (च) स्वर्ग न गच्छति।

हिन्दी अनुवाद : युधिष्ठिर- यह संसार अज्ञान से ढका हुआ है और यह अंधकार के कारण प्रकाशित नहीं होता। व्यक्ति लोभ के कारण मित्रों का त्याग करता है और संग दोष (आसक्ति) के कारण स्वर्ग नहीं जा पाता।

व्याख्या : यक्ष युधिष्ठिर संवाद का यह श्लोक महाभारत के वन पर्व से संकलित है। यक्ष के प्रश्न का उत्तर देते हुए युधिष्ठिर कहते हैं कि संसार अज्ञान रूपी अंधकार
से ढका होने के कारण प्रकाशित नहीं होता। मनुष्य अपने लोभ के वशीभूत हो मित्रों का त्याग कर देता है। अर्थात लोभ के कारण मित्र दूर हट जाते हैं और मनुष्य संसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति (संग) के कारण अनेको दुष्कर्म करता है जिस कारण वह स्वर्ग नहीं जा पाता।

यक्ष

किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन् कः शमश्च प्रकीर्तितः।
दया च का परा प्रोक्ता किं चार्जवमुदाहृतम् ॥3॥

सन्धि विच्छेद : प्रोच्यते = प्र + उच्चते। शमश्च = शमः + च। प्रोक्ता = प्र +उक्ता। चार्जवमुदाहृतम् = च + आर्जवम् + उदाहृतम्। उदाहतम = उत् + आहतम्।

शब्दार्थ : प्रोच्यते = कहा जाता है। प्रकीर्तितः = कहते हैं। शमः = मन की शान्ति, चित्त शान्तिा आर्जवम् = सरलता। उदाहृतम् = कहा गया है।

अन्वय : राजन! ज्ञानं किं प्रोच्यते च शमः कः प्रकीर्तितः। परा दया च का प्रोक्ता च आर्जवम् किं उदाहृतम्।

हिन्दी अनुवाद : हे राजन! ज्ञान किसे कहते हैं? शम क्या है? श्रेष्ठ दया कौन है तथा सरलता किसे कहते

युधिष्ठिर-

ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चित्तप्रशान्तता।
दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता ।।4।।

सन्धि विच्छेद : तत्त्वार्थसम्बोधः = तत्त्व+अर्थसम्बोधः। शमश्चित्तप्रशान्तता। शमः +चित्तप्रशान्तता सर्वसुखैषित्वमार्जवं = सर्वसुख + एषित्वम् + आर्जवं।

शब्दार्थ : तत्त्वार्थसम्बोध = परमात्मा के अर्थ का बोध। चित्त प्रशान्तता = चित्त की विशालता, मन की उदारता। सर्वसुख = सबके सुख (की)। एषित्वं = चाह, इच्छा। समचित्तता = चित्त की समान स्थिति अर्थात हर स्थिति में मन की स्थिति का समान बने रहना।

अन्वय : तत्त्व अर्थ सम्बोधः ज्ञानं चित्त प्रशान्तता शमः सर्वसुख एषित्वं दया (च) समचित्तता आर्जवं (अस्ति)। हिन्दी अनुवाद : परम अर्थ अर्थात परमात्मा का बोध होना ही ज्ञान है। चित्त की
उदारता, विशालता ही शम सबके सुख को चाहना ही दया है तथा चित्त की समस्थिति ही सरलता है।
व्याख्या : प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से ग्रन्थकार ज्ञान, शम, दया तथा सरलता को परिभाषित करते हैं। ईश्वर का वास्तविक बोध ही ज्ञान है। मन की उदारता यानी
विस्तीर्णता ही शम है। सबके सुख की कामना रखना ही दया है। सुख तथा दु:ख, जीवन तथा मरण, उत्थान तथा पतन यानि द्वन्द्व में चित्त में विक्षोभ नहीं होना, चित्त का एक समान रहना ही सरलता है।

यक्ष कः शत्रुर्दुर्जयः पुंसां कश्च व्याधिरनन्तकः ।
को वा स्यात् पुरुषः साधुरसाधुः पुरुषश्च कः ॥5॥

सन्धि विच्छेद : शत्रुर्दुर्जयः = शत्रु: + दुर्जयः। कश्च = कः + चा व्याधिरनन्तकः = व्याधिः + अनन्तकः। साधुरसाधुः = साधु: + असाधुः। पुरुषश्च = पुरुषः + च।

शब्दार्थ : दुर्जयः = जीतने में बहुत कठिन। व्याधिः = रोग। अनन्तकः = अनन्त समाप्त न होने वाला। स्यात = है। साधुः = सज्जन। असाधुः = असज्जन। निर्दयः = क्रूर। अन्वय : पुंसां दुर्जयः शत्रुः कः च अनन्तकः व्याधिः कः। कः साधुः पुरुष वा स्यात् च असाधुः पुरुषः कः।

हिन्दी अनुवाद : व्यक्ति का जीतने में कठिन शत्रु कौन है और समाप्त न होने वाला रोग कौन है? कौन सज्जन व्यक्ति होता है और असज्जन व्यक्ति कौन है?
युधिष्ठिर- क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तकः सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः ।।6।।।।6।।

सन्धि विच्छेद : शत्रुर्लोभी – शत्रु: + लोभः व्याधिनतका व्याधिः । अनन्तकः। साधुरसाधुर्निर्दय: साधु: + असाधु: + निर्दयः।

शब्दार्थ : सुदुर्जय: – जीतने में अत्यन्त कलिना स्मृतः याद किया जाता है, माना जाता है।

अन्वय : सुदुर्जयः शत्रुः क्रोधः (च) अनन्तक: व्याधि; लोधा सर्वदूत हितः साधुः (च) निर्दयः असाधुः स्मृतः।

हिन्दी अनुवाद : जीतने में अत्यन्त कठिन शत्रु क्रोथ है और कभी समाप्त नहीं होने वाली व्याधि लोभ है। सभी प्राणियों के कल्याण में तत्पर व्यक्ति साधु तथा निर्दयी
व्यक्ति को असाधु माना जाता है। व्याख्या : महाभारत के ‘वन पर्व’ से संकलित पाठ ‘यक्ष युधिष्ठिर संवाद’ का यह श्लोक हमें अजेय शत्रु, अनन्त व्याधि, साधु तथा असाधु का सही अर्थ बताता है। शरीर में स्थित षड्दोषों में एक दोष क्रोध हमारा सबसे कठिन शत्रु है। उन्हीं दोषों में एक दोष लोभ हमारा कभी नहीं समाप्त होने वाला रोग है। लोभ की जितनी पूर्ति की जाय, वह बढ़ता ही जाता है। सबके कल्याण की कामना करने वाला साधु पुरुष होता है तथा क्रूर कर्मा व्यक्ति ही असाधु कहे जाते हैं जो दूसरों से निर्दयतापूर्ण व्यवहार

यक्ष-

किं स्थैर्यमृषिभिः प्रोक्तं किं च धैर्यमुदाहृतम् ।
स्नानं च किं परं प्रोक्तं दानं च किमिहोच्यते ॥7॥

सन्धि विच्छेद : स्थैर्यमृषिभिः = स्थैर्यम् + ऋषिभिः धैर्यमुदाहृतम् = धैर्यम् + उदाहृतम्। किमिहोच्यते =किम किम् + इह + उच्यते।

शब्दार्थ : स्थैर्यम् = स्थिरता। ऋषिभिः = ऋषियों द्वारा। धैर्यम् = धैर्य, धीरजा कि= क्या। इह = इस संसार में।

अन्वय : ऋषिभिः स्थैर्यम किं प्रोक्तं च धैर्यम् किं उदाहृतम् च पर स्नान कि प्रोक्त च इह दानं किं उच्यते।
हिन्दी अनुवाद : ऋषियों द्वारा स्थिरता किसे कहा गया है और धैर्य क्या बताया गया है तथा श्रेष्ठ स्नान किसे कहा गया है और इस संसार में दान किसे कहा गया है?

युधिष्ठिर-

स्वधर्म स्थिरता स्थैर्य धैर्यमिन्द्रियनिग्रहः ।
स्नानं मनोमलत्यागो दान वै भूतरक्षणम् ॥8॥

सन्धि विच्छेद । धैर्यमिन्द्रियनिग्रहः – धैर्यम् + इन्द्रियविप्रहा। मनोमलत्यागः कर होने मनीमल + त्यागः।

शब्दार्थ : इन्द्रियनिग्रहः = इन्द्रियों पर नियन्त्रण अर्थात मन पर नियन्त्रण। भूतरक्षणम् = प्राणियों की रक्षा।

अन्वय : स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यम् इन्द्रियनिग्रहः धैर्यम्। मनोमल त्यागो स्नानं वै भूतरक्षणम् दानम्।

हिन्दी अनुवाद : अपने धर्म में स्थिर रहना ही स्थैर्य है। इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना धैर्य है। मन के दोषों का त्याग करना स्नान है तथा प्राणियों की रक्षा दान है।
व्याख्या : महाभारत के वन पर्व से संकलित यक्ष युधिष्ठर संवाद का यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि- अपने द्वारा अपनाये गये धर्म अर्थात कर्म में स्थिर रहना
चाहिए। यही स्थिरता है। इन्द्रियों के वशीभूत हो अनीति पूर्ण कार्यों को नहीं करना चाहिए। वास्तविक धैर्य इन्द्रियों पर लगाम लगाना ही है। मन के मुख्य छः दोषों के त्याग के लिये सतत प्रयास करना चाहिए। वास्तविक स्नान यही है तथा प्राणियों की रक्षा करना ही सही दान है। युधिष्ठिर का यह उत्तर वर्तमानकाल में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना महाभारत काल में था।

यक्ष – कः पण्डितः पुमा यो नास्तिकः कश्च उच्चते। को मूर्खः कश्च कामः स्यात् को मत्सर इति स्मृतः ॥9॥

सन्धि विच्छेद : पुमा यो = पुमान् + ज्ञेयः। नास्तिकः = न + आस्तिकः। कश्च = कः + च।

शब्दार्थ : पुमान् = पुरुष, व्यक्ति। ज्ञेयः = जाना जाता है। नास्तिकः = अनीश्वर वादी, ईश्वर तथा वेद को नहीं मानने वाला। कामः = इच्छा, वासना। मत्सर =
ईर्ष्या, द्वेष। इति = ऐसा। स्मृतः = याद किया जाता है।

अन्वय : कः पुमान् पण्डितः ज्ञेयः च क: नास्तिकः उच्यते। मूर्खः कः च कामः कः स्यात् (च) क: मत्सरः इति स्मृतः।

हिन्दी अनुवाद : कौन व्यक्ति पण्डित जाना जाता है और कौन नास्तिक कहलाता है? मूर्ख कौन है, काम क्या है और ईर्ष्या किसे कहते हैं?

युधिष्ठिर-

धर्मज्ञः पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते।
कामः संसारहेतुश्च हत्तापो मत्सरः स्मृतः ॥10॥

सनि विच्छेद : संसारहेतुश्च = संसारहेतुः + चा हत्तापो = हृत् + तापः।

शब्दार्थ : संसार हेतुः = संसार का कारण, सृष्टि के उद्भव का कारण। हृत् – हृदय। तापः = दाह, जलन।

अन्वय : धर्मज्ञः पण्डितः ज्ञेयः (च) नास्तिक: मूर्ख उच्यते। काम: संसारहेतुः हृत् तापः मत्सर इति स्मृतः।

हिन्दी अनुवाद धर्म को जानने वाला ही पण्डित जाना जाता है और मूर्ख हीनास्तिक कहे जाते हैं। काम संसार का कारण है और हृदय की जलन को ही ईर्ष्या कहते हैं।

व्याख्या व्यास रचित महाभारत के वन पर्व सेसंकलित ‘यक्ष युधिष्ठर संवाद के इस श्लोक में यक्ष के प्रश्नों के उत्तर में युधिष्ठिर यह स्पष्ट करते हैं कि जो धर्म
को भलीभाँति जानता है, जो यह ठीक तरह सेसमझता है कि किस परिस्थिति में हमारा कर्म, हमारा आचरण क्या होना चाहिए, वही पण्डित कहलाने का अधिकारी है। मूर्ख ही नास्तिक कहलाता है। काम ही संसार का कारण है। अर्थात हमारी इच्छाएँ, वासनाएँ ही सांसारिक कार्य कलापों तथा जन्म-मरण का कारण है और हृदय के ताप अर्थात दाह या जलन को ही मत्सर कहते हैं।

अभ्यासः (मौखिकः)

1. संस्कृत भाषया उत्तराणि वदत-

(क) केनस्वित् आवृतो लोक
(ख) किं ज्ञानम्
(ग) पुंसां दुर्जयः शत्रुः कः
(घ) कः अनन्तक व्याधिः
(ङ) कः साधुः
(च) कुतः मित्राणि त्यजति
(छ) केन स्वर्गं न गच्छति
(ज) का दया
(झ) किं ज्ञानम्
(ज) किं स्थैर्यम्

उत्तर—

(क) अज्ञानेन आवृतोलोकः।
(ख) तत्त्वार्थ संबोधः ज्ञानम्।
(ग) क्रोधः पुंक दुर्जयः शत्रुः।
(घ) लोभः अनन्तकः व्याधिः।
(ङ) सर्वभूतहितः साधुः।
(च) लोभात् मित्राणि त्यजति।
(छ) सङ्गात् स्वर्गं न गच्छति।
(ज) दया सर्वसुखैषित्वम्।
(झ) ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः।
(ज) स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यम्।

अभ्यासः (लिखितः)

1. एकवाक्येन संस्कृतभाषया उत्तराणि लिखत-

(क) किं धैर्यमुदाहृतम
(ख) स्नानं किमुच्यते
(ग) भूतानां लक्षणं किमस्ति
(घ) कः पुमान् पण्डितः ज्ञेयः
(ङ) संसारहेतुः कोऽस्ति

उत्तर

(क) इन्द्रियनिग्रहः धैर्यम् अस्ति।
(ख) मनोमलत्यागो स्नानम् उच्यते।
(ग) भूतानां रक्षणं दानम् अस्ति।
(घ) धर्मज्ञः पुमान् पण्डितः ज्ञेयः।
(ङ) संसारहेतुः कामः अस्ति।

2. उदाहरणम् अनुसृत्य अधोलिखित वाक्येषु रेखाङ्गितपदानि आधृत्य प्रश्नान् विरचयत-

उदाहरण—सूर्योदयेन अन्धकारः नश्यति।

प्रश्न -केन अन्धकारः नश्यति

(क) तमसा लोक न प्रकाशते।
(ख) ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः।
(ग) क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुः।
(घ) अनन्तकः व्याधिः लोभः।
(ङ) स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यम्।

उत्तर-

(क) केन लोकः न प्रकाशते
(ख) किं ज्ञानम्
(ग) कः सुदुर्जयः शत्रुः
(घ) कीदृशः व्याधिः लोभः
(ङ) कस्मिन् स्थिरता स्थैर्यम्

3. अधोलिखित वाक्येषु कोष्ठात् समुचितं पदमादाय रिक्तस्थानानि पूरयत-

(क) लोकः …….आवृतः। (अज्ञानेन, ज्ञानेन)
(ख)………सुदुर्जयः शत्रुः(लोभ:, क्रोध:)
(ग)अनन्तकः व्याधिः …….।(लोभः, क्रोधः)
(घ) साधु ………स्मृतः ।(सदयः, निर्दयः)
(ङ) इन्द्रियनिग्रहः ……। (अधैर्यम्, धैर्यम्)

उत्तर-

(क) (अज्ञानेन) (ख) (क्रोधः)
(ग) (लोभ) (घ) (सदयः)
(ङ) (धैर्यम्)

4. संधिविच्छेदं कुरुत-

(क) केनस्विदावृतः = केनस्वित् + आवृतः ।
(ख) केनस्विन्न = केनस्वित् + न
(ग) सुखैषित्वम् = सुख + एषित्वम्
(घ) व्याधिरनन्तकः = व्याधिः + अनन्तकः
(ङ) प्रोच्यते = प्र + उच्यते।

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