9th sanskrit

Bihar board 9th class sanskrit note | लोभाविष्टः चक्रधरः

Bihar board 9th class sanskrit note | पाठ  2 लोभाविष्टः चक्रधरः

Bihar board 9th class sanskrit note

वर्ग – 9

विषय – संस्कृत

पाठ 2 – लोभाविष्टः चक्रधरः

लोभाविष्टः चक्रधरः

(पञ्चतन्त्रं संस्कृतसाहित्यस्य अतीव लोकप्रियो ग्रन्थः। अस्य रूपान्तराणि प्राचीने काले एव नाना वैदेशिकभाषासु कृतानि आसन्। अतएव अस्य संस्कृतभाषायामपि अन्वर्थतः पञ्चतन्त्रम्। तत्र मित्रभेदः, मित्रसम्प्राप्तिः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः, अपरीक्षितकारकं चेति पञ्च भागः सन्ति। अन्तिमस्य भागस्यैव कथाविशेषः पाठेऽस्मिन् संपाद्य प्रस्तुतो वर्तते। अत्र लोभाधिक्यस्य दुष्परिणामः कथाव्याजेन प्रस्तुतः)

(पञ्चतन्त्र संस्कृत साहित्य का बहुत ही लोकप्रिय ग्रन्थ है। इसका प्राचीन कालमें ही अनेको विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। संस्कृत भाषा में भी इसके विविध संस्करण हुए हैं। पाँच भागों में विभक्त होने से यह ग्रन्थ पञ्चतन्त्र है। वे पाँच भाग हैं-मित्रभेदः, मित्र सम्प्राप्ति, काकोलूकीयम्, लब्ध प्रणाश: तथा अपरीक्षितकारकम्। इस पाठ में अन्तिम भाग से ही कथा ली गयी है। यहाँ कथा के माध्यम से अधिक लोभ करने के दुष्परिणाम् को बताया गया है।)

कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः मित्रतां गता वसन्ति स्म। ते दारिद्योपहता मन्त्रं चक्रुः- अहो धिगियं दरिद्रता। उक्तञ्च-

सन्धि विच्छेद: कस्मिंश्चित् = कस्मिन् + चित्। दारिद्रयोपहता = दारिद्रय +उपहता। धिगियं = धिक् + इयं। उक्तञ्च = उक्तम् + च।

शब्दार्थ: कस्मिंश्चित् = किसी। अधिष्ठाने = नगर में। मित्रतां गता = मित्र भाव से। दारिद्रयोपहता दरिद्रता से पीड़ित। उक्तम् = कहा गया है। च = और। मन्त्रं चक्रुः = विचार किया।

हिन्दी अनुवाद: किसी नगर में चार ब्राह्मणपुत्र मित्र भाव से रहते थे। दरिद्रता
से पीड़ित होकर उन्होंने विचार किया- अरे इस दरिद्रता को धिक्कार है। और कहा भी गया है

वरं वनं व्याघ्रगजादिसेवितं
जनेन हीनं बहुकण्टकावृतम्।
तृणानि शय्या परिधानवल्कलं
न बन्धुमध्ये धनहीनजीवितम् ॥

सन्धि विच्छेद : व्याघ्रगजादिसेवितं= व्याघ्र गज + आदि सेवितं। बहुकण्टकावृतम्= बहुकण्टक+आवृतम्।

शब्दार्थ: वरं = श्रेष्ठ, अच्छा। आवृतम् = ढँका हुआ। तृणानि शय्या=घासो का बिछौना। परिधानवल्कलं =छाल का पहनावा,छाल का पोशाक। वन्धुमध्ये = भाईयो के बीच, अपनो के बीच व्याघ्रगजादिसेवितं=बाघ, हाथी आदि से भरे हुए।

अन्वय :व्याघ्रगजादिसेवितं बहुकणटकावृतम् जनेन हीनं वनं (निवसम्) तृणनिशय्या परिधानवल्कलं वरं, (किन्तु) वन्धुमध्ये धनहीन जीवित्तम् न वरम्।

हिन्दी अनुवाद : असंख्य कांटो से ढके हुए बाघ, हाथी आदि से भरे हुए निर्जन वन मे रहना; घासो के सेज पर सोना तथा छाल का बना वस्त्र पहनना अच्छा है, परन्तु धनहीन होकर अपनो के बीच रहना उचित नहीं है
भाव: प्रस्तुत पद्य ‘ पञ्चतन्त्र ‘ के पाँचवे तन्त्र ‘ अपरीक्षितकारकम् ‘ से संकलित है। इसके माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि गरीबी बहुत बड़ा अभिशाप है। धनहीन व्यक्ति को पग-पग पर अपमान सहना पड़ता है। अतः धनहीनता की स्थिति में भाई-बन्धुओं के बीच रह कर पग-पग अपमानित होकर रहने से अच्छा है कठिनाइयों को सहकर भयानक संकटों के बीच निर्जन वन में रहना।

‘ तद्गच्छामः कुत्रचिदर्थाय ‘ इति संमन्त्र्य स्वदेशं परित्यज्य प्रस्थिताः। क्रमेण गच्छन्तः ते अवन्तीं प्राप्ताः। तत्र क्षिप्राजले कृतस्नाना महाकालं प्रणम्य यावन्निर्गच्छन्ति, तावभैरवानन्दो नाम योगी सम्मुखो बभूव। तेन ते पृष्टाः- कुतो भवन्तः समायाताः? किं प्रयोजनम्?
ततस्तैरभिहितम्- वयं सिद्धियात्रिकाः। तत्र यास्यामो यत्र धनाप्तिम॒त्युर्वा भविष्यतीति। एष निश्चयः। उक्तञ्च-

सन्धि विच्छेद: कुत्रचिदर्थाय = कुत्रचित् + अर्थाय। यावन्निर्गच्छन्ति = यावत् +निर्गच्छन्ति। ततस्तैरभिहितम् = ततः + तैः + अभिहितम्। धनाप्तिम॒त्युर्वा = धन +आप्तिः + मृत्युः + वा। भविष्यतीति = भविष्यति + इति।

शब्दार्थ: कुत्रचित् = कहीं। तद्गच्छामः = तब जाते हैं। अर्थाय = धन के लिये।
संमन्त्र्य = विचार कर प्रस्थिता = प्रस्थान किये। क्रमेण क्रमशः। कृतस्नाना =
स्नान कर। प्रणम्य = प्रणाम कर। यावत् = जब तक। निर्गच्छन्ति = निकलते हैं।
तावत् = तब तक। पृष्टाः = पूछे गये। तेन = उसके द्वारा। समायाताः = आए हैं।
भवन्तः = आपलोग। प्रयोजनम् = उद्देश्य। ततः = तब। तैः = उनके द्वारा। अभिहितम्

हिन्दी अनुवाद: ‘ तब धन के लिये कहीं चलते हैं ‘ ऐसा विचार कर उन्होंने स्वदेश का परित्याग कर प्रस्थान किया। क्रमशः आगे बढ़ते हुए उन्हें उज्जयनी नगरी मिली। वहाँ क्षिप्रा नदी के जल में स्नान कर महाकालेश्वर शंकर जी को प्रणाम कर जब वे बाहर आये तब भैरवा-नन्द नामक एक योगी उनके सामने आ गये। उन्होंने उनसे पूछा आप लोग कहाँ से आये हैं? आपलोगों का उद्देश्य क्या है?
तब उनलोगों ने कहा, ‘ हमलोग सिद्धियात्री हैं। हमलोग वहाँ जायेंगे जहाँ या तो धन की प्राप्ति होगी या मृत्यु होगी। यह हमारा निश्चय है। ‘ और कहा भी गया है

अभिमतसिद्धिरशेषा भवति हि पुरुषस्य पुरुषकारेण।
दैवमिति यदपि कथयसि पुरुषगुणः सोऽप्यदृष्टाख्यः ।।

सन्धि विच्छेद : अभिमतसिद्धिरशेषा = अभिमत सिद्धिः + अशेषा। दैवमिति = दैवम्। + इति। सोऽप्यदृष्टाख्यः = स: + अपि + अदृष्ट + आख्यः।

शब्दार्थ: अभिमत सिद्धिः = उद्देश्य की प्राप्ति। अशेषा = समूचा, सम्पूर्ण। भवति: = होती है। पुरुषस्य = व्यक्ति का। पुरुषकारेण = उद्योग करने से, परिश्रम करने से। दैवम् = भाग्य। इति = ऐसा। कथयसि = कहते हैं। अदृष्ट = जो नहीं देखा गया। आख्यः = नामक। यदपि = फिर भी।

अन्वय : पुरुषस्य अभिमत सिद्धि पुरुषकारेण ही अशेषा भवति। यदपि इति कथयसि (यत्) दैवम् (अस्ति) (तु) सः अपि अदृश्ट आख्य: पुरुषगुण: (अस्ति)।
हिन्दी अनुवाद: व्यक्ति के उद्देश्य की प्राप्ति उद्योग करने से सम्पुर्ण होती है। फिर भी ऐसा कहते हैं कि भाग्य है तो वह भी अदृष्ट नामक पुरुष (उद्योग का) गुण ही हैं

तत्कथ्यतामस्माकं कश्चिद्धनोपायः। वयमप्यतिसाहसिकाः उक्तञ्च-

सन्धि विच्छेद ..: तत्कथ्यतामस्माकं = तत् + कथ्यताम् + अस्माकं। कश्चिद्धनोपाय: =कश्चित् + धन + उपायः। वयमप्यतिसाहसिकाः = वयम् + अपि + अतिसाहसिकाः

शब्दार्थ: अस्माकं = हमलोगों का। कथ्यताम् = कहें, बतावें। कश्चित् = कोई हिन्दी अनुवाद: अत: हमें कोई धनप्राप्ति का उपाय बतावें। हमलोग भी बहुत साहसी हैं। कहा भी गया है-

महान्त एव महतामर्थं साधयितुं क्षमाः।
ऋते समुद्रादन्यः को बिभर्ति वडवानलम् ॥

सन्धि विच्छेद: महतामर्थं महतामर्थं = = महताम् + अर्थ अर्थ।। समुद्रादन्यः समुद्रादन्यः = समुद्रात् + अन्यः।

शब्दार्थ : महान्तः = बड़े लोग, महापुरुष। महताम् महान। अर्थम् = कार्य। साधयतुं = साधने में, पूरा करने में। क्षमाः = समर्थ होते हैं। ऋते = विना,
अतिरिक्त। समुद्रात् = सागर से (के)। अन्यः = दूसरा। को = कः = कौन। विभर्ति
= धारण करता है। वडवानलम् = वडवाग्नि = समुद्र की आग।

अन्वय : महान्तः एवं महताम् अर्थं साधयितुं क्षमाः (भवन्ति) (यथा) समुद्रात्
ऋते अन्यः कः वडवानलम् बिभर्ति।
हिन्दी अनुवाद : महान व्यक्ति ही महान कार्यों को साधने में समर्थ होते हैं जैसे
समुद्र के अतिरिक्त दूसरा कौन वाडवाग्नि को धारण कर सकता है। अर्थात् दूसरा कोई
नहीं धारण कर सकता।

भाव : जैसे वडवानल को धारण करने में केवल सागर ही समर्थ है वैसे ही महान कार्यों की सिद्धि केवल महान व्यक्ति ही कर सकते हैं।

‘भैरवानन्दोऽपि तेषां सिद्ध्यर्थं बहूपायं सिद्धवर्तिचतुष्टयं कृत्वा आर्पयत्। आह च-
गम्यतां हिमालयदिशि, तत्र सम्प्राप्तानां यत्र वर्तिः पतिष्यति तत्र निधानमसन्दिग्धं
प्राप्स्यथ। तत्र स्थानं खनित्वा निधिं गृहीत्वा निवर्त्यताम्।

सन्धि विच्छेद : भैरवानन्दोऽपि = भैरवानन्दः + अपि। सिद्ध्यर्थं = सिद्धि + अर्थम्।
निधानमसन्दिग्धं = निधानम् + असन्दिग्धम्। बहूपायं = बहु + उपायं।

शब्दार्थ : सिद्ध्यर्थं = सफलता के लिये। तेषां = उनकी। सिद्धिवर्तिचतुष्टयं = चार
सिद्ध बत्तियाँ। आर्पयत् = दे दिया, अर्पित किया। सम्प्राप्तानां = प्राप्त होने पर,
पहुँचने पर। पतिष्यति = गिरेगी। निधानं = खजाना, कोष। असन्दिग्धं = निस्संदेह।
खनित्वा = खोदकर। निवर्त्यताम् = लौट जाओ। वर्तिः = बत्ती

हिन्दी अनुवाद : भैरवानन्द ने भी उपाय कर उनकी सफलता के लिये सिद्ध बत्ती बनायी तथा उसको चार भागकर उन्हें दे दिया। और कहा,- हिमालय की दिशा में जाओ। वहाँ पहुँचने पर जहाँ बत्ती गिरेगी वहाँ निस्सन्देह खजाना प्राप्त होगा। उस स्थान को खोदकर कोष प्राप्त कर लौट जाना।

‘तथानुष्ठिते तेषां गच्छतामेकतमसय हस्तात् वर्तिः निपपात। अथासौ यावन्तं प्रदेश
खनति तावत्ताम्रमयी भूमिः। ततस्तेनाभिहितम्- ‘अहो! गृह्यतां स्वेच्छया ताम्रम्।’
अन्ये प्रोचुः- ‘भो मूढ! किमनेन क्रियते? यत्प्रभूतमपि दारिद्यं न नाशयति।
तदुत्तिष्ठ, अग्रतो गच्छामः। सोऽब्रवीत्- ‘यान्तु भवन्तः नाहमने यास्यामि।’ एवमभिधाय
तानं यथेच्छया गृहीत्वा प्रथमो निवृत्तः।

सन्धि विच्छेद : तथानुष्ठिते = तथा + अनुष्ठिते। गच्छतामेकतमस्य = गच्छताम् + एकतमस्य। अथासौः = अथ + असौ। यावन्तं = यावत् + तं। तावत्ताम्रमयी = तावत्+ ताम्रमयी। ततस्तेनाभिहितम् – ततः + तेन + अभिहितम्। स्वेच्छया इच्छया। किमनेन = किम् + अनेन। यत्प्रभूतमपि = यत् + प्रभूतम् + आपि। तदुत्तिष्ठ = तत् उत्तिष्ठ। सोऽब्रवीत् = सः + अब्रवीत्। नाहमग्रे = न + अहम् +एवमभिधाय एवम् + अभिधाय। तदुत्रिष्ठ = तत् + उत् + तिष्ठ। यथेच्छया =यथा+ इच्छया।

शब्दार्थ : अनुष्ठिते = कहे अनुसार करते हुए। निपपात् = गिर गयी। अभिहितम् – कहा गया। गृह्यतां = ग्रहण करो, लो। स्वेच्छया = इच्छा भर। पर्याप्त, काफी
उत्तिष्ठ = उठो। अग्रतः = आगे। अभिधाय = कहकर। यथा = जैसी। इच्छया .इच्छा से, इच्छा भर। निवृत्तः
लौट गया।

हिन्दी अनुवाद : कहे अनुसार जाते हुए उनमें से एक के हाथ से बत्ती गिर गई। इसके बाद जब उसने उस जगह को खोदा तो ताम्रमयी भूमि प्राप्त हुई। तब उसने कहा, ‘अरे! इच्छा भर ताम्बा ग्रहण करो।’ दूसरे ने कहा- ‘अरे मूर्ख! यह क्या करते हो? क्योंकि प्रचूर ताम्बे से भी दरिद्रता दूर नहीं होगी। अतः उठो, हम आगे चलते हैं।’ वह बोला- ‘आपलोग जाएँ, मैं आगे नहीं जाऊँगा।’ ऐसा कह कर इच्छा भर ताम्बा लेकर
पहला लौट गया।

‘ते त्रयोऽप्यग्रे प्रस्थिताः। अथ किञ्चिन्मात्रं गतस्य अग्रेसरस्य वर्तिः निपपात, सोऽपि यावत् खनितुमारभते तावत् रूप्यमयी क्षितिः। ततः प्रहर्षितः आह- गृह्यतां यथेच्छया रूपयम्। नाग्रे गन्तव्यम्। किन्तु अपरौ अकथयताम्- आवामग्रे यास्यावः। एवमुक्त्वा
द्वावप्यग्रे प्रस्थितौ। सोऽपि स्वशक्त्या रूप्यमादाय निवृत्तः।

सन्धि विच्छेद : त्रयोप्यग्रे = त्रयः + अपि + अग्रे। किञ्चिन्मानं = किंचित् + मात्र। सोऽपि = सः अपि। खनितुमारभते = खनितुम् + आरभते। नाग्रे = न + अग्रे। आवामग्रे = आवाम् + अग्रे। एवमुक्त्वा = एवम् + उक्त्वा। द्वावप्यग्रे = द्वौ + अपि + अग्रे। रूप्यमादाय = रूप्यम् + आदाय।

शब्दार्थ : त्रयोप्यग्रे तीनों ही आगे की ओर। प्रस्थिताः = प्रस्थान किये। किञ्चिन्मात्रं = थोड़ी दूर। यावत् = जब। खनितुमारभते = खोदना आरम्भ किया। तावत् = तब। रूप्यमयी = रजतमयी, चाँदीमयी। क्षितिः = धरती। रूप्यम् =चाँदी, रजत। नाग्रे = आगे नहीं। अपरौ = अन्य दोनों। स्वशक्त्या = अपनी सामर्थ्य भर। आदाय = लेकर।

हिन्दी अनुवाद : वे तीनों ही आगे चले। इसके बाद थोड़ी दूर जाने पर आगे जानेवाले की बत्ती गिर पड़ी। जब वह (उस जगह को) खोदना आरम्भ किया तब
रजतमयी धरती दिखी। तब खुश होकर वह बोला, ‘जितनी इच्छा हो चाँदी ले लो। (अब) आगे नहीं जाना चाहिए।” किन्तु अन्य दोनों ने कहा- हम दोनों आगे जाएँगे। ऐसा कह कर दोनों ही आगे चले। वह भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार चाँदी लेकर लौट गया।

‘अथ तयोरपि गच्छतोरेकस्याने वर्तिः पपात। सोऽपि प्रहृष्टो यावत् खनति तावत् सुवर्णभूमिं दृष्ट्वा प्राह- ‘भोः गृह्यतां स्वेच्छया सुवर्णम् सुवर्णादन्यन्न किञ्चिदुत्तमं
भविष्यति।’ अन्यस्तु प्राह- :मूढ! न किञ्चिद् वेत्सि। प्राक्ताम्रम् ततो रूप्यम्, ततः सुवर्णम्। तन्नूनम् अतःपरं रत्नानि भविष्यन्ति। तदुत्तिष्ठ, अग्रे गच्छावः। किन्तु तृतीयः यथेच्छया स्वर्णं गृहीत्वा निवृत्तः।

सन्धि विच्छेद : तयोरपि = तयोः + अपि गच्छतोरेकस्याग्रे = गच्छतोः + एकस्य अग्रे। सुवर्णादन्यन्न = सुवर्णात् + अन्यत् + न। किञ्चिदुत्तमं = किञ्चित् + उत्तम। अन्यस्तु = अन्यः + तु। प्राक्ताम्रम् = प्राक् + ताम्रम्। तन्नूनम् = तत् + नूनम्।

शब्दार्थ : अथ = इसके बाद। गच्छतोरेकस्याग्रे = आगे जाते हुए एक की। पपात = गिर गई। प्रहष्टो = प्रसन्न हो गया। किञ्चित् = कुछ भी। वेत्सि = जानते हो।
प्राक् = अवश्य। परं श्रेष्ठ, मूल्यवान। प्राह = बोला। तु = किन्तु।

हिन्दी अनुवाद : इसके बाद उन दोनों के आगे जाने पर एक की बत्ती गिर पड़ी। वह भी प्रसन्न हो गया और जब वहाँ खोदा तो स्वर्णमयी धरती देखकर बोला-
‘हमलोग पूरी इच्छा भर सोना ले लें। सोना से उत्तम दूसरा कुछ भी नहीं होगा। किन्तु दूसरे ने कहा- ‘मूर्ख! तुम कुछ भी नहीं जानते हो। सबसे पहले ताम्बा, तब चाँदी, तब सोना मिला। अतः (अब आगे) निश्चय ही उत्तम रत्न होंगे। इसलिये उठो, आगे चलें किन्तु तीसरा इच्छा भर सोना लेकर लौट गया।

अनन्तरं सोऽपि गच्छन्नेकाकी ग्रीष्मसन्तप्ततनुः पिपासाकुलितः मार्गच्युतः इतश्चेतश्च बभ्राम। अथ भ्राम्यन् स्थलोपरि पुरुषमेकं रुधिरप्लावितगात्रं भ्रमच्चक्रमस्तकमपश्यत् ततो द्रुततरं गत्वा तमवोचत्- ‘भोः को भवान्? किमेवं चक्रेण भ्रमता शिरसि
तिष्ठसि? तत् कथय मे यदि कुत्रचिज्जलमस्ति।

सन्धि विच्छेद : गच्छन्नेकाकी = गच्छन् + एकाकी। पिपासाकुलितः = पिपासा + आकुलितः। इतश्चेतश्च = इत: + च + इत: + च। स्थलोपरि = स्थल + उपरि।
पुरुषमेकं = पुरुषम् + एक। भ्रमच्चक्रमस्तकमपश्यत् = भ्रमत् + चक्र + मस्तकम् + अपश्यत्। तमवोचत् = तम् + अवोचत्। किमेवं = किम् + एवं कुत्रचिज्जलमस्ति कुत्रचित् + जलम् + अस्ति।

शब्दार्थ : अनन्तरं = इसके बाद। गच्छन् = जाते हुए। एकाकी ग्रीष्मसन्तप्त तनुः = गर्मी से पीड़ित शरीर (वाला)। पिपासा = प्यास से। आकुलितः
= व्याकुला मार्गच्युतः = रास्ता भटका हुआ। इतश्चेतश्च = इधर-उधर। बभ्राम = घूमने लगा, भटकने लगा। भ्राम्यन् = घूमते हुए। रुधिरप्लावित गात्रं
= खून से लथपथ अंग। द्रुततरं = तेजी से। अवोचत् = कहा, बोला। तिष्ठसि = रहते हो। कुत्रचित्= कहीं।

हिन्दी अनुवाद : इसके बाद अकेले जाता हुआ, गर्मी से पीड़ित और प्यास से व्याकुल होकर मार्ग भटक कर वह इधर-उधर घूमने लगा। इसके बाद उसी प्रकार
घूमते हुए एक स्थान पर एक ऐसे व्यक्ति को देखा, जिसके अंग खून से लथपथ थे तथा मस्तक पर एक चक्र घूम रहा था। तब वह तेजी से वहाँ जाकर उससे बोला ‘आप कौन हैं? क्या इसी प्रकार मस्तक के ऊपर चक्र घूमते हुए आप रहते हैं? मुझे बताइये
क्या यहाँ कहीं जल है?’

एवं तस्य प्रवदतस्तच्चक्रं तत्क्षणात्तस्य शिरसो ब्राह्मणमस्तके आगतम्। सः आह- किमेतत्? स आह- ममाप्येवमेतच्छिरसि आगतम्। स आह- तत् कथय,
कदैतदुत्तरिष्यति? महती मे वेदना वर्तते।’ स आह- ‘यदा त्वमिव कश्चिद् धृतसिद्धवर्तिरेवमागत्य त्वामालापयिष्यति तदा तस्य मस्तके गमिष्यति।’
इत्युक्त्वा स गतः। अतः उच्यते-

सन्धि विच्छेद : प्रवदतस्तच्चक्रं = प्रवदतः + तत् + चक्रं। किमेतत् = किम् + एतत्। ममाप्येवमेतच्छिरसि = मम + अपि + एवम् + एतत् + शिरसि। कदैतदुत्तरिष्यति = कदा + एतत् + उत्तरिष्यति। त्वमिव = त्वम् + इव। धृतसिद्धवर्तिरेवमागत्य धृतसिद्धवर्तिः + एवम् + आगत्य। त्वमिव = त्वम् + इव। त्वमालापयिष्यति = त्वम् + आलापयिष्यति। आलापयिष्यति = आलापय् + इष्यति। इत्युक्त्वा = इति + उक्त्वा। तत्क्षणात्तस्य = तत् + क्षणात् + तस्य।

शब्दार्थ : प्रवदतः = कहते ही। तत्क्षणात् = उस समय से, उसी क्षण से। शिरसः मस्तक से। एतत् = यह। शिरसि = माथे पर। कदा = कब। उतरिष्यति = उतरेगा।
त्वाम् = तुमको, तुमसे। आलापयिष्यति = कहेगा। त्वमिव = तुम्हारे समान। कश्चिद् = कोई। धृतसिद्धवर्तिः = सिद्धवत्ती को धारण करने वाला।

हिन्दी अनुवाद : इस प्रकार उसके ऐसा कहते ही उसी क्षण वह चक्र उसके सिर से ब्राह्मण के मस्तक पर आ गया। वह ब्राह्मण बोला- यह क्या? वह व्यक्ति बोला-
मेरे सिर पर भी यह इसी प्रकार आया था। वह ब्राह्मण बोला- तब कहो यह कब उतरेगा। मुझे काफी पीड़ा हो रही है।’ वह व्यक्ति बोला- ‘जब तुम्हारे ही समान कोई
सिद्धबत्ती धारण करने वाला इसी प्रकार आकर तुमसे पूछेगा तब यह चक्र उसके मस्तक पर चला जायेगा। ऐसा कहकर वह चला गया। इसलिये कहा गया है-

अतिलोभो न कर्तव्यो लोभं नैव परित्यजेत्।
अतिलोभाभिभूतस्य चक्रं भ्रमति मस्तके॥

सन्धि विच्छेद : नैव = न + एव। अतिलोभाभिभूतस्य = अतिलोभ + अभिभूतस्य। शब्दार्थ : मरित्यजेत् = छोड़ना चाहिए। नैव = न ही। अतिलोभः = बहुत अधिक लोभा अभिभूतस्य = ग्रस्त का, पीड़ित का।

अन्वय : अतिलोभः न कर्तव्यः (च) न एव लोभं परित्यजेत् (यत:) अतिलोभ अभिभूतस्य (पुरुषस्य) मस्तके चक्रं भ्रमति।

हिन्दी अनुवाद : अधिक लोभ नहीं करना चाहिए और न ही लोभ का त्याग करना चाहिए। अधिक लोभ से ग्रस्त व्यक्ति के मस्तक पर चक्र घूमने लगता है।

भाव : जीवन को सुचारु ढंग से व्यतीत करने हेतु अल्पलोभ आवश्यक है। थोड़ा लोभ करना अनुचित नहीं है। लेकिन अधिक लोभ से ग्रस्त व्यक्ति हमेशा चिन्तित और परेशान रहता है। अतः अधिक लोभ नहीं करना चाहिए। व्याकरण

व्याकरण

1. समास विग्रहः

ब्राह्मणपुत्राः = ब्राह्मणस्य पुत्राः (षष्ठी तत्पुरुष समास)
दारिद्योपहताः दारिद् उपहताः (तृतीया तत्पुरुष स०)
बहुकण्टकावृतम् बहूनि कण्टकानि (कर्मधारय) तैः आवृतम् (तृतीय तत्पु० स०)
बन्धुमध्ये बन्धूनां मध्ये (षष्ठी तत्पुरुष)
कृतस्नानाः कृतं स्नानं यैः ते (बहुव्रीहि समास)
धनाप्तिः = धनस्य आप्तिः (षष्ठी तत्पुरुष)
स्वेच्छया = स्वस्य इच्छया (षष्ठी तत्पुरुष)
बहूपायम् = बहवः उपायाः यस्मिन् तत् (बहुव्रीहि)
सिद्धियात्रिका: सिद्धेः यात्रिकाः (षष्ठी तत्पुरुष)
मार्गच्युतः मार्गात् च्युतः (पञ्चमी तत्पुरुष)
ग्रीष्मसन्तप्ततनुः ग्रीष्मेन सन्तप्ता (तृतीय तत्पुरुष) तथा भूता तनुः यस्य सः
(बहुव्रीहि)
पिपासाकुलितः = पिपासया आकुलितः (तृतीय तत्पुरुष)
भ्रमच्चक्रमस्तकम् = भ्रमत् च तत् चक्रं भ्रमच्चक्रम् (कर्मधारय स०) भ्रमच्चक्रं
मस्तके यस्य तम् भ्रमच्चक्रमस्तकम् (बहुव्रीहि स०)
सिद्धवर्तिचतुष्टयम् = सिद्धाः वर्तयः तासां चतुष्टयम् (कर्मधारयः, षष्ठी तत्पुरुष)
सजीवः = जीवनेन सह वर्तमानः (सहार्थ बहुव्रीहि)

2. प्रकृति-प्रत्ययविभाग-व्युत्पतिः

उक्तम् = Vवच् + क्त।
संमन्त्र्य = सम् + Vमन्त्र् + ल्यप्
परित्यज्य = परि + Vत्यज् + ल्यप्
प्रस्थिताः -प्र+स्था + क्तः
प्रणम्य = प्रच्छ् + क्त
समायाताः = सम + आ + या + क्त
कृत्वा = कृ + क्तवा
गृहीत्वा Vग्रह् + क्त्वा
निवृत्तः = नि + Vवृत् + क्त
उक्त्वा Vवच् + क्त्वा
आदाय = आ + दा + ल्यप्
प्रहष्टः = प्र + ।हष् + क्त
दृष्ट्वा = दृश् + क्त्वा

अभ्यासः (मौखिकः)

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तरम् एकपदेन दत्त-

(क) गृहं परित्यज्य ब्राह्मणपुत्राः प्रथमं कुत्र गताः?
(ख) योगी भैरवानन्दः तान् किम् आर्पयत्?
(ग) ताम्रस्य अनन्तरं तेन किं प्राप्तम्?
(घ) तृतीयः ब्राह्मणः खनित्वा किम् अपश्यत्?
(ङ) अतिलोभाभिभूतस्य जनस्य मस्तके किं भ्रमति?

उत्तर-

(क) अवन्ती
(ख) सिद्धिवर्ति चतुष्टयम्
(ग) रूप्यम्
(घ) सुवर्णम्
(ङ) चक्रम्

2. संधिविच्छेदं कुरुत-

इतश्चेतश्च = इतः + च + इतः + च
किञ्चन्मात्रम् = किञ्चित् + मात्रम्
सत्रयोऽप्यग्रे
= त्रयः + अपि + अग्रे
समुद्रादन्यः समुद्रात् + अन्यः
तयोरपि = तयोः + अपि

3. समास विग्रहं कुरुत-

पिपासाकुलितः = पिपासया आकुलितः (तृतीया तत्पुरुष)
स्वेच्छया = स्वस्य इच्छया (षष्ठी तत्पुरुष)
कृतस्नानाः = कृतं स्नानं यैः ते (बहुव्रीहि)
बन्धुमध्ये =बन्धुनां मध्ये(तत्पुरुष)
धनाप्तिः= धनस्य आप्तिः (षष्ठी तत्पुरुष)

4. प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत-

प्रणम्य = प्र + नम् + ल्यप्
परित्यज्य = परि + त्यज् + ल्यप्
आदाय = आ + दा + ल्यप्
उक्त्वा = वच् + क्त्वा
प्रस्थितः = प्र +स्था + क्तः

5. विपरीतार्थकान् शब्दान् वदत-

बंधुः = शत्रुः
निश्चयः अनिश्चयः
क्षितिः = आकाशः
आदाय परित्यज्य
अस्माकम् = युष्माकम्

अभ्यासः (लिखितः)

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-

(क) कस्मिंश्चिदधिष्ठाने के वसन्ति स्म?
(ख) ‘गृह्यतां स्वेच्छया ताम्रम्’-एतत् कस्य वचनमस्ति?
(ग) ते किं संमन्त्र्य स्वदेशं परित्यज्य प्रस्थिताः?
(घ) स्वर्णभूमिं दृष्ट्वा तृतीयः ब्राह्मणपुत्रः किम् अवदत्?
(ङ) भैरवानन्दः किम् अपृच्छत्?

उत्तर—

(क) कस्मिंश्चिदधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः वसन्ति स्म।
(ख) ‘गृह्यतां स्वेच्छया ताम्रम्’–एतत् प्रथम ब्राह्मणपुत्रस्य वचनमस्ति।
(ग) ते ‘कुत्रचिदर्थाय गच्छामः’ इति संमन्त्र्य स्वदेशं परित्यज्य प्रस्थिताः।
(घ) स्वर्णभूमिं दृष्ट्वा तृतीयः ब्राह्मणपुत्रः अवदत्-‘भोः’ गृह्यतां स्वेच्छया
सुवर्णम्। सुवर्णात् अन्यत् न किञ्चित् उत्तमं भविष्यति।”
(ङ) भैरवानन्दः अपृच्छत्–“कुतः भवन्तः समायाताः ? किं प्रयोजनं च।”

2. अधोलिखित वाक्येषु रेखाङ्कितपदानि आधारीकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत

(क) ते चापि दारिद्योपहता मन्त्रं चकः।
(ख) बन्धुमध्ये धनहीनजीवितं न वरम्।
(ग) अथ किञ्चिन्मात्र गतस्य अग्रेसरस्य वर्ति: निपपात।
(घ) सिद्धिमार्गच्युतः सः इतश्चेतश्च बभ्राम।
(ङ) सः यावत् खनति तावत् सुवर्णभूमि दृष्ट्वा प्राह।

उत्तर-

(क) मंत्र = ते चापि दारिद्रयोपहता किं चक्रुः?
(ख) बन्धुमध्ये – कस्मिन् मध्ये धनहीनजीवितं न वरम्?
(ग) वर्तिः = अथ किञ्चिन्भात्रं गतस्य अग्रेसरस्य कः निपपात?
(घ) इतश्चेतश्च सिद्धिभार्गच्युतः स कुत्र वभ्राम?
(ङ) सुवर्णभूमि = सः यावत् खनति तावत् किं दृष्ट्वा प्राह?

3. अधोलिखित क्रियापदानां स्ववाक्येषु संस्कृते प्रयोगं कुरुत-

गच्छामः = वयं विद्यालयं गच्छामः।
अभिहितम = तैः अभिहितम्।
प्राक्= प्राक् भारतवर्ष विश्वे श्रेष्ठः।
तिष्ठसि = त्वं कुत्र तिष्ठसि?
उक्त्वा = प्रिय वचनम् उक्त्वा सः गच्छति।

4. कोष्ठान्तर्गतानां शब्दानां साहाय्येन रिक्त स्थानानि पूरयत-

प्रदेशं, नाहमग्र, वेत्सि, रत्नानि, स्वर्णम्

(क) सोऽब्रवीत्- यान्तु भवन्तः,…………यास्मि।
(ख) स प्राह- ‘मूढ! न किञ्चिद्………….।
(ग) अथासौ यावन्तं……….खनति तावत्ताम्रमयी भूमिः।
(घ) तृतीयः यथेच्छया………….गृहीत्वा निवृत्तः।
(ङ) नूनम् अत:परं………..भविष्यन्ति।

उत्तर-

(क) नाहमग्रे

(ख) वेत्सि
(ग) प्रदेशं
(घ) स्वर्णम्
(ङ) रत्नानि

5. रेखाङ्कितपदेषु प्रयुक्तां विभक्तिं लिखत

(क) भो मूढ! किम् अनेन क्रियते?
ख) रामस्य भ्राता कुत्र गतः?
(ग) मयं फलं रोचते।
(घ) सः गुहात् बहिः अगच्छत्।
(ङ) एकस्मिन् नगरे एक: नृपः आसीत्।

उत्तर-

(क) अनेन -तृतीया-एकवचन
(ख) रामस्य षष्ठी-एकवचन
(ग) मयं चतुर्थी-एकवचन
(घ) गृहात् पंचमी-एकवचन
(ङ) एकस्मिन् = सप्तमी-एकवचन

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