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bihar board class 9th hindi notes | मैं नीर भरी दुःख की बदली

मैं नीर भरी दुःख की बदली

bihar board class 9th hindi notes

वर्ग – 9

विषय – हिंदी

पाठ 5 – मैं नीर भरी दुःख की बदली

मैं नीर भरी दुःख की बदली
                                              -महादेवी वर्मा
                कवि – परिचय

महादेवी वर्मा का जन्म 1907 ई . में उत्तरप्रदेश के फर्रुखाबाद शहर में हुआ था । उनकी शिक्षा – दीक्षा प्रयाग में हुई । प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्राचार्य पद पर लंबे समय तक कार्य करते हुए उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए काफी प्रयल किए । सन् 1987 ई में उनका देहांत हो गया ।
‘ नीहार ‘ , ‘ रश्मि ‘ , ‘ यामा ‘ , ‘ दीपशिखा ‘ उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं । कविता के साथ – साथ उन्होंने सशक्त गद्य रचनाएँ भी की हैं , जिनमें रेखाचित्र तथा संस्मरण प्रमुख हैं । अतीत के चलचित्र , स्मृति की रेखाएँ , पथ के साथी , श्रृंखला की कड़ियाँ इत्यादि उनकी गद्य – रचनाएँ हैं|
महादेवी वर्मा छायावाद के चार स्तम्भों में एक विशिष्ट स्थान रखती हैं । उन्होंने 1929 से लिखना शुरू किया जिनमें उनकी कविता के क्षेत्र में सक्रिय रचनाशीलता लगभग दो दशकों 1992 ई . तक सीमित है । उनकी रचनाएँ आत्मपरक विषय प्रधान रचनाएँ हैं , जिनमें कवयित्री ने अपने ही लौकिक अलौकिक , सुख – दुखों को अभिव्यक्ति दी है । यह वस्तुगत सीमा शिल्प को भी सीमावश कर देती है । उन्होंने केवल प्रगीतों की रचना की है , जिनमें दुःख , वेदना और करुणा की अभिव्यक्ति है । अपनी प्रेमानुभूति में उन्होंने अज्ञात और असीम प्रियतम को संबोधित किया है , इसलिए उनकी कविता में आलोचकों ने रहस्यवाद की खोज की है और उन्हें रहस्यवाद की कवयित्री माना है ।

महादेवी वर्मा की काव्य – रचना के पीछे एक और स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा है तो दूसरी ओर भारतीय समाज में स्त्री – जीवन की वास्तविक स्थिति का बोध भी है । यही कारण है कि उनके काव्य में जागरण की चेतना के साथ स्वतंत्रता की कामना की अभिव्यक्ति है और दुःख की अनुभूति के साथ करुणा बोध भी है । दूसरे छायावादी कवियों की तरह महादेवी वर्मा के प्रगीतो में भक्तिकाल के गीतों की प्रतिध्वनि है और लोकगीतों की अनुगूंज भी लेकिन इन दोनों के साथ ही उनके गीतों में आधुनिक बौद्धिक मानस के द्वंद्वों की अभिव्यक्ति ही प्रमुख है ।
महादेवी वर्मा के गीत अपने विशिष्ट रचाव और संगीतात्मकता के कारण अत्यंत आकर्षक हैं । उनमें लाक्षणिकता , चित्रमयत्ता और विवधर्मिता है । महादेवी ने नए विबों और प्रतीकों के माध्यम से प्रगीत की अभिव्यक्ति द्वारा शक्ति का नया विकास किया है । उनकी काव्य – भाषा प्रायः तत्सम शब्दों से निर्मित है । महादेवी मानती हैं कि समष्टि में अपने आप को लय कर देना ही कवि की मुक्ति । इस धारणा का उपयुक्त प्रतीक उन्होंने बादल को पाया है , जो धरती को हरा – भरा करके और हर चीज को विकास का वातावरण देकर स्वयं मिट जाता है । इनमें दुख किसी व्यक्तिगत अभाव का पर्याय न होकर एक संवेदनशील करुणा भाव का ही प्रतीक है ।
कविता का भावार्थ
‘ मैं नीर भरी दुख की बदली ‘ महादेवी की कविता संग्रह ‘ यामा ‘ से ली गयी है । कवयित्री को व्यक्तिगत अभावों से पैदा होनेवाला दुख इतना मूल्यवान और स्पृहणीय हो जाता है कि उसके निरंतर होने की कामना करती है और अपने को नीर भरी दुख की बदली कहती है । बदली जन से भरी होती है । बदली का जल अपने लिए नहीं होता , सृष्टि के लिए होता है ; वह तप्त विश्व को नहलाती है । बादल विश्व के लिए जल लेकर आता है और पूरे आकाश में छा जाता है । लगता है कि पूरा आकाश उसका अपना किंतु जल बरसाकर उसका समूचा अस्तित्व समाप्त होजाता है । उसी तरह करुणाशील व्यक्तित्व भी संसार में करुणा का जल लेकर आता है ; अपने वह तो दूसरों के ही सुख – दुख से सुखी – दुखी होता रहता है और अपने को बाँटता रहता है । इसी उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है । नभ में उसका अपना कोई कोना भले न हो , किन्तु जहाँ कहाँ हरीतिमा का उल्लास और सौन्दर्य है उसमें वह व्याप्त है । इसी तरह करुणशील व्यक्तित्व अपने को मिटाकर संतप्त प्राणियों के सुख – चैन में व्याप्त हो जाता है । महादेवी की कविताओं में ध्वनित दुख या करुणा की यही दिशा है ।

कविता के साथ

प्रश्न 1. महादेवी अपने को ‘ नीर भरी दुख की बदली ‘ क्यों कहती हैं ?

उत्तर – कवयित्री को व्यक्तिगत अभावों से पैदा होने वाला दुख इतना मूल्यवान और स्पृहणीय हो जाता है कि उसके निरंतर होने की कामना करती है और अपने को नौर भरी दुख की बदली कहती है । बदली जल से भरी होती है । बदली का जल अपने लिए नहीं होता सृष्टि के लिए होता है , वह तप्त विश्व को नहलाती है । बदली अपना जल बरसा कर अपना समूचा अस्तित्व समाप्त कर लेता है । उसी तरह करुणाशील व्यक्तित्व भी संसार में करुणा का जल लेकर आता है और अपने आँसुओं द्वारा संतप्त हृदयों पर बरसाता है । उसका अपना कोई निजी सुख – दुख नहीं होता इसलिए महादेवी अपने को नीर भरी दुख की बदली कहती हैं ।

प्रश्न 2. निम्नांकित पंक्तियों का भाव स्पष्ट करें ।

( क ) मैं क्षितिज – भृकुटि पर घिर धूमिल चिंता का भार बनी अविरल रज – कण पर जल – कण हो बरसी नव – जीवन अंकुर बन निकली ।

उत्तर – प्रस्तुत पक्तियाँ महादेवी वर्मा की कविता ‘ मैं नीर भरी दुख की बदली ‘ से उद्धृत हैं । इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री कहना चाहती है कि मैं क्षितिज ( जहाँ आकाश और पृथ्वी का मिलन दीखता है उसे क्षितिज कहते हैं । ) में घिरा धूमिज जरूर हैं परन्तु वहीं जलकण के रूप में उड़ते हुए धूल पर बरसती हूँ तो वहाँ नया जीवन का संचार हो जाता है । जब व्यक्ति के जीवन में दुख होता है तो ऐसे में उसके संतप्त हृदय को शांत करने वाली के रूप में जीवन को प्रकाशित करती हूँ । मेरा अपना कोई निजी सुख – दुख नहीं होता । वह तो दूसरों के सुख – दुख में खुद को शामिल कर अपने को बाँटता है । वह जहाँ कहीं भी बरसता है वह जीवन में नया उल्लास और सौंदर्य व्याप्त कर देता है ।

( ख ) सुधि मेरे आगम की जग में सुख की सिहरन को अंत खिली ।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ महादेवी वर्मा की कविता ‘ मैं नीर भरी दुख की बदली ‘ से उद्धृत हैं । कवयित्री का कहना है कि मेरे आने की खबर से इस संसार में सुख का संचार हो जाता है । क्योंकि मेरा पग – पग का रास्ता संगीत से भरा नया स्वप्न सृजित करनेवाला है । महादेवी तीव्र संवेदनाओं की कवयित्री हैं । वे प्रेम और प्रेमजन्य विरह को अपनी कविता का विषय बनाती हैं । हृदय की सूक्ष्मतम और गहनतम भावनाओं को महादेवी अपनी कविता में उतारती हैं । उनमें वैविध्य नहीं , शुरू से अंत तक वे आत्मपरक भावनाओं से प्रेरित रहती हैं । वे अपनी वेदना से ही संसार को प्रकाशित करना चाहती है । कहती है जिस तरह बदली के पृथ्वी पर जल के रूप में गिरने पर नया जीवन का संचार हो जाता है उसी प्रकार मेरे आने की खबर से सुख का संसार बन जाता है ।

प्रश्न 3. ” क्रंदन में आहत विश्व हँसा ‘ से कवयित्री का क्या तात्पर्य है ?

उत्तर – कवयित्री वेदना में ही संसार का हित देखती हैं । इसीलिए कंदन में आहत विश्व हँसा करती है । दुखवाद इनकी कविताओं का प्रधान स्वर है । यह दुखवाद , यह पीड़ा का संसार उनके  जीवन में अनजाने हो बस गया है । यह उनके प्रियतम की देन है । उनका हृदय प्रतिक्षण किसी  का अनुभव करता है , सूनेपन का सामान्य है , एकान्त में वे दोये भी जलाती हैं , प्रियतम की राह देखती हैं । महादेवी इस विराट विश्व में व्याप्त उस क्षणिक उल्लास महिमा की गायिका हैं , जिसे दुनिया वेदना कहती है । यह अपूर्व उल्लास है , मिट – मिट कर बनने का उल्लास झर – झरकर पूर्ण होने का आनंद , जल – जल कर आलोकित होने की व्याकुल लालसा है |

प्रश्न4. कवयित्री किसे मलिन नहीं करने की बात करती है

उत्तर – कवयित्री पथ को मलिन नहीं करने की बात करती है । कारण जोवन – संघर्ष में व्यक्ति को अनेक रास्तों से गुजरना पड़ता है । उन रास्तों में कठिनाइयों को झेलना पड़ता है । न रास्तों में यदि वह गंदा या मलिन हो जाएगा तो इससे राही के लिए उस पथ पर जाना मुश्किल हो जाएगा |

प्रश्न 5. स्प्रसंग व्याख्या करें :
विस्तृत नभ का कोई कोना
                 मेरा न कभी अपना होना
                 परिचय इतना इतिहास यही
                 उमड़ी कल थी मिट आज चली ।

उत्तर – प्रस्तुत पक्तियाँ महादेवी वर्मा की कविता ‘ मैं नौर भरी दुख की बदती ‘ से ली गयी हैं । कवयित्री पूरा आकाश उसका अपना है , किंतु वह जल बरसाकर अपने में विलीन हो जाता है । उसका अपना कोई निजी सुख – दुख नहीं होता , वह तो दूसरों के सुख – दुख में खुद को शामिल कर अपने को बाँटता है । नभ में उसका अपना कोई कोना भले न हो किंतु जहाँ कहीं हरीतिमा का उल्लास और सौंदर्य है , वह वहाँ मौजूद है , व्याप्त है । बदली का परिचय इतना ही है कि वह कल जन्मी थी और बरसने के बाद उसका अस्तित्व समाप्त हो गया ।

प्रश्न 6 , ” नयनों में दीपक से जलते ‘ में ‘ दीपक ‘ का क्या अभिप्राय है ?

उत्तर – ‘ नयनों में दीपक से जलते ‘ में ‘ दीपक ‘ उन आँसुओं के लिए आया है जो वेदना के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ है । महादेवी मानती है कि कमल के समान खिला हुआ जीवन उसके विरह के जल से हो खिला है । वेदना में इसका जन्म हुआ है और यह दोपक की तरह प्रकाशित । सुख – दुख , आशा – निराशा की अनुभूतियों से भरपूर इस जीवन अथवा जगत का प्रभाव भी आँसुओं को चुनता हुआ उदय होता है और रात भी मानव जीवन के आँसुओं की ही गिनती है । इसीलिए कवयित्री कहती हैं कि नयनों में दीपक से जलते ।

प्रश्न 7. कविता के अनुसार कवयित्री अपना परिचय किस रूप में दे रही हैं ?

उत्तर – कवयित्री अपना परिचय नीर भरी दुख की बदली के रूप में दे रही हैं । वे कहती हैं कि मेरा जीवन उस बदली के समान है जो बरसकर नया जीवन देती है । वह तप्त विश्व को नहलाती है । बदली विश्व के लिए जल लेकर आती है और पूरे आकाश में छा जाती है । लगता है पूरा आकाश उसका अपना है किंतु जल बरसाकर अपना समूचा अस्तित्व समाप्त कर लेता है । कवयित्री करुणाशील व्यक्तित्व है और वे संसार में करुणा का जल लेकर आती हैं और संतप्त हृदय को शांत करती हैं । उनका अपना कोई निजी सुख – दुख नहीं होता बल्कि वे दूसरों के सुख – दुख में खुद को शामिल कर बाँटती हैं ।

प्रश्न 8. ‘ मेरा न कभी अपना होना ‘ से कवयित्री का क्या अभिप्राय है ?

उत्तर – कवयित्री कहती हैं कि इस संसार में मेरा अपना कुछ नहीं है क्योंकि मैं नीर भरी दुख की बदली के समान हूँ । बदली का जल अपने लिए नहीं होता बल्कि जब तक बदली के रूप में रहता है तभी तक उसका अपना रहता है । लेकिन जैसे ही बदली जल बनकर पृथ्वी पर बरसती है वह दूसरों का कल्याण ही करती है । मेरा दुख भी अपने लिए नहीं है बल्कि वह मेरा दुख निजता के समष्टि की ओर है । इसीलिए कवयित्री कहती है कि मेरा न कभी अपना होना ।

प्रश्न 9. कवयित्री ने अपने जीवन में आँसू को अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण साधन माना है । कैसे ? स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर – महादेवी दुख को सुख से अधिक महत्त्व देती है , इसलिए कि यह मानव मात्र को निकट लाने का प्रयास है , दुख उनके जीवन का ऐसा काव्य है जो सारे संसार को एक सूत्र में बाँधने को क्षमता रखता है । हमारे असंख्य सुख हमें चाहे मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी न पहुँचा सके किन्तु हमारा एक बूंद अश्रु भो जीवन को अधिक मधुर , अधिक उर्वर बनाए बिना नहीं गिर सकता । इसीलिए कवयित्री ने अपने जीवन में आँसू को अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण साधन माना है ।

प्रश्न 10. इस कविता में दुख और आँसू कहाँ – कहाँ , किन – किन रूपों में आते हैं ? उनकी सार्थकता क्या हैं ?

उत्तर – महादेवी मानती हैं कि हृदय अपनी अनुभूतियों की गहनता के कारण आँसुओं का अक्षय भंडार है तो आँखें आँसुओं को ढालनेवाली मशीन है । यह कोमल शरीर जलकों से बने उन बादलों के समान है जो क्षणभंगुर है ; नश्वर है । मेरा शरीर आँसुओं का ही बना हुआ है , वसंत जो मेरे जीवन में आता है वह अश्रु का ही मधु लुटाता है । इस कविता में आँसू नयनों के दीपक के रूप में , नया जीवन के संचार के रूप में , बदली इत्यादि के रूप में आते हैं । बदली को सार्थकता जल के रूप में यरसकर नया जीवन देने में है ।

भाषा की बात

प्रश्न 1. प्रस्तुत कविता में से तत्सम शब्दों को छाँटिए और उनके स्वतंत्र वाक्य – प्रयोग कीजिए ।

उत्तर – स्पंदन -महादेवी राग में स्पंदित थी ।
क्रंदन- उनका क्रंदन देखकर मेरा जी भर आया । मलिन -पथ को मलिन मत करो ।
नभ -इस विस्तृत नभ का कोई अंत नहीं है ।

प्रश्न 2. निम्नांकित शब्दों के संधि – विच्छेद कीजिए ।

उत्तर – नयन -ने + अन
निर्झरणी -निः + झरणी
निस्पंद- निः + पंद
संगित-सम् + गीत।

प्रश्न 3. निम्नांकित शब्दों का वाक्य बनाते हुए लिंग – निर्णय करें ।

उत्तर – सुख ( पु . ) वह सुख का साथी है ।
दीपक ( पु.)- दीपक का प्रकाश धीमा है ।
चिंता ( स्त्री . ) -चिंता नहीं करनी चाहिए ।
पथ ( पु. ) पथ ऊँचा – नीचा है ।
श्वास( पुं . ) -श्वास का बन्द होना जीवन का अन्त है ।

प्रश्न 4. निम्नांकित शब्दों के दो – दो पर्यायवाची बताएँ ।

उत्तर – नभ -आकाश , गगन ।
विश्व- संसार , जगत ।
नव -नया , नूतन ।
नयन -आँख , चक्षु ।

प्रश्न 5. निम्नांकित शब्दों के विलोम रूप लिखें । 

उत्तर – जीवन- मरण
पराया- अपना
आज- कल
विस्तृत  -संकीर्ण
सुख-दुख।।

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