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bihar board class 9th hindi notes | पलक पाँवड़े

पलक पाँवड़े

bihar board class 9th hindi notes

वर्ग – 9

विषय – हिंदी

पाठ 4 – पलक पाँवड़े

पलक पाँवड़े
                      -अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘ हरिऔध ‘
                 कवि – परिचय

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘ हरिऔध ‘ का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद में सन् 1865 ई . में हुआ था । प्रारंभिक शिक्षा चाचा बस्तसिंह के सान्निध्य में पायी । घर पर ही संस्कृत और फारसी का अध्ययन किया । उच्च शिक्षा के लिए क्वींस कॉलेज , वाराणसी में दाखिला लिया , किंतु अस्वस्थता के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर सके । उन्होंने कानून की भी पढ़ाई कॉ और 1889 ई . में कानूनगो नियुक्त हुए लेकिन हरिऔधजी का मन पढ़ने – पढ़ाने में अधिक लगता था । इसलिए उन्होंने स्कूल में भी और विश्वविद्यालय में भी अध्यापन का कार्य किया । काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने अवैतनिक प्राध्यापक के रूप में अपना योगदान दिया । सन् 1947 ई . में हरिऔध जी चल बसे ।
हरिऔधजी ने अनेक विधाओं में रचनाएँ की । उनकी प्रमुख काव्यकृत्तियाँ हैं – ‘ प्रियप्रवास ‘ , ‘ चोखे चौपदे ‘ , ‘ वैदेही वनवास ‘ , ‘ चुभते चौपद ‘ आदि । उन्होंने ‘ प्रेमकांता ‘ , ‘ ठेठ हिंदी का ठाठ ‘ और ‘ अधखिला फूल ‘ नामक उपन्यास भी लिखे । ‘ प्रद्युम्न विजय ‘ और ‘ रुक्मिणीपरिणय ‘ उनके प्रसिद्ध नाटक हैं । हरिऔधजी ने ‘ कबीर वचनावली ‘ का संपादन भी किया , जिसकी उपादेयता आज तक बनी हुई है ।
खड़ी बोली को काव्य – भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करनेवाले कवियों में अयोध्या सिंह उपाध्याय का नाम महत्त्वपूर्ण है । उनीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक 1890 ई . के आस – पास अपने साहित्य सेवा के क्षेत्र में पर्दापण किया । आरम्भ में आप नाटक तथा उपन्यास लेखन की ओर आकर्षित हुए । परन्तु इनकी प्रतिभा का विकास वस्तुतः कवि – रूप में हुआ । हरिऔध को कवि के रूप में सर्वाधिक प्रसिद्धि उनके प्रबन्धकाव्य ‘ प्रियप्रवास ‘ के कारण मिली । इसी काव्य कृति के कारण इन्हें खड़ीबोली का प्रथम महाकवि होने का श्रेय मिला ।
हरिऔध ने सर्वप्रथम पात्रों के वृत्त और चरित्र में परिवर्तन किए तो दूसरी ओर खड़ी बोली के संबंध में मौलिक प्रयोग किए । स्मरणीय है कि इस समय तक यह विवाद का विषय था कि कविता खड़ी बोली में लिखी जाए या कि ब्रजभाषा में । स्वयं हरिऔध दोनों आधार – बोलियों का प्रयोग कर रहे थे । रस – शास्त्र के संबंध में उन्होंने अपने ग्रंथ रस – कलश में उदाहरण.ब्रजभाषा में लिखे । पर नये युगबोध की अभिव्यक्ति के लिए खड़ीबोली को ही स्पष्ट रूप से स्वीकार किया । खड़ी बोलो को भली – भाँति प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने अपनी रचना में उसके कई रंग प्रस्तुत किए । संस्कृत वर्ण – वृत्तों में नितांत तत्सम पदावली ‘ प्रियप्रवास ‘ में प्रयुक्त की तो एकदम बोलचाल की खड़ीबोली अपने चौपदों में । एक सिरे पर भाषा का रूप था – ‘ रूपांधान प्रफुल्ल – प्राय कलिका राकेंदु – बिंबानना ‘ तो दूसरी ओर ‘ मैं घमंड में भरा ऐंठा हुआ एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा । ‘

कविता का भावार्थ

हरिऔध द्विवेदीयुग के कवि हैं । उनकी कविता
‘ पलक पाँवड़े ‘ में प्रकृति का व्यापक मनोहारी रूप प्रकट हुआ है । इस कविता में प्रकृति – सौन्दर्य – प्रेम तथा स्वतंत्रता के भाव सौश्लष्ट रूप में व्यक्त हुए हैं । कवि को अपने प्रिय के आने की आस में उसे प्रकृति में होने वाली सभी -माएँ मनभावन लगती है । उसे आज की सुबह बहुत भावन लगती है । आसमान की लाली और ज का निकलना आश्चर्यचकित कर देता है । चिड़िया तो प्रतिदिन सुबह होते ही चहकते हैं परन्तु दिन उनकी चहचहाहट सुनकर उमंग में घुल जाता है । उसे प्रकृति के जितने व्यापार हैं , घटनाएँ सभी अलग नजर आते हैं । कवि कहते हैं कि पेड़ क्यों है हरे – भरे इतने , किसलिए फूल हैं त फूले । इसका आशय है कि जरूर कोई व्यवस्था में भारी परिवर्तन हुआ है , जिसके कारण धारी प्रकृति खुशहाल लजर आ रही है । हवा भी संभल – संभल कर चल रही है । झोल , तालाब , नदियों में सूर्य का फैला प्रकाश सुनहली चादर के रूप में कवि को दिखाई पड़ते हैं । सभी और अशहाली दिखाई पड़ती है । कवि की आँखें उसे निहारते – निहारते थक गई हैं । इतने दिनों के बाद आ रहा है इसलिए कवि पलक पाँवड़े बिछाकर बैठा है ।

कविता के साथ

प्रश्न 1. कवि को भोर का तारा क्यों भा रहा है ?

उत्तर – कवि प्रकृति में , अपने जीवन में नया सौन्दर्य और उल्लास देखता है । कवि की प्रिया आने वाली है । इसलिए वह पलक पाँबड़े बिछाये खड़ा है । इसीलिए उसे सारी प्रकृति अच्छी लग रही है । उसे भोर का तारा भी भा रहा है । आसमान की लाली देखकर प्रश्न करता है कि न्यों खिली है । किसलिए निकल रहा है सूरज । यह सब घटनाएँ तो प्रकृति में रोज होती हैं परंतु कवि को आज सभी कुछ इसीलिए प्रिय लग रहे हैं क्योंकि कवि को किसी का इंतजार है वह सिके लिए पाँवड़े बिछाये हुए हैं ।

प्रश्न 2. ‘ रोली भरी थाली ‘ का क्या आशय है ?

उत्तर – भारतीय परंपरा में कोई व्यक्ति यदि किसी पर विजय पा लेता है , या उसका स्वागत जरना होता है तो हम थाली में रोली , चंदन , चावल , फूलमाला इत्यादि लेकर उसका स्वागत करते है । कवि भारतवर्ष को स्वतंत्र देखना चाहता है । इसकी स्वतंत्रता दिलानेवाले व्यक्तियों का वह स्वागत करना चाहता है इसलिए वह रोली भरी थाली लेकर खड़ा है । दूसरे अर्थ में वह प्रकृति का स्वागत करने के लिए रोली भली धाली लेकर खड़ा है ।

प्रश्न 3. कवि को प्रकृति में हो रहे परिवर्तन किस रूप में अर्थपूर्ण जान पड़ते हैं ?

उत्तर – प्रकृति में हो रहे परिवर्तन तो दैनदिन होते ही हैं परंतु कवि को किसी का इंतजार है । उसे तकते – तकते उसकी आँखें थक – सी गई हैं । कवि उन्हें न पाकर बेचैन है परन्तु जैसे ही उनकी आने की खबर सुनता है तो वह खुशी से उछल पड़ता है । प्रकृति में हो रही सभी घटनाएँ उसे अपने लिए जान पड़ते हैं मानो सभी उसकी खुशी में शामिल हैं । इसीलिए उसे उस दिनका भोर , आसमान की लाली , निकलता हुआ सूरज , चहकती हुई चिड़ियाँ , पत्तों पर पड़ती हुई ओस की बूंदें , तमाम चहल – पहल अर्थवत जान पड़ते हैं ।

प्रश्न 4. हवा के कौन – कौन से कार्य व्यापार कविता में बताये गये हैं ?

उत्तर – कवि के द्वारा हवा का मानवीकरण किया गया है । हवा का मंद – मंद बहना अर्थात् संभल संभल कर चलना , एकाएक थम जाना , जहाँ – तहाँ रूक जाना , एक जगह जमा होना इत्यादि कार्य – व्यापार कविता में बताए गए हैं ।

प्रश्न 5. सुनहली चादरें कहाँ बिछी हुई हैं और क्यों ?

उत्तर – लाल – नीले – सफेद पत्तों में झील , तालाब और नदियों में सुनहली चादर बिछी हुई हैं । जब सूर्य प्रकाश जल पर पड़ता है तो उसके परावर्तन से प्रकाश का रंग स्वर्णवर्णी होने के कारण मानो वैसे लगता है जैसे सुनहली चादरें बिछी हुई हैं ।

प्रश्न 6. प्रकृति स्वर्ग की बराबरी कैसे करती है ?

उत्तर – प्रकृति में जो भी घटनाएँ आज घट रही हैं , उसकी सुंदरता और मोहकता को देखकर वि कहता है कि प्रकृति स्वर्ग की बराबरी करती है । आज की सुबह बड़ी मनोहारी का सूरज मानो वैसे निकल रहा है , जैसे कोई रोली से भरी थाली लिये खड़ा हो । चिड़िया भी बड़ी उमंग में चहक रही है । पत्तों पर ओस ऐसे बिखरे पड़े हैं , जैसे सीपी में मोती । पेड़ – पौधों की हरियाली , कलियों के फूलना तो रोज होते थे लेकिन आज की घटना बड़ी उमंग में हो रही है । हवा संभल – संभल कर चल रही हैं । सूर्य के प्रकाश के कारण झोल , तालाब और नदियो में सुनहली चादरें बिछ गयी हैं । इस ठाट – बाट को देखकर कवि को लगता है प्रकृति स्वर्ग की बराबरी कर रही है ।

प्रश्न 7. कवि को ऐसा लगता है कि सभी प्राकृतिक व्यापारों के प्रकट होने के पौ ? कोई गूढ़ अभिप्राय है । यह गूढ अभिप्राय क्या हो सकता है ? आप क्या सोचते हैं ? अपने विचार लिखें ।

उत्तर – यह प्रश्न छात्रों के स्वतः स्फूर्त विचारों पर आधारित है । अतः छात्र स्वयं अपना अनुभव रूपायित करें । छात्रों के बौद्धिक स्तर जाँचने का एक उपक्रम के रूप में यह प्रश्न दिया है । अत : किसी एक मंतव्य का साधारणीकरण नहीं किया जा सकता । छात्र अलग – अलग ढंग से अपना विचार रखने के लिए स्वतंत्र है ।

प्रश्न 8. यह कविता नवजागरण और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लिखी गई थी , नई चेतना और नया विहान आने को था । इस कविता में उसकी कोई आहट है ? अगर हाँ तो किस रूप में स्पष्ट करें ।

उत्तर– हाँ ! इस कविता में नई चेतना , नया विहान , नवजागरण और स्वतंत्रता संग्राम की आहट दिखाई पड़ती है । हमारा देश दो सौ वर्षों से अंग्रेजों का गुलाम था । गुलामी की जंजीरें इस तरह जकड़ी हुई थीं कि छूटने का नाम न ले रही थी । इसी बीच ‘ नवजागरण ‘ के द्वारा नये विचारों के आने से जनता में राष्ट्रीयता की भावना पनपती है । उसे अपना सुनहरा भविष्य सामने दीखने लगता है । इसीलिए कवि को सबकुछ मनभावन लगने लगता है । प्रकृति में होने वाली सारी घटनाएँ तो रोज घटती थीं परंतु नवजागरण के कारण मनोहारी लगने लगता है । कवि को लगता है अब स्वतंत्रता आनेवाली है इसीलिए वह ‘ पलक पाँवड़े ‘ विछाता है ।

प्रश्न 9. कवि को किसकी उत्कंठित प्रतीक्षा है ? इस पर विचार कीजिए ।

उत्तर – कवि को अपनी ‘ प्रिया ‘ की उत्कठिस प्रतीक्षा है । इसलिए वह ‘ पलक पाँवड़े बिछाये हुए है । प्रकृति में भोर का होना , सूरज का निकलना , चिड़ियों का चहकना , ओस का गिरना , पेड़ का हरा – भरा होना , फूलों का फूलना , हवा का चलना इत्यादि घटनाएँ तो निरंतर होती रहती हैं । परन्तु किसी खास अवसर पर जब यह व्यक्ति – मन को आकृष्ट करने लगे तो समझना चाहिए कि वा तो कोई भारी परिवर्तन हुआ है , या व्यक्ति – मन में प्रेम का प्रस्फुटन हुआ है । कवि को अपनी प्रिया का इंतजार था , इसके इंतजार में आँखें थक गयी हैं । परंतु एक दिन वह आता है और कवि को मालूम होता है कि वह आ रहा है , तो सबकुछ अच्छा लगने लगता है ।

भाषा की बात

प्रश्न 1. “ आ ! अगर आज आ रहा है तू । ” अगर इस पंक्ति को हम यूँ कर दें । “ आ अगर आज आ रहे हो तुम ” तो अर्थ की दृष्टि से क्या परिवर्तन हो जाता है ? वह उचित है अथवा नहीं ।

उत्तर – यह परिवर्तन उचित नहीं है । क्योंकि मध्यम पुरुष एकवचन में तू का प्रयोग होता है ।

प्रश्न 2. कविता में प्रयुक्त शब्द – युग्म एकत्र करें और उनके स्वतंत्र वाक्य – प्रयोग करें । जैसे हरे – भरे , संभल – संभल , जहाँ – तहाँ आदि ।

उत्तर – एक – एक – -एक – एक कर सभी आये । चहल – पहल –किसलिए है चहल – पहल ऐसी ।

प्रश्न 3. कविता के अंतिम छंद में मैं की जगह हम सर्वनाम का प्रयोग क्यों है ?

उत्तर – मैं एकवचन का द्योतक है , हम बहुवचन का द्योतक है । स्वतंत्रता की आकांक्षा सिर्फ कवि को नहीं है बल्कि सभी जन को है इसीलिए कवि हम का प्रयोग करते हैं ।

प्रश्न 4. निम्नांकित शब्दों का विपरीतार्थक लिखें ।

उत्तर – आसमान -पाताल
रुप-अरूप
दायाँ- बायाँ
सुबह -शाम ।

प्रश्न 5. निम्नलिखित शब्दों के पयार्यवाची लिखें ।

उत्तर – आकाश -व्योम , गगन , अभ्र , अम्बर , नभ , अनन्त ।
चिड़िया -खग , अण्डज , विहग , विहंग , शकुंत , द्विज ।
फूल -पुष्प , कुसुम , प्रसून , सुमन ।
सूर्य -दिनकर , रवि , भास्कर , प्रभाकर , पतंग , हंस , भानु ।
पेड़ -वृक्ष , तरु , दुम , पादप , विटप , अगम , गाछ ।

प्रश्न 6. निम्नलिखित शब्दों का वाक्य प्रयोग द्वारा लिंग – निर्णय करें ।

उत्तर – भोर ( पु . ) भोर का तारा ।
सूरज ( पु . ) किसलिए है निकल रहा सूरज ।
मोती ( पु.) प्रियंका के दाँत मोती जैसे हैं ।
भूल ( स्त्री . ) राम से भूल हो गई ।
हवा ( स्त्री . ) हवा संभल – संभलकर चल रही है । झील ( पु. ) झील कल – कल करते हुए बह रहा है । तालाब ( पु . ) तालाब भरा है ।
चाह ( स्त्री . ) पुष्पेन्दु को पूजा की चाह है ।
पलक ( पु . ) बैठे – बैठे पलक लग गया ।।।

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