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9th class hindi note | शिक्षा में हेर – फेर

शिक्षा में हेर – फेर

9th class hindi note

वर्ग – 9

विषय – हिंदी

पाठ 12 –   शिक्षा में हेर – फेर

शिक्षा में हेर – फेर
                                                -रवीन्द्रनाथ टैगोर
                  लेखक – परिचय

रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म बंगाल के प्रसिद्ध टैगोर वंश में 1861 ई . में कोलकाता में था । इनके पिता महर्षि देवेंद्रनाथ थे । टैगोर परिवार अपनी समृद्धि , कला , विद्या एवं संगीत के लिए संपूर्ण बंगाल में प्रसिद्ध था । टैगोर को अपने पिता से देशभक्ति , विद्वता , धर्मप्रियता , साधना आदि गुण उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुए । वे अपने भाई – बहनों में सबसे छोटे थे । उन्होंने अपने यश से न केवल टैगोर परिवार वरन् संपूर्ण देश को गौरव प्रदान किया । टैगोर को सर्वप्रथम ऑरिएण्टल सेमिनरी स्कूल में भर्ती किया गया परंतु इनका मन वहाँ नहीं लगा । इस कारण इनका कुछ महीनों के बाद नॉर्मल स्कूल में दाखिला दिलाया गया । इस स्कूल में उन्हें कुछ कटु अनुभव प्राप्त हुए जिसके परिणामस्वरूप आगे चलकर आजीवन शिक्षा सुधार के लिए प्रयास किया और आदर्श शिक्षा संस्था के रूप में 1901 ई . में शांति निकेतन की स्थापना की जो आज विश्व भारती विश्वविद्यालय के नाम से प्रख्यात है ।
1878 में टैगोर अपने भाई के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंगलैंड गए । परंतु टैगोर वहाँ अधिक दिनों तक नहीं रहे । 1880 में वे स्वदेश लौटे । 1881 में पुनः इंगलैंड गए । वे वहाँ कानन की शिक्षा प्राप्त करने के ध्येय से गए थे परंतु विचार परिवर्तन के कारण पुनः वापस लौट गए ।
1901 में टैगोर ने बोलपुर के निकट शांति  निकेतन की स्थापना की । उन्होंने इसमें स्वयं अध्यापक के रूप में कार्य किया । यह विद्यालय आध्यात्मिक उदारता एवं विभिन्न संस्कृतियों के संगम – स्थल के रूप में दिन – प्रतिदिन उन्नति करता गया । 1919 ई . तक टैगोर ने राजनीति के क्षेत्र में भी कार्य किया । जलियाँवाला बाग हत्याकांड के उपरांत औपनिवेशिक सत्ता से विक्षुब्ध होकर इन्होंने ‘ नाइट हुड ‘ की उपाधि लौटा दी । वे साहित्य की सेवा अनवरत रूप से करते रहे और महान् कवि एवं साहित्यकार के रूप में उनकी ख्याति देश की सीमाओं को पार कर गई । रवींद्रनाथ टैगोर रहस्यवाद से प्रभावित कवि एवं चिंतक थे । 1913 में ‘ गीतांजलि ‘ पर नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ । इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से पाश्चात्य जगत् को भारतीय सभ्यता – संस्कृति से प्रभावशाली ढंग से परिचय कराया । पाश्चात्य जनजीवन और मूल्यों को भारत ने भी उनके माध्यम से समझने का प्रयास किया ।
      प्रमुख कृतियाँ —
मानसी ( 1880 ) -काव्यसंग्रह , शिल्प विधान की दृष्टि से बंगला काव्य में नवीन प्रयोग । सोनारतरी ( सोने की नाव ) ( 1893 ) काव्यसंग्रह , चित्रा ( 1896 ) -काव्यसंग्रह , चैताली ( बेर की फसल ) ( 1896 ) -काव्यसंग्रह , कल्पना क्षणिक ( 1900 ) -काव्यसंग्रह , काव्य नाटक चित्रांगदा ( 1892 ) और मालिनी ( 1895 ) । कहानी संग्रह – गल्प गुच्छ ( 1912 ) ।

कहानी का सारांश

‘ शिक्षा में हेर – फेर ‘ विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित निबंध । नोबल पुरस्कार से सम्मानित टैगोर एक साहित्यकार होने के साथ – साथ उच्च कोटि के शिक्षाविद भी थे । शाति निकेतन ( विश्व भारती ) के माध्यम से उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कई मौलिक प्रयोग भी किए थे । इस निबंध से उनकी शिक्षा – संबंधी दृष्टि का पता चलता है ।
जीवन की आवश्यकता में बंध कर रह जाना मानव – जीवन का धर्म नहीं है । मनुष्य कुछ हद तक आजाद भी हैं । शिक्षा के विषय में भी यही बात लागू होती है । बच्चों को आवश्यक शिक्षा के साथ स्वाधीनता की सीख भी मिलनी चाहिए । पढ़ाई , के साथ – साथ मनोरंजन भी जरूरी है । विदेशों में बच्चे जब अपने नए दाँतों से बड़े आनंद के साथ ईख चूसते हैं तब हमारे देश में बच्चे विद्यालय के बेंच पर अपनी दो दुबली – पतली टाँगों को हिलाते हुए मास्टर के खेत हजम करते हैं ।
शिक्षा व्यवस्था के बचपन से ही आनंद के लिए जगह होनी चाहिए । विद्या कंठस्थ करने से छात्र का काम भले चल जाता है पर इससे उसका विकास नहीं होता है । आनंददायक तरीके से पढ़ते रहने से पठन शक्ति बढ़ती है , सहज – स्वाभाविक नियम से ग्रहण शक्ति , धारणा शक्ति और चिंता – शक्ति भी सबल होती है । अंग्रेजी विदेशी भाषा । शब्द विन्यास और पद विन्यास को दृष्टि से हमारी भाषा के साथ उसका कोई सामंजस्य नहीं है । इसे धारणा उत्पन्न करके पढ़ना चाहिए । रट कर सीखना बिना चबाये अन्न निगलने की तरह है ।
बचपन से ही भाषा – शिक्षा के साथ भाव – शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए । भाव के साथ पूरी जीवन – यात्रा नियमित रहने पर जीवन के यथार्थ में सामंजस्य बनाता है । जीवन का बड़ा हिस्सा हम जिस शिक्षा को सीखने में व्यतीत करते हैं उसका जीवन में कोई उपयोग न हो तो बड़ी कठिनाई होगी । लोगों के मन में अपनी मातृभाषा के प्रति दृढ़ संबंध होना चाहिए तभी वे जीवन में सफल होंगे ।

पाठ के साथ

प्रश्न 1. शिक्षा के विषय में कौन – सी बात लागू होती है ?

उत्तर -जो अतिआवश्यक है उसी में आबद्ध होकर रह जाना हमारे जीवन का धर्म नहीं है । आवश्यकताओं की श्रृंखला से हम किसी सीमा तक बद्ध हैं लेकिन हम स्वाधीन भी हैं । हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ के फासले में सीमित है । लेकिन उसके लिए साढ़े तीन हाथ का घर बनाने से काम नहीं चलेगा । चलने – फिरने के लिए यथेष्ट स्थान रखना जरूरी है , वरना हमारे स्वास्थ्य और आनंद दोनों में बाधा पड़ेगी । शिक्षा के विषय में भी यही बात लागू होती है ।

प्रश्न 2. बच्चों के मन की वृद्धि के लिए क्या आवश्यक है ?

उत्तर – जो कम से कम जरूरी है वहीं तक शिक्षा को सीमित न किया जाए बल्कि आवश्यक शिक्षा के साथ स्वाधीन पाठ को भी मिलाना होगा तभी बच्चों के मन की वृद्धि हो सकेगी ।

प्रश्न 3. आयु बढ़ने पर भी बुद्धि की दृष्टि से वह सदा बालक ही रहेगा । कैसे ?

उत्तर – जो कम से कम जरूरी है वहीं तक शिक्षा को सीमित किया गया तो बच्चों के मन की वृद्धि नहीं हो सकेगी । आवश्यक शिक्षा के साथ स्वाधीन पाठ को मिलाना होगा , अन्यथा बच्चे की चेतना का विकास नहीं होगा । आयु बढ़ने पर भी बुद्धि की दृष्टि से वह सदा बालक ही रहेगा ।

प्रश्न 4. बच्चों के हाथ में यदि कोई मनोरंजन की पुस्तक दिखाई पड़ी तो वह फौरन क्यों छीन ली जाती है ? इसका क्या परिणाम होता है ?

उत्तर – हम चाहते हैं कि जितना शीघ्र हो सके हम विदेशी भाषा सीखकर इम्तहान पास करके काम में जुट जाएँ । इसलिए बचपन से ही हाँफते – हाँफते दाएँ – बाएँ न देखकर जल्दी – जल्दी सबक याद करने के अलावा और कुछ करने का हमारे पास समय नहीं होता है और बच्चों के हाथ में यदि कोई मनोरंजन की कोई पुस्तक दिखाई पड़ी तो वह फौरन छीन ली जाती है । परिणामस्वरूप हमारे बच्चों व्याकरण , शब्दकोष भूगोल के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता । उनके भाग्य में अन्य पुस्तकें नहीं हैं । दूसरे देशों के बालक जिस आयु में अपने नए दाँतों से बड़े आनंद के साथ गन्ना चबाते हैं उसी आयु में बच्चे स्कूल की बेंच पर अपनी दोनों दुबली – पतली टाँगों को हिलाते हुए मास्टर की बेंत हजम करते हैं । मतलब हमारी शिक्षा में बाल्यकाल से ही मनोरंजन का कोई स्थान नहीं है ।

प्रश्न 5. “ हमारी शिक्षा में बाल्यकाल से ही आनंद का स्थान नहीं होता । ” आपक समझ से इसकी क्या वजह हो सकती है ?

उत्तर – हम चाहते हैं कि जितना शीघ्र हो सके विदेशी भाषा सीखकर , इम्तहान पास कर काम में जुट जाएँ । इसीलिए बचपन से ही हाँफते हाँफते , दाएँ – बाएँ न देखकर जल्दी – जल्ला सबक याद करने के अलावा और कुछ करने का हमारे पास समय नहीं होता । यह घोर संकीर्णवादी दकियानूसी प्रवृत्ति है , जिससे शिक्षा में मनोरंजन का स्थान नहीं ।

प्रश्न 6. हमारे बच्चे जब विदेशी भाषा पढ़ते हैं तब उनके मन में कोई स्मृति जागृत क्यों नहीं होती ?

उत्तर – एक तो भाषा विदेशी होती है , दूसरा उसके शब्द – विन्यास और पद – विन्यास की दृष्टि से हमारी भाषा के साथ उसका कोई सामंजस्य नहीं रहता है । उस पर से भावपक्ष और विषय – प्रसंग भी विदेशी होते हैं । शुरू से अंत तक सभी अपरिचित चीजें हैं इसलिए हमारे मस्तिष्क में कोई धारणा नहीं बन पाती है । धारणा बनने से पहले ही रहना आरंभ कर देते हैं । हमारे बच्चे जब यह सब पढ़ते हैं तो उनके मन में कोई स्मृति जागृत नहीं होती , उनके सामने कोई चित्र प्रस्तुत नहीं होता ।

प्रश्न , 7 . अंग्रेजी भाषा और हमारी हिंदी में सामंजस्य नहीं होने के कारणों का उल्लेख करें ।

उत्तर – सबसे पहला कारण तो यह है कि दोनों भाषाओं की लिपियाँ अलग – अलग हैं जिसके कारण अंग्रेजी रोमन लिपि में लिखी जाती है तो हिंदी देवनागरी में । स्थान और क्षेत्र का प्रभाव भी भाषा पर पड़ता है । यहाँ के बच्चों के लिए उसके भाव और विषय – प्रसंग अलग होते हैं , वे वहीं के वातावरण से प्रभावित होते हैं । शब्द – विन्यास और पद – विन्यास की दृष्टि हमारा उनका कोई ताल – मेल नहीं है । अंग्रेजी भाषा भाव , आचार , व्यवहार साहित्य में हिन्दी से अलग है । इसी कारण इसमें कोई सामंजस्य नहीं है ।

प्रश्न 8. लेखक के अनुसार प्रकृति के स्वराज्य में पहुँचने के लिए क्या आवश्यक है

उत्तर – प्रकृति के स्वराज्य में पहुँचने के लिए बच्चों की ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए जिसमें खेल – कूद के लिए अवकाश मिले , जिससे वे कभी पेड़ पर चढ़ते , पानी में डुबकियाँ लगाते , फूल तोड़ते , प्रकृति जननी को हजार शरारतों से तंग करते ; उनका शरीर पुष्ट और मन प्रफुल्ल होता , उनकी बाल्य – प्रकृति को तृप्ति मिलती । लेकिन अंग्रेजी पढ़ने के प्रयास में वे न तो सीखते हैं , न खेलते हैं , प्रकृति के स्वराज्य में प्रवेश करने के लिए उन्हें अवकाश नहीं मिलता है ।

प्रश्न 9. जीवन – यात्रा संपन्न करने के लिए क्या आवश्यक है ?

उत्तर – जोवन – यात्रा संपन्न करने के लिए चिंतन – शक्ति और कल्पना – शक्ति दोनों का होना अति आवश्यक है । यदि हमें वास्तव में मनुष्य होना है तो इन दोनों को जीवन में स्थान देना ही होगा ।

प्रश्न 10. रीतिमय शिक्षा का क्या अभिप्राय है ?

उत्तर – हमारी शिक्षा में पढ़ने की क्रिया के साथ – साथ सोचने की क्रिया नहीं होती । हम ढेर का ढेर जमा करते हैं कुछ निर्माण नहीं करते । ईंट – पत्थर , बालू – चूना , पहाड़ की तरह जमा करते हैं , माल – मसाला प्रचुर मात्रा में जमा किया गया है । इसमें संदेह नहीं ; मानसिक अट्टालिका के निर्माण के लिए इतनी ईंटें पहले हमारे पास नहीं थीं लेकिन संग्रह करना यदि सीख लें तो निर्माण करना भी सीखा जा सकता है । यह विचार ही सबसे बड़ी भूल है । वास्तव में संग्रह और निर्माण के कार्य साथ – साथ अग्रसर हों तभी इमारत बनाने का काम सम्पन्न हो सकता है । संग्रहणीय वस्तु हाथ में आते ही उसका उपयोग जानना , उसका प्रकृति परिचय प्राप्त करना और जीवन के साथ – ही – साथ जीवन का आश्रय स्थल बनाते जाना – यही है रीतिमय शिक्षा ।

प्रश्न 11. शिक्षा और जीवन एक – दूसरे का परिहास किन परिस्थितियों में करते हैं ।

उत्तर – हमारी जो पुस्तकीय विद्या है और उसकी विपरीत दिशा में जीवन को निर्देशित करते – करते हमारे मन में उस विद्या के प्रति अविश्वास और अश्रद्धा का जन्म होता है । हम सोचते हैं कि वह विद्या एक सारहीन और मिथ्या वस्तु है और समस्त यूरोपीय सभ्यता इसी मिथ्या पर आधारित है । जो कुछ हमारा है वह तो सत्य है और जिधर वह विद्या हमें ले जाती है उधर सभ्यता नामक एक मायाविनी का साम्राज्य है । हम यह नहीं देखते हैं कि विशेष कारणों से हमारे लिए यह शिक्षा निष्फल सिद्ध हुई है । बल्कि हम यह स्थिर करते हैं कि इस विद्या के अंदर स्वभावत : एक वृहत् निष्फलता विद्यमान है । इस तरह जब हम शिक्षा के प्रति अश्रद्धा व्यक्त करते हैं तब शिक्षा भी हमारे जीवन से विमुख हो जाती है । हमारे चरित्र के ऊपर शिक्षा का प्रभाव विस्तृत परिमाण में नहीं पड़ता । शिक्षा और जीवन का आपसी संघर्ष बढ़ता जाता है । वे एक – दूसरे का  परिहास करते हैं।

प्रश्न 12. मातृभाषा के प्रति अवज्ञा की भावना किस तरह के लोगों के मन में उत्पन्न होती है ?

उत्तर – हमारे बाल्यकाल की शिक्षा में भाषा के साथ भाव नहीं होता , और जब हम बड़े होते हैं तो परिस्थिति इसके ठीक विपरीत हो जाती है – अब भाव होते हैं लेकिन उपयुक्त भाषा नहीं होती । भाषा शिक्षा के साथ – साथ भाव – शिक्षा की वृद्धि न होने से यूरोपीय विचारों से हमारा यथार्थ संसर्ग नहीं होता और इसीलिए आजकल बहुत से शिक्षित लोग यूरोपीय विचारों के प्रति अनादर व्यक्त करने लगे हैं । दूसरी ओर जिन लोगों के विचारों से मातृभाषा का दृढ़ संबंध नहीं होता वे अपनी भाषा से दूर हो जाते हैं और उसके प्रति उसके मन में अवज्ञा की भावना उत्पन्न होती है ।

प्रश्न 13. आशय स्पष्ट करें : ” हम विधाता से यही वर मांगते हैं – हमें क्षुधा के साथ अन्न , शीत के साथ वस्त्र , भाव के साथ भाषा और शिक्षा के साथ जीवन प्राप्त करने दो । “

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर के निबंध शिक्षा में हेर – फेर से उद्धृत हैं । इन पक्तियों के माध्यम से निबंधकार कहना चाहते हैं कि हमारी शिक्षा में इतना हेर – फेर हो चुका है कि हमारी भाषा , जीवन और विचारों का सामंजस्य दूर हो गया है । हमारा व्यक्तित्व विच्छिन्न होकर निष्फल हो रहा है ; एक निर्धन आदमी जाड़े के दिनों में रोज भीख मांगकर गरम कपड़ा बनाने के लिए धन – संचय करता लेकिन यथेष्ट धन जमा होने तका जाड़ा बीत जाता है । उसी तरह जब तक वह गर्मी के लिए उचित कपड़े की व्यवस्था कर पाता तब तक गर्मी भी बीत जाती । एक दिन जब देवता ने उस पर तरस खाकर वर मांगने को कहा तो वह बोला ‘ मेरे जीवन का हेर – फेर दूर करो , मुझे और कुछ नहीं चाहिए । हमारी प्रार्थना भी यही है । हेर – फेर दूर होने से ही हमारा जीवन सार्थक होगा । हम सर्दी में गरम कपड़े और गर्मी में ठंडे कपड़े जमा नहीं कर पाते तभी हमारे इतने देन्य हैं – वरना हमारे पास है सब कुछ । इसीलिए हम विधाता से यही वर माँगते हैं हमें क्षुधा के साथ अन्न , शीत के साथ वस्त्र , भाव को साथ भाषा और शिक्षा के साथ जीवन प्राप्त करने दो ।

प्रश्न 14. वर्तमान शिक्षा प्रणाली का स्वाभाविक परिणाम क्या है ?

उत्तर – हमें जिस समाज में जीवन बिताना है उस समाज का कोई उच्च आदर्श हमें इस शिक्षा – प्रणाली में नहीं मिलता । उसमें हम माता – पिता , सुहृद् मित्र , भाई – बहनं किसी का प्रत्यक्ष चित्रण नहीं देखते । हमारे दैनिक जीवन के कार्यकलाप को उस साहित्य में स्थान नहीं मिलता । हमारे आकाश और पृथ्वी निर्मल प्रभात और सुंदर संध्या , परिपूर्ण खेत और देशलक्षमी , स्रोतस्विनी का संगीत उस साहित्य में ध्वनित नहीं होता । यह सब देखकर हम समझ सकते हैं कि वर्तमान शिक्षा के साथ हमारे जीवन का निविड़ मिलन होने की कोई संभावना नहीं है । दोनों के बीच एक व्यवधान है । हमारी शिक्षा जीवन की आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाती । जहाँ हमारे जीवन – कक्ष की जड़ें हैं वहाँ से सौ गज दूर हमारी शिक्षा की वर्षा होती है । जो थोड़ा बहुत पानी हम तक पहुँचता है वह जीवन की शुष्कता दूर करने के लिए यथेष्ट नहीं है । जिस शिक्षा को लेकर हम जीवन व्यतीत करते हैं उसकी उपयुक्तता किसी एक व्यवसाय तक ही सीमित रहती है । जिस संदूक में हम अपनी दफ्तर की पोशाक रखते हैं उसी के अंदर अपनी विधा को बंद कर देते हैं । संपूर्ण जीवन के साथ उसका कोई संबंध नहीं होता । यह वर्तमान शिक्षा प्रणाली का स्वाभाविक परिणाम है ।

प्रश्न 15. अंग्रेजी हमारे लिए काम – काज की भाषा है , भाव की भाषा नहीं । कैसे ?

उत्तर – बाल्यकाल से ही यदि भाषा – शिक्षा के साथ भाव – शिक्षा की भी व्यवस्था हो और भाव के साथ समस्त जीवन – यात्रा नियमित हो , तभी हमारे जीवन में यथार्थ सामंजस्य स्थापित होसकता है । हमारा व्यवहार सहज मानवीय व्यवहार हो सकता है और प्रत्येक विषय में उचित परिणाम की रक्षा हो सकती है । हमें यह अच्छी तरह समझना चाहिए कि जिस भाव से हम जीवन निर्वाह करते हैं उसके अनुकूल हमारी शिक्षा नहीं है । उस शिक्षा में भाषा के साथ भाव नहीं होता और जब हम बड़े होते हैं तो परिस्थिति इसके विपरीत हो जाती है । अब भाव होते है लेकिन उपयुक्त भाषा नहीं होती । भाषा शिक्षा के साथ – साथ भाव शिक्षा की वृद्धि न होने से यूरोपीय विचारों या अंग्रेजी भाषा से हमारा यथार्थ संसर्ग नहीं होता , अतः भाव , साहित्य पर्यावरण विचार सभी अलग होने के कारण अंग्रेजी हमारे काम काज की भाषा नहीं है ।

प्रश्न 16. आज की शिक्षा मानसिक शक्ति का ह्रास कर रही है । कैसे ? इससे छुटकारे के लिए आप किस तरह की शिक्षा को बढ़ावा देना चाहेंगे ?

उत्तर – हमारी शिक्षा में बाल्यकाल से ही आनंद के लिए स्थान नहीं होता , जो नितांत आवश्यक है उसी को हम कंठस्थ करते हैं । इससे काम तो किसी – न – किसी तरह चल जाता है लेकिन हमारा विकास नहीं होता । हवा से पेट नहीं भरता , पेट तो भोजन से ही भरता है । लेकिन भोजन को ठीक से हजम करने के लिए हवा आवश्यक है । वैसे ही ‘ शिक्षा पुस्तक ‘ को अच्छी तरह पचाने के लिए बहुत – सी पाठ्य सामग्री की सहायता जरूरी है । आनंद के साथ पढ़ते रहने से पठन – शक्ति भी अलक्षित रूप से वृद्धि पाती है । सहज – स्वाभाविक नियम से ग्रहण शक्ति , धारणा शक्ति और चिंतन शक्ति भी संबल होती है । लेकिन मानसिक शक्ति का हास करनेवाली इस निरानंद शिक्षा से छूटकारा पाने के लिए हमें अपने बच्चों के लिए मनोरंजनयुक्त शिक्षा प्रयोग करना चाहिए जिससे उसके शारीरिक शक्ति के साथ मानसिक शक्ति का भी विकास होगा ।
भाषा की बात

प्रश्न 1. संधि – विच्छेद करें ।

उत्तर – अत्यावश्यक -अति + आवश्यक
निरस- नि : + रस
यथेष्ट -यथा + इष्ट
अत्यंत- अति + अंत
स्वाधीनता -स्व + अधीनता
निरानंद -निः + आनंद
उज्जवल -उत् + ज्वल
बाल्यावस्था -बाल्य + अवस्था ।

प्रश्न 2. निम्नलिखित शब्दों के विलोम रूप लिखें ।

उत्तर – धर्म -अधर्म
नवीन- पुरातन , प्राचीन
मानवीय -अमानवीय
आवश्यक -अनावश्यक
दुर्भाग्य -सौभाग्य
हराश- वृद्धि
सबल-दुर्बल
जीवन-मरण
शाम-सुबह
उपयोग- दुरुपयोग

प्रश्न 3. निम्नलिखित शब्दों के पयार्यवाची लिखें : 

उत्तर – ईश्वर- भगवान , परमात्मा , सर्वशक्तिमान , इत्यादि ।
पृथ्वी- धरा , भू , भूमि , अचला धरती , आदि ।
आँख- नयन , नेत्र , चक्षु , दृग , लोचन , अक्षि आदि ।

प्रश्न 4. निम्नलिखित शब्दों का समास विग्रह करें एवं उसके प्रकार बताएँ ।

उत्तर – सव्यराज्य – सव्य  का राज्य- तत्पुरुष
वयोविकास -वय का विकास- तत्पुरुष
मातृभाषा –    मातृ का भाषा -तत्पुरुष ।।

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