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Bihar Board 10th class Hindi Notes | श्रम विभाजन और जाति प्रथा

Bihar Board 10th class Hindi Notes | श्रम विभाजन और जाति प्रथा

Bihar Board 10th class Hindi Notes

वर्ग – 10

विषय – हिंदी

पाठ 1 – श्रम विभाजन और जाति प्रथा

श्रम विभाजन और जाति प्रथा
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डॉ. भीमराव अंबेदकर

लेखकः-डॉ. भीमराव अंबेदकर भारतीय संविधान के निर्माता थे। अपनी विलक्षण प्रतिभा एवं अन्वेषी दृष्टि से उन्होंने भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्य का गहन अवगाहन किया। संस्कृत, अंग्रेजी, जर्मनी, मराठी, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र आदि अनेक विधाओं में उन्हें महारत हासिल थी। वे गहन अध्येता और सारस्वत-पुत्र थे। उनकी प्रतिभा के सभी राजनेता कायल थे। उन्होनें अपनी अनेक कृतियों द्वारा भारतीय ज्ञान-भण्डार को समृद्ध किया। उनके तीन प्रेरक महापुरुष-भगवान ब्रद्ध, महात्मा कबीर और ज्योतिबा फूले रहे।
रचनाएँ-1. द कॉटः इन इंडियन, देयर मेकेनिज्म, 2. जेनेसिस ऐंड डेवलपमेंट, 3. द अनटचेबुल्स हू आर दे, 4. हू आर शूद्राज, 5. बुद्धिज्म ऐंड कम्युनिज्म, 6. बुद्धा ऐंड हिज धम्मा, 7. थॉट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स, 8. द शड्ज ऐंड फॉल ऑफ द हिन्दू वीमेन, 9. एनीहिलेशन
ऑफ कास्टा हिन्दी में अंबेदकर का संपूर्ण साहित्य भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय द्वारा 21 खंडों में प्रकाशित हो चुका है।
विशेषताएँ :-अंबेदकर के साहित्य नयी पीढ़ी को दिशा एवं प्रेरणा देने का काम करता है। उनके क्रांतिकारी विचार आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं। उनके गंभीर अध्ययन और खोजी दृष्टि की झलक उनकी कृतियों में स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है। भारतीय मनीषा वे एक महान पंडित थे। उनकी वाणी में ओज और लेखनी में चमत्कार था। उनकी रचनाओं में मानवीयता, नैसर्गिक न्याय, श्रम-विभाजन, मध्ययुगीन अवशिष्ट संस्कारों के रूप में बरकरार जाति प्रथा पर गंभीर चिन्तन दृष्टि की स्पष्ट छाप है।
सारांश:-इस आलेख में डॉ. अंबेदकर ने भारतीय समाज में श्रम विभाजन के नाम पर मध्ययुगीन अवशिष्ट संस्कारों के रूप में बरकरार जाति प्रथा की खामियों पर सटीक प्रकाश डाला है। वे जाति प्रथा पर जब चिंतन करते हैं तब उनकी प्रखरता और तेजस्विता स्पष्ट झलकती है। वे जाति प्रथा पर मानवीयता, नैसर्गिक न्याय एवं सामाजिक सद्भाव की दृष्टि से विचार करते है। जाति प्रथा के विषमता मूलक सामाजिक आधारों, रूढ़ पूर्वाग्रहों, और लोकतंत्र के लिए उसकी अस्वास्थ्यकर प्रकृति पर भी चिंतन करते हैं। इनके लेख में एक संभ्रांत विधिवेत्ता का दृष्टिकोण उभरकर हमारे समक्ष आया है। उन्होंने इस निबंध में जाति प्रथा के पोषकों की कलई खोलकर रख दी है। जाति व्यवस्था द्वारा व्यक्ति के विकास में कौन-कौन-सी समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं इस ओर भी डॉक्टर साहय ने ध्यान खींचा है। जाति प्रथा व्यक्ति को आजीवन दोषपूर्ण पेशे में बाँध देती है जिससे वह कुंठित होकर शोपित की स्थिति में जीने को बाध्य हो जाता है। उसकी प्रतिभा और समुचित विकास के
द्वार सदा के लिए बंद हो जाता है। जाति प्रथा द्वारा जो परंपरागत पेशे को तरजीह जाती है वह भी समाज के लिए घातक
है, ‘जाति प्रथा’ से समाज में, श्रमिकों में गैर-बराबरी, ऊँच-नीच की भावना घर कर जाती है।
इस प्रकार, अंबेदकर की दृष्टि में जातिप्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। जाति प्रथा का श्रमविभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं रहता। आर्थिक पहलू से भी ज्यादा हानिकारक जाति प्रथा है क्योंकि यह अस्वाभाविक नियमों में जकड़कर व्यक्ति को निष्क्रिय बना देती है।
डॉ. अंबेदकर ने स्वस्थ लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र समता और भ्रातृत्व भावना की सिफारिश की है। इसमें सबकी सहभागिता और बहुविध हितों का ध्यान रखना चाहिए। दूध-पानी के मिश्रण की तरह ही हमारा लोकतंत्र हो। यही सच्चे लोकतंत्र का सही स्वरूप है।

गद्यांश पर आधारित अर्थ ग्रहण-संबंधी प्रश्न
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1. यह विडंबना की ही बात कि इस युग में भी ‘जातिवाद’ के पोषकों की कमी नहीं है। इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं। समर्थन का एक आधार यह कहा जाता है कि आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है। और चूँकि जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। इस तर्क के संबंध में पहली बात तो यही आपत्तिजनक है कि जाति प्रथा श्रम विभाजन
के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन,निश्च्य समाज की आवश्यकता है, परंतु किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों के विभिन्न वर्गों में अस्वभाविक विभाजन नहीं करती। भारत की जाति प्रथा की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता।

(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) विष के दाँत (ख) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ग) मछली (घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) हजारी प्रसाद द्विवेदी (ख) बिरजू महाराज
(ग) अशोक वारपेयी। (घ) भीमराव अंबेदकर

(ग) भारत की जाति प्रथा की सबसे प्रमुख विशेषता क्या है?
(घ) सभ्य समाज की क्या आवश्यकता है?

उत्तर-(क)-(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख)-(घ) भीमराव अंबेदकर
(ग) भारत की जाति प्रथा की सबसे प्रमुख विशेषता है कि वह श्रमिकों का अस्वभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है। ऐसी व्यवस्था विश्व के किसी भी समाज में नहीं है।
(घ) समर्थन के आधार पर सभ्य समाज कार्य-कुशलता के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक अंग मानता है। जाति प्रथा श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है। यदि श्रम विभाजन न हो तो सभ्य समाज की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती है।

2. जाति प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए तो यह स्वभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। कुशल व्यक्ति या सक्षम श्रमिक समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें,
जिससे वह अपने पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। इस सिद्धान्त के विपरीत जातिवाद का दूषित सिद्धान्त यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना, दूसरे ही दृष्टिकोण, जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पहले से ही
अर्थात् गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।

(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) शिक्षा और संस्कृति (ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ (घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) भीमराव अंबेदकर (ख) मैक्समूलर
(ग) अशोक वाजपेयी (घ) यतीन्द्र मिश्र

(ग) जाति प्रथा का दूषित सिद्धांत क्या है?
(घ) गद्यांश का सारांश लिखें।

उत्तर-(क)-(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख)-(क) भीमराव अंबेदकर
(ग) जाति-प्रथा का सबसे दूषित पहलू यह है कि इसमें मनुष्य की रुचि या क्षमता के अनुसार विभाजन नहीं होता बल्कि माँ-बाप के पेशा या उनके कार्य से ही विभाजन किया जाता है।
(घ) सक्षम श्रमिक-समाज के निर्माण के लिए व्यक्तियों की रुचि अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वस्तुत: व्यक्तियों की क्षमता का विकास इस हद तक करना चाहिए कि वह अपना पेशा या कार्य स्वयं चुन सके। जन्मना विभाजन से बात नहीं बनती।

3. जाति प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व
तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा
क्या चारा रह जाता है? हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) नाखून क्यों बढ़ते हैं (ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) नागरी लिपि (घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) विनोद कुमार शुक्ल
(ग) भीमराव अंबेदकर (घ) हजारी प्रसाद द्विवेदी

(ग) जाति प्रथा का सबसे बड़ा दोष क्या है?
(घ) आजकल पेशा बदलने के लिए लोग क्यों विवश हैं?

उत्तर-(क)-(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख)-(ग) भीमराव अंबेदकर
(ग) जाति प्रथा पेशे का निर्धारण करती है। यह प्रथा मनुष्य को जीवन भर के लिए एक ही पेशे में बाँध देती है। जाति प्रथा की ऐसी व्यवस्था असंचयित और दोषपूर्ण है।
(घ) ‘बुभुक्षित किं न करोति पापम’- अर्थात् भूखा कौन-सा पाप नहीं करता है। वर्तमान परिस्थिति में उद्योग-धंधों में काफी परिवर्तन हुआ है। नयी तकनीकी मनुष्य को पेशा बदलने के लिए प्रतिकूल परिस्थिति पैदा करती जा रही है। समुचित व्यवस्था नहीं मिलने पर लोग अपनी क्षुधा
की तृप्ति के लिए पेशा बदलने को विवश होते जा रहे हैं।

4. आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी यह कि बहुत से लोग ‘निर्धारित’ कार्य को ‘अरुचि’ के साथ केवल विवशतावश करते हैं। ऐसी स्थितिस्वभावतः मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने और कम काम करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में, जहाँ काम करनेवालो का न दिल लगता हो न दिमाग, कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है? अत: यह सिद्ध हो जाता है कि आर्थिक पहलू से भी
जाति प्रथा हानिकारक प्रथा है।

(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) मछली
(ख) आविन्यो
(ग) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(घ) शिक्षा और संस्कृति

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) भीमराव अंबेदकर (ख) मैक्समूलर
(ग) महात्मा गाँधी
(घ) अमरकांत

(ग) कौन-सी स्थिति मनुष्य को टालू या कम काम करने के लिए जिम्मेवार है?
(घ) आप कैसे कह सकते हैं कि आर्थिक दृष्टि से जाति प्रथा हानिकारक है?

उत्तर-(क)-(ग) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख)-(क) भीमराव अंबेदकर
(ग) काम के प्रति अरुचि और विवशता मनुष्य को टालू या कम काम करने की जिम्मेदार है।
(घ) भारतीय जाति प्रथा में अपनी रुचि के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति टालू काम करता है, फलतः जितना उत्पादन होना चाहिए, उतना नहीं होता और आर्थिक विपन्नता घर कर लेती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय जाति प्रथा आर्थिक रूप से भी हानिकारक है।

5. किसी भी आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविध हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। तात्पर्य यह कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इसमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो।

(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) बहादुर
(ख) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ग) विष के
(घ) नागरी लिपि

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन
(क) गुणाकर मुले (ख) रामविलास शर्मा
(ग) नलिन निलोचन शर्मा (घ) भीमराव अंबेदकर

(ग) भाई-चारे का संबंध दूध और पानी के मिश्रण-सा क्यों बताया गया है?
(घ) किनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए?

उत्तर-(क)-(ख) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख)-(घ) भीमराव अंबेदकर
(ग) दूध और पानी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों में विच्छेदन नहीं किया जा सकता है। शुद्ध दूध में भी पानी का कुछ-न-कुछ अंश रहता ही है। सभ्य समाज ने जाति प्रथा के नाम पर श्रम का भी विभाजन कर दिया है। विविध जातिओं का मिश्रण ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र की ऐसी व्यवस्था ही भाईचारा है। विविष धर्म सम्प्रदाय के होकर भी हम भारतीय हैं। हमारा संबंध अक्षुषण है। यही कारण है कि भाईचारे का संबंध दूध और पानी की तरह है।
(घ) सभ्य समाज ने जाति-प्रथा के नाम पर समाज को विभक्त कर दिया है। ऐसे समाज में सबको भाग लेना चाहिए तथा एक-दूसरे की रक्षा के लिए सजग रहना चाहिए।

पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
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पाठ के साथ
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प्रश्न 1. लेखक किस विडंबना की बात करते हैं? विडंबना का स्वरूप क्या है?
उत्तर-डॉ. भीमराव अंबेदकर ने ‘जातिवाद के पोषकों को विडंबना की बात कहकर संबोधित किया है।
‘जातिवादी विडंबना के स्वरूप’ की चर्चा लेखक ने अपने शोधपरक लेख में करते हुए उसपर सटीक प्रकाश डाला है।
‘जातिवाद’ के जो लोग पोषक वे इसका समर्थन कई आधार पर करते हैं-
(i) कुछ लोगों का कहना है कि आधुनिक ‘सभ्य समाज’ ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम-विभाजन को आवश्यक मानता है। जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है, इसी कारण इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसमें जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ अमिक विभाजन को भी रूप लिए हुए है।
(ii) भारत की जाति प्रथा की दूसरी विडंबना यह है कि यह श्रमिकों का अस्वभाविक विभाजन ही नहीं करती, बल्कि विभाजित वर्गों को एक-दूसरे को अपेक्षा. ऊंच नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता।
(iii) भारत की जाति प्रथा की तीसरी विडंबना यह है कि मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किये बिना दूसरे हो दृष्टिकोण जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, पहले से ही अर्थात् गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।
(iv) चौथी विडंबना यह है कि जाति प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवनभर के लिए एक पेशे में बाँध देती है भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह मूखों मर जाय।
(v) पाँचवीं विडंबना यह है कि हिन्दू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रबार पेशा-परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष
कारण बनी हुई है।

प्रश्न 2. ‘जातिवाद’ के पोषक उसके पक्ष में क्या तर्क देते हैं।
उत्तर-जातिवाद के पोषक ‘जातिवाद’ के पक्ष में अपना राम देते हुए उसकी उपयोगिता को सिद्ध करना चाहते हैं-
(i) जातिवादियों का कहना है कि आधुनिक सभ्य समाज कार्य कुशलता’ के लिए मन-बिभाजन को आवश्यक मानता है क्योंकि श्रम विभाजन भाति प्रथा का ही दूसरा रूप है। इसीलिए श्रम विभाजन में कोई बुराई नहीं है।
(ii) जातिवादी समर्थकों का कहना है कि माता पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार ही यानी गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।
(iii) हिन्दू धर्म पेशा परिवर्तन की अनुमति नहीं देता। भले ही वह पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त ही क्यों न हो। भले ही उससे भूखों मरने की नौबत आ जाए लेकिन उसे अपनाना ही होगा।
(iv) जातिवादियों का कहना है कि परंपरागत पेशे में व्यक्ति दक्ष हो जाता है और वह अपना कार्य सफलतापूर्वक संपन्न करता है।
(v) जातिवादियों ने ‘जातिवाद’ के समर्थन में व्यक्ति की स्वतंत्रता को अपहृत कर सामाजिक बंधन के दायरे में ही जीने-मरने के लिए विवश कर दिया है। उनका कहना है कि इससे सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है और अराजकता नहीं फैलती।

प्रश्न 3. जातिवाद के पक्ष में दिए गये तर्कों पर लेखक की प्रमुख आपत्तियाँ क्या हैं?
उत्तर– ‘जातिवाद’ के पक्ष में दिए गए तर्कों पर लेखक ने कई आपत्तियाँ उठायी हैं जो चिंतनीय है-
(i) लेखक के दृष्टिकोण में जाति प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। (ii) जाति प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं करता। (ii) मनुष्य की व्यक्तिगत भावना या व्यक्तिगत रुचि का इसमें कोई स्थान या महत्त्व नहीं रहता। (iv) आर्थिक पहलू से भी अत्यधिक हानिकारक
जाति प्रथा है। (v) जाति प्रथा मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा, रुचि व आत्मशक्ति को दबा देती है। साथ ही अस्वाभाविक नियमों में जकड़ कर निष्क्रिय भी बना देती है।

प्रश्न 4. जाति भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं कही जा सकती?
उत्तर-जाति या जाति प्रथा भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि और क्षमता का ख्याल नहीं करती। मनुष्य के प्रशिक्षण या उसकी निजी क्षमता पर विचार नहीं कर उसके वंशानुगत पेशा में ही जीने-मरने के लिए विवश कर दिया जाता है।

प्रश्न 5. जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण कैसे बनी हुई है?
उत्तर-हिन्दू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा नहीं हो, भले ही वह उस पेशा में पारंगत हो। इस कारण पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

प्रश्न 6. लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से बड़ी समस्या किसे मामते हैं और क्यों?
उत्तर-लेखक की दृष्टि में आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या यह है कि बहुत-से लोग निर्धारित कार्य को अरुचि के साथ विवशतावश करते हैं। इसका प्रतिफल यह होता है कि काम में मन नहीं लगता है और दिमाग भी अशांत रहता है। इसमें स्वाभाविकता
और रुचि मर जाती है।

प्रश्न 7. लेखक ने पाठ में किन प्रमुख पहलुओं से जाति प्रथा को प्रथा के रूप में दिखाया है?
उत्तर-लेखक ने आर्थिक पहलुओं से जाति प्रथा को एक हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है।

प्रश्न 8. सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए लेखक ने किन विशेषताओं को आवश्यक माना है?
उत्तर-डॉ. भीमराव अंबेदकर ने सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए निम्नांकित विशेषताओं का उल्लेख किया है-
(i) सच्चे लोकतंत्र के लिए समाज में स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व भावना की वृद्धि हो।
(ii) समाज में इतनी गतिशीलता बनी रहे कि कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक संचालित हो सके। (iii) समाज में वहुविध हितों में सबका भाग होना चाहिए और सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। (iv) सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। (v) दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारा होना चाहिए।
इन्हीं गुणों या विशेषताओं से युक्त तंत्र का दूसरा नाम लोकतंत्र है।
“लोकतंत्र शासन की एक पद्धति नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इसमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति, श्रद्धा व सम्मान भाव हो।”

पाठ के आस-पास
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प्रश्न 1. संविधान सभा के सदस्य कौन-कौन थे?
उत्तर-संविधान सभा के मुख्य सदस्यों में निम्नलिखित थे-
1. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
2. डॉ. भीमराव अंबेदकर

प्रश्न 2. जाति प्रथा पर लेखक के विचारों की तुलना महात्मा गाँधी, ज्योतिबा फूले, और डॉ. राम मनोहर लोहिया से करते हुए एक संक्षिप्त आलेख तैयार करें।
उत्तरभारत में जाति प्रथा की परंपरा बहुत प्राचीन काल से चली आ रही है। वैदिक काल में भी जाति प्रथा थी किन्तु उसमें संकीर्णता और अनुदारता का अभाव था। उसका रूप भिन्न था। वैदिक काल के उपरांत श्रम द्वारा कार्य-संपादन के आधार पर जातियों का वर्गीकरण हुआ।
प्रारंभिक दौर में तो यह वर्ण-विभाजन चाहे जाति विभाजन कार्य-संपदान के आधार पर सराहनीय था किन्तु कालान्तर में इसमें सरलता उदारता की जगहें-संकीर्णता, अनुदारता, छुआछूत और ऊँच-नीच की भावना घर कर गयी जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत में जाति विभाजन श्रम
निष्पादन में अपनी सार्थक भूमिका अदा करने से चुक गया और विघटनवादी तत्त्वों के कारण जातीयता संकीर्णता और कठोरता में बदल गयी जिसका दुष्परिणाम आज भी समग्र भारत भोग रहा है। आज इसी संकीर्ण भावनाओं एवं जातिगत विद्वेष के कारण हमारी सही प्रगति लक्ष्य से
भटककर गतिहीन रूप में दीख रही है। श्रम को जब तक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा तब तक भारत उन्नति के शिखर पर रहा किन्तु, जब इसमें संकीर्णता, ऊँच-नीच, घृणा, द्वेष की भावना प्रबल होती गयी तो भारत अवनति की ओर बढ़ गया साथ ही समाज कई खंडों में विभक्त होकर शक्तिहीन अवस्था की ओर अग्रसर होता रहा।
# महात्मा गाँधी भारतीय सम्यता और संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित थे साथ ही वैष्णव विचारधारा के पोषक होने के कारण अहिंसक थे। इसी कारण उन्होंने जाति प्रथा की संकीर्णता, छूआछूत, ऊँच-नीच, घृणा-द्वेष आदि का घोर विरोध किया और वर्ण व्यवस्था की बारीकियों का सूक्ष्म विश्लेषण-विवेचन करते हुए अपना विचार प्रकट किया। इस प्रकार गाँधी के विचार समन्वयवादी और सुधारवादी थे। वे अहिंसा के पुजारी थे। शोषण-दमन, अत्याचार के घोर विरोधी थे। समानता, बंधुत्व, प्रेम और आपसी भाईचारां के प्रबल पक्षधर थे।
# ज्योतिबा फूले एक. समाज-सुधारक, चिंतक एवं मानवतावादी महामानव थे। वे नारी-शोषण के घोर विरोधी थे। जाति-प्रथा, छूआछूत, ऊँच-नीच, ब्राह्मणवादी व्यवस्था के घोर विरोधी थे। उन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार द्वारा इन कुरीतियों को दूर करने का सार्थक प्रयास किया। वे जाति प्रथा के घोर विरोधी थे। उन्होंने मानव-मानव के बीच की संकीर्ण दीवारों को मिटाने का काम किया। उन्हीं के विचारों के कारण समाज का पिछड़ा और दलितवर्ग चेतना संपन्न हो पाया और समाज में संघर्षरत रहकर सम्मान प्राप्त किया। इस प्रकार ज्योतिबा फूले का समानतावादी
विचार, सुधारवादी विचार और परंपरावादी-संकीर्णताओं से मुक्ति का प्रयास सराहनीय है।
# डॉ. राममनोहर लोहिया भी भारतीय चिंतन धारा के एक मजबूत स्तंभ थे। उन्होंने समाजवादी विचारधारा को पोषण किया। वे गैर-बराबरी और जातीयता के घोर विरोधी थे।
सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति के पक्षधर थे। उन्होंने पिछड़ों को जगाने का काम किया। उनमें राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया। पिछड़ा पावे सौ में साठ का नारा देकर भारतीय समाज को आन्दोलित कर दिया और जातीय कुंठा से ग्रसित टूटे हुए लोगों में नयी चेतना की ऐसी ज्योति जगायी कि आज भारत का इतिहास ही बदल गया। लोहिया जी प्रकांड विद्वान, अन्वेषी दृष्टिसंपन्न
विचारक और समाजवादी विचारधारा के हिमायती थी।
# डॉ. भीमराव अंबेदकर भी इन्हीं मनीषियों की परंपरा में आते हैं। इनके विचार भी बल. ही सुलझे हुए और लोकहितकारी थे। इन्होंने बचपन से लेकर युवावस्था तक भारतीय समाज में परिव्याप्त जातीयता, संकीर्णता, असमान व्यवहार-विचार को देखा था, साथ ही उसके अत्याचार को भोगा था। शोषण-दमन से पीड़ित होकर उनका स्वभाव ही विद्रोही हो गया और इसी कारण
इन्होंने भारतीय वाङमय का गठन अध्ययन-चिंतन-मनन किया। तदुपरांत प्रखर विचारों से लैस होकर भारतीय समाज को अपने तल्ख विचारों से प्रभावित किया। साथ ही युगों-युगों से शोषित-पीड़ित, दमित दलित जातियों को जगाकर प्रथम पंक्ति में बैठाने का काम किया। विधि
विज्ञान के वृहस्पति के रूप में ख्याति पायी। भारतीय संविधान के निर्माण में अतुलनीय योगदान दिया और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े मानव को राष्ट्र के सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ होने का संदेश दिया।
बौद्धिस्ट के रूप में उन्होंने मानवतावादी जीवन-दर्शन का प्रचार-प्रचार किया। संवेदनशील और प्रखर चिंतक के रूप में दलितों के उद्धार के लिए जीवनपर्यन्त संघर्ष किया। जातीयता का घोर विरोध किया। ब्राह्मणवादी विचारों का खंडन-मंडन किया। भारतीय वाङमय की विशेषताओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया और लोकहित में उसकी महत्ता को सिद्ध किया।
अंबेदकर द्वारा रचित ग्रंथ इसके साक्षी हैं कि वे कितने बड़े विचारक थे, समाज-सुधारक थे। सूक्ष्म-गंभीर अन्वेषी थे। भारतीयता को नये रूप में ढालनेवाले कुशल शिल्पी थे। वे महा मानव थे। सुविज्ञ कानूनविद् थे। भारत-भारती के सुयोग्य पुत्र थे।

प्रश्न 3. ‘जातिवाद और आज की राजनीति’ विषय पर अंबेदकर जयंती के अवसर पर छात्रों की एक विचार गोष्ठी आयोजित करें।
उत्तर-भारत में आरंभिक दौर से ही जाति प्रथा थी किन्तु उनमें संकीर्णता और असमानता रूप आज हमको देखने को मिल रहा है। नहीं थी। वैदिक काल के बाद इसमें संकीर्णता और घृणा-द्वेष भाव पनपते गए जिसका घृणित
श्रम-विभाजन की उपयोगिता के आधार पर हमारे पूरखों ने अपनी संततियों को काम का बँटवारा कर दिया था ताकि समाज की प्रगति समयानुकूल होती रहे किन्तु धीरे-धीरे आबादी बढ़ती गयी और वैचारिक मतभेद बढ़ते गए जिसके कारण आदमी व्यक्तिगत लाभ-हानि को लेकर ओछा बनता गया। स्वार्थी बनता गया और आज संकीर्णता की गंदगी के बीच जीवन व्यतीत कर रहा है।
अगर श्रम-विभाजन की श्रेष्ठता और नीचता की दृष्टि से नहीं देखा गया होता तो प्राचीनकाल की तरह ही भारत आज विश्व में वंदनीय रहता। जातीयता और श्रम में ऐसा संबंध होता कि उसमें गुणवत्ता की कद्र होती और परंपरा के अवगुणों से मुक्ति मिलती। हर व्यक्ति की रुचि, कार्य कुशलता भिन्न-भिन्न हुआ करती है। परंपरागत पेशा के दबाव में मनुष्य जीता-मरता है, जो कभी-कभी व्यक्तित्व और समाज के विकास में बाधक हो जाता है। इसी कारण) गनुनिक दौर में जातीयता का महत्त्व अब उतना नहीं रह गया है। यह युग आर्थिक मुक्त है। अब बिना जीवन व्यर्थ, वाली कहावत सर्वमान्य है बदलते जीवन मूल्यों के बीच जातीयता तो है किन्तु संकीर्णता और परंपरा के प्रति व्यामोह की जंजीरें टूटती नजर आ रही है।
विज्ञान और तकनीकी विकास ने मानव के पैर में पंख लगा दिए हैं। अतः, जातीयता की , कठोरता और दबाव कम होने लगा है। लोग बौद्धिकता के कारण तार्किक जीवन जीने के लिए विवश है। सारे प्राचीन मान्यताएँ खंडित होकर नये रूप में ढल रही हैं। अतः, प्राचीन काल से चली आ रही जाति प्रथा की बुराइयाँ बहुत कम हुई हैं।
प्राचीन काल की व्यवस्था और जातीयता तथा आधुनिक काल की व्यवस्था और जातीयता में काफी अंतर है। उस समय परंपरागत स्वरुप का पालन-पोषण कठोरता के साथ किया जाता था। समाज का नियंत्रण इतना कठोरता था कि व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता बंधक बन गयी थी। सामाजिक आचार-विचार और जातीय व्यवस्था के बीच ही जीना-मरना पड़ता था। किन्तु आजादी के बाद भारत में जातीयता कर स्वरूप काफी बदल गया और वर्तमान राजनीति ने उसे काफी प्रभावित भी किया।
भारतीय राजनीति के विकास ने ‘जातीयता’ की संकीर्णताओं को दूर करने का अत्यधिक प्रयास किया। छुआछूत, घृणा-द्वेष, ऊँच-नीच की भावना, अमीरी-गरीबी का द्वेष, परंपरागत पेशा से मुक्ति, नयी जीवन शैली का प्रादुर्भाव आदि के माध्यम से जातीयता की कठोरता और असमानता दूर होती गयी। जातीयता के झूठे दंभ में जी रहा भारत आज स्वच्छ वायु का सेवन कर रहा है गुणवत्ता और सुविज्ञता के आधार पर मानव का मूल्यांकन हो रहा है। भारतीय संविधान में रूप-रंग-गुण के आधार पर भेदभाव को खत्म कर दिया गया है। सब में समानता, भाईचारा,
आपसी प्रेम और सेवा-भावना को विकसित करने में सहायक सिद्ध हुआ है।
भारतीय राजनीति ने भारतीय जाति-व्यवस्था के भीतर परिव्याप्त अनेक बुराइयों को दूर कर उसमें नयी स्फूर्ति और नया रूप देने का काम किया है। आज मानव-मानव के बीच किसी भी प्रकार की असमानता या शोषण-दमन नहीं है। लोग अपनी रुचि, आर्थिक संपत्रता और अवसर के आधार पर विविध क्षेत्रों में विकास कर रहे हैं। शादी-विवाह में भी अंतरजातीय विवाह के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। संकीर्णताओं से लोग ऊपर उठकर अपने विकास में लगे हैं। सबको समान अवसर प्राप्त है। राष्ट्र ने सबको समान अधिकार और समान विचार से लैस करने का काम किया है।
फिर भी कभी-कभी चुनावी माहौल में संकीर्ण जातीयता का रूप देखने को मिलता है जो स्थायी तो नहीं रहता लेकिन कुछ नुकसान पहुंचाने का काम करता है। हमारे नेताओं की ओछी और संकीर्ण सोच के कारण यदा-कदा जातीय विद्वेष की लपेटें-अमन-चैन को भस्मीभूत कर देती है।
फिर भी चुनाव समाप्ति के बाद वह माहौल स्वत: समाप्त हो जाता है। धीरे-धीरे भारतीय राजनीति भी अब निर्मलता और न्यायसंगत माहौल बनाने का सार्थक प्रयास कर रही है। कहीं-कहीं अदूरदर्शी, अविवेकी राजनेताओं द्वारा कुत्सित कुप्रयासों द्वारा ओछी जातीयता का बीज बोया जाता है जो निदनीय है।

प्रश्न 4. बाबा साहब भीमराव अंबेदकर को ‘आधुनिक मनु’ क्यों कहा जाता है? विचार करें।
उत्तर-डॉ. भीमराव अंबेदकर भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में जाने जाते हैं। वे एक कुशल वक्ता, प्रखर प्रतिभासंपन्न विधिवेत्ता, भारतीय वाङमय के गंभीर अध्येताऔर पुरातन सामाजिक व्यवस्था के घोर विरोधी एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे। जब राष्ट्र स्वतंत्र हुआ तो
स्वतंत्रता और संप्रुभता की रक्षा के लिए भारतीय संविधान की आवश्यकता महसूस की गयी। हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने भारतीय संविधान निर्माण समिति का गठन किया जिसके सर्वमान्य अध्यक्ष के रूप में डॉ. भीमराव अंबेदकर को मनोनीत किया गया। डॉ साहब बहुत बड़े विधि विशेषज्ञ थे।
उनकी सूक्ष्म अन्वेषी दृष्टि के सभी कायल थे।
भारतीय संविधान के निर्माण में इन्होंने अथक मेहनत की। उसमें मानवीय कल्याणकारी नीति-नियमों की स्थापना की। सबल और सुविज्ञ राष्ट्र के निर्माण के लिए भारतीय संविधान को लोकोपयोगी बनाया। इसी कारण अंबेदकर साहब को भारतीय समाज ने ‘आधुनिक मनु’ के रूप में संबोधित किया।

भाषा की बात
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1. पाठ से संयुक्त, सरल एवं मिश्र वाक्य चुनें।
(i) यह विडंबना की बात है कि इस युग में भी जातिवाद के पोषकों की कमी नहीं है। (मिश्र वाक्य)
(ii) भारत की जाति व्यवस्था की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच
भी करार देती है जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता। (मिश्र वाक्य)
(iii) जाति प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की इच्छा पर निर्भर नहीं रहता। (सरल वाक्य)
(iv) मैं समस्या के रचनात्मक पहलू को लेता हूँ। (सरल वाक्य)
(v) मेरे द्वारा जाति प्रथा की आलोचना सुनकर आप लोग मुझसे यह प्रश्न पूछना चाहेंगे कि यदि मैं जातियों के विरुद्ध हूँ, तो फिर मेरी दृष्टि में आदर्श समाज क्या है? (संयुक्त वाक्य)
(vi) तात्पर्य यह कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है-(संयुक्त वाक्य)।

2. निम्नलिखित के विलोम शब्द लिखें :-
सभ्य-असभ्य
दोष-गुण
विभाजन-संयुक्त
निश्चय-अनिश्चय
ऊँच-नीच
स्वतंत्रता-परतंत्रता
सजग-लापरवाह, सुस्त।
रक्षा-हत्या

3. पाठ से विशेषण चुनें तथा उनका स्वतंत्र वाक्य प्रयोग करें :-
(i) बुराई-श्रम-विभाजन से कोई बुराई नहीं है।
(ii) सक्षम-सक्षम श्रमिक ही समाज के विकास में सहयोग कर सकते हैं।
(iii) पैतृक-भारतीय समाज में पैतृक पेशा अपनाने की बाध्यता थी।
(iv) गरीबी-घोर गरीबी में जीनेवाले लोगों पर सहानुभूति रखनी चाहिए।
(v) दूषित-दूषित जल ग्रहण करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
(vi) विकसित-हमारा राष्ट्र विकसित है।
(vii) कुशलता-कुशल श्रमिकों की कुशलता के लिए हर सरकार को तत्पर रहना चाहिए।
(viii) सभ्य-किसी भी सम्य समाज में श्रमिकों को सम्मान मिलता है।
(ix) अनुपयुक्त-यह खाद्य सामग्री स्वास्थ्य के लिए अनुपयुक्त है।
(x) श्रमिक-श्रमिकों की दशा शोचनीय है।
(xii) अपर्याप्त-यहाँ रहने के लिए अपर्याप्त व्यवस्था है।
(xiii) सामाजिक-माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार व्यक्ति को प्रतिष्ठा मिलती हैं।

4. निम्नलिखित के पर्यायवाची शब्द लिखें:-
दूषित-गंदा, अशुद्ध, अस्वास्थ्यकर।
श्रमिक-मजदूर, मिहनतकश, मिहनती, कामकाजी।
पेशा-व्यवसाय, व्यापार, रोजगार।
अकस्मात्-अचानक, एक-ब-एक, एका एक।
अनुमति-आज्ञा, आदेश।
अवसर-वक्त, समय।
परिवर्तन-बदलाव।
सम्मान-आदर, स्वागत, वंदना, अभिनंदन।

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