10TH SST

bihar board 10 class geography notes – भारत : भूमि एवं लोग

भारत : भूमि एवं लोग

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bihar board 10 class geography notes

class – 10

subject –  geography

lesson 1 – भारत : भूमि एवं लोग

भारत : संसाधन एवं उपयोग

महत्वपूर्ण तथ्य –
मानव जीवन के उपयोग में आने वाली सभी वस्तुएँ संसाधन हैं । इसके अंतर्गत भूमि , मृदा , जल एवं खनिज इत्यादि भौतिक संसाधन तथा वनस्पति , वन्य जीव , जलीय जीव इत्यादि जैविक संसाधन हैं । संसाधन का रूप कोई भी हो , तकनीक को सहायता से ही ये सभी जीवनोपयोगी बन जाते हैं तथा मानवीय आवयकताओं को भी पूर्ण करते हैं । जनसंख्या में वृद्धि तथा आवश्यकताओं में वृद्धि के साथ ही साथ मानव के ज्ञान में भी क्रमशः वृद्धि होती गई है जिसके कारण पर्यावरण में उपलब्ध पदार्थों को , मानव जीवन को सुखमय बनाने में सफल होता गया । प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता जिम्मरमैन ने कहा है कि ” संसाधन होते नहीं , बनते हैं । ” इन संसाधनों का निर्माता एवं उपयोगकर्ता मानव खुद है ।
मानव के आर्थिक विकास में सहायक संसाधनों के कई प्रकार हैं
( i ) उपलब्धता के अंतर्गत मानवकृत एवं प्रकृतिप्रदत्त संसाधन शामिल हैं ।
( ii ) पुनः प्राप्ति के अंतर्गत नवीकरणीय एवं गैर – नवीकरणीय संसाधन शामिल हैं ।
( iii ) स्रोत के अंतर्गत उन्हें जैविक एवं अजैविक संसाधन कहा जाता है ।
( iv ) स्वामित्व की दृष्टि से इनको निजी या व्यक्तिगत , सामुदायिक , राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संसाधनों में बाँया जाता है ।
( v ) विकास के आधार पर संसाधनों को संभावित , ज्ञात , भंडार एवं संचित कोष में बाँटा जाता है ।

संसाधनों के प्रकार एवं उदाहरण
1. मानवकृत संसाधन — भवन , कार्यालय , स्कूल , सड़क , रेलमार्ग , मंदिर , मस्जिद इत्यादि ।
2. प्रकृति प्रदत्त संसाधन — हवा , जल , भूमि , पर्वत , पठार , मैदान , तालाब , मृदा , झील , सागर इत्यादि ।
3. नवीकरणीय संसाधन जलीय ऊर्जा , पवन ऊर्जा , सौर ऊर्जा , भूतापीय ऊर्जा , पेड़ – पौधे इत्यादि ।
4. अनवीकरणीय संसाधन कोयला , खनिज तेल , धात्विक एवं अघात्विक खनिजें इत्यादि ।
5. जैविक संसाधन — जैसे पशु , पक्षी , जीव – जंतु , पेड़ – पौधे , मानव इत्यादि ।
6. अजैविक संसाधन — इसमें सभी निर्जीव पदार्थ चट्टान , खनिजें , भूमि , मृदा , पर्वत , पठार इत्यादि शामिल हैं ।
7. व्यक्तिगत संसाधन — व्यक्ति विशेष के अधिकार की वस्तुएँ एवं पदार्थ जैसे – खेत , मकान , साइकिल , मोटरसाइकिल , मोटरकार , तालाब , बाग – बगीचे शामिल हैं ।
8. सामूहिक संसाधन — इसमें पंचायत भूमि , सामुदायिक भवन , तालाब , मंदिर , मस्जिद , श्मशान भूमि , विद्यालय परिसर , पर्यटक स्थल इत्यादि शामिल हैं ।
9. राष्ट्रीय संसाधन किसी राष्ट्र के अंतर्गत पाए जानेवाले सभी संसाधन एवं तट से 19.2 किमी . दूर तक पाया जानेवाला संसाधन इसमें शामिल हैं ।
10. अंतर्राष्ट्रीय संसाधन – समुद्र तट से 200 किमी की दूरी के बाद पाया जानेवाला संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संसाधन होता है । ऐसे संसाधनों का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति से किया जाता है । 11. संभावी संसाधन — जो संसाधन भविष्य में उपयोग किए जाने वाले हैं और जिनका उपयोग अभी तक नहीं हुआ है , संभावित संसाधन कहलाते हैं । 12. विकसित संसाधन — जिस संसाधन के विकास की तकनीक मालूम हो और अभी उपयोग किया जा रहा है , विकसित संसाधनों की श्रेणी में आते हैं ।
13. भंडार संसाधन — जिस संसाधन का तकनीक के अभाव में उपयोग नहीं हो पा रहा है । भंडार संसाधन कहलाते हैं ।
14. संचित कोष संसाधन — जिस संसाधन के उपयोग की तकनीक पता हो परंतु वर्तमान में उपयोग नहीं हो रहा है । सचित संसाधन हैं ।
विश्व के साथ ही साथ मारत में भी संसाधनों का वितरण काफी विषम है । यही नहीं , इनके अति उपयोग एवं विवेकहीन उपयोग से आज कई समस्याएँ सामने आती जा रही हैं । इसलिए संसाधन संरक्षण एवं नियोजन आवश्यक है । यद्यपि संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है फिर भी इसके कई स्तर हैं –
( 1 ) संसाधनों का सर्वेक्षण करना ।
( ii ) सर्वेक्षण के बाद उसकी गुणात्मक एवं मात्रात्मक आकलन कराना ।
( iii ) उपयुक्त तकनीक के आधार पर संसाधन प्राप्त करना ।
( iv ) प्राप्त संसाधन का राष्ट्रीय विकास के साथ संबंध स्थापित करना ।
संसाधन संरक्षण का संबंध अधिक समय तक अधिक लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक से अधिक उपयोगी होने से है । इस पृथ्वी पर खनिज को सबसे कीमती संसाधन माना गया है । परंतु मानव द्वारा विकास कार्यों के लिए इन संसाधनों का अभूतपूर्व दोहन किया गया , जिससे उत्पन्न समस्याओं से आज विश्व चिंताग्रस्त है ।
संसाधन संरक्षण की दिशा में सर्वप्रथम 1968 ई . में क्लब ऑफ रोम ने इसकी वकालत की । 1968 ई- में एहरिलन की पुस्तक ‘ दी पोपुलेशन बम ‘ तथा 1974 ई . में शुमशेर की पुस्तक ‘ स्मॉल इज ब्यूटीफुल ‘ प्रकाशित हुई । इसी बीच विश्व पर्यावरण विकास आयोग का गठन संयुक्त राष्ट्रसंघ ने किया , जिसका अध्यक्ष नार्वे की तत्कालीन प्रधानमंत्री गरो हरलेष ब्रटेंलैंड को बनाया गया । ब्रटलैंड आयोग ने संसाधन – संरक्षण के संदर्भ में 1987 ई ० में अपनी रिपोर्ट ‘ हमारा साझा भविष्य ‘ नाम से आया । इस रिपोर्ट में सतत् विकास पर जोर दिया गया । इस संदर्भ में 1992 ई . में प्रथम पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन ब्राजील के शहर रायो – डी – जेनेरों में किया गया । 1997 में न्यूयार्क और 2002 में जोहांसबर्ग में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन हुआ ।
इन सम्मेलनों में और विशेषकर प्रथम पृथ्वी सम्मेलन में सतत विकास की अवधारणा पर मंथन किया गया । वास्तव में मानवीय जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए सतत् विकास की जरूरत है । संसाधन के संदर्भ में सतत् विकास का तात्पर्य है भविष्य की पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में पर्यावरण को हानि पहुँचाए बिना विकास करना , जिससे मानवीय जीवन सतत् चलता रहे ।
विश्व स्तर पर आज संसाधनों का दोहन इस प्रकार किया जा रहा है कि संसाधनों के उपयोग को लेकर समाज संपन्न और विपन्न वर्गों में बँट चुका परिणाम यह है कि सम्पन्न वर्ग और सम्पन्न होता जा रहा है तथा विपन्न वर्ग और गरीब होता जा रहा है ।

  I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न :
( i ) कोयला किस प्रकार का संसाधन है ?
( क ) अनवीकरणीय ( ख ) नवीकरणीय ( ग ) जैव ( घ ) अजैव
उत्तर– ( क )
( i ) सौर ऊर्जा निम्नलिखित में से कौन – सा संसाधन है ? (
क ) मानवकृत ( ख ) पुनः पूर्तियोग्य ( ग ) अजैव ( घ ) अचक्रीय
उत्तर– ( ख )
( ii ) तट रेखा से कितने किमी क्षेत्र सीमा अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र कहलाता है ?
( क ) 100 ( ख ) 200 ( ग ) 150 ( घ ) 250
उत्तर– ( ख )
( iv ) डाकू की अर्थव्यवस्था का संबंध है-
( क ) संसाधन संग्रहण से ( ख ) संसाधन के विदोहन से ( ग ) संसाधन के नियोजित दोहन से ( घ ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर– ( ख )
( v ) समुद्री क्षेत्र में राजनीतिक सीमा से कितनी किमी दूरी तक का क्षेत्र राष्ट्रीय संपदा में निहित है –
( क ) 10.2 ( ख ) 15.5 ( ग ) 12.2 ( घ ) 19.2
उत्तर– ( घ )

II. लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
1. संसाधन को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर – प्रकृति में पाए जानेवाले सभी पदार्थ जो उपलब्ध प्रौद्योगिकी के आधार पर मानवीय आवश्यकताओं को पूर्ण करने की क्षमता रखता है , संसाधन कहलाता है । जैसे — सूर्य किरण , हवा , पानी , जीव – जंतु , खनिज पदार्थ इत्यादि । मानव के सामाजिक – आर्थिक विकास में संसाधनों का अमूल्य योगदान होता है ।
2. संभावी और संचित कोष संसाधनों के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – किसो क्षेत्र में पाए जाने वाले ऐसे संसाधन जिनका उपयोग वर्तमान में किसी कारण विशेष से नहीं किया जाता है , परंतु भविष्य में इनके उपयोग की पूरी संभावनाएँ होती हैं , संभावी संसाधन कहलाते हैं । जैसे राजस्थान एवं गुजरात की पवन एवं सौर – ऊर्जा । ऐसे संसाधन जिसके उपयोग की जानकारी होती है परंतु अभी इसका उपयोग प्रारंभ नहीं हुआ है । भविष्य को पूँजी वाले ऐसे संसाधनों को संचित संसाधन कहा जाता है । जैसे भारत में थोरियम द्वारा बिजली पैदा करना ।
3. संसाधन – संरक्षण की उपयोगिता पर प्रकाश डालें ।
उत्तर – विश्व स्तर पर संसाधनों का वितरण काफी विषम है । किसी प्रदेश में संसाधन विशेष की अधिकता है तो दूसरे प्रदेश में इसकी कमी होती है जबकि प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लिए संसाधनों की जरूरत होती है । विकास के नाम पर मानव ने संसाधनों का अविवेकपूर्ण एवं अनियोजित उपयोग किया है । परिणामस्वरूप , कई पर्यावरणीय समस्याएँ उभरने लगी हैं । साथ ही , कई संसाधन समाप्ति के कगार तक पहुँच चुके हैं । इसलिए , भविष्य में विकास के लिए और विशेषकर सतत् विकास के लिए संसाधनों का संरक्षण जरूरी है , उपयोगी है ।
4. संसाधन – निर्माण में तकनीक की भूमिका को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – प्रकृति द्वारा दिए गए पदार्थों को उपयोग में लाना कई कारकों पर निर्भर करता है । सबसे पहले किसी पदार्थ का उपयोग जानना जरूरी होता है । फिर उस पदार्थ की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए । आवश्यकत्ता में वृद्धि के अलावा तकनीकी ज्ञान में बढ़ोतरी होना भी जरूरी है । उचित संभावनाओं और सुविधाओं के बावजूद संसाधन – निर्माण हेतु तकनीकी ज्ञान होना आवश्यक होता है । उदाहरण के लिए , पृथ्वी के गर्भ में छिपे खनिज , संसाधन का रूप तभी ले पाया जब उसके उपयोग की तकनीकी विकसित कर ली गई । गिरते हुए जल से विद्युत पैदा करने की तकनीक विकसित होने के बाद ही जल संसाधन के महत्व में वृद्धि आई अन्यथा यह यूँ ही बहकर बर्बाद हो जाता ।
III . दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
1. संसाधन के विकास में “ सतत् विकास ‘ की अवधारणा को स्पष्ट करें ।
उत्तर – उपभोगवादी संस्कृति तथा आर्थिक विकास के दौर में मानव द्वारा संसाधनों का अति दोहन किया गया है । क्योंकि वर्तमान समय में विकास का मापदंड आर्थिक विकास से है । संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण 1960 में कई यूरोपीय देशों और अमेरिका में इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे । इसी बीच 1968 ई . में ‘ द पोपुलेशन बम ‘ नामक पुस्तक एहरलिन को प्रकाशित हुई तथा 1972 ई . में ‘ द लिमिट टू ग्रोथ ‘ नामक पुस्तकों के प्रकाशन से पर्यावरणविदों का ध्यान आकर्षित हुआ । अंततः संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ‘ विश्व पर्यावरण विकास आयोग ‘ का गठन कर गरो हरलेष बूटलैंड को इसका अध्यक्ष बनाया गया । इन्होंने सारी समस्याओं का अध्ययन कर 1987 ई . में ‘ आवर कॉमन फ्यूचर ‘ नामक रिपोर्ट पेश की जिसमें ‘ सतत् पोषणीय विकास ‘ पर जोर दिया गया । सतत् विकास , विकास की ऐसी अवधारणा है जिसमें आनेवाली पीढ़ियों को ध्यान में रखकर पर्यावरण को क्षति पहुँचाए बिना वर्तमान में विकास करने पर बल दिया गया है । यही कारण है कि विश्व स्तर पर आज सतत विकास की अवधारणा पर जोर दिया जाने लगा है । भारत और बिहार के संदर्भ में सतत विकास के लिए कई सुझाव दिए जाने लगे हैं । सतत विकास के लिए संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग होना जरूरी है । जिसके लिए संसाधनों का नियोजन भी आवश्यक है । संसाधनों का उपयोग इस प्रकार होना चाहिए जिससे पूरे प्रदेश का संतुलित आर्थिक विकास संभव हो सके।

2. स्वामित्व के आधार पर संसाधन के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर – संसाधन किसी भी देश के आर्थिक – सामाजिक विकास की कुंजी है । सामान्यत : संसाधन का तात्पर्य ‘ प्राकृतिक संसाधन ‘ से लिया जाता है । परंतु प्रकृति में उपलब्ध सभी पदार्थ जिसमें मानवीय आवश्यकताओं एवं इच्छाओं को पूरा करने की क्षमता होती है , संसाधन कहलाता है । यह संसाधन कई प्रकार का होता है । इसलिए संसाधनों का वर्गीकरण के कई आधार हैं । इन आधारों में उत्पत्ति , उपयोगिता , विकास एवं स्वामित्व शामिल है । स्वामित्व के आधार पर संसाधन के चार प्रकार होते हैं ( i ) व्यक्तिगत संसाधन — जो संसाधन किसी व्यक्ति विशेष के अधिकार क्षेत्र में होता है , व्यक्तिगत संसाधन कहलाता है । ऐसे संसाधनों के बदले व्यक्ति सरकार को कर भी चुकता करता है । जैसे – भूखंड , मकान , बाग – बगीचा , तालाब इत्यादि ।
( ii ) सामुदायिक संसाधन – जब कोई संसाधन व्यक्ति विशेष का न होकर पूरे समुदाय के अधिकार क्षेत्र में होता है तब उसे सामुदायिक संसाधन कहा जाता है । ऐसे संसाधनों का उपयोग समूह या समुदाय के लिए सुलभ होता है । जैसे – पंचायत भवन , सामुदायिक भवन , मंदिर , मस्जिद , श्मशान भूमि , चारण भूमि , तालाब , विद्यालय , पार्क , खेल मैदान इत्यादि ।
( iii ) राष्ट्रीय संसाधन – वैधानिक तौर पर किसी देश में उपलब्ध सभी प्रकार के संसाधनों को राष्ट्रीय संसाधन कहा जाता है । प्राचीन काल में इन संसाधनों पर राजाओं का अधिकार होता था । वर्तमान समय में यह अधिकार सरकार के पास है । राष्ट्रीय महत्त्व के निर्माण कार्यों जैसे सड़क मार्ग । रेलमार्ग , नहर बनाने , कारखाना स्थापित करने अथवा कार्यालय भवनों इत्यादि के लिए सरकार द्वारा निजी अथवा सामुदायिक संसाधनों का अधिग्रहण कर लिया जाता है तब वह राष्ट्रीय संसाधन बन जाता है । तटीय भाग से समुद्र में 19.2 किलोमीटर दूर तक का भाग राष्ट्रीय संसाधन का अंग माना जाता है ।
( iv ) अंतर्राष्ट्रीय संसाधन – सागर तट से 19.2 किलोमीटर के आगे एवं 200 किलोमीटर तक का समुद्री क्षेत्र संबंधित देश का आर्थिक अपवर्जक क्षेत्र होता है । इसके आगे पाया जानेवाला संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संसाधन कहलाता है जिसके इस्तेमाल के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की अनुमति लेनी पड़ती है ।

                    ( क ) प्राकृतिक संसाधन
                   ( भूमि एवं मृदा संसाधन )

महत्वपूर्ण तथ्य – किसी देश की समृद्धि वहाँ उपलब्ध संसाधनों के उचित उपयोग से ही संभव होता है । देश के प्राकृतिक संसाधनों में भूमि एवं मृदा का महत्व अतुलनीय है । मानव भूमि पर ही निवास करता है तथा सभी क्रियाकलाप इसी पर सम्पन्न करता है । परंतु इस भूमि का उपयोग हम विविध रूप में करते हैं । भूमि के विविध उपयोग के स्वरूप को ‘ भूमि – उपयोग प्रारूप कहा जाता है । भूमि एक प्राकृतिक एवं मौलिक संसाधन है । इसके बावजूद यह एक सीमित संसाधन है । इसलिए उपलब्ध भूमि का विवेकपूर्ण एवं नियोजित उपयोग किया जाना चाहिए।
विशाल क्षेत्रफल वाला देश होने के कारण भारत भूमि संसाधन में संपन्न है परन्तु इसके भौतिक स्वरूप में पर्याप्त भिन्नताएँ हैं । देश में उपलब्ध कुल भूमि का 43 % भाग मैदान के रूप में , 30 % भाग पर्वत के रूप में तथा शेष 27 % भाग पठार के रूप में है अर्थात् भारतीय भूमि पर पर्वत , पठार एवं मैदान सभी उपलब्ध हैं । जहाँ पर्वतीय भाग पर्यटन की दृष्टि से तथा नदियों के स्रोत के कारण महत्वपूर्ण हैं वहीं पठारी भाग खनिज संसाधनों के भंडार के कारण महत्वपूर्ण है । जबकि मैदानी भाग कृषि कार्य के लिए जाना जाता है । भूमि की यह प्रकृति मानवीय क्रियाकलापों को भी प्रभावित करता है । भूमि उपयोग के अंतर्गत निम्नलिखित वर्ग आते हैं –
( i ) वन भूमि । ( ii ) कृषि अयोग्य बंजर भूमि । ( iii ) गैर कृषि कार्य में संलग्न भूमि । ( iv ) स्थायी चारागाह एवं गोचर भूमि । ( v ) बाग – बगीचे एवं उपवन में संलग्न भूमि । ( vi ) कृषि योग्य बंजर भूमि , जिसका उपयोग पाँच वर्ष से नहीं हुआ है । ( vii ) वर्तमान परती भूमि । ( viii ) वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त परती भूमि । ( ix ) शुद्ध बोई गई भूमि ।
भूमि उपयोग का यह प्रारूप भौतिक एवं मानवीय कारकों द्वारा निर्धारित होता है । भौतिक कारकों में जहाँ भू – आकृति , जलवायु एवं मिट्टी शामिल हैं , वहीं मानवीय कारकों में जनसंख्या घनत्व , तकनीकी क्षमता , सांस्कृतिक विकास एवं परंपरा इत्यादि शामिल हैं ।
देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 93 % भाग का ही भू – उपयोग आँकड़ा उपलब्ध है । शेष 07 % भाग पाक अधिकृत एवं चीन अधिकृत क्षेत्र हैं जिनका सर्वेक्षण नहीं हुआ ।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी देश को पर्यावरण संतुलित रखने के लिए उसके 33 % क्षेत्र पर वन का विस्तार होना जरूरी है । परंतु इसके विपरीत भारत में आज भी मात्र 20 – 21 % भाग पर ही वन का फैलाव पाया जाता है । निर्धारित सीमा को प्राप्त करने के लिए देश में 1952 में राष्ट्रीय वन नीति बनाई गई । ये वन पर्यावरण संतुलन के साथ ही अर्थव्यवस्था के विकास में भी योगदान देते हैं । बंजर भूमि एवं गैर कृषि कार्य में संलग्न भूमि लगातार समस्या को बढ़ाती जा रही हैं ।
जहाँ तक शुद्ध बोए गए भूमि या क्षेत्र का संबंध है , विभिन्न राज्यों के बीच इसमें पर्याप्त भिन्नताएँ मिलती है । भारत के कुल क्षेत्रफल के 47 % भाग पर कृषि की जाती है । जबकि पंजाब और हरियाणा के कुल भूमि के 80 % भाग पर , उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के 59 % भूमि पर , महाराष्ट्र में 60 % भूमि पर , मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के 42 % भाग पर कृषि की जाती है । सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि के कारण राजस्थान में कृषि भूमि का विस्तार हुआ है । सिंचाई सुविधा के कारण ही देश में गहन कृषि हो रही है । भारतीय कृषि का योगदान राष्ट्रीय उत्पादन में 26 % है । उत्तराखंड , जम्मू – कश्मीर , हिमाचल प्रदेश , अरुणाचल प्रदेश , मिजोरम , नागालैंड , मणिपुर और अंडमान – निकोबार द्वीप समूह में 10 % से भी कम क्षेत्र कृषि के अंतर्गत हैं ।
भारत की लगभग 25 % भूमि बंजर भूमि के रूप में है । जम्मू – कश्मीर और राजस्थान में सबसे अधिक व्यर्थ भूमि है ।
मृदा पारितंत्र का एक प्रमुख घटक माना जाता है । पृथ्वी तल के सबसे ऊपरी पतली परत जो असंगठित पदार्थों से बनी है तथा जिसमें पेड़ – पौधों एवं जीव – जंतुओं की वृद्धि के लिए पोषक तत्व मौजूद होता है , मिट्टी या मृदा कहलाती है । इस मृदा का महत्व इसी से स्पष्ट होता है कि मानवीय जीवन मिट्टी से ही जन्म लेता है और मिट्टी में ही मिल जाता है । भूमि का मूल्यांकन उसकी उत्पादकता से निर्धारित होती है । वास्तव में भूमि का यह मूल्यांकन उसकी मिट्टी से संबंधित है ।
मृदा निर्माण एक लंबी अवधि में घटने वाली जटिल प्रक्रिया है । एक सेंटीमीटर मृदा के निर्माण में लाखों वर्ष लग जाते हैं ।
मृदा निर्माण के प्रमुख कारक हैं – ( i ) उच्चावच , ( ii ) जलवायु , ( iii ) वनस्पति , ( iv ) मौलिक चट्टान , ( v ) समय । भारत के उच्चावच , भू – आकृति , जलवायु एवं बनस्पतियों की विविधता के कारण यहाँ छ : ( 6 ) प्रमुख मिट्टियाँ पाई जाती हैं- ( i ) जलोढ़ मृदा ( ii ) काली मृदा ( iii ) लाल एवं पीली मृदा ( iv ) लैटेराइट मृदा ( v ) मरुस्थलीय मृदा ( vi ) पर्वतीय मृदा ।
जलोढ़ मृदा देश के 6.4 करोड़ हे . भूमि पर फैली है जो मुख्य रूप से नदी घाटी प्रदेशों तथा डेल्टा प्रदेशों में विकसित है । इस मृदा के कण नदी मुहाने से घाटी में ऊपर की ओर क्रमश : बड़े होते जाते हैं । पुराना जलोढ़ बांगड़ में कंकड़ एवं बजरी की मात्रा अधिक होती है । नवीन जलोढ़ खादर में महीन कण पाए जाते हैं । यह काफी उपजाऊ मिट्टी है । जलोढ़ मिट्टी में पोटाश , फास्फोरस और चूना के अंश अधिक होते हैं । इस मिट्टी में गन्ना , चावल , गेहूँ , मक्का , दलहन इत्यादि फसलों की खेती उपयुक्त मानी जाती है । अधिक उपजाऊ होने के कारण इस क्षेत्र में गहन कृषि होने से जनसंख्या घनत्व भी ऊँचा मिलता है ।
काली मृदा में एल्युमीनियम एवं लौह यौगिक की उपस्थिति अधिक होती है कपास की खेती के लिए उपयुक्त यह मिट्टी दक्कन लावा क्षेत्र में पाई जाती है ।
इस मिट्टी का निर्माण बेसाल्ट चट्टान के विघटन से हुआ है जो महाराष्ट्र , गुजरात , कर्नाटक , आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु में मिलता है । इस मिट्टी को रेगुर भी कहा जाता है । इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अत्यधिक है । इस मिट्टी में फास्फोरस की कमी रहती है । यह मिट्टी गन्ना , प्याज , गेहूँ , कपास एवं फलों की खेती के लिए उपयुक्त है ।
लाल एवं पीली मिट्टी 100 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलते हैं । इस दृष्टि से इसका विस्तार तमिनाडु , कर्नाटक , गोवा , महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश , उड़ीसा , छोटानागपुर पठार एवं मेघालय पठार पर मिलता है । यह मिट्टी मूल रूप से ग्रेनाइट , नीस जैसे रवेदार आग्नेय चट्टानों के विघटन एवं रूपांतर से बना है । लौहांश अधिक होने के कारण यह मिट्टी लाल रंग की तथा जलयोजन के बाद पीले रंग की हो जाती है । इस मिट्टी में चावल , ज्वार – बाजरा , मक्का , मूंगफली , तंबाकू एवं फलों का उत्पादन किया जाता है ।
लैटेराइट मिट्टी का विकास उच्च तापमान एवं अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलता है जहाँ यह तीव्र निक्षालन का परिणाम है । ऐल्युमीनियम और लोहे के ऑक्साइड के कारण इस मिट्टी का रंग लाल होता है । कर्नाटक , केरल , तमिलनाडु , मध्य प्रदेश , उड़ीसा और असम में यह मिट्टी प्रमुखता से पाई जाती है । इस मिट्टी पर चाय एवं कहवा की तथा काजू की खेती की जा रही है ।
मरुस्थलीय मिट्टी 50 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों की विशेषता है । फलत : इस प्रकार को मिट्टी प ० राजस्थान , सौराष्ट्र , कच्छ , प . हरियाणा और द . पंजाब में मिलती है । सिंचाई की व्यवस्था द्वारा इसमें कपास , चावल , गेहूँ इत्यादि की खेती संभव है ।
पर्वतीय मिट्टी पर्वतीय एवं पहाड़ी क्षेत्रों की मिट्टी है । हिमाच्छादित क्षेत्रों में इन मृदाओं का अपरदन हो जाता है और अम्लीय एवं ह्यूमस रहित हो जाते हैं । इसी मिट्टी पर फलों की खेती तथा चावल एवं आलू का उत्पादन किया जाता है ।
यद्यपि मृदा निर्माण में लाखों वर्ष लग जाते हैं परंतु इसके क्षरण में एक मिनट लगता है । मृदा की उपजाऊ परत का अपने मूल स्थान से विविध क्रियाओं द्वारा स्थानांतरित होना मृदा अपरदन या भू – क्षरण कहलाता है । तीव्र वर्षा के कारण अवनालिका माध्यम से भी मिट्टी का क्षरण होता है । भारत में लगभग 13 करोड़ हे भूमि निम्नीकृत है । भू – क्षरण के लिए वनोन्मूलन , अति पशुचारण , खनन , रसायनों का उपयोग एवं मानवीय क्रियाएँ महत्वपूर्ण हैं । झारखंड , मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ राज्यों में खनन कार्य से भूमि निम्नीकरण हुआ उड़ीसा में वनोन्मूलन के कारणं , गुजरात , राजस्थान , महाराष्ट्र में अति पशुचारण , जबकि पंजाब , हरियाणा और प ० उत्तर प्रदेश में जलाक्रांतता के कारण भूमि निम्नीकरण हुई है । भूमि निम्नीकरण तथा मृदा अपरदन को रोकने के लिए फसल चक्र पद्धति , समोच्च जुताई , पट्टिका कृषि , सीढ़ीनुमा खेती , अंतर कृषि एवं वृक्षारोपण करना महत्वपूर्ण है ।

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर :
1. पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण क्या है ?
( क ) वनोन्मूलन ( ख ) गहन खेती ( ग ) अति पशुचारण ( घ ) अधिक सिंचाई
उत्तर– ( घ )
2. सोपानी कृषि किस राज्य में प्रचलित है ?
( क ) हरियाणा ( ख ) बिहार का मैदानी क्षेत्र ( ग ) उत्तराखंड ( घ ) पंजाब
उत्तर– ( ग )
3. मरुस्थलीय मृदा का विस्तार किस राज्य में है ? ( क ) राजस्थान ( ख ) उत्तर प्रदेश ( ग ) कर्नाटक ( घ ) महाराष्ट्र
उत्तर– ( क )
4. मेढक के प्रजनन को कौन – सा रसायन नष्ट करता है ?
( क ) बेंजीन ( ख ) एंड्रिन  ( ग ) यूरिया ( घ ) फास्फोरस
उत्तर– ( ख )
5. काली मृदा का दूसरा नाम क्या है ?
( क ) बलुई मिट्टी ( ख ) रेगुर ( ग ) अखरोटी मिट्टी ( घ ) पर्वतीय मिट्टी
उत्तर– ( ख )

II. लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
1. जलोढ़ मिट्टी के विस्तार वाले राज्यों के नाम लिखें । इस मृदा में कौन – कौन सी फसलें लगाई जा सकती हैं ?
उत्तर — भारत में जलोढ़ मिट्टी का विस्तार उत्तर प्रदेश , बिहार , पंजाब , हरियाणा , उड़ीसा , आंध्र प्रदेश , असम , गुजरात एवं राजस्थान के कुछ हिस्सों में पाया जाता है । इस मृदा में चावल , गेहूं , गना , दलहन , मक्का जैसी फसलें लगाई जा सकती हैं ।

2. समोच्च कृषि से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर – पहाड़ी ढालों पर समोच्च रेखाओं के समानान्तर तैयार की गई भूमि पर की जानेवाली कृषि को समोच्च कृषि कहा जाता है ।
3 . पवन अपरदन वाले क्षेत्र में कृषि की कौन – सी पद्धति उपयोगी मानी जाती है ?
उत्तर – पवन अपरदन वाले क्षेत्र में पट्टिका कृषि पद्धति उपयोगी है ।
4 . भारत के किन भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ है ? यहाँ के मृदा की क्या विशेषता है ?
उत्तर भारत के पूर्वी तटीय भाग में नदी डेल्टा का विकास हुआ है । यहाँ मृदा के कण का आकार काफी महीन होता है ।
5. फसल चक्रपा मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है ?
उत्तरः – फसल चक्रण द्वारा मिट्टी के पोषणीय स्तर को बढ़ाया या स्थिर रखा जाना संभव होता है , जिससे मृदा का संरक्षण हो जाता है । उदाहरण के लिए , गेहूँ , कपास , मक्का इत्यादि फसलों को लगातार उगाने से मृदा का पोषणीय स्तर गिरता जाता है । इसे तिलहन या दलहन पौधों की खेती कर पुनः प्राप्त किया जाता है । इस प्रक्रिया से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण भी होता है ।

II.दीर्घ उत्तरीय प्रश्न :
1. जलाक्रांतता कैसे उत्पन्न होती है ? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है ?
उत्तर – भारत में मृदा अपरदन के लिए कई कारक जिम्मेवार हैं । जिसमें जल भी शामिल है । वास्तव में , हरित क्रांति का आधार अधिक उपज को प्राप्त करना रहा है । इस उद्देश्य से देश के उत्तरी भाग और विशेषकर पंजाब – हरियाणा जैसे राज्यों में गेहूँ अधिक पैदावार प्राप्त करने की कोशिश की गई । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी इस दृष्टि से कृषि के नए प्रयास किए , गए । इसके लिए खेतों में अधिक उपज देनेवाले उन्नत किस्म के बीजों और रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के साथ ही साथ सिंचाई सुविधाओं में भी विस्तार किया गया । कालांतर में इन क्षेत्रों में अधिक सिंचाई से ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई जिससे यहाँ की कृषि भूमि का निम्नीकरण होता गया है । पंजाब , हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में अति सिंचाई से उत्पन्न भूमि की स्थिति की ही ‘ जलाक्रांतता ‘ की संज्ञा दी गई है जिससे मृदा का अपरदन हुआ है । जलाक्रांतता के कारण मिट्टी के लवणीय एवं क्षारीय गुणों में वृद्धि होती गई है जो भूमि के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है । इन क्षेत्रों की कृषि भूमि में सोडियम , कैल्सियम और मैग्नीशियम के यौगिकों के कारण मिट्टी लवणीय या क्षारीय हो गई है जिससे इनकी उर्वरा शक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है । फलत : ये उपजाऊ कृषि भूमि रेह , बंजर या ऊसर भूमि में बदलते जा रहे हैं ।
2. मृदा – संरक्षण पर एक निबंध लिखिए ।
उत्तर -भारतीय मिट्टी से संबंधित समस्याओं में मिट्टी कटाव एवं निम्नीकरण को समस्या सर्वप्रमुख है । जिसके कारण मिट्टी की उर्वरता दुष्प्रभावित हो रही है । मृदा एक अमूल्य संसाधन है , जिससे मानवीय जीवन प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है । परंतु मृदा से संबंधित समस्या की गंभीरता को देखते हुए यह आवश्यक है कि मृदा संरक्षण पर बल दिया जाए । मिट्टी कटाव तथा भूमि के  ास से मिट्टी की उर्वरता में आनेवाली कमी को रोकने की क्रिया मृदा संरक्षण कहलाती है । संपूर्ण भारत आज मिट्टी कटाव एवं उर्वरता हास की समस्या से ग्रसित है । पर्वतीय भागों में तेज वर्षा से बहता पानी मिट्टी कटाव करता है । मध्यवर्ती एवं इसके आसपास के राज्यों में अपनालिका अपरदन सामान्य घटना है । ऐसी स्थिति में मृदा संरक्षण के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं । इनमें कुछ प्रमुख हैं-( i ) नदियों पर बाँध बनाना । ( ii ) रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद का प्रयोग करना । ( iii ) पर्वतीय भागों में सीढ़ीनुमा कृषि , समोच्च कृषि करना । ( iv ) फसल – चक्र पद्धति अपनाने पर बल देना । ( v ) परती छोड़ने की स्थिति में मिट्टी में आवरण फसलें लगाना । ( vi ) कृषि वानिकी एवं सामाजिक वानिक पर जोर देना । ( vii ) खेतों से जल निकास की उचित व्यवस्था करना । ( viii ) झूम कृषि पर प्रतिबंध लगाना । ( ix ) भूमि उपयोग से संबंधित नियोजित एवं वैज्ञानिक पद्धति अपनाना ।
देश में मृदा संरक्षण के लिए भारत सरकार ने केन्द्रीय संरक्षण बोर्ड का गठन 1953 ई . में किया जो पूरे देश में मृदा संरक्षण की योजनाएँ बनाता है तथा सुझाव भी देता है । इन्हीं सुझावों के कारण झाबुआ जिले का सुखोमाजरी गाँव खुशहाल बन चुका है ।

3 . भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है । स्पष्ट करें ।

उत्तर — प्राचीन काल से भारत चावल की कृषि का देश है । यहाँ मॉनसूनी जलवायु की विशेषताएँ पाई जाती हैं । देश के अधिकांश लोगों का जीवन – यापन खेती से ही चलता है जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था एवं समाज में कृषि का योगदान स्पष्ट है । एक विकासशील राष्ट्र होने के कारण देश के भूमि उपयोग में क्रांतिकारी परिवर्तन आ रहा है । 1960-61 से लेकर 2000-01 की अवधि के दौरान देश की भूमि उपयोग प्रारूप में कई विविधताएँ आयी हैं । यही नहीं पशुओं के चरने के लिए चारागाह भूमि की उपलब्धता दिन – प्रतिदिन घटती जा रही है । साथ ही औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण बढ़ते प्रदूषण की मात्रा से संपूर्ण जीव जगत त्रस्त है । यही कारण है कि भारत में पशुधन की संख्या काफी अधिक है । विश्व के अग्रणी देशों में इस दृष्टि से भारत का स्थान आता है । परंतु स्थायी चारागाह की भूमि उपलब्धता में कमी आने के कारण इन्हें पर्याप्त चारा उपलब्ध नहीं हो पा रहा है । साथ ही कृत्रिम तरीके से अधिक दूध प्राप्त किए जाने के प्रयास में इन दुधारू पशुओं को रासायनिक इंजेक्शन दिया जाने लगा है , जिसका बुरा प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है । परिणामतः ये पशुधन जीर्ण – शीर्ण अवस्था में है । चूंकि अधिकांश भारतीय किसान एवं पशु मालिक अमीर नहीं हैं , इसलिए उनके रख – रखाव पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है , जिससे वे कमजोर हो जाते हैं ऐसी स्थिति में ये पशुधन अर्थव्यवस्था में योगदान देने की बजाय भारतीय अर्थ यानि मुद्रा या पूँजी का एक बड़ा हिस्सा खर्च करवा देते हैं । यही कारण है कि भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इनका योगदान नगण्य हो जाता है ।

                 ( ख ) जल – संसाधन

महत्वपूर्ण तथ्य —
पृथ्वी का 3/4 भाग जल से भरा है । परंतु इसका अधिकांश भाग लवणीय है । ऐसे लवणीय जल सागरों , महासागरों एवं कुछ झीलों में पाई जाती है जबकि मीठे जल को सतही अपवाह एवं भूमिगत जल के रूप में जाना जाता है । ये सभी स्रोत जल – चक्र क्रिया द्वारा सदैव नवीकरण एवं पुनर्भरण द्वारा अपने – अपने स्वरूप में मौजूद होते हैं । अर्थात् जल – चक्र एक गतिशील कारक है ।
पृथ्वी का अधिकांश भाग जल से भरा है । इसी कारण पृथ्वी को ‘ नीला ग्रह ‘ कहा जाता है । उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार विश्व के कुल जल का 96.5 % महासागरों में लवणीय जल के रूप में तथा 2.5 % स्थलीय भाग पर मीठे जल के रूप में है । जल जीवन की उत्पत्ति का एक महत्वपूर्ण कारक रहा है ।
यह जल 4 प्रमुख रूपों में पाया जाता है-
( i ) महासागरीय जल , ( ii ) वायुमंडलीय जल , ( iii ) सतही जल , ( iv ) भूमिगत जल । इस दृष्टि से महासागर सबसे बड़ा जल – संग्रहण केन्द्र हैं । सतही या भूपृष्ठीय जल का मूल स्रोत वर्षण यानि वर्षा है जिसका 20 % भाग वाष्पित होकर वायुमंडल में वापस चला जाता है जबकि कुछ भाग धरातलीय छिद्रों से रिसकर भूमिगत जल के रूप में जमा हो जाता है ।
विश्व स्तर पर जल और स्थल के वितरण के आधार पर दक्षिणी गोलार्द्ध को जल गोलार्द्ध एवं उत्तरी गोलार्द्ध को स्थल गोलार्द्ध कहा जाता है ।
भारत में जल संसाधन का वितरण काफी असमान है । यहाँ विश्व की निवास करनेवाली 16 % जनसंख्या को विश्व का 4 % जल पलव्य है । देश में प्रतिवर्ष जलवर्षण से 4000 घन किमी तथा भूपृष्ठीय जल से 1869 घन किमी . जल उपलब्ध होते हैं । देश की तीन बड़ी नदी प्रणालियों सिंधु , गंगा एवं ब्रह्मपुत्र में कुल भूपृष्ठीय जल का 2/3 भाग प्रवाहित होता है 1947 ई . में देश की जल भंडारण क्षमता मात्र 18 अरब घनमीटर से आज 174 अरब घनमीटर हो गया है । इनमें से मात्र 690 अरब घनमीटर जल का उपयोग हो पाता है जो कुल भारत के जल का 32 % है । गंगा नदी की द्रोणी में उपयोग योग्य जल भंडारण की क्षमता सर्वाधिक है । दूसरी और ब्रह्मपुत्र नदी का सर्वाधिक वार्षिक जलप्रवाह होते हुए भी उपयोग योग्य जल भंडारण की क्षमता काफी कम है । जबकि उपयोग योग्य जल भंडारण की क्षमता के अनुपात की दृष्टि से ताप्ती नदी का स्थान प्रथम है । इस नदी में जल भंडारण करने की क्षमता 97 % है ।
भारत के उत्तरी मैदानी भाग में पंजाब से ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी तक सर्वाधिक भूमिगत जल पाया जाता है जो देश का 42 % है । देश में उपलब्ध कुल भूमिगत जल 444 अरब घनमीटर का 19 % भाग सिर्फ उत्तर प्रदेश में है ।
1951 ई . में देश में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 5177 घनमीटर से घटकर 2001 ई . में 1829 घन मीटर है जो 2025 तक लगभग 1342 घनमीटर हो जाने की आशंका है । यह परिस्थिति वास्तव में जल संकट की और इंगित करता है । जल का मानवीय जीवन में काफी उपयोग हैं । एक अध्ययन के अनुसार जीवों में 65 % तथा पौधों में 65-99 % जल का अंश होता है । जल के कई उपयोग है । पेयजल , घरेलू कार्य , सिंचाई , उद्योग , स्वच्छता तथा कई अन्य कार्यों के लिए भी जल की आवश्यकता होती है । कई व्यावसायिक स्तर पर कार्य भी जल पर निर्भर करते हैं । यही नहीं , देश के आर्थिक विकास में भी जल का उल्लेखनीय योगदान है । इसी संदर्भ में नदी – घाटी परियोजनाओं के विकास पर बल दिया गया । जिनमें कई योजनाएँ बहुउद्देशीय हैं । पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ” पौधों को आधुनिक भारत का मंदिर कहा । ” इन परियोजनाओं से कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था , नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के समन्वित विकास को बल मिलेगा , देश में इसी परिप्रेक्ष्य में कई नदी घाटी परियोजनाओं का विकास किया गया जिसमें भाखड़ा – नांगल , हीराकुंड , दामोदर , गोदावरी , कृष्ण स्वर्णरेखा एवं सोना परियोजनाएँ प्रमुख हैं । लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इन परियोजनाओं का विरोध किया जा रहा है । ऐसी परियोजनाओं में नर्मदा बचाओ आंदोलन तथा टिहरी बाँध आंदोलन उल्लेखनीय हैं । नर्मदा बचाओ आंदोलन एक गैर सरकारी संगठन है , जो स्थानीय लोगों , पर्यावरणविदों तथा अन्य लोगों को सरदार सरोवर बाँध के विरोध के लिए प्रेरित कर एकजुट होने का प्रयास करता है । वास्तव में बाँध नियंत्रण के उद्देश्य से बनाई गई इन योजनाओं के अंतर्गत जलाशयों में तलछट जमा होने से बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । यही कारण है कि ऐसी परियोजनाओं का विरोध किया जा रहा है । कहीं – कहीं भूमि – निजीकरण की समस्या और भूकंप की आशंका भी बढ़ने लगी है ।
स्वीडेन के फॉल्कन मार्क के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के प्रतिदिन एक हजार घनमीटर जल की जरूरत होती है । इससे कम जल उपलब्धता जल संकट का द्योतक है । वर्तमान समय पर पूरे विश्व के साथ ही साथ भारत भी जल संकट से जूझ रहा है । तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या के कारण जल की माँग में भी वृद्धि आई है । जिसके कारण इसका अंधाधुंध दुरूप्योग एवं अतिशोषण हुआ है । साथ – ही – साथ जल – प्रदूषण की भी समस्या आज हमारे सामने है । बिहार एवं पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के कुछ भागों में अतिदोहन के कारण जल में आर्सेनिक की मात्रा , राजस्थान एवं महाराष्ट्र में फ्लोराइड का संकेन्द्रण बढ़ गया है । अतः आवश्यकता इस बात की है कि जल का संरक्षण एवं उचित प्रबंधन किया जाए ।
जल संरक्षण एवं प्रबंधन की दिशा में भारत सरकार ने 1987 में ‘ राष्ट्रीय जल नीति ‘ की घोषणा की जिसे संशोधित कर 2002 में पेश किया गया । इसके मुख्य लक्ष्य हैं –
( i ) जल की निरंतर उपलब्धता को बनाए रखना , ( ii ) जल को प्रदूषित होने से रोकना और
( iii ) प्रदूषित जल को स्वच्छ कर पुन : उपयोग करना । पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने ‘ जल मिशन ‘ के द्वारा भूमिगत जल के पुनपूर्ति पर बल दिया है । जल संभर प्रबंधन भी इस दिशा में कारगर सिद्ध हो सकता है । इसके अलावा ड्रिप सिंचाई , लिफ्ट सिंचाई , सूक्ष्म फुहारों जैसी तकनीकों का विकास करके भी इस दिशा में अधिकाधिक लाभ लिया जा सकता है l
जल संरक्षण की दिशा में वर्षा जल संग्रहण एवं उनका पुनःचक्रण काफी कारगर सिद्ध हुआ है । प्राचीन काल में भी कई उत्कृष्ट जल संग्रह ढाँचा का निर्माण किया जाता रहा है जिसमें टाँका , गुल अथवा कुल , खदीन , जोहड़ इत्यादि उल्लेखनीय हैं । राजस्थान में इंदिरा गाँधी नहर के द्वारा जल उपलब्धता से जलाक्रांतता की समस्या एवं भूमि निम्नीकरण की समस्या सामने आने लगी है ।
जल संरक्षण की दिशा में कर्नाटक राज्य के मैसूर जिले में स्थित गंडायूर गाँव के सभी 200 घरों में छत वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था की गई है । इसी तरह तमिलनाडु एकमात्र राज्य है जहाँ इसे कानूनी रूप दिया गया है ।
बहुउद्देशीय परियोजनाओं के अंतर्गत बिहार में गंडक , कोसी एवं सोन परियोजनाएँ महत्वपूर्ण हैं । सोन परियोजना का विकास 1874 ई . में किया गया । इसके अंतर्गत 130 किमी लंबी नहर निकाली गई है । कुल मिलाकर इस परियोजना से 3 लाख हे . भूमि की सिंचाई होती है । 1968 ई . में ‘ डेहरी से 10 किमी की दूरी पर इन्द्रपुरी बराण बनाया गया । सोन का यह सुखाग्रस्त क्षेत्र ‘ चावल का कटोरा ‘ बन चुका है ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर :
1. वृहत् क्षेत्र में जल की उपस्थिति के कारण पृथ्वी को क्या कहते हैं ?
( क ) उजला ग्रह ( ख ) नीला ग्रह ( ग ) हरा ग्रह ( घ ) लाल ग्रह
उत्तर– ( ख )
2. कुल जल का कितना प्रतिशत भाग महाागरों में निहित है ?
( क ) 9.5 % ( ख ) 95.5 % ( ग ) 96.6 % ( घ ) 96 %
उत्तर– ( ग )
3. देश के बाँधों को किसने ‘ भारत का मंदिर ‘ कहा था ?
( क ) महात्मा गाँधी ( ख ) डॉ . राजेन्द्र प्रसाद ( ग ) पंडित जवाहरलाल नेहरू ( घ ) स्वामी विवेकानंद उत्तर– ( ग )
4. प्राणियों के शरीर में कितना प्रतिशत जल की मात्रा होती है ?
( क ) 70 % ( ख ) 55 % ( 51 ) 60 % ( घ ) 65 % उत्तर– ( घ )
5. बिहार में अति जल – शोषण से किस तत्व का संकेन्द्रणा बढ़ने लगा है ?
( क ) आर्सेनिक ( ख ) फ्लोराइड ( ग ) क्लोराइड ( घ ) लोहा
उत्तर ( क )

II . लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :

1. बहुउद्देशीय परियोजना से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर – जब किसी परियोजना के विकास का उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण , सिंचाई , विद्युत उत्पादन , परिवहन , मनोरंजन के साथ ही साथ कई अन्य उद्देश्य होते हैं तब उन परियोजनाओं को बहुउद्देशीय परियोजना कहा जाता है ।
2. जल – संसाधन के क्या – क्या उपयोग हैं ?

उत्तर – जल – संसाधन एक नवीकरणीय संसाधन हैं , जिसके विविध उपयोग हैं -( i ) पेयजल हेतु आवश्यक । ( ii ) घरेलू कार्यों में जरूरी । ( iii ) सिंचाई में उपयोग । ( iv ) उद्योगों के लिए आवश्यक । ( ४ ) स्वच्छता हेतु । ( vi ) अग्निशमन हेतु एवं ( vii ) मल – मूत्र विसर्जन हेतु आवश्यक है ।
3. अंतरराज्यीय जल – विवाद के क्या कारण हैं ?

उत्तर – एक से अधिक राज्यों से होकर बहनेवाली बड़ी नदियों पर जब स्रोत के निकट ऊपरी भाग में बाँध बना दिया जाता है तब शेष राज्यों की नदी घाटियों में जल का अभाव हो जाता है जिससे जल संकट उत्पन्न होता है । यही अंतरराज्यीय जल विवाद का मूल कारण है ।

4. जल – संकट क्या है ?
उत्तर – स्वीडिश वैज्ञानिक फाल्कन मार्क के अनुसार एक व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग 1000 घन मीटर जल की आवश्यकता होती है । जब उसे इस मात्रा से कम जल मिलने लगता है तब इसे जल – संकट कहा जाता हैंl

5. भारत की नदियों के प्रदूषण के कारणों का वर्णन करें ।
उत्तर – भारत की नदियों के प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं ( ) निकटवर्ती शहरों से नगरीय कूड़ा – करकट को नदी में गिराया जाना । ( ii ) नगरीय मल – जल को बिना स्वच्छ किए नदी में गिराना । ( iii ) नदियों के किनारे बसे औद्योगिक कारखानों से निकलने वाले अपशिष्टों एवं रसायनों को नदी में बहाना । ( iv ) मृत जीवों को नदियों में फेंक देना । ( v ) कृधि में प्रयुक्त कीटनाशकों , रसायनों एवं उर्वरकों का जल के साथ बहकर नदी में मिल जाना ।
.II.दीर्घ उत्तरीय प्रश्न :
1. जल – संरक्षण क्या है ? इसके लिए क्या – क्या उपाय किए जा सकते हैं ?
उत्तर – वर्तमान समय में जल संकट दिन – प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है । उपलब्ध जल न केवल सीमित है बल्कि इसका अधिकांश हिस्सा प्रदूषित भी है जो कई बीमारियों का कारण भी बनता जा रहा है । अत : जल की उपलव्यता को बनाए रखना , उसे प्रदूषित होने से बचाना तथा प्रदूषित जल को स्वच्छ कर पुन : उपयोग लायक बनाना एवं वर्षा जल को संग्रहित करना ही ‘ जल संरक्षण ‘ है । जल संरक्षण का उद्देश्य स्वस्थ जीवन , खाद्यान्न सुरक्षा और उत्पादक क्रियाओं को सुनिश्चित करना है भारत सरकार ने जल संकट निवारण हेतु 1987 ई . में ‘ राष्ट्रीय जल नीति तैयार की जिससे 2002 में संशोधित कर ‘ राष्ट्रीय जल नीति 2002 ‘ नाम दिया गया ।
जल संरक्षण के लिए तीन मुख्य उपाय किए जा सकते हैं –
( i ) भूमिगत जल स्तर को बनाए रखना भूमिगत जल ही नलकूपों , कुओं , गाँवों , शहरों और खेतों में जल का स्रोत है । इसके स्तर को बनाए रखने तथा बढ़ाने के लिए वृक्षारोपण , वेटलैंड संरक्षण , वर्षा जल संचयन एवं खुली जगह या गैर – कंक्रीट जगह को छोड़ना आवश्यक है । संभर प्रबंधन किसी एक सहायक नदी की द्रोणी को जल संभर कहा जाता है । इसके प्रबंधन हेतु नदी द्रोणी क्षेत्र में उद्यान कृषि , जल कृषि , वृक्षारोपण कार्य किया जाना चाहिए ।
( ii ) तकनीकी उपाय – तकनीकी उपाय के अंतर्गत वैज्ञानिक आधुनिक उपायों को अमल में लाने की जरूरत है । ऐसे उपायों में ड्रिप सिंचाई , लिफ्ट सिंचाई , सूक्ष्म फुहार व्यवस्था , सीढ़ीनुमा खेती , प्रदूषित जल को पुन : उपयोग लायक बनाना एवं शहरी मल जल को वैज्ञानिक तरीकों द्वारा पुनः उपयोग लायक बनाना शामिल है ।

2. वर्षा जल का मानव जीवन में क्या भूमिका है ? इसके संग्रहण एवं पुन : चक्रण की विधियों का उल्लेख करें ।
उत्तर — पृथ्वी पर उपलब्ध सागरीय जल लवणीय हैं जिसका सामान्य या दैनिक जीवन में उपयोग नहीं है तथा आंतरिक भागों में उपलब्ध जल का वितरण काफी असमान है । ऐसी स्थिति में वर्षा जल मानव जीवन के लिए काफी उपयोगी है । जो भूमिगत जलस्तर को बनाए रखने एवं नदी , तालाबों के जल स्तर को बनाए रखने एवं वर्षा आधारित कृषि के लिए अति आवश्यक है । वर्तमान एवं भविष्य में जल संकट की स्थिति से निबटने तथा वर्षा जल के बेकार वह जाने को कम करना तथा भूमिगत जल – स्तर को ऊँचा उठाना ही वर्षा जल संग्रहण का मुख्य उद्देश्य है । इसके संग्रहण एवं पुनः चक्रण की कई विधियाँ प्रचलित हैं जिसे प्राचीन एवं आधुनिक विधियों में वर्गीकृत किया जाता है । प्राचीन विधियों के अंतर्गत खदीन , जोहड़ , गुल , कुल जैसी विधियाँ शामिल हैं जबकि आधुनिक समय में छत वर्षा जल संग्रहण की तकनीक काफी प्रचलित है । इसके अंतर्गत छत पर संग्रहीत वर्षा जल को एक पाइप के सहारे नीचे बने टैंक या संग्रह स्थान तक पहुंचा दिया जाता है । फिर उस पानी का उपयोग किया जाता है । बड़े – बड़े शहरों में उपयोग किए जा चुके पानी को एक बड़े ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुँचाया जाता है । यहाँ यह गंदा पानी वैज्ञानिक विधि से साफ किया जाता है और पुनः उपयोग के लायक बना दिया जाता है इससे पानी का पुनःचक्रण हो जाता है ।

                ( ग ) वन एवं वन्य प्राणी संसाधन

महत्वपूर्ण तथ्य –
वन एवं वन्य प्राणी मानव जीवन के आवश्यक अंग हैं । वन पृथ्वी के संसाधन के साथ ही साथ पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण का भी एक महत्त्वपूर्ण घटक है । वास्तव में , सभी जीवों के लिए खाद्य ऊर्जा का प्रारंभिक स्रोत वनस्पति ही है ।
वन विस्तार की दृष्टि से भारत का विश्व में दसवाँ स्थान है । यहाँ लगभग 68 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर वन का विस्तार है । एफ . ए . ओ . की वानिकी रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 1948 में 4 अरब हेक्टेयर वन क्षेत्र था जो 1990 में 3.4 अरब हेक्टेयर हो गया । 2005 में विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 30 % भाग पर वन का विस्तार था । भारत में 2001 में भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार 19.27 % क्षेत्र पर वन का फैलाव था जबकि 2005 में 20.60 % क्षेत्र पर वन का फैलाव पाया गया ।
देश में वन का फैलाव काफी असमान है । वृक्षों के धनत्व के अनुसार भारतीय वनों को पाँच वर्गों में रखा जाता है-
1. अत्यंत सघन वन – जहाँ कुल भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षों का घनत्व 70 % से अधिक होता है ।
2. सघन वन — यहाँ वृक्षों का घनत्व 40-70 % तक होता है ।
3. खुले वन — यहाँ वृक्षों का घनत्व 10-40 % तक होता है ।
4. झाड़ियाँ एवं अन्य वन — यहाँ कुल भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षों का घनत्व 10 % से कम होता है ।
5. मैंग्रोव वन — यह तटीय भाग में पाया जानेवाला वन है ।
अत्यंत सघन वन देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 1.66 % भाग पर फैला है , जिसमें असम एवं सिक्किम क्षेत्र को छोड़कर सभी पूर्वोत्तर राज्य शामिल हैं । सघन वन देश के 3 % क्षेत्र पर फैला है जिसमें हिमाचल प्रदेश , सिक्किम , मध्य प्रदेश , जम्मू – कश्मीर , महाराष्ट्र एवं उत्तराखंड शामिल हैं । खुले वन 7.12 % भाग पर पाया जाता है । ऐसे वन कर्नाटक , केरल , तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश , उड़ीसा एवं असम में पाए जाते हैं । पंजाब , हरियाणा , उत्तर प्रदेश , बिहार एवं पश्चिम बंगाल के मैदानी भागों में झाड़ियों एवं अन्य वन का विस्तार पाया जाता है । राजस्थान में भी इसी प्रकार के वन मिलते हैं जो देश के 8.68 % भाग पर फैले हैं । मैंग्रोव वन देश के पूर्वी तटीय भागों में पाया जाता है । विश्व के कुल मैंग्रोव का 5 % भाग देश के 0.14 % क्षेत्र पर पाया जाता है । पश्चिम बंगाल , गुजरात , अंडमान – निकोबार में ऐसे वन क्रमशः 48 % , 21 % एवं 14 % क्षेत्र पर फैले हैं ।
देश के कुल वन विस्तार का 25.11 % भाग पूर्वोत्तर राज्यों में पाया जाता है । देश के 188 आदिवासी जिलों में कुल वन क्षेत्र का 60.11 % पाया जाता है । उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार देश में सबसे अधिक वन 11 % मध्य प्रदेश में हैं । इसके बाद अरुणाचल प्रदेश में 10 % वन पाया जाता है । बिहार विभाजन के बाद मात्र 71 % क्षेत्र पर वन का फैलाव है । प्रशासकीय प्रबंधन की दृष्टि से देश के वनों को तीन वर्गों में रखा जाता है –
( 1 ) आरक्षित वन — इन वनों से लकड़ियाँ काटना एवं यहाँ पशु चराना वर्जित होता है । वन एवं जीवों के संरक्षण के लिए ये वन काफी महत्वपूर्ण हैं । देश का 54 % वन आरक्षित वन है ।
( 2 ) रक्षित वन — यहाँ लाइसेंस प्राप्त व्यक्ति ही पशु चरा सकता है या लकड़ी काट सकता है । देश के कुल वन क्षेत्र का 29 % वन रक्षित वन है ।
( 3 ) अवर्गीकृत वन — यहाँ किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होता है । कुल वन क्षेत्र का 17 % अवर्गीकृत वन है ।
आरक्षित एवं रक्षित वन का सबसे अधिक विस्तार मध्य प्रदेश है । भारत में वनों के हास का एक बड़ा कारण कृषि भूमि का फैलाव है । 1951-1980 के बीच लगभग 26200 वर्ग किमी . वन क्षेत्र कृषि क्षेत्र में परिवर्तित हो चुका है । साथ ही बड़ी – बड़ी विकास परियोजनाओं के कारण भी वनों का ह्रास हुआ है । रेलमार्ग , सड़क मार्ग , औद्योगिक विकास तथा नगरीकरण से भी वनों को नुकसान पहुंचा है ।
सागवान के एकल रोपण से दक्षिण भारत में अन्य प्राकृतिक वन बर्बाद हो चुके हैं । इसी तरह हिमालय में चीड़ , पाईन के रोपन से हिमालयन ओक और रोडोडेंड्रोन वनों का नुकसान हुआ है । हिमालयन यव की छाल , पत्तियों , टहनियों और जड़ों से निकलनेवाले टैक्सोल रसायन से कैंसर रोगों का उपचार किया जा रहा है भारत में लगभग 81000 वन प्राणी एवं 47000 वनस्पतियों की उपजातियाँ पायी जाती हैं । कई वन्य प्राणी भी इसी तरह लुप्त हो चुके हैं । भारत में चीता एवं गिद्ध इसके उदाहरण हैं ।
देश में 74.4 प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं और 22531 प्रजातियां विलुप्ती के कगार पर हैं । इनमें सबसे अधिक विलुप्त हो चुकी प्रजातियों में पेड़ – पौधों ( 384 ) एवं पक्षियों ( 133 ) की है ।
वर्तमान समय में वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । भारत में संकटग्रस्त पादप प्रजातियों की सूची बनाने का काम 1970 ई . में बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया तथा वन अनुसंधान संस्थान द्वारा एक सूची तैयार की गई जिसे रेड डाटा बुक ‘ कहा गया है । इसी क्रम में असाधारण पौधों ( रेयर प्लांट ) के लिए ‘ ग्रौन बुक ‘ तैयार किया गया है । विश्व स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण एवं संवर्द्धन को दिशा में कार्य कर रही एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्था है । इसे अब ‘ विश्व संरक्षण संघ ‘ कहा जाता है । इस संस्था ने विभिन्न प्रकार के पौधों और प्राणियों के जातियों को चिह्नित कर 6 श्रेणियों में बाँया है- ( 1 ) सामान्य श्रेणी , ( 2 ) संकटग्रस्त श्रेणी , ( 3 ) सुभेद्य जातियाँ , ( 4 ) दुर्लभ जातियों , ( 5 ) स्थानिक जातियाँ , ( 6 ) तुप्त जातियाँ । संकटग्रस्त वन एवं वन्य जीवों , पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए वर्ल्ड वाइड फंड फार नेचर ( WWF ) विशेष रूप से कार्यरत है ।
भारत में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । वन्य जीवों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित करने का सफल प्रयास ‘ इन सीटू ‘ ( In- Situ ) कहलाता है |जबकि संकट से बचाने के लिए कृत्रिम आवासीय संरक्षण का विकास एक्स सौटू ‘ ( Ex -Situ ) कहलाता है ।
वन्य प्राणियों के संरक्षण की दिशा में देश में राष्ट्रीय उद्यान , बिहार या अभ्यारण्य एवं जैव मंडल विकसित किए गए हैं । देश में राष्ट्रीय उद्यानों की कुल संख्या 85 , अभ्यारण्यों की संख्या 448 एवं 14 जैव मंडल क्षेत्र हैं ।
प्रकृतिजनित तथा करोड़ों वर्षों के विकास की क्रिया में स्थापित अनुवांशिक गुणों में हेराफेरी को ‘ जैव अपहरण ‘ कहा जाता है । इस जैव अपहरण के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के जीवों और वनस्पतियों के अनुवांशिक गुणों का पता लगाकर दूसरे पौधे एवं जीवों में प्रत्यारोपण कर अन्य प्रकार के जीव एवं पौधों को विकसित किया जाने लगा है ।

प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर 1968 में अफ्रीकी कनवेंशन , रामसर कनवेंशन 1971 तथा विश्व प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण एवं रक्षा अधिनियम 1972 मुख्य हैं । भारतीय संविधान की धारा 21 के अनुच्छेद 47,48 एवं 51 ए ( जी ) के तहत भी वन्य जीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण संबंधी नियम निहित है । 1952 ई . में भारतीय वन्य जीव बोर्ड के गठन के बाद वन्य जीवों के संरक्षण की दिशा में सरकार गंभीर हुई । वन्य जीव सुरक्षा ऐक्ट 1972 और 1973 एवं 1091 के अंतर्गत पक्षियों तथा जानवरों के शिकार पर प्रतिबंध लगाया गया है । जैव विविधता अधिनियम 2002 में जैव विविधता के संरक्षण के लिए सभी स्तर पर समितियाँ गठित करने का प्रावधान है । राष्ट्रीय स्तर पर बाघ को राष्ट्रीय जानवर एवं मयूर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया है ।
भारत में पाई जानेवाली वनस्पतियों को 8 वनस्पति क्षेत्रों में बाँटा गया है –
( 1 ) पश्चिमी हिमालय वनस्पति क्षेत्र , ( 2 ) पूर्वी हिमालय वनस्पति क्षेत्र , ( 3 ) असम वनस्पति क्षेत्र , ( 4 ) सिंधु मैदान वनस्पति क्षेत्र , ( 5 ) गंगा का मैदानी वनस्पति क्षेत्र ( 6 ) दक्षिण का पठारी वनस्पति क्षेत्र , 7 ) मालाबार वनस्पति क्षेत्र एवं ( 8 ) अंडमान – वनस्पति क्षेत्र ।
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण विभाग के अनुसार देश में 47000 पेड़ – पौधों की प्रजातियाँ मिलती है जिसमें 35 % प्रजातियाँ देशी हैं । दूसरी और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के अनुसार देश में 89451 जीव – जंतुओं की प्रजातियाँ पाई जाती हैं । भारत जैव विविधता के संदर्भ में विश्व के 12 प्रथम समृद्धशाली देशों में शुमार किय जाता है । यहाँ विश्व की कुल जैव उपजातियों का 8 % भाग ( लगभग 16 लाख ) पाई जाती है । देश में पश्चिमी घाट और उत्तर – पूर्वी क्षेत्र सबसे समृद्ध जैव – विविधता वाला क्षेत्र है जिन्हें विश्व के 25 हॉट स्पॉट में रखा गया है । देश में यूनेस्को के सहयोग से 14 जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र की स्थापना की गई है जिनमें शामिल हैं— ( 1 ) नीलगिरि ( 2 ) नंदा देवी ( 3 ) नोकरेक ( 4 ) मानस ( 5 ) सुंदरवन ( 6 ) मन्नार की खाड़ी ( 7 ) ग्रेट निकोबार ( 8 ) सिमलीपाल ( 9 ) डिब्रू साईकोबा ( 10 ) दिहंग – दिबंग ( 11 ) कंचनजंगा ( 12 ) पंचमढ़ी ( 13 ) अगस्थ्यमलाई और ( 14 ) अचनकमार |

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर :
1.   2001 ई ० में भारत के कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर बन का विस्तार था ?
( क ) 25 ( ख ) 19.27 ( ग ) 20 ( घ ) 20.27 उत्तर– ( ख )
2. वन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार भारत में वन का विस्तार कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर है ?
( क ) 20.60 % ( ख ) 20.55 % ( ग ) 20 % ( घ ) 60.20 %
उत्तर— ( क )
3. बिहार में कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर वन का विस्तार है ?
( क ) 15 % ( ख ) 28 % ( T ) 20 % ( घ ) 45 % उत्तर- ( ग )
4. पूर्वोत्तर राज्यों के 188 आदिवासी जिलों में देश के कुल क्षेत्र का कितना प्रतिशत वन है ?
( क ) 75 % ( ख ) 80.05 % ( ग ) 90.03 % ( घ ) 60.11 %
उत्तर– ( घ )
5. निम्नांकित किस राज्य में सबसे अधिक वन का विस्तार मिलता है ?
( क ) केरल ( ख ) कर्नाटक ( ग ) मध्य प्रदेश ( घ ) उत्तर प्रदेश
उत्तर ( ग )
6. वन संरक्षण एवं प्रबंधन की दृष्टि से वनों को कितने वर्गों में बाँटा गया है ?
( क ) 2 ( ख ) 3 (ग)4 ( घ ) 5
उत्तर– ( ख )
7. 1951-1980 की अवधि के दौरान लगभग कितना वर्ग किमी वन क्षेत्र कृषि भूमि में परिवर्तित हुआ ?
( क ) 3000 ( ख ) 25200 ( T ) 35500 ( घ ) 26200
उत्तर– ( घ )
8. भारतीय संविधान की धारा 21 का संबंध किससे है ?
( क ) मृदा संरक्षण ( ख ) वन्य जीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण ( ग ) जल संसाधन संरक्षण ( घ ) खनिज संपदा संरक्षण
उत्तर– ( ख )
9. एफ . ए . ओ . की वानिकी रिपोर्ट के अनुसार 1948 में विश्व के कितने हेक्टेयर भूमि पर वन का विस्तार था ?
( क ) 6 अरब हे ( ख ) 5 अरब है . ( ग ) 4 अरब है . ( घ ) 8 अरब हे .
उत्तर– ( ग )
10. प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित 1968 में कौन – सा कनवेंशन हुआ था ?
( क ) अफ्रीकी कनवेंशन ( ख ) वेटलैंडस कनवेंशन ( ग ) ब्राजील कनर्वेशन ( घ ) विश्व आपदा कनवेंशन उत्तर— ( क )
11. इनमें कौन जीव केवल भारत में पाया जाता है ? ( क ) घड़ियाल ( ख ) कछुआ ( ग ) हल ( घ ) डालफिन
उत्तर– ( क )
12. भारत का राष्ट्रीय पक्षी है ?
( क ) कबूतर ( ख ) हंस ( ग ) मयूर ( घ ) तोता उत्तर– ( ग )
13. मैंग्रूव्स का सबसे अधिक विस्तार कहाँ मिलता है ?
( क ) अंडमान – निकोबार ( ख ) सुंदरवन ( ग ) पूर्वोत्तर राज्य ( घ ) मालाबार तट
उत्तर- ( ख )
14. टेक्सोल का उपयोग किस बीमारी में होता है ? ( क ) मलेरिया ( ख ) एड्स ( ग ) टी.बी. ( घ ) कैंसर उत्तर– ( घ )
15. चरक का संबंध किस देश से था ?
( क ) म्यांमार ( ख ) श्रीलंका ( ग ) भारत ( घ ) नेपाल
उत्तर– ( ग )

II . लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
1 . वन विनाश के मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर – वन विनाश के मुख्य कारक हैं -( i ) कृषि भूमि का विस्तार । ( ii ) बड़ी विकास योजनाओं की शुरुआत । ( iii ) पशुचारण एवं ईंधन के लिए लकड़ी का उपयोग । ( iv ) रेलमार्ग , सड़कमार्ग निर्माण । ( v ) औद्योगिक विकास एवं नगरीकरण ।

2. बिहार के वर्तमान वन संपदा की स्थिति का वर्णन कीजिए ।
उत्तर – बिहार विभाजन के बाद बिहार की वन संपदा में काफी कमी आ गई । वर्तमान समय में कुल भौगोलिक क्षेत्र के मात्र 7.1 % भाग पर वन का फैलाव है । बिहार के 38 जिलों में से 17 जिलों से वन क्षेत्र बिल्कुल समाप्त हो चुका है । राज्य के औरंगाबाद , कैमूर , रोहतास , गया , नालंदा , नवादा , जमुई , बांका , मुंगेर और पश्चिम चंपारण में वन पाए जाते हैं । यहाँ कुल मिलाकर 3700 वर्ग किमी क्षेत्र पर वन का विस्तार मिलता है ।
3. वन के पर्यावरणीय महत्व को लिखें ।
उत्तर – वन एक अमूल्य संसाधन है । सृष्टि के आरंभ से लेकर अंत तक मानव जीवन इसके द्वारा पोषित है । वन की उपस्थिति जीवमंडल में सभी जीवों को संतुलित स्थिति में जीने के लिए संतुलित परिस्थितिकी प्रदान करता है तथा सभी जीवों के लिए खाद्य ऊर्जा का प्रारंभिक स्रोत भी ये वन ही हैं ।
4. वन्य जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारणों को लिखेंl
उत्तर – वन्य जीवों के हास के चार प्रमुख कारण हैं ( 1 ) वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण । ( ii ) प्रदूषण संबंधी समस्याएँ । ( iii ) आर्थिक लाभ हेतु शिकार । ( iv ) अवैध शिकार ।
5. वन्य जीवों के संरक्षण में सहयोगी या सामुदायिक रीति – रिवाज कैसे सहायक हैं ? उल्लेख करें ।
उत्तर -वन्य जीवों के संरक्षण में सामुदायिक रीति – रिवाज काफी सहायक हैं । गैर जनजातीय समाज में कई अवसरों पर पीपल , नीम , आम , बरगद एवं तुलसी की पूजा की जाती है । परिणामतः इनका स्वतः संरक्षण हो जाता है । इसी तरह कई पशुओं को भी पूजनीय माना गया है । जबकि जनजातीय समाजों में भी प्रकृति एवं पशुओं को पवित्र माना जाता है । उनकी वे पूजा करते हैं तथा उनके जीवन की रक्षा भी करते हैं । काले हिरण , चिंकारा , नीलगाय , बंदर , गाय , चूहा , कबूतर इत्यादि जैसे जीवों की रक्षा सामुदायिक रीति – रिवाजों के द्वारा होती है । वनों के संरक्षण के कारण उन पर आश्रित वन्य जीवों का भी स्वतः संरक्षण हो जाता है ।
6. चिपको आंदोलन क्या है ?
उत्तर – तत्कालीन उत्तर प्रदेश और वर्तमान के उत्तराखंड राज्य में स्थित टेहरी – गढ़वाल जिले में चिपको आंदोलन 1972 में शुरू किया गया । सुंदर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में स्थानीय अनपढ़ जनजातियों द्वारा , ठेकेदारों द्वारा हरे – भरे वृक्षों को काटने के दौरान उसे बचाने के लिए ये लोग पेड़ों से चिपककर खड़ा हो जाते थे , ताकि पेड़ों को काटा नहीं जा सके । इसे पूरे भारत के साथ ही साथ विश्व स्तर पर स्वीकार किया गया ।
7. कैंसर रोग के उपचार में वन कैसे सहायक है ? लिखें ।
उत्तर – हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों में स्थित उच्च क्षेत्रों में हिमालयन यव नाम का एक पौधा पाया जाता है । चीड़ के प्रकार का यह पौधा औषधीय गुण वाला है । इस पेड़ की छाल , पत्तियों , टहनियों और जड़ों से ‘ टैक्सॉल ‘ नामक रसायन प्राप्त किया जाता है जो कैंसर रोग के उपचार में सफल है । इस प्रकार कैंसर रोग के उपचार में वन अपने उत्पाद के जरिए सहायक है ।
8. विलुप्त होने के खतरे वाले दस जीव – जंतुओं के नाम लिखें ।
उत्तर — विलुप्त होने के खतरे वाले दस जीव – जंतुओं के नाम इस प्रकार हैं ( i ) लाल पांडा ( ii ) सफेद सारस ( iii ) पर्वतीय बटेर ( iv ) सारंग ( iv ) नीलगाय ( vi ) मगरमच्छ ( vii ) गिद्ध ( viii ) भेड़िया ( ix ) मोर ( x ) चीता
9. प्रदूषण जनित समस्या से वन्य जीवों का ह्रास हुआ है । कैसे ?
उत्तर – प्रदूषण के बढ़ने के कारण कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हुई है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव वन्य जीवों पर नकारात्मक रूप से पड़ा है । पराबैंगनी किरणों की अधिकता , अम्ल वर्षा एवं ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण वन्य जीवों की संख्या में कमी आई है । इसके अलावा वायु , जल तथा मृदा प्रदूषण के कारण वन एवं वन्य जीवन चक्र दुष्प्रभावित होता जा रहा है । जीवन चक्र को पूर्ण किए बिना नया जन्म संभव नहीं है । यही कारण है कि निवास स्थान उपलब्ध होने के बाद भी वन्य जीवों का वास होता जा रहा है ।
10. भारत के दो प्रमुख जैवमंडल क्षेत्र का नाम प्रांतों सहित लिखें ।
उत्तर – भारत के दो प्रमुख जैवमंडल क्षेत्र हैं – ( i ) पंचमढ़ी क्षेत्रफल 492628 वर्ग किमी ० , प्रांत – मध्य प्रदेश । ( ii ) डिबू साइकोबा क्षेत्रफल , 765 वर्ग किमी ० , प्रांत – असम ।

II . दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :

1. वन एवं वन्य जीवों के महत्त्व का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए ।
उत्तर – वन एक नवीकरणीय संसाधन है , जिससे मानव का संबंध काफी पुराना है । मानवीय सभ्यता और संस्कृति का विकास वनों से ही हुआ है और आज भी हमारा संबंध इन वनों और वन्य जीवों से काफी गहरा है ।
वन पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच है । यह पृथ्वी का फेफड़ा कहलाता है । कहा जाता है कि जब तक वन एवं वन्य जीव साँस लेता रहेगा तबतक मानव भी साँस लेता रहेगा । संसाधन के साथ ही साथ यह पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण का एक महत्वपूर्ण घटक है । सभी जीवों के लिए खाद्य ऊर्जा का प्रारंभिक स्रोत यह वन ही है ।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित पर्यावरण के लिए किसी क्षेत्र के लगभग 33 % क्षेत्र पर वन का विस्तार होना आवश्यक है । वन का विकास कई भौगोलिक कारकों पर निर्भर करता है । फलतः इसके वितरण में काफी भिन्नताएँ पाई जाती हैं । वन वृक्षों की विविधता के कारण इससे पशुओं के लिए चारा , उलाने के लिए ईंधन , काष्ठ , लकड़ियाँ तथा कई उद्योगों के लिए कच्चे माल तथा लुग्दी , इमारती लकड़ियाँ प्लाईवुड , फाइबर बोर्ड , सेलुलोज , रबड़ , कार्क , तेल , विभिन्न प्रकार के फल एवं मसाले , औषधियाँ तथा टैनिन इत्यादि प्राप्त किए जाते हैं । हिमालयन यव से प्राप्त टैक्सोल रसायन कैंसर रोग के उपचार में प्रयुक्त होता है । इसी तरह कई अन्य जड़ी – बूटियाँ हमें वनों से मिलती हैं ।
जबकि वन्य जीवों में मांसाहारी , शाकाहारी , उभयचर एवं सरीसृप वर्ग के जीव पाए जाते हैं जो जैव – विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं । इनके कई प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष उपयोग हैं ।
2. वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों का विस्तार से वर्णन कीजिए ।
उत्तर – वनों का वितरण कई भौगोलिक कारकों पर निर्भर करता है जिसमें स्थानीय जलवायु एवं उच्चावच प्रमुख हैं । इसी के आधार पर विश्व के वनों का वर्गीकरण किया जाता है । परंतु इन वनों का वितरण काफी असमान है । भारत में भी यही स्थिति है जहाँ मध्य प्रदेश एवं पूर्वोत्तर राज्यों में सघन वन पाए जाते हैं वहीं राजस्थान , हरियाणा , बिहार , पंजाब जैसे राज्यों में बनों का घनत्व काफी कम है वृक्षों के इसी घनत्व भिन्नता के आधार पर भारतीय वनों को पाँच वर्गों में रखा गया है –
( i ) अत्यंत सघन वन – इस प्रकार के वनों में वृक्षों का घनत्व 70 % से अधिक है । भारत में इस प्रकार के वन का विस्तार ( 2 % ) 54.6 लाख हेक्टेयर भूमि पर है । असम और सिक्किम को छोड़कर पूरे पूर्वोत्तर राज्यों में ऐसे वन हैं ।
( ii ) सघन वन — इस प्रकार के वन के अंतर्गत लगभग 74 लाख हेक्टेयर भूमि है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 3 % है । यहाँ वनों का घनत्व 63 % है । ऐसे वन हिमाचल प्रदेश , सिक्किम , मध्य प्रदेश , जम्मू – कश्मीर , महाराष्ट्र एवं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में है । ( iii ) खुले वन – लगभग 3 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर इन वनों का विस्तार है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र के 7 % पर विस्तृत है इसके अंतर्गत कर्नाटक , तमिलनाडु , केरल , आंध्रप्रदेश , उड़ीसा और असम के 16 आदिवासी जिले शामिल हैं । यहाँ वृक्षों का घनत्व 10-40 % तक है ।
( iv ) झाड़ियाँ एवं अन्य — इसके अंतर्गत पंजाब , हरियाणा , बिहार , उत्तर प्रदेश , पश्चिम बंगाल एवं राजस्थान के इलाके शामिल हैं । ऐसे वन का विस्तार कुल भौगोलिक क्षेत्र के 9 % क्षेत्र पर है । यहाँ वृक्षों का घनत्व 10 % से भी कम है l
( v ) मैंग्रोव वन मुख्यतः देश के पूर्वी तटीय राज्यों में ऐसे वन मिलते हैं इसमें पश्चिम बंगाल , गुजरात , अंडमान – निकोबार द्वीप समूह , आंध्र प्रदेश , कर्नाटक , महाराष्ट्र , उड़ीसा , तमिलनाडु , पांडिचेरी , केरल एवं दमन – दीव शामिल हैं ।
3. जैव – विविधता से आप क्या समझते हैं ? इसके महत्व का वर्णन करें ।
उत्तर – संपूर्ण पृथ्वी अथवा उसके किसी एक हिस्से पर पाए जानेवाले जीवों की विविधता को जैव – विविधता कहा जाता है । इसमें सूक्ष्म जीवाणु से लेकर ब्लू देल जैसे बड़े जीव शामिल हैं । दूसरे शब्दों में ” पृथ्वी जैव विविधता का भंडार गृह है । ” स्थानीय स्तर पर किसी क्षेत्र अथवा जैविक उद्यान में स्वतः अथवा मानवीय प्रयास से इकट्ठा किए गए जीवों को जैव – विविधता का ही अंश माना जाता है । इस आधार पर भारत जैसे विशाल भौगोलिक क्षेत्र वाले देश एवं विभिन्नताओं से भरा यह देश जैव – विविधता के संदर्भ में भी अनूठा है । यही कारण है कि इसकी गिनती विश्व के 12 विशाल जैविक विविधता वाले देशों में की जती है । यहाँ विश्व की सभी जैव उपजातियाँ की 8 % संख्या पाई जाती है । किसी भी देश के स्वस्थ जैव मंडल एवं जैविक उद्योग के लिए जैव – विविधता का समृद्ध होना अनिवार्य है । जिसके कई प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ हैं । इन जैव विविधताओं से हमें भोजन , औषधियाँ , दवाईयाँ , रेशा , रबड़ और लकड़ियाँ मिलती हैं जिनका मानव जीवन में विविध उपयोग है । आज कई सूक्ष्म जीवों का उपयोग बहुमूल्य उत्पाद तैयार करने में होने लगा है । इनके अतिरिक्त जैव – विविधता की कई उपयोगिताएँ हैं -( i ) नवीन फसलों के साधन के रूप में । ( ii ) उन्नत किस्म के कृषि / फसल नस्ल तैयार करने में । ( iii ) नए जैव विकास के रूप में ।
जैव विविधता के कारण ही जैव तकनीक का विकास हुआ है जिससे नए गुण और उन्नत नस्ल वाले पेड़ – पौधे एवं जीव विकसित किए जा चुके हैं । पारदर्शी शरीर वाले मेढ़क का विकास इसकी नवीनतम कड़ी है ।
4. मानवीय क्रियाओं द्वारा वन एवं वन्य जीवों का ह्रास हुआ है । कैसे ? विस्तृत वर्णन करें ।
उत्तर – वन संपदा मानव जीवन के लिए अनिवार्य है । फिर भी मानव ने विकास के नाम पर तथा अधिक पाने की लालसा में वनों का दोहन करना आरंभ किया । मानव के अतिरिक्त अन्य सभी जीव – जंतु वन से अपनी आवश्यकता के अनुसार ही चीजें प्राप्त करता है , परंतु मानवीय गुण के कारण इसने वनों से अधिक पाने की लालसा में वनों का अधिक दोहन कर वन एवं वन जीवों का हास किया है ।
उपनिवेश काल में अंग्रेजों द्वारा रेलमार्गों एवं सड़कों के विकास के लिए वनों को काटा गया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकास के नाम पर वनों का विनाश आरंभ हुआ । बढ़ती जनसंख्या के कारण वनों को काटकर न केवल कृषि भूमि का विस्तार किया गया बल्कि अधिवासीय क्षेत्रों का भी विकास किया गया है । एक सर्वेक्षण के अनुसार 1951-81 के मध्य लगभग 26000 वर्ग किमी . वन क्षेत्र कृषि भूमि में परिवर्तित किया गया ।
आर्थिक विकास के नाम पर बड़ी विकास योजनाएँ आरंभ की गईं । बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के विकास के कारण 1952 ई . में 50000 वर्ग किमी . से अधिक वन क्षेत्रों को नष्ट किया गया । वर्तमान समय में भी इस प्रक्रिया से वन विनाश जारी है । खनन कार्य के कारण भी संबंधित क्षेत्र पर के वनों का विनाश होता रहा है ।
बड़े – बड़े कारखानों , उद्योगों की स्थापना के कारण भी वनों का विनाश बड़े पैमाने पर हुआ है । साथ ही वन आधारित उद्योगों के विकास का भी प्रतिकूल असर इन वनीय संपदाओं पर पड़ा है । पशुचारण कार्य तथा ईंधन के लिए लकड़ियों के उपयोग के कारण भी पर्वतीय क्षेत्रों के वन कटे हैं । सड़क मार्ग , रेलमार्ग , नगरीकरण , औद्योगीकरण के कार भी वन एवं वन्य जीवों का लगातार विनाश होता जा रहा है । वनों के विनाश से पर्यावरण एवं अधिवासीय क्षेत्र के विनाश के कारण वन्य जीवों का भी साथ – साथ विनाश अथवा हास हो रहा है । फलत : 744 वन्य जीव लुप्त हो चुके हैं एवं 22500 विलुप्ती के कगार पर हैं । भारत में चीता और गिद्ध इसके उदाहरण हैं । बाघों की संख्या भी लगातार घटती जा रही है ।
5 . भारत में विकसित जैव मंडल क्षेत्र का विस्तृत विवरण दें ।
उत्तर — भारत जैव विविधताओं से समृद्ध देश है । जहाँ पश्चिमी घाटी एवं उत्तर – पूर्वी राज्य इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं । यहाँ भारत के कुल क्षेत्रफल का क्रमश : 4 % एवं 5.2 % भाग है , जिसे विश्व के 25 हॉट स्पॉट में शामिल किया गया है । जहाँ असंख्य जैविक समूह निवास करते हैं ।
एक अध्ययन के अनुसार देश में उपलब्ध 33 % पुष्पीय पौधे , 53 % स्वच्छ जल मछली , 60 % एम्फीबियन , 30 % सरीसृप एवं 10 % स्तनपाई प्रजातियाँ भारतीय मूल की हैं । इस विविधता भरी विशेषताओं को सुरक्षित रखने एवं इनके संवर्द्धन के उद्देश्य से यूनेस्को की सहायता से देश में 14 जैव मंडल आरक्षित क्षेत्रों का विकास किया गया है ।
देश का सबसे बड़ा जैव – मंडल आरक्षित क्षेत्र पंचमढ़ी है जो मध्य प्रदेश के बेतूल , होशंगाबाद और छिंदवाड़ा जिलों के लगभग 5 लाख वर्ग किमी ० क्षेत्र पर फैला है । इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र अचनकमार – अमरकंटक जैव मंडल क्षेत्र है । लगभग 383000 वर्ग किमी ० क्षेत्र पर मध्य प्रदेश के अनुपुर , दिन दौरी और छत्तीसगढ़ के विलासपुर जिले में फैला है । कंचनजंगा जैवमंडल क्षेत्र सिक्किम के 2.6 लाख वर्ग किमी . क्षेत्र पर फैला है । सबसे प्रसिद्ध नीलगिरी जैव मंडल क्षेत्र तमिलनाडु , केरल और कर्नाटक राज्यों की सीमाओं पर 5520 किमी ० क्षेत्र पर विस्तृत है । उत्तराखंड राज्य के लगभग 2200 वर्ग किमी क्षेत्र पर नंदा देवी जैव मंडल क्षेत्र का फैलाव है । नोकरेक जैव मंडल क्षेत्र मेघालय राज्य के 820 वर्ग किमी क्षेत्र पर फैला है । जबकि मानस क्षेत्र का विकास असम राज्य के 2837 वर्ग किमी ० क्षेत्र पर है । सुंदरवन जैव मंडल क्षेत्र पश्चिम बंगाल , मन्नार की खाड़ी , तमिलनाडु तट पर ग्रेट निकोबार क्षेत्र अंडमान निकोबार द्वीप समूह , सिमलीपाल – रिजर्व क्षेत्र उड़ीसा , डिब्रू – साइकोवा असम , दिहांग – दिबंग अरुणाचल प्रदेश एवं अगस्थ्यमलाई जैव मंडल रिजर्व क्षेत्र केरल राज्य में विस्तृत है ।

                   ( घ ) खनिज संसाधन

   महत्वपूर्ण तथ्य –
मानवीय क्रियाकलापों एवं किसी देश की अर्थव्यवस्था के विकास में खनिज संसाधनों का महत्वपूर्ण स्थान होता है । ये खनिज प्राकृतिक रूप में पाया जानेवाला अकार्बनिक पदार्थ हैं जिनकी भौतिक तथा रासायनिक संरचनाएँ निश्चित होती हैं । साथ ही इन खनिजों का आंतरिक परमाण्विक संगठन भी निश्चित होता है । ये खनिज कभी – कभी रवा की अवस्था में भी पाए जाते हैं । यही नहीं ये खनिज कोमल ( टॉल्क ) तथा कठोर ( हीरा ) दोनों प्रकार के होते हैं । इन्हीं खनिजों या विशेष खनिजों के मिलने से चट्टानें बनती हैं ।
वर्गीकरण की दृष्टि से इन खनिजों को दो प्रमुख वर्गों में रखा जाता है । ( क ) धात्विक खनिज एवं ( ख ) अधात्विक खनिज । ( क ) धात्विक खनिज उनखनिजों को धात्विक खनिज कहा जाता है जिसमें धातु का अंश होता है । जैसे — ताँबा , चाँदी आदि । धात्विक खनिजें पुन : दो उप प्रकार की होती हैं
( i ) अलौह खनिजें जिनमें लोहे की उपस्थिति नहीं होती है । जैसे — टिन , सीसा , जस्ता इत्यादि ।
( ii ) लौह खनिजें जिनमें लोहे की उपस्थिति होती है । जैसे —- मैंगनीज , क्रोमियम , निकेल , कोबाल्ट इत्यादि ।
अधात्विक खनिजों में धातु का अंश नहीं होता है । जैसे – पोटाश , नाइट्रेट आदि । जिन खनिजों से धातुओं का निष्कासन व्यापारिक दृष्टि से किया जाता है उन्हें ‘ अयस्क ‘ कहा जाता है । धातु का यह निष्कासन एक जटिल प्रक्रिया है । ये खनिजें पृथ्वी के अंदर कई स्थानों पर विभिन्न रूपों में विद्यमान होते हैं ।
भारत में लगभग खनिज पाए जाते हैं । ये सभी खनिज तीन प्रमुख क्षेत्रों में पाए जाते हैं – ( i ) उत्तर – पूर्वी भारत का क्षेत्र । ( i ) पश्चिम – उत्तर भारतीय क्षेत्र । ( iii ) दक्षिण भारतीय क्षेत्र । उत्तर – पूर्वी क्षेत्र खनिज की दृष्टि से सबसे धनी क्षेत्र है जिसमें छोटानागपुर पठार , उड़ीसा , छत्तीसगढ़ एवं मेघालय का पठार शामिल है । यहाँ लौह अयस्क , मैंगनीज , अभ्रक , बॉक्साइट , चूना – पत्थर , यूरेनियम , थोरियम जैसे खनिज पाए जाते हैं । पश्चिम एवं उत्तर – पश्चिमी क्षेत्र के अंतर्गत गुजरात , राजस्थान , महाराष्ट्र , पं . मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश एवं जम्मू कश्मीर राज्य शामिल हैं । यहाँ बालू पत्थर , चाँदी , सीसा , ताँबा , जस्ता , जिप्सम , संगमरमर , नमक इत्यादि मिलते हैं । दक्षिणी क्षेत्र के अंतर्गत कर्नाटक , आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु एवं केरल राज्य आते हैं । यहाँ लौह अपस्क , मैंगनीज , बॉक्साइड , थोरियम , चूना पत्थर , लिग्नाइट इत्यादि खान पाए जाते हैं । भारत में पाए जानेवाले खनिजों में लौह अयस्क , मैंगनीज , बॉक्साइड , अभ्रक , ताँबा मुख्य हैं ।
लौह अयस्क सभी उद्योगों की जननी मानी जाती है । लोहे के तीन मुख्य अयस्क हैं हेमाटाइट , मैग्नेटाइट एवं लिमोनाइट । देश में विश्व के कुल लौह भंडार का 1/4 भाग पाया जाता है । हेमाटाइट में लोहे क , अंश 68 % , मैग्नेटाइट में 60 % एवं लिमोनाइट में 40 % तक पाया जाता है । देश में लौह अयस्क का कुल उत्पादन 1950-51 में 42 लाख टन से बढ़कर 2004-05 1427 लाख टन हो गया । लौह अयस्क उत्पादक राज्यों में कर्नाटक , छत्तीसगढ़ , उड़ीसा , गोवा , झारखंड , महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु का क्रम से स्थान आता है लौह अयस्क के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बेल्लारी , बाबाबूदन , कालाहांडी , बैलाडिला , डाली – राजहरा , बादाम पहाड़ , गुरु महिषानी , सिंहभूम , पलामू , संथाल परगना , रत्नागिरी , भंडारा , सेलम इत्यादि शामिल हैं ।
मैगनीज उत्पादन में विश्व में भारत का तीसरा स्थान है । जंगरोधी इस्पात बनाने तथा मिश्र धातु बनाने में मैगनीज का मुख्य उपयोग है । इसके अलावा शुष्क बैटरियों के निर्माण में , माचिस उद्योग , चमड़ा उद्योग , फोटोग्राफी में , पेंट उद्योग तथा कीटनाशक दवाओं के निर्माण में भी उपयोग किया जाता है । देश में मैंगनीज का कुल संचित भंडार 1760 लाख टन आँका गया है । जिम्बावे के बाद भारत विश्व का सबसे बड़ा मैंगनीज भंडार वाला देश है । देश का 78 % मैंगनीज मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र राज्यों में मिलता है जबकि उत्पादन में उड़ीसा प्रथम स्थान पर है । इसके बाद क्रमश : महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश , कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश का स्थान आता है । मैंगनीज उत्पादक क्षेत्रों में सुंदरगढ़ , कालाहांडी , क्योंझर , मयूरगंज , नागपुर , भंडारा , बालाघाट , छिंदवाड़ा , घारवाड़ , शिमोगा , चित्रदुर्ग , उत्तरी कनारा , कुडप्पा , विजयनगर प्रसिद्ध हैं ।
बॉक्साइट अलौह धातु निक्षेप है जिससे एल्युमीनियम धातु प्राप्त की जाती है एल्युमीनियम हल्का होता है , जिसके कारण वायुयान निर्माण , विद्युत उपकरण निर्माण , घरेलू बरतन बनाने , साज – सज्जा के सामानों के निर्माण , सफेद सीमेंट बनाने एवं रसायनिक वस्तुओं के निर्माण के साथ ही अन्य अनेक उपयोग हैं । देश के पास लगभग 3037 मिलियन टन बॉक्साइट के भंडार हैं । इसके उत्पादन में उड़ीसा का प्रथम स्थान है । यहाँ से देश के कुल बॉक्साइट का 42 % प्राप्त होता है । इसके बाद गुजरात , झारखंड , महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ से क्रमश : 17 % , 14 % , 12 % एवं 6 % बॉक्साइट का उत्पादन होता है । भारत से बॉक्साइट का निर्यात इटली , यू.के. , जापान एवं जर्मनी को होता है ।
ताँबा का देश में कुल भंडार 125 करोड़ टन है । झारखंड का सिंहभूम जिला इसका सबसे बड़ा उत्पादक है । इसके बाद राजस्थान का खेतड़ी , मध्य प्रदेश के बालाघाट एवं छतीसगढ़ के दुर्ग में भी इसका उत्पादन होता है ।
अभ्रक अधात्विक खनिज है जिसके विविध उपयोग हैं । देश में इसका कुल भंडार 59065 टन है । झारखंड में उत्तम कोटि का रूबी अभ्रक पाया जाता है । झारखंड क्षेत्र का कोडरमा जिला अभ्रक उत्पादन में प्रसिद्ध है । झारखंड के अलावा बिहार , राजस्थान और आंध्र प्रदेश में भी अभ्रक पाया जाता है ।
चूना पत्थर के कुल उपयोग का 76 % सीमेंट उद्योग , 16 % लौह इस्पात उद्योग , 4 % रसायन उद्योग तथा शेष 4 % उर्वरक , कागज एवं चीनी उद्योग में प्रयुक्त होता है । चूना पत्थर उत्पादन में मध्य प्रदेश अग्रणी स्थान रखता है । यहाँ देश का 35 % चूना पत्थर पाया जाता है । इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ , आंध्र प्रदेश , गुजरात , राजस्थान , उड़ीसा , बिहार इत्यादि राज्यों में भी चूना पत्थर पाया जाता है ।
खनिजों का आर्थिक महत्व एवं संरक्षण खनिज संपदा राष्ट्रीय आय के प्रमुख स्रोत हैं । खनिजों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये क्षयशील होते हैं जिनका उपयोग वर्तमान एवं भविष्य दोनों में है । इसलिए इनका संरक्षण अति आवश्यक है ।
किसी भी देश के आर्थिक विकास में खनिजों का महत्वपूर्ण स्थान होता है । इसी से देश ‘ को औद्योगिक विकास को गति एवं दिशा मिलती है । फलतः इस दृष्टि से खनिजों के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए इसके विवेकपूर्ण उपयोग की जरूरत है । खनिजों के विकल्पों की खोज एवं उनके उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता है । इसके अपशिष्ट पदार्थों के बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग तथा पर्यावरण पर इसके कुप्रभाव को नियंत्रित करना जैसे तथ्य स्खनिज प्रबंधन के मुख्य उद्देश्य हैं ।

I .वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर :
1.भारत में लगभग कितने खनिज पाए जाते हैं ? ( क ) 50 ( ख ) 100 ( 1 ) 150 ( घ ) 200
उत्तर– ( क )
2. इनमें से कौन लोहयुक्त खनिज नहीं है ?
( क ) मैंगनीज ( ख ) अभ्रक ( ग ) बॉक्साइट ( घ ) चूना पत्थर
उत्तर— ( क )
3. निम्नलिखित में कौन अघात्विक खनिज है ? ( क ) सोना ( ख ) टीन ( ग ) अभ्रक
उत्तर– ( ग )
4. किस खनिज को उद्योगों की जननी कहा गया है ? ( क ) ताँबा ( ख ) मैंगनीज ( ग ) सोना ( घ ) लोहा उत्तर– ( घ )
5. इनमें कौन लौह अयस्क का एक प्रकार है ?
( क ) लिग्नाइट ( ख ) हेमाटाइट ( ग ) बिटुमिनस ( घ ) फ्लोगोपाइट
उत्तर- ( ख )
6. निम्नांकित कौन भारत का सबसे बड़ा लौह उत्पादक राज्य है ?
( क ) कर्नाटक ( ख ) गोवा ( ग ) झारखंड ( घ ) बिहार
उत्तर— ( क )
7. छत्तीसगढ़ भारत का कितना प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित करता है ?
( क ) 10 ( ख ) 20 ( ग ) 30 ( घ ) 50
उत्तर– ( ख )
8. मैंगनीज उत्पादन में भारत का विश्व में क्या स्थान है ?
( क ) पहला ( ख ) दूसरा ( ग ) तीसरा ( घ ) पाचवाँ उत्तर– ( घ )
9. एक टन इस्पात बनाने में कितना मैंगनीज उपयोग होता है ?
( क ) 5 किग्रा . ( ख ) 10 किग्रा ( ग ) 15 किग्रा . ( घ ) 20 कि.ग्रा .
उत्तर– ( ख )
10. उड़ीसा किस खनिज का सबसे बड़ा उत्पादक है ?
( क ) लौह अयस्क ( ख ) मैंगनीज ( ग ) टीन ( घ ) ताँबा
उत्तर– ( ख )
11. एल्युमीनियम बनाने के लिए किस खनिज की आवश्यकता पड़ती है ?
( क ) मैंगनीज ( ख ) टीन ( ग ) लोहा ( घ ) बॉक्साइट
उत्तर– ( घ )
12. देश में ताँबा का कुल भंडार कितना है ?
( क ) 125 लाख टन ( ख ) 125 करोड़ टन ( ग ) 150 करोड़ टन ( घ ) 175 करोड़ टन
उत्तर– ( ख )
13. बिहार – झारखंड राज्य मिलकर देश का कितना प्रतिशत अभ्रक का उत्पादन करते हैं ?
( क ) 90 ( ख ) 60 ( ग ) 70 . ( घ ) 89
उत्तर– ( घ )
14. सीमेंट उद्योग का सबसे प्रमुख कच्चा माल क्या है ? 
( क ) चूना पत्थर  ( ख ) लोहा( ग ) ग्रेफाइट ( घ ) बॉक्साइड
उत्तर– ( क )

II . लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :

1. खनिज किसे कहा जाता है |

उत्तर –  खनिज प्राकृतिक रूप से मिलने वाला अकार्बनिक पदार्थ है , जिसको रासायनिक एवं भौतिक संरचना एवं आंतरिक परमाण्विक संगठन निश्चित होता है ।

2. धात्विक खनिजों के दो प्रमुख पहचान को लिखें ।

उत्तर – धात्विक खनिजों के दो प्रमुख पहचान हैं-
( i ) गलाने पर इनसे धातु प्राप्त होता है ।
(ii) ये कठोर एवं चमकीले होते हैं जिसे पीटकर तार बनाया जाता है ।

3. खनिजों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर -खनिजों की प्रमुख विशेषताएँ हैं
( i ) ये प्राकृतिक रूप में पाए जाते हैं ।
( ii ) इनका भौतिक एवं रासायनिक संयोजन निश्चित होता है ।
( iii ) इनका विशिष्ट आंतरिक परमाण्विक संरचना होती है ।
4. लौह अयस्क के दो प्रकारों के नाम लिखें ।
उत्तर – लौह अयस्क के दो प्रकार हैं
( i ) मैग्नेटाइट , ( ii ) हेमाटाइट ।
5. लोहे के प्रमुख उत्पादक राज्यों के नाम लिखें ।

उत्तर – लोहे के प्रमुख उत्पादक राज्यों में कर्नाटक , छत्तीसगढ़ , उड़ीसा , गोवा , झारखंड एवं महाराष्ट्र हैं ।

6. झारखंड के प्रमुख लौह उत्पादक जिलों के नाम लिखिए ।
उत्तर – झारखंड के प्रमुख लौह उत्पादक जिले सिंहभूम , पलामू , धनबाद , हजारीबाग , संथाल परगना एवं राँची हैं ।
7. मैंगनीज के क्या उपयोग हैं ? लिखें ।
उत्तर – मैंगनीज का उपयोग शुष्क बैटरियों के निर्माण में , फोटोग्राफी में , चमड़ा एवं माचिस उद्योग में कीटनाशक दवाओं के निर्माण में तथा पेंट उद्योग में होता है ।
8. एल्युमीनियम के उपयोग पर प्रकाश डालें ।
उत्तर – वायुयान निर्माण , विद्युत उपकरण निर्माण , घरेलू साज – सज्जा के सामानों का निर्माण , बरतन बनाने , सफेद सीमेंट तथा रासायनिक वस्तुएँ इत्यादि बनाने में एल्युमीनियम का उपयोग किया जाता है ) . 9.अभ्रक के क्या उपयोग हैं ? लिखें ।
उत्तर – अभ्रक विद्युतरोधक गुणवाला होने के कारण इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग , इलेक्ट्रीकल उद्योग , खिलौना उद्योग एवं आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में किया जाता है ।
10. चूना पत्थर के उपयोग को लिखें ।
उत्तर – चूना पत्थर का उपयोग मुख्य रूप से सीमेंट उद्योग , लौह – इस्पात उद्योग एवं रसायन उद्योग में किया जाता है ।
11. खनिजों के संरक्षण एवं प्रबंधन से आप क्या समझते  हैं ?
उत्तर – खनिज राष्ट्रीय संपत्ति है , जो एक बार उपयोग में आने के बाद लगभग समाप्त हो जाते हैं । इन्हें दोबारा उपयोग में नहीं लाया जा सकता है । देश का आर्थिक विकास का प्रत्यक्ष संबंध इन खनिजों से है तथा इनके भंडार सीमित एवं क्षयशील प्रकृति के कारण खनिजों का संरक्षण जरूरी है । इसके लिए इनका विवेकपूर्ण – उपयोग होना चाहिए । खनिजों के विकल्पों की खोज , उनके अपशिष्ट पदार्थों का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग , पारिस्थितिकीय कुप्रभाव पर नियंत्रण तथा खनिज निर्माण के चक्रिय पद्धति को अपनाना खनिज प्रबंधन कहलाता है । खनिजों के संरक्षण के साथ – साथ प्रबंधन से खनिज संकट पर काबू पाया जाना संभव है ।

III . दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
1. खनिज कितने प्रकार के होते हैं ? सोदाहरण विवरण दें ।
उत्तर – खनिज प्राकृतिक रूप में पाया जानेवाला वह पदार्थ है , जिसकी भौतिक एवं रासायनिक संरचनाएँ निश्चित होती है तथा आंतरिक परमाण्विक संगठन भी विशिष्ट होता है । खनिज टॉल्क जैसी मुलायम एवं हीरे जैसी कठोर भी होती है । विशिष्ट प्रकार के खनिजों के संयोजन से ही चट्टानों का निर्माण होता है ।
मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं
( क ) घात्विक खनिज ऐसे खनिजों में धातु का अंश होता है । इन्हें पुनः दो उपभागों में बाँटा गया है
( i ) लोहयुक्त खनिज —ऐसे धात्विक खनिजों में लोहा का अंश अधिक पाया जाता है । जैसे लौह अयस्क , मैंगनीज , निकेल , टंगस्टन इत्यादि ।
( ii ) अलौह खनिज – ऐसे धात्विक खनिजों में लोहे का अंश नहीं के बराबर होता है । जैसे सोना , चाँदी , ताँबा , टीन , शीशा इत्यादि ।
( ख ) अधात्विक खनिज इस प्रकार के खनिजों में धातु नहीं मिलते हैं । इनके भी दो उपवर्ग बनाए गए हैं ( i ) कार्बनिक खनिज – ऐसे अधात्विक खनिजों में जीवाश्म या कार्बन के अंश होते हैं । जैसे कोयला , पेट्रोलियम आदि ।
( ii ) अकार्बनिक खनिज ऐसे अधात्विक खनिजों में कार्बन या जीवाश्म नहीं होते हैं । जैसे अभ्रक , ग्रेफाइट आदि । इन खनिजों में लौह खनिजे रवेदार चट्टानों में पाए जाते हैं जबकि अलौह खनिजें सभी प्रकार के चट्टानों में मिलने संभव हैं । इसी तरह घात्विक खनिजें आग्नेय चट्टानों में मिलते हैं । जबकि अधात्विक खनिजें अवसादीय चट्टानों में पाये जाते हैं ।

2. धात्विक एवं अघात्विक खनिजों में क्या अंतर है ? तुलना कीजिए ।
उत्तर – खनिजों का मानवीय जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है । ये खनिज किसी भी देश की राष्ट्रीय संपत्ति है , जिस पर देश का आर्थिक विकास निर्भर करता है । खनिजों पर ही देश के औद्योगिक विकास की दशा एवं दिशा निर्भर करती है । दूसरे शब्दों में ” खनिज संसाधन आधुनिक सभ्यता एवं संस्कृति के आधार स्तम्भ माने जाते हैं । ये खनिज निश्चित भौतिक एवं रासायनिक विशिष्टताओं से निर्मित प्राकृतिक पदार्थ हैं जिनका आंतरिक परमाण्विक संगठन भी निश्चित होता है तथा ये ठोस अवस्था में पाए जाते हैं । लगभग 2000 से अधिक प्रकार के खनिजों को पहचाना जा चुका है , परंतु सभी खनिज एक ही प्रकार के नहीं होते हैं । इन्हें प्रमुख रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है । ( क ) धात्विक खनिज एवं
( ख ) अधात्विक खनिज ।
( क ) धात्विक खनिज वैसे खनिजों को इस वर्ग में रखा जाता है जिनमें धातु होता है जैसे लोहा , तांबा , मैंगनीज , सोना इत्यादि इन्हें पुनः दो उपवर्गों में रखा जाता है ।
( i ) लौहयुक्त खनिज – जिन धात्विक खनिजों में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है , उन्हें लौह युक्त खनिज कहा जाता है । जैसे लौह अयस्क , मैंगनीज , टंग्स्टन इत्यादि ।
( ii ) अलौहयुक्त खनिज – जिन धात्विक खनिजों में लोहे का अंश काफी कम होता है , इस वर्ग में शामिल हैं । जैसे – सोना , चाँदी , टीन , ताँबा इत्यादि ।
( ख ) अधात्विक खनिज – इस प्रकार के खनिजों में धातु नहीं पाए जाते हैं । जैसे चूना पत्थर , अभ्रक आदि । अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं ( i ) कार्बनिक खनिज इन खनिजों में जीवाश्म होते हैं । जैसे – कोयला , पेट्रोलियम आदि ।
( ii ) अकार्बनिक खनिज इनमें जीवाश्म नहीं होता है । जैसे — अभ्रक , ग्रेफाइट आदि ।
धात्विक खनिजें कठोर एवं चमकीले होते हैं जबकि अधात्विक खनिजों की चमक अलग होती है । धात्विक खनिजें प्रायः आग्नेय चट्टानों में मिलते हैं जबकि अधात्विक खनिजें परतदार चट्टानों में प्रायः मिलती हैं । धात्विक खनिजों को पीटकर तार बनाया जा सकता है जबकि अधात्विक खनिजें पीटने पर चूर – चूर हो जाते हैं ।
3. भारत के विभिन्न खनिज पेटियों का नाम लिखकर उनका विस्तृत विवरण दीजिए ।
उत्तर – भारत के भूगर्भिक संरचनाओं में विभिन्नता के कारण खनिजों का वितरण काफी असमान है । यहाँ के अधिकतर खनिज प्राचीन समूहों में मिलते हैं । आर्कियन और धारवाड़ समूह के चट्टानों में लौह अयस्क एवं मैगनीज मिलते हैं तो अरावली श्रेणी में जस्ता , ताँबा एवं शीशा पाया जाता है । कड़प्पा और विध्यन समूहों में जहाँ चूना पत्थर , जिप्सम एवं डोलोमाइट तथा हीरा पाया जाता है वहीं गोंडवाना चट्टानों में कोयला प्रमुखता से पाया जाता है जबकि टर्शियरी कालीन चट्टानों में लिग्नाइट एवं पेट्रोलियम मिलते हैं । देश का अधिकांश खनिजों का वितरण काफी असमान है । फिर भी इन्हें तीन प्रमुख पेटियों में बाँटा जाता है –
( i ) पूर्वी पठारी क्षेत्र – इसके अंतर्गत झारखंड , असम , मेघालय , उड़ीसा , छत्तीसगढ़ एवं पूर्वी मध्य प्रदेश का क्षेत्र शामिल है । यहाँ कोयला , लौह अयस्क , मैंगनीज , पेट्रोलियम , यूरेनियम , अभ्रक , चूनापत्थर , बॉक्साइट , थोरियम , ताँबा इत्यादि खनिज पाए जाते हैं ।
( ii ) पश्चिमी एवं पश्चिमोत्तर क्षेत्र इस क्षेत्र के अंतर्गत राजस्थान , गुजरात , महाराष्ट्र , पश्चिमी मध्य प्रदेश एवं जम्मू – कश्मीर राज्य शामिल हैं जहाँ कोयला , बॉक्साइट , मैंगनीज , पेट्रोलियम , अबरक , लौह अयस्क , ताँबा प्रमुखता से पाये जाते हैं ।
( iii ) दक्षिणी पठारी क्षेत्र – इस क्षेत्र के अंतर्गत आंध्रप्रदेश , कर्नाटक , केरल एवं तमिलनाडु राज्य आते हैं जहाँ बॉक्साइट , थोरियम , लिग्नाइट , कोयला , लौह अयस्क , मैगनीज , ताँबा , अभ्रक , सोना जैसे खनिजों के भंडार पाए जाते हैं ।
4. लौह – अयस्क का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को लिखिए ।
उत्तर – लौह – अयस्क में उपलब्ध लौहांश की मात्रा को ध्यान में रखकर लौह – अयस्क को तीन भागों में वर्गीकृतकर अध्ययन किया जा सकता है ।
( a ) हेमेटाइट – इस लौह – अयस्क में लौहांश सर्वाधिक 68 प्रतिशत पाया जाता है । इससे लकीर खींचने पर लाल उगता है , जिस कारण इसे लाल अयस्क भी कहा जाता है । भारत में इसके लगभग 12317 मिलिन टन भंडार उपलब्ध हैं ।
( b ) मैग्नेटाइट – इसमें लौहांश की मात्रा 60 प्रतिशत होती है । घिसने पर काला रंग दिखता है । अत : इसे काला अयस्क के नाम से जाना जाता है । भारत में इसके 540 मिलियन टन भंडार उपलब्ध हैं ।
( c ) लिमोनाइट — यह सबसे घटिया किस्म का लौह – अयस्क है , जिसमें लौहांश की मात्रा 40 प्रतिशत से भी कम होता है । पीला अयस्क के नाम से जाना जाता है । भण्डार का आकलन अभी परीक्षणाधीन है ।

5 . भारत में लौह – अयस्क के वितरण एवं उत्पादन का वर्णन करें ।
उत्तर – लोहा औद्योगीकरण की रीढ़ है । जिस पर देश का आर्थिक विकास निर्भर करता है । भारत में लौह – अयस्क का कुल भंडार का 84 % हेमाटाइट प्रकार है । इसके अतिरिक्त मैग्नेटाइट एवं लिमोनाइट के भंडार भी यहाँ हैं । देश में इसके अयस्क का वितरण प्राय : सभी राज्यों में है । जिनमें प्रमुख हैं-
( i ) कर्नाटक यहाँ देश का एक चौथाई लोहा उत्पन्न होता है । उसका उत्पादन बेल्लारी , कुद्रेमुख , बाबाबूदन एवं केमनगुडी की खानों से होता है ।
( ii ) छत्तीसगढ़ – कर्नाटक के बाद यह देश का दूसरा प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक राज्य है । यहाँ से लगभग 20 % लोहा प्राप्त होता है जिसका खनन बैलाडिला , डाली , राजहरा इत्यादि से होता है । यहाँ से उत्पादित लोहे का निर्यात विशाखापतनम बंदरगाह से किया जाता है ।
( iii ) उड़ीसा – यहाँ से 19 % लोहा प्राप्त होता है जो गुरु महिषानी एवं बादाम पहाड़ तथा किरीबुरू से निकाला जाता है ।
( iv ) गोवा देश का 16 % लौह उत्पादन वाला यह राज्य देश का चौथा स्थान रखता है । जहाँ साहफ्वालिम , संग्यूम , सतारी , पौंडा एवं वियोलिम इत्यादि खानों से लौह अयस्क निकाला जाता है । ( v ) झारखंड – यह सिंहभूम , पलामू , धनबाद , हजारीबाग , राँची एवं संथाल परगना क्षेत्र से देश के कुल लौह अयस्क उत्पादन का 15 % हिस्सा उत्पादित होता है ।
इन प्रमुख उत्पादक राज्यों के अतिरिक्त महाराष्ट्र , कर्नाटक , आंध्रप्रदेश एवं तमिलनाडु राज्यों से भी लौह अयस्क निकाला जाता है । 1950-51 में देश में लौह अयस्क का कुल उत्पादन 42 लाख टन से बढ़कर 2004-05 ई ० के 1427 लाख टन हो गया ।66 वर्ग के
6. मैंगनीज अथवा बॉक्साइट की उपयोगिता तथा देश में इनके वितरण का वर्णन कीजिए ।

उत्तर – मैंगनीज की उपयोगिता एवं वितरण मैंगनीज का उपयोग इस्पात सहित विभिन्न मिश्रधातु बनाने में किया जाता है । इससे निर्मित इस्पात जंगरोधी होते हैं । इसके अतिरिक्त शुष्क शेल बनाने में , फोटोग्राफी में , चमड़ा एवंमाचिस उद्योग में , रग – रोगन आदि कार्यों में भी मैंगनीज का उपयोग होता है । भारत में विश्व का 20 प्रतिशत मैंगनीज ( 1670 लाख टन ) संचित है । उत्पादन में रूस एवं द . अफ्रीका के बाद यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा देश है । यहाँ मैंगनीज के भंडार उड़ीसा , मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र , कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश राज्य में फैले हैं । अकेले उड़ीसा देश का 37 प्रतिशत मैंगनीज उत्पादन करता है । बॉक्साइट की उपयोगिता एवं वितरण बॉक्साइट एक अलौह धातु निक्षेप है । भारत के पास इसके पर्याप्त संचित भण्डार हैं । इससे अल्युमीनियम प्राप्त किया जाता है । जिसका बहुमुखी उपयोग आधुनिक युग में हो रहा है । इसका उपयोग वायुयान निर्माण , विद्युत उपकरण निर्माण , घरेलू साज – सज्जा सामग्रियों का निर्माण , वर्तन निर्माण , सफेद सिमेन्ट निर्माण एवं रसायनों के निर्माण में किया जाता है । भारत में लगभग 3037 मिलियन टन बॉक्साइट के अनुमानित भंडार उपलब्ध हैं । इसका भंडार मुख्य रूप से उड़ीसा , गुरात , झारखंड , महाराष्ट्र , छत्तीसगढ़ , कर्नाटक , तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश में अवस्थित हैं । देश का 42 प्रतिशत बॉक्साइट का उत्पादन अकेले उड़ीसा राज्य करता है । इसके प्रमुख उत्पादन क्षेत्र कालाहांडी , बालंगीर , कोरापुट , सुन्दरगढ़ तथा संभलपुर है । गुजरात में 17.35 प्रतिशत बॉक्साइट उत्पादन होता है । इसके साथ ही गुजरात देश का दूसरा बड़ा उत्पादक राज्य है । जामनगर , कैगा , सबरकंठ , कच्छ तथा सूरत प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है । झारखंड को देश में तीसरा स्थान प्राप्त है । यहाँ देश का 14 प्रतिशत बॉक्साइट का उत्पादन राँची , लातेहार , पलामू , लोहरदग्गा जिलों से होता है । इसके अतिरिक्त भी कई राज्यों में अनेक बॉक्साइट उत्पादक क्षेत्र हैं । जहाँ न्यून मात्रा में बॉक्साइट का उत्खनन होता है ।
प्रश्न 7. अभ्रक की उपयोगिता एवं वितरण पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर – अभ्रक की उपयोगिता – अभ्रक एक विद्युतरोधी अधात्विक खनिज है । विद्युतरोधी होने को कारण इस खनिज का सर्वाधिक उपयोग विद्युत उपकरण के निर्माण में किया जाता है । इसके तिरिक्त इसका उपयोग साज – सज्जा सामग्रियाँ , रंग – रोगन की वस्तुओं के निर्माण में भी होता है । अभ्रक का वितरण – अभ्रक के उत्पादन में भारत विश्व का सिरमौर है । भारत में अभ्रक की तीन पेटियाँ हैं , जो बिहार , झारखंड , आंध्र प्रदेश तथा राजस्थान राज्यों में विस्तृत हैं । भारत में अभ्रक के कुल भंडार 59065 टन है । बिहार एवं झारखंड में उत्तम कोटि के अभ्रक ‘ रूबी अभ्रक ‘ का उत्पादन होता है । बिहार में गया , मुंगेर एवं भागलपुर जिलान्तर्गत इसके उत्पादन होते हैं । वहीं झारखंड में हजारीबाग , धनबाद , पलामू , राँची एवं सिंहभूम जिलों में अभ्रक की खानें है । बिहार एवं झारखंड भारत के 80 प्रतिशत अभ्रक का उत्पादन करते हैं । आंध्र प्रदेश के नेल्लूर जिला , राजस्थान अंतर्गत उदयपुर , जयपुर , भीलवाड़ा , अजमेर आदि जिलों में अभ्रक के उत्खनन होते हैं ।

प्रश्न 8. खनिजों के संरक्षण के उपाय सुझाइए ।
उत्तर – खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन हैं । इनके भंडार सीमित हैं और पुनर्निर्माण भी असंभव है । क्योंकि इनका निर्माण एक जटिल एवं लंबी प्रक्रिया से होता है । खनिज आधुनिक औद्योगिक जगत् के आधार हैं । औद्योगिक विकास के क्रम में खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व को संकटग्रस्त कर दिया है । अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन अपरिहार्य है । खनिजों का संरक्षण तीन बातों पर निर्भर है : –
( i ) खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण ।
( ii ) उनका विवेकपूर्ण उपयोग जिससे खनिज का बचत किया जा सके ।
( iii ) कच्चे माल के रूप में इनके विकल्पों की खोज।
उपर्युक्त बातों को अमल में लाकर खनिज के संकटग्रस्त अस्तित्व की रक्षा की जा सकती है ।

           ( ङ ) शक्ति ( ऊर्जा ) संसाधन

महत्वपूर्ण तथ्य — किसी भी काम को करने के लिए शक्ति या ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है । इस क्रम में सभ्यता के विकास और तकनीकी विकास के कारण मानव ने विभिन्न प्रकार के शक्ति संसाधनों का विकास किया है । बड़े पैमाने पर उद्योग चलाने के लिए बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन की तकनीक का भी विकास किया गया । कोयले की खोज से 18 वीं सदी में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई । कालांतर में पेट्रोलियम ने कोयले का स्थान लिया । फिर परमाणु शक्ति का विकास हुआ । संसाधनों की विविधता के कारण इनके वर्गीकरण के कई आधार हैं –
( i ) उपयोग स्तर के आधार पर शक्ति संसाधनों को सतत् शक्ति एवं समापनीय शक्ति में बाँटा जाता है । सतत् शक्ति में सौर ऊर्जा , भूतापीय ऊर्जा , पवन ऊर्जा , जलीय ऊर्जा इत्यादि शामिल हैं । जबकि समापनीय शक्ति में कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस एवं विखंडनीय तत्व शामिल हैं ।
( ii ) उपयोगिता के आधार पर ऊर्जा को दो वर्गों में बाँटा गया है—
( क ) प्राथमिक ऊर्जा जिसमें कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस एवं रेडियोसक्रिय खनिज शामिल हैं । ( ख ) गौण ऊर्जा — इसमें विद्युत शामिल है ।
( iii ) स्रोत की स्थिति के आधार पर क्षयशील एवं अक्षयशील ऊर्जा संसाधन होते हैं । क्षयशील संसाधनों में कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस एवं रेडियोसक्रिय खनिजें शामिल हैं । जबकि अक्षयशील ऊर्जा में प्रवाहित जल , पवन , ऊर्जा , सौर्य किरण , ज्वारीय ऊर्जा शामिल है ।
( iv ) संरचनात्मक गुण के आधार पर जैविक ऊर्जा में मानव एवं अन्य पशु शक्ति शामि .. है जबकि अजैविक ऊर्जा में जल शक्ति , पवन , सौर , ज्वारीय , भूतापीय ऊर्जा शामिल हैं ।
( v ) समय के आधार पर शक्ति संसाधनों को परंपरागत ऊर्जा संसाधनों जैसे — कोयला , जलविद्युत , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस , परमाणु ऊर्जा एवं गैर – परंपरागत ऊर्जा संसाधनों में पवन ऊर्जा , सौर ऊर्जा , भूतापीय ऊर्जा , ज्वारीय ऊर्जा एवं बायो गैस तथा गोबर गैस ऊर्जा शामिल हैं ।
परंपरागत ऊर्जा के स्रोत — परंपरागत ऊर्जा स्रोत में कोयला सर्वप्रमुख है । भारत में इसका कुल अनुमानित भंडार लगभग 25530 करोड़ टन है । देश में समस्त कोयला भंडार के दो प्रमुख वर्ग है-
(i ) गोंडवाना समूह एवं ( ii ) टर्शियरी कोयला ।
गोंडवाना समूह के कोयले दामोदर नदी सोन नदी , महानदी , वर्धा एवं गोदावरी नदी की घाटियों में पाए जाते हैं । इस कोयले का निर्माण 20 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ । गोंडवाना समूह के कोयले में एथ्रासाइट एवं विटमिनस किस्म मुख्य हैं । ऐंध्रासाइट किस्म का कोयला सर्वोत्तम किस्म का कोयला है जिसमें कार्बन की मात्राएँ 80 % से ऊपर है । बिटुमिनस किस्म में कार्बन की मात्रा 60-80 % तक होती है ।
गॉडवाना समूह के कोयले झारखंड , मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ , उड़ीसा , महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में पाया जाता है ।
टर्शियरी कोयला में लिग्नाइट का भंडार ( भूरा – कोयला ) पाया जाता है । इस किस्म के कोयले में 30-60 % तक कार्बन की मात्रा होती है जो जलने पर ऊष्मा कम धुओं अधिक देता है । इस प्रकार का कोयला मेघालय , असम , जम्मू – कश्मीर , अरुणाचल प्रदेश एवं तमिलनाडु में पाया जाता है । तमिलनाडु के नेवेली में लिग्नाइट बेसिन में देश का 94 % लिग्नाइट कोयले का भंडार है ।
पेट्रोलियम का कुल भंडार देश में 17 अरब टन है । देश में पहली बार तेल कुऔं 1866 में ऊपरी असमा में खोदा गया था । बाद में 1890 में डिगबोई में तेल मिला । धीरे – धीरे देश में तेल कुआँ की संख्या बढ़ती गई । वर्तमान समय में भारत में मुख्यत : 5 तेल उत्पादक क्षेत्र हैं । जिनमें उत्तर – पूर्वी राज्य , गुजरात क्षेत्र , मुंबई हाई क्षेत्र , पूर्वी तटीय क्षेत्र एवं वाड़मेर क्षेत्र शामिल हैं । इन तेल क्षेत्रों से निकलनेवाला कच्चा तेल देश में स्थित 18 तेल परिशोधनशालाओं में परिष्कृत किया जाता है । देश में पहला तेलशोधक कारखाना असम के डिगबोई में 1901 में स्थापित किया गया था।
प्राकृतिक गैस भी ऊर्जा का पारंपरिक स्रोत है । देश में इसकी कुल सचित राशि लगभग 700 अरब घन मीटर है । पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्रों में ही प्राकृतिक गैस भी मिलते हैं । देश में सबसे लंबा गैस पाइपलाइन एच.बी.जे. ( हजीरा , विजयपुर – जगदीशपुर ) गैस पाइप लाइन है ।
जल विद्युत उत्पादन के लिए कुछ भौतिक एवं आर्थिक कारकों का उपलव्य होना आवश्यक होता है । देश में पहला जलविद्युत उत्पादन संयंत्र 1807 में दार्जिलिंग में लगाई गई थी । इसक बाद कर्नाटक के शिवसमुद्रम में जलविद्युत उत्पादन केन्द्र विकसित किया गया । वर्तमान समय में कई जलविद्युत परियोजनाएँ कार्यरत है-
( i ) भाखड़ा नांगल परियोजना
( ii ) दामोदर घाटी परियोजना दामोदर नदी
( iii ) कोसी परियोजना महानदी
( iv ) हीराकुंड परियोजना महानदी
( v ) रिहंद परियोजना रिहंद नदी
( vi ) चंबल परियोजना चंबल नदी
( vii ) तुंगभद्रा परियोजना तुंगभद्रा नदी ( दक्षिण भारत की सबसे बड़ी परियोजना )

परमाणु ऊर्जा – परमाणु ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पादन के लिए यूरेनियम , थोरियम , इल्मेनाइट , बेनेडियम , एंटीमनी , ग्रेफाइट जैसे खनिज आवश्यक हैं । यूरेनियम इसका प्रमुख कच्चा माल है । भारत में पहला परमाणु रिएक्टर 1955 में ट्राम्बे में स्थापित किया गया । अभी तक देश में 6 परमाणु विद्युत गृह कार्यरत हैं
1.  तारापुर — महाराष्ट्र
2 . राजा प्रताप सागर ( कोटा )–  राजस्थान
3 . कलपक्कम —  तमिलनाडु
4 . नरौरा — उत्तर प्रदेश
5 . ककरापार — गुजरात
6.   कैगा — कर्नाटक

* गैर- पारंपरिक ऊर्जा के स्रोत – इसके अंतर्गत सौर ऊर्जा , पवन ऊर्जा , ज्वारीय ऊर्जा , भूतापीय ऊर्जा , जैव ऊर्जा इत्यादि शामिल हैं ।
सौर ऊर्जा के उत्पादन के लिए सोलर प्लेट पर फोटोवोल्टेक सेल लगाया जाता है जो सूर्य किरण से प्राप्त गर्मी को ऊर्जा या विद्युत में बदल देता है । भारत के गुजरात एवं राजस्थान में सौर ऊर्जा विकास की संभावनाएं हैं ।
पवन ऊर्जा के अंतर्गत पवन चक्की पवन की गति से चलती है और टरबाइन को चलाती है जो गति ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है । भारत विश्व का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक देश है । गुजरात के लांबा में एशिया का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित है । तमिलनाडु के तूतीकोरिन में भी दूसरा संयंत्र लगाया गया है ।
ज्वारीय ऊर्जा समुद्री जल में उठने वाली लहरों से उत्पन्न की जाती है । देश में खंभात की खाड़ी , कच्छ की खाड़ी एवं सुंदरवन क्षेत्र में इसके विकास के अनुकूल दशाएँ हैं ।
भूतापीय ऊर्जा – पृथ्वी के अंदर विद्यमान ताप से प्राप्त किया जताा है हिमाचल प्रदेश के मणिकरण , मध्य प्रदेश के तातापानी तथा लद्दाख के पूगा घाटी में भूतापीय ऊर्जा प्राप्त किया जा रहा है ।
बायो गैस – ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध गोबर , कृषि , – अपशिष्ट , पशु एवं मानव जनित अपशिष्टों के उपयोग से तैयार की जानेवाली ऊर्जा को गोबर गैस कहा जाता है । जबकि शहरी कूड़ा – कचरा , मल – मूत्र एवं जैविक अपघटित पदार्थों से उत्पादित ऊर्जा को बायो गैस कहा जाता है ।
परंपरागत ऊर्जा साधनों को सीमितता एवं गैर – परंपरागत ऊर्जा साधनों का आशातीत विकास नहीं होने के कारण शक्ति के संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता है । इसके लिए ऊर्जा के उपयोग में कमी लाना , नवीन ऊर्जा क्षेत्रों की खोज करना । ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों के उपयोग पर बल देना अंतर्राष्ट्रीय प्रयास जरूरी है ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर :
1. निम्न वर्जित किस राज्य में खनिज तेल का विशाल भंडार पाया जाता है ?
( क ) विहार ( ख ) असम ( ग ) राजस्थान ( घ ) मध्य प्रदेश
उत्तर- ( ख )
2 .  भारत के किस स्थान पर पहला परमाणु ऊर्जा स्टेशन स्थापित किया गया था ?
(क)तारापुर ( ख ) कलपक्कम ( ग ) नरोरा (घ) कैगा
उत्तर- ( क )
3. निम्न में कौन ऊर्जा स्रोत अनवीकरणीय है ?
( क ) जल ( ख ) सौर (ग) पवन (घ)कोयला
उत्तर– ( घ )
4 . निम्न में कौन प्राथमिक ऊर्जा का उदाहरण नहीं है ?
(क)कोयला (ख) पेट्रलियम ( ग ) पवन ( घ ) कोयला उत्तर– ( ग )
5. ऊर्जा का गैर – पारंपरिक स्रोत कौन है ?
( क ) कोयला ( ख ) जलीय ऊर्जा ( ग ) सौर ऊर्जा
( घ ) परमाणु ऊर्जा
उत्तर– ( ग )
6. गोंडवाना समूह के कोयले का निर्माण कब हुआ था ?
( क ) 20 हजार वर्ष पूर्व ( ख ) 20 लाख वर्ष पूर्व ( ग ) 20 करोड़ वर्ष पूर्व ( घ ) इनमें से कोई नहीं उत्तर– ( ग )
7 . भारत में कोयले का प्रमुख उत्पादक राज्य इनमें कौन है ?
( क ) पश्चिम बंगाल ( ख ) झारखंड ( ग ) उड़ीसा ( घ ) छत्तीसगढ़
उत्तर– ( ख )
8. कोयले की सर्वोत्तम किस्म कौन – सी है ?
( क ) ऐंधासाइट ( ख ) लिग्नाइट ( ग ) बिटुमिनस ( घ ) पोट
उत्तर– ( क )
9. मुंबई हाई किसलिए प्रसिद्ध है ?
( क ) सोना उत्पादन हेतु ( ख ) परमाणु ऊर्जा हेतु ( ग ) तेलशोधन हेतु    ( घ ) पेट्रोलियम उत्पादन हेतु उत्तर– ( घ )
10. भारत का पहला तेलशोधक कारखाना कहाँ स्थापित हुआ था ?
( क ) मथुरा ( ख ) बरौनी ( ग ) डिगबोई ( घ ) गुवाहाटी
उत्तर– ( ग )
11. प्राकृतिक गैस किस खनिज के साथ पाया जाता है ?
( क ) यूरेनियम ( ख ) पेट्रोलियम ( ग ) कोयला ( घ ) जल
उत्तर– ( ख )
12. भाखड़ा नांग्ल परियोजना किस नदी पर अवस्थित है ?
( क ) नर्मदा ( ख ) झेलम ( ग ) सतलज ( घ ) ब्यास उत्तर– ( ग )
13. दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना कौन है ?
( क ) चंबल ( ख ) शरावती ( ग ) तुंगभद्रा ( घ ) हीराकुड
उत्तर– ( ग )
14. ताप विद्युत उत्पादन केन्द्र का उदाहरण कौन है ? ( क ) गया ( ख ) कटिहार ( ग ) समस्तीपुर (घ)बरौनी
उत्तर– ( घ )
15. यूरेनियम के लिए प्रसिद्ध उत्पादक केन्द्र है |
( क ) जादूगोड़ा ( ख ) घाटशिला ( ग ) खेतड़ी ( घ ) झरिया
उत्तर— ( क )
16. एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह कौन है ?
(क)कैगा ( ख ) तारापुर ( ग ) केलपक्कम ( घ ) नरौरा उत्तर— ( ख )
17. भारत के किस राज्य में सौर – ऊर्जा विकास की असीम संभावनाएँ हैं ?
( क ) असम (ख) बिहार ( ग ) राजस्थान ( घ ) उत्तर प्रदेश
उत्तर– ( ग )
18. ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन के लिए सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियाँ इनमें कहाँ पाई जाती हैं ?
( क ) कोसी नदी (ख) गंगा नदी ( ग ) मन्नार की खाड़ी ( घ ) खंभात की खाड़ी
उत्तर– ( घ )

I . लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :

1. पारंपरिक एवं गैर – पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के तीन – तीन उदाहरण लिखिए ।
उत्तर — पारंपरिक ऊर्जा स्रोत– ( i ) कोयला , ( ii ) पेट्रोलियम , ( iii ) जलविद्युत
गैर – पारंपरिक ऊर्जा स्रोत- ( i ) पवन , ( ii ) सौर ताप , ( iii ) भूताप ।

2. गोंडवाना समूह के कोयला क्षेत्रों के नाम लिखिए ।

उत्तर – गोंडवाना समूह के प्रमुख कोयला क्षेत्र है -( i ) दामोदर घाटी क्षेत्र , ( ii ) सोन घाटी क्षेत्र , ( iii ) महानदी घाटी क्षेत्र , ( iv ) वर्धा – गोदावरी क्षेत्र ।

3. झारखंड के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्रों के नाम लिखिए ।
उत्तर– झारखंड के मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं झरिया , बोकारो , धनबाद , गिरिडीह , कर्णपुरा , रामगढ़ ।
4. कोयले के विभिन्न प्रकार कौन – कौन से होते हैं ? उत्तर – कोयले के चार प्रमुख प्रकार होते हैं –
( i ) ऐंथासाइट – सर्वोच्च कोटि के इस कोयले में कार्बन की मात्रा 80 % से अधिक होती है । जलने पर घुओं नहीं देता परंतु ताप अधिक देता है ।
( ii ) बिटुमिनस- इसमें कार्बन की मात्रा 60-80 % तक होती है । इसको जलाने पर धुआँ और ताप दोनों मिलता है ।
( iii ) लिग्नाइट – यह निम्न कोटि का कोयला है जिसमें 40-60 % तक कार्बन होती है जिससे जलने पर धुआं अधिक ताप कम देता है ।
( iv ) पीट – इसमें 40 % से कम कार्बन होने से यह जलने पर सिर्फ धुआँ देता है , ताप काफी कम ।

5. पेट्रोलियम से बनने वाले वस्तुओं के नाम लिखें ।

उत्तर – पेट्रोलियम से गैसोलीन , डीजल , स्नेहक , किरासन तेल , कीटनाशक दवाएँ , पेट्रोल , साबुन , कृत्रिम रेशा , प्लास्टिक इत्यादि वस्तुएँ बनाई जाती हैं ।

6. सागर – सम्राट क्या है ?
उत्तर – मुंबई तट से 176 किमी ० पश्चिमोत्तर में अरब सागर में स्थित एक प्लेटफार्म का नाम सागर – सम्राट है , जहाँ से तेल के कुएँ खोदे जाते हैं ।
7. किन्हीं चार तेलशोधक कारखानों के नाम लिखें ।

उत्तर – भारत के चार तेलशोधक कारखाने हैं- ( i ) डिग्बोई ( असम ) , ( ii ) बरौनी ( बिहार ) , ( ii ) मुंबई ( महाराष्ट्र ) , ( iv ) मथुरा ( उत्तर प्रदेश ) ।
8. जलविद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक कारकों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर – जलविद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक कारक हैं
( i ) वर्षभर प्रचुर जल को नदी में उपलब्धता ।
( ii ) उत्पादित बिजली की माँग ।
( iii ) उत्पादन तकनीक को उपलब्धता ।
( iv ) पर्याप्त पूँजी ।
( v ) नदी मार्ग में ढाल एवं जल का तीव्र वेग ।
9. नदी घाटी परियोजनाओं को बहुउद्देशीय क्यों कहा जाता है ?
उत्तर – कुछ नदी घाटी परियोजनाओं के अंतर्गत नदियों पर बराज बनाकर सिंचाई कार्य , बिजली उत्पादन , बाढ़ नियंत्रण , मिट्टी कटाव की रोकथाम , मत्स्य पालन , यातायात को सुविधा , मनोरंजन की सुविधा इत्यादि जैसी कई उद्देश्यों को पूरा किया जाता है । इसलिए इन्हें बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ कहा जाता है ।

10. निम्नलिखित नदी घाटी परियोजनाओं के राज्यों के नाम लिखें । हीराकुंड , तुगभद्रा एवं रिहंद ।
उत्तर– हीराकुड परियोजना – – उड़ीसा
तुगभद्रा परियोजना – – आंध्र प्रदेश
रिहंद परियोजना — उत्तर प्रदेश

11. ताप शक्ति समाप्य संसाधन माना जाता है । क्यों ?
उत्तर – ताप शक्ति का उत्पादन कोयला , पेट्रोलियम जैसे अनवीकरणीय संसाधनों द्वारा होता है । इनके भंडार सीमित हैं तथा भविष्य में समाप्त हो जाएंगे । इसलिए इन पर निर्भर करनेवाले ताप शक्ति को भी समाप्य संसाधन माना जाता है ।

12. परमाणु शक्ति किन – किन खनिजों से प्राप्त होता है ? उल्लेख करें ।
उत्तर — परमाणु शक्ति यूरेनियम , थोरियम , इल्मेनाइट , एंटीमनी , ग्रेफाइट , बेनेडियम जैसे खनिजों से प्राप्त होता है ।

13. मोनाजाइट भारत में कहाँ – कहाँ पाया जाता है ?

उत्तर – मोनाजाइट भारत के केरल राज्य के साथ ही साथ तमिलनाडु , आंध्रप्रदेश और उड़ीसा के तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है ।

14. सौर ऊर्जा के उत्पादन विधि का उल्लेख करें ।

उत्तर – सौलर प्लेट पर लगे फोटोवोल्टेक सेल पर जब सूर्य की किरणें पड़ती हैं तब ये सेल सूर्य किरणों को ऊर्जा में परिवर्तित कर देती हैं , जिसे सौर ऊर्जा कहा जाता है ।
15. भारत के किन – किन राज्यों में पवन ऊर्जा के लिए अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं ?
उत्तर -भारत में पवन ऊर्जा के लिए अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियाँ राजस्थान , गुजरात , महाराष्ट्र , कर्नाटक एवं तमिलनाडु राज्यों में हैं ।

II . दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :

1. शक्ति संसाधन का वर्गीकरण कर उपयुक्त उदाहरण भी दें ।
उत्तर – शक्ति मानवीय जीवन का आधार है । इन संसाधनों के आधार पर ही औद्योगीकरण एवं नगरीकरण संभव हो पाया है । दूसरे शब्दों में ” शक्ति या ऊर्जा विकास की कुंजी है । ” शक्ति के कई साधन हैं , परंतु विभिन्न आधारों पर इनके कई वर्ग किए जा सकते हैं-
1. उपयोग के आधार पर उपयोग स्तर के आधार पर वैज्ञानिकों ने शक्ति के संसाधन को दो वर्गों में बाँटा है— ( क ) सतत शक्ति के साधन – इन साधनों में भूतापीय ऊर्जा , पवन ऊर्जा , सौर ऊर्जा इत्यादि शामिल हैं ।
( ख ) समापनीय शक्ति के साधन – इसके अंतर्गत कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस एवं परमाणु खनिज जैसे समाप्त होने वाले साधन शामिल हैं ।
2. उपयोगिता के आधार पर इस आधार पर ऊर्जा संसाधनों को दो वर्गों में बाँटा जाता है ।
( क ) प्राथमिक ऊर्जा — जैसे कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस , परमाणु खनिज इत्यादि ।
( ख ) गौण ऊर्जा — जैसे विद्युत , जो प्राथमिक खनिजों से उत्पन्न किया जाता है ।
3. स्रोत की स्थिति के आधार पर इस आधार पर भी शक्ति संसाधनों के दो वर्ग किए जाते हैं ।
( i ) क्षयशील संसाधन — जैसे – कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस इत्यादि ।
( ii ) अक्षयशील संसाधन जैसे – प्रवाही जल , सौर ऊर्जा , पवन एवं ज्वारीय तरंगें इत्यादि ।
4. संरचनात्मक गुण के आधार पर इसके तहत शक्ति संसाधनों को जैविक एवं अजैविक में बाँटा जाता है । ( i ) जैविक संसाधन – मानव एवं अन्य पशु आदि । ( ii ) अजैविक संसाधन — जल शक्ति , पवन शक्ति , सौर शक्ति इत्यादि ।
5. समय के आधार पर इस दृष्टि से इन्हें परंपरागत एवं गैर परंपरागत साधनों में बाँटा जाता है ।
( i ) परंपरागत साधन – जैसे कोयला , जल , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस ।
( ii ) गैर परंपरागत साधन – पवन , सौर , ज्वार , भूताप , बायो गैस इत्यादि ।

2. भारत के पारंपरिक शक्ति के विभिन्न स्रोतों का विवरण प्रस्तुत कीजिए ।
उत्तर — भारत में पारंपरिक शक्ति के साधनों के अंतर्गत कोयला , पेट्रोलियम , जल विद्युत , परमाणु ऊर्जा को शामिल किया जाता है ।
( i ) कोयला – कोयला पारंपरिक ऊर्जा साधनों में सबसे पुराना स्रोत है । भारत में इसकी कुल अनुमानित भंडार लगभग 25530 करोड़ टन है । यहाँ कोयला गोंडवाना और टर्शियरीकालीन चट्टानों में पाया जाता है । गोंडवाना कोयला प्रमुख भ्रंश प्रभावित नदी घाटियों के क्षेत्रों में मिलती है जिसमें दामोदर , सोन , महानदी , वर्धा एवं गोदावरी घाटी प्रमुख हैं । देश में कोयले का कुल उत्पादन 43 करोड़ टन के आस – पास है । टर्शियरी कोयला का प्रमुख भंडार तमिलनाडु के नेवेली क्षेत्र में है ।
( ii ) पेट्रोलियम – भारत में पेट्रोलियम का अनुमानित भंडार 17 अरब टन है । देश में पेट्रोलियम का उत्पादन इयोसीन और मायोसीन कालीन चट्टानों से होता है । उत्तर पूर्वी राज्य , गुजरात क्षेत्र , मुंबई हाई क्षेत्र , पूर्वी तटीय प्रदेश एवं बाडमेर क्षेत्र प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं । यहाँ से उत्पादित तेल देश के 18 तेर धनशालाओं में साफ होता है जो देश के विभिन्न भागों में फैले हैं ।
( iii ) जल विद्युत देश में जल विद्युत उत्पादन के लिए कई परियोजनाएँ विकसित हैं । इनमें भाखड़ा नांगल , दामोदर घाटी , कोसौं , हीराकुंड , रिहंद , चंबल , तुंगभद्रा इत्यादि प्रमुख परियोजनाएँ हैं ।
( iv ) परमाणु ऊर्जा भारत में परमाणु अथवा रेडियोसक्रिय खनिजों की प्रचुरता के कारण परमाणु बिजली उत्पादन की अच्छी संभावनाएं हैं । परिणामस्वरूप देश में परमाणु विद्युत गृह क्रमशः तारापुर , कोटा , कलपक्कम , नरौरा , ककरापार , कैगा एवं कुडनकुलम में स्थापित एवं कार्यरत हैं कुडनकुलम अभी निर्माणाधीन अवस्था में है ।
( v ) प्राकृतिक गैस – प्राकृतिक गैस से भी विद्युत या ऊर्जा का काम देश में लिया जा रहा है ।
3. गोंडवानाकालीन कोयले का भारत में वितरण का विवरण दीजिए ।
उत्तर – भारत में पाया जानेवाला कोयला गोंडवानाकालीन एवं टर्शियरीकालीन है । इनमें गोंडवानाकालीन कोयला का हिस्सा कुल कोयला भंडार में 96 % तथा कुल उत्पादन में 99 % है । इस कोयले का निर्माण लगभग 20 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था । आज गोंडवानाकालीन कोयला चार प्रमुख भ्रंश प्रभावित नदी घाटी क्षेत्रों में मिलती हैं । ये घाटियाँ हैं ( i ) दामोदर घाटी , ( ii ) सोन घाटी , ( ii ) महानदी घाटी , ( iv ) गोदावरी घाटी ।
वितरण – गोंडवानाकालीन कोयला भंडारों में ऐंधासाइट एवं बिटुमिनस किस्म का कोयला पाया जाता है जो देश के झारखंड , छत्तीसगढ़ , उड़ीसा , महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश , पश्चिम बंगाल राज्यों में सीमित है ।
झारखंड- झारखंड कोयला भंडार एवं उपजाऊ में देश में पहला स्थान रखता है । यहाँ देश के कुल कोयला भंडार का 30 % सुरक्षित है । यहाँ के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बोकारो , झरिया , रामगढ़ , कर्णपुरा इत्यादि शामिल हैं । यहाँ से देश के कुल कोयला उत्पादन का 23 % हिस्सा प्राप्त होता है ।
छत्तीसगढ़ – इस राज्य में कुल 15 % सुरक्षित भंडार है । यहाँ का कोयला चिरमिरी , कुरसिया , विश्रामपुर , झिलमिली , सोन्हाट एवं कोरवा देश का 16 % कोयला उत्पादित होता है ।
उड़ीसा – यहाँ देश का 1/4 कोयला का भंडार है । जिसमें तालचेर प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है । महाराष्ट्र – यहाँ देश का 3 % कोयला है जहाँ चाँदा , वर्धा , कांपटी एवं बंदर से देश का 9 % कोयला उत्पादित होता है ।
मध्य प्रदेश – यहाँ 7 % कोयला भंडार है । यहाँ के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्रों में सिंगरौली , सोहागपुर , उमरिया , पेंच , मोहपानी इत्यादि हैं । पश्चिम बंगाल — यहाँ रानीगंज देश का प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र स्थित है । इसके अतिरिक्त आंध्र प्रदेश में भी कोयला का उत्पादन होता है । देश में कोयले का कुल उत्पादन 2006-07 में 43 टन करोड़ टन के लगभग हुआ ।
4. कोयले का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को लिखें ।
उत्तर – कोयला ऊर्जा देने वाला पारंपरिक स्रोत है । यह चार प्रकार का होता है ।
( i ) ऐंथासाइट – इस प्रकार के कोयला में कार्बन की मात्रा 80 % से अधिक होती है तथा नमी नहीं के बराबर होती है । परिणामस्वरूप , जलाने या जलने पर यह कोयला ताप अधिक देता है एवं इससे धुआँ नहीं निकलता है । इसलिए इसे कोयला का सर्वोत्तम किस्म कहा जाता है । अधिक देर तक ऊष्मा देनेवाला यह कोयला कोकिंग – कोयला भी कहा जाता है , जो धातु गलाने में उपयोग किया जाता है!
( ii ) बिटुमिनस – इस प्रकार के कोयले की किस्म में कार्बन की मात्रा 60-80 % तक होती है । फलत : जलने पर यह ऊष्मा और धुआँ दोनों प्रदान करता है । भारत का अधिकांश कोयला इसी कोटि का है । इसे परिष्कृत कर ‘ कोकिंग कोयला ‘ बनाया जा सकता है
( iii ) लिग्नाइट – इसे निम्न कोटि का कोयला माना जाता है , जिसमें कार्बन की मात्रा 30 60 % तक होती है । नमी की उपस्थिति के कारण जलने पर यह ऊष्मा या ताप कम देता है तथा धुआँ अधिक देता है । इसे ही ‘ भूरा कोयला ‘ कहा जाता है ।
( iv ) पीट कोयला — यह निम्नतम कोटि का कोयला है जिसमें कार्बन की मात्रा 30 % से कम होती है । फलतः जलने पर यह धुआँ अत्यधिक देता है तथा ताप अत्यधिक कम । ऐंथ्रासाइट एवं विटुमिनस किस्म का कोयला गोंडवाना समूह के चट्टानों में पाया जाता है जबकि टर्शियरीकालीन अवसादीय चट्टानों में लिग्नाइट पाया जाता है । पीट दलदली भागों में पाया जाता है ।

5 .  भारत में खनिज तेल के वितरण का वर्णन कीजिए ।
उत्तर – भारत में खनिज तेल का भंडार लगभग 17 अरब टन है जो विश्व का मात्र 1 % है । देश में पहली बार डिग्बोई में तेल खोदा गया था । इसके बाद देश के कई हिस्सों में खनिज तेल का पता लगाया गया , जहाँ से इसका उत्पादन भी रहा है । वितरण- वर्तमान समय में खनिज तेल के देश में पाँच प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं ( i ) उत्तर – पूर्वी राज्य – यह देश का सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है । आज असम के अतिरिक्त नागालैंड एवं अरुणाचल प्रदेश में भी तेल की खोज की गई है । यहाँ के प्रमुख उत्पादक केन्द्रों में नहरकटिया , सुगड़ीजन , डिग्बोई , मोरन , लखीमपुर , रूद्रसागर , बोरहोल्ला इत्यादि है । यहाँ का तेल साफ होने के लिए डिग्बोई , नूनकाटी , बोगाई गाँव , बरौनी एवं हल्दिया भेजा जाता है ।
( ii ) गुजरात क्षेत्र यहाँ खंभात की खाड़ी के अतिरिक्त गुजरात के मैदान में भी तेल मिले हैं । प्रमुख उत्पादक केन्द्रों में अंकलेश्वर , कलोल , कोसंबा , सानंद , मेहसाणा , दबका , लुनेज , बड़ोदरा , नवगाँव इत्यादि हैं ।
( iii ) मुंबई हाई क्षेत्र -1975 से तेल उत्पादन करनेवाला यह क्षेत्र अरब सागर में स्थित है जो वर्तमान में देश का सर्वाधिक तेल उत्पादन करनेवाला क्षेत्र है । इसके अतिरिक्त कई अन्य तेल कुआँ से भी तेल का उत्पादन किया जा रहा है |
( iv ) पूर्वी तटीय प्रदेश यहाँ कृष्णा – गोदावरी और कावेरी नदियों की घाटियों में तेल मिला है जिसमें नारीमनन एवं कोविलकप्पल प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं । ( v ) बाडमेर बेसिन यहाँ से सितंबर 2009 में तेल का उत्पादन शुरू हुआ है । यहाँ से प्रतिदिन 56000 बैरल तेल का उत्पादन हो रहा है । देश में उत्पादित कुल तेल का परिष्करण देश में स्थापित 18 तेल परिष्करणशालाओं में किया जाता है ।
6. जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक आर्थिक कारकों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर – जल विद्युत पपिरिक ऊर्जा के स्रोत हैं । यह ऐसा अक्षयशील संसाधन हैं जो नवीकरणीय है तथा विद्युत उत्पादन का एक प्रमुख स्रोत है । नदी या किसी अन्य रूप में तीन वेग से प्रवाहित जल से उत्पन्न की जाने वाली शक्ति को जल विद्युत शक्ति कहा जाता है । बहते हुए जल को तीव्र गति से गिराकर टरबाइन को घुमाया जाता है तब इस ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती है जल विद्युत उत्पादन के लिए अनुकूल भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों में मुख्य हैं –
( i ) नदी में वर्षभर पर्याप्त जल की मात्रा का रहना । ( ii ) नदी मार्ग में ढाल का होना ।
( iii ) जल का तीव्र वेग होना ।
( iv ) प्राकृतिक जलप्रपात का होना ।
( v ) जल एकत्र करने के लिए विशाल क्षेत्रफल का होना ।
( vi ) क्षेत्र में विद्युत की माँग का होना ।
( vii ) उत्पादन तकनीक का ज्ञान होना ।
( viii ) जल विद्युत उत्पाद तकनीक विकास हेतु पर्याप्त पूँजी का होना ।
( ix ) निकटवर्ती क्षेत्र में दूसरे ऊर्जा उत्पादन संसाधन का अभाव होना ।
( x ) निकटवर्ती क्षेत्र में उद्योग एवं वाणिज्य का आबाद होना ।
( xi ) परिवहन के साधन का विकसित होना ।
7. संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखिए :
         भाखड़ा – नंगल परियोजना , दामोदर घाटी परियोजना , कोसी परियोजना , हीराकुंड परियोजना , रिहन्द परियोजना और तुगभद्रा परियोजना ।

उत्तर –
भाखड़ा नंगल परियोजना – यह सतलज नदी पर निर्मित न केवल भारत की सबसे बड़ी नदी परियोजना है बल्कि , यह विश्व का सबसे ऊँचा बांध है । इसकी ऊँचाई 225 मीटर है । इस पर चार शक्ति गृह स्थापित हैं , जो 7 लाख किलोवाट विद्युत उत्पन्न कर पंजाब , हरियाणा , दिल्ली , उत्तरांचल , उत्तरप्रदेश , हिमाचल प्रदेश , राजस्थान तथा जम्मू – कश्मीर जैसी राज्यों की कृषि एवं औद्योगिक प्रगति में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है |

दामोदर घाटी परियोजना – झारखंड एवं प . बंगाल को दामदेर नदी की प्रलयंकारी बाढ़ से बचाने के लिए एवं जल विद्युत उत्पादन करने के लिए तिलैया , मैथन , कोनार और पंचेत पहाड़ी में बाँध बनाकर इस परियोजना का विकास किया गया है । यहाँ 1300 मेगावाट जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है , जिसका लाभ बिहार , झारखंड एवं प . बंगाल को प्राप्त है ।

कोसी परियोजना –. विहार की अभिशाप कोसी नदी पर हनुमान नगर ( नेपाल ) में बांध बनाकर इस परियोजना से 20,000 किलो वाट विद्युत उत्पन्न किया जाता है । इराकी आधी बिजली नेपाल और शेष बिहार में खपत किया जाता है ।

हीराकुण्ड परियोजना – यह महानदी पर निर्मित विश्व की सबसे लंबी ( 4801 मीटर ) परियोजना है । जहाँ 2.7 लाख किलोवाट विद्युत का उत्पादन होता है , जिसका उपयोग उड़ीसा एवं सीमावर्ती राज्यों द्वारा किया जाता है ।

रिहन्द परियोजना – सोन को सहायक नदी रिहन्द पर उत्तर प्रदेश में 934 मीटर लंबा बांध लगाकर कृत्रिम झील ‘ गोविन्द बल्लभ पंत सागर ‘ का निर्माण कर 30 लाख किलोवाट विद्युत उत्पन्न की जाती है । इससे रेणुकुट के विविध औद्योगिक प्रतिष्ठान लाभान्वित होते हैं ।

तुंगभद्रा परियोजना –आंध्र प्रदेश स्थित द . भारत की यह सबसे बड़ी परियोजना है जो कृष्णा की सहायक नदी तुंगभद्रा पर निर्मित है । इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता 1 लाख किलोवाट है । इसका निर्माण कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश राज्य के सहयोग से हुआ है ।

8. भारत के चार परमाणु विद्युत गृहों का नाम लिखकर उनकी विशेषताओं को लिखिए ।
उत्तर -भारत में रेडियो सक्रिय खनिजों की प्रचुरता के कारण परमाणु विद्युत उत्पादन की पुरी संभावनाएँ मौजूद हैं । देश में यूरेनियम का मुख्य भंडार झारखंड के जादूगोडा में है । पर्याप्त माँग एवं उत्पादन तकनीक मौजूद होने के कारण देश में सर्वप्रथम 1955 में पहला आण्विक स्पेिक्टर मुंबई के निकट ट्राम्बे में स्थापित किया गया । वर्तमान समय में देश में 6 परमाणु विद्युत गृह कार्यरत हैं । इनमें से चार प्रमुख हैं ( i ) तारापुर परमाणु संयंत्र भारत का यह पहला परमाणु विद्युत शक्ति उत्पादन गृह है जो एशिया में सबसे बड़ा है । इस केन्द्र में यूरेनियम के स्थान पर थोरियम को इनरिच करके प्लूटोनियम बनाकर उससे विद्युत उत्पन्न किया जा रहा है । जल उबालने के लिए यहाँ 200 मेगावाट क्षमता वाले दो – द्रो परमाणु भट्टियाँ लगी हैं ।
( ii ) राणा प्रताप सागर परमाणु संयंत्र – राजस्थान के कोटा शहर में यह विद्युत उत्पादन केन्द्र चंबल नदी के किनारे स्थापित है । कनाडा के सहयोग से बने इस विद्युत गृह की उत्पादन क्षमता 100 मेगावाट है । ( iii ) कलपक्कम परमाणु संयंत्र तमिलनाडु के कल्पक्कम स्थान पर विकसित यह परमाणु बिजली घर पूर्णतः स्वदेशी प्रयास से बना है । यहाँ 335 मेगावाट विद्युत उत्पादन के दो रिएक्टर काम कर रहे हैं ( iv ) नरौरा परमाणु संयंत्र उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर के पास नरौरा में स्थापित परमाणु बिजली उत्पादन गृह का निर्माण माँग आधारित है । निकटवर्ती क्षेत्रों में उद्योगों के विकास के कारण यहाँ 235 मेगावाट के दो रिएक्टर कार्यरत हैं ।
9. ऊर्जा संसाधनों के संरक्षण हेतु आवश्यक सुझाव दीजिए ।
उत्तर – ऊर्जा के परंपरागत स्रोत या संसाधन सभी क्षयशील या समाप्त होने वाले संसाधन हैं । परंतु ऊर्जा या शक्ति के बिना औद्योगिक विकास अथवा आर्थिक विकास संभव नहीं है । साथ ही साथ ऊर्जा के गैर – परंपरागत स्रोत वृहत् स्तर पर परंपरागत स्रोत के विकल्प का स्थान नहीं ले पाए हैं । इसलिए सतत् विकास के लिए यह आवश्यक है कि ऊर्जा संसाधनों को संरक्षित किया जाए । ऊर्जा संकट एक विश्वव्यापी समस्या है । अतः इसके समाधान के लिए अथवा ऊर्जा संसाधनों के संरक्षण हेतु कुछ मुख्य उपयोगी सुझाव इस प्रकार हैं-
( i ) ऊर्जा के उपयोग में मितव्ययिता अपनाई जाए – ऊर्जा के उपयोग में मितव्ययिता का संबंध इन संसाधनों के बचत से है । ऐसी तकनीक का विकास एवं उपयोग किया जाना चाहिए जिससे कम ऊर्जा खपत में अधिक शक्ति मिल सके । नए मोटरगाड़ियों , मोटरसाइकिल का निर्माण , सी . एफ . ए . बल्ब का निर्माण इस दिशा में उपयोगी है ।
( ii ) ऊर्जा के नवीन क्षेत्रों की खोज की जाए – इसका संबंध उपलब्ध ऊर्जा संसाधनों के नए भंडारों की खोज से है । देश में पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस के नए भंडारों की खोज इसी उद्देश्य से की जा रही है । इनके लिए नवीन सुदूर संवेदी सूचना तकनीक का भी उपयोग बढ़ा है ।
( iii ) नवीन वैकल्पिक संसाधनों की खोज की जाए – इसका तात्पर्य यह है कि ऊर्जा की बढ़ती माँग को देखते हुए नवीन तकनीक के सहारे ऊर्जा के नए वैकल्पिक स्रोतों की खोज की जानी चाहिए । साथ ही गैर – परंपरागत ऊर्जा साधनों के वृहत् स्तर पर उपयोग की दिशा में भी शोध एवं कार्य किए जाने चाहिए । ( iv ) अंतर्राष्ट्रीय सहयोग इस दिशा में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बैठकर इस दिशा में विचार – विमर्श करना आवश्यक है|
( v ) जागरूकता फैलाना जरूरी – ऊर्जा संसाधन के मितव्ययिता एवं संरक्षण हेतु लोगों के बीच विशेषकर बच्चों के बीच जागरूकता फैलाना जरूरी है ।

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