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Surdas Biography In Hindi – सूरदास की जीवनी

Surdas Biography In Hindi – सूरदास की जीवनी

Surdas Biography In Hindi

‘सूरदास’ का जन्म सन 1478 ई० में हुआ था। इनके जन्मस्थान के बारे में मतभेद है। कुछ विद्वान इनका जन्मस्थान आगरा से मथुरा जाने वाली सड़क पर स्थित रुनकता नामक ग्राम को मानते हैं जबकि कुछ इनका जन्मस्थान दिल्ली के निकट ‘सीही’ ग्राम मानते हैं।सूरदास 15 वी शताब्दी के अंधे संत, कवी और संगीतकार थे। सूरदास का नाम भक्ति की धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सर्वोपरि है। सूरदास अपने भगवान कृष्ण पर लिखी भक्ति गीतों के लिये जाने जाते है। सूरदास जी की रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण के भाव स्पष्ट देखने को मिलते हैं। जो भी उनकी रचनाओं को पढ़ता है वो कृष्ण की भक्ति में डूब जाता है।उन्होंने अपनी रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण का श्रृंगार और शांत रस में दिल को छू जाने वाला मार्मिक वर्णन किया हैं। सूरदास जी, को हिन्दी साहित्य की अच्छी जानकारी थी, अर्थात उन्हें हिन्दी साहित्य का विद्धान माना जाता था।

नाम (Name) सूरदास (Surdas)
जन्म (Birthday) संवत् 1535 विक्रमी (स्पष्ट नहीं है)
जन्मस्थान (Birthplace) रुनकता
पिता का नाम (Father Name) रामदास सारस्वत
गुरु (Guru) बल्लभाचार्य
पत्नी का नाम (Wife Name) आजीवन अविवाहित
मृत्यु (Death) संवत् 1642 विक्रमी (स्पष्ट नहीं है)
कार्यक्षेत्र कवि
रचनायें सूरसागर, सूरसारावली,साहित्य-लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो

सूरदास जीवन परिचय :-

कुछ लोग कहते है की सूरदास ( Surdas ) जी का प्राथमिक नाम मदन मोहन था | बाद में उनका नाम सूरदास ( Surdas )पड़ा कुछ लोग श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास ( Surdas )का जन्म 1478 ई0 ( संवत् 1607 ई0 ) में रुनकता नामक गाँव में हुआ था। यह गाँव मथुरा और आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ लोग कहते है कि सूरदास ( Surdas ) का जन्म सीही गांव में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसके बाद ये आगरा से आगे गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास ( Surdas ) के पिता, रामदास गायक थे। सुरदास जन्म से ही अंधे थे , सूरदास ( Surdas ) के जन्म से अंधे होने के कई मत है श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास ( Surdas ) आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं पर उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई थी उसके बाद वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनकी शिक्षा को पूर्ण करके उनको कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया था।

सूरदास जी कैसे अंधे हुए थे :-

सूरदास ( Surdas ) ( मदन मोहन) जी प्रतिदिन नदी के किनारे जाकर गीत लिखा करते थे। एक दिन एक लड़की ने उसका मन को मोह लिया था । वह लड़की एक दिन नदी के किनारे पर बैठी कपडे धो रही थी सूरदास ( Surdas ) ( मदन मोहन ) जी का ध्यान उसकी और चला गया और पुरे ध्यान से उस लड़की को देखने लगे । एक दिन वह लड़की उनके पास आई और आकर बोली आप सूरदास ( Surdas ) ( मदन मोहन ) जी हो तो वह बोले हां मैं ( मदन मोहन ) सूरदास हूँ। और में कविताये और गीत लिखता हूँ तथा उनको गाता हूँ |उसके बाद जब यह बात सूरदास ( Surdas ) ( मदन मोहन ) के पिता को पता चली तो उनको बहुत क्रोधित हुए । फिर सूरदास ( Surdas ) जी घर को छोड़ कर चले गए । सूरदास ( Surdas ) मदन मोहन जी एक दिन मंदिर मे बैठे थे तभी वह एक सुन्दर स्त्री आई । मदन मोहन उनके पीछे चल दिए जब वह उसके घर पहुंचे तो उसके पति ने दरवाजा खोला और समानं के साथ उन्हें बिठाया फिर मदन मोहन ने दो जलती हुए सिलाया मांगी तथा उसे अपनी आँख में डाल दी ।

सूरदास जी ने गुरू बल्लभाचार्य से ली शिक्षा:-

एक बार जब सूरदास जी अपनी वृन्दावन धाम की यात्रा के लिए निकले तो इस दौरान इनकी मुलाकात बल्लभाचार्य से हुई। जिसके बाद वह उनके शिष्य बन गए। गौऊघाट पर ही उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और बाद में वह इनके शिष्य बन गए।महाकवि सूरदास ने  बल्लभाचार्य से ही भक्ति की दीक्षा प्राप्त की। श्री वल्लभाचार्य ने सूरदास जी को सही मार्गदर्शन देकर श्री कृष्ण भक्ति के लिए प्रेरित किया।आपको बता दें कि भक्तिकाल के महाकवि सूरदास जी और उनके गुरु वल्लभाचार्य के बारे में एक रोचक तथ्य यह भी हैं कि सूरदास और उनकी आयु में महज 10 दिन का अंतर था।विद्धानों के मुताबिक गुरु बल्लभाचार्य का जन्म 1534 में वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए कई विद्धान सूरदास का जन्म भी 1534  की वैशाख शुक्ल पंचमी के आसपास मानते हैं।आपको बता दें कि सूरदास जी के गुरु बल्लभाचार्य, अपने शिष्य को अपने साथ गोवर्धन पर्वत मंदिर पर ले जाते थे। वहीं पर ये श्रीनाथ जी की सेवा करते थे, और हर दिन दिन नए पद बनाकर इकतारे के माध्यम से उसका गायन करते थे।बल्लभाचार्य ने ही सूरदास जी को ही ‘भागवत लीला’ का गुणगान करने की सलाह दी थी। इसके बाद से ही उन्होंने श्रीकृष्ण का गुणगान शुरू कर दिया था। उनके गायन में श्री कृष्ण के प्रति भक्ति को स्पष्ट देखा जा सकता था।इससे पहले वह केवल दैन्य भाव से विनय के पद रचा करते थे। उनके पदों की संख्या ‘सहस्राधिक’ कही जाती है, जिनका संग्रहित रूप ‘सूरसागर’ के नाम से काफी मशहूर  है।

कृष्ण भक्त के रूप में सूरदास जी:-

अपने गुरु बल्लभाचार्य से शिक्षा लेने के बाद सूरदास जी पूरी तरह से भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लीन हो गए। सूरदास जी की कृष्ण भक्ति के बारे में कई सारी कथाएं प्रचलित हैं।एक कथा के मुताबिक, एक बार सूरदास जी श्री कृष्ण की भक्ति नें इतने डूब गए थे कि वे कुंए में तक गिर गए थे, जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने खुद साक्षात दर्शन देकर उनकी जान बचाई थी।जिसके बाद देवी रूकमणी ने श्री कृष्ण से पूछा था कि, हे भगवन, तुमने सूरदास की जान क्यों बचाई। तब कृष्ण भगवान ने रुकमणी को कहा के सच्चे भक्तों की हमेशा मदद करनी चाहिए, और सूरदास जी उनके सच्चे उपासक थे जो निच्छल भाव से उनकी आराधना करते थे।उन्होंने इसे सूरदास जी की उपासना का फल बताया, वहीं यह भी कहा जाता है कि जब श्री कृष्ण ने सूरदास की जान बचाई थी तो उन्हें नेत्र ज्योति लौटा दी थी। जिसके बाद सूरदास ने अपने प्रिय कृष्ण को सबसे पहले देखा था।इसके बाद श्री कृष्ण ने सूरदास की भक्ति से प्रसन्न होकर उनसे वरदान मांगने को कहा। जिसके बाद सूरदास ने कहा कि – मुझे सब कुछ मिल चुका हैं और सूरदास जी फिर से अपने प्रभु को देखने के बाद अंधा होना चाहते थे।क्योंकि वे अपने प्रभु के अलावा अन्य किसी को देखना नहीं चाहते थे। फिर क्या था भगवान श्री कृष्ण ने अपने प्रिय भक्त की मुराद पूरी कर दी और उन्हें फिर से उनकी नेत्र ज्योति छीन ली। इस दौरान भगवान श्री कृष्ण ने सूरदास जी को आशीर्वाद दिया कि उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैले और उन्हें हमेशा याद किया जाए।

सूरदास जी की प्रमुख रचनाये :-

(1.) सूरसागर-
(2.) सूरसारावली-
(3.) साहित्य लहरी –
(4.) नल दमयन्ती-
(5.) ब्याहलो-

सूरदास जी की सम्लित रचनाये :-

1. भाव भगति है जाकें के पद,
2. चरन कमल बंदौ हरिराई ,
3. मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे ,
4. प्रीति करि काहु सुख न लह्यो ,
5. निसिदिन बरसत नैन हमारे,
6. प्रीति करि काहू सुख न लह्यो ,
7. दृढ इन चरण कैरो भरोसो ,
8. तिहारो दरस मोहे भावे ,
9. बिनु गोपाल बैरिन भई कुंजैं ,
10. भोरहि सहचरि कातर दिठि,
11. ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी,
12. मधुकर! स्याम हमारे चोर ,
13. अंखियां हरि–दरसन की प्यासी ,
14. चरन कमल बंदौ हरि राई,

सूरदास जी के द्वारा लिखे गए भजन :-

1. देखे मैं छबी आज अति बिचित्र हरिकी
2. श्रीराधा मोहनजीको रूप निहारो
3. बासरी बजाय आज रंगसो मुरारी
4. जागो पीतम प्यारा लाल
5. ऐसे भक्ति मोहे भावे उद्धवजी
6. दरसन बिना तरसत मोरी अखियां
7. सावरे मोकु रंगमें बोरी बोरी
8. हमसे छल कीनो काना नेनवा लगायके
9. जमुनाके तीर बन्सरी बजावे कानो
10. मधुरीसी बेन बजायके
11. काहू जोगीकी नजर लागी है
12. शाम नृपती मुरली भई रानी
13. कमलापती भगवान
14. उधो मनकी मनमें रही
15. नारी दूरत बयाना रतनारे
16. अति सूख सुरत किये
17. मुरली कुंजनीनी कुंजनी बाजती
18. तुमको कमलनयन कबी गलत
19. राधे कृष्ण कहो मेरे प्यारे
20. नंद दुवारे एक जोगी आयो
21. देख देख एक बाला जोगी
22. रसिक सीर भो हेरी लगावत
23. नेक चलो नंदरानी उहां लगी
24. देखो माई हलधर गिरधर जोरी
25. नेननमें लागि रहै गोपाळ
26. सुदामजीको देखत श्याम हसे
27. महाराज भवानी ब्रह्म भुवनकी रानी
28. फुलनको महल फुलनकी सज्या
29. कायकूं बहार परी
30. सुदामजीको देखत श्याम हसे
31. महाराज भवानी ब्रह्म भुवनकी रानी
32. हरि जनकू हरिनाम बडो धन
33. ऐसे संतनकी सेवा
34. जयजय नारायण ब्रह्मपरायण
35. मन तोये भुले भक्ति बिसारी
36. बेर बेर नही आवे अवसर
37. केत्ते गये जखमार भजनबिना
38. क्यौरे निंदभर सोया मुसाफर
39. जनम सब बातनमें बित गयोरे
40. देखो ऐसो हरी सुभाव
41. सब दिन गये विषयके हेत
42. जय जय श्री बालमुकुंदा
43. निरधनको धनि राम
44. अद्भुत एक अनुपम बाग
45. तबमें जानकीनाथ कहो

सूरदास जी के द्वारा लिखे गए पद :-

पद नo- 1
चरन कमल बंदौ हरि राई ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई ||

पद नo- 2
अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥
परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातों सूर सगुन लीला पद गावै

पद नo- 3
मोहिं प्रभु तुमसों होड़ परी।
ना जानौं करिहौ जु कहा तुम नागर नवल हरी॥
पतित समूहनि उद्धरिबै कों तुम अब जक पकरी।
मैं तो राजिवनैननि दुरि गयो पाप पहार दरी॥
एक अधार साधु संगति कौ रचि पचि के संचरी।
भ न सोचि सोचि जिय राखी अपनी धरनि धरी॥
मेरी मुकति बिचारत हौ प्रभु पूंछत पहर घरी।
स्रम तैं तुम्हें पसीना ऐहैं कत यह जकनि करी॥
सूरदास बिनती कहा बिनवै दोषहिं देह भरी।
अपनो बिरद संभारहुगै तब यामें सब निनुरी
पद नo- 4
कब तुम मोसो पतित उधारो।
पतितनि में विख्यात पतित हौं पावन नाम तिहारो॥
बड़े पतित पासंगहु नाहीं अजमिल कौन बिचारो।
भाजै नरक नाम सुनि मेरो जमनि दियो हठि तारो॥
छुद्र पतित तुम तारि रमापति जिय जु करौ जनि गारो।
सूर पतित कों ठौर कहूं नहिं है हरि नाम सहारो.
पद नo- 5
अपन जान मैं बहुत करी।
कौन भांति हरि कृपा तुम्हारी सो स्वामी समुझी न परी॥
दूरि गयौ दरसन के तां व्यापक प्रभुता सब बिसरी।
मनसा बाचा कर्म अगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी॥
गुन बिनु गुनी सुरूप रूप बिनु नाम बिना श्री स्याम हरी।
कृपासिंधु अपराध अपरिमित छमौ सूर तैं सब बिगरी.
पद नo- 6
सो रसना जो हरिगुन गावै।
नैननि की छवि यहै चतुरता जो मुकुंद मकरंदहिं धावै॥
निर्मल चित तौ सो सांचो कृष्ण बिना जिहिं और न भावै।
स्रवननि की जु यहै अधिका सुनि हरि कथा सुधारस प्यावै॥
कर तै जै स्यामहिं सेवैं चरननि चलि बृन्दावन जावै।
सूरदास जै यै बलि ताको जो हरिजू सों प्रीति बढ़ावै ||

मृत्यु :-

सूरदास की मृत्यु वर्ष 1580 ईस्वी में हुई थी। सूरदास का जीवन काल “वर्ष 1478 से वर्ष 1580 तक” यानी कुल 102 वर्ष का रहा था। अपने दिर्ध आयु जीवन काल में सूरदास ने कई ग्रंथ लिखे और काव्य पद की रचना की। सूरदास का जीवन कृष्ण भक्ति के लिए समर्पित था।

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