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Parashurama biography in hindi – भगवान परशुराम का इतिहास

Parashurama history, story – भगवान परशुराम का इतिहास

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Parashurama biography in hindi

भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे जिनकी माता रेणुका थी जिनके वे पाचवी सन्तान थे, ऋषि जमदग्नि वही ऋषि थे जिनको सप्तऋषियों में स्थान है, भगवान परशुराम को भगवान श्रीहरी विष्णु के छटवे अवतार माने जाते है, जो की क्रोधित मुनि थे, इनके बारे में कहा जाता है की भगवान परशुराम ने 21 बार इस धरती को छत्रिय विहीन कर दिया था, और कहा जाता है की इन्होने अपनी माँ का गला काट दिया था, और फिर पिता के आशीर्वाद से उन्होंने अपनी माता को पुनर्जीवित कर दिया था.

परशुराम जयंती हिन्दू पंचांग के वैशाख माह की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है. इसे “परशुराम द्वादशी” भी कहा जाता है. अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन दिये गए पुण्य का प्रभाव कभी खत्म नहीं होता . अक्षय तृतीया से त्रेता युग का आरंभ माना जाता है. इस दिन का विशेष महत्व है.

भारत में हिन्दू धर्म को मानने वाले अधिक लोग हैं. मध्य कालीन समय के बाद जब से हिन्दू धर्म का पुनुरोद्धार हुआ है, तब से परशुराम जयंती का महत्व और अधिक बढ़ गया है. इस दिन उपवास के साथ साथ सर्व ब्राह्मण का जुलूस, सत्संग भी सम्पन्न किए जाते हैं.

परशुराम दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है. परशु अर्थात “कुल्हाड़ी” तथा “राम”. इन दो शब्दों को मिलाने पर “कुल्हाड़ी के साथ राम” अर्थ निकलता है. जैसे राम, भगवान विष्णु के अवतार हैं, उसी प्रकार परशुराम भी विष्णु के अवतार हैं. इसलिए परशुराम को भी विष्णुजी तथा रामजी के समान शक्तिशाली माना जाता है.

भगवान परशुराम:-

भगवान परशुराम का जन्म त्रेतायुग के शुरू और सतयुग के अंत काल में हुआ था, जो की भगवान विष्णु के छटवे अवतार माने जाते है, इनके पिता का नाम ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका थी, पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म इनके पिता द्वारा किये गये पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था, जो की इनकी माता रेणुका से इनका जन्म बैसाख महीने के शुक्ल तृतीया को इनका जन्म हुआ था.जमदग्नि के पुत्र होने के कारण इनका नाम जामदग्न्य और शिव जी मिले परशु के कारण इनका नाम परशुराम पड़ा था. बाल्यकाल में ही भगवान परशुराम ने अपने माता पिता से अस्त्र-शस्त्र की विद्या सीख लिया था.  और उनमे जन्म से दैवीय गुण के विलक्षण प्रतिभा दिखने लग गया था.परशुराम का जन्म भले ही ब्राह्मण कुल में हुआ था लेकिन वे जन्म से ही क्षत्रिय गुणों वाले थे, एक बार की बात है, इनके पिता जब यज्ञ में तल्लीन थे तो इनकी माता जल लेने नदी चली गयी, जहा पर राजा चित्ररथ स्नान कर रहे थे, जिन्हें देखकर इनकी माता रेणुका आसक्त हो गयी थी, जिस बात को इनके पिता जमदग्नि ने अपने तप के बल से अपनी पत्नी का कृत्य जान चुके थे, फिर उन्होंने अपने पांचो पुत्रो को माता का वध करने का आदेश दिया, लेकिन दयावश किसी ने अपनी माता का वध नही किया.तो फिर पिता का आदेश पाकर भगवान परशुराम तुरंत अपनर फरसे से अपनी माता का गला कांट दिया, जिससे उनके पिता अपने पुत्र की आज्ञा मानने से प्रसन्न हो गये, जिससे फिर प्रसन्न होकर वरदान मागने को कहा तो भगवान परशुराम ने अपनी माता का जीवनदान मांग लिया, जिसके बाद ऋषि जमदग्नि ने वापस अपनी पत्नी को जिन्दा कर दिया.

भगवान परशुराम अस्त्र (Parshuram Astra):

  • परशुराम का मुख्य अस्त्र “कुल्हाड़ी” माना जाता है. इसे फारसा, परशु भी कहा जाता है. परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्मे तो थे, परंतु उनमे युद्ध आदि में अधिक रुचि थी. इसीलिए उनके पूर्वज च्यावणा, भृगु ने उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने की आज्ञा दी. अपने पूर्वजों कि आज्ञा से परशुराम ने शिवजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया. शिवजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. तब परशुराम ने हाथ जोड़कर शिवजी की वंदना करते हुए शिवजी से दिव्य अस्त्र तथा युद्ध में निपुण होने कि कला का वर मांगा. शिवजी ने परशुराम को युद्धकला में निपुणता के लिए उन्हें तीर्थ यात्रा की आज्ञा दी. तब परशुराम ने उड़ीसा के महेन्द्रगिरी के महेंद्र पर्वत पर शिवजी की कठिन एवं घोर तपस्या की.
  • उनकी इस तपस्या से एक बार फिर शिवजी प्रसन्न हुए. उन्होनें परशुराम को वरदान देते हुए कहा कि परशुराम का जन्म धरती के राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ है. इसीलिए भगवान शिवजी ने परशुराम को, देवताओं के सभी शत्रु, दैत्य, राक्षस तथा दानवों को मारने में सक्षमता का वरदान दिया.
  • परशुराम युद्धकला में निपुण थे. हिन्दू धर्म में विश्वास रखने वाले ज्ञानी, पंडित कहते हैं कि धरती पर रहने वालों में परशुराम और रावण के पुत्र इंद्रजीत को ही सबसे खतरनाक, अद्वितीय और शक्तिशाली अस्त्र – ब्रह्मांड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र तथा पशुपत अस्त्र प्राप्त थे.
  • परशुराम शिवजी के उपासक थे. उन्होनें सबसे कठिन युद्धकला “कलारिपायट्टू” की शिक्षा शिवजी से ही प्राप्त की. शिवजी की कृपा से उन्हें कई देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्राप्त हुए थे.
  • “विजया” उनका धनुष कमान था, जो उन्हें शिवजी ने प्रदान किया था.

भगवान परशुराम के 21 बार छत्रियो के संहार की रोचक कहानी

Amazing Story of Parshuram in Hindi

एक बार की बात है, जब महिष्मती देश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन जो की सहत्रार्जुन के नाम से भी जाना जाता था, रास्ते से गुजर रहे है, तो अपनी थकावट के चलते ऋषि जमदग्नि के आश्रम के पास आराम करने के लिए जगह माँगा, तो ऋषि जमदग्नि ने विश्राम के लिए उचित स्थान का प्रबंध कर दिया और देवराज इंद्र द्वारा मिले कामधेनु गाय की कृपा से राजा सहित पूरी सेना को भोजन पानी आदि की व्यवस्था करा दी. इतने विशाल सेना और लोगो के अचानक से भोजन पानी की व्यवस्था से राजा कार्तवीर्य अर्जुन चकित रह गया और इसका बारे में ऋषि जमदग्नि से पूछा तो ऋषि जमदग्नि ने बताया की यह अलौकिक गाय माता कामधेनु की कृपा बताया,

फिर लालचवश राजा ने ऋषि जमदग्नि से वह माँगा तो ऋषि जमदग्नि ने उसे देने से साफ़ साफ मना कर दिया, जिसके बाद राजा ने अपने बल से उस कामधेनु गाय को ऋषि जमदग्नि के आश्रम से छुड़ा ले गये. जिस कारण से ऋषि जमदग्नि बहुत ही क्रोधित हुए और यह सारी बात अपने पुत्र परशुराम को बताया, परशुराम जी पिता के अपमान की बात सुनकर बहुत ही क्रोधित हुए और अपने पिता के अपमान का बदला लेने का प्रण किया.

इसके बाद भगवान परशुराम राजा कार्तवीर्य के राज दरबार में पहुच गये और वही पर अपने परसु (फरसे) से सहत्रार्जुन के हजार भुजाओ सहित उसका सर धड से अलग कर दिया, जिसके बाद अपने पिता के बदला लेने हुए सहत्रार्जुन के पुत्रो ने धोखे से ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दिया, जिनके मृत्यु के वियोग में उनकी माता रेणुका भी अपने पति ऋषि जमदग्नि के चिताग्नि में खुद को सती कर लिया.

ये सारी घटना जानने के बाद भगवान परशुराम बहुत ही क्रोधित हुए और फिर सहत्रार्जुन के सभी पुत्रो के साथ इक्कीस बार पूरे धरती को छत्रिय विहीन (हैहयवंशी समाज के छत्रिय) कर दिया.

महाभारत काल में भगवान परशुराम की कथाये

Parshuram Mahabharat Story in Hindi

भगवान परशुराम को अमरत्व प्रदान है इसलिए वे त्रेतायुग के बाद भी महाभारत काल यानि द्वापरयुग में उनके होने का जिक्र मिलता है,

जब कर्ण को गुरु द्रोणाचार्य ने सूतपुत्र होने कारण शस्त्र विद्या देने से मना कर दिया था तो कर्ण भगवान परशुराम के पास गये, और फिर यह सारी बात बता दिया, भगवान परशुराम जो की सिर्फ ब्राह्मणों को अपना शस्त्र- शास्त्र की शिक्षा देते थे, और छत्रियो को शिक्षा देने के विरुद्ध थे, और फिर सूतपुत्र होने कारण भगवान परशुराम ने कर्ण को अपना शिष्य बना लिया,

फिर एक सूतपुत्र समजकर भगवान परशुराम ने कर्ण को सभी विद्याये सीखा दिया, एक दिन की बात है, भगवान परशुराम कर्ण के पैरो पर अपना सर रखकर सो रहे थे की इतने में एक भौरा आया और कर्ण के पैरो में काटना लगा, जो बहुत ही विषैला था, उसके काटने से कर्ण के पैरो से खून निकलने लगा था, लेकिन कर्ण अपने गुरु के नीद में व्यवधान न आये, टस से मस भी नही हुए, फिर थोड़ी देर बाद जब गुरु परशुराम की नींद खुली तो सारा दृश्य देखकर और कर्ण के खून को देखकर तुरंत समझ गये की यह कोई छत्रिय ही होगा और फिर उन्होंने कर्ण से पूछा की कर्ण कौन है उसके असलियत के बारे में पूछा, क्युकी भगवान परशुराम जानते थे कोई छत्रिय ही होगा जो इतना बड़ा कष्ट आसानी से झेल सकता है.

लेकिन कर्ण खुद को एक सूतपुत्र बताते रहे, जिससे क्रोधित होकर कर्ण को श्राप दिया की उनके द्वारा दिया गया विद्द्या भूल जाये, जिसके बाद कर्ण भगवान परशुराम द्वारा दिया गयी सारी शस्त्र- शास्त्र की विद्या भूल गया और दुखी मन से वापस अपने घर को लौट गया.

इसके अलावा भगवान परशुराम के जीवन का वर्णन भगवान गणेश के दंत कथा, राम सीता के स्वयंबर कथा, महाभारत के कई प्रसंगों में जिक्र मिलता है. जिस कारण से इन्हें अमर माना जाता है और पुराणों के अनुसार कलयुग में भगवान् कल्कि के अवतार में भी भगवान परशुराम का जिक्र मिलता है, जो की कलयुग के अंत तक आने वाला समय ही बता सकता है.

परशुराम जयंती का महत्व तथा आयोजन (Parshuram Jayanti Celebration):

  • इस दिन बड़े बड़े जुलूस, शोभायात्रा निकाले जाते हैं. इस शोभायात्रा में भगवान परशुराम को मानने वाले सभी हिन्दू, ब्राह्मण वर्ग के लोग भारी से भारी संख्या में शामिल होते हैं.
  • परशुराम भगवान के नाम पर उनके मंदिरों में हवन – पूजन का आयोजन किया जाता है. इस दिन अक्षय तृतीया भी मनाई जाती है. सभी लोग पूजन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और दान आदि करते हैं.
  • भगवान परशुराम के नाम पर भक्तगण जगह जगह भंडारे का आयोजन करते है और सभी श्रद्धालु इस भोजन प्रसादी का लाभ उठाते हैं.
  • कुछ लोग इस दिन उपवास रख कर वीर एवं निडर ब्राह्मण रूप भगवान परशुराम की तरह पुत्र की कामना करते हैं. वे मानते हैं कि परशुरामजी के आशीर्वाद से उनका पुत्र पराक्रमी होगा.
  • वराह पुराण के अनुसार, इस दिन उपवास रखने एवं परशुराम को पूजने से अगले जन्म में राजा बनने का योग प्राप्त होता है.

परशुराम मंदिर (Parshuram temple):

भारत में कई जगह परशुराम के मंदिर स्थित है. उनमें से कुछ नीचे दिये गए हैं:

1 परशुराम मंदिर, अट्टिराला, जिला कुड्डापह ,आंध्रा प्रदेश.
2 परशुराम मंदिर, सोहनाग, सलेमपुर, उत्तर प्रदेश.
3 अखनूर, जम्मू और कश्मीर.
4 कुंभलगढ़, राजस्थान.
5 महुगढ़, महाराष्ट्र.
6 परशुराम मंदिर, पीतमबरा, कुल्लू, हिमाचल प्रदेश.
7 जनपव हिल, इंदौर मध्य प्रदेश (इसे भी कई लोग परशुराम का जन्म स्थान मानते हैं).

परशुराम कुंड (Parshuram Kund history)

परशुराम कुंड (Parshuram kund), लोहित जिला, अरुणाचल प्रदेश – एसी मान्यता है, कि इस कुंड में अपनी माता का वध करने के बाद परशुराम ने यहाँ स्नान कर अपने पाप का प्रायश्चित किया था.

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