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अयोध्यासिंह उपाध्याय

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अयोध्यासिंह उपाध्याय

अयोध्यासिंह उपाध्याय
खड़ी बोली हिन्दी में प्रथम महाकाव्य लिखने का श्रेय हरिऔध जी को ही है । हरिजीत जी अपनी शैली के अकेले कवि थे । इसकी शैली का , न इनसे पहले कोई कवि था और न इसके बाद ही कोई उस शैली का अनुगमन कर सका । ये आज तक अनुपम और अद्वितीय रहे हैं ।

जीवन – वृत्त- हरिऔध जी का जन्म आजमगढ़ जिले के निजामाबाद में सन् १८६५ ई ० में हुआ था । इनके पिता का नाम श्री भोपालसिंह था , ये धनाढ्य ब्राह्मण थे । संस्कृत , उर्दू , फारसी का ज्ञान इन्होंने घर पर ही प्राप्त किया । इनकी शिक्षा – दीक्षा की देख – रेख इनके चाचा पं ० ब्रह्मानन्द ने की थी । मिडिल एवं नॉर्मल की परीक्षा पास करके ये निजामाबाद मिडिल स्कूल में अध्यापक हो गये । पाँच वर्ष के पश्चात् ये कानूनगो हो गये । सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त हो जाने पर ये काशी विश्वविद्यालय में हिन्दी के अवैतनिक अध्यापक हो गये । सन् १ ९ ४१ ई ० में ये विश्वविद्यालय छोड़कर घर लौट गये और आजमगढ़ में स्थायी रूप से रहने लगे ।

हरिऔध बड़े करुण हृदय , परोपकारी एवं मधुर भाषी थे । घन एवं यश की इन्हें अभिलाषा नहीं थी , फिर भी समाज से पूर्ण सम्मान मिला था । ये कवि होने के साथ – साथ अच्छे वक्ता , गद्य – लेखक एवं समीक्षक भी थे । ‘ प्रिय प्रवास ‘ महाकाव्य पर इन्हें १२०० रु ० का मंगला प्रसाद पारितोषिक भी प्राप्त हुआ था । हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के ये सभापति भी रहे । सम्मेलन में | इन्हें विद्यावाचस्पति की उपाधि से विभूषित किया था , कवि सम्राट की उपाधि इन्हें पहले से ही प्राप्त थी । भारतीय संस्कृति का यह अनन्य अर्चक मार्च १ ९ ४५ में गोलोक वासी हुआ ।

रचनायें– हरिऔंघ जी प्रकाण्ड विद्वान , महाकवि एवं बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न गद्यकार थे । इन्होंने आजीवन साहित्य की सेवा की और इस प्रकार अनेक ग्रंथों का निर्माण किया । इनको रचनायें निम्नलिखित हैं-
महाकाव्य – प्रिय प्रवास , वैदेही वनवास ।

मुक्तक काव्य संग्रह- रस कलश , ग्रामगीत , परिजात , गद्य प्रसून , कर्मवीर , चोखे
चौपदे , चुभते चौपदे , हरिऔध सतसई , प्रेमाम्बु वारिधि , प्रेमाम्बु प्रवाह आदि २७ काव्य ग्रन्थ ।

नाटक – प्रद्युम्न विजय , रुक्मिणी परिणय ।

उपन्यास – ठेठ हिन्दी ठाठ , प्रेमकान्ता , अधखिला फूल ।
आलोचना- कबीर वचनावली , हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास , विभूतिमती ब्रजभाषा ।
धार्मिक – उपदेश कुसुम ।
अनूदित – वेनिस का बांका , विनोद बाटिका आदि ।

काव्यगत विशेषतायें – हरिऔध जी की काव्य प्रतिभा बड़ी प्रभावपूर्ण थी । इनकी कविता का क्रमिक विकास हुआ । इनके काव्य पर भारतेन्दुकालीन एवं द्विवेदीकालीन प्रवृत्तियाँ स्पष्ट ष्टिगोचर होती हैं । इन्होंने एक ओर’सामाजिक भावनाओं का चित्रण किया तो दूसरी ओर प्राचीन भक्ति – कालीन विषयों का । यदि एक ओर उर्दू छंदों में रोचक रचनायें की तो दूसरी ओर संस्कृत के वर्ण – वृत्तों में । इनका ‘ प्रिय प्रवास ‘ महाकाव्य इन्हें महाकवि के आसन पर विराजमान करता है । दूसरा महाकाव्य वैदेही बनवास ” है । ‘ प्रिय प्रवास के नायक और नायिका , राधा और कृष्ण तथा ‘ वैदेही बनवास ‘ के सीता और राम हैं । हरिऔध जी ने राधा और कृष्ण के चित्रण में प्राचीन भक्ति – कालीन विचारधाराओं का अन्धानुकरण न करके मौलिकता का परिचय दिया है । उनके सभी पात्र उदार एवं मानवीय गुणों से ओत – प्रोत हैं । ब्रज की कुंजों और यमुना के तीर को पार करने वाले कृष्णप्रिया प्रवास में समाज सेवक और संग्रही ही के रूप में अवतरित हुए हैं तथा राधा केवल प्रेमिका न रहकर त्याग , साधना और विश्व प्रेम की मूर्ति बन गई है । प्रियतम कृष्ण के चले जाने पर राधा न रोती है ना बिलखती है केवल इतना कह देती है –
प्यारे जीवें , जग – हित करें ,
     गेह    आवें    न    आव

समाज की सेवा के लिए राधा का यह अद्वितीय त्याग है । राधा का चरित्र चित्रण हरिऔध ने निम्न पंक्तियों में किया है –
वे छाया थीं सुजन – शिर की ,
शासिका थी खलों की ,
कंगालों की परम निधि थी ,
औषधी पीड़ितों की ,
दीनों की थी भागिनी ,
जननी थी अनाथाश्रितों की ,
आराध्या थी ब्रज अवनि की
प्रेमिका विश्व की थीं ।

लोक सेवक के रूप में कृष्ण के उद्गार —

विपत्ति से रक्षण सर्वभूत का
सहाय होना असहाय जीव का
उबारना संकट से स्वजाति का
मनुष्य का सर्वप्रधान कृत्य है ।

पवन को दूत बनाकर कृष्ण के पास भेजते समय भी लोकोपकार भुलाया नहीं गया –
कोई क्लान्ता कृषक ललना खेत में जो दिखावे ,
धीरे – धीरे परस उसकी क्लातियों को मिटाना । जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला ,
छाया द्वारा सुखित करना , तप्त भूतांगना को ।
X x X x
राधा के अन्तर की पीड़ा , मर्यादा त सहदयता – तीनों की अभिव्यक्ति भी देखने योग्य है –
कोई प्यारा कुसुम कुम्हला गेह में जो पड़ा हो ,
   तो प्यारे के चरण पर ला डाल देना उसी को ।
  यों देना ए पवन ? बतला फूल – सी एक बाला ,
  प्लाना होकर कमल – पंग को चूमना चाहती है ।

पुत्र वियोग में मां के हृदय का भाव – पूर्ण चित्र देखिए–
छीना जावे लकुट न कभी , वृद्धता में किसी का , ऊधो ! कोई न बल – छल से , लाल ले ले किसी का|

प्रकृति चित्रण– कवि परम्परा निर्वाह के लिए जहाँ हरिऔध जी केवल वृक्षों की नामावली गिनाने लगते हैं , वहाँ उनका प्रकृति – चित्रण नीरस अवश्य हो उठता है , परन्तु प्रायः इनका प्रकृति – चित्रण संवेदनशील स्वाभाविक एवं सरस होता है ।
संध्या का एक चित्र देखिए –

दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला ।
तरु – शिखा पर थी जब राजती ,
कमलिनी – कुल – बल्लभ की प्रभा ।।
अचल के शिखरों पर जा चढ़ी ,
किरण पादप – शीश विहारिणी ।
तरुणि बिम्ब तिरोहित हो चला ,
गगन मण्डल मध्य शनैः शनैः ।।

भाषा– हरिऔध की भाषा इनके भावों की अनुगामिनी है । वे जब चाहते हैं तब भाषा के स्वरूप और गति को परिवर्तित कर देते हैं । इनकी भाषा को चार रूपों में विभक्त किया जा सकता है- ( १ ) ब्रज भाषा , ( २ ) उर्दू शैली से प्रभावित भाषा , ( ३ ) संस्कृत – निष्ठ भाषा , ( ४ ) सरल भाषा । संस्कृत – निष्ठ भाषा में कहीं – कहीं क्रिया – पद भी हिन्दी के आते हैं ।
रूपोद्यान प्रफुल्ल प्राय : कलिका राकेन्दु बिम्बानना । तन्वंगी कल हासिनी सुरसिका क्रीड़ा कला पुत्तली ॥ शोभा वारिधि की अमूल्य मणि – सी लावण्य लीलामयी ।
श्री राधा मृदु – भाषिणी मृगगी माधुर्य सन्मूर्ति थीं ।

हरिऔध की भाषा सर्वत्र सरस , प्रभावपूर्ण और सुव्यवस्थित है । संस्कृत – निष्ठ भाषा में संस्कृत का लालित्य है ; तो ब्रज भाषा में ब्रज का माधुर्य । उर्दू में चंचलता और रोचकता है , तो सरल बोली में सरलता । लोकोक्तियों और मुहावरों का भी सरल प्रयोग किया गया है ।

शैली – अपनी शैली के हरिऔध स्वयं जन्म – दाता थे । इनके बाद भी इनकी शैली के अनुसरण में कोई सक्षम नहीं हुआ । कुल मिलाकर इन्होंने चार शैलियों में रचना की है
१.संस्कृत काव्य शैली- ( प्रिय प्रवास ) । २.रीतिकालीन शैली- ( रस कलश ) ।
३.उर्दू की मुहावरेदार शैली ( चौपदों में ) ।
४.वर्तमान शैली- ( वैदेही बनवास तथा पारिजात में ) ।

रस , छन्द एवं अलंकार – महाकाव्यकार होने के नाते इनके काव्य में सभी रसों का पूर्ण परिपाक हुआ । फिर भी ये मूल रूप से करुण रस के कवि हैं । “ वैदेही बनवास “ उनका करुण रस प्रधान काव्य है , इसी प्रकार ‘ प्रिय प्रवास ‘ भी करुण रस एवं वात्सल्य में डूबा हुआ है । श्रृंगार रस भी इनका अत्यन्त श्रेष्ठ एवं मौलिक रस है । ‘ रस कलश ‘ शृंगार रस में भीगा हुआ काव्य है । हरिऔध की छंद योजना बड़ी विस्तृत है । प्राचीन एवं नवीन छंदों पर इनका एकाधिकार था । दोहे , कवित्त , सवैये आदि लिखकर इन्होंने संस्कृत के छन्दों – मालिनी , मन्दाक्रान्ता , शिखरिणी , इन्द्रवज्रा , वंशस्थ आदि में अतुकान्त रचना की । उर्दू छन्दों का भी प्रयोग किया तथा आधुनिक छन्दों का भी । अलंकार हरिऔध जी की भाषा को बहुत प्रिय थे , परन्तु उनका प्रयोग उचित समय पर ही आवश्यकतानुसार किया गया है । अनुप्रास , यमक , श्लेष , उपमा , रूपक , सन्देह , उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का हरिऔध जी ने सफल , सार्थक एवं यथेष्ट प्रयोग किया है ।

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