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मलिक मुहम्मद जायसी | Malik Muhammad Jayasi

मलिक मुहम्मद जायसी | Malik Muhammad Jayasi

मलिक मुहम्मद जायसी

जीवन – वृत्त – मानव मात्र के प्रति सहदयता और प्रेम की भावना से ओत – प्रोत हो जायमा मानव – हदय की उस अवस्था के दर्शन कराए , जहाँ सभी धर्म और सम्प्रदायों के भेद – भाव तिरोहित हो जाते हैं और मनुष्य ऐक्य , प्रेम एवं सहानुभूति का अनुभव करता है ।
निर्गुण भक्ति की प्रेममार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म लगभग सन् १४ ९ २ ई . में हुआ था । कुछ लोग गाजीपुर को और कुछ ‘ जायस ‘ को इनका जन्म – स्थान मानते हैं । यह सभी स्वीकार करते हैं कि इनके जीवन का अधिकांश भाग ‘ जायस ‘ में ही बीता था l
सन् १५४२ ई. में इनका देहांत हो गया l अमेठी का राजा इनका बड़ा आदर करते थे |

रचनायें – जायसी की प्रसिद्ध रचनायें पद्मावत ‘ , ‘ अखराक्ट ‘ , ‘ आखिरी कमाल ‘ , सर्वोत्कृष्ट तथा अद्वितीय कृति हैं | इसमें पद्मावत के प्रेमाख्यान को आधार मानकर प्रेममार्गी भक्ति भावना का प्रतिपादन किया गया है |

काव्यगत विशेषता

भाव – पक्ष संयोग शृङ्गार – जायसी रस सिद्ध कवि थे परन्तु जितना सुन्दर वियोग बन पड़ा है- उतना संयोग वर्णन नहीं । संयोग वर्णन में इन्होंने षट्ऋतु वर्णन भी किया है । रानी पद्मावती के पास जब उसका प्रेमी रत्नसेन आता तब पद्मावती की स्थिति का चित्रण बड़े अनूठे ढङ्ग से किया गया है-

रङ्ग राती प्रीतम रङ्ग जागी , गरजे गगन चौकि गर लागी ।
सीतल बंद , उंच चोपारा , हरिहर सङ्ग देखाइ संसारा ।

( अ ) वियोग शृंगार – जायसी का वियोग वर्णन हिन्दी साहित्य में अपना विशेष महत्त्व रखता है । यह हृदय वेदना का अधिक वर्णन किया है नागमती का संयोग के समय सुख देने वाली प्रकृति वियोग की ओर अधिक बीता था । इसी से इनको जायसी कहा जाता है । सूफी संत थे । कुरूप थे किन्तु इनका हृदय उदार , पवित्र निर्मल था । इनमें सहृदयता थी । सन् १५४२ ई ० में इनका देहान्त हो गया । अमेठी के राजा इनका बड़ा आदर करते थे । उन्होंने जायसी की एक समाधि बनवाई जो उनके प्रेम का प्रतीक समझी जाती है । काव्यगत विशेषतायें विरह वर्णन संवेदनात्मक है । कवि ने विरह की आग और उद्दीप्त करती है समस्त प्रकृति नागमती के विरह में दुःखी रहती है । जायसी ने स्वकीया के पवित्र प्रेम की सौन्दर्यानुभूति का मार्मिक चित्रण पद्मावत में किया है । कहीं – कहीं अत्युक्तियाँ हैं , फिर भी गहनता और गम्भीरता नहीं छूटने पाई । आचार्य शुक्ल का मत है
“ जायसी विरह कहीं – कहीं अत्यन्त अत्युक्तिपूर्ण होने पर भी मजाक की हद तक नहीं पहुंचने पाया है , उसमें गाम्भीर्य बना हुआ है । इनकी अत्युक्तियाँ बात की करामात नहीं जान पड़ती , हृदय की अत्यन्त तीव्र वेदना के शब्द संकेत प्रतीत होते हैं ।

( आ ) बारहमासा – नागमती के विरह की तीव्रता का जायसी ने बारहमासा खण्ड में वर्णन किया है । इस खण्ड में वर्ष के बारह महीनों पर नागमती के विरह का प्रभाव है । विरह वर्णन में जायसी की यह अद्वितीय सफलता है । इसमें नागमती को एक आदर्श हिन्दू गृहिणी के रूप में चित्रित किया गया है । नागमती में भावों की उत्कर्षता और हृदय वेगों को अभिव्यक्ति जायसी की अद्वितीय विशेषता है|
कुछ उदाहण देखिए –
आसाढ़ मास में नागमती की विरह दशा का चित्र देखिये-.
” चढ़ा असाढ़ , गगन धन गाजा ।
साजा विरह ढुंद दल बाजा ।।
X
” दादुर मोर कोकिला , पीऊ । गिरै बिचु , घट रहै न जीऊ ।।
पुष्प नखत सिर ऊपर आवा । हों बिनु नाँह मन्दिर को छावा ?
” सावन मास में- ” सावन बरस मेह अति पानी । भौनि परि , हौ बिरह झरानी । ”
भार्दो मास में – मा भादो दूभर अति भारी । कैसे मरौ रैनि अँधयारी ।
कार्तिक मास में कातिक सरद चन्द उजियारी । जग शीतल , हौ बिरहै जारी ।
चैत मास में – चैत बसंता होई घमारी । मोहि लेखे संसार उजारी ।।
बैसाख मास में – लागिउँ जरै , जरै जस भारू । फिर फिर मॅजेसि तेउँन बारू ।
जेठ मास में – विरह गाजि हनुवंत होइ जागा । लंका दाह करै तनु लागा ॥

रहस्यवाद- पद्मावत एक प्रीतिकात्मक काव्य है । उसकी समस्त कथा एक प्रतीक के रूप में चलती है । जायसी ने सूफियों के प्रेममार्गी सिद्धान्तों को बड़ी खूबी के साथ रत्नसेन और किक पद्मावती की प्रेम कथा में पिरोया है । पद्मावती और रत्नसेन ब्रह्म और जीव के प्रतीक हैं । तोता गुरु है । वही लक्ष्य प्राप्ति ( मोक्ष ) के लिये पथ – प्रदर्शन करता है ।
” गुरु सुआ जेहि पन्थ दिखावा ”

भाषा – जायसी ने बोल – चाल की अवधि में पद्मावत की रचना की है । स्थान – स्थान पर अवधि के पूर्वी और पश्चिमी रूप देखने को मिलते हैं । इन्होंने स्वेच्छा से नवीन शब्दों का निर्माण किया है । अरबी और फारसी के शब्दों का भी स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग किया है ।

शैली — जायसी ने भारतीय तथा उर्दू की मसनवी शैली दोनों में अपनी रचना की है । भारतीय शैली में इन्होंने दोहा और चौपाई छन्दों को अपनाया । लोकोक्तियों और मुहावरों के सफल प्रयोग से जायसी की शैली और भी अधिक सरल एवं सरस बन गई है ।
अलंकार – नख – सिख वर्णन में जायसी ने अलंकारों की प्रदर्शिनी सी उपस्थित कर दी । वैसे पद्मावत में अलंकारों की छटा देखने के योग्य है । सादृश्य मूलक अलंकार अपेक्षाकृत अधिक प्रयोग किये हैं । सामान्यतः जायसी ने उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा , अतिशयोक्ति , आदि अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से स्थान – स्थान पर किया है ।

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