12-sociology

Bihar board solutions for class 12th sociology

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ग्रामीण समाज में विकास एवं परितर्वन

    (Change and Development in Rural Society)

*स्मरणीय तथ्य

समानता (Equality): समानता लोगों को समता के आधार पर देखने और भेदभाव न करने का विचार है।

*जीविका (Occupation) : जीवन जीने के लिए आवश्यक रोजगार या कार्य जिससे धन की प्राप्ति हो।

एन.सी.ई.आर.टी. पाठ्यपुस्तक एवं अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

(Objective Questions) 

  1. भारत में निम्न प्रांतों में किस प्रांत में भूमि-सुधार कार्यक्रम तुलनात्मक रूप से अधिक सफल हुआ है ?
[M.Q.2009A]

(क) बिहार

(ख) असम

(ग) मध्य प्रदेश

(घ) पश्चिम बंगाल

उत्तर-(घ) 

  1. जमींदारी व्यवस्था कब लागू की गई थी?
[M.Q.2009A]

(क) 1793 ई० में

(ख) 1820 ई० में

(ग) 1947 ई० में

(घ) 1950 ई० में

उत्तर-(क)

  1. जमींदारी प्रथा किसके द्वारा लागू की गई ?
[M.Q.2009A]

(क) लॉड डलहौजी

(ख) लॉर्ड विलियम बेटिंक

(ग) लॉड कार्नवालिस

(घ) इनमें कोई नहीं

उत्तर-(ग) 

  1. भारत किसके द्वारा हरित क्रांति से होकर गुजर रहा है ? [M.Q. 2009A]

(क) नवीन कृषि तकनीक एवं भूमि सुधार

(ख) औद्योगिकीकरण एवं उत्पादकता

(ग) नगरीकरण

(घ) आधुनिकीकरण

उत्तर-(क) 

  1. हरितक्रांति के लिए कौन कारक जिम्मेदार है ?
[M.Q. 2009A]

(क) उपजाऊ भूमि

(ख) रासायनिक खाद

(ग) वर्षा

(घ) शिक्षा

उत्तर-(ख) 

  1. एम. एम. स्वामीनाथन के अनुसार सर्वप्रथम Green Revolution शब्द का उपयोग
[M.Q.2009AJ

(क) नार्मन बोरलॉग ने किया

(ख) जार्ज हैरर ने किया

(ग) विलियम गेड ने किया

(घ) जार्ज बुश ने किया

उत्तर–(ग) 

7 भारत में जमींदारी उन्मूलन कानून किस वर्ष बना ?

[M.Q.2009A]

(क) 1951

(ख) 1941

(ग) 1961

(घ) 1971

उत्तर–(क)

  1. भूदान आंदोलन की शुरुआत किनके द्वारा की गई थी ? [M.Q. 2009A] 

(क) नम्बुदरीपाद

(ख) विनोबा भावे

(ग) लोकमान्य तिलक

(घ) राजेन्द्र प्रसाद

उत्तर-(क)

  1. लोगों को समता के आधार पर देखने और भेदभाव न करने का विचार को कहते हैं

(क) जीविका

(ख) समानता (ग) चकबंदी

(घ) गहन कृषि

उत्तर-(ख) 10. जीवन जीने के लिए आवश्यक रोजगार या कार्य जिससे धन की प्राप्ति हो उसे कहते

(क) जीविका

(ख) बिचौलिए

(ग) बटाईदारी

(घ) काश्तकारी

उत्तर-(क) 

  1. भारत में हरित क्रांति लाने में किसका योगदान है ? 

(क) जगदीशचन्द्र बसु

(ख) चन्द्रशेखर वेंकट रमन

(ग) डॉ. होमी जहाँगीर भाभा

(घ) डॉ०एम०एस० स्वामीनाथन

उत्तर–(घ) 

  1. भारत में कितना प्रतिशत राष्ट्रीय आय कृषि से प्राप्त होती है ? 

(क) 28

(ख) 29.

(ग) 30

(घ) 40

उत्तर-(ख) 

  1. गहन कृषि जिला कार्यक्रम आरम्भ किया गया

(क) 1961 में

(ख) 1951 में

(ग) 1971 में

(घ) 1991 में

उत्तर–(क) 

(ख) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए : 

(1) किराए के आधार पर दूसरे व्यक्ति की जमीन का उपयोग एवं अधिग्रहण करना …

………….. कहलाता है।

(2) भारत का आर्थिक विकास मूलतः ………….. विकास पर निर्भर करता है।

(3) भारत में जमींदारी प्रथा ……………. ने आरंभ किया था।

(4) …………… ने रैयतवाड़ी प्रथा चलाई।

उत्तर-(1) काश्तकारी, (2) कृषि, (3) लॉर्ड कार्नवालिस, (4) लॉर्ड विलियम बैंटिका 

(ग) निम्नलिखित कथनों में सत्य एवं असत्य बताइये: 

(1) हरित क्रांति कृषि व्यवसाय में अधिक-से-अधिक और अच्छा अन्न उपजाने का एक

प्रभावशाली आंदोलन है।

(2) भूमि सुधार कार्यक्रमों का एक मुख्य उद्देश्य है कि स्रोतों को दो टुकड़ों में बाँटना।

(3) हरित क्रांति के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति खराब हो गयी।

(4) हरित क्रांति के कारण पूँजीपति किसानों का एक नया वर्ग उत्पन्न हो गया।

उत्तर–(1) सत्य, (2) असत्य, (3) असत्य, (4) सत्य।

 

(Short Answer Type Questions) 

प्रश्न 1. ‘भारत का आर्थिक विकास कृषि विकास पर निर्भर है।स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-भारत गाँवों का देश है। इसमें 6 लाख से अधिक गाँव हैं। लोगों का मुख्य आर्थिक कार्य कृषि है। कृषि गाँवों में लोगों का मुख्य व्यवसाय है। 100 करोड़ से अधिक लोगों को खाद्य सामग्री खेती से प्राप्त होती है। अतः हम कह सकते हैं कि भारत का आर्थिक विकास मूलतः कृषि विकास पर निर्भर करता है।

 प्रश्न 2. भूमि सुधार से क्या अभिप्राय है ?

[B.M.2009 A]

उत्तर-भूमि व्यवस्था में संबंधित संस्थाओं और कृषि संगठन में किसी भी सुधार को भूमि सुधार कहते हैं। भूमि सुधार की अवधारणा से स्पष्ट है कि भूमि सुधार को जमीन के पुनर्वितरण तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि कृषि में सुधार के उपायों को भी उसमें शामिल करना चाहिए।

प्रश्न 3. भारत में भूमि सुधार के उद्देश्य बताइए।

[B.M.2009 A]

उत्तर–() समानतावादी कृषि संबंधों की स्थापना।

(ii) भूमि संबंधों में शोषण को समाप्त करना।

(iii) काश्तकारों को जमीन उपलब्ध कराना।

(iv) गाँव के गरीब लोगों के भू-धारण अधिकार को बढ़ाना।

(v) कृषि उत्पादन में वृद्धि करना।

(vi) कृषि अर्थव्यवस्था का विविधीकरण करना।

(vii) कृषि क्षेत्र से बिचौलियों का उन्मूलन करना।

प्रश्न 4. जमींदारी प्रथा से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर-लार्ड कार्नविलास ने भारत में जमींदारी प्रथा आरंभ की। भू-राजस्व वसूल करने वाले अधिकारियों का पद बढ़ाकर उन्हें भ-स्वामी या जमींदार बना दिया गया। ये जमींदार सरकार को निश्चित मालगुजारी जमा करते थे आर क्षकों का शोषण करते थे। वे अधिक लगान वसूल करते थे, परंतु भूमि सुधार के लिए कोई कार्य नहीं करते थे।

प्रश्न 5. महालवारी प्रथा से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर-इसमें ग्रामीण समुदाय का भूमि पर संयुक्त स्वामित्व होता था और गाँव के सभी सदस्य संयुक्त रूप से लगान चुकाने के लिए उत्तरदायी रहते थे।

प्रश्न 6. रैयतवाड़ी प्रथा से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर-लार्ड विलियम बैंटिक ने रैयतवाड़ी प्रथा नलाई। इसमें रैयत भूमिधारी जोतदार या कृषक थे। इनका सीधा संबंध ब्रिटिश सरकार के साथ था। घर मा यतवाड़ी बंदोबस्त सन् 1792 में मद्रास में लागू हुआ। इसमें रैयतों को जमीनों के अनुपात में निधाारत गया या लगान सीधे सरकार को देना पड़ता था।

प्रश्न 7. स्वतंत्रता के पश्चात् भूमि सुधार कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर–(i) जमींदारी प्रथा समाप्त कर बिचौलियों का उन्मूलन करना।

(ii) काश्तकारी सुधार जिसमें नियमित मजदूरी, काश्तकारी सुरक्षा, काश्तकारों को भूमि खरीदने का अधिकार आदि।

(iii) कृषि भूमि की उच्चतम सीमा का निर्धारण करना।

(iv) जोत की चकबंदी करना।

(v) भू-अभिलेखों का नवीकरण और आधुनिकीकरण करना।

प्रश्न 8. हरित क्रांति से क्या अभिप्राय है ?

[B.M.2009A]

उत्तर-सामान्य तौर पर हरित क्रांति का अभिप्राय कृषि व्यवसाय में क्रांतिकारी नीतियों द्वारा सर्वांगीण विकास से है और इसका अंतिम लक्ष्य कृषि फसलों का अधिकतम उत्पादन होता है। हरित क्रांति कृषि व्यवसाय में अधिक-से-अधिक और अच्छा अन्न उपजाने का एक प्रभावी आंदोलन है।

प्रश्न 9. हरित क्रांति के तत्त्वों का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर-(i) अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग।

(ii) रासायनिक खाद का प्रयोग।

(iii) कृषि में आधुनिक उपकरण व संयंत्रों का प्रयोग।

(iv) कीटनाशकों का प्रयोगा।

(v) सिंचाई की व्यवस्था।

(vi) भूमि संरक्षण, बहुफसली खेती।

(vii) कृषि मूल्य का निर्धारण और कृषि ऋण व्यवस्था।

प्रश्न 10. हरित क्रांति के क्या परिणाम हैं ?

उत्तर-आज हरित क्रांति केवल खाद्यान्न आंदोलन ही नहीं है बल्कि ग्रामीण आर्थिक-सामाजिक उत्थान की क्रांति है। हरित क्रांति से :

(i) किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है।

(ii) बहुत से किसान गरीबी की रेखा से ऊपर उठे हैं।

(iii) रोजगार में वृद्धि हुई है।

(iv) धनी और निर्धन किसानों की आर्थिक स्थिति में अंतर आ गया है।

(v) पूँजीपति किसानों का एक नया वर्ग उत्पन्न हो गया है।

(vi) गेहूँ और चावल के उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है।

प्रश्न 11. भूमि चकबंदी से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर-भूमि के छोटे-छोटे और बिखरे खेतों पर सिंचाई की व्यवस्था करना कठिन होता है। अत: छोटे-छोटे भूमि के टुकड़ों को मिलाकर किसानों को एक स्थान पर देना भूमि की चकबंदी कहलाता है। इससे खेत पर मशीनों का प्रयोग किया जा सकता है। साथ ही सिंचाई की व्यवस्था और भूमि की देख-रेख बेहतर तरीके से की जा सकती है।

प्रश्न 12. भूमि चकबंदी के पीछे क्या उद्देश्य था ?

उत्तर-भूमि के छोटे-छोटे और बिखरे हुए होने की समस्या भूमि के उपविभाजन और विखंडन की समस्या कहलाती है। जब जनसंख्या वृद्धि के कारण भूमि के छोटे-छोटे टुकड़े करके उत्तराधिकारियों के बीच बाँट दिये जाते हैं तो भूमि की जोत अनार्थिक हो जाती है। भूमि का बहुत सा भाग मोड़ व नाली आदि बनाने में बेकार हो जाता है। अलग-अलग खेतों की देखभाल नहीं हो पाती। पशुओं द्वारा फसल खराब की जाती है। हर खेत पर पानी पहुंचाना आसान नहीं है। किसानों में छोटी-छोटी बातों पर मुकदमेबाजी हो जाती है। कृषि के आधुनिक तरीकों को छोटेखेतों पर अपनाना कठिन होता है। छोटे किसाना कृषि की आधुनिक तकनीक को भी प्रयोग में नहीं ला पाते।

भूमि का छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजन कृषि विकास में एक महत्वपूर्ण बाधा रही है।

अधिकतर खेत न केवल छोटे हैं बल्कि दूर तक फैले हुए भी हैं। अतः सभी राज्यों में चकबंदी संबंधी कानून बनाए गए। एक किसान की जोत के अलग-अलग टुकड़ों को एक अथवा दो जगह पर एकत्र करके उनका उचित इस्तेमाल किया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं वहाँ चकबंदी से बहुत लाभ पहुंचा है। अब लगभग सभी राज्यों में चकबंदी का काम पूरा हो चुका है। भूमि की चकबंदी से उत्पादन में वृद्धि हुई है। फसलों की सुरक्षा बढ़ी है तथा जोत को आर्थिक बनाने में सफलता मिली है।

प्रश्न 13. भारत में भूमि सुधार के उद्देश्य क्या हैं ? 

उत्तर-भूमि सुधार के सामान्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं :

(i) सामाजिक तथा आर्थिक समानता :- भूमि सुधार के पीछे सामाजिक न्याय तथा आर्थिक

अतः भूमि सुधार का उद्देश्य समानता और सामाजिक न्याय लाना तथा निर्धनता दूर करना है।

(ii) मध्यस्थों की समाप्ति :- संसार के अधिकतर देशों ने दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् स्वतंत्रता प्राप्त की। औपनिवेशिक काल में विदेशियों के स्वामित्व में भूसंपत्ति का स्वामित्व कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में था। भारत में जमींदारी व्यवस्था अंग्रेजी शासनकाल की देन थी। जब राष्ट्रवादी प्रेरणा जोर पकड़ने लगी तो जमींदारों के उन्मूलन की बात जोर पकड़ती गई और किसानों को शोषण से मुक्त कराने के लिए मध्यस्थों को हटाने की माँग ने जोर पकड़ लिया। अत: स्वतंत्रता के पश्चात् जमींदारी उन्मूलन भूमि सुधार कार्यक्रमों के प्राथमिक चरण का एक लक्ष्य बन गया।

(iii) लोकतंत्र की स्थापना के लिए :- भूमि सुधार कार्यक्रम के पीछे लोकतंत्र की भावना भी काम करती रही है। स्वाधीनता और न्याय के लक्ष्य को प्रजातांत्रिक समाज में ही प्राप्त किया जा सकता है। निर्धन और वंचित नागरिक अपनी शिकायतों को लोकतंत्र के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में सुधार के लिए एक वातावरण का निर्माण होता है। __

(iv) भूमि की उत्पादकता में वृद्धि :- भूमि सुधार के प्रभावशाली उपायों को अपनाकर कृषि क्षेत्र का विकास भूमि की उत्पादकता को बढ़ाकर किया जा सकता है।

प्रश्न 14. भारत में राजनीति ने भूमि-सुधार कार्यक्रमों को किस प्रकार प्रभावित किया?

उत्तर-भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों के पीछे राजनीतिक वातावरण और राष्ट्रवादी विचारधारा का बहुत बड़ा हाथ रहा है। राष्ट्रीयता की भावना के विकास से ऐसी स्थितियों का निर्माण हुआ जिसमें सरकार के लिए भूमि सुधार के उपायों का बीड़ा उठाना अनिवार्य हो गया। स्वाधीनता संग्राम के दिनों में जनता की गरीबी और जमींदारों तथा सूदखोरों द्वारा किसानों के अत्यधिक शोषण ने राजनीतिक नेताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। सन् 1936 में कांग्रेस अधिवेशन में पंडित नेहरू ने कृषक और राज्य के बीच के बिचौलियों के निष्कासन और उसके पश्चात् सहकारी अथवा सामूहिक खेती की बात उठाई।

सन् 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा में जमींदारी उन्मूलन, रैयतों के दखल-अधिकार, भूमिहीन मजदूरों के बीच परती जमीन के पुनर्वितरण आदि माँगों को उठाया गया। स्वामी सहजानन्द सरस्वती के नेतृत्व में किसान सभा आंदोलन, सन् 1918 का खेड़ा आंदोलन, सन् 1928 का बारदोली सत्याग्रह तथा बंगाल का विभाजन आंदोलन ने सारे देश में किसानों और भूमि मालिकों के बीच संघर्षों को जन्म दिया। किसानों की शिकायतों के समाधान की योजना बनाने के लिए सरकार बाध्य हो गई और स्वतंत्रता के पश्चात् भूमि सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किए गए।

प्रश्न 15. स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में भूमि सुधार के कौन से प्रारंभिक उद्देश्य थे?

उत्तर-स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात् सरकार ने भूमि सुधार कार्यक्रम को भूमि कानून के द्वारा प्रारंभ करने की रणनीति बनाई। इस संबंध में देश के विभिन्न राज्यों में विधान सभाओं द्वारा कानून बनाए गए।

भारत में भूमि सुधार के प्रारंभिक उद्देश्य निम्नलिखित थे :

  1. कृषि व्यवस्था में व्याप्त शोषण और सामाजिक अन्याय के सभी तत्वों का निष्कासन ताकि समाज के सभी वर्गों को उन्नति के अवसर प्राप्त हो सके।
  2. कृषि संरचना में मौजूद रुकावटों को हटाना जिससे उत्पादन में वृद्धि हो सके।

अतः कृषि के आधुनिकीकरण तथा कृषि अर्थव्यवस्था में व्याप्त असमानताओं को घटाने की दृष्टि से ही भूमि सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किए गए। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित कार्य किए गए :

  1. राज्य और जमीन जोतने वालों के बीच सभी प्रकार के मध्यस्थ वर्गों का उन्मूलन करना।
  2. किसानों द्वारा खेती की जाने वाली भूमि पर उनके स्वामित्व का अधिकार प्रदान करना।
  3. खेतों की अधिकतम जोत का निर्धारण करना।

4.कृषि में आधुनिक तकनीकों के प्रयोग को सुलभ बनाने की दृष्टि से जोतों की चकबंदी करना। 5. भूमि संबंधी रिकॉर्ड को तर्कसंगत बनाना।

प्रश्न 16. जमींदारी प्रथा से क्या अभिप्राय है ? यह किसानों के शोषण के लिए किस प्रकार उत्तरदायी थी ?

उत्तर-ब्रिटिश शासकों ने जमीन से अधिकतम लगान प्राप्त करने के लिए तीन प्रकार के भूमि बंदोबस्त प्रारंभ किए :__-

  1. जमींदारी, 2. रैयतवाड़ी, 3. महालवारी।

जमींदारों व्यवस्था के अंतर्गत जमीन की संपत्ति का अधिकार स्थानीय लगान वसूल करने वालों को दिया गया, वे जमींदार कहलाये और ये सामान्यत: ऊँची जातियों के सदस्य थे। इस नये बंदोबस्त ने वास्तविक किसानों को रैयत बना दिया। भूमि व्यवस्था में इस संरचनात्मक परिवर्तन ने राज्य और जमीन जोतने वालों के बीच बिचौलियों को खड़ा कर दिया। इन मध्यस्थों की भूमि प्रबंधन और सुधार में कोई अभिरुचि नहीं थी। जमींदारों को एक निश्चित राजस्व की राशि सरकार को देनी होती थी, परंतु किसानों से वसूली की कोई सीमा नहीं था। समय-समय पर उनसे अनेक कर वसूल किए जाते थे। यह व्यवस्था अन्यायपूर्ण थी और इसमें आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न दोनों ही विद्यमान थे।

स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में बिचौलियों का उन्मूलन भूमि सुधार का पहला लक्ष्य बना। देश के सभी भागों से जमींदारी प्रथा को कानून बनाकर समाप्त कर दिया गया। अब खेतिहरों को राज्य के साथ प्रत्यक्ष रूप से जोड़ दिया गया। खेतिहरों को भूमि के स्थायी अधिकार प्रदान कर दिए गए।

प्रश्न 17. कृषि में काश्तकारी सुधारों में क्या अभिप्राय है ? – 

उत्तर-कृषि जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करने का मूल उद्देश्य एक निश्चित सीमा से अधिक भूमि को वर्तमान भू-स्वामियों से लेकर भूमिहीनों के बीच वितरित करना था। यह पुनर्वितरण सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है। _

भारत में भूस्वामित्व की असमानता बहुत अधिक पाई जाती है। स्वतंत्रता के समय ग्रामीण परिवारों में एक चौथाई के पास कोई जमीन नहीं थी जबकि भू-स्वामियों में हजारों एकड़ जमीन राज्यों में व्यक्ति अथवा परिवार के स्वामित्व में रहने वाले खेतों के आकार को नियंत्रित करने वाले कानून बनाए गए। निर्धारित सीमा से अधिक भूमि रखने की मनाही की गई। सीमा निर्धारण से प्राप्त अतिरिक्त भूमि राज्य सरकार ने अधिगृहीत करके समाज के कमजोर वर्गों में बाँट दी।

भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारण में विभिन्न राज्यों में भिन्नता पाई जाती है। अधिकतर राज्यों में निर्धारित सीमा काफी ऊँची है। भूमि की गुणवत्ता के आधार पर तथा सिंचाई वाली भूमि और वर्षा पर आधारित भूमि के आधार पर भूमि की अधिकतम सीमा का निर्धारण किया गया। भूमि का अधिग्रहण किया गया है जिसमें से 92.99 लाख एकड़ जमीन का वितरण 55.10 लाख लोगों को किया गया जिसमें 36 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग हैं।

प्रश्न 18. जोतों की चकबंदी से क्या समझते हैं ? भूमि की उत्पादकता को बढ़ाने में चकबंदी किस प्रकार लाभकारी है ?

उत्तर-भूमि का छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा होना भूमि का उपविभाजन कहलाता है और जब ये टुकड़े अलग-अलग स्थानों पर बिखरे हुए होते हैं तो इसे भूमि का विखंडन कहते हैं। भूमि के छोटे-छोटे टुकड़े कृषि विकास में बाधक होते हैं। बहुत-सी भूमि खेतों की बाड़ बनाने में खराब हो जाती है। किसान अपने संसाधनों का प्रयोग करने में असमर्थ रहता है। वह उनका उचित प्रयोग नहीं कर पाता। सिंचाई परियोजनाओं का लाभ भी उन्हें नहीं मिल पाता। इसलिए छोटे-छोटे और बिखरे हुए खेतों को मिलाकर एक स्थान पर देने से किसान भूमि का प्रयोग ठीक प्रकार से कर पाता है और उत्पादन में भी वृद्धि होती है। नये कृषि यंत्रों का प्रयोग करके कृषि की आधुनिक विधियों को प्रयोग में लाकर उत्पादकता में वृद्धि कर सकता है।

प्रश्न 19. जोत की भूमि सीमा निर्धारण से क्या अभिप्राय है ? इसका क्या लाभ हुआ है ?

उत्तर-जोत की भूमि की सीमा निर्धारित करने का मूल उद्देश्य एक निश्चित सीमा से अधिक भूमि को वर्तमान भू-स्वामियों से लेकर भूमिहीनों के बीच वितरित करना था। यह भूमि का पुनर्वितरण सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है। स्वतंत्रता के समय ग्रामीण परिवारों में एक चौथाई के पास जमीन नहीं थी जबकि बड़े किसानों और जमींदारों के पास हजारों एकड़ जमीन थी। इस असंतुलन को दूर करने के लिए ही कृषि जोतों का निर्धारण किया गया।

भूमि की उच्चतम सीमा का अर्थ है कि “एक व्यक्ति या परिवार अधिक-से-अधिक कितनी खेती योग्य भूमि का स्वामी हो सकता है।” उच्चतम सीमा से अधिक भूमि भूस्वामियों से लेकर उन्हें बदले में मुआवजा दिया जायेगा। इस प्रकार जो भूमि ली जायेगी, उसे छोटे किसानों, काश्तकारों या भूमिहीन कृषि मजदूरों में बाँटा जा सकता है या उसे पंचायतों या सहकारी समितियों को दे दिया जायेगा। भूमि की उच्चतम सीमा निर्धारण का उद्देश्य भूमि के समान और उचित प्रयोग के प्रोत्साहन देना है। भारत में ये कदम खेती करने वाले काश्तकारों की स्थिति को सुधारने को लिए उठाए गए। लगान को निर्धारित किया गया है। भूधारण की सुरक्षा से भूस्वामियों द्वारा उन्हें बेदखल किए जाने से रोका गया है। काश्तकारों को खेती वाली जमीन पर स्वामित्व का अधिकार दिया गया। सितंबर, 2000 तक 124.22 लाख काश्तकारों को 156.30 लाख एकड़ भूमि पर उनके अधिकारों को सुरिक्षत किया गया। सरकार ने 52.99 लाख एकड़ भूमि भूमिहीनों के बीच वितरित की। लगभग 55.10 लाख लोगों को भूमि का वितरण किया गया जिसमें से 36 प्रतिशत अनुसूचित तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के सदस्य सम्मिलित हैं।

प्रश्न 20. दिए गए गद्यांश को पढ़ें तथा प्रश्नों का उत्तर दें। (NCERTT.B. Q. 1)

अघनबीघा में मजदूरों की कठिन कार्य-दशा, मालिकों की एक वर्ग के रूप में आर्थिक शक्ति तथा प्रबल जाति के सदस्य के रूप में अपरिमित शक्ति के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी। मालिकों की सामाजिक शक्ति का एक महत्वपूर्ण पक्ष, राज्य के विभिन्न अंगों का अपने हितों के पक्ष में हस्तक्षेप करवा सकने की क्षमता थी। इस प्रकार प्रबल तथा निम्न वर्ग के मध्य खाई को चौड़ा करने में राजनीतिक कारकों का निर्णयात्मक योगदान रहा है।

(i) मालिक राज्य की शक्ति को अपने हितों के लिए कैसे प्रयोग कर सके, इस बारे में आप क्या सोचते हैं ?

(ii) मजदूरों की कार्य-दशा कठिन क्यों थी?

उत्तर-() मालिक राज्य की शक्ति को प्रबल जाति के सदस्य के रूप में अपने प्रभाव द्वारा प्रयोग कर सके। मालिकों की सामाजिक शक्ति इस प्रकार की थी कि वे राज्य के विभिन्न अंगों का अपने हितों के पक्ष में इस्तेमाल कर सकें।

(ii) मालिकों की आर्थिक शक्ति में वृद्धि होने तथा प्रबल जाति होने से मजदूरों की कार्य दशा कठिन थी। मजदूर निम्न वर्ग से थे इस कारण मालिक उन्हें दबाव में रखते थे।

प्रश्न 21. कृषि मजदूरों की स्थिति तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक उर्ध्वगामी गतिशीलता के अभाव के बीच सीधा संबंध है। इनमें से कुछ के नाम बताइए। (NCERTT.B. Q.3)

उत्तर-ये नाम हैं : () प्रवासन, (ii) भूमिहीनता, (iii) प्रभुजाति, (iv) निर्धनता, (v) ऋणग्रस्ता, (vi) तकनीक की जानकारी का अभाव, (vii) शासन की नीतियों की जानकारी न होना।

प्रश्न 22. हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में अक्सर ग्रामीण परिवेश में होती हैं। ग्रामीण भारत पर आधारित किसी फिल्म के बारे में सोचिए तथा उसमें दर्शाए गए कृषक समाज और संस्कृति का वर्णन कीजिए। उमसें दिखाए गए दृश्य कितने वास्तविक हैं ? क्या आप हाल में ग्रामीण क्षेत्र पर आधारित कोई फिला देखी है ? यदि नहीं तो आप इसकी व्याख्या किस प्रकार करेंगे ?

(NCERTT.B.Q.5)

उत्तर-अध्यापक की सहायता से छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 23. अपने पड़ोस में किसी निर्माण स्थल, ईंट के भट्टे या किसी अन्य स्थान पर जाएँ जहाँ आपको प्रवासी मजदूरों के मिलने की संभावना हो, पता लगाइए कि वे मजदूर कहाँ से आए हैं ? उनके गाँव से उनकी भर्ती किस प्रकार की गई, उनका मुकादम कौन है ? अगर वे ग्रामीण क्षेत्र से हैं तो गाँवों में उनके जीवन के बारे में पता लगाइए तथा उन्हें काम ढूँढ़ने के लिए प्रवासन करके बाहर क्यों जाना पड़ा ? (NCERTT.B.Q.6)

उत्तर-अध्यापक की सहायता से छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 24. अपने स्थानीय फल विक्रेता के पास जाएँ और उससे पूछे कि वे फल जो वह बेचता है कहाँ से आते हैं, और उनका मूल्य क्या है। पता लगाइए कि भारत के बाहर से फलों के आयात (जैसे कि आस्ट्रेलिया से सेब) के बाद स्थानीय उत्पाद के मूल्यों का क्या हुआ? क्या कोई ऐसा आयातित फल है जो भारतीय फलों से सस्ता है ?

(NCERTT.B.Q.7)

उत्तर-अध्यापक की सहायता से छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 25. ग्रामीण भारत में पर्यावरण स्थिति के विषय में जानकारी एकत्र कर एक रिपोर्ट लिखें। उदाहरण के लिए विषय, कीटनाशक, घटता जल स्तर, तटीय क्षेत्रों में झींगें की खेती का प्रभाव, भूमि का लवणीकरण तथा नहर सिंचित क्षेत्रों में पानी का जमाव, जैविक विविधता का ह्रास।

(NCERTT.B.Q.8)

उत्तर-अध्यापक की सहायता से छात्र स्वयं करें।

 प्रश्न 26. भूमि संबंधी नवीनतम रिकार्ड की आवश्यकता क्यों है ?

उत्तर भारत में भूमि के अधिकारों से संबंधित आलेख अत्यंत दोषपूर्ण और असंतोषजनक हैं। सही और नवीनतम रिकार्डों की आवश्यकता बनी रहती है। इसलिए प्रमाणित भूमि रिकार्ड का नवीनीकरण भूमि सुधार कार्यक्रम का हिस्सा बना दिया गया। पंचवर्षीय योजना के आलेख में कहा गया है कि ‘अनेक राज्यों के रिकार्ड, रैयत दर रैयत तर्था बटाईदारों से संबंधित कोई सूचना नहीं देते।’ देश के अधिकतर राज्यों में अभी भी आधुनिकतम भूमि रिकार्ड नहीं है। बड़े भू-स्वामी इसका विरोध करते हैं। कई राज्यों में भूमि संबंधी रिकार्ड को सर्वेक्षण तथा बंदोबस्त के द्वारा आधुनिक बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। भूमि दस्तावेजों का कंप्यूटरीकरण किया गया है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

(Long Answer Type Questions) 

प्रश्न 1. हरित क्रांति से क्या अभिप्राय है ? हरित क्रान्ति के प्रभाव बताइये। 

उत्तर-भारत में योजनाओं की अवधि में अपनाए गए कृषि सुधारों के फलस्वरूप 1967-68

अनाज के उत्पादन में इतनी अधिक वृद्धि होना एक क्रांति के समान था। इसलिए अर्थशास्त्रियों ने आज के उत्पादन में होने वाली इस वृद्धि को हरित क्रांति का नाम दिया। हरित क्रांति से अभिप्राय कृषि उत्पादन में होने वाली भारी वृद्धि से है जो कृषि की नई नीति अपनाने के कारण हुई है। अतः हरित क्रांति शब्द सन् 1968 में होने वाले उस आश्चर्यजनक परिवर्तन के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो भारत में खाद्यान्न के उत्पादन में हुआ और अब भी जारी है। हरित क्रांति के फलस्वरूप कृषि उत्पादन में काफी वृद्धि हुई और इसका प्रभाव दीर्घकाल में कृषि उत्पादन के ऊँचे स्तर को बनाए रखने में देखा जा सकता है।

हरित क्रांति के प्रभाव (Effect of Green Revolution)

भारतीय अर्थव्यवस्था पर हरित क्रांति के बहुत ही आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिले हैं। इसके फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया आधार प्राप्त हुआ है। हरित क्रांति के मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं :

  1. उत्पादन में वृद्धि (Increase in production): हरित क्रांति के फलस्वरूप फसलों के उत्पादन में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई। 1967-68 के वर्ष जिसे हरित क्रांति का वर्ष कहा जाता है में अनाज का उत्पादन 950 लाख टन हो गया। ____
  2. किसानों की समृद्धि (Prosperity of farmers): हरित क्रांति के फलस्वरूप किसानों की अवस्था में काफी सुधार हुआ। उनका जीवन स्तर पहले से ऊँचा हो गया। कृषि एक लाभदायक व्यवसाय माना जाने लगा। किसानों की समृद्धि से औद्योगिक उत्पादों की मांग भी तेजी से बढ़ी है।
  3. पूँजीवादी खेती को प्रोत्साहन (Capitalistic farming): वे किसान जिनके पास 10 हेक्टेयर या इससे अधिक भूमि थी और साधन संपन्न थे उन्होंने पूँजीवादी खेती को प्रोत्साहित किया।
  4. खाद्य समाग्री के आयात में कमी (Reduction in imports of foodgrains): हरित क्रांति के फलस्वरूप भारत में खाद्य सामग्री के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ी और विदेशों से खाद्य सामग्री का आयात कम हो गया। ____
  5. उद्योगों का विकास (Development of Industries): हरित क्रांति के कारण उद्योगों के विकास पर काफी उचित प्रभाव पड़ा है। कृषि यंत्र उद्योगों का तेजी से विकास हुआ। रासायनिक खाद और ट्रैक्टर आदि बनाने के कारखाने खोले गये। डीजल इंजन, पंपसैट आदि के नये कारखाने स्थापित किए गए।
  6. आर्थिक विकास और स्थिरता का आधार (Base for economic growth and stability): भारत जैसे देश में जहाँ 29% राष्ट्रीय आय कृषि से प्राप्त होती है, सरकारी बजट

और यातायात पर कृषि का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। कृषि उत्पादन में होने वाली वृद्धि से देश में आर्थिक विकास, स्थिरता और आत्मनिर्भरता के उद्देश्य को पूरा करने में सहायता मिलती है। ___

  1. विचारधारा में परिवर्तन (Change in thinking) : भारत जैसे अल्पविकसित देश में जहाँ अधिकतर किसान अनपढ़, रूढ़िवादी और अंधविश्वासी हैं, हरित क्रांति का एक बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। लोग अब विज्ञान के महत्व को समझने लगे हैं। भारतीय किसानों ने शीघ्रता से कृषि की नई तकनीक को अपनाया है। वे नये विचारों और तकनीकों को ग्रहण कर रहे हैं।
  • प्रश्न 2. हरित क्रांति के विरोध में तर्क दीजिए।

उत्तर-हरित क्रांति के निम्नलिखित प्रभावों के कारण कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में असमानता बढ़ी है और हरित क्रांति का प्रभाव देश के सभी भागों में समान नहीं पड़ा है। __

  1. सीमित फसलें (Limited Crops): कृषि उत्पादन में होने वाली वृद्धि केवल कुछ फसलों तक सीमित है। इसका प्रभाव मुख्य रूप से गेहूँ, ज्वार, मक्का और बाजरा पर पड़ा है। देश की 60 प्रतिशत भूमि पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा। चावल के उत्पादन पर इसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा है।
  2. सीमित क्षेत्र (Limited Area): हरित क्रांति का प्रभाव भारत के सभी राज्यों में एक समान नहीं पड़ा है। कुछ राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ा। इन राज्यों में कृषि उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि हुई परंतु उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा सूखे प्रदेशों में हरित क्रांति अपना प्रभाव नहीं छोड़ सकी।
  3. धनी किसानों को लाभ (Benefit to big farmers): जिन किसानों के पास 10 हेक्टेयर से अधिक भूमि थी और जो बीज, खाद, ट्यूबवैल, ट्रैक्टर आदि खरीदने की सामर्थ्य रखते थे उन्हें अधिक लाभ पहुंचा। छोटे किसानों ने इस तकनीक को नहीं अपनाया।
  4. आर्थिक असमानता में वृद्धि (Increase in economic inequality) : हरित क्रांति ने धनी और निर्धन के बीच अंतर बढ़ा दिया।

प्रश्न 3. भारत में हरित क्रांति के सामाजिक-आर्थिक परिणामों की व्याख्या कीजिए।

[B.M.2009 A] उत्तर-हरित क्रांति शब्द सन् 1968 में होने वाले उस आश्चर्यजनक परिवर्तन के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो भारत के खाद्यान्न के उत्पादन में हुआ था तथा अब भी जारी है। हरित क्रांति से अभिप्राय है-कृषि उत्पादन में काफी अधिक वृद्धि होना और दीर्घकाल में कृषि उत्पादन के ऊँचे स्तर को स्थिर रखना। भारतीय अर्थव्यवस्था पर हरित क्रांति ने कई प्रकार से प्रभाव डाले हैं।

हरित क्रांति के आर्थिक प्रभाव :

  1. उत्पादन में वृद्धि : हरित क्रांति के फलस्वरूप 1967-68 और उसके बाद के वर्षों में कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई है। _
  2. किसानों की समृद्धि : हरित क्रांति के फलस्वरूप किसानों की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है। उनका जीवन स्तर भी ऊँचा हो गया है। कृषि का व्यवसाय एक लाभकारी व्यवसाय माना जाने लगा है।
  3. खाद्यान्न के आयात में कमी : हरित क्रांति के फलस्वरूप खाद्यान्न के आयात में कमी आई। भारत अनाज का एक निर्यातक देश बन गया। ___
  4. उद्योगों का विकास : हरित क्रांति के कारण उद्योगों का भी विकास हुआ। कृषि यंत्र व उपकरण बनाने, रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई। _
  5. आर्थिक विकास : कृषि विकास से सरकार की आय में वृद्धि हुई। इससे देश में आर्थिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता के उद्देश्य को पूरा करने में सफलता मिली।

हरित क्रांति के सामाजिक प्रभाव : हरित क्रांति का प्रभाव सभी राज्यों में एक समान नहीं पड़ा। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु पर इसका अधिका प्रभाव पड़ा। इन राज्यों में कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई परंतु अन्य राज्यों में जहाँ सिंचाई व्यवस्था की कमी थी उसका हरित क्रांति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

धनी किसानों को लाभ : हरित क्रांति का लाभ केवल धनी किसानों को पहुंचा। बड़े किसान जिनके पास अधिक भूमि तथा धन था वे ही इसका लाभ उठा सके। हरित क्रांति का लाभ उन किसानों को पहुँचा जिनके पास 10 से 15 हेक्टेयर तक भूमि है। छोटे किसान हरित क्रांति को लाने वाले तत्वों जैसे उन्नत बीज, रासायनिक खाद, ट्यूबवैल, ट्रैक्टर आदि का खर्च नहीं उठा सकते थे। हरित क्रांति से धनी किसान समृद्ध हो गए।

हरित क्रांति के फलस्वरूप गाँवों में असमानता बढ़ गई। धनी किसान और अधिक धनी हो गए जबकि निर्धन किसानों की आर्थिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। गाँवों में सामाजिक, आर्थिक तनाव बढ़ गया।

प्रश्न 4. कृषि में पैकेज कार्यक्रम से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर-नई कृषि रणनीति इस बात पर आधारित थी कि कृषि में विज्ञापन और प्रौद्योगिकी का व्यापक प्रयोग खाद्यान्नों के उत्पादन में प्रचुर मात्रा में वृद्धि के रूप में फलदायी हो सकता है। वर्ष 1961 में गहन कृषि जिला कार्यक्रम आरंभ किया गया। इसका उद्देश्य उन्नत औजार, साख, अधिक उपज वाले बीज, सुनिश्चित सिंचाई आदि को एक साथ मिलाकर कृषि की उत्पादकता को बढ़ाना था। इस कार्यक्रम का अच्छा परिणाम निकला। खाद्यान्नों के उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई। फिर इसका विस्तार बड़े क्षेत्रों में किया गया। इसे गहन कृषि कार्यक्रम का नाम दिया गया। छठे दशक के उत्तराद्ध में भारी उपज और सीमांत किसान एवं कृषि मजदर विकास कार्यक्रम प्रमुख थे। इन कार्यक्रमों का उर्वरकों, कीटनाशकों, ऋण-सुविधाओं और सिंचाई सुविधाओं के साथ

जोड़ा गया। अधिक उपज देने वाले बीजों के प्रयोग से खाद्यान्नों का उत्पादन काफी तेजी से बढ़ा। सन् 1977-78 में गेहूँ का उत्पादन दुगुना हो गया। चावल का उत्पादन भी बढ़ना आरंभ हो गया। धीरे-धीरे दलहन, ज्वार, मक्का और बाजरे के उत्पादन में भी तेजी से वृद्धि हुई। वर्ष 2005-06 में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 60 करोड़ 24 लाख टन रहा जो पिछले वर्ष की उपज से 4.1 लाख टन अधिक था।

  • प्रश्न 5. वे कौन से कारक हैं जिन्होंने कुछ समूहों के नव धनाढ्य, उद्यमी तथा प्रबल वर्ग के रूप में परिवर्तन को संभव किया है ? क्या आप अपने राज्य में इस परिवर्तन के उदाहरण के बारे में सोच सकते हैं ? – (NCERTT.B.Q.4) ।

उत्तर-1960 के दशक में हरित क्रांति के अंतर्गत ऐसे अनेक कारक तथा परिणाम सामने आए जिन्होंने खाद्य उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ अनेक परिवर्तनों को जन्म दिया। इनमें से अनेक कारकों ने भारत में आर्थिक असमानता को बढ़ाने में योगदान दिया है। ___

कृषि की नई तकनीक, उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक औषधि, सिंचाई आदि में निवेश लघु

और सीमांत किसानों की पहुंच से बाहर है। जिन किसानों के पास अधिक भूमि और धन था उन किसानों ने कृषि की इस नई तकनीक को अपनाया। छोटे किसानों ने इस तकनीक को इसलिए नहीं अपनाया क्योंकि न तो उनके पास सुविधाएँ थीं और न ही जोखिम उठाने की क्षमता थी। अतः हरित क्रांति ने लघु और धनी किसानों के बीच असमानता को बढ़ा दिया।

संपन्न किसान अधिक उत्पादन के कारण लाभ प्राप्त कर सकने की स्थिति में हैं। कृषि क्षेत्र में आर्थिक असमानता बढ़ रही है जिससे ग्रामीण क्षेत्र में असंतोष फैल रहा है। हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों में संघर्ष के अनेक उदाहरण सामने आये हैं। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार नई कृषि रणनीति में संपन्न किसानों तथा लघु भूस्वामियों एवं भूमिहीन कृषि श्रमिकों के बड़े समूह के बीच दरार बढ़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष की भावना कृषि की नई व्यवस्था के कारण बढ़ रही है।

हरित क्रांति के कारण जो सामान्य संपन्नता आई उसमें गरीब किसान, बटाईदार, भूमिहीन कृषि मजदूर को भाग नहीं मिला। हरित क्रांति गरीबों का कल्याण नहीं कर सकेगी, जब तक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना का निचले स्तर पर रूपांतरण न हो जाये।

हरित क्रांति का प्रथम कृषि उत्पादन में वृद्धि के रूप में देखने को मिलता है, परन्तु यह वृद्धि गेहूँ के उत्पादन में देखने को मिलती है, जो कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में देखने को मिली। देश के अन्य भागों में इसका प्रभाव बहुत कम पड़ा। देश के अधिकतर भाग इस कृषि परिवर्तन से लाभान्वित नहीं हुए। हरित क्रांति के करण पूँजीपति किसानों का एक नया वर्ग उत्पन्न हो गया। जिन क्षेत्रों में हरित क्रांति से संपन्नता बढ़ी है वहाँ स्त्री-पुरुष अनुपात में अंतर बढ़ रहा है। इन विषमताओं के होते हुए भी तीव्र आर्थिक विकास ने एक सामाजिक परिवर्तन की नई दिशा दी है। —

प्रश्न 6. भूमिहीन कृषि मजदूरों तथा प्रवास करने वाले मजदूरों के हितों की रक्षा करने के लिए आपके अनुसार सरकार ने क्या उपाए किए हैं, या क्या किए जाने चाहिए ?          (NCERT T.B.Q.2) 

उत्तर-स्वतंत्रता के तत्काल बाद भूमि सुधार पर काफी जोर दिया गया। भूमि सुधार को भूमि कानून के जरिए प्रारंभ करने की रणनीति अपनाई गई।

भूमि सुधार के प्रारंभिक उद्देश्य या उपाय निम्नलिखित थे :

  1. कृषि संरचना में सभी रूकावटों को दूर करना।
  2. कृषि व्यवस्था में शोषण और सामाजिक अन्याय के सभी तत्वों का निष्कासन करना ताकि समाज के सभी वर्गों को अवसर की समानता मिल सके। ____

भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् कृषि अर्थव्यवस्था में व्याप्त असमानताओं को कम करने की दृष्टि से ही भूमि सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किये गए। उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित कार्य किए गए :

  1. राज्य एवं जमीन जोतने वालों के बीच सभी प्रकार के मध्यस्थ वर्गों का उन्मूलन किया गया।
  2. किसानों द्वारा खेती की जाने वाली भूमि पर उनके स्वामित्व का अधिकार प्रदान किया गया।
  3. खेतों की जोत का सीमा निर्धारण किया गया।
  4. कृषि में आधुनिक तकनीकों के प्रयोग को सुलभ बनाने की दृष्टि से जोतों की चकबंदी करना।
  5. भूमि संबंधी रिकार्ड को तर्कसंगत बनाना।

प्रश्न 7. भारत में भूमि सुधार का उद्देश्य बिचौलिये (मध्यस्थों) को हटाना क्यों था?

उत्तर-ब्रिटिश शासकों ने जमीन से अधिकतम राजस्व प्राप्त करने के लिए तीन प्रकार की भूमि व्यवस्थाओं को प्रचलित किया-जमींदारी, रैयतवाड़ी तथा महालवाड़ी। जमींदारी व्यवस्था के अंतर्गत जमीन की संपत्ति का अधिकार स्थानीय लगान वसूलने वालों को दिया गया। वे जमींदार कहलाये। ये सामान्यतः ऊँची जातियों के सदस्य थे। इस नये बंदोबस्त ने वास्तविक किसानों को रैयत बना दिया। भूमि व्यवस्था के इस संरचनात्मक परिवर्तन ने राज्य एवं जमीन जोतने वालों के बीच बिचौलियों को खड़ा कर दिया। रैयतवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत बिचौलियों को मान्यता नहीं मिली। जमीन जोतने वालों को अपनी जमीन पर हस्तांतरण का अधिकार दिया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत भी प्रभावशाली रैयत शक्तिशाली भू-स्वामी के रूप में उभरे। महालवाड़ी प्रथा के अंतर्गत भी बिचौलियों का एक वर्ग उत्पन्न हो गया। इन मध्यस्थों की भूमि प्रबंधन और सुधार में कोई रुचि नहीं थी। जमींदारों को एक निश्चित राजस्व की राशि सरकार को देनी होती थी, परंतु किसानों से वसूली की कोई सीमा नहीं थी। इस व्यवस्था ने आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न को बढ़ाने का कार्य किया।

स्वतंत्रता के पश्चात् बिचौलियों का उन्मूलन करना भूमि सुधार का पहला लक्ष्य था। इस कार्यक्रम के द्वारा देश के सभी क्षेत्रों में बिचौलियों जैसे जमींदारों, जागीरदारों आदि की समाप्ति करने का प्रयत्न किया गया। खेतिहर किसानों को राज्य के साथ प्रत्यक्ष रूप से जोड़ दिया गया। किसानों को भूमि के स्थायी अधिकार दे दिये गए। सन् 1954-55 तक सभी राज्यों ने भूमि सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत बिचौलियों को हटा दिया। जमींदारों से भूमि लेकर जोतने वाले किसानों को सौंप दी गई।

प्रश्न 8. भारत में कृषिक संरचना पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। प्रबल भू-स्वामियों से आपका क्या तात्पर्य है ?

उत्तर-(i) भूमि का उचित विभाजन नहीं : ग्रामीण समाज में कृषि योग्य भूमि ही जीविका का एकमात्र महत्वपूर्ण साधन और संपत्ति का एक प्रकार है। लेकिन किसी विशिष्ट गाँव या किसी क्षेत्र में रहने वालों के बीच इसका उचित विभाजन बिल्कुल नहीं है। न ही सभी के पास भूमि होती है। वास्तव में भूमि का विभाजन घरों के बीच बहुत असमान रूप से होता है। भारत के कुछ भागों में अधिकांश लोगों के पास कुछ-न-कुछ भूमि होती है। अक्सर जमीन का बहुत छोटा टुकड़ा होता है। कुछ दूसरे भागों में 40 से 50 प्रतिशत परिवारों के पास कोई भूमि नहीं होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि उनकी जीविका या तो कृषि मजदूरी से या अन्य प्रकार के कार्यों से चलती है। इसका सहज अर्थ यह हुआ कि कुछ थोड़े परिवार बहुत अच्छी अवस्था में हैं। बड़ी संख्या में लोग गरीबी की रेखा के ऊपर या नीचे होते हैं।

(ii) महिलाओं को जमीन का हक नहीं : उत्तराधिकार के नियमों और पितृवंशीय नातेदारी व्यवस्था के कारण, भारत के अधिकांश भागों में महिलाएँ जमीन की मालिक नहीं होती हैं। कानून महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी दिलाने में सहायक होता है। वास्तव में महिलाओं के पास बहुत सीमित अधिकार होते हैं, और परिवार का हिस्सा होने के नाते भूमि पर अधिकार होता है जिसका कि मुखिया एक पुरुष होता है।

(iv) कृषिक वर्ग संरचना : भूमि स्वामित्व के विभाजन अथवा संरचना के लिए अक्सर कृषि संरचना शब्द का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि ही उत्पादन

का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है, भूमि रखना ही ग्रामीण वर्ग संरचना को आकार देता है। कृषि उत्पादन की प्रक्रिया में अपको भूमिका का निर्धारण मुख्य रूप से भूमि पर आपके अभिगमन से होता है। मध्यम और बड़ी जमीनों के मालिक साधारणत: कृषि से पर्याप्त अर्जन ही नहीं बल्कि अच्छी आय भी कर लेते हैं (हालांकि यह फसलों के मूल्य पर निर्भर करता है जो कि बहुत अधिक घटता-बढ़ता रहता है, साथ ही अन्य कारणों जैसे मानसून पर भी निर्भर करता है) लेकिन कृषि मजदूरों को अक्सर निम्नतम निर्धारित मूल्य से कम दिया जाता है और वे बहुत कम अर्जन करते हैं। उसकी आमदनी निम्न होती है। उनका रोजगार असुरक्षित होता है। अधिकांश कृषि-मजदूर रोजाना दिहाड़ी कमाने वाले होते हैं और वर्ष में बहुत से दिन उनके पास कोई काम नहीं होता है। इसे बेरोजगारी कहते हैं। समान रूप से काश्तकार या पट्टधारी (कृषक जो भूस्वामी से जमीन पर लेता है) की आमदनी मालिक-कृषकों से कम होती है। क्योंकि वह जमीन के मालिक को यथेष्ट किराया चुकाता है – साधारणतः फसल स होने वाली आमदनी का 50 से 75 प्रतिशत तक।

(iv) जाति व्यवस्था का बाहुल्य : कृषक समाज से उसकी वर्ग संरचना से ही पहचाना जाता है। परंतु हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह जाति व्यवस्था के द्वारा संरचित होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जाति और वर्ग के संबंध बड़े जटिल होते हैं। ये संबंध हमेशा स्पष्टवादी नहीं होते। हम प्राय: यह सोचते हैं कि ऊँचे जातिवाले के पास अधिक भूमि और आमदनी होती है और यह कि जाति और वर्ग में पारस्परिकता है, उसका संस्तरण नीचे की ओर होता है। कुछ क्षेत्रों में यह सही है लेकिन पूर्णरूपेण सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए कई जगहों पर सबसे ऊंची जाति ब्राह्मण बड़े भूस्वामी नहीं हैं अत: वे कृषिक संरचना से भी बाहर हो गए हालाँकि वे ग्रामीण समाज के अंग हैं। भारत के अधिकांश क्षेत्रों में भूस्वामित्व वाले समूह के लोग ‘शूद्र या क्षत्रिय’ वर्ण के हैं। प्रत्येक क्षेत्र में, सामान्यत: एक या दो जातियों के लोग ही भूस्वामी होते हैं, वे संख्या के आधार पर भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने ऐसे लोगों को प्रबल जाति का नाम दिया, प्रत्येक क्षेत्र में, प्रबल जाति समूह काफी शक्तिशाली होता है आर्थिक और राजनीतिक रूप से वह स्थानीय लोगों पर प्रभुत्व बनाए रखता है। उत्तर प्रदेश के जाट और राजपूत कर्नाटक के वोक्कालिगास और लिंगायत, आंध्र प्रदेश के कम्मास और रेडी और पंजाब के जाट सिख प्रबल भूस्वामी समूहों के उदाहरण हैं।

सामान्यतः प्रबल भूस्वामियों के समूहों में मध्य और ऊँची जातीय समूहों के लोग सम्मिलित हैं, अधिकांश सीमांत किसान और भूमिहीन लोग निम्न जातीय समूहों के होते हैं। कार्यालयीय वर्गीकरण के अनुसार ये लोग अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों अथवा अन्य पिछड़े वर्गों के होते हैं। भारत के अनेक भागों में, पहले ‘अछूत’ अथवा दलित जाति के लोगों को भूमि रखने के अधिकार नहीं था, वे अधिकांशत: प्रबल जाति के भूस्वामी समूहों के लोगों के यहाँ कृषि मजदूर रहते थे। इसमें एक मजदूर सेना बनी जिससे भूस्वामियों ने खेत जुतवाकर कृषि करवाई और अधिक लाभ कमाया।

जाति और वर्ग की अनुरूपता दयनीय थी अर्थात् विशिष्ट अर्थ में सबसे अच्छी जमीन और साधन उच्च एवं मध्य जातियों के पास थे, अतः शक्ति और विशेषाधिकार भी। इसका महत्वपूर्ण निहितार्थ ग्रामीण आर्थिकी एवं समाज पर होता है। देश के अधिकतर क्षेत्रों में एक स्वत्वाधिकारी जाति के पास सभी महत्वपूर्ण साधन हैं और सभी मजदूरों पर उनका नियंत्रण है जिससे वे उनके लिए काम करें। उत्तरी भारत के कई भागों में अभी भी ‘बेगार और मुफ्त मजदूरी जैसी प्रचलन में है। गाँव के जमींदार या भूस्वामी के यहाँ निम्न जाति समूह के सदस्य वर्ष में कुछ निश्चित दिनों तक मजदूरी करते हैं। इसी तरह, संसाधनों की कमी और भूस्वामियों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सहायता लेने के लिए बहुत से गरीब कामगार पीढ़ियों से उनके यहाँ बँधुआ मजदूर के रूप में काम कर रहे हैं। हालांकि कानूनन इस तरह की व्यवस्थाएँ समाप्त हो गई हैं, लेकिन वे कई क्षेत्रों में अभी भी चल रही है। उत्तरी बिहार के एक गाँव में अधिकतर भूस्वामी भूमिहार हैं, यह भी एक प्रबल जाति है।

प्रश्न 9. स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार के मुख्य उद्देश्य क्या थे और इसके क्या सामाजिक परिणाम हुए?

उत्तर-भारत के स्वतंत्र होने के बाद नेहरू और उनके नीति सलाहकारों ने नियोजित विकास के कार्यक्रमों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया। कृषिकीय सुधारों के साथ-ही-साथ औद्योगीकरण भी इसमें सम्मिलित था। नीति निर्माताओं ने उस समय भारत की निराशाजनक कृषि स्थिति पर अपने जवाबी मुद्दे सामने रखे। इसमें शामिल किए गए मुख्य मुद्दे थे-पैदावार का कम होना, आयातित अनाज पर निर्भरता और ग्रामीण जनसंख्या के एक बड़े भाग में गहन गरीबी का होना। सन् 1950 से 1970 के बीच में भूमि सुधार कानूनों की एक श्रृंखला को प्रारंभ किया गया। इसे राष्ट्रीय स्तर के साथ राज्य के स्तर पर भी किया गया। इसका उद्देश्य निम्न पविर्तनों को लाने का था:

(i) जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करना : विधेयक में पहला सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन था जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करना, इससे उन बिचौलियों की फौज समाप्त हो गई जो कि कृषक और राज्य के बीच में थी। भू-सुधार के लिए पास किए गए कानूनों में यह संभवतः सबसे अधिक प्रभावशाली कानून था। यह महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भूमि पर जमींदारों के उच्च अधिकारों को दूर करने और उनकी आर्थिक एवं राजनीतिक शक्तियों को कम करने में पूर्ण रूप से सफल रहा। निश्चित रूप से, यह बिना संघर्ष के नहीं हो सकता था, लेकिन इसने आखिर में वास्तविक भूस्वामियों एवं स्थानीय कृषकों की स्थिति को मजबूत कर दिया। हालांकि, जमींदारी उन्मूलन ने भूसामंतवाद या पट्टेदारी या साझाकृषि व्यवस्था को पूरी तरह साफ नहीं किया, यह अनेक क्षेत्रों में चलता रहा। कृषिक संरचना की बहुआयामी परतों में फैला हुआ भूमि सामंतवाद केवल सबसे ऊपर वाली परतों में ही समाप्त हुआ।

(ii) पट्टेदारी का उन्मूलन : भू-सुधार के कानूनों के अंतर्गत अन्य मुख्य कानून था पट्टेरारी का उन्मूलन और नियंत्रण या नियमन अधिनियम। उन्होंने या तो पट्टेदारी को पूर्ण रूप से हटाने का प्रयत्न किया या किराए के नियम बनाए जिससे पट्टेदार को कुछ सुरक्षा मिल सके। अधिकतर राज्यों में यह कानून कभी भी प्रभावशाली तरीके से लागू नहीं किया गया। पश्चिम बंगाल और केरल में कृषि संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन आए जिससे पट्टेदार को भूमि के अधिकार प्रदान किए गए।

(ii) हदबंदी अधिनियम : भूमि सुधार की तीसरी मुख्य श्रेणी में भूमि की हदबंदी अधिनियम थे। इन कानूनों के तहत एक विशिष्ट परिवार के लिए जमीन रखने की उच्चतम सीम तय कर दी गई। प्रत्येक क्षेत्र में हदबंदी भूमि के प्रकार, उपज और अन्य इसी प्रकार के कारकों पर निर्भर थी। बहुत अधिक उपजाऊ जमीन की हदबंदी कम थी जबकि अनुपजाऊ, बिना पानी वाली जमीन की हदबंदी अधिक सीमा तक थी। यह संभवतः राज्यों का कार्य था कि वह निश्चित करें कि अतिरिक्त भूमि (हदबंदी सीमा से ज्यादा) को वह अधिगृहित कर लें, और इसे भूमिहीन परिवारों के लिए निर्धारित की गई श्रेणी के अनुसार पुनः वितरित कर दें जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में। परंतु अधिकांश राज्यों में ये अधिनियम दंतविहीन साबित हुए। इसमें बहुत से ऐसे बचाव के रास्ते और युक्तियाँ थीं जिससे परिवारों और घरानों ने अपनी भूमि को राज्यों को देने से बचा लिया था। हालाँकि कुछ बड़ी जागीरों या जायदादों (एस्टेट) को तोड़ दिया गया, लेकिन अधिकतर प्रकरणों में भूस्वामियों ने अपनी भूमि रिश्तेदारो या अन्य लोगों के बीच विभाजित कर दी। इसमें उनके नौकर के नाम भी तथाकथित बेनामी बदल दी गई जिसमें उन्हें जमीन पर नियंत्रण करने का अधिकार दिया गया (वास्तव में उनके नाम नहीं किया गया) कुछ स्थानों पर कुछ अमीर किसानों ने अपनी पत्नी को वास्तव में तलाक दे दिया (परंतु उसी के साथ रहते रहे) सीलिंग अधिनियम की व्यवस्था से बचने के लिए, जो कि एक अविवाहित महिला को अलग हिस्सा देने की अनुमति देता है लेकिन पत्नियों के नहीं।

कृषिक संरचना पूरे देश में बहुत ही भिन्न स्तर पर मिलती है। विभिन्न राज्यों में भूमि सुधार की प्रगति भी असमान रूप से हुई। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि हालाँकि इसमें औपनिवेशिक काल से अब तक वास्तव में परिवर्तन आया, लेकिन अभी भी बहुत असमानता बची हुई है। इस संरचना ने कृषि संबंधी उपज पर ध्यान खींचा। भूमि सुधार न केवल कृषि उपज को अधिक बढ़ाने के लिए बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों से गरीबी हटाने और सामाजिक न्याय दिलाने के लिए भी आवश्यक है।

प्रश्न 10. स्वतंत्रता के पश्चात् ग्रामीण समाज में होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर-स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण समाज में हुए परिवर्तन : स्वातंत्र्योत्तर काल में ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक संबंधों की प्रकृति में अनेक प्रभावशाली रूपांतरण हुए, विशेषत: उन क्षेत्रों में जहाँ हरित क्रांति लागू हुई। ये परिवर्तन निम्न थे :

– गहन कृषि के कारण कृषि मजदूरों का बढ़ोत्तरी। – भुगतान में समान (अनाज) के स्थान पर नगद भुगतान।

– पारंपरिक बंधनों में शिथिलता अथवा भूस्वामी एवं किसान या कृषि मजदूरों (जिन्हें बंधुआ मजदूर भी कहते हैं) के मध्य पुश्तैनी संबंधों में कमी होना।

– “मुक्त’ दिहाड़ी मजदूरों के वर्ग का उदय।

  • भूस्वामियों (जो अधिकतर प्रबल जाति के होते थे) तथा कृषि मजदूरों के (अधिकतर निम्न जातियों के) मध्य संबंधों की प्रकृति में परिवर्तन का वर्णन समाजशास्त्री जान ब्रेमन ने ‘संरक्षण से शोषण’ की ओर बदलाव में किया था। ऐसे परिवर्तन उन विभिन्न क्षेत्रों में हुए जहाँ कृषि का व्यापारीकरण अधिक हुआ, अर्थात् जहाँ फसलों का उत्पादन मूल रूप से बाजार में बिक्री के लिए किया। मजदूर संबंधों का यह परिवर्तन कुछ विद्वानों द्वारा पूँजीवादी कृषि की ओर एक परिवर्तन के रूप में देखा जाता है क्योंकि पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था, उत्पादन के साधन (इस मामले में भूमि) तथा प्रजदूरों के पृथक्कीकरण तथा ‘मुक्त’ दिहाड़ी मजदूरों के प्रयोग पर आधारित होती है। सामान्यतः यह सच है कि अधिक विकसित क्षेत्रों के किसान अधिक बाजारोन्मुखी हो रहे थे। कृषि के अधिक व्यापारीकरण के कारण ये ग्रामीण क्षेत्र भी विस्तृत अर्थव्यवस्था से जुड़ते जा रहे थे। इस प्रक्रिया से मुद्रा का गाँवों की ओर बहाव बढ़ा तथा व्यापार के अवसरों व रोजगार में विस्तार हुआ लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवर्तन की यह प्रक्रिया वास्तव में औपनिवेशिक काल में प्रारंभ हुई थी। उन्नीसवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में भूमियों के बड़े टुकड़े कपास की कृषि के लिए दिए गए थे, तथा कपास की कृषि करने वाले किसान सीधे विश्व बाजार से जुड़ गए। हालाँकि इसकी गति तथा विस्तार में स्वतंत्रता के पश्चात् तेजी से परिवर्तन हुआ, क्योंकि सरकार ने कृषि की आधुनिक पद्धतियों को प्रोत्साहित किया तथा अन्य रणनीतियों द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण का प्रयास किया। राज्य ने ग्रामीण अधिसंरचना जैसे सिंचाई सुविधाएँ, सड़कें तथा सरकारी समितियों द्वारा उधार की सुविधा में निवेश किया। ग्रामीण विकास के इन प्रयासों का समग्र परिणाम न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा कृषि में रूपांतरण था बल्कि संरचना तथा ग्रामीण समाज में भी रूपांतरण था।

1960 व 1970 के दशक में कृषि विकास द्वारा ग्रामीण सामाजिक संरचना को परिवर्तित करने वाला एक तरीका नई तकनीक अपनाने वाले मध्यम तथा बड़े किसानों की समृद्धि थी। अनेक कृषि संपन्न क्षेत्रों जैसे तटीय आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा मध्य गुजरात में प्रबल जातियों में संपन्न किसानों ने कृषि से होने वाला लाभ को अन्य प्रकार के व्यापारों में निवेश करना प्रारंभ कर दिया था। विविधता की इस प्रक्रिया ने नए उद्यमी समूहों का जन्म हुआ जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों से इन विकासशील क्षेत्रों के बढ़ते कस्बों की ओर पलायन किया, जिससे नए क्षेत्रीय अभिजात वर्गों का जन्म हुआ और जो आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से प्रबल हो गए। वर्ग संरचना के इस परिवर्तन के साथ ही ग्रामीण तथा अर्द्ध-नगरीय क्षेत्रों में उच्च का विस्तार, विशेषतः निजी व्यावसायिक महाविद्यालयों की स्थापना से नव ग्रामीण अभिजालो द्वारा अपने बच्चों को शिक्षित

करना संभव हो सका, जिनमें से अनेक ने व्यावसायिक अथवा श्वेत वस्त्र व्यवसाय अपनाए अथवा व्यापार प्रारंभ कर नगरीय मध्य वर्गों के विस्तार में सहयोग किया।

इस प्रकार त्वरित कृषि विकास वाले क्षेत्रों में पुराने भूमि अथवा कृषि समूह का समेकन हुआ, जिन्होंने स्वयं को एक गतिमान उद्यमी, ग्रामीण नगरीय प्रबल वर्ग के रूप में परिवर्तित कर लिया। लेकिन अन्य क्षेत्रों जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में प्रभावशाली भू-सूधारों का अभाव, राजनीतिक गतिशीलता तथा पुनर्वितरण के साधनों के कारण वहाँ तुलनात्मक रूप में कृषिक संरचना तथा अधिकांश लोगों की जीवन दशाओं में अल्प बदलाव हुए। इसके विपरीत केरल जैसे राज्य विकास की एक भिन्न प्रक्रिया से गुजरे जिसमें राजनीतिक गतिशीलता, पुनर्वितरण के साधन तथा बाह्य अर्थव्यवस्था (मूल रूप से खाड़ी के देश) से जुड़ाव ने ग्रामीण परिवेश में भरपूर बदलाव किया। केरल में ग्रामीण क्षेत्र मूल से कृषि प्रधान होने के बजाय मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला है जिनमें कुछ कृषि कार्य खुदरा विक्रय तथा सेवाओं के एक विस्तृत संजाल के साथ जुड़ा हुआ है, और जहाँ एक बड़ी संख्या में परिवार विदेश से भेजे वाले धन पर निर्भर है।

प्रश्न 11. भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण का भारतीय कृषि तथा ग्रामीण समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर-उदारीकरण की नीति जिसका अनुसरण भारत 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से कर रहा है, का कृषि तथा ग्रामीण समाज पर बहुत महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है।

(i) खाद्यान्नों का आयात : इस नीति के अंतर्गत व्यापार संगठन (डब्लू.टी.ओ.) में भागीदारी होती है, जिसका उद्देश्य अधिक मुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था है, और जिसमें भारतीय बाजारों को आयात हेतु खोलने की आवश्यकता है। दशकों तक सरकारी सहयोग और संरक्षित बाजारों, के बाद भारतीय किसान अंतर्राष्ट्रीय बाजार से प्रतिस्पर्धा हेतु प्रस्तुत है। उदाहरण के लिए हम सभी ने आयातित फलों तथा अन्य खाद्य सामग्री को अपने स्थानीय बाजारों में देखा है-ये वे वस्तुएँ हैं जो कुछ वर्ष पूर्व तक आयात प्रतिबंधों के कारण उपलब्ध नहीं थीं। हाल ही में भारत ने गेहूँ के आयात का भी फैसला किया, जो एक विवादास्पद फैसला था जिसने खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता की पूर्व नीति को उलट दिया। और साथ ही जो स्वतंत्रता के बाद के प्रारंभिक वर्षों में अमेरिका के खाद्यान्न पर हमारी निर्भरता के कटु स्मृति कराता है।

(ii) कृषि का अंतर्राष्ट्रीयकरण : कृषि के भूमंडलीकरण की प्रक्रिया अथवा कृषि को विस्तृत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सम्मिलित किए जाने के फलस्वरूप किसानों और ग्रामीण समाज पर सीधा प्रभाव पड़ा है। उदाहरणार्थ पंजाब और कर्नाटक जैसे कुछ क्षेत्रों में किसानों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों (जैसे पेप्सी, कोक) से कुछ निश्चित फसलें (जैसे टमाटर और आलू) उगाने की विदा दी गई है, जिन्हें ये कंपनियाँ उनसे प्रसंस्करण अथवा निर्यात हेतु खरीद लेती हैं।

ऐसी ‘संविदा खेती पद्धति में, कंपनियाँ उगाई जाने वाली फसलों की पहचान करती हैं, बीज तथा अन्य वस्तुएँ निवेशों के रूप में उपलब्ध करवाती हैं, साथ ही जानकारी तथा अक्सर कार्यकारी पूँजी भी देती हैं। बदले में किसान बाजार की ओर से आश्वस्त रहता है क्योंकि कंपनी पूर्वनिर्धारित तय मूल्य पर उपज के क्रय का आश्वासन देती है। ‘संविदा खेती’ कुछ विशिष्ट मदों जैसे फूल (कट फ्लावर), अंगूर, अंजीर तथा अनार जैसे फल, कपास तथा फल, कपास तथा तिलहन के लिए आजकल बहुत साधारण बात है। जहाँ ‘संविदा खेती’ किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है वहीं यह किसानों के लिए अधिक असुरक्षा भी बन जाती है, क्योंकि वे अपने जीवन व्यापार के लिए इन कंपनियों पर ही आश्रित हो जाते हैं। निर्यातोन्मुखी उत्पाद जैसे फूल और खीरे हेतु ‘संविदा खेती’ का अर्थ यह भी है कि कृषि भूमि का प्रयोग खाद्यान्न उत्पादन से हटकर किया जाता है। ‘संविदा खेती’ का समाजशास्त्रीय महत्व यह है कि यह बहुत से व्यक्तियों को उत्पादन प्रक्रिया से अलग कर देती है, तथा उनके अपने देशीय कृषि ज्ञान को निरर्थक बना देती है। इसके अतिरिक्त सविदा खेती मूल रूप से अभिजात मदों का उत्पादन करती है तथा चूंकि यह अक्सर खाद तथा कीटनाशक का उच्च मात्रा में प्रयोग करते हैं, इसलिए यह बहुधा पर्यावरणीय दृष्टि से असुरक्षित होती है।

3 बहुर्राष्ट्रीय कंपनियों का आगमन : कृषि के भूमंडलीकरण का एक अन्य तथा अधिक प्रचलित पक्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों का इस क्षेत्र में कृषि मदों जैसे बीज, कीटनाशक तथा खाद के विक्रेता के रूप में प्रवेश है। पिछले दशक के आसपास से सरकार ने अपने कृषि विकास कार्यक्रमों में कमी की है तथा ‘कृषि विस्तार’ एजेन्टों ने ले लिया है। ये एजेंट अक्सर किसानों के लिए बीजों तथा कृषि कार्य हेतु जानकारी एकमात्र स्रोत होते हैं, और नि:संदेह वे अपने उत्पाद बेचने के इच्छुक होते हैं। इससे किसानों की महँगी खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता अधिक बढ़ी है, जिससे उनका लाभ कम हुआ है, बहुत से किसान ऋणी हो गए हैं, तथा ग्रामीण क्षेत्र से पर्यावरण संकट भी पैदा हुआ है। ___

भारत के किसान सदियों से समय-समय पर सूखे, फसल न होने अथवा ऋण के कारण परेशानी का सामना करते रहे हैं। किंतु किसानों द्वारा आत्महत्या की प्रघटना नई जान पड़ती है। इस प्रघटना की व्याख्या समाजशस्त्रियों ने कृषि तथा कृषिक समाज में होने वाले संरचनात्मक तथा सामाजिक परिवर्तनों के परिप्रेक्ष्य में करने का प्रयास किया है। ऐसी आत्महत्याएँ ‘मैट्रिक्स घटनाएँ’ बन गई हैं, अर्थात् जहाँ कारकों की एक श्रृंखला मिलकर एक घटना बनाती हैं। आत्महत्या करने वाले बहुत से किसान ‘सीमांत किसान’ होते हैं, जो मूल रूप से हरित क्रांति के तरीकों का प्रयोग करके अपनी उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे।

प्रश्न 12. भारतीय समाज में भूमि सुधार कार्यक्रमों के प्रभावों की चर्चा करें।

[M.Q.2009A]

उत्तर-स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कृषि पर आधारित हमारे अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए भूमि-सुधार कार्यक्रम चलाया गया, आजादी से पहले भारतीय समाज में भूमि सम्बन्ध अत्यन्त त्रुटिपूर्ण था, खेत जोतनेवाला किसान तथा सरकारी शासनतंत्र के बीच एक बिचौलिया वर्ग हुआ करता था जिन्हें जमींदार कहा जाता था, उनका एक मात्र उद्देश्य खेत जोतनेवाला किसानों का भरपूर शोषण करना, कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था को स्व-निर्भर बनाने एवं किसानों को सामाजिक तथा आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए भूमि-सुधार कार्यक्रम चलाये गए, इसके अतिरिक्त भूमि-सुधार कार्यक्रम के दो और उद्देश्य थे-भूमि की हदबन्दी तथा छोटे आकार के जमीनों का चकबन्दी। भारत में पिछले 50 वर्षों में कुछ निश्चित प्रान्तों जैसे-पश्चिम बंगाल एवं केरल आदि को छोड़कर शायद ही अन्य प्रान्तों में भूमि-सुधार कार्यक्रम को वांछित सफलता मिली है।

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