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bihar board class 12 civics notes | समकालीन विश्व राजनीति

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bihar board class 12 civics notes | समकालीन विश्व राजनीति

समकालीन विश्व राजनीति
                                          (THE COLD WAR ERA)
                                                 याद रखने योग्य बातें
• शीतयुद्ध (Cold war) : वह तनावपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक स्थिति जो द्वितीय
विश्वयुद्ध के बाद 1945 से 1990 तक जारी रही, उसे शीतयुद्ध की संज्ञा दी जाती है।
• समकालीन विश्व राजनीति की शुरुआत (Beginning of Contemporary
World Politics) : 1990 ई. में शीत युद्ध की समाप्ति को समकालीन विश्व राजनीति
की शुरुआत माना जाता है।
• दो महाशक्तियाँ (Two Great Powers) : द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त संयुत राज्य
अमेरिका तथा सोवियत संघ दो महाशक्तियाँ कहलाई।
• गुट निरपेक्ष आन्दोलन (NAM (Non-alignment Movement)] : वह आन्दोलन
जो गुट निरपेक्षता की नीति का अनुसरण करने वाले राष्ट्रों द्वारा दोनों महाशक्तियों के
दबदबे को चुनौती देने की दृष्टि से शुरू किया गया।
• नव अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic System):
वह नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक नीति जो उदारीकरण, वैश्वीकरण एवं निजीकरण की पक्षधर
है। गत 40 वर्षों से भी ज्यादा समय से विश्व के अधिकांश देश इस व्यवस्था के पक्षधर
हो गये हैं।
• सी०आई०ए० (C.I.A.) : संयुक्त राज्य अमेरीका की खुफिया एजेंसी।
• क्यूबा (परिचय) : संरा अमेरिका के तट से लगा हुआ एक छोटा-सा द्वीपीय देश है।
• क्यूबा का मिसाइल संकट (Cuban Missles Crisis): अप्रैल 1961 से 1962 तक।
• फिदेल कास्त्रो : क्यूबा के राष्ट्रपति रहे।
• मित्र राष्ट्र (Ailied Powers) : द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन, सं• रा- अमेरिका, फ्रांस
तथा सोवियत संघ को मित्र राष्ट्र कहा गया।
• धुरी-राष्ट्र (Axis-powers) : जर्मनी, इटली तथा जापान को द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी
राष्ट्र गया गया।
• लिटिल ब्यॉय और फैट मैन (Little boy and Fat Man) : अमेरिका द्वारा दो परमाणु
बमों को दिए गए गुप्त नाम।
• पारस्परिक अवरोध (Mutual Deterrence) : संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और सोवियत
संघ के दिमाग में जो परामणु बमों के प्रयोग होने के फलस्वरूप जो भय था जिसे दोनों
राष्ट्रों ने स्वंय अपने लिए भयंकर बर्बादी लाने का कारण मानकर (शीतयुद्ध के काल में)
परमाणु बमों के प्रयोग से परहेज किया वही पारस्परिक अवरोध (रोक और संतुलन) कहा
गया।
• दो ध्रुवीय विश्व का आरंभ (The Emergence of two power blocs) : शीतयुद्ध
काल में पश्चिमी यूरोपीय देशों में से ज्यादातर सं० रा• अमेरिका के खेमे में तथा पूर्वी
यूरोप के अधिकांश देशों ने सोवियत संघ के खेमे में शामिल होने (NATO) का निर्णय
लिया।
• कांगो संकट (Congo Crisis) : 1960 के दशक की शुरुआत में।
       एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक एवं अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न एवं उनके उत्तर
                                                वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1. शीतयुद्ध के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?  [NCERT T.B.Q.1]
(क) यह संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ और उनके साथी देशों के बीच की एक
प्रतिस्पर्धा थी?
(ख) यह महाशक्तियों के बीच विचारधाराओं को लेकर एक युद्ध था।
(ग) शीतयुद्ध ने हथियारों की होड़ शुरू की।
(घ) अमेरिका और सोवियत संघ सीधे युद्ध में शामिल थे।
                                   उत्तर-(घ)
2. निम्न में से कौन-सा कथन गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों पर प्रकाश नहीं डालता?
                                                                                 [ NCERT T.B.Q.2]
(क) उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों को स्वतंत्र नीति अपनाने में समर्थ बनाना।
(ख) किसी भी सैन्य संगठन में शामिल होने से इंकार करना।
(ग) वैश्विक मामलों में तटस्थता की नीति अपनाना।
(घ) वैश्विक आर्थिक असमानता की समाप्ति पर ध्यान केंद्रित करना।
                                         उत्तर-(ग)
3. नीचे महाशक्तियों द्वारा बनाए सैन्य संगठनों की विशेषता बताने वाले कुछ कथन
दिए गए हैं। प्रत्येक कथन के सामने सही या गलत का चिह्न लगाएँ। [NCERT T.B.Q.31]
(क) गठबंधन के सदस्य देशों को अपने भू-क्षेत्र में महाशक्तियों के सैन्य अड्डे के लिए
स्थान देना जरूरी था।
(ख) सदस्य देशों को विचारधारा और रणनीति दोनों स्तरों पर महाशक्ति का समर्थन
करना था।
(ग) जब कोई राष्ट्र किसी एक सदस्य-देश पर आक्रमण करता था तो इसे सभी सदस्य
देशों पर आक्रमण समझा जाता था।
(घ) महाशक्तियाँ सभी सदस्य देशों को अपने परमाणु हथियार विकसित करने में मदद
करती थीं।
                उत्तर-(क) सही (ख) सही (ग) सही (घ) गलत।
4. नीचे कुछ देशों की एक सूची दी गई है। प्रत्येक के सामने लिखें कि वह शीतयुद्ध
के दौरान किस गुट से जुड़ा था?                                  [NCERT T.B.Q.4]
(क) पोलैंड
(ख) फ्रांस
(ग) जापान
(घ) नाइजीरिया
(ङ) उत्तरी कोरिया
(च) श्रीलंका
उत्तर-(क) पोलैण्ड―सोवियत संघ के साम्यवादी गुट में।
(ख) फ्रांस-सं-रा- अमेरिका के पूँजीवादी गुट में।
(ग) जापान―सं-रा- अमेरिका के पूँजीवादी गुट में।
(घ) नाइजीरिया―गुटनिरपेक्ष में।
(ङ) उत्तरी कोरिया―सोवियत संघ के साम्यवादी गुट में।
(च) श्रीलंका―गुटनिरपेक्ष में।
5. प्रायः अधिकांश विद्वान शीतयुद्ध का दौर मानते हैं-
(क) 1945 से 1990 तक
(ख) 1914 से 1918 तक
(ग) 1939 से 1945 तक
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं।                               उत्तर-(क)
6. शीतयुद्ध की समाप्ति का एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम अनुभव किया गया-
(क) गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रारंभ
(ख) समकालीन विश्व राजनीति की शुरुआत।
(ग) संयुक्त राष्ट्रसंघ का जन्म
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं।                              उत्तर-(ख)
7. द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त दो महाशक्तियाँ उभर कर सामने आयी थीं-
(क) संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन
(ख) सोवियत संघ और यूनाइटेड किंगडम
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ
(घ) उपर्युक्त में कोई भी नहीं।                          उत्तर-(ग)
8. “गुटनिरपेक्ष आन्दोलन पर मुख्य रूप से विचार किया गया था-
(क) दो महाशक्तियों के दबदबे को चुनौती देने की दृष्टि से
(ख) भारत में सुपर पावर (सर्वोच्च शक्ति) बनाने के लिए
(ग) नव अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था लाने के के लिए
(घ) उपर्युक्त में कोई भी नहीं।                           उत्तर-(क)
9. आइवो जीवा, की लड़ाई (23 फरवरी, 1945) जिन दो देशों में हुई थी वे थे-
(क) जापान और सोवियत संघ।
(ख) जापान और अमेरिका।
(ग) जर्मनी और अमेरिका
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं।                                उत्तर-(ख)
10. मई, 1945 में राइस्टैग विल्डिंग (बर्लिन, जर्मनी) पर जिस देश के सैनिकों ने झण्डा
फहराया था, उसका नाम था-
(क) सोवियत संघ
(ख) फ्रांस
(ग) ब्रिटेन
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं                               उत्तर-(क)
11. क्यूवा मिसाइल संकट के समय सोवियत संघ का नेतृत्व जिस नेता के हाथों में था
उसका नाम था-
(क) फिदले कास्त्रो
(ख) निकिता खुश्चेव
(ग) स्तालिन
(घ) गोर्बाचेव।                                            उत्तर-(ख)
12. क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा परमाणु हथियार तैनात करने की भनक अमरीकियों
को जितने हफ्तों बाद लगी थी उनकी संख्या थी-
(क) तीन
(ख) तेरह
(ग) तेईस
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं                               उत्तर-(क)
13. द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के दौरान मित्रराष्ट्रों की अगुआई जो देश कर रहे
थे, वे थे-
(क) भारत, पाकिस्तान, ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका
(ख) सोवियत संघ, जर्मनी, जापान तथा इटली
(ग) अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस
(घ) जर्मनी, जापान, इटली तथा ऑटोमन तुर्की।              उत्तर-(ग)
14. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान धुरी राष्ट्रों की अगुआई कर रहे थे-
(क) जर्मनी, इटली और जापान
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ और चीन
(ग) हिन्द-चीन, श्रीलंका तथा फ्रांस
(घ) उपर्युक्त में कोई भी नहीं                                      उत्तर-(क)
15. निम्नलिखित में कौन सही है?                             [B.M. 2009A]
(क) भारत की गुटनिरपेक्षता नीति का अर्थ पश्चिमी जगत और साम्यवादी गुट से अलग
रहने की नीति थी।
(ख) गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के चलते भारत अमेरिका और सोवियत संघ दोनों
की सहायता प्राप्त कर सका।
(ग) गुटनिरपेक्षता की नीति के चलते भारत ने विश्व में अपनी पहचान बनाई।
(घ) उपर्युक्त सभी                                 उत्तर-(घ)
16. शीतयुद्ध के संबंध में निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही नहीं है? [B.M. 2009A]
(क) यह दो महाशक्तियों के बीच विचारधाराओं को लेकर एक युद्ध था।
(ख) यह अमेरिका, सोवियत संघ और उनके मित्र देशों के बीच की एक प्रतिस्पर्धा थी।
(ग) शीतयुद्ध के चलते हथियारों की होड़ प्रारंभ हुई।
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ सीधे युद्ध में सम्मिलित थे।
                                                  उत्तर-(घ)
17. शीत युद्ध सबसे बड़ा प्रतीक थी :                       [B.M. 2009A]
(क) बर्लिन दीवार का खड़ा किया जाना।
(ख) 1989 में पूर्वी जर्मनी की आम जनता द्वारा बर्लिन दीवार का गिराया जाना
(ग) जर्मनी में द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व एडोल्फ हिटलर के नेतृत्व में नाजी पार्टी का
उत्थान।
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं                     उत्तर-(क)
18. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के संस्थापकों में निम्नलिखित में से कौन-सा एक था?
                                                                             [B.M. 2009A]
(क) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
(ख) जवाहर लाल नेहरू
(ग) महात्मा गाँधी
(घ) डॉ. वी. आर. अम्बेदकर                      उत्तर-(ख)
19. शीत युद्ध के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है? [B.M. 2009A]
(क) यह संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ और उसके साथी देशों के बीच की एक
प्रतिस्पर्धा थी।
(ख) यह महाशक्तियों के बीच विचारधाराओं को लेकर एक युद्ध था।
(ग) शीत युद्ध ने हथियारों की होड़ शुरू की।
(घ) अमेरिका और सोवियत संघ सीधे युद्ध में शामिल थे।
                                                              उत्तर-(घ)
20. निम्न में से कौन-सा कथन गुट-निरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों पर प्रकाश नहीं डालता?
                                                                                      [B.M. 2009A]
(क) उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों को स्वतंत्र नीति अपनाने में समर्थ बनाना।
(ख) किसी भी सैन्य संगठन में शामिल होने से इंकार करना।
(ग) वैश्विक मामलों में आर्थिक तटस्थता की नीति अपनाना।
(घ) वैश्विक आर्थिक असमानता की समाप्ति पर ध्यान केन्द्रित करना।
                                                           उत्तर-(ग)
21. गुटनिरपेक्ष आंदोलन हेतु प्रथम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन कब हुआ?        [B.M. 2009A]
(क) 1947
(ख) 1950
(ग) 1961
(घ) 1963                                           उत्तर-(ग)
22. शीतयुद्ध काल में वारसा पैक्ट का संबंध किस गठबंधन से था?        [B.M. 2009A]
(क) सोवियत गठबंधन
(ख) अमेरिकी गठबंधन
(ग) गुटनिरपेक्ष गठबंधन
(घ) इनमे से कोई नहीं                           उत्तर-(क)
                                      अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
1. सन् 1945 से 1990 के मध्य की किन्हीं चार महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं का
उल्लेख कीजिए।
Mention any four important political events took place between 1945 to
1990.
उत्तर-(1) दो नयी महाशक्तियों : संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ का उदय।
(2) तृतीय दुनिया के अधिकांश देशों-एशियाई (जापान को छोड़कर), अफ्रीकी तथा लैटिन
अमेरिकी देशों की उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद से मुक्ति।
(3) संयुक्त राष्ट्र का गठन।
(4) शीतयुद्ध का प्रारंभ (1945 से) तथा अन्त (1990)।
(5) गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का जन्म तथा प्रचार-प्रसार।
(6) शीतयुद्ध की समाप्ति के उपरान्त समकालीन विश्व राजनीति की शुरुआत तथा
उदारीकरण, वैश्वीकरण का प्रारंभ।
2. भारत अमेरिकी सम्बन्धों की उत्पत्ति कैसे हुई?
Describe the origin of Indo-US relations.
उत्तर-भारत और अमेरिका के सम्बन्ध पुराने हैं। स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व राष्ट्रीय आन्दोलन
के समय से ही अमेरिका भारत के प्रति सहानुभूति रखता था और उसने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को सहारा दिया था। इस हेतु द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में अमेरिका ने ब्रिटेन पर दबाव बनाया कि भारत को भी आत्मनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिए। भारत के लोगों के प्रति अमेरिका की सहानुभूति सोवियत प्रभाव को रोकने के उद्देश्य से भी थी।
3. द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थिति
का वर्णन कीजिए।
What was the position of U.S.A. in international politics after Second
World War?
उत्तर-द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का सबसे शक्तिशाली
राष्ट्र था। उस पर समस्त विश्व के नेतृत्व का उत्तरदायित्व था। दूसरा शक्तिशाली देश सोवियत
रूस था जो अन्तर्राष्ट्रीय साम्यवादी क्रांति का कार्य करता था। पश्चिमी यूरोप के देश शक्तिशून्य
हो चुके थे। अफ्रीका और एशिया के देशों में आर्थिक दरिद्रता छाई हुई थी। इन देशों में साम्यवाद
के प्रसार को रोकने के लिए अमेरिका ने अपनी विदेश नीति को साम्यवाद के प्रसार की रोक पर
आधारित बनाया।
4. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका की विदेश नीति के दो प्रमुख सिद्धान्त बनाइए।
Mention two main principles of Foreign Policy of America after Second
World War.
उत्तर-द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति के आधार ‘स्वतंत्र
जगत की रक्षा’ तथा ‘साम्यवाद के प्रसार की रोक’ ये दो सिद्धान्त थे। टूमैन सिद्धांत, मार्शल
योजना, ‘आइजन हावर सिद्धांत’ इसी नीति के परिणाम थे।
5. ‘साप्यवाद के प्रसार की रोक’ के लिए अमेरिका ने क्या कदम उठाए?
Mention the steps taken by United State of America to check the spread of Communist Ideology
उत्तर- संयुक्त राज्य अमेरिका में साम्यवादी प्रसार की रोक के लिए टूमैन सिद्धांत, मार्शल योजना तथा आइजन हावर सिद्धांत बनाए।
अमेरिका ने 1971 तक चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ से पृथक रखा तथा कश्मीर के मामले में
पाकिस्तान का पक्ष लिया। पूर्वी एशिया के देशों में आर्थिक तथा सैनिक सहायता दी। सुदूर पूर्व में
जापान के साथ सैनिक सन्धि की तथा यूरोप में स्पेन और पश्चिमी जर्मनी के साथ। अंग्रेजों और
फ्रांसीसियों के उपनिवेशवाद की भी उसने अधिक तीव्र शब्दों में निन्दा नहीं की तथा पाकिस्तान
को सैनिक सहायता प्रदान की।
6. उन कारणों का वर्णन कीजिए जिनके कारण संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए भारत
की मित्रता आवश्यक थी।
What were the causes which affects the United States of America to keep the friendship with India?
उत्तर-भारत और अमेरिका दोनों ही बड़े लोकतंत्र हैं। भारत की औद्योगिक नीति जिसमें
भारत व्यक्तिगत उद्योग-धन्धों के भी विरुद्ध नहीं है, अमेरिका को प्रिय है। दोनों ही देश संयुक्त
राष्ट्र चार्टर का पालन करते हैं। दोनों देशों के कई दृष्टिकोणों में मौलिक एकता है। विश्व शान्ति
तथा सुरक्षा के प्रश्न पर जनतंत्रीय प्रगति के विषय में, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा विधि के अधिनियम (Rule of Law) के प्रश्नों पर दोनों देशों में एक मत है।
7. 1960 के दशक में किस संकट को ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ के रूप में जाना गया?
Which crisis was known as the Cuban Missile Crisis in 1960s?
उत्तर-क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा परमाणु हथियार तैनात करने की भनक अमरीकियों को
तीन हफ्ते बाद लगी। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी और उनके सलाहकार ऐसा कुछ भी
करने से हिचकिचा रहे थे जिससे दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध शुरू हो जाए। लेकिन वे इस
बात को लेकर दृढ़ थे कि खुश्चेव क्यूबा से मिसाइलों और परमाणु हथियारों को हटा लें। कैनेडी
ने आदेश दिया कि अमेरिकी जंगी बेड़ों को आगे करके क्यूबा की तरफ जाने वाले सोवियत जहाजों को रोका जाए। इस तरह अमेरिका सोवियत संघ को मामले के प्रति अपनी गंभीरता की चेतावनी देना चाहता था। ऐसी स्थिति में यह लगा कि युद्ध होकर रहेगा। इसी को क्यूबा ‘मिसाइल संकट’ के रूप से जाना गया। इस संघर्ष की आशंका ने पूरी दुनिया को बेचैन कर दिया। यह टकराव कोई आम युद्ध नहीं होता। अंतत: दोनों पक्षों ने युद्ध टालने का फैसला किया और दुनिया ने चैन की साँस ली। सोवियत संघ के जहाजों ने या तो अपनी गति धीमी कर ली या वापसी का रुख कर लिया।
8. शीत युद्ध क्या है? (What is Cold War?)                   [B.M.2009A]
उत्तर-शीत युद्ध से हमारा अभिप्राय ऐसी अवस्था है जब दो या दो से अधिक देशों के
बीच वातावरण उत्तेजित व तनावपूर्ण हो किंतु वास्तविक रूप में कोई युद्ध न हो रहा हो। द्वितीय
विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ अमेरिका के बाद दूसरी बड़ी ताकत बनकर उभरा। हालाँकि युद्ध
के दौरान ब्रिटेन, अमेरिका और सोवियत संघ ने मिलकर फासीवादी ताकतों को हराया था लेकिन
युद्ध के बाद उनमें टकराव और तनाव उभरने लगे और उनके संबंध बिगड़ने लगे। इसी टकराव
व तनावपूर्ण स्थिति को शीत युद्ध के नाम से जाना जाता है।
9. जवाहर लाल नेहरू कौन थे? विश्व नेता के रूप में उनकी भूमिका सम्बन्धी कुछ
महत्त्वपूर्ण बिन्दु लिखिए।
Who was Jawaharlal Nehru? Write some important points related with
his role as an international leader.
उत्तर-जवाहरलाल नेहरू (1889-1964) भारत के पहले प्रधानमंत्री (1947-64) थे। वे
विश्व में शांति के महान दूत के रूप में विख्यात हैं। उन्होंने अफ्रीकी एशियाई एकता;
अनौपनिवेशीकरण और निरस्तीकरण के प्रयास किए और विश्व-शांति के लिए शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की वकालत की।
10. जोसेफ ब्रॉज टीटो कौन थे? संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Who was Joseph Broz Tito? Give a brief introduction.
उत्तर-जोसेफ ब्रॉज टीटो (1892-1980) यूगोस्लाविया के शासक (1940-80) रहे। वह
दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी के खिलाफ लड़े थे। उन्होंने साम्यवादी, सोवियत संघ से दूरी बनाए
रखी तथा यूगोस्लाविया में एकता कायम की वह गुट निरपेक्षता आदोलन के समर्थक थे।
11. गमाल अब्दुल नासिर कौन थे? उनकी अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भूमिका के प्रथम विन्दुओं
का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
Who was Gamal Abdul Nasser? Mention briefly the main points of his role in internal field.
उत्तर-गमाल अब्दुल नासिर (Gamal Abdul Nasser)-गमाल अब्दुल नासिर
(1918-70) सन् 1970 तक मिस का शासक रहा था। वह अरब राष्ट्रवाद, समाजवाद और
साम्राज्यवाद-विरोध के लिए प्रतिबद्ध था। उसने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया इसकी वजह से सन् 1956 में अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष हुआ।
12. सुकर्णो कौन थे? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Who was Sukamo? Give his brief introduction.
उत्तर-सुकर्णो (Sukarmo)- इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति (1945-65) थे। उन्होंने देश
के स्वतंत्रता संग्राम को नेतृत्व प्रदान किया था। वह समाजवाद और साम्राज्यवाद विरोध के लिए
प्रतिबद्ध थे। बाडुग सम्मेलन के आयोजक थे। एक सैनिक विद्रोह में उनका तख्ता पलट हुआ था।
13. वामे एनक्रूमा कौन था? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Who tvas Kwame Nkrumah? Give his introduction.
उत्तर-वामे एनक्रूमा-(1909-1972) घाना (अफ्रीका) के पहले प्रधानमंत्री (1952-66)
थे। वह अपने देश की आजादी की लड़ाई के अगुआ थे। अफ्रीकी एकता और समाजवाद के पक्षधर। नव-उपनिवेशवाद का विरोध किया। सैनिक षड्यंत्र में इनका तख्ता पलट हुआ।
14. पहला गुटनिरपेक्ष सम्मेलन कब और कहाँ हुआ था? यह कौन-सी तीन वातों की
परिणति (Culnination) था ?
उत्तर-1 पहला गुट निरपेक्ष सम्मेलन 1961 में बेलग्रेड में हुआ था।
II. पहला गुटनिरपेक्ष सम्मेलन कम-से-कम निम्नलिखित तीन बातों की परिणति था-(1)
पाँच देशों (भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया, इण्डोनेशिया तथा याना) के बीच सहयोग। (2) शीतयुद्ध
का प्रसार और इसके बढ़ते हुए दायरे को रोकना, और (3) अन्तर्राष्ट्रीय फलक (Arena) पर कई
नव स्वतंत्र अफ्रीकी राष्ट्रों का नाटकीय उदय हो चुका था। सन् 1960 तक 16 नये अफ्रीकी देश
संयुक्त राष्ट्र (UNO) में सदस्यता ग्रहण कर चुके थे।
15. “गुटनिरपेक्षता का मतलब पृथक्तावाद नहीं हैं।” समझाइए।
The meaning of Non-aligneal is not Isolation.” Explain.
उत्तर-गुटनिरपेक्षता का मतलब पृथक्तावाद नहीं। पृथक्तावाद का अर्थ होता है अपने को
अंतर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखना। 1787 में अमेरिका में स्वतंत्रता की लड़ाई हुई थी। इसके
बाद से पहले विश्वयुद्ध की शुरुआत तक अमेरिका ने अपने को अंतर्राष्ट्रीय मामलों से अलग
रखा। पृथक्तावाद की विदेश नीति अपनाई थी। इसके विपरीत गुटनिरपेक्ष देशों ने, जिसमें भारत
भी शामिल है, शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच मध्यस्थता में सक्रिय भूमिका निभाई। गुटनिरपेक्ष देशों की ताकत की जड़ उनकी आपसी एकता और महाशक्तियों द्वारा अपने-अपने खेमे में शामिल करने की पुरजोर कोशिशों के बावजूद ऐसे किसी खेमे में शामिल न होने के उनके संकल्प में है।
16. “गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता का धर्म निभाना नहीं है।” संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
“Non-alignment is not nuetality.” Make clear in brief.
उत्तर-गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता का धर्म निभाना भी नहीं है। तटस्थता का अर्थ होता
है मुख्यतः शुद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना। तटस्थता की नीति का पालन करने
वाले देश के लिए यह जरूरी नहीं कि वह युद्ध को समाप्त करने में मदद करे। ऐसे देश युद्ध में
संलग्न नहीं होते और न ही युद्ध के सही-गलत होने के बारे में उनका कोई पक्ष होता है। दरअसल
कई कारणों से गुटनिरपेक्ष देश, जिसमें भारत भी शामिल है, युद्ध में शामिल हुए हैं। इन देशों ने
दूसरे देशों के बीच युद्ध को होने से टालने के लिए काम किया है और हो रहे युद्ध के अंत के लिए
प्रयास किए हैं।
17. गुटनिरपेक्षता से क्या अभिप्राय है?
What is meant by the term Non-alignment?
उत्तर-गुटनिरपेक्षता की नीति का अर्थ है किसी देश अथवा राष्ट्र का अन्य बहुत-से देशों
द्वारा बनाए गए सैनिक गुटों में सम्मिलित न होना तथा किसी भी गुट या राष्ट्र के कार्य की सराहना
या निन्दा आँख बन्द करके बिना-सोचे समझे न करना। जब कोई राष्ट्र अथवा देश किसी गुट में
सम्मिलित हो जाता है तो उस गुट की प्रत्येक कार्यवाही को उचित ही बताना पड़ता है चाहे वह
वास्तव में उचित हो न हो। वास्तविकता है कि गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने वाला राष्ट्र अपने
लिए एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्धारण करता है। वह राष्ट्र अच्छाई या बुराई, उचित व अनुचित
का निर्णय स्वविवेक से करता है न कि किसी गुट अथवा बड़े राष्ट्र के दबाव में आकर करता है।
18. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में कुल कितने सदस्य देश हैं?
How many nations are the members of Non-aligned Movement?
उत्तर-गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सदस्य देशों की संख्या अब 116 हो गयी है। तिमोर लेस्ते
और सेंट बिसेंट ऑफ ग्रेनाडाइंस 20 फरवरी, 2003 को नैम (NAM) के सदस्य बन गए।
19. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को एक आकार और दिशा प्रदान करने में भारत के प्रारंभिक
योगदान का वर्णन कीजिए।
Describe India’s role in giving a shape, form and direction of the Non-align Movement.
उत्तर-गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को जन्म देने तथा उसे बनाए रखने में भारत की एक महत्त्वपूर्ण
भूमिका रही है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन नैम (NAM) के नाम से प्रचलित है। इस आन्दोलन की
स्थापना 1961 ई. में हुई थी। यह आन्दोलन अपने आपको तीसरी दुनिया के हितों का संरक्षक
तथा सैनिक गुटों में बंँटे दो समूहों के मुकाबले में एक वैकल्पिक समूह मानता है। 1961 की
सदस्यता की अपेक्षा आज ‘नैम’ की सदस्यता लगभग चार गुना बढ़ चुकी है। “नैम” विश्व की
चालीस प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। इस समय इसकी कुल सदस्य संख्या 116 है।
20. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के किन्हीं दो उद्देश्यों का उल्लेख करें।
Mention any two objectives of Non-aligned Movement
                                            अथवा,
उन परिस्थितियों का वर्णन करें जिसमें गुटनिरपेक्ष आन्दोलन शुरू हुआ था।
Describe briefly the circumstances in which the Non-aligned Movement
was began.
उत्तर-गुटनिरपेक्ष आंदोलन विशेष परिस्थितियों में प्रारंभ हुआ था। आरंभ में गुट निरपेक्षता
भारत की विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण सार थी परंतु बाद में संसार को बड़े गुटों (अमेरिकी एवं
सोवियत संघ गुट) में बँट जाने से इस गुटनिरपेक्षता ने एक आन्दोलन का रूप धारण कर लिया
तब कुछ और देशों ने भी गुटनिरपेक्षता को सैनिक गुटों में बँटे संसार के लिए शांति दूत मान
लिया। युद्ध के निकट आने वाले संसार को गुटनिरपेक्षता की आवश्यकता थी। सैनिक हथियारो की होड़ न करने वाले देशों को गुटनिपेक्षता की आवश्यकता थी। भारत ने यह विदेश नीति व आंदोलन दोनों संसार को दिये थे।
                                               लघु उत्तरीय प्रश्न
1. द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त महाशक्तियों को गुट बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी
थी ? (Why did the super powers needed any alliences at all?)
उत्तर-द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त महाशक्तियों को गुट बनाने की आवश्यकता निम्न
कारणों से पड़ी थी-
(1) अपने-अपने राजनीतिक प्रभाव एवं समर्थकों की संख्या बढ़ाने के लिए उन्हें अपने गुट
बनाने की जरूरत पड़ी थी।
(2) अनेक राष्ट्र विशेषकर यूरोप में दोनों शक्तियाँ एक-दूसरे के विरुद्ध दो विश्वयुद्ध लड़
चुकी थीं। वे अब भी सोच रही थीं कि तीसरा विश्व युद्ध छिड़ने पर वे अपने-अपने समर्थक राष्ट्रों
से सैनिक, युद्ध सामग्री, खाद्य सामग्री आदि तुरंत प्राप्त कर सकेंगे।
(3) तेल (पेट्रोल) तथा डीजल उत्पादक देशों को अपनी ओर करना जरूरी था ताकि सामान्य
परिस्थितियों में आर्थिक विकास तथा संकट की घड़ी में युद्ध संचालन, यातायात तथा औद्योगिक
एवं कृषि उन्नति निरन्तर जारी रखी जा सके।
(4) खनिज सम्पदा एशियाई, अफ्रीकी तथा लतीनी देशों से प्राप्त किये जा सकते थे।
(5) अनेक देशों के समर्थन या मित्रता के बाद उनके भू-क्षेत्र को महाशक्तियाँ अपने हथियारों
एवं सेना का संचालन करने के लिए उपयोग कर सकते थे।
(6) महाशक्तियाँ छोटी शक्तियों के द्वीपों या भू-क्षेत्रों को जासूसी करने के लिए इस्तेमाल
कर सकते थे। शत्रु के सैनिक ठिकानों का पता करना एवं उनकी जासूसी करना समर्थक देशों के
माध्यम से या सहयोग से आसानी से की जा सकती है।
(7) महाशक्तियाँ आर्थिक मदद लेन-देन के लिए भी अपने गुट के सदस्यों का प्रयोग कर
सकते हैं।
(8) पूँजीवादी गुट के देश साम्यवाद को अपनी विचारधारा के लिए हउआ मानते थे।
2. तृतीय दुनिया के देशों ने गुटनिरपेक्ष रहने का निर्णय क्यों किया था? समझाइए।
Why did the Third World countries decide to remain Non-aligned? Explain.
उत्तर-गुटनिरपेक्षता का उदय विश्व में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी जब सारा विश्व शीतयुद्ध
की लपेट में आता जा रहा था तब गुटनिरपेक्षता की नीति ने शीतयुद्ध के बढ़ते कदमों को रोकने
का प्रयास किया। आरम्भ में भारत, यूगोस्लाविया तथा मिस्र ने मिलकर इसका आरम्भ किया फिर एशिया और अफ्रीका के अनेक नव-स्वाधीन राष्ट्रों ने भी शीतयुद्ध में शामिल होने से इंकार कर दिया। संसार को पूँजीवादी और साम्यवादी दोनों गुटों से अलग रखकर विश्व में शांति स्थापना के लिए प्रयास किया। अधिकांश नव-स्वाधीन राष्ट्रों ने गुटनिरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया
जिसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं-
(1) नव-स्वाधीन अधिकांश राष्ट्रों ने किसी भी शक्ति संगठन का सदस्य बनने से इंकार कर
दिया, क्योंकि वे जानते थे कि ये सैनिक गुट उनकी स्वाधीनता व शांति के लिए गंभीर खतरा पैदा
कर देंगे।
(2) वे समझते थे कि सैनिक संगठनों को बढ़ावा देने से अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण को बढ़ावा
मिलेगा और विश्व शांति को खतरा पैदा होगा।
(3) इन देशों के सामने सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की एक भारी जिम्मेदारी थी और
इस कार्य को युद्ध और तनावों से मुक्त वातावरण में ही पूरा किया जा सकता था।
(4) शक्ति-संगठन का सदस्य बनने से उन्हें संगठनों के बनाये गये नियमों पर चलना पड़ता। इसलिए वे तटस्थ रहे।
(5) तटस्थ रह कर ही ये देश परतंत्र देशों को स्वतंत्र कराने में मदद कर सकेंगे। प्रत्येक देश
को आत्म-निर्भर बनाने में सहायता दे सकेंगे।
(6) गुटों से अलग रहकर ही ये देश अपना राष्ट्रीय एकीकरण, भौगोलिक सुरक्षा और चतुर्मुखी
प्रगति करना चाहते थे।
(7) रंगभेद की नीति, हथियारों की होड़ तथा साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का विरोध करना तथा
नव-स्वतंत्र देशों के बीच मैत्री-भाव उत्पन्न करना गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाने का कारण
था। जबकि सैनिक गुट अपनी गतिविधियों से विश्व को तनाव व युद्ध के वातावरण में धकेल रहे
थे। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों की लोकप्रियता के कारण आज विश्व में इसका महत्त्वपूर्ण
स्थान है। 1961 के बेलग्रेड सम्मेलन में 25 देशों ने भाग लिया था मगर इसके बाद इनकी संख्या
बढ़ती चली गई। 2006 ई. में बढ़कर 116 तक हो गयी। (याद रहे 2006 ई. में हवाना (क्यूबा)
में 14वें सम्मेलन में 116 सदस्य देश तथा 15 पर्यवेक्षक देश शामिल हुए) ये देश एशिया,
अफ्रीका, यूरोप और अमेरिकी महाद्वीपों के हैं। यह आंदोलन नव-स्वाधीन राष्ट्रों के लिए ही नहीं
वरन् विश्व के लिए बड़ा वरदान सिद्ध हुआ है।
3. विश्व शान्ति की स्थापना में भारत के प्रमुख योगदान का वर्णन कीजिए।
Describe India’s major contribution towards the maintenance of the world peace.
उत्तर-भारत ने विश्व शांति की स्थापना में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। विश्व शांति
में भारत के योगदान को निम्नलिखित तरीके से स्पष्ट किया जा रहा है-
विश्व शांति की स्थापना में भारत का योगदान (India’s Contribution towards
World Peace)
(1) सैनिक गुटों का विरोध (Opposition of the Military Alliances)- इस समय
विश्व में बहुत सैनिक गुट बन रहे हैं। जैसे नाटो, सीटो सैण्टो आदि। भारत का हमेशा यह विचार
रहा है कि ये सैनिक गुट बनने से युद्धों की संभावना बढ़ जाती है और ये सैनिक गुट विश्व शांति
में बाधक हैं। अत: भारत ने हमेशा इन सैनिक गुटों की केवल आलोचना ही नहीं की बल्कि इनका
पूरी तरह से विरोध किया है।
(2) निशस्त्रीकरण में सहायता (Support of Disarmament)-संयुक्त राष्ट्र संघ ने
निशस्त्रीकरण के प्रश्न को अधिक महत्त्व दिया है तथा इस समस्या को हल करने के लिए बहुत
ही प्रयास किये हैं। भारत ने इस समस्या का समाधान करने के लिए हमेशा संयुक्त राष्ट्र संघ की
मदद की है क्योंकि भारत को यह विश्वास है कि पूर्ण निशस्त्रीकरण के द्वारा ही संसार में शांति की
स्थापना हो सकती है।
(3) जातीय भेदभाव का विरोध (Opposition to the policy of Discriminations
based on Caste, Creed and Colour)-भारत ने अपनी विदेश नीति के आधार पर जातीय भेदभाव को समाप्त करने का निश्चय किया है। जब संसार का कोई भी देश जाति प्रथा के भेद को अपनाता है तो भारत सदैव उसका विरोध करता रहा है। दक्षिणी अफ्रीका ने जब तक जातीय भेदभाव की नीति को अपनाया तो भारत ने उसका विरोध किया और अब भी कर रहा है।
4. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का संक्षिप्त इतिहास बताइए।
Mention brief historyofNon-aligned Movement. .
                                   अथवा,
भारत ने गुट निरपेक्ष आन्दोलन प्रारंभ करने में किस प्रकार भूमिका अदा की?
What role did India play in the origin of Non-aligned Movement?
उत्तर-गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास (BriefHistory of Non-aligned
Movement)―द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपनिवेशवाद की समाप्ति और नए स्वतंत्र राष्ट्रों के
अस्तित्व में आने के साथ एक नई समस्या पैदा हुई। यह समस्या थी इन नवगठित राष्ट्रों के
आर्थिक एवं राजनैतिक विकास की। शीत युद्ध काल में इन नवोदित राष्ट्रों की रुचि किसी भी गुटबाजी से दूर रहकर अपने आर्थिक एवं राजनैतिक ढाँचे के विकास में थी। समान रुचि के रहते इन विकासशील देशों के नेताओं ने एक सार्थक तटस्थता की नीति के बारे में सोचना शुरू किया।
1955 के बाडुग सम्मेलन में पहली बार इस आशय के प्रस्ताव की घोषणा की गयी। 1956 में
भारत के प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो और मिस्र के
राष्ट्रपति अब्दुल नासिर तीनों ने मिलकर सत्र में यही बात दोहराई और उनके प्रयासों से 1961 में
प्रथम गुटनिरपेक्ष आन्दोलन बेलग्रेड में सम्पन्न हुआ। आन्दोलन की सफलता इस बात में है कि
1961 में इसकी सदस्य संख्या 25 थी जो अब बढ़कर 116 है।
5. प्रथम गुटनिरपेक्ष सम्मेलन कहाँ तथा कब हुआ था? बाद में ऐसे सम्मेलनों की सूची
तैयार कीजिए।
When and where did first Non-aligned conference take place? Make a list of the other conferences which took place afterwards?
उत्तर-प्रथम गुटनिरपेक्ष सम्मेलन 1961 ई. में बेलग्रेड में हुआ था। दूसरा सम्मेलन काहिरा
में 1964 ई. में हुआ था। तीसरा सम्मेलन लुसाका में 1970 में हुआ था। पाँचवाँ सम्मेलन 1976
ई. में कोलम्बो में हुआ था। छठा सम्मेलन हवाना में 1979 ई. में हुआ था। सातवाँ सम्मेलन भारत
की राजधानी नई दिल्ली में 1983 ई. में हुआ था। आठवाँ सम्मेलन हरारे में 1986 ई. में हुआ था
तथा नौवां सम्मेलन 1989 ई. में एक बार फिर बेलग्रेड में हुआ। दसवाँ सम्मेलन 1992 ई. में
जकार्ता में तथा ग्यारहवाँ सम्मेलन कार्टाजेना में 1995 में हुआ। 12वाँ सम्मेलन डरबन (द. अफ्रीका) तथा 13वाँ सम्मेलन 24 फरवरी, 2003 में कुआलालपुर (मलेशिया) में हुआ। 2006 में हवाना (क्यूबा) में हुए 14वें सम्मेलन में 116 सदस्य-देश और 15 पर्यवेक्षक देश में शामिल हुए।
6. बेलग्रेड शिखर सम्मेलन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Write a short note on ‘Belgrade Summit’
उत्तर–बेलग्रेड सम्मेलन (Belgrade Summit).-गुटनिरपेक्ष देशों का प्रथम सम्मेलन
यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में 1961 में हुआ और इसमें गुटनिरपेक्षता के पाँच आधारभूत तत्त्व निर्धारित किए गए थे-
(i) गुटनिरपेक्ष तथा शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के आधार पर स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण,
(ii) उपनिवेशवाद का विरोध, (iii) किसी सैनिक गुट का सदस्य न होना, (iv) अमेरिका या रूस
किसी भी महाशक्ति से सैनिक संधि न करना और; (v) उस देश की धरती पर कोई विदेशी सैनिक
अट्ठा न हो।
उस समय इसमें 25 देशों ने भाग लिया था। तीन राज्यों के पर्यवेक्षक भी इस सम्मेलन में
उपस्थित थे। भारत के सुझाव पर पूर्व सोवियत संघ तथा अमेरिका से अपील की गयी थी कि वे
अणुबमों के निर्माण की होड़ पर प्रतिबंध लगाएँ। गुटनिरपेक्ष आंदोलन की यह सफलता का ही
प्रतीक था कि बेलग्रेड में जहाँ गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सदस्य देशों की संख्या कुल 25 थी वह
2003 में मलेशिया के कुआलालंपुर में होने वाले तेरहवें शिखर सम्मेलन तक 116 हो गयी है।
7. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सार तत्त्व की व्याख्या कीजिए।
Describe the essence of the Non-aligned Movement?
उत्तर-गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सार तत्त्व का विवेचन निम्नलिखित है-
(1) साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का विरोधं करना। यदि संसार में साम्राज्यवाद और
उपनिवेशवाद का अन्त हुआ है तो उसका श्रेय गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को जाता है। इस आन्दोलन
से नव-उपनिवेशवाद को क्षति पहुंँची है।
(2) गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के कारण नीति-भेद, रंगभेद, नस्ल-भेद और शायोनिज्म (स्वयं
को अन्य से श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति) आदि को भी हानि हुई है। गुटनिरपेक्ष देशों में इन अन्तर्राष्ट्रीय
समस्याओं के विरुद्ध समय-समय पर आवाज उठाई गयी है।
(3) युद्धों को टालने तथा विश्व में शांति, सुरक्षा स्थापित करने में भी गुटनिरपेक्षता की
सराहनीय भूमिका रही है। गुटनिरपेक्षता के कारण ही आक्रमणकारी नीतियों को क्षति पहुंची है।
(4) गुटनिरपेक्ष आन्दोलनों ने अपने भिन्न-भिन्न मंचों पर विदेशी आक्रमण, कब्जे, आधिपत्य
के साथ-साथ बड़ी-बड़ी शक्तियों के हस्तक्षेप व उनमें गुटबन्दी की भी निन्दा की है।
8. भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति क्यों अपनाई है?
Why has India adopted the policy of Non-alignment.
उत्तर-15 अगस्त, 1947 ई. को स्वतंत्रता के पश्चात् भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति
को अपनाया। भारत द्वारा इस नीति को अपनाने के मुख्य कारण निम्नलिखित है-
(1) भारत ने अपने को गुट संघर्ष में सम्मिलित करने की अपेक्षा देश की आर्थिक, सामाजिक
तथा राजनीतिक प्रगति की ओर ध्यान देने में अधिक लाभ समझा क्योंकि हमारे सामने अपनी
प्रग्रति अधिक आवश्यक है।
(2) सरकार द्वारा किसी भी गुट के साथ मिलने से यहाँ की जनता में भी विभाजनकारी प्रवृत्ति
उत्पन्न होने का भय था और उससे राष्ट्रीय एकता को धक्का लगता है।
(3) किसी भी गुट के साथ मिलने और उसका पिछलग्गू बनने से राष्ट्र की स्वतंत्रता कुछ
अंश तक अवश्य प्रभावित होती है।
(4) भारत स्वयं एक महान देश है और इसे अपने क्षेत्र में अपनी स्थिति को महत्त्वपूर्ण बनाने
के लिए किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं थी।
9. ‘नेहरू तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ पर टिप्पणी लिखें।
Write a short note on Nehru and Non-Aligned conference.
उत्तर-गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के प्रमुख जनक नवोदित देशों के स्वाधीनता संग्राम के नेता
रहे थे। इनमें भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अपनायी थी। मार्शल
टीटो तथा कर्नल नासिर के साथ मिलकर 1961 में नेहरू के अथक प्रयासों से गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की नींव रखी गयी। नेहरू के अथक प्रयासों से गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की नींव रखी गयी। नेहरू ने गुटनिरपेक्षता का अर्थ बताते हुए अमेरिका की प्रतिनिधि सभा में कहा था- “जहाँ स्वतंत्रता के लिए खतरा उपस्थित हो, न्याय को धमकी दी जाती हो अथवा जहाँ आक्रमण होता हो, वहाँ न तो हम तटस्थ रह सकते हैं और न ही तटस्थ रहेंगे।”
नेहरूजी ने अपने प्रसारण में कहा था―”शीतयुद्ध के सैनिक गठबन्धन विश्व में अच्छे
प्रभाव नहीं लाए हैं।” 1955 तक में बाडुग सम्मेलन में तटस्थता या गुटों से अलग रहकर सार्थक
नीति में विचार किया। 1956 में जवाहरलाल नेहरू, मार्शल टीटो व कर्नल नासिर तीनों ने यही
बात सत्र में दोहराई और 1961 में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना की। पंडित नेहरू स्वतंत्रता- प्राप्ति से पूर्व अन्तरिम सरकार के गठन से लेकर तथा बाद में भी भारत की विदेश नीति के संचालक रहे। 23 मार्च से 2 अप्रैल तक 1947 में नई दिल्ली में एशियाई सम्मेलन हुआ इसमें 25 देशों के 250 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिसमें जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र विदेश नीति की घोषणा की। 18 अप्रैल से 24 अप्रैल तक 1955 में बाडुंग सम्मेलन में प. जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने का समर्थन किया। जुलाई 1956 में ब्रायनी में एक त्रिपक्षीय सम्मेलन हुआ जिसमें जवाहरलाल नेहरू, मार्शल टीटो तथा कर्नल नासिर ने भाग लिया। तीनों नेताओं ने तय किया कि गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को संगठन बनाने को प्रेरित किया जाए। इसी के परिणामस्वरूप 1961 में गुटनिरपेक्ष सम्मेलन की नीव रखी गयी। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी मृत्युपर्यन्त (1964) तक गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को दिशा प्रदान की।
10. भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता का महत्त्व वताइए।
Describe the importance of Non-alignment in India’s foreign policy.
उत्तर भारत की विदेश नीति का एक मूल सिद्धान्त गुटनिरपेक्षता है। इसका अर्थ है कि
भारत अन्तर्राष्ट्रीय विषयों के सम्बन्ध में अपनी स्वतंत्र निर्णय लेने की नीति का पालन करता है।
सारा विश्व 1991 तक दो गुटों में विभाजित था-एक अमेरिकी गुट तथा दूसरा सोवियत संघ
के नेतृत्व में साम्यवादी गुट। भारत ने स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद अपनी विदेश नीति में गुट निरपेक्षता के सिद्धान्त को अत्यधिक महत्त्व दिया। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को जन्म देने तथा उसको बनाए रखने में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। 1961 से लेकर 24 फरवरी, 2003 द्वारा इसके 13वें शिखर सम्मेलन (कुआलालम्पुर) तक भारत ने इसको बराबर सशक्त बनाए रखने का प्रयत्न किया है। भारत प्रत्येक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या का समर्थन या विरोध उसमें निहित गुण और दोषों के आधार पर करता रहा है। भारत ने यह नीति अपने देश की राजनीतिक, आर्थिक और भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए अपनायी है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद से ही भारत को अमेरिकन तथा पूर्व सोवियत संघ के गुटों ने अपनी ओर आकर्षित करने तथा पूर्व सोवियत संघ के गुटों ने अपनी और आकर्षित करने तथा अपने गुट में शामिल करने का प्रयास किया परंतु भारत किसी भी गुट में शामिल नहीं हुआ। नेहरू, नासिर तथा टीटो के द्वारा शुरू किया गया। गुट निरपेक्ष आन्दोलन आज 116 राष्ट्रों की सदस्यता से परिपूर्ण है। अभी तक भारत में 13 आम चुनाव हो चुके हैं। प्रत्येक बार बनने वाली सरकारी ने अपनी विदेशी नीति में गुटनिरपेक्षता की नीति ही अपनायी है।
11. गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका का वर्णन कीजिए।
Discuss India’s role in the Non-aligned Movement.
उत्तर-गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका (India’s Role in the
Non-aligned Movement)-किसी भी महाशक्ति के नियंत्रण या प्रभाव में न रहकर,
अन्तर्राष्ट्रीय प्रश्नों का निर्णय गुण-दोषों के आधार पर करना गुटनिरपेक्षता है। गुट निरपेक्ष रहते
हुए भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर सक्रिय भूमिका निभायी है। गुटनिरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर
सम्मेलन 1961 में बेलग्रेड में हुआ जिसमें 25 देश शामिल हुए थे। अब तक इसमें 116 देश
शामिल हो चुके हैं। गुटनिरपेक्ष आन्दोलनों में नेहरू जी का स्थान सर्वोपरि रहा था। उन्होंने
निशस्त्रीकरण का समर्थन और साम्राज्यवाद का विरोध किया। गुटनिरपेक्ष देशों का सम्मेलन
समय-समय पर किसी सदस्य देश में होता रहता है। 1980 में भारत ‘अफ्रीका कोष’ का अध्यक्ष
बना। जकार्ता सम्मेलन 1992 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन का मामला
उठाया। 11वाँ सम्मेलन कार्टिजेना में 1995 में सम्पन्न हुआ। कार्टिजेना घोषणा में आतंकवाद को
निन्दनीय बताया गया और कहा गया कि इर प्रकार के आतंकवाद का विरोध होना चाहिए।
12. भारत-सोवियत संधि (1971) पर टिप्पणी लिखें।
Write a short note on Indo-Soviet treaty (1971).
उत्तर-अमेरिका के चीन तथा पाकिस्तान के साथ तथा पाकिस्तान के चीन तथा अमेरिका
से सैनिक सहायता प्राप्त करने की स्थिति को देखते हुए तथा 1971 में भारत का पाकिस्तान के
साथ बंगला देश संकट के कारण होने वाले संघर्ष के परिणामस्वरूप अगस्त 1971 में भारत और
सोवियत संघ के बीच मैत्री और सहयोग की संधि हुई। यह सन्धि भारत द्वारा प्रथम बार किसी
महाशक्ति के साथ की गयी राजनीतिक संघि थी। कुछ विशेषज्ञों द्वारा इस संधि को भारत का
गुटनिरपेक्ष आंदोलन से विचलन (Deviation) कहा गया। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में यह भारत
और सोवियत संघ के पारस्परिक लाभ और सामान्य उद्देश्यों से प्रेरित थी। इस संधि का 1991 में
पुनः नवीनीकरण किया गया। सोवियत संघ में बिखराव के बाद भी यह संधि भारत और रूस के
मध्य बरकरार है। इस संधि के संदर्भ में दोनों देशों ने एक-दूसरे की राष्ट्रीय स्वतंत्रता, उपनिवेशवाद
के विरुद्ध संघर्ष, जातीय और नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष, पराधीन देशों के स्वतंत्रता संघर्ष
में साथ देने आदि के सिद्धांतों का पालन करने का वचन दिया तथा दोनों में से किसी एक देश पर
बाह्य आक्रमण की परिस्थिति में दोनों देश मिलकर उसका मुकाबला करेंगे।
13. महाशक्तियाँ छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन क्यों रखती थीं? तीन कारण वताइए।
Why did the super powers have military aliances with smaller countries
give the reasons?                         [B.M. 2009A; NCERT T.B.Q.6)
उत्तर–प्राय: अनेक लोग यह प्रश्न उठाते है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त महाशक्तियों
ने छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन क्यों रखा था? उन्हें ऐसा करने की क्या आवश्यकता थी?
आखिर अपने परमाणु हथियारों और अपनी स्थायी सेना के बूते महाशक्तियाँ इतनी ताकतवर थीं
कि एशिया तथा अफ्रीका और यहाँ तक कि यूरोप के अधिकांश छोटे देशों की साझी शक्ति का.
भी उनसे कोई मुकाबला नहीं था। लेकिन, हमें यह समझने की जरूरत है कि छोटे देश निम्न
कारणों से महाशक्तियों के बड़े काम के थे
(क) महत्त्वपूर्ण संसाधनों (जैसे तेल और खनिज),
(ख) भू-क्षेत्र (ताकि यहाँ से महाशक्तियाँ अपने हथियार और सेना का संचालन कर सके),
(ग) सैनिक ठिकाने (जहाँ से महाशक्तियाँ एक-दूसरे की जासूसी कर सकें) और
(घ) आर्थिक सहायता (जिसमें गठबंधन में शामिल बहुत-से छोटे-छोटे देश सैन्य-खर्च वहन
करने में मददगार हो सकते थे)। ये ऐसे कारण थे जो छोटे देशों को महाशक्तियों के लिए जरूरी
बना देते थे।
(ङ) विचारधारा के कारण भी थे ये देश महत्त्वपूर्ण थे। गुटों में शामिल देशों की निष्ठा से
यह संकेत मिलता था कि महाशक्तियाँ विचारों का पारस्परिक युद्ध भी जीत रही हैं। गुट में शामिल हो रहे देशों के आधार पर वे सोच सकती थीं कि उदारवादी लोकतंत्र और पूँजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद से कहीं बेहतर है अथवा समाजवाद और साम्यवाद, उदारवादी लोकतंत्र और पूँजीवाद की अपेक्षा बेहतर है।
14. कभी-कभी कहा जाता है कि शीतयुद्ध सीधे तौर पर शक्ति के लिए संघर्ष था और
इसका विचारधारा से कोई सम्बन्ध नहीं था। क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
अपने उत्तर के समर्थन में एक उदाहरण दें।
Sometime it is said that the Cold War was a simple struggle for power and that ideology had nothing to do with it. Do you agree with this? Give one example to support your position.
उत्तर-हम इस कथन से सहमत नहीं है कि शीतयुद्ध सीधे तौर पर शक्ति के लिए संघर्ष
था। वस्तुतः इसका विचारधारा से गहरा सम्बन्ध था। पूर्वी यूरोप के सभी देश साम्यवादी विचारधारा के देश थे तथा साम्यवादी सोवियत संघ ही उनका नेता था। दूसरी ओर पश्चिमी देश सभी पूँजीवादी थे तथा वे संयुक्त राज्य अमरीका के गुट में थे तथा उसी के नेतृत्व में कार्य करते थे। दोनों विचारधाराओं के राष्ट्रों में (विशेषकर गुटों के नेताओं में) परस्पर सन्देह तथा भय व्याप्त था। दोनों गुट सैन्यकरण तथा अन्तर्राष्ट्रीय तनाव या शीत युद्ध के लिए जिम्मेदार थे। जब 1990 में सोवियत संघ का विघटन हो गया तथा 1980 के दशक में पूर्वी देशों में साम्यवादी सरकारें (या साम्यवादी दलों की अधिनायकवादी सरकारें) समाप्त हो गई तो शीतयुद्ध समाप्त हो गया। यहाँ तक कि गुट निरपेक्ष आन्दोलन के औचित्य पर भी प्रश्न उठने लगे।
15. ‘गुटनिरपेक्ष आन्दोलन अब अप्रासंगिक हो गया है। आप इस कथन के बारे में क्या
सोचते हैं? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करें।
What do you think about the statement that NAM has become irrelevant
today? Give reasons to support your opinion.
उत्तर-मेरे विचारानुसार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन अभी भी प्रासंगिक है। दिसम्बर, 1991 में
सोवियत संघ का विघटन हो जाने के बाद से विश्व एकध्रुवीय बन चुका है। मिस्र ने सुझाव दिया
है कि गुटबंदी समाप्त होने के कारण गुट निरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य पूरा हो गया है। अत: अब गुट निरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य पूरा हो गया है। अतः अब गुटनिरपेक्ष आंदोलन को G-77 के समूह में शामिल हो जाना चाहिए। फरवरी, 1992 के पहले सप्ताह में गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन निकोसिया में हुआ जिसमें बदली परिस्थितियों में इस आंदोलन की भावी भूमिका पर विचार हुआ। 1992 में इंडोनेशिया में दसवें शिखर सम्मेलन में अधिकतर सदस्यों ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को जारी रखने पर जोर दिया और इसके उद्देश्य में परिवर्तन करने को कहा।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अब क्या प्रासंगिकता रह गई है, इसका वर्णन निम्नलिखित है-
(1) नवोदित राष्ट्रों का संगठन होने के कारण इसकी प्रासंगिकता अभी भी है। इन राष्ट्रों का
आर्थिक विकास और उनका राजनीतिक विकास भी परस्पर सहयोग पर निर्भर है।
(2) वर्तमान महाशक्ति अमेरिका के प्रभाव से मुक्त रहने के लिए निर्गुट राष्ट्रों का आपसी
सहयोग और भी अधिक आवश्यक है।
(3) गुटनिरपेक्ष आंदोलन अमेरिका, यूरोप तथा जापान जैसे पूँजीवादी देशों से उनकी रक्षा के
लिए आवश्यक हैं।
(4) गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से निशस्त्रीकरण की आवाज उठाई जा रही है। जो
गुटनिरपेक्ष देशों को सुरक्षा प्रदान करती है।
(5) अधिकतर गुटनिरपेक्ष देश विकासशील या अविकसित हैं। सभी की आर्थिक समस्याएँ
समान हैं। अतः आपसी सहयोग से ही आर्थिक उन्नति की जा सकती है।
16. भारत की सुरक्षा नीति के प्रमुख प्रभावित घटकों का वर्णन करें। [B.M.2009A]
उत्तर- भारत की सुरक्षा नीति के चार प्रमुख प्रभावी घटक रहे हैं, जिनका वर्णन निम्नलिखित
है―
(i) सैन्य क्षमता को मजबूत करना-भारतीय सुरक्षा नीति का सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण
घटक भारतीय सैन्य क्षमता को मजबूत करना रहा है क्योंकि भारत पर पड़ोसी देशों द्वारा कई बार आक्रमण किया गया है।
(ii) अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करना-भारत अपने सुरक्षा हितों को बचाने के
लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करने का हिमायती रहा है।
(iii) आंतरिक समस्याओं से निपटना-भारत में क्षेत्रवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता व
अन्य कारणों से समय-समय पर राज्यों में विवाद उठते रहते हैं। कई बार ये विवाद राष्ट्रीय सुरक्षा
के लिए खतरे का रूप भी धारण कर चुके हैं। इसलिए भारतीय सुरक्षा के लिए यह आवश्यक हो
जाता है कि वह राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए उचित उपाय करें तथा भारत ने ऐसा ही
किया है।
(iv) अर्थव्यवस्था को मजबूत करना-भारतीय सुरक्षा नीति का अंतिम घटक अर्थव्यवस्था
को विकसित करना है, जिसके कारण देश की गरीब जनता को अधिक से अधिक लाभ पहुंँच सके तथा आर्थिक समानता को कम किया जा सके।
16. 1991 ई. से नई विश्व व्यवस्था आशय क्या है?                 [B.M.2009A]
उत्तर-1991 ई० में सोवियत संघ के विघटन के बाद द्वि-धृवीय विश्व व्यवस्था का
भी अंत हो गया। इस प्रकार के एक नई विश्व व्यवस्था का जन्म हुआ, जिसमें अमेरिका का
वर्चस्व स्थापित हो गया। शीतयुद्ध की स्थिति स्वाभाविक रूप से समाप्त हो गई। सुरक्षा परिषद्
में भी अमेरिका को सोवियत संघ के निषेधाधिकार के प्रयोग का संकट नहीं रहा। यही कारण है कि अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान तथा इराक में हस्तक्षेप करने का कोई प्रतिरोध नहीं हुआ। सोवियत संघ के विघटन के बावजूद अमेरिका को आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है तथा वर्तमान समय में मंदी पर आधारित आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ रहा है।
                                                   दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. क्यूवा मिसाइल संकट पर एक लेख लिखिए।
Write an essay an Quban Missile Crisis.
                                 अथवा,
क्यूबा मिसाइल संकट ‘शीतयुद्ध का चरम बिन्दु था’ व्याख्या कीजिए।
“Cuban Missile Crisis war the highest point of the Cold War.’ Explain.
उत्तर-क्यूबा का मिसाइल संकट (Cuban Missile Crisis)-
(1) क्यूबा अमेरिका के तट से लगा हुआ एक छोटा-सा द्वीपीय देश है। क्यूबा का गठजोड़
सोवियत संघ से था और सोवियत संघ उसे कूटनीतिक तथा वित्तीय सहायता देता था।
(2) 1961 की अप्रैल में सोवियत संघ के नेताओं को यह चिन्ता सता रही थी कि अमेरिका
साम्यवादियों द्वारा शासित क्यूबा पर आक्रमण कर देगा और इस देश के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो
का तख्तापलट हो जाएगा।
(3) सोवियत संघ के नेता निकिता खुश्चेव ने क्यूबा को रूस के ‘सैनिक अड्डे’ के रूप में
बदलने का फैसला किया। 1962 में खुश्चेव ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं। इन
हथियारों की तैनाती से पहली बार अमेरिका नजदीकी निशाने की सीमा में आ गया। हथियारों की
इस तैनाती के बाद सोवियत संघ पहले की तुलना में अब अमेरिका के मुख्य भू-भाग के लगभग
दोगुने ठिकानों या शहरों पर हमला बोल सकता था।
(4) क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा परमाणु हथियार तैनात करने की भनक अमरीकियों को तीन
हफ्ते बाद लगी। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी और उनके सलाहकार ऐसा कुछ भी करने से हिचकिचा रहे थे जिससे दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध शुरू हो जाए लेकिन वे इस बात को
लेकर दृढ़ थे कि खुश्चेव क्यूबा से मिसाइलों और परमाणु हथियारों को हटा ले। कैनेडी ने आदेश
दिया कि अमेरिकी जंगी बेड़ों को आगे करके क्यूबा की तरफ जाने वाले सोवियत जहाजों को रोका जाए। इस तरह अमेरिका सोवियत संघ को मामले के प्रति अपनी गंभीरता की चेतावनी देना चाहता था। ऐसी स्थिति में यह लगा कि युद्ध होकर रहेगा। इसी को ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ के रूप में जाना गया। इस संघर्ष की आशंका ने पूरी दुनिया को बेचैन कर दिया। यह टकराव कोई आम युद्ध नहीं होता। अंतत: दोनों पक्षों ने युद्ध टालने का फैसला किया और दुनिया ने चैन की सांस ली। सोवियत संघ के जहाजों ने या तो अपनी गति धीमी कर ली या वापसी का रुख कर लिया।
(5) ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ शीतयुद्ध का चरम बिंदु था। शीतयुद्ध सोवियत संघ और अमेरिका
तथा इनके साथी देशों के बीच प्रतिद्वन्दिता, तनाव और संघर्ष की एक श्रृंखला के रूप में जारी
रहा। सौभाग्य से इन तनावों और संघर्षों ने युद्ध का रूप नहीं लिया यानी इन दो देशों के बीच
कोई पूर्णव्यापी रक्तरंजित युद्ध नहीं छिड़ा। विभिन्न इलाकों में युद्ध हुए: दोनों महाशक्तियाँ और
उनके साथी देश इन युद्धों में संलग्न रहे; वे क्षेत्र-विशेष के अपने साथी देश के मददगार बने;
लेकिन दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध से बच गई।
(6) शीतयुद्ध सिर्फ जोर-आजमाइश, सैनिक गठबंधन अथवा शक्ति-संतुलन का मामला भर
नहीं था बल्कि इसके साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर भी एक वास्तविक संघर्ष जारी था। विचारधारा की लड़ाई इस बात को लेकर थी कि पूरे विश्व में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन को सूत्रबद्ध करने का सबसे बेहतर सिद्धांत कौन-सा है। पश्चिमी गठबंधन का अगुआ अमेरिका था और यह गुट उदारवादी लोकतंत्र तथा पूँजीवाद का हामी था। पूर्वी गठबंधन का अगुआ सोवियत संघ था और इस गुट की प्रतिबद्धता समाजवाद तथा साम्यवाद के लिए थी।
2. शीतयुद्ध की पृष्ठभूमि का विवरण दीजिए।
Describe the background of the Cold War.
उत्तर-शीतयुद्ध की पृष्ठभूमि (The Background of the Cold War)-(1) दूसरे
विश्वयुद्ध की समाप्ति से ही शीतयुद्ध की शुरुआत हुई। अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के
दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये और जापान को घुटने टेकने पड़े। इसके बाद दूसरे विश्वयुद्ध का अंत हुआ। परमाणु बम गिराने के अमेरिकी फैसले के आलोचकों का तर्क है कि अमरीका इस बात को जानता था कि जापान आत्मसमर्पण करने वाला है। ऐसे में बम गिराना गैर-कानूनी थां। इन आलोचकों का मानना है कि अमेरिका की इस कार्यवाही का लक्ष्य सोवियत संघ को एशिया तथा अन्य जगहों पर सैन्य और राजनीतिक लाभ उठाने से रोकना था। वह सोवियत संघ के सामने यह भी जाहिर करना चाहता था कि अमेरिका ही सबसे बड़ी ताकत है।
(2) अमेरिका के समर्थको का तर्क था कि युद्ध को जल्दी-से-जल्दी समाप्त करने तथा अमेरिका
और साथी राष्ट्रों की आगे की जनहानि को रोकने के लिए परमाणु बम गिराना जरूरी था। विश्वयुद्ध की समाप्ति के कारण कुछ भी हों लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि वैश्विक राजनीति के मंच पर दो महाशक्तियों का उदय हो गया। जर्मनी और जापान हार चुके थे और यूरोप तथा शेष विश्व
विध्वंस की मार झेल रहे थे। अब अमेरिका और सोवियत संघ विश्व की सबसे बड़ी शक्ति थे।
इनके पास इतनी क्षमता थी कि विश्व की किसी भी घटना को प्रभावित कर सकें। अमेरिका और
सोवियत संघ का महाशक्ति बनने की होड़ में एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा होना शीतयुद्ध का कारण बना। शीतयुद्ध शुरू होने के पीछे ये समझ भी काम कर रही थी कि परमाणु बम से होने वाले विध्वंस की मार झेलना किसी भी राष्ट्र के बूते की बात नहीं।
(3) यह एक सीधा-सादा लेकिन असरदार तर्क था। जब दोनों महाशक्तियों के पास इतनी
क्षमता के परमाणु हथियार हों कि वे एक-दूसरे को असहनीय क्षति पहुंचा सकें तो ऐसे में दोनों के
बीच रक्तरंजित युद्ध होने की संभावना कम रह जाती है। उकसावे के बावजूद कोई भी पक्ष युद्ध
का जोखिम मोल लेना नहीं चाहेगा क्योंकि युद्ध से चाहे किसी को राजनीतिक फायदा हो, लेकिन
इन देशों के विध्वंस को औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।
(4) परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों पक्षों को इतना नुकसान उठाना पड़ेगा कि उनमें से विजेता
कौन है-यह तय करना भी असंभव होगा। अगर कोई अपने शत्रु पर आक्रमण करके उसके
परमाणु हथियारों को नाकाम करने की कोशिश करता है तब भी दूसरे के पास उसे बर्बाद करने
लायक हथियार बच जायेंगे। इसे अपराध (रोक और संतुलन) का तर्क कहा गया। दोनों ही पक्षों
के पास एक-दूसरे के मुकाबले और परस्पर नुकसान पहुंचाने की इतनी क्षमता होती है कि कोई भी पक्ष युद्ध का खतरा नहीं उठाना चाहता। इस तरह, महाशक्तियों के बीच गहन प्रतिद्वन्द्विता होने के बावजूद शीतयुद्ध रक्तरंजित युद्ध का रूप नहीं ले सका। इसकी तासीर ठंडी रही। पारस्परिक ‘अपरोध’ की स्थिति ने युद्ध तो नहीं होने दिया, लेकिन यह स्थिति पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता को न रोक सकी।
(5) शीतयुद्ध की प्रमुख सैन्य विशेषताओं पर ध्यान दें। इसमें दो महाशक्तियाँ और उनके
अपने-अपने गुट थे। इन परस्पर प्रतिद्वंद्वी गुटों में शामिल देशों से अपेक्षा थी कि वे तर्कसंगत और
जिम्मेदारी भरा व्यवहार करेंगे। इन देशों को एक विशेष अर्थ में तर्कसंगत और जिम्मेदारी भरा
बर्ताव करना था। परस्पर विरोधी गुटों में शमिल देशों को समझना था कि आपसी युद्ध में जोखिम
है क्योंकि संभव है कि इसकी वजह से दो महाशक्तियों के बीच युद्ध ठन जाए। जब दो महाशक्तियाँ और उनकी अगुआई वाले गुटों के बीच ‘पारस्परिक अपरोध’ का संबंध हो तो युद्ध लड़ना दोनों के लिए विध्वंसक साबित होगा। इस संदर्भ में जिम्मेदारी का मतलब था संयम से काम लेना और तीसरे विश्वयुद्ध के जोखिम से बचना। शीतयुद्ध ने समूची मनुष्य जाति पर मंडराते खतरे को जैसे-तैसे संभाल लिया।
3. शीतयुद्ध के कारणों का वर्णन कीजिए। (Describe causes of the Cold War.)
उत्तर-शीतयुद्ध के कारण (Causes of the Cold War)- शीतयुद्ध को जन्म देने वाले
अनेक कारण इस प्रकार है-
(1) साम्यवाद का भय (Fear of Communism)-ब्रिटेन और अमेरिका साम्यवाद से
भयभीत थे। 1917 की क्रांति के बाद रूस में साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई। यह विश्व में
पहली साम्यवादी सरकार थी लेकिन युद्ध के बाद पूर्वी और मध्य यूरोप के अनेक देशों जैसे पोलैंड, हंगरी, रूमानिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया आदि में साम्यवादी सरकारें स्थापित हुई। साम्यवाद के विस्तार का अर्थ था रूस का अधिक शक्तिशाली होना। इससे अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोप के देश भयभीत हो उठे। 1949 ई. में चीन के गृहयुद्ध में साम्यवाद की विजय ने उन्हें और अधिक डरा दिया इसलिये साम्यवाद को फैलने से रोकने के लिए वे हरसंभव प्रयास करने लगे।
(2) जर्मनी की घटनाएँ (Events of Germany)-द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी दो
भागों में बँट गया। पूर्वी भाग में रूस की साम्यवादी शक्तियों ने सत्ता संभाली जबकि पश्चिमी
भाग में फ्रांस, अमेरिका वे ब्रिटेन की साम्यवाद विरोधी शक्तियों ने सत्ता सँभाली। इनमें भी तनावपूर्ण स्थिति रहती थी।
(3) अमेरिकी गतिविधियाँ (AntericanActivities)-अमेरिका ने खुली घोषणा की कि
उसका उद्देश्य साम्यवाद के विस्तार को रोकना है। अमेरिका अब दुनिया की प्रत्येक घटना को इसी दृष्टि से देखने लगा कि कोई घटना साम्यवाद को बढ़ावा देगी या उसे रोकेगी। इससे उपनिवेशो के स्वतंत्रता आंदोलनों पर विपरीत प्रभाव पड़े। उदाहरणार्थ हिंदचीन के स्वाधीनता आंदोलन को कुचलने में अमेरिका ने फ्रांस की सहायता की, क्योंकि रूस इन स्वतंत्रता आंदोलन को अपना पूरी सहयोग दे रहा था।
(4) तटस्थ देशों के प्रति शंकालु दृष्टि (Suspicious outlook about the neutral
comtries)-जो देश एक तटस्थ नीति अपनाकर सोवियत संघ सहित प्रत्येक राष्ट्र के साथ
अच्छे संबंध बनाना चाहते थे, उन्हें भी शंका की दृष्टि से देखा जाने लगा। फलस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय
स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
(5) संयुक्त राष्ट्र संघ की दुर्बलता (Weakness of uN)-संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों गुटों
में शंका और तनाव को दूर करने में असफल सिद्ध हुआ।
(6) सैनिक गुट की स्थापना तथा शस्त्रों की दौड़ (Foundation of military
alliances and arms race) -अमेरिका तथा उसके सहयोगी पश्निमी देशों ने नाटो, सीएटो
आदि सैनिक संगठन स्थापित किये। स्थान-स्थान पर साम्यवाद के प्रभाव को रोकने के लिए सैनिक अड्डे भी स्थापित किये जिसने तनावपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को और बढ़ा दिया। इसी बीच 1949 ई. में रूस ने परमाणु बम परीक्षण किया तथा कुछ ही वर्षों में नाभिकीय हथियार भी विकसित कर लिये। ऐसे में शीतयुद्ध का वातावरण तैयार हो गया।
शीतयुद्ध समाप्त होने के पक्ष में तर्क (Arguments in favour ofending of the
cold war)―(1) द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद रूस और अमेरिका में शीतयुद्ध शुरू हुआ था। दिसंबर 1991 ई. में रूस के विघटन के साथ ही शीतयुद्ध की विभीषिका ठंडी पड़ गई।
(2) विश्वभर में निःशस्त्रीकरण पर बल दिया जाने लगा है। सी-टी बी-टी. पर अनेक राष्ट्रों
ने हस्ताक्षर किये हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ भी विश्व को युद्ध से बचाने के कार्य में जुटा है।
इन्हीं गतिविधियों से शीतयुद्ध की गति मंद हुई है।
4. दो ध्रुवीय विश्व का आरंभ किस प्रकार हुआ था? समझाइए।
How did the emergence of two power-blocs take place? Explain.
                                                                           [Board Model 2009]
उत्तर-दो ध्रुवीय विश्व का आरंभ (The Emergence of two power-blocs)-
दोनों महाशक्तियाँ विश्व के विभिन्न हिस्सों पर अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाने के लिए तुली हुई
थीं। दुनिया दो गुटों के बीच बहुत स्पष्ट रूप से बंट गई थी। ऐसे में किसी मुल्क के लिए एक
रास्ता यह था कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किसी एक महाशक्ति के साथ जुड़ा रहे और दूसरी
महाशक्ति तथा उसके गुट के देशों के प्रभाव से बच सके।
2. परस्पर विरोधी गुटों के अपेक्षाकृत छोटे देशों ने महाशक्तियों के साथ अपने-अपने जुड़ाव
का इस्तेमाल निजी हित में किया। इन देशों को स्थानीय प्रतिद्वंद्वी देश के खिलाफ सुरक्षा का वायदा मिला, हथियार और आर्थिक मदद मिली। इन देशों की अपने पड़ोसी देशों से होड़ थी। महाशक्तियों के नेतृत्व में गठबंधन की व्यवस्था से पूरी दुनिया के दो खेमों में बँट जाने का खतरा पैदा हो गया। यह विभाजन सबसे पहले यूरोप में हुआ। पश्चिमी यूरोप के अधिकतर देशों ने अमेरिका का  पक्ष लिया जबकि पूर्वी यूरोप सोवियत खेमे में शामिल हो गया। इसीलिए ये खेमे पश्चिमी और पूर्वी गठबंधन भी कहलाते हैं।
(3) पश्चिमी गठबंधन ने स्वयं को एक संगठन का रूप दिया। अप्रैल 1949 में उत्तर
अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की स्थापना हुई जिसमें 12 देश शामिल थे। इस संगठन ने घोषणा की कि उत्तरी अमेरिका अथवा यूरोप के इन देशों में से किसी एक पर भी हमला होता है तो उसे ‘संगठन’ में शामिल सभी देश अपने ऊपर हमला मानेंगे। ‘नाटो’ में शामिल हर देश एक-दूसरे की मदद करेगा। इसी प्रकार के पूर्वी गठबंधन को ‘वारसा संधि’ के नाम से जाना जाता है। इसकी
अगुआई सोवियत संघ ने की। इसकी स्थापना 1955 ई. में हुई थी और इसका मुख्य काम था
‘नाटो’ में शामिल देशों का यूरोप में मुकाबला करना।
(4) शीतयुद्ध के दौरान अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों का निर्धारण महाशक्तियों की जरूरतों और
छोटे देशों के लाभ-हानि के गणित से होता था। जैसा कि ऊपर बताया गया है, महाशक्तियों के
बीच तनातनी का मुख्य अखाड़ा यूरोप बना। कुछेक मामलों में यह भी हुआ कि महाशक्तियों ने
अपने-अपने गुट में शामिल करने के लिए कुछ देशों पर अपनी ताकत का इस्तेमाल किया। पूर्वी
यूरोप में सोवियत संघ की दखलंदाजी इसका उदाहरण है। सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप में अपने
प्रभाव का इस्तेमाल किया। इस क्षेत्र के देशों में सोवियत संघ की सेना की व्यापक उपस्थिति ने
यह सुनिश्चित करने के लिए अपना प्रभाव जमाया कि यूरोप का पूरा पूर्वी हिस्सा सोवियत संघ
के दबदबे में रहे।
(5) पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा पश्चिम एशिया में अमरीका ने गठबंधन का तरीका
अपनाया। इन गठबंधनों को दक्षिण-पूर्व एशियाई संधि संगठन (SEATO) और केंद्रीय संधि संगठन (CENTO) कहा जाता है। इसके जवाब में सोवियत संघ तथा साम्यवादी चीन ने इस क्षेत्र के देशों मसलन उत्तरी वियतनाम, उत्तरी कोरिया और इराक के साथ अपने सम्बन्ध मजबूत किये।
(6) शीतयुद्ध के कारण विश्व के सामने दो गुटों के बीच बँट जाने का खतरा पैदा हो गया
था। ऐसी स्थिति में औपनिवेशिक शासन, मसलन ब्रिटेन और फ्रांस के चंगुल से मुक्त हुए नव
स्वतंत्र देशों को चिन्ता हुई कि कहीं वे अपनी इस आजादी को पाने के साथ खो न बैठे। गठबंधन
में भेद पैदा हुए और बड़ी जल्दी उनमें दरार पड़ी। साम्यवादी चीन की सन् 1950 के दशक के
उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ से अनबन हो गई। सन् 1969 में इन दोनों के बीच एक भू-भाग पर
आधिपत्य को लेकर छोटा-सा युद्ध भी हुआ। इस दौर की एक महत्त्वपूर्ण घटना ‘गुटनिरपेक्ष
आंदोलन’ का विकास है। इस आंदोलन ने नव-स्वतंत्र राष्ट्रों को दोध्रुवीय विश्व की गुटबाजी से
अलग रहने का मौका दिया।
5. शीतयुद्ध के दायरों का विवरण दीजिए।
Describe the areas of the Cold War.
उत्तर-शीतयुद्ध के दायरे (The Areas of the Cold War)-
(1) शीतयुद्ध के दौरान अनेक संकट सामने आये। क्यूबा के जिस मिसाइल संकट से हमने
इस अध्याय की शुरुआत की, वह इनमें एक था। शीतयुद्ध के दौरान खूनी लड़ाइयाँ भी हुई, लेकिन यहाँ ध्यान देने की बात यह भी है कि इन संकटों और लड़ाइयों की परिणति तीसरे विश्वयुद्ध के रूप में नहीं हुई। दोनों महाशक्तियाँ कोरिया (1950-1953), बर्लिन (1958-1962), कांगो (1960 के दशक की शुरुआत) और कई अन्य जगहों पर सीधे-सीधे मुठभेड़ की स्थिति में आ चुकी थीं। संकट गहराता गया क्योंकि दोनों में कोई भी पक्ष पीछे हटने के लिए तैयार नहीं था। जब हम शीतयुद्ध के दायरों की बात करते है तो हमारा आशय ऐसे क्षेत्रों से होता है जहाँ विरोधी खेमों में बंँटे देशों के बीच संकट के अवसर आये, युद्ध हुए या इनके होने की संभावना बनी, लेकिन बातें एक हद से ज्यादा नहीं बढ़ी। कोरिया, वियतनाम और अफगानिस्तान जैसे कुछ क्षेत्रों में व्यापक जनहानि हुई, लेकिन विश्व परमाणु युद्ध से बचा रहा और वैमनस्य विश्वव्यापी नहीं हो पाया। कई बार ऐसे अवसर आए जब दोनों महाशक्तियों के बीच राजनयिक संवाद जारी नहीं रह पाया और इससे दोनों के बीच गलतफहमियाँ बढ़ीं।
(2) ऐसे कई मौके आए जब शीतयुद्ध के संघर्षों और कुछ गहन संकटों को टालने में दोनों-
गुटों से बाहर के देशों ने कारगर भूमिका निभायी। इस संदर्भ में गुटनिरपेक्ष देशों की भूमिका को
नहीं भुलाया जा सकता। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख नेताओं में एक जवाहरलाल नेहरू थे।
नेहरू ने उत्तरी और दक्षिणी कोरिया के बीच मध्यस्थता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कांगो संकट में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ने प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभाई। अंतत: यह बात उभरकर सामने आती है कि महाशक्तियों ने समझ लिया था कि युद्ध को हर हालत में टालना जरूरी है। इसी समझ के कारण दोनों महाशक्तियों ने संयम बरता और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में जिम्मेवारी भरा बर्ताव किया। शीतयुद्ध एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की तरफ संरकता गया और इसमें संयम का तर्क ही काम कर रहा था।
(3) यद्यपि शीतयुद्ध के दौरान दोनों ही गठबंधनों के बीच प्रतिद्वंद्विता समाप्त नहीं हुई थी।
इसी कारण एक-दूसरे के प्रति शंका की हालत में दोनों गुटों ने भरपूर हथियार जमा किए और
लगातार युद्ध के लिए तैयारी करते रहे। हथियारों के बड़े जखीरे को युद्ध से बचने के लिए जरूरी
माना गया।
(4) दोनों पक्ष लगातार इस बात को समझ रहे थे कि संयम के बावजूद युद्ध हो सकता था।
दोनों पक्षों में कोई भी दूसरे के हथियारों की संख्या को लेकर गलत अनुमान लगा सकता था। दोनों गुट एक-दूसरे की मंशा को समझने में भूल कर सकते थे। इसके अतिरिक्त सवाल यह भी था कि कोई परमाणु दुर्घटना हो गई तो क्या होगा? अगर गलती से कोई परमाणु हथियार चल जाए या कोई सैनिक शरारतन युद्ध शुरू करने के इरादे से कोई हथियार चला दे तो क्या होगा? अगर परमाणु हथियार के कारण कोई दुर्घटना हो जाए तो क्या होगा? ऐसी दुर्घटना का शिकार हुए देश के नेताओं को कैसे पता चलेगा कि यह शत्रु का षड्यंत्र नहीं अथवा दूसरी तरफ से कोई मिसाइल नहीं दागी गई है, बल्कि यह महज एक दुर्घटना है?
(5) इस कारण, समय रहते अमेरिका और सोवियत संघ ने कुछेक परमाण्विक और अन्य
हथियारों को सीमित या समाप्त करने के लिए आपस में सहयोग करने का फैसला किया। दोनों
महाशक्तियों ने फैसला किया कि ‘अस्त्र-नियंत्रण’ द्वारा हथियारों की होड़ पर लगाम कसी जा सकती है और उसमें स्थायी संतुलन लाया जा सकता है। ऐसे प्रयास की शुरुआत सन् 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में हुई और एक दशक के भीतर दोनों पक्षों ने तीन अहम समझौतों पर दस्तखत किए। ये संधियाँ थीं परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि, परमाणु अप्रसार संधि और परमाणु प्रक्षेपास्त्र परिसीमन संधि (एंटी-बैलेस्टिक मिसाइल ट्रीटी)। इसके बाद महाशक्तियों ने ‘अस्त्र-परिसीमन’ के लिए वार्ताओं के कई दौर किए और हथियारों पर अंकुश रखने के लिए अनेक संधियाँ कीं।
6. “शीतयुद्ध से हथियारों की होड़ और हथियारों पर नियंत्रण-ये दोनों ही प्रक्रियाएँ
पैदा हुई।” इन दोनों प्रक्रियाओं के क्या कारण थे?
“The Cold War produced an aim race as well as arms control. What were
the reasons for both there developments?            [NCERT T.B.Q.5]
उत्तर-(1) दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से ही शीतयुद्ध की शुरुआत हुई। अमेरिका ने
जापान के विरुद्ध दो बमों का प्रयोग किया जिससे सोवियत संघ को नये-नये हथियार बनाने की
प्रेरणा मिली। शीतयुद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियाँ विश्व के विभिन्न भागों पर अपने प्रभाव का
दायरा बढ़ाने के लिए तुली हुई थीं। महाशक्तियों के नेतृत्व में सैन्य गठबंधन (या गुटबंदी) की
व्यवस्था से पूरी दुनिया के दो खेमों में बंट जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई। यह विभाजन सर्वप्रथम
यूरोप में दिखाई दिया। पश्चिमी यूरोप के अधिकतर देशों ने अमेरिका का पक्ष लिया जबकि पूर्वी
यूरोप सोवियत खेमे में शामिल हो गया। इसलिए ये खेमे पश्चिमी और पूर्वी गठबंधन भी
कहलाते हैं।
(2) पश्चिमी गठबन्धन ने स्वयं को एक संगठन का रूप दिया। अप्रैल 1949 में उत्तर
अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की स्थापना हुई जिसमें 12 देश शामिल थे। घोषणा की गई कि
उत्तरी अमेरिका या यूरोप के इन राष्ट्रों में से किसी एक पर भी हमला होता है तो उसे ‘संगठन’
में शामिल सभी देश अपने ऊपर हमला मानेंगे। ‘नाटो’ में शामिल प्रत्येक देश एक-दूसरे की मदद
करेगा।
(3) पूर्वी गठबंधन को वारसा संधि के नाम से भी जाना गया। इसकी अगुआई सोवियत संघ
ने की। इसकी स्थापना सन् 1955 में हुई थी। इसका मुख्य कार्य था ‘नाटो’ में शामिल देशों का
यूरोप में मुकाबला करना।
(4) यद्यपि शीतयुद्ध के दौरान दोनों ही गठबंधनों के बीच प्रतिद्वंद्विता समाप्त नहीं हुई थी।
इसी कारण एक-दूसरे के प्रति शंका की हालत में दोनों गुटो ने भरपूर हथियार जमा किए और लगातार युद्ध के लिए तैयारी करते रहे। हथियारों के बड़े जखीरे को युद्ध से बचने के लिए आवश्यक माना गया।
दोनों लगातार इस बात को समझ रहे थे कि संयम के बावजूद युद्ध हो सकता था। दोनों पक्षों
में से कोई भी दूसरे के हथियारों की संख्या को लेकर गलत अनुमान लगा सकता था। दोनों गुट
एक-दूसरे की मंशा को समझने में भूल कर सकते थे। इसके अतिरिक्त सवाल यह भी था कि कोई
परमाणु दुर्घटना हो गई तो क्या होगा? अगर गलती से कोई परमाणु हथियार चल जाए या कोई
सैनिक शरारतन युद्ध शुरू करने के इरादे से कोई हथियार चला दे तो क्या होगा? अगर परमाणु
हथियार के कारण कोई दुर्घटना हो जाए तो क्या होगा? ऐसी दुर्घटना का शिकार हुए देश के नेताओं को कैसे पता चलेगा कि वह शत्रु का षड्यंत्र नहीं था दूसरी ओर से कोई मिसाइल नहीं दागी गई है, अपितु यह महज एक दुर्घटना है।
(5) शीतयुद्ध शुरू होने के पीछे यह समझ भी कार्य कर रही थी कि परमाणु बम से होने
वाले विध्वंस की मार झेलना किसी भी राष्ट्र के बूते की बात नहीं। यह एक सीधा-सादा लेकिन
असरदार तर्क था। जब दोनों महाशक्तियों के पास इतनी क्षमता के परमाणु हथियार हों कि वे
एक-दूसरे को असहनीय क्षति पहुंचा सके तो ऐसे में दोनों के बीच रक्तरंजित युद्ध होने की संभावना कम रह जाती है। उकसावे के बावजूद कोई भी पक्ष युद्ध का जोखिम मोल लेना नहीं चाहेगा क्योंकि युद्ध से चाहे किसी को राजनीतिक फायदा हो, लेकिन इन देशों के विध्वंस को औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।
(6) परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों पक्षों को इतना नुकसान उठाना पड़ेगा कि उनमें विजेता
कौन है-यह तय करना भी असंभव होगा। अगर कोई अपने शत्रु पर आक्रमण करके उसके
परमाणु हथियारों को नाकाम करने की कोशिश करता है तब भी दूसरे के पास उसे बर्बाद करने
लायक हथियार बच जायेंगे। इसे ‘अपरोध’ (रोक और संतुलन) का तर्क कहा गया। दोनों ही पक्षों
के पास एक-दूसरे के मुकाबले और परस्पर नुकसान पहुंचाने की इतनी क्षमता होती है कि कोई भी पक्ष युद्ध का खतरा नहीं उठाना चाहता। इस तरह, महाशक्तियों के बीच गहन प्रतिद्वन्द्विता होने के बावजूद शीतयुद्ध रक्तरंजित युद्ध का रूप नहीं ले सका। इसकी तासीर ठंडी रही। पारस्परिक ‘अपरोध’ की स्थिति ने युद्ध तो नहीं होने दिया, लेकिन यह स्थिति पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता को न रोक सकी।
(7) सौभाग्यवश, समय रहते संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ ने कुछेक परमाण्विक
और अन्य हथियारों को सीमित या समाप्त करने के लिए आपस में सहयोग करने का फैसला
किया। दोनों महाशक्तियों ने फैसला किया कि ‘अस्त्र-नियंत्रण’ द्वारा हथियारों की होड़ पर लगाम
कसी जा सकती है और उसमें स्थायी संतुलन लाया जा सकता है। ऐसे प्रयास की शुरुआत सन्
1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में हुई और एक दशक के भीतर दोनों पक्षों ने तीन अहम समझौतों
पर दस्तखत किए। ये संधियाँ थीं परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि, परमाणु अप्रसार संधि और परमाणु प्रक्षेपास्त्र परिसीमन संधि (एंटी बैलेस्टिक मिसाइल ट्रीटी)। इसके बाद महाशक्तियों ने
‘अस्र-परिसीमन के लिए वार्ताओं के कई दौर किए और हथियारों पर अंकुश रखने के लिए अनेक
संधियांँ कीं।
7. शीतयुद्ध के दौरान भारत की अमेरिका और सोवियत संघ के प्रति विदेश नीति क्या
थी? क्या आप मानते हैं कि इस नीति ने भारत के हितों को आगे बढ़ाया?
What was India’s foreign policy towards the US and USSR during the Cold War era? Do you think that the policy helped India’s interests?
                                                                                    [NCERT T.B.Q. 8)
उत्तर-प्रस्तावना (Introduction)-15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तब से
लेकर शीतयुद्ध के अंत तक (1990 ई. तक) भारत की अमेरिका और सोवियत संघ के प्रति विदेश नीति निम्नलिखित अनुच्छेदों में वर्णित है।
(क) भारत-अमेरिकी सम्बन्धों का परीक्षण (Evaluation of Indo-American
Relations)-स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व अमेरिका ने ब्रिटेन पर दबाव डाला था कि भारत को
स्वतंत्रता दे दी जाए परंतु स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति का अनुसरण किया।
कारणवश अमेरिका भारत से नाराज हुआ और भारत के विरुद्ध पाकिस्तान को सहायता दी गयी। अमेरिका के साथ भारत के सम्बन्धों का विवेचन निम्न कालखण्डों में किया जा सकता है-
(1) नेहरू जी के काल में (Nehru period) (1947-64)-यद्यपि गुटनिरपेक्ष नीति के
कारण अमेरिका भारत से अप्रसन्न था उसने पाकिस्तान को सैनिक सहायता दी। गोवा के प्रश्न पर
भी अमेरिका ने भारत का साथ नहीं दिया। भारत नाटो और सेण्टो सन्धियों से पृथक् रहा। कोरिया प्रश्न पर भी भारत-अमेरिका में मतभेद रहा। अमेरिका की जापान के साथ सन्धि पर भी भारत ने रूस के दृष्टिकोण का समर्थन किया। 1957 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका की यात्रा की जिससे दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार हुआ। 1959 में राष्ट्रपति आइजकहावर ने भारत की यात्रा की जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक मजबूत हुए। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया। अमेरिका ने भारत को बड़े पैमाने पर सैनिक सहायता दी।
(2) लालबहादुर शास्त्री काल (Shastri’s Period) (1964-66)-शास्त्रीजी ने भी
गुटनिरपेक्षता की नीति का पालन करते हुए वियतनाम युद्ध के समय अमेरिका की घोर निन्दा की
1965 में भारत-पाक युद्ध के समय अमेरिका ने पाकिस्तान का पूर्ण समर्थन किया अतः भारतीय
जनमानस अमेरिका के विरुद्ध हुआ और भारत अमेरिकी सम्बन्ध तनावपूर्ण रहे। भारत में उस समय खाद्य समस्या थी परंतु अमेरिका ने खाद्य सहायता में भी कमी की और इसके बावजूद भी भारत ने अमेरिका की वियतनाम नीति का घोर विरोध किया।
(3) इन्दिरा गाँधी का प्रथम काल (Indira’s First Period) (1966-77)-अमेरिका
कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान का समर्थन बना रहा। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी
अमेरिका ने पाकिस्तान का ही साथ दिया। सुरक्षा परिषद में भी उसने पाकिस्तान का पक्ष लिया परंतु रूस द्वारा वीटो किये जाने के कारण अमेरिका के मनसूबे पूरे नहीं हुए।
(4) जनता सरकार का काल (Janta Government Period)-1977 में जनता पार्टी
शासन में आयी। उस समय यूरेनियम की सप्लाई को लेकर दोनों देशों में कटुता पैदा हुई क्योंकि
अमेरिका ने तारापुर परमाणु केन्द्र के लिए जो यूरेनियम सप्लाई करने की भारत के साथ सन्धि की थी, उस पर अमेरिका ने प्रतिबन्ध लगा दिया। भारत ने फ्रांस से यूरेनियम सप्लाई का समझौता किया। राष्ट्रपति जिमी कार्टर जब भारत आये तो भारत ने दृढ़तापूर्वक परमाणु अप्रसार सन्धि पर हस्ताक्षर करने से इंकार करके अपने स्वतंत्र व्यवहार का परिचय दिया।
(5) इन्दिरा गाँधी का द्वितीय काल (Indira’s Second Period) (1980-84)-इंदिरा
गाँधी के द्वितीय काल (1980-84) में भी भारत-अमेरिकी सम्बन्धों में मधुरता नहीं आ सकी।
सोवियत सेनाओं द्वारा अफगानिस्तान में प्रवेश को लेकर अमेरिका ने पाकिस्तान को अत्याधुनिक
शस्त्रों की सप्लाई की। भारत ने अमेरिका के इस कदम का विरोध किया। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने
अमेरिका की यात्रा की। राष्ट्रपति रीगन भारत आए और सम्बन्धों को मधुर बनाया।
(6) राजीव गाँधी (Rajiv Gandhi’s Period) (1984-89)–अक्टूबर 1984 में इंदिरा
गाँधी की हत्या के बाद राजीव गांधी भारत के नए प्रधानमंत्री बने। उनके प्रधानमंत्री काल के दौरान भारत और अमेरिका के सम्बन्धों में सुधार होना शुरू हुआ। जून 1985 में राजीव गांधी अमेरिका की यात्रा पर गए और उनका राष्ट्रपति रीगन के ह्वाइट हाउस में भव्य स्वागत किया। भारत और अमेरिका द्वारा जारी संयुक्त वक्तव्य में अमेरिका ने भारत में आतंकवादी हिंसा के प्रयासों और उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप मिलने के विरुद्ध भारत सरकार को पूरा सहयोग देने का संकल्प व्यक्त किया।
(7) विश्वनाथ प्रताप सिंह एवं चन्द्रशेखर कालखंड (Vishvanath Pratap Singh
and Chandra Shekhar Period) (1989-90)- इस काल में भी अमेरिका से सम्बन्ध
सामान्यत: सामान्य बने है किन्तु अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को अस्त्र-शस्त्रों की निरंतर सप्लाई से
सम्बन्धों में मधुरता नहीं आई। यद्यपि अमेरिका ने पाकिस्तान की कश्मीर में घुसपैठ की निन्दा कर सराहनीय कार्य किया था।
(ख) भारत-सोवियत संघ सम्बन्ध (Indo-Soviet Relations)-भारत और सोवियत
सम्बन्ध बड़े ही मधुर रहे हैं। कश्मीर में भारतीय सीमान्त से सोवियत अधिक दूर नहीं है। सोवियत संघ की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा एशियाई है। सोवियत संघ के प्रति नेहरूजी ने विशेष रुचि दिखायी। 1920 के दशक में भारतीय राजनीति में सक्रिय होने के साथ ही उन्होंने सोवियत संघ का दौरा किया। स्टालिन काल में भारत सोवियत सम्बन्ध कोई विशेष नहीं थे क्योंकि स्टालिन गाँधी और नेहरू को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पिछलग्गू ही मानते थे। नेहरूजी ने गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाया तो भारत-सोवियत सम्बन्धों को रही सही आशा भी धूमिल हो गयी। नेहरू जी के काल में साम्यवादी विपक्षियों का दमन किया जा रहा था जिससे सोवियत संघ अप्रसन्न था। जब चीन में साम्यवाद बढ़ रहा था तब भी नेहरू चाँग काई शेक के साथ पारिवारिक सम्बन्धों का प्रदर्शन कर रहे थे। विजय लक्ष्मी पंडित और डॉ. राधाकृष्णन सोवियत संघ में भारतीय राजदूत के रूप में भारत-सोवियत मैत्री को नहीं बढ़ा सके परंतु के पी एस. मेनन के राजदूत बनने पर भारत-सोवियत सम्बन्धों में सुधार हुआ।
  खुश्चेव काल (1954-64) में भारत-सोवियत सम्बन्धों में घनिष्ठता स्थापित होती गयी।
खुश्चेव ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व वाले राजनय का अनुसरण किया। भारतीय साम्यवादियों ने भी
इस काल में नेहरू सरकार को समर्थन देना शुरू कर दिया परंतु 1956 में हंगरी में सोवियत संघ
के हस्तक्षेप का भारत ने समर्थन नहीं किया। बाद में कांगो में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वावधान में
सम्पन्न कार्यवाही को सोवियत संघ ने गलत समझा। सोवियत-चीन विवाद ने भारत-सोवियत
सम्बन्धों को मजबूती दी, क्योंकि चीन 1962 में भारत पर आक्रमण कर चुका था। कैनेडी और
खुश्चेव के निकट आने के कारण 1965 के भारत-पाक युद्ध में सोवियत संघ ने तटस्थ की भूमिका निभायी और ताशकन्द समझौते में भी अमेरिकी हितों का ध्यान रखा गया। यह असहज स्थिति 1969 तक बनी रही। उसके बाद इन्दिरा गाँधी काल बैंकों का राष्ट्रीकरण, प्रिवीयर्स की समाप्ति आदि से सोवियत संघ में भारत की छवि प्रगतिशील राष्ट्र के रूप में हुई। इसके साथ ही उसूरी नदी के तट पर चीन के साथ हिंसक झड़पें होने से सोवियत नेता चीन के संदर्भ में भारत के साथ अपने हितों का संयोग फिर से देखने लगे थे।
    बंगलादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान भारत-सोवियत मैत्री सहयोग सन्धि की गयी। 1971 से
1975 तक भारत-सोवियत सम्बन्धों में सुधार होता गया। 1977 में मोरारजी देसाई के काल में भी भारत-सोवियत सम्बन्धों में परिवर्तन नहीं आया। यद्यपि मोरारजी, वाजपेयी तथा चरणसिंह आदि का झुकाव सोवियत संघ की अपेक्षा अमेरिका की ओर अधिक था फिर भी परिस्थितियों के कारण भारत-सोवियत संघ सम्बन्ध मधुर बने रहे। सोवियत संघ ने सैनिक सहायता तथा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारत का साथ दिया। मिग-16, मिग-32 हैलीकोप्टर और ए-एन–12 व ए.एन.-32 मालवाहक जहाज भी भारत की सोवियत संघ ने ही सुलभ कराए। साथ ही परमाणु प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सोवियत संघ ने भले ही सदैव वायदा पूरा न किया हो, किन्तु भारत के मन में वह धारणा बनी रही कि ‘भारी पानी की आपूर्ति में सोवियत संघ भारत की सहायता करेगा। 1979 में सोवियत संघ को अफगानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा। जिसमें उसे भारत की सहायता की आवश्यकता थी, जो भारत ने पूरी तरह से निभाई। राजकपूर की ‘आवारा’ जैसे फिल्में सोवियत संघ में लोकप्रिय हुई जो सरकारी समर्थन के बिना संभव नहीं थी। सोवियत संघ में बड़े पैमाने पर ‘भारत-महोत्सव’ का आयोजन किया गया। धीरे-धीरे 1990 तक सोवियत संघ का 15 गणराज्यों में विघटन होता गया और भारत सोवियत सम्बन्धों का स्थान अब भारत-रूस सम्बन्धों में परिवर्तित हो गया।
भारत की विदेश नीति का भारत के हितों पर प्रभाव (Impact on India’s interests
of the foreign Policy of India)–गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में शीतयुद्ध के दौर
में भारत ने दो स्तरों पर अपनी भूमिका निभाई। एक स्तर पर भारत ने सजग और सचेत रूप से
अपने को दोनों महाशक्तियों की खेमेबंदी से अलग रखा। दूसरे, भारत ने उपनिवेशों के चुंगल से
मुक्त हुए नव-स्वतंत्र देशों के महाशक्तियों के खेमे में जाने का पुरजोर विरोध किया।
भारत की नीति न तो नकारात्मक थी और न ही निष्क्रियता की। नेहरू ने विश्व को याद
दिलाया कि गुटनिरपेक्षता कोई ‘पलायन’ की नीति नहीं है। इसके विपरीत, भारत शीतयुद्धकालीन
प्रतिद्वंद्विता की जकड़ ढीली करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करने के
पक्ष में था। भारत ने दोनों गुटों के बीच मौजूद मतभेदों को कम करने की कोशिश की और इस
तरह उसने इन मतभेदों को पूर्णव्यापी युद्ध का रूप लेने से रोका। भारत के राजनयिकों और नेताओं का उपयोग अक्सर शीतयुद्ध के दौर के प्रतिद्वंद्वियों के बीच संवाद कायम करने तथा मध्यस्थता करने के लिए हुआ; मिसाल के तौर पर 1950 के दशक के शुरुआती सालों में कोरियाई युद्ध के दौरान।
यहाँ यह याद रखना भी जरूरी है कि भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल अन्य सदस्यों
को भी ऐसे कामों में संलग्न रखा। शीतयुद्ध के दौरान भारत ने लगातार उन क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को सक्रिय बनाये रखने की कोशिश की जो अमेरिका अथवा सोवियत संघ के खेमे से नहीं जुड़े थे। नेहरू ने स्वतंत्र और परस्पर सहयोगी राष्ट्रों के एक सच्चे राष्ट्रकुल’ के ऊपर गहरा विश्वास जताया जो शीतयुद्ध को खत्म करने में न सही, पर उसकी पकड़ ढीली करने में ही
सकारात्मक भूमिका निभाये।
कुछ लोगों ने माना कि गुटनिरपेक्षता अंतर्राष्ट्रीयता का एक उदार आदर्श है लेकिन यह आदर्श
भारत के वास्तविक हितों से मेल नहीं खाता। यह बात ठीक नहीं है। गुटनिरपेक्षता की नीति ने
कम-से-कम दो तरह से भारत का प्रत्यक्ष रूप से हितसाधन किया-
• पहली बात तो यह कि गुटनिरपेक्षता के कारण भारत ऐसे अंतर्राष्ट्रीय फैसले और पक्ष ले
सका जिससे उसका हित सधता होता हो न कि महाशक्तियों और उनके खेमे के देशों का।
• दूसरे, भारत हमेशा इस स्थिति में रहा कि एक महाशक्ति उसके खिलाफ जाए तो वह
दूसरी महाशक्ति के करीब आने की कोशिश करे। अगर भारत को महसूस हो कि
महाशक्तियों में से कोई उसकी अनदेखी कर रहा है या अनुचित दबाव डाल रहा है। तो
वह दूसरी महाशक्ति की तरफ अपना रुख कर सकता था। दोनों गुटों में से कोई भी भारत
को लेकर न तो बेफिक्र हो सकता था और न ही धौंस जमा सकता था।
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की कई कारणों से आलोचना की गई। हम यहाँ ऐसी दो
आलोचनाओं की चर्चा करेंगे-
• आलोचकों का एक तर्क यह है कि भारत की गुटनिरपेक्षता सिद्धांतविहीन है। कहा जाता
है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को साधने के नाम पर अक्सर महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय
मामलों पर कोई सुनिश्चित पक्ष लेने से बचता रहा।
• आलोचकों का दूसरा तर्क है कि भारत के व्यवहार में स्थिरता नहीं रही और कई बार भारत
की स्थिति विरोधाभासी रही। महाशक्तियों के खेमों में शामिल होने पर दूसरे देशों की
आलोचना करने वाले भारत ने स्वयं सन् 1971 के अगस्त में सोवियत संघ के साथ
आपसी मित्रता की संधि पर हस्ताक्षर किए। विदेशी पर्यवेक्षकों ने इसे भारत का सोवियत
खेमे में शामिल होना माना। भारत की सरकार का दृष्टिकोण यह था कि बांग्लादेश-संकट
के समय उसे राजनीतिक और सैनिक सहायता की जरूरत थी और यह संधि उसे संयुक्त
राज्य अमेरिका सहित अन्य देशों से अच्छे संबंध बनाने से नहीं रोकती।
गुटनिरपेक्षता की नीति शीतयुद्ध के संदर्भ में पनपी थी। दूसरे अध्याय में हम पढ़ेंगे कि सन्
1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में शीतयुद्ध का अंत और सोवियत संघ का विघटन हुआ। इसके साथ ही एक अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन और भारत की विदेश नीति की मूल भावना के रूप में
गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता तथा प्रभावकारिता में थोड़ी कमी आयी। बहरहाल, गुटनिरपेक्षता में कुछ आधारभूत मूल्य और विचार शामिल हैं। गुटनिरपेक्षता इस बात की पहचान पर टिकी है कि उपनिवेश की स्थिति से आजाद हुए देशों के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव हैं और यदि ये देश साथ आ जायें तो एक।
8. गुटनिरपेक्षता आन्दोलन के आरंभ, लक्ष्यों (या उद्देश्यों) एवं उपलब्धियों का विवरण
दीजिए।
Discuss beginning, aims (or objections) and achievements of Non-alignment Movement.
                                                  अथवा,
गुटनिरपेक्षता ने किस तरह से दो-ध्रुवीयता को चुनौती दी थी? वह इस क्षेत्र में कहाँ
तक सफल रहा है?
How did the Non-alignment give challenge to bipolarity? How far it has
been successful in this area?                          [Board Model 2009A]
उत्तर-(1) गुनिरपेक्षता आन्दोलन (Non-alignment Movement)-गुटनिरपेक्षता
से अभिप्राय है किसी भी गुट में शामिल न होना द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संसार में अमेरिकी
अर्थात् पूँजीवादी तथा रूसी अर्थात् साम्यवादी दो गुट बन गये। दोनों में शीत युद्ध चल रहा था।
इसी बीच एशिया और अफ्रीका के अनेक राष्ट्र स्वतंत्र हुए। नये स्वाधीन हुए अनेक राष्ट्र किसी भी
गुट में शामिल नहीं होना चाहते थे। गुटनिरपेक्षता का अभिप्राय यह नहीं था कि हम विश्व की
घटनाओं के प्रति उदासीन हो जाएं वरन यह कि गुटों से अलग रहते हुए भी प्रत्येक घटना की
अच्छाई या बुराई को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय लेंगे।
(II) आन्दोलन का प्रारंभ तथा उद्देश्य एवं सिद्गांत (Beginning, Aims and
Principles of the Movement)-गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उत्थान में भारत के प्रधानमंत्री पं.
जवाहरलाल नेहरू, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर और यूगोस्लाविया
के राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने प्रमुख भूमिका निभाई है। गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों का पहला शिखर सम्मेलन
यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में सितंबर 1961 ई. में हुआ। इसमें 25 देशों के राष्ट्राध्यक्षों में
भाग लिया। इस सम्मेलन में गुटनिरपेक्षता के मूलभूत उद्देश्यों व सिद्धांतों की घोषणा की गई जो
इस प्रकार हैं-
(1) गुटनिरपेक्ष देशों ने युद्धों के विरुद्ध और विश्व में शांति स्थापना की भावना को महत्त्व
दिया।
(2) उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को समाप्त करने पर बल दिया है।
(3) संसार के दोनों गुटों से अलग रहना और दोनों में संतुलन बनाये रखने में विश्वास
करता है।
(4) प्रत्येक देश को आत्मनिर्भर बनने में सहायता देना तथा परतंत्र देशों को स्वतंत्र कराने के
लिए प्रयत्न करना है।
(5) ये शस्त्रों की होड़ को भी समाप्त करने के पक्ष में हैं।
(6) गुटनिरपेक्ष आंदोलन समानता के सिद्धांत में विश्वास करता है। यह नस्ली भेदभाव की
निंदा करता है।
(7) गुटनिरपेक्ष देश समस्याओं का निपटारा युद्ध द्वारा नहीं बल्कि शांतिपूर्वक तथा आपसी
बातचीत के ढंग से निपटाने के पक्ष में हैं। वह आपस में मेल-मिलाप तथा सह-अस्तित्व की भावना में विश्वास करता है।
(8) गुटनिरपेक्ष देश किसी भी प्रकार के सैनिक गुटों की घोर विरोधी है।
(9) वह मानवीय अधिकारों का सम्मान करता है।
(10) गुटनिरपेक्ष आंदोलन विभिन्न राष्ट्रों के बीच समानता के आधार पर शोषण-मुक्त
आर्थिक संबंध स्थापित करना चाहता है।
(III) उपलब्धियाँ (Achievements)-गुटनिरपेक्ष देशों ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों में
महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है-
(1) महाशक्तियों में तनाव की कमी (Tension reduced among super-powers)-
गुटनिरपेक्ष देशों ने किसी भी महाशक्ति में शामिल न होकर बेहतर दुनिया के निर्माण की नीति
अपनाई। उन्होंने ऐसी सद्भावना की नीति अपनाई कि दोनों महाशक्तियां एक-दूसरे के निकट आ
गई और उनमें तनाव की कमी आई।
(2) स्वतंत्रता की लहर (IWave of Freedom)–पराधीन राष्ट्रों की स्वाधीनता के लिए
गुटनिरपेक्ष देशों ने साम्राज्यवादी शक्तियों पर नैतिक दबाव डाला। परिणामस्वरूप आज लगभग
सारा विश्व स्वतंत्र है।
(3) निशस्त्रीकरण (Disammanent)-इन देशों ने अस्त्र-शस्त्रों की होड़ के विरुद्ध एक
दीर्घ आंदोलन छेड़ा। परिणामस्वरूप महाशक्तियों ने शस्त्रों पर प्रतिबंध लगाने के लिए अनेक
प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किये।
(4) शीतयुद्ध का अंत (End of the Cold War)-गुटनिरपेक्ष देशों के फलस्वरूप
शीतयुद्ध समाप्त हो गया है। सच तो यह है कि गुटनिरपेक्ष देशों ने विश्वयुद्धों के विरुद्ध और
शांति के पक्ष में आवाज उठाई है।
इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने आदर्श विश्व बनाने में अथाह योगदान दिया जो एक
वरदान साबित हुआ है।
9. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को तीसरी दुनिया के देशों ने तीसरे विकल्प के रूप में समझा।
जब शीतयुद्ध अपने शिखर पर था तब इस विकल्प ने तीसरी दुनिया के देशों के
विकास में कैसे मदद पहुंँचाई?
NAM was considered a “Third Option by Third World countries. How did
the option benefit their growth during the peak of the Cold War?
                                                                           [NCERT T.B.Q.9)
उत्तर-गुटनिरपेक्ष आन्दोलन तीसरी दुनिया के देशों द्वारा प्रस्तुत तीसरा विकल्प
(Non-alignment Movement as a third alternative presented by the countries of the Third World) –
(1) शीतयुद्ध की वजह से विश्व दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में बंट रहा था। इसी संदर्भ में गुटनिरपेक्षता
ने एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका के नव-स्वतंत्र देशों को एक तीसरा विकल्प दिया। यह
विकल्प था दोनों महाशक्तियों के गुटों से अलग रहने का।
(2) गुटनिरपेक्ष आंदोलन की जड़ में युगोस्लाविया के जोसेफ ब्रॉज टीटो, भारत के
जवाहरलाल नेहरू और मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर की दोस्ती थी।
(3) इन तीनों ने सन् 1956 में एक सफल बैठक की। इंडोनेशिया के सुकर्णो और घाना के
वामे एनक्रूमा ने इनका जोरदार समर्थन किया। ये पाँच नेता गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक
कहलाए। पहला गुटनिरपेक्ष सम्मेलन सन् 1961 में बेलग्रेड में हुआ। यह सम्मेलन कम-से-कम
तीन बातों की परिणति था-
(क) इन पांँच देशों के बीच सहयोग।
(ख) शीतयुद्ध का प्रसार और इसके बढ़ते हुए दायरे; और
(ग) अंतर्राष्ट्रीय फलक पर बहुत से नव-स्वतंत्र अफ्रीकी देशों का नाटकीय उदय। 1960
तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में 16 नये अफ्रीकी देश बतौर सदस्य शामिल हो चुके थे।
(4) पहले गुटनिरपेक्ष-सम्मेलन में 25 सदस्य देश शामिल हुए समय गुजरने के साथ
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सदस्य संख्या बढ़ती गई। 2006 में हवाना (क्यूबा) में हुए 14वें सम्मेलन में 116 सदस्य-देश और 15 पर्यवेक्षक देश शामिल हुए।
(5) जैसे-जैसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन एक लोकप्रिय अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में बढ़ता
गया वैसे-वैसे इसमें विभिन्न राजनीतिक प्रणाली और अलग-अलग हितों के देश शामिल होते
गए। इससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मूल स्वरूप में बदलाव आया। इसी कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सटीक परिभाषा कर पाना कुछ मुश्किल है। वास्तव में यह आंदोलन है क्या? दरअसल यह आंदोलन क्या नहीं है-यह बताकर इसकी परिभाषा करना ज्यादा सरल है। यह महाशक्तियों के गुटों में शामिल न होने का आंदोलन है।
(6) महाशक्तियों के गुटों से अलग रहने की इस नीति का मतलब यह नहीं है कि इस
आंदोलन से जुड़े देश अपने को अंतर्राष्ट्रीय मामलों से अलग-थलग रखते हैं या तटस्थता का
पालन करते हैं। गुटनिरपेक्षता का मतलब पृथक्तावाद नहीं पृथक्तावाद का अर्थ होता है अपने को
अंतर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखना। 1787 में अमेरिका में स्वतंत्रता की लड़ाई हुई थी। इसके
बाद से पहले विश्वयुद्ध की शुरुआत तक अमेरिका ने अपने को अंतर्राष्ट्रीय मामलो से अलग
रखा। उसने पृथक्तावाद की विदेश-नीति अपनाई थी। इसके विपरीत गुटनिरपेक्ष देशों ने जिसमें
भारत भी शामिल है। शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच मध्यस्थता
में सक्रिय भूमिका निभाई। गुटनिरपेक्ष देशों की ताकत की जड़ उनकी आपसी एकता और
महाशक्तियों द्वारा अपने-अपने खेमे में शामिल करने की पुरजोर कोशिशों के बावजूद ऐसे किसी।
खेमे में शामिल न होने के उनके संकल्प में है।
(7) गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता का धर्म निभाना भी नहीं है। तटस्थता का अर्थ होता है
मुख्यत: युद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना। तटस्थता की नीति का पालन करने
वाले देश के लिए यह जरूरी नहीं कि वह युद्ध को समाप्त करने में मदद करे। ऐसे देश युद्ध में
संलग्न नहीं होते और न ही युद्ध के सही-गलत होने के बारे में उनका कोई पक्ष होता है। दरअसल
कई कारणों से गुटनिरपेक्ष देश, जिसमें भारत भी शामिल है, युद्ध में शामिल हुए हैं। इन देशों ने
दूसरे देशों के बीच युद्ध को होने से टालने के लिए काम किया है और हो रहे युद्ध के अंत के लिए
प्रयास किए हैं।
10. नव अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर एक लेख लिखिए।
Write an essay on ‘New Intentational Economic Order. INCERT T.B.Q.10]
उत्तर-नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New Intermaional Economic
Order)-(1) गुटनिरपेक्ष देश शीतयुद्ध के दौरान महज मध्यस्थता करने वाले देश भर नहीं थे।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल अधिकांश देशों की ‘अल्प विकसित देश’ का दर्जा मिला था। इन
देशों के सामने मुख्य चुनौती आर्थिक रूप से और ज्यादा विकास करने तथा अपनी जनता को
गरीबी से उबारने की थी। नव-स्वतंत्र देशों की आजादी के लिहाज से भी आर्थिक विकास महत्त्वपूर्ण था। बगैर टिकाऊ विकास के कोई देश सही मायनों में आजाद नहीं रह सकता। उसे धनी देशों पर निर्भर रहना पड़ता। इसमें वह उपनिवेशक देश भी हो सकता था जिससे राजनीतिक आजादी हासिल की गई।
(2) इसी समझ से नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की धारणा का जन्म हुआ। 1972 में
संयुक्त राष्ट्र संघ के व्यापार और विकास से संबंधित सम्मेलन (यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन
ट्रेड एंड डेवलपमेंट-अंकटाड) में ‘टुवार्ड्स अ न्यू ट्रेड पॉलिसी फॉर डेवलपमेंट’ शीर्षक से एक
रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। इस रिपोर्ट में वैश्विक व्यापार-प्रणाली में सुधार का प्रस्ताव किया गया था।
इस रिपोर्ट में कहा गया था कि सुधारों से―
(क) अल्प विकसित देशों को अपने उन प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त होगा जिनका
दोहन पश्चिम के विकसित देश करते हैं;
(ख) अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजार तक होगी; वे अपना सामान
बेच सकेंगे और इस तरह गरीब देशों के लिए यह व्यापार फायदेमंद होगा;
(ग) पश्चिमी देशों से मंँगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम होगी; और
(घ) अल्प विकसित देशों की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में भूमिका बढ़ेगी।
(3) गुटनिरपेक्षता की प्रकृति धीरे-धीरे बदली और इसमें आर्थिक मुद्दों को अधिक महत्त्व दिया
जाने लगा। बेलग्रेड में हुए पहले सम्मेलन (1961) में आर्थिक मुद्दे ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं थे। सन्
1970 के दशक के मध्य तक आर्थिक मुद्दे प्रमुख हो उठे। इसके परिणामस्वरूप गुटनिरपेक्ष आंदोलन आर्थिक दबाव-समूह बन गया। सन् 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध तक नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक
व्यवस्था को बनाये-चलाये रखने के प्रयास मंद पड़ गए इसका मुख्य कारण था विकसित देशों
द्वारा किया जा रहा तेज विरोध। विकसित देश एक सुर में विरोध कर रहे थे जबकि गुटनिरपेक्ष देशों को इस विरोध के बीच अपनी एकता बनाए रखने के लिए जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ रही थी।
11. आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया ने अर्थव्यवस्था पर क्या प्रतिकूल प्रभाव डाले हैं? संक्षेप
में बताएँ।                                                                        [B.M. 2009A]
उत्तर-आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया ने भारतीय अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित प्रतिकूल प्रभाव
डाले हैं-
(i) कृषि क्षेत्र में सुधार-आर्थिक सुधारों के अंतर्गत भारत सरकार ने खाद्य सब्सिडी को
कम किया है, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की है। इनके सामूहिक प्रभाव से अनाज की
कीमतों में वृद्धि हुई है। इसके अतिरिक्त सुधार अवधि में कृषि क्षेत्र में, सार्वजनिक निवेश में
विशेषकर आधारिक संरचना में काफी कमी आयी है।
(ii) उद्योग क्षेत्र में सुधार-आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया ने देश के उद्योगों को अत्यधिक
आघात पहुँचाया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ तो भारतीय बाजार को धीरे-धीरे हड़प रही है, जबकि
भारत अभी भी विकसित राष्ट्रों को निर्यात कर पाने में विफल रहा है।
(iii) विनिवेश-अपनी विनिवेश की नीति के तहत् सार्वजनिक उपक्रमों की परिसम्पत्तियों
को कम दामों पर निजी क्षेत्रक की कम्पनियों को बेचा जा रहा है। इस प्रक्रिया से सरकार को बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा है।
(iv) व्यापार–भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य देश है। इसने संगठन के नियमों
के अनुसार अपनी आयात-निर्यात नीति को उदार बना दिया है। आयातों पर लगे सभी मात्रात्मक
नियंत्रण हटा लिए गए हैं।
(v) बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आधिपत्य-बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अब धीरे-धीरे भारतीय
बाजार पर कब्जा करती जा रही हैं और परिणामस्वरूप इनके लाभों में अत्यधिक वृद्धि हो रही है।
निष्कर्ष-वस्तुत: आर्थिक सुधारों से विकासशील राष्ट्रों की तुलना में विकसित राष्ट्रों को
अधिक लाभ पहुंँचा है। इस प्रकार सुधारों से विभिन्न देशों एवं व्यक्तियों के मध्य आर्थिक
असमानताएँ बढ़ी हैं। सुधारों से तो केवल उच्च आय वर्ग के लोगों की आय और उपभोग में ही
वृद्धि हुई है जो दूरसंचार, सूचना प्रोद्योगिकी, वित्त, मनोरंजन, पर्यटन सेवाओं में संलग्न है। कृषि,
विनिर्माण जैसे-क्षेत्रक, जो करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं, इन सुधारों से लाभान्वित
नहीं हो पाए हैं।
                                                   ★★★

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