11-Political Science

Bihar board class 11th notes civics

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Bihar board class 11th notes civics

विधायिका
                                                    पाठ्यक्रम
•भारतीय संसद।
•द्विसदनीय विधायिका-उच्च सदन-राज्यसभा तथा निम्न सदन-लोकसभा।
•रचना एवं शक्तियाँ
• संसद में विधि निर्माण प्रक्रिया।
• संसद कार्यपालिका पर कैसे नियंत्रण रखती है ?
•दल-बदल रोकने के संवैधानिक उपाय।
•धन विधेयक और साधारण विधेयक में अन्तर।
•लोकसभा का स्पीकर और उसके कार्य।
•राज्य सभा का सभापति और उसके कार्य।
                                                           स्मरणीय तथ्य
• भारत में संसदात्मक शासन प्रणाली को अपनाया गया है। केन्द्र में विधायिका को संसद
नाम दिया गया है। संसद् के प्रथम सदन (निम्न सदन) को लोकसभा तथा द्वितीय सदन
(उच्च सदन), को राज्यसभा कहते हैं।
• राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या 250 है। इनमें 238 सदस्य निर्वाचित तथा 12 सदस्य
राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।
• मनोनीत किए जाने वाले सदस्य कला, साहित्य, समाज सेवा तथा विज्ञान के क्षेत्र में विशेष
योग्यता प्राप्त किए हुए व्यक्ति होते हैं।
• लोकसभा में 543 सदस्य जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं। दो सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत
किए जा सकते हैं।
• द्विसदनात्मक विधायिका के गुण- (क) विधिनिर्माण प्रक्रिया में होने वाली त्रुटियों को
दूर करना है, (ख) दूसरा सदन क्षेत्र विशेष में प्रसिद्ध अथवा बुद्धिजीवियों को प्रतिनिधित्व
देने के लिए आवश्यक है, (ग) पहले सदन की निरंकुशता पर रोक लगाता है, (घ) पहले
सदन के काम के बोझ को हल्का करता है, (ङ) संघात्मक राज्यों के लिए आवश्यक
है।
• विधायिका जब समय के अभाव के कारण कानून बनाने का अधिकार कार्यपालिका को
सौंप देती है तो इस प्रकार की व्यवस्था को प्रदत्त व्यवस्थापन कहते हैं।
• प्रत्यक्ष विधि निर्माण का अर्थ है कि जनता प्रत्यक्ष रूप से विधि के निर्माण में भाग ले।
• विधायिका के प्रमुख कार्य हैं-(क) कानून निर्माण, (ख) बजट पर नियंत्रण, (ग)
कार्यपालिका पर नियंत्रण, (घ) निर्वाचन सम्बन्धी कार्य, (ङ) संविधान में संशोधन।
• राज्यसभा की सदस्यता के लिए प्रत्याशी में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए-(क)
वह भारत का नागरिक हो, (ख) वह 30 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, (ग) वह
भारत अथवा किसी राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो।
• लोकसभा के सदस्य को प्रत्याशी बनने के लिए निम्न योग्यताएं होनी चाहिए -(क)
प्रत्याशी भारत का नागरिक हो, (ख) वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, (ग)
वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ के पद पर न हो।
• कोई विधेयक धन विधेयक है या साधारण विधेयक इसका अन्तिम निर्णय स्पीकर करता )
है। धन विधेयक निम्न विषयों से सम्बन्धित है- (क) कोई कर लगाना अथवा समाप्त
करना, (ख) भारत सरकार द्वारा लिया गया ऋण, (ग) भारत की संचित निधि एवं
आकस्मिक निधि की रक्षा, (घ) धन के आय-व्यय के सम्बन्ध में कोई अन्य विषय।
धन विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जाता है।

                         पाठ्यपुस्तक के एवं परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
                                                        वस्तुनिष्ठ प्रश्न
                                              (Objective Questions)
1. भारत की संसद में निम्नलिखित समाहित है-                         [B.M.2009A]
(क) लोकसभा, राज्यसभा तथा मंत्रीपरिषद
(ख) लोकसभा, राज्य सभा तथा प्रधानमंत्री
(ग) लोकसभा तथा राज्यसभा
(घ)लोकसभा, राज्यसभा तथा राष्ट्रपति               उत्तर-(घ)
2. मंत्रिमंडलीय शासन की विशेषता है :
(क) सामूहिक उत्तरदायित्व
(ख) राजनीतिक सजातीयता
(ग) लोक सदन के विघटन का अधिकार
(घ) उपर्युक्त तीनों                                            उत्तर-(ख)
3. भारत की संसद को लोक लेखा समिति के अध्यक्ष को कौन नाम निर्देशित करता
है ?                                                                                    [B.M.2009A] (क) प्रधानमंत्री
(ख) राष्ट्रपति
(ग) राज्य सभा का सभापित
(घ) लोक सभा का अध्यक्ष                                   उत्तर-(घ)
4. वर्तमान में लोकसभा की सदस्य संख्या कितनी है ?               [B.M.2009 A]
(क) 545 सदस्य
(ख) 600 सदस्य
(7) 550 सदस्य
(घ) 525 सदस्य                                                 उत्तर-(क)
5. लोकसभा का विघटन कौन करता है ?                                  [B.M.2009A]
(क) उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
(ख) प्रधानमंत्री
(ग) राष्ट्रपति
(घ) इनमें से कोई नहीं                                         उत्तर-(ग)

                                               अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. सरकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-सरकार कानून बनाने और लागू करने वाली एक विशिष्ट संस्था है।
प्रश्न 2. देश किसके आधार पर शासित होता है ?
उत्तर-देश संविधान के कुछ आधारभूत कानूनों के आधार पर शासित होता है।
प्रश्न 3. संविधान में दिए गए मौलिक नियमों पर आधारित कानून कौन बनाता है।
उत्तर-विधायिका संविधान में दिए गए मौलिक नियमों पर आधारित कानूनों को बनाती है।
प्रश्न 4. देश या राज्य में कानूनों की व्याख्या कौन करता है ?
उत्तर-कार्यपालिका देश या राज्य में कानून को लागू करता है।
प्रश्न 5. देश के कानूनों की व्याख्या कौन करता है ?
उत्तर-न्यायपालिका देश के कानूनों की व्याख्या करती है।
प्रश्न 6. कानून बनाना, लागू करना तथा उसकी व्याख्या करना जैसे कार्य कौन
करता है?
उत्तर-देश की विधायिका द्वारा कानून बनाए जाते हैं, कार्यपालिका द्वारा लागू किए जाते हैं
तथा न्यायपालिका द्वारा उनकी व्याख्या की जाती है।
प्रश्न 7. सरकार क्या है ? समझाइए।
उत्तर-राज्य के चार आवश्यक अंग होते हैं जिनमें से सरकार एक है। सरकार राज्य का
एक महत्वपूर्ण अंग है। सरकार उस संस्था को कहते हैं जो देश के शासन को चलाती है। शासन
चलाने के लिए वह कानून बनाती है, उन्हें लागू करती है और कानून का पालन न करने वालों
को उचित दंड देती है।
प्रश्न 8. सरकार की क्या आवश्यकता है?
उत्तर-किसी भी देश में सरकार की आवश्यकता निम्नांकित कारणों से होती है-
(i) कानून निर्माण के लिए सरकार का सबसे प्रमुख अंग विधायिका है। विधायिका
सरकार की कानून बनाने वाली संस्था है।
(ii) कानूनों को लागू करने के लिए-कार्यपालिका सरकार का दूसरा अंग है। इसका प्रमुख
कार्य कानूनों को लागू करना है।
(iii) कानून न मानने वालों को दंडित करना-न्यायपालिका भी सरकार का एक
आवश्यक अंग है। यह कानूनों का उल्लंघन करने वालों को दंड देती है।
प्रश्न 9. प्रजातंत्रीय शासन क्या है?
उत्तर-प्रजातंत्रीय शासन ऐसे शासन को कहते हैं जिनमें जनता स्वयं अथवा जनता द्वारा चुने
हुए प्रतिनिधि शासन करते हैं। इसे जनता द्वारा, जनता के लिए तथा जनता का शासन कहते हैं।
प्रजातंत्र दो प्रकार का होता है-(क) प्रत्यक्ष प्रजातंत्र, एवं (ख) अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र।
प्रश्न 10. तानाशाही शासन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-तानाशाही शासन में सरकार की सारी शक्तियां केवल एक ही व्यक्ति या समूह के
हाथ में होती हैं जिसे तानाशाही कहते हैं। जनता का इस शासन में कोई हाथ नहीं होता। इस शासन
में लोगों को किसी प्रकार के कोई अधिकार प्रदान नहीं किए जाते और न ही लोगों को किसी
प्रकार की कोई स्वतंत्रता प्रदान की जाती है। यह शासन प्रजातंत्र का विरोधी होता है और युद्ध
में विश्वास रखता है।
प्रश्न 11. तानाशाही शासन की दो मुख्य विशेषताएं बताइए।
उत्तर-तानाशाही शासन की दो प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
1. स्वतंत्रता का अभाव-तानाशाही का आधार जनमत न होकर निरंकुश शक्ति होती है।
तानाशाह प्रायः शक्ति द्वारा शासन करता है। तानाशाही में नागरिकों को कोई स्वतंत्रता प्राप्त नहीं
होती। वह स्वतंत्र रूप से अपने विचार भी व्यक्त नहीं कर सकती।
2. सरकार का उत्तरदायी न होना-तानाशाही सरकार में नागरिक के प्रति किसी विषय में
भी सरकार की जिम्मेदारी नहीं होती और न ही लोगों को अपनी सरकार बनाने या हटने का
अधिकार होता है।
प्रश्न 12. विधायिका के दो प्रमुख विधायी कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर-(क) यह अपने क्षेत्र में आने वाले विषयों पर कानून बनाती है। यह कानूनों में संशोधन
भी कर सकती है।
(ख) यह राज्य के संविधान में आवश्यक संशोधन कर सकती है।
प्रश्न 13. विधायिका के दो गैर-विधायी कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर-(क) विधायिका के सदस्यों द्वारा मंत्रियों से प्रश्न पूछे जाते हैं तथा मंत्री उनके उत्तर
देते हैं।
(ख) विधायिका मंत्रिमंडल के विरुद्ध विश्वास तथा अविश्वास का प्रस्ताव तैयार करती है।
प्रश्न 14. भारतीय संसद की कोई चार विशेषताएं लिखिए। [B.M.2009A]
उत्तर-(क) भारत में संसद देश में कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था है।
(ख) भारत में संसद द्विसदनात्मक है, अर्थात् इसके दो सदन हैं।
(ग) भारतीय संसद के निम्न सदन को लोकसभा और उच्च सदन को राज्यसभा कहते हैं।
(घ) दोनों सदनों की शक्तियाँ समान नहीं हैं और इनका गठन भी भिन्न-भिन्न प्रकार से
होता है।
प्रश्न 15. केन्द्रीय सरकार की संरचना अथवा गठन का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-भारत में केन्द्रीय सरकार का रूप संसदात्मक है। सरकार के तीन अंग होते हैं-
(i) विधायिका (संसद के दोनों सदन अर्थात् लोकसभा व राज्यसभा)
(ii) कार्यपालिका (राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व उसकी मंत्रिपरिषद्)
(iii) न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय)।
प्रश्न 16. भारतीय संसद के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-भारतीय संसद के दो सदन हैं-(क) लोकसभा, (ख) राज्यसभा।
लोकसभा संसद का निम्न सदन है और वह सारे देश की जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
राज्यसभा संसद का ऊपरी सदन है और यह देश के राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। औपचारिक
रूप से राष्ट्रपति को भी संसद का अंग माना जाता है।
प्रश्न 17. राज्य विधानसभा के कोई दो मुख्य कार्य बताइए।
उत्तर-राज्य विधानसभा बहुत से कार्य करती हैं जिनमें से उसके दो मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-
(i) राज्य विधानसभा राज्य सूची के विषयों पर विधेयक पारित करती है।
(ii) राज्य विधानसभा राज्य के आय-व्यय का ब्यौरा बजट के रूप में पास करती है।
प्रश्न 18. भारत में कुल कितने संघ राज्य क्षेत्र हैं ? किन्हीं पांँच के नाम लिखिए।
उत्तर-भारत में कुल सात संघ राज्य क्षेत्र हैं। उनमें से पांँच हैं-
(क) अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह, (ख) चंडीगढ, (ग) दादर और नागर हवेली,
(घ) दमन और दीव, (ङ) लक्षद्वीप।
प्रश्न 19. संघ क्या है ? संघ की दो विशेषताएंँ बताइए।
उत्तर-कुछ राजनीतिक इकाइयों से मिलकर जब एक राज्य बनता है तब उसे संघ कहते हैं।
संघ की दो विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
(क) संघ का संविधान लिखित व कठोर होता है।
(ख) संघ में केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों में शक्तियां विभाजित होती हैं।
प्रश्न 20. विधायिका से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-सरकार के तीनों अंगों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में से विधायिका
सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। विधायिका के द्वारा ही किसी देश में सरकार की इच्छा व्यक्त होती
है। विधायिका कंवल नए कानूनों का निर्माण ही नहीं करती, बल्कि उनमें संशोधन भी करती है
और प्रशासन की नीति भी निश्चित करती है। विधायिका दो प्रकार की होती है-
(क) एक सदनीय विधायिका एवं (ख) द्विसदनीय विधायिका।
प्रश्न 21. विधायिका के चार कार्यों का विवेचन कीजिए।
उत्तर-(i) विधायिका का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कानून निर्माण करना है।
(ii) विधायिका राज्य के वित्त पर नियंत्रण करती हैं। बजट पास करना विधायिका का
कार्य है।
(iii) सभी लोकतन्त्रीय राज्यों में संविधान में संशोधन करने का अधिकार विधायिका के पास है।
(iv) विधायिका का कार्यपालिका पर थोड़ा-बहुत नियंत्रण अवश्य होता है। संसदीय शासन
प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
प्रश्न 22. द्वितीय सदन की उपयोगिता उसके स्थायित्व में हैं। स्पष्ट करो।
उत्तर-द्वितीय सदन की उपयोगिता उसके स्थायित्व में है। प्रायः सभी देशों में द्वितीय सदन
स्थायी सदन होते हैं। अमेरीका की सीनेट, भारत की राज्यसभा अथवा इंग्लैण्ड को लॉर्ड सभा,
सभी स्थायी सदन हैं तथा इनके सदस्य बड़े अनुभवी होते हैं। उनकी योग्यता और अनुभव का
लाभ देश को मिलता रहता है।
प्रश्न 23. भारतीय संसद के दोनों सदनों के नाम तथा उनके कार्यकाल का उल्लेख
कीजिए।
उत्तर-भारतीय संसद के दोनों सदनों का नाम और कार्यकाल निम्नलिखित है :
(क) लोकसभा-यह संसद का निचला सदन है। इसके सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से
देश की सभी वयस्क नागरिकों द्वारा किया जाता है। इसका कार्यकाल 5 वर्ष है।
(ख) राज्यसभा-यह संसद का ऊपरी सदन है। इसके सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधान
सभाओं द्वारा किया जाता है। यह एक स्थायी सदन है और इसके 1/3 सदस्य प्रति 2 वर्ष बाद
अवकाश ग्रहण कर लेते हैं। अतः प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष हो जाता है।
प्रश्न 24. भारत की संसद की तीन विधायी शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-भारतीय संसद की तीन विधायी शक्तियां निम्नलिखित हैं-
(i) कानून निर्माण-भारतीय संसद आवश्यकतानुसार नए कानूनों का निर्माण करती है और
पुराने कानूनों में संशोधन करती है।
(ii) अध्यादेशों को मंजूरी देना-जब संसद का अधिवेशन न हो रहा हो और राष्ट्रपति कोई
अध्यादेश जारी कर दे तो संसद अधिवेशन के समय उस अध्यादेश को मंजूरी देती है और उसे
पूर्ण कर कानून का दर्जा प्राप्त हो जाता है।
(iii) संविधान में संशोधन-संसद के पास भारत के संविधान में संशोधन करने
का अधिकार है।
प्रश्न 25. संसद के चार गैर-विधायी कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-(i) संसद को मंत्रिमण्डल पर नियंत्रण होता है। मंत्रिमण्डल को तब तक अपने पद
पर बने रहने का अधिकार है जब तक उसे संसद का बहुमत प्राप्त होता रहता है।
(ii) संसद राष्ट्रीय नीतियों को निर्धारित करती है।
(iii) संसद अगर चाहे तो राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटा सकती है।
(iv) संसद उपराष्ट्रपति का चुनाव करती है तथा राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेती है।
प्रश्न 26. राज्यसभा की रचना का संक्षिप्त विवेचना कीजिए। [B.M.2009 A]
उत्तर-संविधान के अनुसार राज्यसभा के सदस्यों की संख्या अधिक-से-अधिक 250 हो
सकती है, जिनमें से 238 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले होंगे, 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा
मनोनीत किए जा सकते हैं, जिन्हें समाज सेवा, कला तथा विज्ञान, शिक्षा आदि के क्षेत्र में विशेष
ख्याति प्राप्त हो चुकी है। राज्यसभा की रचना में संघ की इकइयों को समान प्रतिनिधित्व देने का
वह सिद्धान्त जो अमेरिका की सीनेट की रचना अपनाया गया है, भारत में नहीं अपनाया गया।
हमारे देश में विभिन्न राज्यों की जनसंख्या के आधार पर उनके द्वारा भेजे जाने वाले सदस्यों की.
संख्या सविधान द्वारा निश्चित की गई है।
प्रश्न 27. लोकसभा का गठन कैसे होता है ?
उत्तर-प्रारम्भ में लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 50 निश्चित की गई थी। 1963
ई० में संविधान के 14वें संशोधन के अन्तर्गत इसके निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 525
निश्चित की गई है। 31वें संशोधन के अन्तर्गत इसके निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 545
निश्चित की गई है।इस प्रकार वर्तमान में लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या 545 है। 2 सदस्य
(एंग्लो-इण्डियन) राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जा सकते हैं।
प्रश्न 28. राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए ?
उत्तर-राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएंँ आवश्यक हैं-
(i) उम्मीदवार भारत का नागरिक हो।
(ii) वह तीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
(iii) वह संसद द्वारा निश्चित अन्य योग्यताएंँ रखता हो।
(iv) वह पागल तथा दिवालिया न हो।
(v) भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभदायक पद पर आसीन न हो।
प्रश्न 29. लोकसभा का सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएंँ होनी चाहिए ?
उत्तर-लोकसभा का सदस्य वही व्यक्ति बन सकता है जिसमें निम्नलिखित योग्यताएंँ हैं
(i) वह भारत का नागरिक हो।
(ii) वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
(iii) वह भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभदायक पर पद आसीन
न हो।
(iv) वह संसद द्वारा निश्चित की गई अन्य योग्यताएंँ रखता हो।
(v) वह पागल या दिवालिया न हो।
(vi) किसी न्यायालय द्वारा पद के लिए अयोग्य न घोषित किया गया हो। यदि चुने जाने
के बाद किसी सदस्य में कोई अयोग्यता उत्पन्न हो जाए तो उसे अपना पद त्यागना पड़ेगा।
प्रश्न 30. राज्यसभा के सदस्यों के विशेषाधिकार बताइए।
उत्तर-राज्यसभा के सदस्यों को निम्नलिखित विशेषाधिकार प्राप्त हैं-
(i) राज्य सभा के सदस्यों को अपने विचार प्रकट करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। सदन में
दिए गए भाषण के कारण उनके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जा
(ii) अधिवेशन के दौरान सदन के किसी भी सदस्य को दीवानी अभियोग के कारण गिरफ्तार
नहीं किया जा सकता।
(iii) सदस्यों को वे सभी विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं जो संसद द्वारा समय-समय पर निश्चित
किए जाते हैं।
प्रश्न 31. आलोक मानता है कि किसी देश को कारगर सरकार की जरूरत होती है।
जो जनता की भलाई करे। अत: यदि हम सीधे-सीधे अपना प्रधानमंत्री और मंत्रीगण चुन लें
और शासन का काम उन पर छोड़ दें, तो हमें विधायिका की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्या आप
इस बात से सहमत हैं ? अपने उत्तर का कारण बताएंँ?
उत्तर-आलोक का यह विचार बिल्कुल ठीक नहीं है क्योंकि यदि विधायिका नहीं होगी तो
प्रधानमंत्री और मंत्री के कार्यों पर किसी का नियंत्रण नहीं रहेगा। विधायिका कार्यपालिका को
निरंकुश होने से रोकती है।
                                             लघु उत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. सरकार से क्या अभिप्राय है? सरकार के तीन अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर-सरकार से अभिप्राय-सरकार राज्य का अनिवार्य तत्व है। सरकार के अभाव में राज्य
का कल्याण व्यर्थ है। कुछ विद्वान राज्य और सरकार में कोई भेद नहीं करते हैं, परन्तु इन दोनों
में काफी अन्तर है।
मेकाइवर के अनुसार-“राज्य एक अमूर्त, अदृश्य और अपरिवर्तशील व्यक्ति है और
सरकार उसकी अभिकर्ता या एजेण्ट है।” राज्य की सम्प्रभुता का प्रयोग सरकार ही करती है।
गार्नर सरकार का अर्थ बताते हैं-“जिस संस्था अथवा अभिकरण द्वारा राज्य की इच्छा का निर्माण,
उसकी अभिव्यक्ति तथा उसका क्रियान्वयन होता है, उसे सरकार कहते हैं।”
सरकार के अंग-सरकार की शक्ति तीन अंगों में विभाजित है। कानून बनाने वाला अंग
विधायिका, शासन करने वाला अंग कार्यपालिका और न्याय का प्रबन्ध करने वाला अंग
न्यायपालिका कहलाता है।
प्रश्न 2. द्विसदनीय विधायिका के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर-द्विसदनीय विधायिका के पक्ष में दो तर्क :
(i) कानून निर्माण में जल्दबाजी तथा आवेश पर रोक-द्वितीय सदन में प्रथम सदन की
अपेक्षा अधिक आयु वाले अनुभवी तथा रूढ़िवादी सदस्य होते हैं। ये सदस्य प्रथम सदन के
नवयुवक प्रतिनिधियों के द्वारा जल्दबाजी तथा आवेश में आकर पास किए गए कानून पर रोक
लगाते हैं और किसी प्रकार की भावना में न बहकर केवल उपयोगिता को ध्यान में रखकर सहमति
देते हैं।
(ii) जनमत निर्माण का समय मिल जाता है-द्विसदनात्मक व्यवस्था में प्रत्येक विधेयक
निम्न सदन में स्वीकृत होने के पश्चात् उच्च सदन में भेजा जाता है। परिणामस्वरूप विधेयक को
कानून का रूप धारण करने में काफी समय लग जाता है। इस बीच जनता को उसके संबंध में
विचार और मनन करके अपना मत प्रकट करने का अवसर मिल जाता है। इस प्रकार कानून पास
होने से पहले ही उसके बारे में पता चल जाता है कि जनता उसको पसन्द करती है या नहीं।
प्रश्न 3. विधायिका से क्या अभिप्राय है ? विधायिका के दो प्रकार कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-विधायिका से अभिप्राय-सरकार के सभी अंगों में विधायिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण
है। गार्नर के मतानुसार-“राज्य की इच्छा जिन अंगों द्वारा व्यक्त होती है, उनमें विधायिका का
स्थान नि:संदेह सर्वोच्च है। विधायिका केवल कानून का निर्माण ही नहीं करती बल्कि प्रशासन
की नीति भी निश्चित करती है।”
विधायिका के.प्रकार-इसके दो प्रकार हैं-(क) एक सदनीय और (ख) द्वि-सदनीय)
वर्तमान काल में अधिकांश देशों में द्वि-सदनीय प्रणाली प्रचलित है। 18वीं और 19वीं शताब्दी के
आरम्भ में द्वि-सदनीय प्रणाली की कटु आलोचना की गई और एक-सदनीय प्रणाली को अच्छा
माना गया। द्वि-सदनीय विधायिका की तुलना एक ऐसी घोड़ा-गाड़ी से की गई जिसके दोनों पहिए
विपरीत दिशा में जा रहे हों।
प्रश्न.4. विधायिका किस प्रकार कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है ?
उत्तर-प्रत्येक संसदीय शासन प्रणाली वाले देश में कार्यपालिका (प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद)
अपने सभी कार्यों के लिए विधायिका (संसद) के प्रति उत्तरदायी हैं। विधायिका, कार्यपालिका
पर निम्न प्रकार से नियंत्रण रखती है-
(क) विधायिका के सदस्य, कार्यपालिका के सदस्यों अर्थात् मंत्रियों से उनके विभागों एवं
कार्यों के बारे में प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछकर उन पर नियंत्रण रखते हैं।
(ख) विधायिका के सदस्य कार्यपालिका के सदस्यों के विरुद्ध ‘काम रोको प्रस्ताव’ और
“निन्दा प्रस्ताव’ पास करके उन पर अपना नियंत्रण रखते हैं।
(ग) यदि विधायिका के सदस्य कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) की नीतियों व कार्यों से संतुष्ट
न हों तो वे उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश कर सकते हैं। यदि यह प्रस्ताव पास हो जाए
तो प्रधानमंत्री सहित सारी मंत्रिपरिषद को अपदस्थ कर दिया जाता है।
प्रश्न 5. पुलिस राज्य तथा कल्याणकारी राज्य में अन्तर बताइए।
अथवा, कल्याणकारी राज्य की विशेषताएं बताइए।
उत्तर-पुलिस राज्य वह राज्य होता है जहाँ केवल पुलिस कार्य (अथवा पुलिस शक्ति पर
आधारित कार्य) होते हैं। ऐसे राज्य केवल तीन प्रकार के कार्य करते हैं-
(क) बाहरी आक्रमणों से रक्षा (युद्ध करना), (ख) अपराधों की रोकथाम, (ग) यातायात
गदि पर नियंत्रण रखना।
आधुनिक युग में अनेक देशों में कल्याणकारी राज्य स्थापित हैं। कल्याणकारी राज्य उपरोक्त
तीन कार्यों के अलावा नागरिकों के सामान्य कल्याण के लिए भी अनेक कार्य करते हैं। जैसे-सड़कें
बनवाना, विद्यालय खोलना, अस्पताल खोलना, नहरों का निर्माण करना, उद्योग खोलना, विज्ञान
की उन्नति के लिए प्रयोगशालाएंँ स्थापित करना आदि।
प्रश्न 6. राज्य के अनिवार्य तत्व बताइए।
उत्तर-राज्य के अनिवार्य तत्व निम्नांकित हैं-
(i) जनसंख्या-मनुष्यों के बिना किसी राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। किसी भी ऐसे
स्थान को, जहाँ जीवित मनुष्य न रहते हों, राज्य नहीं कहा जा सकता। अत: राज्य का सबसे पहला
अनिवार्य तत्व जनसंख्या है।
(ii) भूभाग-राज्य के लिए एक निश्चित भूभाग का होना भी आवश्यक है। खानाबदोशों
पर न तो कोई स्थायी शासन कर सकता है और न ही खानाबदोश लोग किसी राज्य की स्थापना
कर सकते हैं। उदाहरण के लिए जब तक यहूदी लोग संसार में बँटे रहे और किसी निश्चित भूभाग
पर नहीं बसे, तब तक वे कोई राज्य नहीं बना सके। जब वे इजराइल के निश्चित भूभाग पर बस
गए, तब उन्होंने अपने राज्य की स्थापना कर ली।
(iii) सरकार-राज्य के अस्तित्व के लिए राजनैतिक संगठन या सरकार का होना भी अति
आवश्यक है। बिना सरकार के राज्य नहीं बन सकता क्योंकि सरकार के बिना एक सभ्य समाज
का अस्तित्व संभव ही नहीं। –
(iv) संप्रभुता-राज्य का सबसे अधिक महत्वपूर्ण तत्व संप्रभुता को माना जाता है। किसी
विशेष भूभाग में रहने वाले लोग एक संगठित सरकार के रहते हुए भी राज्य की स्थापना नहीं
कर सकते यदि उनके पास संप्रभुता न हो। अंग्रेजी युग में भारत को एक राज्य नहीं माना जा सकता
या क्योंकि तब इसके पास संप्रभुता नहीं थी।
प्रश्न 7. सरकार के चार परम्परागत कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-सरकार के चार परम्परागत कार्य इस प्रकार हैं-
(क) देश की रक्षा-सरकार का सबसे पहला कार्य बाहरी आक्रमणों से देश की रक्षा करना
है। देश की रक्षा करने के लिए सरकार सेना व पुलिस की सहायता लेती है।
(ख) कानून और व्यवस्था-सरकार का कार्य है कि राज्य में कानून और व्यवस्था बनाए
रखे। ऐसा न करने से राज्य में अराजकता फैल सकती है।
(ग) कर एकत्र करना-सरकार को अपने असंख्य कार्य करने के लिए धन को आवश्यकता
होती है। यह धन लोगों से कर के रूप में एकत्र किया जाता है। यदि सरकार कर एकत्र करने
की ओर ध्यान न दे तो राज्य-कोष की कमी आ जायगी।
(घ) अपराधियों को दंड देना-कुछ लोग अनजान परत कछ लोग जान-बूझकर कानूनों
का उल्लंघन करते हैं और कुछ अपराध (मारपीट, चोरी-डकैती, हत्या, अपहरण आदि) करते
हैं। अत: सरकार का कर्तव्य है कि ऐसे व्यक्तियों को सजा दे।
प्रश्न 8. संसदीय कार्यपालिका के तीन मुख्य दोष कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-संसदीय कार्यपालिका के निम्नलिखित तीन मुख्य दोष हैं-
(क) इसमें कार्यपालिका के अवधि निश्चित नहीं होती है। विधायिका कभी भी अविश्वास
प्रस्ताव पास करके सरकार को त्यसकती है। अत: इस प्रणाली में सरकार अस्थिर रहती है।
(ख) इस प्रकार की सरकार में नौकरशाही कार्यकुशलता नहीं होती।
(ग) संसदीय कार्यपालिका में धन का दुरुपयोग होता है। प्रत्येक विभाग का अध्यक्ष कोई
मंत्री होता है। मंत्रियों तथा उनके विभागों में काम करने वाले असंख्य कर्मचारियों को बहुत-सा
धन बेतन एवं भत्तों के रूप में देना पड़ता है।
प्रश्न 9. अध्यक्षात्मक कार्यपालिका के मुख्य तीन दोष कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-अध्यक्षात्मक कार्यपालिका के दो इस प्रकार हैं-
(क) यह निश्चित अवधि के लिए चुनी जाती है। अतः विधानमंडल में बदलते हुए जनमत
का ठीक प्रकार से प्रतिनिधित्व नहीं करती।
(ख) इसमें राष्ट्रपति या मंत्रियों पर व्यवस्थापिका का वैसा नियंत्रण नहीं होता जैसा संसदीय
कार्यपालिका में होता है।
(ग) अध्यक्षात्मक कार्यपालिका को विधानमंडल में व्यक्त किए गए विचारों की तुरन्त सूचना
प्राप्त नहीं होती, क्योंकि कार्यपालिका के सदस्य विधानमंडल में उपस्थित नहीं होते।
प्रश्न 10. नागरिकों द्वारा सरकार के कार्यों में भाग लेने के महत्व सम्बन्धी पांँच बातों
का वर्णन करो।
उत्तर-(क) इसमें नागरिक सरकार द्वारा बनाए हुए कानूनों से ही शासित होते हैं। ऐसे कानून
नागरिकों की आवश्यकताओं और इच्छाओं के अनुकूल होते हैं।
(ख) इससे सरकार सावधान रहती है और कानून के अनुसार ही धन का व्यय करती है।
(ग) नागरिक अपने अधिकारों का स्वतंत्रतापूर्वक प्रयोग करते हैं तथा उन अधिकारों की
प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हैं जो अधिकार अभी तक उन्हें नहीं मिल सके।
(घ) इससे सरकार जनमत के प्रति उत्तरदायी रहती है और मनमानी नहीं कर सकती।
(ङ) इससे सुनिश्चित हो जाता है कि जनता और सरकार एक दूसरे के प्रति कर्तव्यों का
पालन करें तथा उनमें परस्पर सहयोग बना रहे।
प्रश्न 11. आधुनिक सरकारों से जनता के लिए किन चार शैक्षणिक कार्यों की अपेक्षा
की जाती है?
उत्तर-(क) सरकार को चाहिए कि वे ऐसी व्यवस्था करे जिससे सब नागरिकों को
निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा प्राप्त हो।
(ख) नागरिकों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जिसको प्राप्त करके वे अपनी आजीविका
प्राप्त कर सकें। अतः सरकार को उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा का प्रबन्ध करना चाहिए।
(ग) सरकार से यह भी आशा की जाती है कि वह प्रौदों की शिक्षा का प्रबन्ध करे।
प्रश्न 12. अविश्वास प्रस्ताव पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-अविश्वास प्रस्ताव-भारत में संसदीय सरकार की स्थापना की गई है और संसदीय
सरकार में कार्यपालिका अर्थात् प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद् अपने समस्त कार्यों के लिए संसद (विशेष
तौर से लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद मंत्रियों से उनके विभागों के कार्यों के सम्बन्ध
में उनसे प्रश्न पूछकर, उनके विरुद्ध काम रोको प्रस्ताव तथा निन्दा प्रस्ताव पास कर सकती है।
इनके अतिरिक्त लोकसभा यदि मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर दे तो सारी
मंत्रिपरिषद को त्याग पत्र देना पड़ता है। इस प्रकार अविश्वास प्रस्ताव द्वारा लोकसभा मंत्रिपरिषद
पर नियंत्रण रखती है।
प्रश्न 13. लोकसभा अध्यक्ष के तीन प्रमुख कार्य बताओ।                              [B.M.2009A]
उत्तर-लोकसभा अध्यक्ष बहुत से कार्य करता है जिनमें से प्रमुख कार्यों का विवेचन
निम्नलिखित है-
(i) वह लोकसभा की अध्यक्षता करता है।
(ii) वह लोकसभा में अनुशासन बनाए रखता है।
(iii) कोई विधेयक धन विधेयक है अथवा नहीं इसका निर्णय भी लोकसभा अध्यक्ष ही
करता है।
प्रश्न 14. संसद किस प्रकार मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण रखती है ?
उत्तर-संसदीय प्रणाली की एक प्रमुख विशेषता है कि कार्यपालिका और विधायिका में
घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। मंत्रिपरिषद् का निर्माण संसद में से ही होता है। निम्न सदन में बहुमत
दल के नेता को प्रधानमंत्री तथा उसकी सिफारिश से अन्य मंत्री बनाए जाते हैं। प्रत्येक सदस्य
को संसद का सदस्य होना आवश्यक है। इस प्रकार मंत्रिपरिषद् संसद का अंग है। मंत्रिपरिषद्
तभी तक सत्ता में बनी रह सकती है, जब तक कि लोकसभा का बहुमत उसका समर्थन करता
रहे। मंत्रिपरिषद के सदस्यों से प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछते रहते हैं, उसकी आलोचना करते हैं।
निन्दा प्रस्ताव, काम रोको प्रस्ताव, कटौती प्रस्ताव आदि के द्वारा अपना विरोध प्रकट कर सकते
हैं। अंतिम रूप में लोकसभा के द्वारा अविश्वास का प्रस्ताव पास करके मंत्रिपरिषद् को हटाया
जा सकता है। कार्यपालिका पर नियंत्रण की शक्ति के अन्तर्गत ही संसद संघीय लोकसेवा आयोग,
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक, वित्त आयोग, भाषा आयोग व अनुसूचित जाति और
जनजाति आयोग की रिपोर्ट पर विचार करती है।
प्रश्न 15. किसी कक्षा में द्वि-सदनीय प्रणाली के गुणों पर बहस चल रही थी। चर्चा
में निम्नलिखित बातें उभरकर सामने आयीं। इन तर्को को पढ़िए और इनसे अपनी सहमति-
असहमति के कारण बताइए।
• नेहा ने कहा कि द्वि-सदनीय प्रणाली से कोई उद्देश्य नहीं सधता।
• शमा का तर्क था कि राज्य सभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होना चाहिए।
• त्रिदेव ने कहा कि यदि कोई देश संघीय नहीं है, तो फिर दूसरे सदन की जरूरत
नहीं रह जाती।
उत्तर-(i) नेहा ने कहा कि द्विसदनात्मक व्यवस्था से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता। परन्तु यह
सत्य नहीं है क्योंकि भारत जैसे विशाल देश के अन्दर जहाँ अनेक विविधताएँ हैं; 28 राज्य और
7 संघ शासित क्षेत्र हैं, वहां पर दूसरा सदन होना ही चाहिए जो विभिन्न राज्यों और संघ शासित
क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर सके तथा प्रथम सदन की निरंकुशता पर रोक भी लगायी जा सके।
(ii) शमा का तर्क है कि द्वितीय सदन में विशेषज्ञों को मनोनीत किया जाना चाहिए। हमारे
देश में राष्ट्रपति राज्यसभा में कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा के क्षेत्र से जुड़े 12 सदस्यों
की नियुक्ति करता है।
(ii) त्रिदेव ने कहा कि यदि कोई देश संघात्मक राज्य नहीं है तो वहाँ द्वितीय सदन की
आवश्यकता ही नहीं होती। परन्तु यह विचार भी गलत है क्योंकि भले ही द्वितीय सदन संघात्मक
राज्यों में इकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है किन्तु द्वितीय सदन प्रत्येक मामले में दोहरा नियंत्रण
करने का काम भी करता है। क्योंकि एक सदन द्वारा लिया गया प्रत्येक निर्णय दूसरे सदन के
लिए भेजा जाता है। अर्थात् प्रत्यया कि एक समान द्वारा लिया गया विचार होता है। इससे हर मुद्दे
को दो बार जाँचने का मौका मिलता है। यदि एक सदन जल्दबाजी में कोई निर्णय ले लेता है,
तो दूसरे सदन में वहस के दौरान उस पर पुनर्विचार सम्भव हो जाता है।
प्रश्न 16. लोकसभा कार्यपालिका को राज्यसभा की तुलना में क्यों कारगर ढंग से
नियंत्रण में रख सकती है?
उत्तर-लोकसभा कार्यपालिका पर राज्यसभा की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली ढंग से नियंत्रण
रखती है। इसका कारण यह है कि प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।
राज्यसभा के प्रति नहीं। इसका आशय यह हुआ कि राज्यसभा मंत्रिपरिषद् से प्रश्न पूछ सकती
है परन्तु मंत्रिपरिषद को हटा नहीं सकती। दूसरी ओर लोकसभा मंत्रिपरिषद पर सीधा नियंत्रण
रखती है। प्रधानमंत्री लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या बहुमत प्राप्त गठबन्धन का नेता होता है।
जब तक लोकसभा का विश्वास मंत्रिपरिषद पर बना हुआ है तब तक यह (मंत्रिपरिषद) कार्य
करती रहेगी। लोकसभा यदि सरकार के प्रति अविश्वास पारित कर दे तो सरकार गिर जाती है।
राज्यसभा मंत्रिपरिषद की आलोचना तो कर सकती है परन्तु उसे हटा नहीं सकती। राज्य सभा
की अपेक्षा लोकसभा द्वारा अधिक प्रभावशाली नियंत्रण (कार्यपालिका पर) रखने का एक सफल
कारण यह भी है कि लोकसभा जनता द्वारा चुनी जाती है, जबकि राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव
अप्रत्यक्ष रूप से होता है। जनता राज्यों में निम्न सदन के विधायक चुनती है और इन विधायकों
के द्वारा राज्यसभा के सदस्यों का एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा चुनाव किया जाता है। प्रश्न
काल सरकार के कार्यपालिका व प्रशासकीय एजेन्सियों पर निगरानी रखने का सबसे प्रभावशाली
तरीका है।
प्रश्न 17. लोकसभा कार्यपालिका पर कारगर ढंग से नियंत्रण रखने की नहीं बल्कि
जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है। क्या आप इससे सहमत
हैं ? कारण बताएंँ।                                                                (NCERT T.B.Q.4)
उत्तर-लोकसभा यद्यपि कार्यपालिका पर नियंत्रण बनाए रखती है लेकिन नियंत्रण के
अतिरिक्त भी लोकसभा एक ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ जनता की इच्छाओं और उनके भावों की
अभिव्यक्ति की जाती है। संसद देश में वाद-विवाद का सर्वोच्च मंच है। लोकसभा क्योंकि लोगों
का सदन है, यहांँ पर प्रत्येक राजनीतिक समस्या का पूर्णतः विश्लेषण किया जाता है। लोकसभा
जिन-जिन कार्यों को करती है, वे निम्न प्रकार हैं-
यह संघ सूची और समवर्ती सूची के विषय पर कानून बनाती है। धन विधेयक और सामान्य
विधेयकों को प्रस्तुत और पारित करती है। कर प्रस्तावों और बजट को स्वीकृति देती है। संविधान
में संशोधन करने में भाग लेती है। प्रश्न पूछकर, पूरक प्रश्न पूछकर, संकल्प ताव और अविश्वास
प्रस्ताव के माध्यम से कार्यपालिका को नियंत्रित भी करती है। विभिन्न विधेयकों का प्रस्तुतीकरण
किसी भी सदन में कर सकते हैं परन्तु धन विधेयक पहले लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता
है। वहाँ से पारित होने के बाद ही वह राज्यसभा में प्रस्तुत किया जायगा।
प्रश्न 18. नीचे संसद ज्यादा कारगर बनाने के कुछ प्रस्ताव लिखे जा रहे हैं। इनमें से
प्रत्येक के साथ अपनी सहमति या असहमति का उल्लेख करें। यह भी बताएं कि इन सुझावों
को मानने के क्या प्रभाव होंगे?:                                                    (NCERT T.B.Q.3)
* संसद को अपेक्षाकृत ज्यादा समय तक काम करना चाहिए।
* संसद के सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।
अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा पैदा करने
पर सदस्य को दंडित कर सकें।
उत्तर-(i) संसद का कार्यकाल अधिक लम्बा रखा जाय-संसद में यद्यपि राज्यसभा तो
स्थायी सदन है जिसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष बाद रिटायर होते हैं। राज्यसभा सदस्य
6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। लोकसभा (निम्न सदन) का कार्यकाल 5 वर्ष है। यदि यह अवधि
लम्बे समय के लिए बढ़ायी जाएगी तो संसद सदस्य एक बार लम्बी अवधि के लिए चुने जाने
पर जनता की आशाओं और उनके हितों का ध्यान नहीं रखेंगे।
(ii) संसद सदस्यों के लिए सदन में उपस्थिति अनिवार्य बनाया जाय-यह सुझाव
स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि सांसद अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी से नहीं करते। बहुत
से सांसद सदन में होने वाली चर्चा में भाग ही नहीं लेते। कई सांसद तो आवश्यक चर्चा के दौरान
च्यूगम चबाते देखे जा सकते हैं।
(iii) स्पीकर को यह अधिकार होना चाहिए कि वह सदन की कार्यवाही में बाधा
पहुंँचाने वाले सदस्यों को दण्डित करे-स्पीकर लोकसभा की कार्यवाही चलाने में अन्तिम
अधिकारी है। वह लोकसभा का अध्यक्ष है। उसे लोकसभा में अनुशासन बनाये रखना है। परन्तु
आजकल संसद सदस्य सदन के अन्दर इस प्रकार से व्यवधान उत्पन्न करते हैं कि सदन की
कार्यवाही चलाना कठिन हो जाता है। सत्र चलने के समय में अधिकांश समय सदन स्थगित रहते
है, क्योंकि सांसदों द्वारा गलत व्यवहार किया जाता है। उनकी गतिविधियाँ शर्मनाक होती हैं। ऐसे
में स्पीकर को ऐसे सदस्यों को दण्डित करने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए। स्पीकर को और
अधिक शक्तियांँ दी जानी चाहिए।
प्रश्न 19. संघीय व्यवस्था में द्वितीय सदन की भूमिका का अवलोकन कीजिए।
उत्तर-संघीय व्यवस्था में दूसरे सदन का होना आवश्यक है। निम्न सदन में जनता द्वारा
निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं। संघ की इकाइयों का प्रतिनिधित्व दूसरे सदन में ही दिया जा सकता
है। निचले सदन में विभिन्न इकाइयों को जनसंख्या के आधार पर सदस्य भेजने का अधिकार होता
है। ऊपरी सदन में उनको समान प्रतिनिधित्व देकर उनमें एकता व सहयोग की भावना को दृढ़
बनाया जा सकता है जो संघ की स्थिरता के लिए आवश्यक है। उदाहरणत: अमरीका में कांग्रेस
के द्वितीय सदन सीनेट में संघ की प्रत्येक इकाई को चाहे उसकी जनसंख्या व क्षेत्रफल कितना
भी हो, दो सदस्य भेजने का अधिकार है।
द्वितीय सदन के लाभ:
(i) कानून निर्माण में जल्दबाजी पर रोक लगाता है।
(ii) संघ की एकता और असहयोग की भावना को दृढ़ बनाता है।
(iii) प्रथम सदन की निरंकुशता पर रोक लगाता है।
द्वितीय सदन की हानियाँ:
(i) दूसरा सदन व्यर्थ अथवा शरारती होता है। अबेसियस के अनुसार “यदि उच्च सदन
निम्न सदन से सहमत होता है तो वह शरारती है।”
(ii) दूसरा सदन गतिरोध पैदा करता है। अबेसियस के अनुसार “जहाँ दो सदन होते हैं वहाँ
विरोध तथा विभाजन अनिवार्य है।”
(iii) संघात्मक सरकार में भी दूसरा सदन अनिवार्य नहीं है। दूसरे सदन के सदस्य भी
राजनैतिक दलों के आधार पर चुने जाते हैं और उनकी निष्ठा दल के प्रति अधिक रहती है अपने
राज्य के प्रति कम।
प्रश्न 20. उन परिस्थितियों को बताइए जब संसद उन विषयों पर भी कानून बना
सकती है जो राज्य सूची में शामिल हैं।
उत्तर-कानून निर्माण करना संसद का प्रमुख कार्य है। भारत में संघीय शासन की व्यवस्था
होने के कारण कानूनों का निर्माण दो स्थानों पर होता है। केन्द्र में संसद सम्पूर्ण देश के लिए
कानून बनाती है और विभिन्न राज्यों के विधानमण्डल अपने-अपने राज्यों के लिए कानून बनाता
है। इस प्रकार कानून निर्माण के सम्बन्ध में शक्तियों का केन्द्र व राज्यों में विभाजन किया गया
है और इस उदेश्य के लिए तीन सूचियाँ बनाई गई हैं- (क) संघ सूची, (ख) राज्य सूची, (ग)
समवर्ती सूची। संघीय सूची में दिए गए सभी विषयों पर संसद को कानून बनाने का अधिकार
है। राज्य सूची पर साधारण अवस्था में संसद राज्य के विषयों पर भी कानून बना सकती है। यह
अवस्था दो प्रकार से उत्पन्न हो सकती है। प्रथम, उस अवस्था में जब राज्य की सूची का कोई
विषय राष्ट्रीय महत्त्व का बन जाता है तब राज्यसभा यदि 2-3 के बहमत से इस प्रकार का प्रस्ताव
पारित करती है कि राज्य सूची का कोई विषय राष्ट्रीय महत्त्व का बन गया है तो इस कारण इस
विषय पर कानून बनाने का अधिकार संसद को प्राप्त हो जाता है। दूसरे आपातकालीन घोषणा
के पश्चात् राज्य की सूची पर केन्द्र को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
प्रश्न 21. भारतीय संसद का कौन-सा सदन अधिक क्षमता सम्पन्न है? विवेचना
कीजिए।
उत्तर-भारतीय संसद के दो सदन है- लोकसभा तथा राज्य सभा। लोकसभा निम्न सदन है
जिसमें जनता के प्रत्यक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं और राज्य सभा ऊपरी सदन है जिसमें
राज्यों के प्रतिनिधि अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। इनमें लोकसभा अधिक शक्तिशाली सदन है।
लोकसभा के अधिक क्षमता सम्पन होने के कारण निम्नलिखित हैं-
(i) साधारण बिल के संबंध में-साधारण बिल किसी भी सदन में पेश हो सकता
है। एक सदन से पास होने के बाद दूसरे सदन में जाता है। यदि किसी साधारण बिल पर दोनों
सदनों में मतभेद हो, या एक सदन से पास होने के बाद दूसरा सदन उस पर 6 महीने तक कोई
कार्यवाही न करे या ऐसे रद्द कर दे तो राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है और
बिल या उसका विवादास्पद भाग उसके सामने रखा जाता है और संयुक्त बैठक में साधारण बहुमत
से उसका निर्णय होता है। क्योंकि लोकसभा की सदस्य संख्या राज्यसभा की सदस्य संख्या से
दो गुणा से भी अधिक है इसलिए संयुक्त बैठक में लोकसभा की इच्छानुसार ही निर्णय होता है।
(ii) वित्त बिल के संबंध में वित्त विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश हो सकता है,
राज्यसभा चाहे उसे रद्द कर दे, चाहे संशोधित कर दे, चाहे 14 दिन तक उस पर कोई कार्यवाही
न करे, सभी दिशाओं में वह बिल दोनों सदनों से पास समझा जाता है और राष्ट्रपति की स्वीकृति
के लिए भेजा जाता है। इस प्रकार राज्यसभा धन विधेयक को केवल 14 दिन तक पास होने से
रोक सकती है।
(iii) कार्यपालिका पर नियंत्रण- लोकसभा कार्यपालिका के सदस्यों अर्थात् प्रधानमंत्री और
उसकी मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटा सकती है जबकि
राज्यसभा के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है।
निष्कर्ष-ऊपरलिखित बातों से स्पष्ट है कि लोकसभा राज्यसभा से अधिक शक्तिशाली है।
राज्यसभा लोकसभा के रास्ते में कुछ समय के लिए बाधा तो उत्पन्न कर सकती है परंतु उसे
निष्फल नहीं बना सकती।
प्रश्न 22. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए।
(क) संविधान संशोधन, (ख) अनुदान मांगें, (ग) कटौती प्रस्ताव, (घ) विनियोजन
विधेयक।
उत्तर-(क) संविधान संशोधन-भारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन
अनुच्छेद 368 में किया गया है। यह संशोधन प्रक्रिया न तो ब्रिटेन की तरह सरल है और न ही
संयुक्त राज्य अमरीका की तरह |टल। भारतीय संविधान की यह विशेषता है कि वह अंशतः
कठोर है और कुछ अंश तक लचीला है। संशोधन सम्बन्धी कोई भी विधेयक संसद के किसी
भी सदन में रखा जा सकता है। कुछ अनुच्छेद 3, 4, 169, 239 (A) आदि ऐसे हैं जिनके संशोधन
के लिए दोनों सदनों में केवल साधारण बहुमत से ही विधेयक पारित होना चाहिए। इनमें राज्यों
के नाम, उनकी सीमाओं में परिवर्तन, किसी राज्य के विधानमण्डल के द्वितीय सदन को समाप्त
करना अथवा जहाँ द्वितीय सदन नहीं है उसका निर्माण करना आदि आते हैं। इनमें साधारण विधेयक
की तरह ही संशोधन किया जा सकता है। परंतु महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद में संशोधन संसद के दोनों
सदनों के दो-तिहाई बहुमत से ही किया जा सकता है। उसके बाद राष्ट्रपति उस पर अपनी स्वीकृति
दे तो संविधान में संशोधन हो जाता है। इस प्रकार के प्रावधानों में मौलिक अधिकार व नीति
निर्देशक सिद्धांत जैसे प्रावधान आते हैं। कुछ संशोधनों के प्रकरणों में यह अनिवार्यता भी होती
है कि राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजने से पूर्व कम से कम आधे राज्यों के विधानमण्डल
भी संशोधन का अनुमोदन करें। इस प्रकार के प्रावधानों में राष्ट्रपति का निर्वाचन, केन्द्रीय
कार्यपालिका की शक्तियाँ, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ, संघ
शासित क्षेत्र में उच्च न्यायालय की स्थापना, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व तथा अनुच्छेद 368
का संशोधन सम्मिलित है।
(ख) अनुदान मांँगें-बजट प्रस्तुत किए जाने के बाद उस पर आम चर्चा होती है। आम
चर्चा खत्म होने पर आकलनों को लोकसभा के सामने विशेष शीर्षकों के अन्तर्गत अनुदान मांँगों
के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। मंत्रिगण अपने-अपने विभागों की अनुदान मांँगों को स्वीकृत
या अस्वीकृत कर सकता है। मांगों की अस्वीकृति की स्थिति में संशोधन रखे जाते हैं। सदन के
नेता से परामर्श करके अध्यक्ष अनुदान की मांगों पर चर्चा के लिए दिनों की संख्या निश्चित करता
है और फिर मतदान करवाता है। अनुदान मांगों पर मतदान के लिए आवंटिते अन्तिम दिन शाम
को पांँच बजे मतदान कराया जाता है।
(ग) कटौती प्रस्ताव-सदन का कोई भी सदस्य किसी भी मंत्री द्वारा रखी गई अनुदान
की मांँग में कटौती का प्रस्ताव रख सकता है। कटौती के प्रस्ताव पर बहस होती है और इससे
सदस्य को सम्बन्धित मंत्रालय या विभाग की कार्यकुशलता की आलोचना करने का अवसर मिलता
है। कटौती का प्रस्ताव प्रायः विपक्षी दलों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और सत्तारूढ़ दल उसे पास
नहीं होने देता, क्योंकि ऐसे प्रस्ताव के पास न होने का अर्थ मंत्रिमण्डल में सदन का अविश्वास
समझा जाता है और ऐसी स्थिति में मंत्रिमण्डल को त्यागपत्र देना पड़ता है।
(घ) विनियोजन विधेयक-जब लोकसभा मांगों को स्वीकार कर लेती है तो उन सारी
माँगों और जितना भी व्यय देश की संचित निधि से होना है उन्हें मिलाकर एक विधेयक का रूप
दे दिया जाता है। उसे विनियोजन विधेयक कहते हैं। लोकसभा उसे धन विधेयक के रूप में पास
कर देती है। राज्यसभा 14 दिन के भीतर उस विधेयक को अपनी सिफारिशों सहित लेकसभा को
लौटा देगी। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद वह कानून का रूप धारण कर लेता है। विनियोजन
अधिनियम द्वारा किए गए विनियोजन के अन्तर्गत ही भारत की संचित निधि से धन निकाला जा
सकता है।
प्रश्न 23. साधारण विधेयक एवं धन विधेयक में अंतर स्पष्ट करें। [B.M.2009 A]
उत्तर-साधारण विधेयक एवं धन विधेयक में निम्नलिखित अंतर है-
(1) साधारण विधेयक संसद के किसी भी सदन में सर्वप्रथम पेश हो सकता है। जबकि
धन विधेयक सर्वप्रथम लोकसभा में ही पेश होगा।
(2) साधारण विधेयक संसद में पेश करने के पहले राष्ट्रपति से आवश्यक नहीं है।
(3) साधारण विधेयक संसद से पास हो जाने के बाद राष्ट्रपति उसे पुनर्विचार के लिए
संसद को लौटा सकते हैं।
(4) साधारण विधेयक के मामलों में दोनों सदनों में गतिरोध की संभावना बनी रहती है
जबकि धन विधेयक के मामलों में गतिरोध की संभावना नहीं के बराबर रहती है।
प्रश्न 24. प्रधानमंत्री के कार्य क्या हैं ?                                          [B.M.2009A]
उत्तर-प्रधानमंत्री का पद भारतीय राजनीतिक प्रणाली का प्रमुख पद है। यह कार्यपालिका का
वास्तविक मुखिया है जिसकी पूरी व्यवस्था पर नियंत्रण होता है। प्रधानमंत्री के कार्यों को निम्न
रूपों में समझ सकते हैं-
(1) मंत्रिमंडल का निर्माण करना।
(2) मंत्रियों में विभागों का वितरण करना।
(3) मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करना।
(4) राष्ट्रपति के प्रमुख सलाहकार के रूप में कार्य करना।
(5) विभिन्न मंत्रालयों में तालमेल करना।
(6) मंत्रिमंडल एवं राष्ट्रपति के बीच कड़ी का कार्य करना।
(7) संसद एवं राष्ट्रपति के बीच कड़ी का कार्य करना।
(8) विदेश नीति का प्रमुख निर्माता होता है।
(9) महत्वपूर्ण नियुक्ति करना।
(10) सदन के नेता का रूप में कार्य करता है।
(11) अपने दल के नेता के रूप में कार्य करना।
(12) राष्ट्र के नेता के रूप में कार्य करना।
प्रश्न 25.73वें संविधान संशोधन की 11वें अनुसूची के मुख्य प्रावधान क्या हैं ?
उत्तर-भारतीय संसद द्वारा अप्रैल 1993 में 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया
गया। इस अधिनियम में 11वीं अनुसूची को जोड़ा गया है। इस अनुसूची. के द्वारा पंचायती राज
संस्थाओं के विस्तृत कार्यों का उल्लेख किया गया है। इसमें 29 विषय हैं जिसमें सिंचाई, पीने
का पानी, पशुपालन, स्वास्थ्य की देखरेख, शिक्षा, बिजली, रसोई के लिए ईंधन, रोजगार के साधनों
को बढ़ावा देना। तकनीकी एंव व्यावसायिक शिक्षा का प्रबंध जिससे गरीबी कम हो। महिला एवं
शिशु कल्याण के कार्य अपंग, मानसिक रूप से अविकसित तथा कमजोर वर्ग के कल्याण का
कार्य पंचायती संस्था को सौंपा गया।
                                                  दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. भारतीय संसद के गठन एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए।                 [B.M. 2009 A]
उतर-भारतीय संसद के दो सदन हैं, इसके ऊपरी सदन को राज्यसभा और निचले सदन
को लोकसभा के नाम से जाना जाता है। इन दोनों सदनों के गठन एवं शक्तियों का विवेचन इस
प्रकार है-
राज्यसभा की रचना-राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या संविधान द्वारा 250 निश्चित
की गई है। इनमें से 238 सदस्य राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों से चुनकर आते हैं तथा 12 सदस्य
राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। राष्ट्रपति उन सदस्यों को मनोनीत करता है, जो साहित्य, कला,
और विज्ञान आदि में विशेष योग्यता रखते हों।
सदस्यों का चुनाव-राज्यसभा के सदस्यों को राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों से चुना जाता
है। राज्यों से चुने जाने वाले सदस्यों को राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य आनुपातिक
प्रतिनिधि पद्धति के आधार पर एकल संक्रमणीय मत द्वारा चुनते हैं। केन्द्रशासित प्रदेश के
प्रतिनिधियों के निर्वाचन की प्रणाली संसद द्वारा निश्चित की जाती है।
योग्ताएंँ-(i) वह भारत का नागरिक हो, (ii) वह कम से कम 30 वर्ष की आयु का हो,
(iii) वह सरकारी लाभ के पद पर आसीन न हो।
अवधि-राज्यसभा एक स्थायी सदन है। इसे किसी भी स्थिति में भंग नहीं किया जा सकता।
प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है तथा इसके एक-तिहाई सदस्यों को हर दो वर्ष
के बाद हटा दिया जाता है।
लोकसभा की रचना-
सदस्यों के लिए योग्यताएंँ– (i) वह भारत का नागरिक हो। (ii) उसकी आयु 25 वर्ष
से कम न हो। (iii) किसी न्यायालय द्वारा उसे पागल या दिवालिया घोषित न किया गया हो।
(iv) वह भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो।
अवधि-संविधान के अनुसार लोकसभा का कार्यकाल चुनाव के पश्चात् 5 वर्ष के लिए
निश्चित किया गया है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह से इस अवधि से पहले भी लोकसभा भंग
कर सकता है। संकटकालीन स्थिति में राष्ट्रपति की सलाह से इसकी अवधि एक बार में एक वर्ष
बढ़ा दी जाती है, लेकिन संकटकालीन स्थिति समाप्त हो जाने के बाद 6 महीने के अन्दर लोकसभा
का चुनाव होना आवश्यक होता है।
भारतीय संसद की शक्तियांँ एवं कार्य-(i) विधायी शक्तियाँ-कानून निर्माण करना
संसद का एक प्रमुख कार्य है। भारत में कानून निर्माण के संबंध में शक्तियों के केन्द्र व राज्यों
में विभाजन किया गया है और इस उद्देश्य के लिए तीन सूचियाँ बनाई गई हैं-(क) संघ सूची
(ख) राज्य सूची (ग) समवर्ती सूची
संघ सूची में दिए गए सभी विषयों पर संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। संकटकाल
की स्थिति में अथवा राज्य सभा द्वारा प्रस्ताव पारित करने पर संसद को राज्य सूची पर भी कानून
बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। समवर्ती सूची के विषयों पर संसद व राज्यों, दोनों को कानून
बनाने का अधिकार है परन्तु यदि किसी विषय पर संसद का बनाया हुआ कानून लागू होगा, राज्य
विधानमण्डल का नहीं।
(ii) वित्तीय शक्तियाँ-भारतीय संसद का देश के धन पर पूर्ण नियंत्रण है। संविधान के
अनुसार राष्ट्रपति की आज्ञा से वित्तमंत्री आगामी वर्ष के लिए आय-व्यय के पूर्ण विवरण को
बजट के रूप में लोकसभा के सामने प्रस्तुत करता है। बिना बजट पास हुए सरकार न कोई
कर लगा सकती है, न कर के रूप में कोई पैसा वसूल कर सकती है और न ही कोई खर्च कर
सकती है।
(iii) कार्यपालिका पर नियंत्रण-भारत में संसद कार्यपालिका अर्थात् प्रधानमंत्री व
मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण रखती है। मंत्रिपरिषद् अपने समस्त कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी
है। संसद मंत्रियों से उनके विभागों के सम्बन्ध में उनसे प्रश्न पूछकर, उनके विरुद्ध काम रोको
प्रस्ताव पास करके अविश्वास का प्रस्ताव पास करके नियंत्रण रखती है।
(iv) न्यायिक शक्तियां-भारतीय संसद को न्याय सम्बन्धी शक्तियां भी प्राप्त हैं। संसद
राष्ट्रपति को महाभियोग लगाकर हटा सकती है। वह राष्ट्रपति को भी हटा सकती है। सर्वोच्च
न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके असंवैधानिक तथा अनैतिक कार्यों के
लिए उनके पद से हट सकती है।
(v) चुनाव सम्बन्धी शक्तियांँ-संसद राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेती है। उपराष्ट्रपति का
चुनाव करती है। लोकसभा-अपने स्पीकर व डिप्टी-स्पीकर का तथा राज्य सभा अपने उपसभापति
का चुनाव करती है।
प्रश्न 2. आरिफ यह जानना चाहता था कि अगर मंत्री ही अधिकांश महत्वपूर्ण विधेयक
प्रस्तुत करते हैं और बहुसंख्यक दल अक्सर सरकारी विधेयक को पारित कर देता है तो
फिर कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की भूमिका क्या है ? आप आरिफ को क्या उत्तर
देंगे?                                                                                    (NCERT T.B.0.6)
उत्तर-आरिफ द्वारा पूछे गए प्रश्न में जो महत्वपूर्ण बात उठायी गयी है कि जब महत्वपूर्ण
बिल मंत्रियों द्वारा प्रस्तावित किए जाते हैं और बहुमत दल उसको पारित करवा ही देता है तो फिर
संसद की क्या भूमिका रह जाती है ? वास्तव में संसदात्मक शासन में बहुमत दल के लिए यह
आवश्यक है कि मंत्रियों द्वारा प्रस्तावित विधेयक अवश्य पारित हो जाने चाहिए अन्यथा सरकार
गिर जायगी। मत्रिमंडल को त्यागपत्र देना पड़ता है। इस बात को देखते हुए सरकार को बचाने
के लिए सत्ता दल को वे विधेयक पारित करवाने अनिवार्य हो जाते हैं। परन्तु इसका अर्थ यह
भी नहीं है कि फिर विधि निर्माण प्रक्रिया में संसद की कोई भूमिका नहीं है। साधारण विधेयक
संसद के किसी भी सदन में प्रस्तावित किया जाता है। धन विधेयक लोकसभा में प्रस्तावित किए
जाते हैं। अनेक गैर सरकारी विधेयक जो मंत्रियों से अलग संसद सदस्यों द्वारा प्रस्तावित किए जाते
हैं। इसके अतिरिक्त निजी विधेयक भी संसद में प्रस्तावित किए जाते हैं। संसद में उन सभी विधेयकों
पर अलग-अलग सोपानों में चर्चाएं होती हैं। विधेयक को विभिन्न सोपानों से गुजरना पड़ता है।
जैसे (क) प्रस्तुतीकरण व प्रथम वाचन, (ख) द्वितीय वाचन, (ग) समिति स्तर, (घ) रिपोर्ट
स्तर, (ङ) तृतीय वाचन। इन सोपानों के बाद ही विधेयक पर मतदान होता है। पारित होने के
बाद वह दूसरे सदन में भेजा जाता है जहाँ उसे इन्हीं सोपानों से गुजरना पड़ता है। जब दूसरा सदन
भी उसे पारित कर देता है तो राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है और राष्ट्रपति
के हस्ताक्षर हो जाने पर विधेयक कानून बन जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि संसद की भूमिका
बहुत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 3. संसद में धन विधेयक कैसे पारित होता है ?
अथवा, कोई विधेयक कानून बनने के लिए किन अवस्थाओं से गुजरता है, उनका
वर्णन कीजिए।
उत्तर-धन विधेयक से अभिप्राय-ऐसे विधेयक को धन विधेयक कहा जाता है, जिसका
सम्बन्ध सरकार से धन प्राप्त करने, तथा सरकारी निधियों के संरक्षण या उनमें से खर्च के लिए
होता है। धन विधेयक को पास करने का तरीका साधारण विधेयक से मिलता-जुलता है। धन
विधेयक में साधारण विधेयक की तुलना में तीन अन्तर होते हैं-
(क) धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तावित किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं।
(ख) धन विधेयक सरकारी विधेयक होता है और वित्त मंत्री या उसकी अनुपस्थिति में कोई
अन्य मंत्री ही पेश कर सकता है, कोई साधारण सदस्य नहीं।
(ग) धन विधेयक लोकसभा में केवल राष्ट्रपति की सिफारिश से ही पेश किया जा
सकता है।
धन विधेयक को भी लोकसभा में पास होने के लगभग साधारण बिल वाली अवस्थाओं
से ही गुजरना पड़ता है। लोकसभा इसे पास करके राज्य सभा के पास भेज देती है। राज्य सभा
को धन विधेयक में संशोधन करने या उसे अस्वीकार करने का अधिकार नहीं होता। वह केवल
इस पर विचार करके 14 दिनों के भीतर ही अपनी सिफारिशों के साथ लोकसभा को लौटा देती
है। यदि राज्यसभा 14 दिन तक धन विधेयक को न लौटाए तो उसे पारित मान लिया जाता है।
लोकसभा चाहे तो राज्यसभा की सिफारिशें माने या न माने। यदि लोकसभा सिफारिशें मान लेती
है तो विधेयक पारित हो जाता है और उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।
विधेयक के कानून बनने की विभिन्न अवस्थाएंँ :
(i) विधेयक को पेश करना तथा उसका प्रथम वाचन-कानून बनाने की प्रक्रिया में सबसे
पहले विधेयक को सदन में पेश करना होता है। ये विधेयक दो प्रकार के होते हैं-(क) सरकारी,
(ख) गैर-सरकारी। यदि विधेयक सरकारी होता है तो उसे प्रस्तावित करने की सूचना मंत्री सात
दिन पहले ही सदन को देता है और यदि विधेयक गैर-सरकारी होता है तो उसकी सूचना सदन
को एक महीना पहले दी जाती है। प्रस्तावित विधेयक की एक प्रति सदन के सचिवालय को भेजता
है। सदन का अध्यक्ष विधेयक को निश्चित तिथि को सदन की कार्यवाही सूची में शामिल कर
लेता है। निश्चित तिथि को प्रस्तावक सदस्य अपने स्थान पर खड़ा होकर विधेयक के शीर्षक को
पढ़ता है तथा उसके मुख्य उपबन्धों पर प्रकाश डालता है और उसकी आवश्यकता बतलाता है।
इस अवस्था में विधेयक पर विस्तृत रूप से विचार नहीं होता। सदन में विधेयक के प्रस्तावित होने
के बाद उसे सरकारी गजट में छाप दिया जाता है।
(ii) द्वितीय वाचन-विधेयक के प्रस्तावित और गजट में प्रकाशित होने के बाद निश्चित
तिथि को द्वितीय वाचन प्रारम्भ होता है। प्रस्तावक इस अवस्था में निम्न प्रस्तावों में से कोई एक
प्रस्ताव रखता है-
(क) सदन विधेयक पर शीघ्र विचार करे।
(ख) विधेयक को प्रवर समिति को सौंप दिया जाय।
(ग) विधेयक दोनों सदनों की संयुक्त समिति को सौंप दिया जाय।
(घ) जनमत प्राप्त करने के लिए विधेयक को प्रसारित कर दिया जाय।
विधेयकों को अधिकार प्रवर समिति के पास ही भेज दिया जाता है। द्वितीय वाचन में
विधेयक के गुण-दोषों पर सामान्य रूप से प्रकाश डाला जाता है। उसकी मुख्य धाराओं पर
विस्तारपूर्वक वाद-विवाद नहीं हो सकता और न इस स्तर पर संशोधन के प्रस्ताव ही प्रस्तुत किए
जा सकते हैं।
(iii) समिति स्तर-विधेयक की धाराओं पर. समिति अच्छी तरह विचार करती है। समिति
के प्रत्येक सदस्य को विधेयक की धाराओं, उपधाराओं पर विचार प्रकट करने तथा उसमें
आवश्यक संशोधन प्रस्ताव रखने का अधिकार होता है। समिति अगर जरूरी समझे तो विशेषज्ञों
से इसके विषय में राय ले सकती है। उसके बाद समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है।
(iv) रिपोर्ट स्तर-समिति की रिपोर्ट तैयार होने के पश्चात् सदन के सदस्यों में बांट दी जाती
है तथा विचार करने की तिथि निश्चित की जाती है। उस तिथि पर विधेयक पर पूरी तरह से
विचार-विमर्श किया जाता है तथा सदस्यों को भी इस समय संशोधन प्रस्ताव रखने का अधिकार
होता है। वाद-विवाद के पश्चात् प्रत्येक खण्ड तथा संशोधन पर मतदान होता है। संशोधन यदि
बहुमत से स्वीकार हो जाते हैं तो विधेयक के अंग बन जाते हैं और उसके अनुसार विधेयक पास
हो जाता है।
(v) तृतीय वाचन-प्रवर समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् तृतीय वाचन की
तिथि निश्चित की जाती है। इस अवस्था में विधेयक की भाषा या शब्दों के परिवर्तन के विषय
में विचार किया जाता है। विधेयक पर मतदान कराकर उसे पास कर दिया जाता है। सदन का
अध्यक्ष इसे प्रमाणित करता है और उसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है।
(vi) विधेयक पर दूसरे सदन में विचार-विधेयक पर दूसरे सदन में भी इसी प्रकार विचार
किया जाता है जैसा कि पहले सदन में कहा गया है अर्थात् दूसरे सदन में भी विधेयक उपरोक्त
सभी स्तरों से गुजरता है। यदि दूसरा सदन विधेयक को पास कर देता है तो उसे राष्ट्रपति के
हस्ताक्षर के लिए भेज दिया जाता है।
(vii) राष्ट्रपति की स्वीकृति-राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर विधेयक कानून बन जाता
है। राष्ट्रपति को असहमति होने पर किसी विधेयक को एक बार अस्वीकार भी कर सकता है,
परन्तु दोबारा संसद द्वारा पारित किए जाने पर राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी ही होती है। धन
विधेयक के बारे में राष्ट्रपति स्वीकृति पहली बार ही दे देता है, क्योंकि धन विधेयक में राष्ट्रपति
की स्वीकृति लेकर हो संसद में प्रस्तुत किए जाते हैं।
प्रश्न 4. विधान सभा और विधान परिषद की शक्तियों तथा कार्यों की तुलना कीजिए।
उत्तर-राज्य विधान सभा में विधान परिषद को उच्च सदन और विधान सभा को निम्न
सदन कहा जाता है। विधान परिषद को उच्च सदन केवल परम्परावश कहा जाता है। वास्तव में
विधान सभा उससे कहीं अधिक शक्तिशाली है। दोनों सदनों की तुलना निम्न आधारों पर की जा
सकती है-
(क) विधायी क्षेत्र में-दोनों सदन विधि-निर्माण में भाग लेते हैं। विधान सभा विधेयक
पास करके विधान परिषद के पास भेजती है और यदि वह भी पास कर देती है तो उसे राज्यपाल
के पास स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। यदि किसी विधेयक के विषय में दोनों सदनों में
मतभेद है तो जीत विधान सभा की होती है। विधान परिषद उसे पहली बार में तीन महीने और
विधान सभा से दूसरी बार पास करने पर केवल एक महीने के लिए रोक सकती है।
(ख) वित्तीय क्षेत्र-वित्तीय क्षेत्र में विधान परिषद को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। धन
विधेयक विधान सभा में प्रस्तावित होता है। वह उसे पास करके विधान परिषद में भेज देती है।
विधान परिषद में केवल 14 दिन समय दिया जाता है। इस अवधि में विधेयक को चाहे स्वीकार,
अस्वीकार या संशोधित करके भजे।14 दिन के बाद पास मान लिया जाता है और राज्यपाल की
स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है।
(ग) कार्यपालिका पर नियंत्रण के क्षेत्र में-दोनों सदनों के सदस्य कार्यपालिका से प्रश्न
या पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं। कोई भी प्रशासनिक सूचना मांग सकते हैं। सरकार की आलोचना
कर सकते हैं, किन्तु कार्यपालिका केवल विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। विधान सभा द्वारा पास
किए गए अविश्वास प्रस्ताव पर मंत्रिमण्डल त्यागपत्र देता है।
(घ) अन्य क्षेत्रों में- राष्ट्रपति के चुनाव में केवल विधानसभा के सदस्य ही भाग लेते हैं।
इसी प्रकार संविधान के संशोधन की स्वीकृति विधानसभा से ही ली जाती है। उपरोक्त तुलना
स्पष्ट हो जाता है कि विधानपरिषद विधानसभा की तुलना में बहुत ही शक्तिहीन सदन है।
यह कहना ठीक है कि दोनों सदनों समान विधायी शक्तियों से युक्त नहीं हैं। वित्त विधेयक
के विषय में तो विधान परिषद केवल 14 दिन की देरी ही कर सकती है। साधारण विधेयक के
विषय में भी विधान सभा अधिक शक्तिशाली है। यदि विधान सभा किसी विधेयक को पास कर
दे और वह विधान परिषद के पास भेजा जाए तो विधान परिषद या तो उस विधेयक को उसी
रूप में पारित कर सकती है या उसे अस्वीकार भी कर सकती है अथवा उसमें संशोधन कर सकती
है। यह भी हो सकता है कि तीन महीने तक विधानपरिषद कोई निर्णय ही न ले। इसका यह अर्थ
मान लिया जाता है कि विधानपरिषद ने उसे अस्वीकार कर दिया है। तीनों अवस्थाओं में विधेयक
फिर से विधान सभा के पास जाता है। विधान सभा विधान परिषद के द्वारा किए गए संशोधन
को माने या न माने। विधानसभा यदि दोबारा उस विधेयक को पारित कर दे तो विधान परिषद
उस पर एक महीने तक अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति दे सकती है। यदि विधान परिषद उसे अब
भी स्वीकार नहीं करती तो यह मान लिया जाता है विधेयक दोनों सदनों द्वारा स्वीकार किया जा
चुका है। उसके बाद विधेयक राज्यपाल के पास भेजा जाता है। इस प्रकार विधायी शक्तियों में
विधानसभा अधिक शक्तिशाली है।
प्रश्न 5. आप निम्नलिखित में से किस कथन से सबसे ज्यादा सहमत हैं ? अपने उत्तर
का करण दें।
*सांसद / विधायकों को अप पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट होनी चाहिए।
* दलबदल विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसदों /
विधायकों पर बढ़ा है।                                                  [B.M.2009A] दलबदल हमेशा स्वार्थ के लिए होता है और इस कारण जो विधायक / सांसद दूसरे
दल में शामिल होना चाहता है उसे आगामी दो वर्षों के लिए मंत्री पद के अयोग्य करार
दिया जाना चाहिए।
उत्तर-जब एक सांसाद/विधायक किसी पार्टी को छोड़ कर किसी अन्य पार्टी में मिलने की
इच्छा करता है और नई पार्टी में मिल जाता है अर्थात् नयी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर लेता
है तो यह प्रक्रिया दल-बदल कहलाती है। दल-बदल पर रोक लगाने सम्बन्धी संशोधन से ही
दल-बदल पर रोक लग पाई वरन् इसमें तो पार्टी नेतृत्व को और अधिक शक्ति मिल गयी है।
सदन का पीठासीन अधिकारी इसमें अन्तिम निर्णय लेने का अधिकारी है। दल-बदल करने वाले
व्यक्ति को अयोग्य करार कर दिया जाता है। उसकी सदन की सदस्यता भी समाप्त कर दी जाती
है। उसे किसी भी राजनीतिक पद के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। इन तीनों कथनों में से
पहले कथन में विधायक को उसकी पसंद की पार्टी में जाने की छूट नहीं दी जा सकती क्योंकि
यह उन नागरिकों की इच्छा का दमन होगा जिन्होंने उसे चुनकर विधानमण्डल में भेजा था। तीसरे
विकल्प में उस व्यक्ति या विधायक को अगले दो वर्ष तक बने रहना काफी नहीं हो सकता क्योंकि
उसकी सदस्यता (लोकसभा में) बराबर नहीं रहेगी। अतः द्वितीय कथन ही सही है कि दल-बदल
विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसदों/विधायकों पर बढ़ा है। इसका
कारण यह है कि नेताओं का आदेश सांसदों और विधायकों को मानना पड़ता है अन्यथा वे
दल-बदल विरोधी कानून के अन्तर्गत अपनी सदस्यता से हाथ धो बैठते हैं। पार्टी नेतृत्व का इसमें
दबदबा रहता है और पार्टी अध्यक्ष सदस्यों को सदन में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी करते
हैं। किसी विधेयक पर मतदान के लिए भी व्हिप जारी कर दिया जाता है। व्हिप का उल्लंघन करने
वाले सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी जाती है।
प्रश्न 6. डॉली और सुधा में इस बात की चर्चा चल रही थी कि मौजूदा वक्त में संसद
कितनी कारगर और प्रभावकारी है। डॉली का मानना था कि भारतीय संसद के कामकाज
में गिरावट आयी है। यह गिरावट एकदम साफ दिखती है क्योंकि अब बहस-मुबाहिसे पर
समय कम खर्च होता है और सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने अथवा वॉकआउट
(बहिर्गमन) करने में ज्यादा। सुधा का तर्क था कि लोकसभा में अलग-अलग सरकारों ने
मुंँह की खायी है, धराशायी हुई है। आप सुधा या डॉली के तर्क के पक्ष या विपक्ष में और
कौन-सा तर्क देंगे?                                                                   (NCERT T.B.0.8)
उत्तर-जब हम दूरदर्शन पर संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देख रहे होते हैं तो मालूम
होता है कि सदन में सदस्य किस प्रकार कटुता लिए हुए एक-दूसरे की टांग खींचते हैं। विभिन्न
दलों के सदस्यों में आपस में बहस होती रहती है। कई बार ऐसा लगता है कि राष्ट्र का धन बरबाद
हो रहा है। परंतु वास्तव में संसद तो वाद-विवाद का मंच है। संसद इस वाद-विवाद के माध्यम
से अपने तमाम महत्वपूर्ण कार्यों को निपय लेती है। वाद-विवाद सार्थक तथा शान्तिपूर्ण होना
चाहिए। कुछ सदस्य अपने दायित्वों की पूर्ति ईमानदारी से नहीं कर रहे हैं। उनका व्यवहार
पक्षपातपूर्ण है। वे सदन में शोर-शराबा उत्पन्न करते हैं। उपरोक्त प्रश्न में डॉली के विचार से
यह संसद में गिरावट का समय चल रहा है क्योंकि वाद-विवाद में समय कम लगाया जा रहा
है और संसद की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने में अधिक समय खर्च किया जा रहा है। वे
कभी-कभी गैरसंसदीय तरीके भी प्रयोग में लाते हैं पर अधिकांश सदस्य अपने अधिकारों का प्रयोग
संसद में उचित रूप से करते हैं। वह सदन में वाद-विवाद में ईमानदारी से भाग लेते हैं और सदन
की कार्यवाही सुचारु रूप से चलती है। इससे संसद की गरिमा बनी रहती है। आजकल गठबन्धन
सरकारों का समय है। अतः संसद सदस्यों को अपना व्यवहार उचिंत और ईमानदारी से परिपूर्ण
रखना चाहिए। उन्हें अपने दल के सदस्यों का व्यवहार नियन्त्रित रखना चाहिए ताकि ये संसद
की कार्यवाही में उचित व्यवहार करें और संसद की कार्यवाही को उचित रूप से चलने दें। यदि
वे अनुचित व्यवहार करें तो पीठासीन अधिकारी को उनके गलत व्यवहार के लिए उन्हें दण्डित
करना चाहिए। संसदात्मक गणतंत्र या संसदीय लोकतंत्र में जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति करने,
जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला विधानमण्डल होता है जिसकी स्थिति और दायित्व बहुत ऊँचे
होते हैं। संसदात्मक लोकतंत्र में जनता की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली व्यवस्थापिका
अत्यन्त शक्तिशाली और उत्तरदायी संस्था है। अतः इसके सदस्यों का व्यवहार भी औचित्यपूर्ण
होना चाहिए।
प्रश्न 7. किसी विधेयक को कानून बनने के क्रम में जिन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता
है उन्हें क्रमवार सजाएँ।
• किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।
• विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में हुआ है उसमें यह विधेयक पारित होता है।
• विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
• विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती
है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है।
• संबद्ध मंत्री विधेयक को जरूरत के बारे में प्रस्ताव करता है।
• विधि मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।
उत्तर-विषयक पारित होने की विभिन्न अवस्थाएंँ:
(i) विधि मंत्रालय का कानून विभाग विधेयक तैयार करता है।
(ii) सम्बद्ध मंत्री विधेयक की आवश्यकता के बारे में प्रस्ताव करता है।
(iii) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए स्वीकृति का प्रस्ताव पारित किया जाता है।
(iv) विधेयक उपसमिति के पास भेजा जाता है। समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और
चर्च के लिए सदन में भेज देती है।
(v) विधेयक की प्रत्येक धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
(vi) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में किया जाता है, उसमें यह पारित होता है।
(vii)- विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और पारित हो जाता है।
(viii) विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति से विधेयक कानून
बन जाता हैं परन्तु यदि राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर न करें, वह उसे रोक लें या उस पर स्वीकृति
न दें जैसा कि 1986 में निवर्तमान राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह ने डाक विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं किए
तथा अभी 2006 (31 मई) को राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वारा ‘लाभ के पद’ पर
विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेज दिया गया। ऐसी स्थिति में संसद यदि दोबारा
उस विधेयक को पारित करके राष्ट्रपति के पास भेजती है तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी स्वीकृति
देनी ही होती है। लेकिन संसद से पास पुनर्विचार के लिए भेजने की कोई समय सीमा निर्धारित
नहीं की गयी है और इस प्रकार राष्ट्रपति इस विधेयक को ठंडे बस्ते में भी डाल सकता है।
प्रश्न 8. संसदीय समिति की व्यवस्था से संसद के विधायी कामों के मूल्यांकन और
देखरख पर क्या प्रभाव पड़ता है ?                                  (NCERT T.B.Q.10)
उत्तर-संसद केवल अधिवेशन के दौरान ही बैठती है इसलिए उसके पास अत्यन्त सीमित
समय होता है। कार्य की अधिकता और समय की अल्पता के कारण वह किसी विधेयक पर गहराई
से विचार नहीं कर सकती। कानून बनाने के लिए विधेयक के अन्तर्निहित विषय का गहन अध्ययन
करना पड़ता है। इसके लिए अधिक समय की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त और भी
महत्वपूर्ण कार्य संसद को करने होते हैं जैसे विभिन्न मंत्रालयों अनुदान मांगों का अध्ययन,
विभिन्न विभागों के खचों की जाँच, भ्रष्टाचार के मामलों की जांच आदि। इन सब कारणों से
विभिन्न विधायी कार्यों के लिए समितियों का गठन विधायी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण भाग बन
चुका है। यह समितियाँ कानून बनाने में ही नहीं वरन् सदन के दैनिक कार्यों में भी हाथ बंँटाती
है। 1983 ई० में भारत में संसद की स्थायी समितियों की प्रणाली विकसित हुई। विभिन्न विभागों
से सम्बन्धित ऐसी 20 समितियाँ हैं। स्थायी समितियाँ विभागों के कार्यों, उनके बजट, खर्चे तथा
उनसे सम्बन्धित विधेयकों की देखरेख करती हैं। स्थायी समितियों के अतिरिक्त संयुक्त संसदीय
समितियाँ भी होती हैं। इनमें संसद के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। इनका गठन किसी विधेयक
पर संयुक्त चर्चा अथवा वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए किया जाता है। समिति व्यवस्था
से संसद का कार्य भी हल्का हो जाता है। समितियों के सुझाव को आम तौर पर संसद स्वीकार
कर लेती है।
प्रत्येक सदन में स्थायी समितियाँ और कुछ संयुक्त समितियां होती हैं। कार्यों के अनुसार इन
समितियों को निम्न प्रकार श्रेणीबद्ध किया जा सकता है-
वित्तीय समितियाँ:
(i) प्राकलन समिति
(ii) सरकारी उपक्रमों सम्बन्धी समिति
(iii) लोक लेखा समिति
सदन की समितियाँ :
(i) कार्य मंत्रणा समिति
(ii) गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों तथा संकल्पों सम्बन्धी
समिति
(iii) नियम समिति
जांँच समितियाँ :
(i) याचिका समिति
(ii) विशेषाधिकार समिति
छानबीन समितियाँ :
(i) सरकारी आश्वासनों सम्बन्धी समिति
(ii) अधीनस्थ विधान सम्बन्धी समिति
सेवा समितियाँ :
(i) आवास समिति
(ii) ग्रन्थालय समिति
प्रश्न 9. लोकसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) के कार्यों का उल्लेख कीजिए। [B.M.2009A]
अथवा, लोक सभा के अध्यक्ष का चुनाव कैसे होता है? अध्यक्ष की शक्तियों व कार्यों
का वर्णन कीजिए।
अथवा, लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्या हैं?
उत्तर-संसद के निचले सदन लोक सभा की कार्यवाही को चलाने के लिए संविधान में एक
अध्यक्ष की व्यवस्था की गई है जिसे साधारण भाषा में स्पीकर कहते हैं। स्पीकर का चुनाव
नव-निर्वाचित लोकसभा के सदस्य प्रथम अधिवेशन में अपने सदस्यों में से बहुमत के आधार पर
करते हैं। स्पीकर चुने जाने के बाद वह सदस्य अपने राजनीतिक दल को छोड़कर निष्पक्ष रूप से
कार्य करता है।
स्पीकर की शक्तियाँ एवं कार्य-
(i) लोक सभा की बैठकों की अध्यक्षता करना-स्पीकर लोकसभा की बैठकों की
अध्यक्षता करता है। उसकी आज्ञा का पालन सभी सदस्य करते हैं। सदन में अनुशासन व व्यवस्था
बनाए रखना उसकी जिम्मेवारी है।
(ii) प्रस्ताव रखने की अनुमति देना-लोक सभा में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रस्तावों के
सम्बन्ध में उसका निर्णय अन्तिम होता है कि कोई प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है या नहीं।
‘काम रोको प्रस्ताव’ को प्रस्तावित करने के लिए पर्याप्त कारण हैं अथवा नहीं, यह देखकर उसको
अनुमति देने या न देने का निर्णय अध्यक्ष ही करता है।
(iii) नियुक्तियांँ करना-लोक सभा का अध्यक्ष सदन की प्रवर समिति तथा अन्य समितियों
के सभापतियों व सदस्यों की नियुक्तियांँ करता है।
(iv) प्रधानमंत्री को परामर्श देना-लोक सभा का अध्यक्ष प्रधानमंत्री को, जो कि लोक सभा
का नेता है, परामर्श देकर लोकसभा का कार्यक्रम निर्धारित करता है। जैसे उन प्रस्तावों का क्रम
क्या हो जिन्हें सदन में रखा जाता है, इत्यादि।
(v) सदस्यों के भाषण से सम्बन्धित शक्ति-लोक सभा में दिए जाने वाले भाषण अध्यक्ष
को सम्बोधित करके दिए जाते हैं। वह भाषणों के लिए समय निश्चित करता है। यह भी निश्चित
करता है कि कौन-सा सदस्य भाषण करे और किस सदस्य का कितना भाषण अप्रासंगिक है।
(vi) लोकसभा के सदस्यों में अनुशासन बनाए रखा-लोक सभा में अनुशासन व
व्यवस्था को बनाये रखना अध्यक्ष का महत्वपूर्ण कार्य है। यदि कोई सदस्य सदन की व्यवस्था
भंग करे तो उसे वह चेतावनी दे सकता है और आवश्यकता पड़ने पर उसे सदन से बाहर चले
जाने को बाध्य कर सकता है।
(vii) सदन की बैठक स्थगित करना-यदि अध्यक्ष यह महसूस करे कि सदन में गंभीर
अव्यवस्था उत्पन्न हो गई है तो वह जितने समय के लिए उचित समझे सदन की बैठक को स्थगित
कर सकता है।
(viii) विधेयक का निर्णय-कौन-सा विधेयक धन सम्बन्धी है और कौन-सा साधारण
है, इसका निर्णय लोकसभा का अध्यक्ष ही करता है। उसका निर्णय अन्तिम होता है।
(ix) सदन में पास हो गए विधेयकों पर हस्ताक्षर-जो विधेयक लोकसभा पास कर देती
है उन विधेयकों पर स्पीकर अपना हस्ताक्षर करके आवश्यकतानुसार राष्ट्रपति के पास भेज देता है।
(x) विधेयकों पर मतदान करवाना-किसी विधेयक को सदन स्वीकार करता है अथवा
अस्वीकार करता है।इस संबंध में वह विधेयकों व प्रस्तावों पर मतदान कराता है। वह उनकी
स्वीकृति और अस्वीकृति की भी घोषणा करता है।
(xi) निर्णायक मत देना-यदि किसी विधेयक के पक्ष व विपक्ष में मतों की संख्या बराबर
हो जाए तो अध्यक्ष को निर्णायक मत देने का अधिकार है।
(xii) सदस्यों के विशेषाधिकारों की सुरक्षा-अध्यक्ष लोकसभा के सदस्यों के विशेषाधिकारों
की रक्षा करता है। अपने अधिकारों से सम्बन्धित यदि किसी सदस्य को कोई शिकायत हो तो
वह अपनी शिकायत अध्यक्ष के सामने रखता है।
प्रश्न 10. भारतीय संसद के मुख्य कार्य क्या हैं ? उन विधियों का परीक्षण कीजिए
जिनके द्वारा संसद कार्यकारिणी को नियंत्रित करती है।
उत्तर-संसद के मुख्य कार्य-भारत की संसद के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-
(i) विधायी कार्य-संसद का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कानूनों का निर्माण करना है। संसद
को संघीय सूची के 97 विषयों तथा समवर्ती सूची के 47 विषयों पर कानून बनाने का अधिकार
प्राप्त है। आपातकाल के समय संसद द्वारा राज्य सूची के विषयों पर भी कानून का निर्माण किया
जा सकता है। दो या दो से अधिक राज्यों के विधान मण्डलों की प्रार्थना पर संसद सामान्य काल
में भी राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बना सकती है। राज्य सभा दो तिहाई बहुमत से यदि
किसी राज्य सूची के विषय को राष्ट्रीय महत्व का घोषित करे तो संसद उस पर भी कानून बना
सकती है।
(ii) संविधान संशोधन-संविधान संशोधन का प्रस्ताव संसद में ही प्रस्तावित किया जा
सकता है। कुछ विषयों में संसद के दोनों सदनों के पृथक्-पृथक् साधारण बहुमत से तथा कुछ
में दो तिहाई बहुमत से संशोधन पारित किया जाता है। संविधान की कुछ व्यवस्थाओं में भारतीय
संघ के आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति भी आवश्यक होती है।
(iii) वित्तीय कार्य-संसद द्वारा बजट पारित किया जाता है। राष्ट्रीय वित्त पर संसद का
पूर्ण नियंत्रण होता है। राष्ट्रपति की आज्ञा से वित्तमंत्री आगामी वर्ष के आय-व्यय के पूर्ण विवरण
को बजट के रूप में लोकसभा के समक्ष प्रस्तुत करता है। बिना बजट पारित हुए सरकार न कोई
कर लगा सकती है और न कर के रूप में कोई पैसा वसूल सकती है और न ही खर्च कर सकती है।
(iv) न्यायिक कार्य-संसद को राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने का अधिकार है। वह सर्वोच्च
न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को भी उनके पद हटा सकती है।
(v) अन्य कार्य-भारतीय संसद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में भाग लेती है।
लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव लोकसभा द्वार तथा राज्यसभा के उपसभापति का
चुनाव राज्यसभा द्वारा होता है।
(vi) प्रशासन पर नियंत्रण-संसद मंत्रिपरिषद पर अपना नियंत्रण रखती है। मंत्रिपरिषद
सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। संसद सदस्य मंत्रियों से प्रश्न तथा पूरक प्रश्न
पूछते हैं। काम रोको प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव तथा आवश्यकता पड़ने पर संसद का निम्न सदन
लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव भी पारित कर सकती है।
प्रश्न 11. लोकसभा का गठन कैसे होता है ? इसके कार्य बताएंँ।
उत्तर-लोकसभा का गठन-लोकसभा संसद का प्रथम अथवा निम्न सदन है। इसके कुल
सदस्यों की संख्या अधिकतम 550 हो सकती है। इनमें से 530 सदस्य राज्यों की जनता के द्वारा
तथा 20 सदस्य केन्द्र शासित प्रदेशों की जनता के प्रतिनिधि हो सकते हैं। इसके सदस्यों का चुनाव
जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। आजकल लोकसभा में 545 सदस्य हैं जिनमें से दो
सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत एंग्लो-इण्डियन हैं। सदस्यों के निर्वाचन में वयस्क मताधिकार का
प्रयोग होता है। प्रत्येक 18 वर्ष की आयु वाले नागरिक वोट डालते हैं। 25 वर्ष की आयु वाला
नागरिक जिसका नाम मतदाता सूची में हो, चुनाव लड़ सकता है। सदस्यों का चुनाव 5 वर्ष के
लिए किया जाता है।
लोकसभा का कार्य-
(i) लोकसभा संघ की सूची के विषयों पर कानून बनाती है। संसद में कोई विधेयक
लोकसभा और राज्य सभा दोनों में अलग-अलग पारित किया जाता है, तभी राष्ट्रपति उस पर
हस्ताक्षर करता है। उसके बाद वह विधेयक कानून बन जाता है।
(ii) वित्त विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तावित किए जाते हैं तथा अंतिम रूप से इसी के
द्वारा पास किए जाते हैं।
(iii) लोकसभा राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेती है।
(iv) लोकसभा में बहुमत दल के नेता को राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री बनाया जाता है।
(v) लोकसभा लोगों की सभा है। लोगों के कल्याण के लिए यहाँ अनेक प्रस्ताव पास किए
जाते हैं।
(vi) लोकसभा मंत्रिमंडल पर नियंत्रण रखती है। वह उसके प्रति अविश्वास का प्रस्ताव भी
पारित कर सकती है, जिससे मंत्रिमण्डल को त्याग-पत्र देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त निन्दा
प्रस्ताव, काम रोको प्रस्ताव लाकर, प्रश्न पूछ कर लोकसभा मंत्रिमण्डल पर नियंत्रण रखती है।
(vii) राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने का अधिकार संसद को है। इस प्रकार लोकसभा इस
कार्य में भी राज्यसभा की सहभागी है। वह सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों
को भी उनके पद से हटा सकती है।
प्रश्न 12. विधानसभा अध्यक्ष के चार प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर– विधानसभा का अध्यक्ष-नव निर्वाचित विधानसभा के सदस्य अपनी पहली बैठक
में ही अपने में से एक अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। अध्यक्ष विधानसभा का सबसे महत्त्वपूर्ण
व्यक्ति होता है। वह सदन की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा सदन में शांति और व्यवस्था
बनाए रखता है।
अध्यक्ष के चार प्रमुख कार्य-
1. विधानसभा की बैठकों की अध्यक्षता करना-अध्यक्ष विधानसभा की बैठकों की
अध्यक्षता करता है। उसकी आज्ञा का पालन सभी सदस्यों को करना पड़ता है। सदन में अनुशासन
व व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है।
2. प्रस्ताव रखने की अनुमति देना-विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रस्तावों के
संबंध में उसका निर्णय अतिम होता है। कोई प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है या नहीं, काम
रोको प्रस्ताव को प्रस्तावित करने के लिए पर्याप्त कारण हैं अथवा नहीं; यह देखकर उसको अनुमति
देने या न देने का निर्णय अध्यक्ष ही करता है।
3. विधेयक का निर्णय-कौन-सा विधेयक धन सम्बन्धी विधेयक है और कौन-
सा साधारण विधेयक है यह निर्णय विधानसभा का अध्यक्ष ही करता है। उसका निर्णय अन्तिम
होता है।
4. निर्णायक मत-सामान्य स्थिति में वह मतदान में भाग नहीं लेता किंतु पक्ष और विपक्ष
में बराबर मत आएं तो वह निर्णायक मत का प्रयोग कर सकता है।
13. बिहार विधान परिषद् का गठन कैसे होता है? इसके कार्य एवं अधिकारों का
वर्णन करें।                                                                              [B.M.2009A] उत्तर-भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 के अधीन बिहार में द्विसदनात्मक विधानमंडल
की व्यवस्था की गई है। जिसमें उच्च सदन विधान परिषद् और निम्न सदन विधान सभा है। बिहार
विधान परिषद एक स्थायी सदन है लेकिन इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का है। इसके 1/3
सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष पर अवकाश ग्रहण करते हैं। बिहार विधान परिषद में सदस्यों की संख्या
75 है जिसमें 1/3 सदस्य स्थानीय संस्थाओं द्वारा, 1/3 सदस्य विधान सभा के सदस्यों द्वारा, 1/12
सदस्य माध्यमिक एवं उच्च कक्षा में अध्यापन कर रहे शिक्षकों द्वारा, 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा
मनोनीत होती है।
बिहार विधान परिषद के सदस्यों के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ निर्धारित हैं-
(1) वह भारत का नागरिक हो।
(2) वह कम-से-कम 30 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुका हो।
(3) विधान सभा द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताएँ रखता है।
बिहार विधान परिषद के कार्य एवं अधिकार निम्नलिखित हैं-
(1) विधायी शक्तियों के अन्तर्गत साधारण विधेयक किसी भी सदन में पेश हो सकता
है, परंतु दोनों सदनों से अनुमोदन होना आवश्यक है। इसलिए साधारण विधेयक में विधान सभा
के समकक्ष ही विधान परिष्द की शक्तियांँ हैं।
(2) वित्तीय शक्तियाँ वित्तीय मामलों में विधान परिषद विधान सभा से कमजोर है। वित्त
विधेयक पहले विधान सभा में ही पेश हो सकता है। विधान परिषद मात्र 14 दिन तक ही उसे
रोक सकता है। इस विधेयक
14. जनहित याचिका पर एक लेख लिखें।                                          [B.M.2009 A]
उत्तर-न्यायपालिका के क्षेत्र में जनहित याचिका एक नवीन परंपरा विकसित करता है। इस
परंपरा के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी मामले को न्यायालय में रख सकता है जिससे वह प्रत्यक्ष
रूप से सम्बद्ध न भी हो और वह विवाद सार्वजनिक हित से सम्बद्ध हो, इसे जनहित याचिका
कहते हैं। न्यायालय के द्वारा इस परंपरा की शुरुआत 1979 ई० में हुई। 1979 में समाचार पत्रों
में विचाराधीन कैदियों के बारे में खबर छपी कि जिन अपराधों के लिए उन्हें बंदी बनाया गया
था। यदि उन अपराधों के लिए उन्हें सजा भी हो जाती तो वे उतनी लंबी अवधि तक कैद में
नहीं रहते। इस खबर को आधार बनाकर सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की। सर्वोच्च
न्यायालय में यह मुकदमा चला। यह पहली जनहित याचिका के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
जनहित याचिका न्यायालय के क्षेत्राधिकार काफी विस्तृत कर दिया है। सामाजिक हितों की
रक्षा, पर्यावरण संरक्षण आदि के लिए जनहित याचिका के माध्यम से न्याय की मांग व्यक्ति
का अधिकार है जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।
प्रश्न 15. मुख्यमंत्री के कार्य एवं अधिकारों की समीक्षा करें। [B.M.2009 A]
उत्तर-मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक प्रधान है। यह राज्यमंत्री परिषद में तारों के बीच चन्द्रमा
के समान राज्य सरकार का केन्द्र बिन्दु है। यह विधान सभा का नेता होता है। इसलिए मुख्यमंत्री
राज्य कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान है। मुख्यमंत्री को व्यापक कार्य एवं अधिकार प्राप्त है,
जो निम्नलिखित है-
(i) मुख्यमंत्री राज्य मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष होता है। इसलिए वह मंत्रिपरिषद का निर्माण
करता है।
(ii) मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल के बैठक की अध्यक्षता करता है और मंत्रिमंडल के निर्णय में इसकी
निर्णायक भूमिका होती है।
(iv) कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान होने के कारण मुख्यमंत्री समस्त प्रशासनिक कार्यों
करना,
का निरीक्षण करता है।
(v) मुख्यमंत्री विधान सभा का नेता होता है। वह विधान सभा के अध्यक्ष से मिलकर सदन
के विधायी कार्यसम की रूपरेखा तय करता है।
(vi) राज्य प्रशासन से जिन पदों पर नियुक्ति करने का अधिकार राज्यपाल को है उसका
वास्तविक उपयोग मुख्यमंत्री करता है। जैसे एडवोकेट जनरल, राज्य लोक सेवा आयोग अध्यक्ष
एवं सदस्य आदि की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री के परामर्श से करते हैं।
इस प्रकार मुख्यमंत्री को राज्य प्रशासन में वही स्थान प्राप्त है जो केन्द्रीय प्रशासन में
प्रधानमंत्री को है।

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