11-Political Science

Bihar board class 11th civics notes chapter 3

Bihar board class 11th civics notes chapter 3

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Bihar board class 11th civics notes chapter 3

                                                       समानता
                                                       पाठ्यक्रम
•क्या सभी विषमताओं में असमानता व्याप्त होती है ?
•क्या समानता से आशय एकरुपता है ?
•असमानता के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं ?
• किस प्रकार समानता को क्रियान्वित करना संभव है?
                                                          स्मरणीय तथ्य
                                            (Points to be Remember)
• व्यक्ति कुछ निश्चित लक्षणों की दृष्टि से समान होते हैं। वे समान प्राकृतिक अधिकारों
का उपभोग करते हैं। सभी व्यक्ति सुख अथवा पीड़ा को समान रूप से अनुभव करते
हैं। उनकी भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताएं समान हैं। हमारा संविधान भी जाति, वर्ग,
पंथ, लिंग अथवा प्रजाति के आधार पर किसी भेदभाव का निषेध करता है। समानता का
सही अर्थ यही है कि समाज में सभी प्रकार के विशेषाधिकार मौजूद हों।
• समानता का सकारात्मक रूप (Positive Aspects of Equality)-स्वतंत्रता की भांँति
समानता का भी सकारात्मक रूप होता है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना
पूर्ण विकास करने के लिए उचित अवसर प्राप्त हो।
• समानता का नकारात्मक रूप (Negative Aspect of Equality)- यदि समानता का
अर्थ सब व्यक्तियों का समान वर्ग, सबकी समान आय तथा समान वेतन कर दिया जाए
तथा सब एक ही प्रकार से जीवनयापन करने लगें तो यह समानता का नकारात्मक रूप
कहलाता है जो कि.समाज में सम्भव ही नहीं है।
• समानता के रूप (Kinds of Equality)-
(i) प्राकृतिक समानता (Natural Equality), (ii) नागरिक समानता (Civil Equality),
(iii) सामाजिक समानता (Social Equality), (iv) राजनीतिक समानता (Political
Equality), (v) आर्थिक समानता (Economics Equality)।
• स्वतंत्रता और समानता में सम्बन्ध (Relationship between Liberty and Equal-
ity)- डी. टॉकविले तथा लार्ड एक्टन आदि का विचार है कि स्वतंत्रता तथा समानता
एक दूसरे के विरोधी हैं परन्तु आजकल यह विचार मान्य नहीं है। आजकल यह माना
जाता है कि स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे के पूरक हैं। आर्थिक समानता के बिना
राजनीतिक स्वतंत्रता व्यर्थ है। दूसरी ओर राजनीतिक स्वतंत्रता के बिना समानता भी स्थापित
नहीं हो सकती। आर. एच. टॉनी के अनुसार, “समानता स्वतंत्रता की विरोधी न होकर
इसके लिए आवश्यक है।”
• समानता की अवधारणा-भारतीय परिप्रेक्ष्य में (Concept of Equality – Indian
Prepective) – भारतीय दर्शन में, विशेष रूप से वेदान्त में मानव को आध्यात्मिक रूप
से समान माना गया है। स्मृतियों में नारी-पूजा का उल्लेख मिलता है। इस आधार पर
स्त्री-पुरुष समानता भी भारतीय दर्शन का आधार है। वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित
न होकर कर्म पर आधारित थी जो समानता का एक और पहलू
• समानता की अवधारणा-पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य में (Concept of Equality & Westem
Prepective) – पाश्चात्य विचारकों द्वारा मानव समानता पर बल दिया गया। स्टोइक,
रोमन कानून तथा यीशु (ईसा मसीह) के सिद्धान्तों में समानता का सिद्धांत देखने को
मिलता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पाश्चात्य देशों में विशेष रूप से यूरोप में जहाँ-जहाँ
लोकतंत्र अपनाया गया वहाँ राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता,
सामाजिक स्वतंत्रता तथा धार्मिक स्वतंत्रता और सभी क्षेत्रों में समानता के सिद्धांत अपनाए
गए।
                                               पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. कुछ लोगों का तर्क है कि असमानता प्राकृतिक है जबकि कुछ अन्य का
कहना है कि वास्तव में समानता प्राकृतिक है और जो असमानता हम चारों ओर देखते हैं
उसे समाज ने पैदा किया है। आप किस मत का समर्थन करते हैं ? कारण दीजिए।
उत्तर-ये दोनों दृष्टिकोण सही प्रतीत होते हैं। यह कि असमानता प्राकृतिक है और समानता
भी प्राकृतिक है। इस दृष्टिकोण के बिन्दु को इस प्रकार समझा जा सकता है। इन दोनों
अवधारणाओं में भिन्नता है परन्तु स्थान विशेष पर दोनों सत्य हो सकती हैं। प्राकृतिक असमानता
कहीं सही हो सकती है तो कहीं गलत। यह वैसे ही है जैसे कहीं रात होती है, तो कहीं दिन। इस
प्रकार कहीं गर्म होता है तो कहीं ठंडा, कुछ स्थान पर भूमि समतल होती है तो कुछ स्थानों पर
पहाड़ी होती है। कहीं सुबह होती है तो कहीं शाम होती है। इसी प्रकार एक आदमी काला हो सकता
है तो दूसरा गोरा हो सकता है, एक व्यक्ति लम्बा हो सकता है तो दूसरा ठीगना हो सकता है।
इसी प्रकार व्यक्ति में भी जैविक असमानता मिलती है यथा कुछ लोग पुरुष होते हैं तो दूसरे स्त्री
हो सकती हैं। इन दोनों में जैविक असमानताएं होती हैं।
प्रकृति ने भी व्यक्ति को.योग्यताओं और क्षमताओं में समान बनाया है और प्रत्येक व्यक्ति
समान होना चाहता है। समानता एक प्राकृतिक शर्त भी है परन्तु समानता पूर्ण दृष्टिकोण है,
सामूहिक दृष्टिकोण में सम्भव नहीं है। इसलिए समानता का अर्थ समाज के सामाजिक-आर्थिक
दशाओं को ध्यान में रखकर निकाला जा सकता है। समानता की आवश्यकता व्यक्ति के रहने
पर पर्यावरणीय प्रभाव में सुनिश्चित किया जा सकता है। यहाँ तक कि असमान दशा को भी समझा
जा सकता है। व्यक्ति द्वारा निर्मित अन्यायपूर्ण समानता को हटाया नहीं जा सकता। एक डॉक्टर
के काम और मजदूर के काम में अंतर स्वाभाविक है।
प्रश्न 2. एक मत है कि पूर्ण आर्थिक समानता न तो संभव है और न ही वांछनीय।
एक समाज ज्यादा से ज्यादा बहुत अमीर और बहुत लोगों के बीच की खाई को कम करने
का प्रयास कर सकता है। क्या आप इस तर्क से सहमत हैं? अपना तर्क दीजिए।
उत्तर-हम इस कथन से कारणों सहित सहमत हैं कि पूर्ण समानता न तो सम्भव है और
न ही ऐच्छिक है। इस सम्बन्ध में डाक्टर और मजदूर की उदाहरण ले सकते हैं। एक डाक्टर और
एक मजदूर को समान पारिश्रमिक (Wages) न तो सम्भव है और न ऐच्छिक है, क्योंकि डाक्टर
ने अधिक निवेश करके अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को बढ़ाया है। यही नहीं, डाक्टर का
उत्तरदायित्व और कार्य मजदूर के उत्तरदायित्व और कार्य से अधिक होता है। एक डाक्टर को
10 हजार रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जाता है। यह आशा नहीं की जा सकती कि एक मजदूर
को 10000 रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जाय। उसकी न्यायसंगत मजदूरी 3000 रूपये प्रतिमाह
हो सकती है इसलिए यहाँ दोनों के पारिश्रमिक में 7000 रुपये प्रतिमाह का अंतर है। इसकी
आलोचना नहीं होनी चाहिए और इसे समानता के रूप में स्वीकार करना चाहिए। यदि दो मजदूरों
में यदि पुरुष मजदूर को 3000 रुपये प्रतिमाह और दूसरे स्त्री मजदूर को 1000 रुपये प्रतिमाह दिया
जाता है, तो उस स्थिति को व्यक्ति निर्मित असमानता कहा जा सकता है। यह समानता का अलगाव
भी है जो लिंग (Sex) के आधार पर किया जाता है।
सभी व्यक्ति अत्यधिक धनी या अत्यधिक गरीब नहीं हो सकते। यह कल्पना नहीं किया जा
सकता कि सभी व्यक्ति महलों में रह सकते हैं या सभी व्यक्ति बिना किसी आवश्यकता के
झोपड़ियों में रह सकते हैं। समानता सापेक्षिक शर्त के रूप में होनी चाहिए जिसमें सभी को समान
अवसर मिलना चाहिए। योग्यताओं एवं क्षमताओं के विकास और जीवन की आवश्यकताओं पर
ही पूर्ति होनी चाहिए।
प्रश्न 3. नीचे दी गई अवधारणा और उसके उचित उदाहरणों में मेल बैठायें।
कॉलम ‘क’                                                            कॉलम ‘ख’
(क) सकारात्मक कार्यवाई          (i) प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार है।
(ख) अवसर की समानता            (ii) बैंक वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज की ऊंची दर देते हैं।
(ग) समान अधिकार                   (iii) प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए।
                         उत्तर-(क)-(ii), (ख)-(iii), (ग)-(i)
प्रश्न 4. किसानों की समस्या से संबंधित एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार छोटे और
सीमांत किसानों को बाजार से अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। रिपोर्ट में सलाह
दी गई कि सरकार को बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन
यह प्रयास केवल लघु और सीमांत किसानों तक ही सीमित रहना चाहिए। क्या यह सलाह
समानता के सिद्धान्त से संभव है?
उत्तर-यह तथ्य स्पष्ट रूप से समानता के सिद्धान्त के विरुद्ध है और समानता के सिद्धान्त
से मेल नहीं खाता। क्योंकि विभिन्न लोगों के लिए दो नीतियां नहीं अपनाई जा सकती। एक छोटे
और सीमांकित किसानों के लिए और दूसरी बड़े और धनी किसानों के दो नीतियों हो जाती हैं।
यदि लघु किसान अपनी उपज की अच्छी कीमत नहीं प्राप्त कर रहे हैं, तो इसका कारण भिन्न
हो सकता है। लघु और सीमांकित किसानों की कुछ स्वीकृत कार्यों यथा-उच्च रियायत
(Subsidiary) और निम्न ब्याज वाले ऋण देकर उनकी सहायता की जा सकती है।
प्रश्न 5. निम्नलिखित में से किस में समानता के किस सिद्धान्त का उल्लंघन होता है
और क्यों ?
(क) कक्षा का हर बच्चा नाटक का पाठ अपना क्रम आने पर पड़ेगा।
(ख) कनाडा सरकार ने दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से 1960 तक यूरोप के श्वेत
नागरिक को कनाडा में आने और बसने के लिए प्रोत्साहित किया।
(ग) वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से रेलवे आरक्षण की एक खिड़की खोली गई।
(घ) कुछ वन क्षेत्रों को निश्चित आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उत्तर-प्रश्न के पैरा में समानता के सिद्धान्त का उल्लंघन है। कनाडा की सरकार ने रंग के
आधार पर भिन कार्य अपनाया। उसने केवल गोरे यूरोपीय लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध के
अंत से 1960 तक कनाडा प्रवजन का आदेश दिया। यह स्पष्ट रूप से समानता के सिद्धान्त का
उल्लंघन है।
प्रश्न के पैरा ‘क’ और पैरा ‘ग’ में समानता के सिद्धान्त का उल्लंघन नहीं है।
प्रश्न के पैरा ‘घ’ में समानता के सिद्धान्त का उल्लंघन है, क्योंकि इसमें कुछ जंगल केवल जनजाति
समुदाय को देने की बात कही गई है जबकि सभी के लिए इस प्रकार प्रावधान करना चाहिए।
प्रश्न 6, यहां महिलाओं को मताधिकार देने के पक्ष में तर्क दिए गए हैं। इसमें से कौन-से
तर्क समानता के विचार से संगत हैं। कारण भी दीजिए।
(क) स्त्रियांँ हमारी माताएंँ हैं। हम अपनी माताओं को मताधिकार से वंचित करके
अपमानित नहीं करेंगे?
(ख) सरकार के निर्णय पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी प्रभावित करते हैं
इसलिए शासकों के चुनाव में उनका भी मत होना चाहिए।
(ग) महिलाओं को मताधिकार न देने से परिवारों में मतभेद पैदा हो जाएंगे।
(घ) महिलाओं से मिलकर आधी दुनिया बनती है। मताधिकार से वंचित करके लंबे
समय तक उन्हें दबाकर नहीं रखा जा सकता है।
उत्तर-प्रश्न के पैरा ‘ख’ और पैरा ‘घ’ समानता से अधिक मेल रखते हैं। पैरा ‘ख’ में कहा
गया है कि सरकार के निर्णय पुरुष और महिला दोनों को प्रभावित करते हैं। इसलिए दोनों को
शासकों के चुनाव में सहभागी होना चाहिए। पैरा ‘घ’ में कहा गया है महिलाओं के मतदान के
अधिकार को इंकार किया जा सकता है जो सम्पूर्ण जनसंख्या का 50% है।
                                           परीक्षोपयोगी महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
                              (Important Questions for Examination
                                                           वस्तुनिष्ठ प्रश्न
                                                 (Objective Questions)
1. राजनीति समानता की सर्वश्रेष्ठ गारंटी है।                        [B.M.2009A]
(क) लोकतंत्र में
(ख) तानाशाही में
(ग) उच्चतम न्यायालय
(घ) अभिजात तंत्र                             उत्तर-()
2. समानता का अर्थ है ?                                                         [B.M.2009A]
(क) सभी के लिए समान अवसर              (ख) समान शिक्षा
(ग) समान कार्य के लिए समान वेतन         (घ) विशेषाधिकारों का अभाव      उत्तर-(क)
3.बीसवीं शताब्दी में निम्नलिखित में से किस पर तुलनात्मक दृष्टि पर जोर दिया गया
था?                                                                                         [B.M.2009A
(क) राजनीतिक समानता पर
(ख) नागरिक समानता पर
(ग) सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर
(घ) राजनीतिक एवं आर्थिक समानता पर                      उत्तर-(ग)
                                                           अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न
                                         (Very Short Answer Type Questions)
प्रश्न 1. समा से आप क्या समझते हैं ?
(What do you understand by the term equality ?)
उत्तर-साधारण भाषा में समानता का अर्थ है-सब व्यक्तियों का समान दर्जा हो, सबकी आय
एक जैसी हो, सब एक ही प्रकार से जीवन-यापन करें। पर यह सम्भव नहीं है। लास्की ने कहा
है, “समानता का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को समान वेतन दिया जाए, यदि ईंट ढोने वाले
का वेतन एक प्रसिद्ध गणितज्ञ अथवा वैज्ञानिक के समान कर दिया जाए, तो समाज का उद्देश्य
ही नष्ट हो जाएगा। इसलिए समानता का यह अर्थ है कि कोई विशेष अधिकार वाला वर्ग न रहे।
सवको उन्नति के समान अवसर प्राप्त हों।”
प्रश्न 2. समानता के कोई चार रूप बताइए।                                       [B.M.2009 A]
(Explain any four kinds of equality.)
उत्तर-समानता के चार रूपों की विवेचना निम्नलिखित हैं:-
(i) प्राकृतिक समानता (Natural of Equality)- प्राकृतिक समानता का अर्थ है कि
प्रकृति ने सभी व्यक्तियों को समान बनाया है, परन्तु यह विचार ठीक नहीं है। सभी व्यक्तियों के
रंग, रूप, बनावट, शक्ति, बुद्धि तथा स्वभाव में असमानता होती है। वास्तव में प्राकृतिक समानता
का यह अर्थ है कि प्रत्येक में कुछ मौलिक समानताएं हैं जिनके कारण सभी व्यक्तियों को समान
माना जाना चाहिए।
(ii) नागरिक समानता (Civil Equality)- सभी व्यक्तियों को समान अधिकार प्राप्त हों
और सभी व्यक्ति कानून के समक्ष समान हों।
(iii) सामाजिक समानता (Social Equality) – सामाजिक समानता का अर्थ है कि
समाज के सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। ऊंच-नीच की भावना नहीं होनी
चाहिए।
(iv) राजनीतिक समानता (Political Equality)-समाज में सभी व्यक्तियों को समान
राजनैतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। चुनाव में खड़े होने या मतदान करने के अधिकार से किसी
को वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
प्रश्न 3. आर्थिक समानता के बारे में आप क्या जानते हैं?              (M. Imp.)
(What do you know about economic euqality ?)
उत्तर-वर्तमान काल में आर्थिक समानता ने एक महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। इसका यह
अर्थ नहीं है कि सब व्यक्तियों की आय अथवा वेतन समान कर दिया जाए। इसका अर्थ है-सबको
उन्नति के समान अवसर प्रदान किए जाएं। सभी की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए।
प्रत्येक व्यक्ति को काम मिले।
प्रश्न 4. कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को स्पष्ट करें।
(Explain the concept of euqlity before law.)
अथवा, कानून के समक्ष समानता से आप क्या समझते हैं ?             (Imp.)
(Whar do you understand by equality before law.)
उत्तर-कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा
गया है कि कानून के सामने सब समान होंगे और “कानून सबकी एक जैसे तरीके से रक्षा करेगा।”
इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति कानून से बड़ा या ऊपर नहीं है। कानून के लिए कोई छोटा-बड़ा
नहीं होता। कानून सबको एक समान मानता है। कानून धनी-निर्धन, छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा,
शिक्षित-अशिक्षित का भेदभाव नहीं मानता है।
प्रश्न 5. असमानता के किन्हीं दो प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-(i) प्राकृतिक असमानता : सभी व्यक्ति जन्म से ही असमान होते हैं। कोई भी दो
व्यक्ति एक समान नहीं हैं। किन्तु कुछ समाजशास्त्रियों का मत है कि जन्म से हीं नैतिकता की
भावना सबमें समान रूप से होती है। यह माना जा सकता है कि नैतिकता की भावना समान हो,
परन्तु दो व्यक्तियों की प्रकृति कभी एक समान नहीं होती। एक विकलांग व्यक्ति को कभी भी
एक स्वस्थ शरीर की तुलना में नहीं रखा जा सकता है। इस प्रकार यह प्राकृतिक असमानता है।
(ii) नागरिक असमानता : नागरिक असमानता के अन्तर्गत एक देश के सभी व्यक्तियों को
समान रूप से अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। दूसरा, मौलिक अधिकारों व अन्य अधिकारों से भी
जब कुछ नागरिकों को दूर रखा जाए तो उसे नागरिक असमानता कहते हैं। इसलिए सभी को
समान रूप से नागरिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए व सभी नागरिक कानून के सम्मुख बराबर
होने चाहिए।
                                                          लघु उत्तरात्मक प्रश्न
                                          (Short Answer Type Questions)
प्रश्न 1. समानता किन तीन तत्वों पर आधारित है ?
(On Which three elements is equality based ?)
उत्तर-समानता निम्नलिखित तीन आवश्यक तत्वों पर आधारित है-
(i) विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति-किसी व्यक्ति को वंश, लिंग, धर्म व स्थान के कारण
ऐसे विशेष अधिकारों की प्राप्ति न हो, जिनसे अन्य लोग वंचित हों।
(ii) सभी के लिए उचित अवसरों की प्राप्ति हो।
(iii) व्यक्तियों के बीच भेदभाव तर्कसंगत आधार पर हो।
प्रश्न 2. समानता का मार्क्सवादी दृष्टिकोण क्या है ? [B.M.2009A]
(What is Marxist view of equality ?)
उत्तर-समानता का मार्क्सवादी दृष्टिकोण (Marxist view of Equality)-समानता के
मार्क्सवादी दृष्टिकोण में आर्थिक रूप से समानता पर बल दिया जाता है। उनके अनुसार जब
सम्पत्ति कुछ ही व्यक्तियों के हाथ में केन्द्रित हो जाती है तो समाज में विषमता पैदा होती है और
राजनीतिक सत्ता भी कुछ ही व्यक्तियों के हाथ में आने लगती है। इसलिए सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण
होना चाहिए ताकि समाज के सभी लोग आर्थिक समानता का उपभोग कर सकें।
प्रश्न 3. व्यवहार की समानता से आपका क्या अभिप्राय है?
(What do you understand by equality of treatment ?)
उत्तर-व्यवहार की समानता (Equality of Treatment) साधारण शब्दों में व्यवहार
की समानता का यह अर्थ है कि राज्य अथवा सरकार द्वारा किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग
के पक्ष या विपक्ष में किसी प्रकार का कोई पक्षपात न किया जाए। राज्य द्वारा अपने नागरिकों के
साथ समान व्यवहार किया जाए। जाति, धर्म, लिंग, जन्म-स्थान आदि के आधार पर उनमें किसी
प्रकार का भेदभाव न किया जाए।
प्रश्न 4. “सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
(“All men are born equal.” Discuss.)
उत्तर-सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं (All men are born equal)—यह बात साधारण
तौर पर भी कही जाती है और अमेरिका के स्वतंत्रता घोषणा-पत्र में भी कही गयी है। सब व्यक्ति
समान पैदा हुए हैं। फ्रांस की राष्ट्रीय सभा में,मानवीय अधिकारों की घोषणा में इस समानता को
स्वीकार किया गया है कि “मनुष्य जन्म से समान पैदा होते हैं और अपने अधिकारों के सम्बन्ध
में समान ही रहते हैं।” परन्तु इसका आशय यह भी नहीं है कि सब व्यक्ति पूर्ण रूप से समान
होंगे। सबको समान नहीं बनाया जा सकता। गोरा-काला, छोटा-बड़ा, बुद्धिमान-निर्बुद्धि सभी प्रकार
के व्यक्ति होते हैं।
प्रश्न 5. “समानता के अभाव में स्वतंत्रता निरर्थक है।” अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए।
(“Liberty is meaningless without equality.” Do you agree with this view ?
Give reason for your answer.)
उत्तर-लास्की के शब्दों में ‘जहाँ धनी और निर्धन, शिक्षित और अशिक्षित हैं वहाँ पर स्वामी
और दास सदैव पाए जाते है।’ (Wheer there are rich and poor, educated and
uneducated, we find always master and servant.)| समानता ही स्वतंत्रता को सुनिश्चित
करती है और उसे लाभदायक बनाती है। निर्बल व्यक्ति शक्तिशाली के सामने और निर्धन व्यक्ति
धनवान के सामने अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक प्रयोग नहीं कर सकता। जिसके पास धन की
शक्ति होती है उसके पास राजनीतिक शक्ति भी चली जाती है। अत: निर्धन व्यक्ति की स्वतंत्रता
वास्तविक नहीं रहती। जहाँ सामाजिक समानता नहीं मिलती वहाँ निम्न श्रेणी के लोगों की स्वतंत्रता
व्यर्थ और निरर्थक हो जाती है।
प्रश्न 6. समानता किसे कहते हैं ? सामाजिक समानता का वर्णन करें।
(What is equality ? Discuss social euality.)
उत्तर-लास्की ने कहा है कि “समानता का अर्थ सर्वप्रथम तो विशेषाधिकारों का अभाव
है और दूसरे उसका अर्थ है कि सभी लोगों को विकास के लिए उपयुक्त अवसर प्राप्त हों।”
सामाजिक समानता का अर्थ समाज में जाति, धर्म, रंग, वंश आदि के आधार पर भेदभाव
के बिना विकास के समान अवसरों की प्राप्ति है।
सामाजिक समानता (Social Equality) – सामाजिक समानता का अर्थ है कि समाज में
जाति, धर्म, वंश, रंग विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होना चाहिए। सबका सामाजिक स्तर समान होना
चाहिए। छुआछूत अवैध होनी चाहिए। अमेरिका में गोरे-काले का भेद आज भी सामाजिक
असमानता का प्रमाण है।
प्रश्न 7. प्राकृतिक समानता किसे कहते हैं?                                         
(What is Natural Equality ?)
उत्तर-प्राकृतिक समानता (Natural Equality)-कुछ लोग इस बात पर जोर देते हैं कि
“सभी व्यक्ति प्राकृतिक रूप से समान हैं” तथा कुछ धार्मिक परम्पराओं तथा विचारकों को समान
नहीं बनाया है। यहां तक कि जुड़वां भाई-बहनों में भी कुछ अन्तर मिलता है।

प्रश्न 8. समानता के राजनीति पक्ष का विवेचन कीजिए।                            (M. Imp.)
( (Describe the poltical dimension of equality.)
उत्तर-राजनीतिक समानता का अर्थ है कि राज्य में सभी नागरिकों को समान राजनैतिक
अधिकार प्राप्त होने चाहिए। प्रत्येक नागरिक को चुनाव में खड़ा होने का अधिकार होना चाहिए।
अपनी योग्यता के अनुसार सरकारी पद प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए। सरकार यदि
नागरिकों पर अत्याचार करती है तो प्रत्येक नागरिक को उसकी आलोचना करने का अधिकार
होना चाहिए। किसी भी नागरिक को उसकी जाति, रंग, लिंग, संपत्ति, शिक्षा तथा धर्म आदि के
आधार पर मतदान करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। एशिया और अफ्रीका
के सभी ऐसे बहुत से देश हैं जहाँ राजनीतिक समानता स्थापित नहीं हुई है।
प्रश्न 9. राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता में सम्बन्ध बताइए। (M. Imp.)
(Define the relation between political freedom and economic freedom.)
उत्तर-स्वंतत्रता और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं। लास्की का कहना है कि आर्थिक
समानता के बिना राजनैतिक स्वतंत्रता मात्र एक कल्पना है। इस कथन का आशय यह है कि जब
तक आर्थिक समानता स्थापित नहीं होती तब तक राजनैतिक स्वतंत्रता व्यर्थ होती है। इस आशय
को निम्न तर्कों द्वारा समझा जा सकता है-
(1) पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता से आर्थिक शोषण में वृद्धि होती है तथा उससे आर्थिक असमानता
पनपती है।
(ii) स्वतंत्रता का अर्थ मात्र बन्धनों का अभाव नहीं होता। बन्धन मुक्त स्वतंत्रता शक्तिशाली
की स्वतंत्रता होती है। ऐसी स्वतंत्रता से आर्थिक समानता नष्ट हो जाती है।
(iii) आर्थिक असमानता के वातावरण में व्यक्ति का विकास असम्भव होता है। हॉब्स का
कहना है कि भूख से मरते व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होता।
(iv) आर्थिक असमानता के अन्तर्गत लोकतंत्र की सफलता की आशा नहीं की जा सकती है।
प्रश्न 10. समानता की परिभाषा कीजिए। इसके विभिन्न प्रकार समझाइए।
(Define the equality.What are its type?)
उत्तर-समानता प्रजातंत्र का एक मुख्य स्तम्भ है। व्यक्तित्व के विकास के लिए यह एक
आवश्यक शर्त है। समानता का तात्पर्य ऐसा परिस्थितियों के अस्तित्व से होता है जिसके कारण
सब व्यक्तियों के विकास हेतु समान अवसर प्राप्त हो सके और इस प्रकार उस असमानता का
अंत हो सके, जिनका मूल कारण सामाजिक वैषम्य है। लास्की ने भी लिखा है कि समानता मूल
रूप में समानीकरण को एक प्रक्रिया है। समानता का आशय विशेषाधिकारों के अभाव से है और
इसका यह भी आशय है कि सभी व्यक्तियों को विकास हेतु समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।
स्वतंत्रता के समान ही समानता के अनेक प्रकार हैं जो निम्नलिखित हैं-
(1) सामाजिक समानता (Social Equality) – सामाजिक दृष्टि से सभी व्यक्ति समान होने
चाहिए और उन्हें सामाजिक उत्थान के सामन अवसर प्राप्त होने चाहिए।
(ii) नागरिक समानता (Civics Equality)- नागरिक समानता के दो भेद हैं। प्रथम राज्य
के कानूनों की दृष्टि से सभी व्यक्ति समान होने चाहिए। द्वितीय सभी व्यक्तियों को नागरिकता के
अवसर या नागरिक अधिकार एवं स्वतंत्रताएं समान रूप से प्राप्त होनी चाहिए।
(ii) राजनीतिक समानता (Political Equality)- राजनीतिक समानता का अभिप्राय
सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अधिकार एवं अवसर प्राप्त होने से है।
(iv) आर्थिक समानता (Economics Equality)-आर्थिक समानता से तात्पर्य है कि
मनुष्यों की आय में बहुत अधिक असमानता नहीं होनी चाहिए।
प्रश्न 11. राजनीतिक समानता क्या है ?
(What is political equality?)
उत्तर-राजनीतिक समानता का तात्पर्य है कि सभी नागरिकों को राज्य की राजनीतिक
प्रक्रियाओं को प्रभावित तथा उसमें भागीदारी करने का अवसर समान रूप से प्राप्त हो। हालांकि
यह धारणा सिर्फ लोकतान्त्रिक राज्य से ही सम्बन्धित होती है, नहीं तो राजतन्त्र, तानाशाही राज्यों
में लोकतन्त्र की इस राजनीतिक समानता के विचारधारा को उत्पन्न किया जाता है, वह वास्तव
में राजनीतिक समानता के गुण को प्रदर्शित करती है, अर्थात् इसके अलावा राज्य और व्यक्ति को
लेकर न्यायपूर्ण राजनीतिक समानता का अर्थ नहीं हो सकता है। लोकतन्त्रीय पद्धति में नागरिकों
की राजनीतिक समानता का तात्पर्य निम्न तथ्यों से पाया जाता सकता है। जैसे मतदान का अधिकार,
चुनाव में उम्मीदवार बनने का अधिकार, प्रार्थना पत्र का अधिकार, सार्वजनिक नियुक्ति जो राज्य
के माध्यम से हो उसे प्राप्त करने का सभी को समान अधिकार प्राप्त है। विचारों को स्वतन्त्रतापूर्ण
अभिव्यक्ति और राजनीतिक दलों का स्वतंत्रतापूर्वक निर्माण सम्बन्धी समानता सभी नागरिकों को
समान रूप से प्रदान की जाती है, जबकि ऐसी पद्धति राजनीतिक समानता को लेकर निरंकुशवादी
राज्यों के संदर्भ में नहीं पायी जाती है। अत: उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि
राजनीतिक समानता का वास्तविक अर्थ सिर्फ लोकतन्त्रीय पद्धति में दिए गए अर्थ के माध्यम से
स्पष्ट होता है।
प्रश्न 12. सामाजिक समानता के अर्थ को वर्णित करें।
( (Define the social equality.)
उत्तर-सामाजिक मानता का अर्थ-सामाजिक जीवन में सभी व्यक्तियों समान समझा
जाना चाहिए और धर्म, जाति, वंश, लिंग अथवा जन्म के आधार और स्थान पर किसी व्यक्ति
का व्यक्ति से कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए। सामाजिक समानता के अर्थ में समाज के सभी
अधिकार व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त हो सकें, यही सामाजिक समानता का मूलभूत
उद्देश्य है और इस तथ्य की वास्तविकता सिर्फ लोकतन्त्रीय समाज में ही है। भारतीय संविधान
में सामाजिक समानता को मूल अधिकार के तहत वर्णित किया गया है। अर्थात् अनुच्छेद 17 में
अस्पृश्यता को एक दण्डनीय अपराध माना गया है। सामाजिक समानता के मुख्यतः इन तथ्यों को
प्रबल रूप से स्थान दिया जाता है कि वंश, धर्म, जाति और वर्ण के आधार पर किसी को श्रेष्ठ
या किसी को हेय न समझा जाए। स्त्रियों और पुरुषों में किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव न
हो। अर्थात् सामाजिक समानता की मांग है कि स्त्रियों और पुरुषों को बराबर सम्मानजनक व्यवहार
प्राप्त होना चाहिए। सामाजिक समानता ही वास्तव में लोगों के बीच राजनीतिक समानता को उत्पन्न
करने का कारण बनती है। सामाजिक समानता की अवधारणा निरंकुश राज्य पद्धति में सम्भव नहीं
होती, क्योंकि वहाँ पर स्वतंत्रता, समानता और न्याय का कोई अर्थ नहीं रहता है, यहाँ पर यह
सब सम्बन्धित अधिकार केवल निरंकुश शासक वर्ग के लिये होते हैं। इस कारण सामाजिक
समानता की मूल अवधारणा केवल लोकतन्त्रीय पद्धति में ही सम्भव है।
प्रश्न 13. आर्थिक समानता से आप क्या समझते हैं ?
(What do you know about the economic equality ?)
उत्तर-आर्थिक समानता का मूल अभिप्राय रूसो के इस कथन में समझा जा सकता है, अर्थात्
रूसो ने कहा, “सरकार की नीति यह होनी चाहिए कि न तो अमीरों की संख्या बढ़ने पाये और
न ही भिखमंगों को।” अर्थात् यह कथन आर्थिक समानता के इस रूप को प्रदर्शित करता है कि
पूंँजी की व्यवस्था और उसका वितरण इस रूप में हो कि पूंजी किसी के शोषण का माध्यम न
बन जाए। सार्क्सवादी साम्यवाद ने इसी पूंजीवादी शोषण व्यवस्था को खत्म करने के लिए अपने
तरीके के वर्गविहीन समाज को आर्थिक समानता के साथ सम्बद्ध किया। आर्थिक समानता की
मूल अवधारणा यही थी कि समाज का कोई वर्ग दूसरे वर्ग का आर्थिक शोषण न कर सके
तथा इसके लिए आर्थिक समानता की यह मूल अवधारणा रही कि आर्थिक स्वतंत्रता सभी वर्गों
को इस रूप में प्रदान की गई कि हर व्यक्ति अपनी दक्षता से किसी को अन्यायपूर्ण तरीके से
आर्थिक स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। इसलिए आर्थिक समानता की मूल अवधारणा
ही आर्थिक समानता को न्यायगत अवधारणा बनी। इस आर्थिक समानता की अवधारणा को
लोकतन्त्रीय और समाजवादी देशों की शासन व्यवस्था में अपनाया जाता है, न कि निरंकुशवादी
व्यवस्था में।
                                                       दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न
                                        (Long Answer Type Questions)
प्रश्न 1. स्वतंत्रता और समानता में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
(Discuss the relationship between liberty and equality.)
अथवा, “समानता का तात्पर्य यह नहीं है कि सभी व्यक्तियों से समान व्यवहार किया
जाए।” व्याख्या कीजिए।
(“Equality does not mean equal treatment to all the people.” Discuss.)
उत्तर-समानता की भ्रामक धारणा (Wrong view of Equality)- कुछ लोग समानता
का यह अर्थ लगाते हैं कि जीवन के सभी क्षेत्रों में उन्हें समान होना चाहिए। सभी समान रूप
से शिक्षित हों, सबको समान धन प्राप्त हो, समान नौकरी करें तथा सब समान वेतन प्राप्त करें।
किन्तु यह धारणा प्रामक है। सबको समान नहीं बनाया जा सकता। हाथ की पांचों उंगलियाँ भी
समान नहीं होती हैं। ईश्वर ने भी सबको समान नहीं बनाया है। कोई गोरा, कोई काला, कोई छोटा,
कोई बड़ा, कोई दुर्बल है कोई सबल है, कोई बुद्धिमान है, और कोई मूर्ख है।
समानता का वास्तविक अर्थ (Correct view of Equality)- अब प्रश्न यह उठता है
कि समानता का वास्तविक अर्थ क्या है ? वास्तव में समानता एक ओर उस अवस्था का नाम
है जिसमें विशेषाधिकारों का अन्त कर दिया गया हो और दूसरी ओर सबको आत्मविकास के
समान अवसर प्राप्त हों। समान अवसरों की प्राप्ति से तात्पर्य केवल यह है कि सभी को बिना
अवरोध के विकास के समान अवसर प्राप्त हों।
प्रश्न 2. “नागरिक समानता स्वतंत्रता की पूर्व शर्त के रूप में” पर टिप्पणी लिखो।
(Write short note on “Civil equality as a precondition of freedom.”)
उत्तर-नागरिक समानता अर्थात् कानून के समक्ष समानता और सभी के लिए एक सा कानून
लागू होना स्वतंत्रता के उपभोग के लिए एक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक शर्त है। इसके बिना कोई
भी व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक उपभोग नहीं कर सकता नागरिक समानता अर्थात् किसी
भी व्यक्ति के साथ उसके वंश, जाति, धर्म,जन्म स्थान तथा लिंग के आधार पर कानून कोई
भेदभाव नहीं करेगा और कानून का उल्लंघन करने वाले सभी व्यक्तियों को, चाहे उनका सामाजिक
स्तर कुछ भी हो, समान दण्ड मिलेगा। कानूनी दृष्टि से समान समझे जाने पर ही प्रत्येक व्यक्ति
अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति कानून की परवाह न करे और कानून
उसका कुछ न बिगाड़ सके तो दह अन्य व्यक्तियों को स्वतंत्रता पर कुठाराघात कर सकता है।
जब कानून समान रूप से सब व्यक्तियों के जीवन तथा सम्पत्ति की रक्षा करता है तभी वह निर्भीक
होकर अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग वास्तविक रूप में कर सकता है। इस प्रकार नागरिक समानता
स्वतंत्रता की पूर्व शर्त है।
प्रश्न 3. क्या समानता तथा स्वतंत्रता परस्पर विरोधी हैं ? चर्चा कीजिए।
(Are equality and liberty opposed to each other ? Explain.)
अथवा, “समानता के अभाव में स्वतंत्रता निरर्थक है।” क्या आप इस कथन से
सहमत हैं?
(“Liberty is meaningless without equality.” Do you agree with this line?)
उत्तर-हाँ। स्वतंत्रता और समानता लोकतंत्र के मूल आधार हैं। दोनों के परस्परिक सम्बन्धों
का विवेचना निम्नलिखित है-
(क) स्वतंत्रता व समानता परस्पर विरोधी हैं (Liberty and equality are opposed
to each other)-इस विचाराधारा के प्रमुख समर्थक लॉर्ड एक्टन व डी. टाँकविल हैं। उनके
विचार में स्वतंत्रता और समानता दोनों एक साथ नहीं रह सकते, क्योंकि समानता व्यक्तिगत
स्वतंत्रता को नष्ट कर देती है। इन विचारकों ने निम्न आधारों पर स्वतंत्रता तथा समानता को
एक-दूसरे को विरोधी माना है-
(i) सभी मनुष्य समान नहीं हैं (All the individuals are not equal)-संसार में सभी
व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। असमानता प्राकृतिक देन है। कुछ व्यक्ति शक्तिशाली होते हैं
तो कुछ कमजोर। कुछ व्यक्ति बहुत बुद्धिमान होते हैं तो कुछ मूर्ख। इन असमानताओं के होते हुए.
सभी व्यक्तियों को समान नहीं समझा जा सकता।
(ii) समान स्वतंत्रता का सिद्धांत अनैतिक हैं (The theory of equal liberty is
irmoral)- सभी व्यक्तियों की मूल योग्यताएंँ समान नहीं होती। अत: सबको समान अधिकार
देना या समान स्वतंत्रता प्रदान करना अन्यायपूर्ण होगा।
(ख) स्वतंत्रता और समानता परस्पर विरोधी नहीं है (Liberty and equality are not
opposed to each other)- जो विचारक स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी न मानकर
एक-दूसरे का पूरक मानते हैं और इनका आपस में घनिष्ठ संबंध बतलाते हैं, उनमें रूसो, आर,
एच. टोनी व पोलार्ड प्रमुख हैं। रूसो के अनुसार, “विना स्वतंत्रता के समानता जीवित नहीं रह
सकती।” आर. एच. टोनी के अनुसार, “सम्पनता की प्रचुर मात्रा स्वतंत्रता की विरोधी नहीं वरन्
अत्यन्त आवश्यक है।” प्रो. पोलार्ड के अनुसार- “स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक ही
समाधान है और वह है समानता।”
ये विचारक अपने पक्ष में निम्नलिखित तर्क देते हैं-
(i) स्वतंत्रता और समानता का विकास एक साथ हुआ है (Liberty and equality
have grown simal-taneously) – स्वतंत्रता और समानता का सम्बन्ध जन्म से है। जब
निरंकुशता और असमानता के विरुद्ध मानव ने आवाज उठाई और क्रान्तियां हुई तो स्वतंत्रता और
असमानता के सिद्धांतों का जन्म हुआ।
(ii) दोनों के उद्देश्य समान हैं (Both have the same objectives)-दोनों का एक ही
उद्देश्य है और वह है-व्यक्ति के विकास के लिए सुविधाएँ प्रदान करना ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने
व्यक्तित्व का विकास कर सके। एक के बिना दूसरे का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। स्वतंत्रता के
विना समानता असम्भव है और समानता के बिना स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है।
निष्कर्ष (Conclusion) – स्वतंत्रता और समानता के आपसी सम्बन्धों के उपरोक्त विवेचन
का अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता व समानता एक-दूसरे के पूरक हैं,
क्योंकि दोनों का एक ही उद्देश्य है। दोनों ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करने के लिए उचित
वातावरण की व्यवस्था करती हैं।
प्रश्न 4. राजनीतिक समानता और आर्थिक समानता के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन
कीजिए।
(Describe the relationship between Poltical Equality and Economic
Equality.)
उत्तर-समानता के अनेक रूप हैं, परन्तु राजनीतिक समानता तथा आर्थिक समानता का
घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। राजनीतिक समानता का अर्थ है कि सभी नागरिकों को समान राजनीतिक
अधिकार प्राप्त हो, जबकि आर्थिक समानता का अर्थ है कि लोगों में कोई आर्थिक भेदभाव न
हो। राज्य में एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण न करे। समाजवादी दलों का आधार आर्थिक समानता
ही है। यदि आर्थिक समानता रूपी नींवें पक्की हैं तो राजनीतिक समानता रूपी भवन का निर्माण
भी मजबूत हो सकता है। यदि आर्थिक समानता न हो तो राजनीतिक समानता की कल्पना करना
ही व्यर्थ है। लास्की (Laski) के शब्दों में, “जहाँ धनी और निर्धन, शिक्षित और अशिक्षित हैं वहाँ
स्वामी और दास सदैव पाये जाते हैं।” (Where there are rich and poor, educated and
uneducated we find always musters and servants. — Laski).
वर्तमान काल में आर्थिक समानता ने एक महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। इसका अर्थ है कि
सभी व्यक्तियों को न्यूनतम आय की गारण्टी होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अनिवार्य
आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए। सभी लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान सरलता से सुलभ
हो जाए। शोषण का अन्त हो। इतिहास बताता है कि जब तक धनी व्यक्ति निर्धनों का शोषण
करते रहते हैं अथवा उन्हें शोषण करने की छूट रहती है तब तक समाज शोषक व शोषित, स्वामी
तथा सेवक, धनी और निर्धन- दो वर्गों में बंटा रहता है। शासन पर उन्हीं शक्तियों का नियन्त्रण
रहता है जो आर्थिक साधनों पर नियन्त्रण रखते हैं। शासन उन्हीं के इच्छानुसार चलता है। स्टालिन
के इस कथन में सच्चाई है कि “बेरोजगार व्यक्ति जिसे उसके परिश्रम का फल नहीं मिलता, जो
भूखा रहता है उसके लिए राजनीतिक समानता का कोई अर्थ नहीं।” केवल सिद्धांत रूप में सबको
वोट देने का अधिकार देने या चुनाव लड़ने या सरकारी पद पर चुने जाने का समान रूप से
अधिकार देने मात्र से कोई.व्यक्ति राजनीतिक स्वतंत्रता का उपभोग नहीं कर सकता जब तक कि
उसे आर्थिक रूप से भी समानता प्राप्त नहीं हो जाती। निर्धन राजनीति में सक्रिय भाग नहीं लेते।
उनको न्याय प्राप्त करने में भी कठिनाई होती है।

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