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bihar board class 11 sociology | ग्रामीण तथा नगरीय समाज

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bihar board class 11 sociology | ग्रामीण तथा नगरीय समाज

ग्रामीण तथा नगरीय समाज में सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक व्यवस्था
(Social Change and Social Order in Rural and Urban Society)
शब्दावली
• प्रौद्योगिकी-उन औजारों तथा प्रविधियों का ज्ञान जिनके द्वारा व्यक्तियों के द्वारा समाज की आवश्यकता हेतु कुछ वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है।
• उद्विकास-विकास-की वह प्रक्रिया जो समाज को धीरे-धीरे विकसित अवस्था में ले जाती है। परिवर्तन सामान्यतः सरल से जटिल तथा अनिश्चित से निश्चित दिशा में होता है।
• क्रांति-जब उन समूहों के मध्य होने वाले संघर्ष से समाज की आधारभूत संरचनाओं में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है।
• प्रगति-इच्छित दिशा में होने वाला विकास, जिसे सामजिक मूल्यों द्वारा स्वीकृति प्राप्त होती है।
• महानगर-जब कोई नगर सामाजिक तथा अर्थिक रूप से उपनगरों, कस्बों तथा ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ा हो।
• उपनगर-नगर का बाहरी क्षेत्र, जहाँ जनसंख्या का घनत्व कम पाया जाता है।
पाठ्यपुस्तक एवं अन्य महत्वपूर्ण परीक्षा उपयोगी प्रश्न एवं उत्तर
             अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. समाजिक परिवर्तन की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-जोन्स के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है जो सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक प्रतिमानों, सामाजिक अंत:क्रिया या सामाजिक संगठन के किसी पक्ष में अन्त या रूपांतर को वर्णित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।”
कोइनिंग के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन व्यक्तियों के जीवन प्रतिमानों में घटित होने वाले अंतरों को सूचित करता है।”
प्रश्न 2. सामाजिक परिवर्तन तथा सांस्कृतिक परिवर्तन से आप क्या समझते हैं?
अथवा, सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तः का अर्थ संक्षेप में समझाइए।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन : सामाजिक संस्थाओं, प्रस्थितियों, भूमिकाओं तथा प्रतिमानों में समय-समय पर होने वाले परिवर्तन की प्रक्रिया को सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है। इसके अंतर्गत परिवार, विवाह, नातेदारी आर्थिक-राजनीतिक, जनसंख्या आदि में होने वाले परिवर्तन सम्मिलित किए जाते हैं।
सांस्कृतिक परिवर्तन : सास्कृतिक परिवर्तन का तात्पर्य समाज की संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों से है। इसके अंतर्गत विचार, ज्ञान, मूल्य, नैतिकता, कला तथा धर्म आदि में होने वाले परिवर्तन सम्मिलित किए जाते हैं।
प्रायः सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तन की अवधारणाएँ एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रित होती हैं। दोनों ही पक्षों में होने वाले परिवर्तनों को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन कहते हैं।
प्रश्न 3. सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण कारक बताइए।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं:
(i) पर्यावरण, (ii) जनसंख्या, (iii) प्रौद्योगिकी, (iv) मूल्य तथा विश्वास, (v) प्रसार ।
प्रश्न 4. पर्यावरण सामाजिक परिवर्तन को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर-पारिस्थितिकी विज्ञान, जिसे सामान्य रूप से पर्यावरण कहते हैं, सामाजिक परिवर्तन पर काफी अधिक प्रभाव पड़ता है।
पर्यावरणीय दशाएँ सामाजिक परिवर्तन की गति को तीव्र तथा मंद कर सकती है। अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में सामाजिक परिवर्तन तीव्र गति से होते हैं। इसके विपरीत, भौगोलिक रूप से पृथक् क्षेत्रों में सामाजिक अंत:क्रिया बहुत कम होती है। ऐसे समाज अथवा क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से भी विकसित नहीं होते हैं। अतः ऐसे समाजों में सामाजिक परिवर्तन अत्यंत धीमे या आशिक होते हैं।
प्रश्न 5. सत्ता क्या है? यह कानून तथा प्रभुत्व से किस प्रकार संबद्ध है?
उत्तर-वियरस्टेड के अनुसार, “सत्ता शक्ति के प्रयोग का संस्थात्मक अधिकार है। वह स्वयं शक्ति नहीं है।
सी राइट मिल्स के अनुसार, “सत्ता का तात्पर्य निर्णय लेने के अधिकार तथा दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार को अपनी इच्छानुसार तथा संर्बोधत व्यक्तियों की इच्छा के विरुद्ध प्रभावित करने की क्षमता है।”
संप्रभुता या प्रभुत्व एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अवधारण है। इसका स्पष्ट संबंध शक्ति के साथ होता है और शक्ति सत्ता में निहित है इसलिए सत्ता का ही काम है। बिना सत्ता के कानून का निर्माण व पालन करना भी सत्ता का ही काम है। बिना सत्ता के कानून का पालन/निर्माण संभव नहीं है।
अत: हम कह सकते हैं कि सत्ता/कानून/प्रभुत्व सभी एक-दूसरे से संबंधित हैं।
प्रश्न 6. प्रौद्योगिक विकास किसी भी समाज में सामाजिक परिवर्तन लाने का महत्वपूर्ण कारक किस प्रकार है?
उत्तर-प्रौद्योगिक रूप से विकसित समाजों में सामाजिक अंत:क्रिया का क्षेत्र व्यापक होने के कारण सामाजिक परिवर्तन की गति तीव्र होती है जबकि परंपरागत समाजों अथवा प्रौद्योगिक रूप से पिछड़े समाजों में सामाजिक परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत मंद होती है। ऐसे समाजां में श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण नहीं पाया जाता है।
प्रश्न 7. नए सामाजिक मूल्य तथा विश्वास किस प्रकार सामाजिक परिवर्तन लाते हैं?
उत्तर-समाज में पाए जानेवाले परंपरागत सामाजिक मूल्यों तथा विश्वासों का नए सामाजिक मूल्यों तथा विश्वासों में संघर्ष होता है। नए तथा पुराने सामाजिक मूल्यों तथा विश्वासों में होने वाले संघर्ष से सामाजिक परिवर्तन होते हैं।
कार्ल मार्क्स का मत है कि धर्म तथा विश्वास परिवर्तन का विरोध करते हैं। भारत में हिंदुओं के संदर्भ में मैक्स वैबर का मत है कि उनमें उद्यमिता तथा पूंजीवादी दृष्टिकोण के अपेक्षित विकास न होने के कारण आर्थिक विकास की गति धीमी रही है।
प्रश्न 8. प्रसार किस प्रकार सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारक है?
उत्तर-विभिन्न संस्कृतियों के पारस्परिक संपर्क प्रसार के कारण ही सामाजिक मूल्यों, विचारों तथा प्रौद्योगिकी को एक समाज दूसरे समाज से ग्रहण करता है। इस प्रकार प्रसार सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारक है।
प्रसार के माध्यम से पिछड़े समाज प्रौद्योगिक रूप से उन्नत समाजों का अनुसरण करते हैं। इस प्रकार पिछड़े समाजों में भी सामाजिक परिवर्तन की गति तीव्र हो जाती है।
प्रश्न 9. सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप के विषय में दो बिंदु दीजिए।
उत्तर-सामाजिक परिर्वन के अनेक स्वरूप पाए जाते हैं। यथा उद्विकास, प्रगति तथा क्रांति आदि।
उद्विकास के माध्यम से परिवर्तन धीमी गति से होते हैं। उदाहरण के लिए सामाजिक संस्थाओं, जैसे परिवार और विवाह आदि में होने वाले परिवर्तन प्रगति के जरिए सामाजिक परिवर्तन धीमे अथवा तीव्र दोनों प्रकार के हो सकते हैं। क्रांति द्वारा होने वाले सामाजिक परिवर्तन अकस्मात तथा अप्रत्याशित होते हैं।
प्रश्न 10. सामाजिक परिवर्तन के एक कारक के रूप में उद्विकास की दिशा बताइए।
उत्तर-उद्विकास सामाजिक परिवर्तन की निरंतर तथा धीमी प्रक्रिया है। उद्विकास सामाजिक व्यवस्था को निश्चित दिशा प्रदान करता है। यह सामाजिक संरचना को सरलता से जटिलता की ओर ले जाता है।
उद्विकास की दिशा सैदव सरलता से जटिलता, समानता से असमानता तथा अनिश्चितता से निश्चितता की ओर होती है।
प्रश्न 11. क्रांति की परिभाषा दीजिए। सामाजिक परिवर्तन के एक प्रमुख कारक के रूप में इसका महत्व बताइए।
उत्तर-जॉन इ. कॉनक्लिन के अनुसार, “क्रांति समाज के राजनीतिक, आर्थिक तथा संस्तरण की व्यवस्थाओं में मूलभूत तथा तीव्र परिवर्तन लाती है।
क्रांति का प्रारंभ संघर्ष से होता है। यह संघर्ष हिंसात्मक स्वरूप भी ले सकता है। क्रांति के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं में अकस्मात् तथा आध परभूत परिवर्तन आ जाते हैं। कार्ल मार्क्स का मत है कि क्रांति के जरिए समाज में संरचनात्मक परिवर्तन आते हैं। क्रांति द्वारा लाए गए परिवर्तन व्यापक होते हैं।
प्रश्न 12. प्रगति की परिभाषा दीजिए। प्रगति की अवधारणा के प्रमुख तत्व बताइए।
उत्तर-लूम्ले के अनुसार, “प्रगति परिवर्तन है, लेकिन इच्छित अथवा अन्य दिशा में परिवर्तन है, न कि प्रत्येक दिशा में।”
हॉबहाउस के अनुसार, “सामाजिक प्रगति से मैं सामाजिक जीवन के उन गुणों की वृद्धि समझता हूं जिन्हें मनुष्य मूल्यों से आंक सके अथवा तर्कपूर्ण रीति से मूल्य जोड़ सके।”
प्रगति की अवधारणा के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं:
(i) लक्ष्य का स्वरूप, (ii) उस लक्ष्य से व्यक्तियों की दूरी।
प्रश्न 13. गांव, कस्बा तथा नगर एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर-सेंडरसन ने अपनी पुस्तक में स्पष्ट किया है कि एक गांव में स्थानीय क्षेत्र में लोगों की सामाजिक अंत:क्रिया और उनकी संस्थाएं सम्मिलित होती हैं। साथ ही गांव के खेतों के चारों ओर झोपड़ियां बनी होती हैं तथा उनमें वे निवास करते हैं। मानव की अनिवार्य आवश्यकताओं में से कुछ भी आपूर्ति ग्रामों से ही होती है। ग्रामों में कृषि उपज की प्राप्ति के बाद उसे कस्बों तथा नगरों में भेज देते हैं जिससे नगरों व कस्बों के लिए भोजन की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
कस्बा नगर का छोटा रूप है। कस्बे से ही नगर का विकास होता है। ग्राम-नगर-कस्बा एक-दूसरे के पूरक हैं। नगरों के उद्योग के लिए मानव संसाधन कस्बों से ही प्राप्त होते हैं जबकि कस्बों के लिए आवश्यक उत्पाद नगरों से। इस प्रकार दोनों का काम एक-दसरे के बिना नहीं चल सकता है।
प्रश्न 14. शक्ति से आप क्या समझते हैं? शक्ति के प्रकृति को निर्धारित करने वाले महत्वपूर्ण कारक बताइए।
अथवा, शक्ति पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-व्यक्ति सामाजिक जीवन में कुछ कार्यों को स्वेचछा से करता है तथा कुछ कार्यों को करने के लिए बाध्य होता है। शक्ति की अवधारणा में भौतिक तथा दबावात्मक पहलू पाए जाते हैं। शक्ति, सत्ता का अनुभवात्मक तथा भौतिक पहलू होता है। शक्ति के कारण ही संपूर्ण समाज तथा उसके सदस्य सत्ता के निर्णयों को बाध्यता अथवा दबाव के कारण स्वीकार करते हैं।
शक्ति की प्रकृति को निर्धारित करने वाले महत्वपूर्ण पहलू निम्नलिखित हैं-
(i) सामाजिक प्रस्थिति, (ii) सामाजिक प्रतिष्ठा,
(iii) सामाजिक ख्याति, (iv) शारीरिक तथा भौतिक शक्ति तथा (v) शिक्षा, ज्ञान तथा योग्यता ।
प्रश्न 15. सत्ता की परिभाषा दीजिए। सत्ता के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर-सत्ता की परिभाषा :
सी. राइट मिल्स के अनुसार सत्ता का तात्पर्य निर्णय लेने के अधिकार तथा दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार को अपनी इच्छानुसार तथा संबंधित व्यक्तियों की इच्छा के विरुद्ध प्रभावित करने की क्षमता से है।
रॉस का मत है कि सत्ता का तात्पर्य प्रतिष्ठा से है। प्रतिष्ठित वर्ग के पास सत्ता भी होती है।
सत्ता के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-
(i) प्रतिष्ठा, (ii) प्रसिद्धि, (ii) प्रभाव, (iv) क्षमता, (v) ज्ञान, (vi) प्रभुता, (vii) नेतृत्व तथा (viii) शक्ति
प्रश्न 16. शक्ति तथा सत्ता में मुख्य अंतर बताइए।
उत्तर-प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने शक्ति तथा सत्ता में अंतर बताया है। वैबर के अनुसार यदि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर उसकी इच्छा के विरुद्ध अपना प्रभाव स्थापित करता है तो इस प्रभाव को शक्ति कहते हैं। दूसरी तरफ, सत्ता वह प्रभाव है जिसे उन व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छापूर्वक स्वीकार किया जाता है जिनके प्रति इसका प्रयोग होता है। इस प्रकार सत्ता एक वैधानिक शक्ति है।
अतः हम सत्ता को सामाजिक रूप से प्रभाव कह सकते हैं। जब शक्ति को वैधता प्रदान कर दी जाती है तो वह सत्ता का स्वरूप धारण कर लेती है तथा व्यक्ति इसे स्वेच्छापूर्वक स्वीकार कर लेते हैं।
प्रश्न 17. पारंपरिक सत्ता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-पारंपरिक सत्ता को व्यक्तियों द्वारा आदतन स्वीकार किया जाता है। उनसे पहले के व्यक्तियों ने भी उसे स्वीकार किया था। अतः सत्ता का अनुपालन एक परंपरा बन जाता है।
परंपरागत सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत तथा अतार्किक होती है पारंपरिक सत्ता के प्रमुख उदाहरण है:
(i) जनजाति का मुखिया (ii) मध्यकाल के राजा तथा सामंत (iii) परंपरागत पितृसत्तात्मक परिवार का मुखिया आदि।
प्रश्न 18. करिश्माई सत्ता के विषय संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-करिश्माई सत्ता से युक्त व्यक्ति में असाधरण प्रतिभा, नेतृत्व का जादुई गुण तथा निर्णय लेने की क्षमता पायी जाती है। जनता द्वारा ऐसे व्यक्ति का सम्मान तथा उसमें विश्वास प्रगट किया जाता है। यही कारण है कि व्यक्तियों द्वारा करिश्माई सत्ता के आदेशों का पालन स्वेच्छापूर्वक किया जाता है। करिश्माई सत्ता की प्रकति व्यक्तिगत तथा तार्किक होती है। अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी आदि करिश्माई व्यक्तित्व थे।
प्रश्न 19. आधुनिक औद्योगिक समाज में सत्ता का स्वरूप बताइए।
अथवा, विवेकपूर्ण वैधानिक सत्ता के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-आधुनिक औद्योगिक समाजों में सत्ता का स्वरूप वैधानिक तथा तार्किक होता है। वैधानिक तथा तार्किक सत्ता औपचारिक होती है तथा इसके विशेषाधिकार सीमित तथा कानून द्वारा सुपरिभाषित होते हैं।
वैधानिक-तार्किक सत्ता की प्रकृति अवैयक्तिक तथा तार्किक होती है।
आधुनिक औद्योगिक समाजों में नौकरशाही को वैधानिक तार्किक सत्ता का उपयुक्त उदाहरण समझा जाता है।
प्रश्न 20. नगर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-नगर से अभिप्राय ऐसी केंद्रीयकृत बस्तियों के समूह से है जिसमें सुव्यवस्थित केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र, प्रशासिनक इकाई, आवागमन के साधन, संचार सुविधाएँ और अन्य नागरिक सुविधाएँ होती हैं। एक नगर में जनसंख्या का घनत्व भी अधिक होता है।
प्रश्न 21. नगरों में जनसंख्या का घनत्व क्यों बढ़ रहा है?
उत्तर-सर्वप्रमुख कारण से रोजगार की प्राप्ति है- अधिकतर कारखाने नगरों के पास ही स्थापित किए जाते हैं जिनमें काम करने के लिए लोग ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं और वे आकर नगर मे बस जाते हैं। इससे नगरों में जनसंख्या का घनत्व बढ़ जाता है।
प्रश्न 22. स्वतंत्रता से पूर्व ग्रामों की क्या स्थिति थी?
उत्तर-स्वतंत्रता से पूर्व भारतीय ग्रामों को स्थिति अच्छी नहीं थी। लोग गरीब थे, बेरोजगारी फैली हुई थी। अधिकतर ग्रामवासी कर्ज में डूबे थे। अशिक्षा, अंधविश्वास आदि फैले हुए थे। शिक्षा, चिकित्सा आदि की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं।
प्रश्न 23. ग्रामीण समुदाय से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-ग्रामीण समुदाय से अभिप्राय गामीण क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों से है जो मुख्य रूप से कृषि पर आधारित कार्यों को करके अपना जीवन-निर्वाह करते हैं।
प्रश्न 24. जजमानी व्यवस्था क्या है?
उत्तर-व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों से सेवाएँ प्राप्त करनी पड़ती है। सेवा लेने वाले और सेवा प्रदान करने वाले के बीच के संबंध को जजमानी प्रथा कहते हैं।
प्रश्न 25. व्यक्ति अपने पास-पड़ोस के लोगों से संबंध क्यों बनाते हैं?
उत्तर-व्यक्ति की आवश्यकताएँ असीम होती हैं जिन्हें वह अकेले पूरा नहीं कर सकता। उसे अपने पास-पड़ोस में रहने वाले लोगों से सहायता लेनी पड़ती है। वह न केवल सहायता लेता है वरन् आवश्यकता पड़ने पर सहायता देता भी है।
प्रश्न 26. भारत में कुल कितने नगर हैं?
उत्तर-1991 की जनगणना के अनुसार भारत में 5109 नगर थे। भारत में नगरों की सूचना राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न नियमों के अनुसार की जाती है। नगरों में नगर निगम, नोटीफाइड एरिया और नगरपालिका होती है। एक लाख से अधिक जनसंख्या वाली बस्ती नगर कहलाती है। 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगर महानगर कहलाते हैं। पाँच हजार से कम जनसंख्या वाले क्षेत्र को गांव कहते हैं।
प्रश्न 27. गाँव से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-गाँव मान्य और स्थायी पारस्परिक संबंधों द्वारा आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक एकीकृत समुदाय है। कृषि ही लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है। जजमानी व्यवस्था इसकी एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
प्रश्न 28. भारतीय ग्रामों की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर-भारतीय ग्रामों की निम्नलिखित विशेषता हैं-
(i) भारतीय ग्रामों का प्रमुख व्यवसाय कृषि है।
(ii) जनसंख्या का घनत्व कम है।
(iii) ग्रामवासियों का प्रकृति से प्रत्यक्ष संबंध है।
(iv) गाँव के सदस्यों का रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज और जीवन पद्धति एक जैसी है।
(v) सामाजिक गतिशीता कम पाई जाती है।
(vi) ग्रामों में सीमित आकार के कारण प्राथमिक संबंध पाए जाते हैं।
(vii) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म का प्रमुख स्थान है।
(viii) परंपराओं, प्रथाओं, जनरीतियों का सामाजिक नियंत्रण में अधिक प्रभाव है।
प्रश्न 29. संयुक्त परिवार प्रथा में क्या परिवर्तन आ रहे हैं?
उत्तर-संयुक्त परिवार प्रथा में आज क्रांतिकारी परिवर्तन आ रहे हैं। पहले परिवार के सभी सदस्य मिल-जुलकर खेतीबाड़ी का कार्य करते थे, परंतु औद्योगीकरण के साथ-साथ संयुक्त परिवार में पाई जाने वाली यह एकता नष्ट होती गई। नौकरी की खोज में लोग दूर-दूर स्थानों पर जाकर बसने लगे। संयुक्त परिवार विघटित होने लगा।
प्रश्न 30. वर्तमान काल में स्त्रियों की स्थिति में क्या परितवर्तन आ रहे हैं?
उत्तर-आज स्त्री शिक्षा प्राप्त कर रही है। नौकरी के अवसर पुरुष के साथ-साथ स्त्री को भी प्राप्त हो रहे हैं। अब स्त्रियाँ नौकरी कर रही हैं, ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुंच रही हैं इसलिए वे आर्थिक मामलों में परिवार पर कम निर्भर हैं। उनमें आत्मविश्वास और सम्मान की भावना बढ़ी है।
प्रश्न 31. आधुनिक युग मे धार्मिक जीवन में क्या परिवर्तन आ रहे हैं?
उत्तर-वैज्ञानिक आविष्कारों के साथ-साथ धार्मिक कट्टरता में कमी आई है। गाँव के लोग जो धार्मिक पूजा-पाठ में अधिक विश्वास करते थे आज उनके दृष्टिकोण में अंतर आ रहा है।
प्रश्न 32. आधुनिक युग में जाति व्यवस्था में क्या परितवर्तन आ रहे हैं?
उत्तर-आज विभिन्न जातियों के लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। परस्पर विवाह संबंध करते हैं और इच्छानुसार किसी भी पेशे को अपनाते हैं। आज समाज में ऊँच-नीच का स्तर जाति के आधार पर नहीं अपितु धन, शिक्षा या वैयक्तिक योग्यता पर आधारित है। राजनीति में जाति का महत्व बढ़ गया है।
प्रश्न 33. सांस्कृतिक जीवन में क्या परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं?
उत्तर-पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के प्रभाव के कारण स्त्रियों की शिक्षा में वृद्धि हो रही है। स्त्रियाँ आज पहले से अधिक रोजगार परक कार्यों में लगी हैं। प्रेम विवाह बढ़ रहे हैं। विवाह के पश्चात् विवाह-विच्छेदों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। पर्दा प्रथा समाप्त हो रही है। रहन-सहन और वेशभूषा पर पश्चिमी प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। भारतीय समाज में नैतिकता संबंधी अनेक परिवर्तन आ रहे हैं। अपराध, भ्रष्टाचार, झूठ व धोखाधड़ी आदि का अधिक बोलबाला है। नैतिकता की दृष्टि से समाज का स्तर गिरा है।
प्रश्न 34. महानर की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-महानगर से एक विशाल नगर और उसके चारों ओर उपनगरों का बोध होता है,
जैसे- राज्य की राजधानियाॅं।
प्रश्न 35. संयुक्त परिवार से क्या समझा जाता है?
उत्तर-संयुक्त परिवार से अभिप्राय एक ऐसे परिवार से है जिसमें दादा-दादी, पिता-माता, चाचा-चाची, भाई-बहन, चचेरे भाई-बहन आदि तीन या चार पीढ़ियों के लोग आपस में मिलकर रहते हैं। परिवार के सबसे बड़े सदस्य की आज्ञा का पालन करते हैं। सभी मिलकर परिवार का व्यय चलाने में सहयोग करते हैं।
                 लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन को अन्य प्रकार के परिवर्तनों से किस प्रकार अलग किया जा सकता है?
अथवा, सामाजिक परिवर्तन, परिवर्तन के अन्य प्रकारों से विशिष्ट क्यों है?
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन अपने आप में अन्य परिवर्तनों की अपेक्षा विशिष्ट है। इसका कारण है सामाजिक परिवर्तन से समाज के मूल्य और विश्वासों में भी परिवर्तन आ जाता है जबकि अन्य परिवर्तनों से ऐसा नहीं होता है। एच.एन. जॉनसन ने स्पष्ट किया है कि मूल्य के आधार पर सामाजिक संरचना में व्यापक पैमाने पर परिवर्तन होता है। उनके अनुसार यह आशा की जाती है कि सामाजिक मूल्यों का प्रभाव सामाजिक ढाँचे के विभिन्न पक्षों पर होता है। सामाजिक मूल्य सामाजिक प्रणालियों को विभिन्न रूपों में प्रभावित करते हैं। जॉनसन ने भारतीय परिवेश के आधार पर सामाजिक मूल्यों की व्याख्या की है। उदाहरण के लिए भारत में कोई भी व्यक्ति
जो साधु जीवन व्यतीत करता है, चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो उसकी सराहना की जाती है। निश्चित रूप से सामाजिक मूल्य एक आधारभूत सांस्कृतिक तत्व है तथा इसमें बदलाव होने से चिरकालिक परिवर्तन के संकेत मिलते हैं।
प्रश्न 2. शक्ति क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-शक्ति व्यक्तियों और समूहों के बीच संबंधों का एक पक्ष है। एक व्यक्ति या समूह किसी दूसरे व्यक्ति या समूह की तुलना में शक्तिशाली हो सकता है। मैक्स वैबर के शब्दों में “व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के विपरीत या विरोध की स्थिति में भी सामुदायिक गतिविधि द्वारा इच्छापूर्ति की संभावना को शक्ति कहते हैं।”
शक्ति से तात्पर्य सत्ता अथवा प्रभाव से भी लगाया जा कसता है। कौटिल्य शक्ति शब्द का प्रयोग ‘बल’ के प्रयोग के रूप में करता है, “समस्त सांसारिक जीवन का आधार दंड शक्ति ही है।”
एक व्यक्ति की शक्ति वास्तव में उसका दूसरे व्यक्तियों के संबंध में यह प्रभाव है जो कि दूसरों पर डालने में समर्थ होता है। एक व्यक्ति जिस सीमा तक दूसरों को प्रभावित करता है, वह उसकी शक्ति है।
शक्ति मानवीय अंत:संबंधों को प्रभावित करती है। क्षमता रहित व्यक्ति शक्तिधारी नहीं हो सकता। शक्ति का उद्देश्य व्यवहार परिवर्तन से है।
प्रश्न 3. पारसंस के शक्ति संबंधी विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-पारसंस के अनुसार शक्ति एक सामाजिक संसाधन है। सत्ताधारी लोग उस शक्ति
का प्रयोग सबके हित के लिए सुनिश्चित करते हैं। शक्ति वह क्षमता है जिससे सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए समाज के संसाधनों को संचालित किया जाता है। समान्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयासों से शक्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त की जाती है। शक्ति के प्रयोग का अर्थ है सहयोग और पारस्परिकता का उत्पन्न होना जो समाज के स्थायित्व के लिए आवश्यक है।
प्रश्न 4. सत्ता की प्रकृति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-मैक्स वैबर का मत है कि समाज में सत्ता का महत्वपूर्ण स्थान होता है। सत्ता द्वारा व्यक्ति अपने उद्देश्यों की प्राप्ति करता है। वही व्यक्ति अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होता है जिसके हाथ में शक्ति या सत्ता होती है। सत्ता समाज की संस्थापित व वैधानीकृत शक्ति है। सत्ता नियंत्रण को सर्वस्वीकृति प्राप्त होती है क्योंकि इसे उचित माना जाता है। शासित लोग यह मानते हैं कि सत्ता के माध्यम से शक्ति का प्रयोग उनके हितों में ही होती है न कि केवल शक्तिशाली लोगों के लिए जो सत्ता में स्थित हैं। सत्ता समाज के किसी एक व्यक्ति या वर्ग में
केन्द्रित हो सकती है, या यह पूरे समाज में फैली हुई हो सकती है। पारंपरिक समाजों में दोनों प्रकार के शक्ति वितरण के उदाहरण मिलते हैं। जैसे किसी राजा, अभिजात वर्ग या धार्मिक संस्था के मुखिया द्वारा प्रभावी शक्ति का प्रयोग तथा रिवाजों के अनुसार सारे समाज में वितरित शक्ति।
प्रश्न 5. आधुनिक समाज में राज्य की शक्ति का विवरण दीजिए।
उत्तर-आधुनिक औद्योगिक समाज में शक्ति राजकीय संस्थाओं में केंद्रित होती है और इसके नागरिकों में बंटी होती है। मैक्स वैबर के अनुसार राज्य, लोगों की एक ऐसी संस्था है जिसे एक निश्चित क्षेत्र भौतिक बल के प्रयोग का वैधानिक रूप से एकाधिकार प्राप्त है। राज्य सामाजिक नियंत्रण की ऐसी इकाई है जिसे अपने कार्य को करने के लिए कानून का संरक्षण प्राप्त है। भौतिक बल के प्रयोग से राज्य समाज में अनुशासन और व्यवस्था कायम करता है। राज्य के
अधीन पुलिस, सेना और न्यायपालिका जैसी संस्थाएँ जो सामाजिक नियंत्रण के लिए प्रयोग की जाती हैं। लोग अपने आप समाज और संविधान के मूल्यों और मानदंडों को स्वीकार करते हैं। राज्य एक ऐसा क्षेत्रीय समुदाय है जो प्रभुसत्ता संपन्न सरकार द्वारा नियमित हो और बाहरी नियंत्रण से मुक्त हो। राज्य की चार विशेषताएँ हैं, जनसंख्या, क्षेत्र, सरकार व प्रभुत्व। राज्य को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता की आवश्यकता होती है। इसका विकास ऐतिहासिक प्रक्रिया से होता है।
प्रश्न 6. राज्य के आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर-राज्य एक ऐसा क्षेत्रीय समुदाय है जो प्रभुसत्तात्मक सरकार द्वारा नियमित हो और बाहरी नियंत्रण से मुक्त हो। राज्य एक ऐसी संस्था है जिसे एक निश्चित क्षेत्र में भौतिक बल के प्रयोग का वैधानिक रूप से एकाधिकार प्राप्त है। इस संदर्भ में राज्य के निम्नलिखित तत्वों का उल्लेख किया जा सकता है:
(i) जनसंख्या : सभी राज्यों में जनसंख्या का अस्तित्व होता है किसी राज्य की जनसंख्या राज्य की प्राकृतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि परिस्थितियों के ही अनुसार होती है।
(ii) निश्चित क्षेत्र : राज्य का एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है जहाँ पर राज्य का अधिकार होता है। क्षेत्रीय सीमाएँ घटती-बढ़ती हैं परंतु फिर भी उसका रूप निश्चित होता है।
(iii) सरकार : राज्य के संचालन व नियमन के लिए सरकार होती है। सरकार के अभाव में न तो राज्य की शक्ति को व्यावहारिक रूप प्रदान किया जा सकता है और न जनता पर नियंत्रण रखा जा सकता है। सभी राज्यों में सरकार का स्वरूप भिन्न होता है। कहीं पर प्रजातांत्रिक सरकार होती है तो कहीं कुलीनतंत्र होता है। राज्य के लिए सरकार अनिवार्य है।
(iv) प्रभुसत्ता : सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए, राज्य के आदेशों की अवहेलन करने तथा बाहरी आक्रमणों की स्थिति में राज्य अपनी शक्ति का प्रयोग करता है। राज्य बिना सर्वोच्च अधिकार के नागरिकों को सरकार द्वारा निर्मित कानूनों को पालन करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
प्रश्न 7. ग्रामीण जीवन में सामुदायिक भावना के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-ग्रामीण जीवन कृषि पर आधारित है। कृषि एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें सारा ग्रामीण समुदाय एक-दूसरे पर निर्भर करता है। सभी लोग फसलों की बुआई, कटाई आदि में एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। ग्रामीण जीवन में सरलता और मितव्ययता एक महत्वपूर्ण विशेषता है। ग्रामों में अपराध और पथभ्रष्ट व्यवहार जैसे-चोरी, हत्या, दुराचार आदि बहुत कम होते हैं क्योंकि ग्रामीणों में बहुत सहयोग होता है। वे भगवान से भय खाते हैं और परंपरावादी होते हैं। ग्रमीण लोग नगरों की चकाचौंध और मोह से कम प्रभावित होते हैं और साधारण जीवन व्यतीत करते
हैं। उनके व्यवहार और कार्यकलाप गाँव की प्रथाओं, रूढ़िओं, जनरीतियों आदि से संचालित होते हैं।
प्रश्न 8. पर्यावरण से संबंधित कुछ सामाजिक परिवर्तनों के बारे में बताइए।
उत्तर-पर्यावरण निश्चित रूप से सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करता है। वास्तव में प्राणी के अतिरिक्त जो कुछ उसके चारों तरफ है वह उसका पर्यावरण कहलाता है। रॉस के अनुसार,”कोई भी बाहरी शक्ति जो हमें प्रभावित करती है, पर्यावरण कहलाती है।”
पर्यावरण तथा प्राणी एक-दूसरे से संबंधित होते हैं। विशेष पारिस्थितिकी दशाओं में समाज का विकास होता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “पर्यावरण जीवन के प्रारंभ से ही यहाँ एक उत्पादन कोशिकाओं में भी उपस्थित है।” जीवन तथा पर्यावरण को एक-दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता है। मेकाइवर तथा पेज के शब्दों में “जीवन तथा पर्यावरण को एक-दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता है। मेकाइवर तथा पेज के शब्दों में “जीवन तथा पर्यावरण, वास्तव में परस्पर संबंधी हैं।”
मानव जीवन में जहां एक ओर पर्यावरण से प्रभावित होता है वहाँ दूसरी ओर पर्यावरण को प्रभावित भी करता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार ” मनुष्य स्वयं को स्वयं के पर्यावरण के अनुकूल बनाता है।” सामाजिक पर्यावरण मनुष्य के मूल्यों तथा विचारों को निश्चित करता है। अनुकूल पर्यावरण में सामाजिक परिवर्तन की गति तीव्र होती है, जबकि प्रतिकूल पर्यावरण में सामाजिक परिवर्तन की गति मंद हो जाती है।
मनुष्य का सामाजिक व्यवहार किसी न किसी रूप में भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होता है। जो समाज भौगोलिक रूप से एकाको क्षेत्रों में बसे होते हैं, उनमें दूसरे समाजों की अपेक्षा कम सामाजिक अन्त:क्रिया पायी जाती है। ओडम का मत है कि “मनुष्य पृथ्वी की संतान है। उसे पृथक नहीं किया जा सकता है।” प्राकृतिक प्रकोप जैसे बाढ़, चक्रवात, समुद्री झंझावात
तथा सूखा आदि समाज में तेजी से परिवर्तन के लिए उत्तरदायी हैं।
प्रश्न 9. ग्रामीण और नगरीय आर्थिक जीवन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि उत्पादन का प्रमुख आधार है। पशुपालन और कुटीर उद्योग भी कृषि पर आधारित होते हैं। यह अनेक लोगों को जीवन निर्वाह का साधन है। ग्रामों में नकदी फसलें, खाद्य संस्करण और छोटे उद्योग भी व्यवसाय और आय को बढ़ने में सहायता करते हैं। आय का स्तर नीचा होता है। अत: उपभोग का स्तर भी नीचा होता है और लोगों की जीवन
पद्धति सरल होती है।
नगरों में उद्योग और सेवा क्षेत्रों का विकास होता है। यहाँ रोजगार के अच्छे साधन हैं। नगरों में श्रम विभाजन और विशेषीकरण पाया जाता है। श्रम की गतिशीलता व्यक्ति को आय के अधिक अवसर प्रदान करती है। यहाँ साक्षरता की दर अधिक है। नगरों में आय के अधिक अवसर विद्यमान हैं। अधिकतर लोग उद्योगों और कार्यालयों में काम करते हैं। नगरों की संस्कृति पर विदेशी भौतिकवाद और प्रौद्योगिकी का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। किसी व्यक्ति की आय और उसकी जीवन शैली से ही व्यक्ति का मूल्य आँका जाता है। नगरों में अनेक लोग गैर-कानूनी क्रियाओं द्वारा अधिक आय प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।
प्रश्न 10. ग्रामीण और नगरीय समुदाय की परिभाषा कीजिए।
उत्तर-सभ्यता के प्रारंभ में कुछ लोग एक निश्चित भू-भाग पर स्थायी रूप से प्राकृतिक वातावरण में रहने लगे। उसी भू-भाग को ग्रामीण समुदाय के नाम से पुकारा जाने लगा। मैरिल तथा एल्डरीज ने ग्रामीण समुदाय की परिभाषा देते हुए लिखा है कि “ग्रामीण समुदायों के अंतर्गत संस्थाओं और ऐसे व्यक्तियों का संकलन होता है जो छोटे से केन्द्र के चारों ओर संगठित होते हैं तथा सामान्य प्राथमिक संबंधों द्वारा जुड़े होते हैं।” ग्रामीण जीवन का अर्थ वह सामुदायिक
जीवन है जो अनौपचारिक, सरल तथा समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।”
नगरीय समुदाय की परिभाषा विद्वानों ने जनसंख्या के आकार तथा घनत्व को सामने रखकर की है। किंग्सले डेविस के अनुसार, नगर एक ऐसा समुदाय है जिसमें सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विषमता पाई जाती है तथा जो कृत्रिमता, व्यक्तिवादिता, प्रतियोगिता और घनी जनसंख्या के कारण नियंत्रण के औपचारिक साधनों द्वारा संगठित होता है।”
प्रश्न 11. ग्रामीण और शहरी जीवन में सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-ग्रामीण क्षेत्रों में सांस्कृतिक एकता होती है। सामान्य मूल्यों को उत्सवों, धार्मिक कर्मकांडों, पुरानी प्रथाओं के द्वारा शक्तिशाली बनाया जाता है। आज भी भारतीय गाँव सम्यता और संस्कृति के वाहक हैं। वहाँ सभी कार्य परंपरागत भारतीय पंचाग के द्वारा संचालित होते हैं। ग्रामीण परिवेश में बहुत कम नवीनता देखने को मिलती है। नगरों में नवीनता, अनुकूलता और अनुकरण की प्रवृति देखने को मिलती है। नगरों में अधिक खुलापन होता है। ऐसे परिवर्तन सरकारी ढाँचों के द्वारा प्रोत्साहित होते हैं और नगरों में ऐसी संस्थाएँ होती हैं जो इन परिवर्तनों को स्थायी बनाए रखती हैं।
प्रश्न 12. सामाजिक संगठन की दृष्टि से नगरों और ग्रामों की स्थिति में भेद बताइए।
उत्तर-ग्रामीण क्षेत्रों में संयुक्त परिवार का बहुत अधिक महत्व है। कृषि अर्थव्यवस्था होने के कारण कृषि कार्य के लिए अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती है। नगरों में संयुक्त परिवारों को पंसद नहीं किया जाता। यहाँ एकाकी परिवारों को पसंद किया जाता है। रिश्तेदारी के सबंधों को राजनीतिक या आर्थिक लाभ के लिए पसंद किया जाता है परंतु सदस्यों के निजी जीवन में
ये संबंध प्रायः कमजोर होते हैं। भारत में विवाह को अपनिवर्तनीय बंधन समझा जाता है। यह एक धार्मिक संस्कार है। ग्रामों में अंतर्जातीय विवाहों को अच्छा नहीं समझा जाता है। जबकि नगरों में प्रेम-विवाह, अंतर्जातीय विवाह बढ़ रहे हैं। नगरों में युवक-युवतियाँ अधिक आयु में विवाह कर रहे हैं। ग्रामीण जीवन में सामाजिक स्थिति जाति पर आधारित होती है। नगरों में जाति सहायक भूमिका निभाती है। ग्रामीण समाज परस्पर सहयोग की भावना और मित्रता के भाव पर आधारित होता है जबकी नगरों में लोग अपने पड़ोस में रहनेवालों से प्रायः संबंध नहीं रखते। यहां सहयोग और सहानूभूति की कमी देखने को मिलती है।
प्रश्न 13. कस्बे शहरों से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर-भारत में नगरीय क्षेत्रों का निर्धारण राज्य सरकारों द्वारा होता है और इसके लिए भिन्न-भिन्न राज्यों ने भिन्न-भिन्न मापदंड निर्धारित किए हैं। जनगणना के आधार पर भी शहरों को परिभाषित किया जाता है। जनगणना अधिकारियों द्वारा किसी स्थान को शहर या कस्वा घोषित करने के लिए अनलिखित मानदण्ड निर्धारित किए हैं:
(i) न्यूनतम जनसंख्या 5000 या उससे अधिक होनी चाहिए।
(ii) कम से कम 75 प्रतिशत वयस्क पुरुष जनसंख्या कृषि कार्यों में व्यस्त न होकर दूसरे कार्यों पर आश्रित हो।
(iii) जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. होना चाहिए। भारतीय जनगणना, आकार और जनसंख्या के घनत्व के आधार पर तीन प्रकार के आवासों का निर्धारण किया जाता है-
(i) वह आवास जिसकी जनसंख्या 1,00,000 या अधिक हो, नगर कहलाता है।
(ii) पांच हजार से एक लाख तक की जनसंख्या वाले स्थान कस्बा या शहर कहलाते हैं।
(iii) नगर की शासन व्यवस्था नगर महापालिका चलाती है, जबकि कस्बे की व्यवस्था नगर पालिका या गाँव की पंचायत चलाती है।
नगर और शहरों को एक साथ नगरीय वर्ग में तथा शेष आवासों को ग्रामीण वर्ग में रखा गया है। आकार, घनत्व, व्यवसाय-संरचना तथा प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर नगर और कस्बे के बीच अंतर रखा गया है।
प्रश्न 14. ग्रामीण जीवन में गरीबी और अशिक्षा के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-ग्रामीण जीवन में कृषक परिवारों की प्रधानता है। उनका प्रकृति से प्रत्यक्ष संबंध है। ग्रामीण परिवेश में परस्पर सहयोग व समुदाय का भाव होता है लेकिन ग्रामीण जीवन में गरीबी और अशिक्षा अंग्रेजों के शासनकाल से ही चली आ रही है। भूमि की गैर लाभकारी छोटी और बिखरी हुई जोतों के कारण गाँवों में निर्धनता बनी हुई है। अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई के साधनों का अभाव है। अधिकतर भूमि बंजर पड़ी है जो भूमि सरकार ने अधिग्रहण की है वह
उपजाऊ नहीं है। ग्रामीण जनसंख्या का एक बड़ा प्रतिशत गरीबी की रेखा के नीचे रहता है। अभी भी ग्रामीण मौलिक सुविधाओं से वंचित हैं। वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, आवागमन, संचार और उद्योगों की कमी है। यद्यपि सरकार ने स्वतंत्रता के पश्चात् ग्रामीण जीवन की स्थिति को सुध परने का बहुत प्रयास किया है परंतु कृषि की उत्पादकता और अन्य सुख-सुविधाओं की कमी के कारण ग्रामीण जीवन अभी भी निम्न स्तर का है।
प्रश्न 15. सामाजिक नियंत्रण की दृष्टि से ग्रामीण और नगरीय जीवन की तुलना करो।
उत्तर-सामान्य शब्दों में प्रत्येक व्यक्ति को समाज द्वारा मान्य आदर्शों व प्रतिमानों के अनुसार अपने को ढालना पड़ता है तथा उसी के अनुसार वह व्यवहार और आचरण करने के लिए बाध्य होता है। यह बाध्यता ही सामाजिक नियंत्रण कहलाती है। यह वह विधि है जिसके द्वारा एक समाज अपने सदस्यों और समूहों के व्यहावर का नियमन करता है।
मेकाइवर और पेज के अनुसार “सामाजिक नियंत्रण से अभिप्राय उस ढंग से है जिसमें कि समस्त सामाजिक व्यवस्था समन्वित रहती है और अपने को बनाए रखती है अथवा वह जिससे संपूर्ण व्यवस्था एक परिवर्तनशील संतुलन के रूप में क्रियाशील रहती है।”
सामाजिक नियंत्रण का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके द्वारा प्राचीन काल से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में सहायता मिलती है। सामाजिक नियंत्रण द्वारा पूर्वजों की अपनाई गई परंपराओं और रीति-रिवाजों को उनकी संतानें मानने के लिए बाध्य होती हैं।
ग्रामीण जीवन में परिवार, जाति और धर्म सामाजिक नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। ग्रामीण समुदाय के सभी लोगों को इन अनौपचारिक नियमों का पालन करना आवश्यक
होता है। इन नियमों की अवहेलना करने का साहस किसी में भी नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो ग्राम पंचायत उन लोगों को दंडित करती है।
नगरों में व्यक्ति सामाजिक नियंत्रण से मुक्त रहते हैं। नगर प्रायः अकेलेपन का भाव पैदा करता है। नगर का आकार जितना बड़ा होता है, उतनी ही बड़ी समस्या सामाजिक नियंत्रण की होती है। सामाजिक नियंत्रण के साधन भी जटिल हो जाते हैं। नगरों में न्यायिक सत्ता दबाब वर्ग के रूप में कार्य करती है।
प्रश्न 16. एकाकी परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-परिवार के आकार और इसमें सम्मिलित पीढ़ियों की संख्या के आधार पर परिवारों को संयुक्त परिवार और एकाकी परिवारों में विभाजित किया जाता है। सामान्य रूप से इस प्रकार के परिवारों में केवल दो पीढ़ियों के सदस्य ही पाए जाते हैं अर्थात् पति-पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चे।
एकाकी परिवार की परिभाषा देते हुए श्री.एम.एन. श्रीनिवास ने कहा है, “व्यक्ति, उसकी पत्नी और अविवाहित बच्चों वाले गृहस्थ समूह को प्रारंभिक अथवा एकाकी परिवार कहते हैं।”
एकाकी परिवार का आकार छोटा होता है। इसमें पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे रहते हैं। इस प्रकार के परिवार का संबंध दो परिवारों के साथ होता है। एकाकी परिवार एक स्वतंत्र सामाजिक इकाई है और हर मामले में केवल एक ही व्यक्ति का नियंत्रण रहता है। एकाकी परिवार के सभी सदस्यों के बीच मित्रों जैसे संबंध होते हैं। अपने-अपने कार्यों से निपटने के पश्चात् सभी सदस्य एक-दूसरे की सहायता करते हैं। इसमें माता-पिता की प्रधानता होती है।
जब तक बच्चों के विवाह नहीं हो जाते हैं उस समय तक माता-पिता बच्चों पर नियंत्रण रखते हैं। इन परिवारों में माता-पिता द्वारा ही बच्चों का समाजीकरण किया जाता है। बच्चों को भाषा, रहन-सहन और नियमित जीवन व्यतीत करने की शिक्षा परिवार में ही दी जाती है। एकाकी परिवारों में स्त्रियों की दशा अपेक्षाकृत ठीक रहती है। उनका स्थान ऊँचा और सम्मानजनक होता है। इन परिवारों में सामाजिक समस्याएँ अधिक नहीं होती।
प्रश्न 17. ग्रामीण समुदाय का अर्थ भारतीय संदर्भ में स्पष्ट करें?
उत्तर-भारत की आत्मा गाँवों में वास करती है। भारतवर्ष की 72 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों या गाँवों में निवास करती है। समाज शास्त्र में गाँव को ग्रामीण समुदाय के रूप में परिभाषित किया गया है। सैंडर्सन के अनुसार “एक ग्रामीण समुदाय वह स्थानीय क्षेत्र है, जिसमें वहाँ निवास करने वाले लोगों की सामाजिक अन्त:क्रिया और उनकी संस्थाएँ समिलित हैं, जिनमें वह खेतों के चारों ओर झोपड़ियो या गाँवें रहती हैं जो उनके सामान्य गतिविधियों के केंद्र होते हैं।”
सामान्यत: गाँव या ग्राम ऐसे परिवारों के समूह होते हैं जिनके प्रमुख व्यवसाय कृषि होते हैं। और जो कच्चे-पक्के मकानों में निवास करते हैं
ए.आर.देशाई के अनुसार- ” ग्राम एक रंगमंच है जहाँ ग्रामीण जीवन का प्रमुख भाग स्वंय प्रकट होते हैं और कार्य करते हैं; भारतीय संदर्भ पूर्णतः सत्य सिद्ध होता है।”
                  दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न स्वरूपों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन के स्वरूपः सामाजिक परिवर्तन व्यक्तियों के जीवन प्रतिमानों में होने वाले परिवर्तनों की ओर संकेत करता है। गर्थ तथा मिल्स के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन के द्वारा हम उसको संकेत करते हैं जो समय के साथ-साथ काया, संस्थाओं या उन व्यवस्थाओं से होता है जो सामाजिक संरचना व उनकी उत्पत्ति, विकास तथा पतन से संबंधित है।”
समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक परिवर्तन के निम्नलिखित स्वरूपों का उल्लेख किया गया है:
(i) उद्विकास, (ii) क्रांति तथा (iii) प्रगति ।
(i) उद्विकास : उद्विकास समाजिक परिवर्तन की धीमी प्रक्रिया है। उद्विकास से हाने वाला सामाजिक परिवर्तन लगातार परिवर्तन करते हुए सामाजिक संरचना का विकास सरलता से जटिलता की ओर करता है। उद्विकास की दिशा का स्वरूप निम्नलिखित होता है:
(a) सरता से जटिलता की ओर, (b) समानता से असमानता की ओर तथा (c) अनिश्चितता से निश्चितता की ओर।
सामाजिक उद्विकास की परिभाषा करते हुए हाबहाउस ने कहा है कि ” सामाजिक उद्विकास नियोजित अथवा अनियोजित विकास को कहते हैं, जो सांस्कृतिक तथा सामाजिक संबंधों के स्वरूपों अथवा सामाजिक अंत:क्रियाओं के स्वरूपों का होता है।”
ऑगस्त कोंत ने सभी समाजों में विकास की निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ बतायी हैं-
(i) धार्मिक अवस्था, (ii) अध्यात्मिक अवस्था तथा (iii) प्रत्यक्षवादी अवस्था।
हरबर्ट स्पेंसर ने सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत योग्यतम की उत्तरजीविता को आधार बनाया।
लेविस हैनरी मोर्गन ने अपनी पुस्तक ‘एनसिएंट सोसाइटी’ में उद्विकास की तीन अवस्थाएँ बतायी हैं- (i) जंगली अवस्था, (ii) बर्बरता की अवस्था तथा (iii) सभ्यता की अवस्था।
(ii) क्रांति : उद्विकास की भाँति क्रांति भी सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया है। उद्विकास में सामाजिक परवर्तन मंद गति से होते हैं, जबकि क्रांति में सामाजिक परिवर्तन तेजी से तथा प्रायः अकस्मात होते हैं। जॉन ई. कॉनक्लिन ने क्रांति की परिभाषा देते हुए लिखा है कि “क्रांति समाज के राजनीतिक, आर्थिक तथा संस्तरण की यवस्थाओं में आधारभूत तथा तीव्र परिवर्तन लाती है।”
क्रांति का संघर्ष सामाजिक परिवर्तन का वाहक है। इस संघर्ष का स्वरूप हिंसात्मक भी हो सकता है। क्रांति का प्रारंभ राजनीतिक समूहों तथा वर्गों के बीच होता है। क्रांति के माध्यम से राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक संस्थाओं में मौलिक परिवर्तन होते हैं।
कार्ल मार्क्स का मत है कि क्रांति के माध्यम से समाज में संरचनात्मक परिवर्तन आते हैं। क्रांति का स्वरूप राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक या प्रौद्योगिक हो सकता है लेकिन इसके द्वारा समाज में व्यापक परिवर्तन लाए जाते हैं।
विद्वानों के द्वारा क्रांति के दो उपागम बताए गए हैं:- (i)जैविकीय उपगाम, (ii) संरचनात्मक उपागमा
1776 की अमेरिकन क्रांति, 1789 की फ्रांसीसी क्रांति तथा 1917 की रूसी क्रांति विश्व की प्रमुख क्रांतियाँ हैं।
(iii) प्रगति : समाज की गतिशील पहलू, उद्विकास, विकास तथा प्रगति के माध्यम से प्रतिबंधित होता है। प्रगति सामाजिक गतिशीलता का केन्द्रीय तत्व है।
ऑगस्त कोंत के अनुसार प्रगति, भौतिक, नैतिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक हो सकती है। लूम्ले के अनुसार, “प्रगति परिवर्तन है लेकिन यह इच्छित तथा स्वीकृत दिशा में परिवर्तन है, न कि प्रत्येक दिशा में परिवर्तन।’ गुरविच तथा मूर के अनुसार, प्रगति स्वीकृत मूल्यों के संदर्भ में इच्छित उद्देश्य की ओर बढ़ना है।” वार्ड के शब्दों में, “प्रगति उसे कहते हैं जो मानव संख्या में वृद्धि करती है।”
हाबहाउस के अनुसार, उविकास से मैं सामाजिक जीवन के उन गुणों की वृद्धि समझता हूँ जिन्हें मनुष्य मूल्यों से संबद्ध कर सके अथवा तर्कपूर्ण तरीके से मुल्य जोड़ सके।
प्रगति का तात्पर्य विशिष्ट साध्य की ओर तथा आदर्श की ओर सूचित करने से है। वस्तुतः प्रगति की अवधारणा में श्रेष्ठता की ओर परिवर्तन का तत्व निहित है।
उपरोक्त वर्णन के आधार पर प्रगति के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं:
(i) प्रगति किसी विशिष्ट दिशा में परिवर्तन है।
(ii) प्रगति के माध्यम से वांछित लक्ष्य की पूर्ति की जाती है।
(iii) प्रगति सामूहिक रूप से होती है।
(iv) प्रगति के लिए संकल्प तथा इच्छा आवश्यक है।
(v) एक अवधारणा के रूप में प्रगति परिवर्तनशील है। प्रगति के चिन्ह सदैव बदलते रहते
(vi) प्रगति मनुष्य के सचेत प्रयत्नों का परिणाम है।
प्रश्न 2. संरचनात्मक परिवर्तन से आप क्या समझते हैं? पुस्तक से अलग उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-हैरी एम. जॉनसन के अनुसार सामाजिक परिवर्तन अपने संकुचित अर्थ में सामाजिक
संरचना में परिवर्तन है। हैरी. एम. जॉनसन ने सामाजिक संरचना में परवर्तन के निम्नलिखित
पाँच प्रकारों का उल्लेख किया है:
(i) सामाजिक मूल्यों में होने वाला परिवर्तन,
(ii) संस्थाओं में होने वाला परिवर्तन,
(iii) संपदा तथा पुरस्कारों के वितरण में होने वाला परिवर्तन, (iv) कार्मिकों में परितवर्तन,
(v) कार्मिकों की अभिवृत्तियों तथा योग्यताओं में परिवर्तन।
(ii) सामाजिक मूल्यों में होने वाला परिवर्तन : सामाजिक संरचना में परिवर्तन का तात्पर्य सामाज के मूल्यों तथा मानकों में होने वाले परिवर्तनों से है। सामाजिक मूल्य वस्तुतः सामाजिक भूमिकाओं तथा सामाजिक अंत:क्रियाओं को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इन समाजिक मूल्यों में परितर्वन के दूरगामी परिणाम सामाजिक व्यवस्था को प्रकार्यात्मकता पर अवश्य पड़ते हैं।
(ii) संस्थाओं में होने वाला परिवर्तन : संस्थाओं में होने वाले परितवर्तन अपेक्षाकृत अधिक निश्चित संरचनाओं में होते हैं। इन परिवर्तनों के अंतर्गत संगठनों, भूमिकाओं तथा भूमिकाओं की विषय-वस्तु सम्मिलित किए जाते हैं, इन्हें ही संस्थाओं में होने वाला परिवर्तन कहा जाता है। उदाहरण के लिए नगरीकरण तथा उत्तरोत्तर बढ़ती गतिशीतता के कारण संयुक्त परिवार व्यवस्था एकाकी परिवारों में परिवर्तित हो रही है। इससे एकाकी परिवारों के सदस्यों के मध्य अंत:संबध प्रभावित हुए हैं।
(iii) संपदा तथा पुरस्कारों के वितरण में होने वाला परिवर्तन : कुछ विशेष मामलों में संपदा तथा पुरस्कारों के वितरण में अत्यधिक निकट संबंध मिलता है लेकिन फिर भी दोनों स्थितियों में विश्लेषणात्मक अंतर पाया जाता है। उदाहरण के लिए व्यक्तियों को दिया जाने
वाला वेतन उनकी सेवाओं का पुरस्कार तथा स्वीकृति दोनों है। इसी संदर्भ में प्रतिष्ठा, ख्याति तथा प्रेम एवं स्नेह अमूर्त पुरस्कार हैं, जो निरंतर परिवर्तित होते रहते हैं। वास्तव में पुरस्कार एक प्रकार की शक्ति कहे जा सकते हैं जो निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।
(vi) कार्मिकों में परिवर्तन : सामाजिक परिवर्तन सामाजिक व्यवस्था की भूमिकाओं को धारण करने वाले कार्मिकों में परिवर्तन के कारण भी होता है। इस प्रकार के परिवर्तन मूल्यों को महत्वपूर्ण परिवर्तन कहते हैं। जो किसी विशेष सामाजिक पद पर आसीन होता है, उसकी
कार्यपद्धति भी विशिष्ट होती है इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमताओं तथा योग्यताओं के आधार पर अन्य व्यक्तियों से भिन्न होता है। कार्मिकों के परिवर्तन से मूल्यों तथ संस्थागत प्रतिमानों में परिवर्तन आता है उदाहरण के लिए, किसी संस्था के शीर्ष यक्ति के बदलने पर उस संस्था की कार्य पद्धति तथा अभिवृत्तियों व मूल्यों में परिवर्तन आ सकते हैं।
(v) कार्मिकों की योग्यताओं तथा मनोवृत्तियों में परिवर्तन : संरचनात्मक परिवर्तन कार्मिकों की मनोवृत्तियों में परिवर्तन होने से हो भी सकता है अथवा नहीं भी हो सकता है, उदाहरण के लिए, दूरदर्शन तथा दूरभाष के आविष्कारों ने न केवल परिवारों में वरन् सामाजिक व्यवस्था में अनेक परिवर्तन ला दिए हैं।
प्रश्न 3. सत्ता से आप क्या समझते हैं? शक्ति के वैधानिकरण के कौन-कौन से आधार हैं?
उत्तर-सत्ता का अर्थ
सी.राइट मिल्स के अनुसार सत्ता का तात्पर्य निर्णय लेने के अधिकार तथा दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार को अपनी इच्छानुसार तथा संबंधित व्यक्तियों की इच्छा के विरुद्ध प्रभावित करने की क्षमता से है।
रॉस का मत है कि सत्ता का तात्पर्य प्रतिठा से है। प्रतिष्ठित वर्ग के पास सत्ता भी होती है। सत्ता के प्रमुख तत्त्व हैं-
(i) प्रतिष्ठा, (ii) प्रसिद्धि, (iii) प्रभाव, (iv) क्षमता,
(v) ज्ञान, (vi) प्रभुता (vii) नेतृत्व तथा (viii) शक्ति।
मैक्स वैबर का मत है कि सत्ता वह प्रभाव है जिसे वे व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक स्वीकार करते हैं, जिनके प्रति इसका प्रयोग किया जाता है। सत्ता एक वैधानिक शक्ति है।
सत्ता समाज द्वारा स्वीकृत प्रभुत्व है। आधुनिक समाजों में राज्य के प्रमुख द्वारा प्रयोग किए जाने वाला बल वस्तुतः सत्ता है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि जब शक्ति को वैधता प्रदान कर दी जाती है तो यह सत्ता का स्वरूप धारण कर लेती है।
शक्ति के वैधानीकरण के विभिन्न आधार : प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने सत्ता के वैधानिकरण के निम्नलिखित तीन आधार बताए हैं-
(i) पारंपरिक सत्ता, (ii) करिश्माई सत्ता तथा
(iii) वैधानिक-तार्किक सत्ता।
(i) पारंपरिक सत्ता-
(a) पारंपरिक सत्ता को व्यक्तियों द्वारा आदतन स्वीकार किया जाता है।
(b) व्यक्तियों द्वारा किसी भी शक्ति को केवल इसलिए स्वीकार किया जाता है कि उनसे पहले के व्यक्तियों ने भी उसे स्वीकार किया था अतः सत्ता का अनुपालन एक परंपरा बन जाता है।
(c) परंपरागत सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत तथा अतार्किक होती है। पारंपरिक सत्ता के प्रमुख उदाहरण हैं:- (i) जनजाति का मुखिया, (ii) मध्यकाल के राजा तथा सामंत एवं (iii) परंपरागत पितृसत्तात्मक परिवार का मुखिया।
(ii) करिश्माई सत्ता- करिश्माई सत्ता से युक्त व्यक्ति में असाधारण प्रतिभा, नेतृत्व का जादुई गुण तथा निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता पायी जाती है। जनता द्वारा ऐसे व्यक्ति का सम्मान किया जाता है तथा उसमें विश्वास प्रगट किया जाता है। यही कारण है कि व्यक्तियों द्वारा करिश्माई व्यक्ति के आदेशों का पालन स्वेच्छापूर्वक किया जाता है। करिश्माई सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत
तथा तार्किक होती है। अब्राहम लिंकन, महात्मा गाँधी तथा लेनिन करिश्माई व्यक्तित्व थे।
(iii) वैधानिक-तार्किक सत्ता-(a) आधुनिक औद्योगिक समाजों में सत्ता स्वरूप वैध निक तथा तार्किक होते हैं।
(b) वैधानिक तथा तर्किक सत्ता औपचारिक होती है तथा इसके विशेषाधिकार सीमित तथा कानून के द्वारा सुपरिभाषित होते हैं।
(c) वैधानिक-तार्किक सत्ता का समावेश व्यक्ति विशेष में निहित न होकर उसके पद तथा प्रस्थिति में निहित होता है।
(d) वैधानिक-तार्किक सत्ता की प्रकृति अवैयक्तिक तथा तार्किक होती है। आधुनिक औद्योगिक समाजों में नौकरशाही को वैधानिक तार्किक सत्ता का उपयुक्त उदाहरण समझा जाता है।
प्रश्न 4. क्या आप इस बात से सहमत हैं कि तीव्र सामाजिक परिवर्तन मनुष्य के इतिहास में तुलनात्मक रूप से नवीन घटना है? अपने उत्तर के लिए कारण दें।
उत्तर-मानव एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में ही रह सकता है। समाज एक निरंतर परिवर्तनशील अवधारणा है। एच.एन. जॉनसन ने लिखा है “अपने मूल अर्थ में सामाजिक परिवर्तन का अर्थ सामाजिक संरचना में परिवर्तन से है।’ गिलिन एवं गिलिन ने अपनी रचना में सामाजिक परिवर्तन जीवन की मानी हुई रीतियों में परिवर्तन को कहते हैं।
जिस प्रकार समय की गति को कोई अवरुद्ध नहीं कर सकता है, ठीक उसी प्रकार परिवर्तन की धारा को कोई रोक नहीं सकता है। अति प्राचीन काल में, मानव समाज के विकास के आरंभिक चरण में मानव पैदल चलता था और लंबी दूरी को तय करता था। कालांतर में लकड़ी की गाड़ी का अविष्कार हुआ, सड़कों पर बैलगाड़ियाँ दौड़ने लगीं। घोड़े की सवारी सामने आई। हाथी पर बैठकर लोगों ने मंजिल तय करना आरंभ किया । इक्का, बघ्यी, तांगे का समय भी आया पहियों
के सहारे साईकिल चलने लगी। एक दिन पटरियाँ बिछ गईं और रेलगाड़ी का इंजन दौड़ने लगा। कार, बस, ट्रैक्टर देखते-देखते क्या-क्या नहीं आया? और एक दिन पक्षी की तरह आदमी के पंख लग गए और वह हवाई जहाज में उड़ने लगा, लोगों ने कहा चमत्कार हो गया। विज्ञान ने चमत्कार कर दिखाया, परंतु चमत्कार इससे भी अधिक हुआ। आंतरिक्ष में यात्रा की शुरुआत
हुई और यात्रियों ने चंद्रलोक की यात्रा पूरी की। चमत्कार और भी हो रहे हैं, विज्ञान का कमाल और भी होने वाला है। परिवर्तन का कदम और भी बढ़ने वाला है। परिवर्तन की गति तेज हुई है बाजारों में शेयर मार्केट की धूम मची हई है। सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव चल रहे हैं। येन, रूबल और डॉलर से बाजार में चकाचौंध बढ़ रही है। संसार में हर 30 मिनट में कोई न कोई परिवर्तन हो रहा है। निश्चित ही तीव्र समाजिक घटनाएँ अभूतपूर्व परिवर्तन है। इसका मूलभूत कारण विज्ञान की उन्नति है।
प्रश्न 5. कानून के उद्देश्य एवं प्रकार लिखिए।
उत्तर-कानून के उद्देश्य: कानून का उद्देश्य समाज में व्यक्ति का पूर्ण विकास करना है।
इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है:
(i) शांति और व्यवस्था : कानून का सबसे पहले, किंतु महत्वपूर्ण उद्देश्य शांति स्थापित करना होता है।
(ii) समानता उत्पन्न करना : कानून का दूसरा उद्देश्य समानता उत्पन्न करता है समानता से तात्पर्य समान अवसर से है। कानून समानता के सिद्धान्त पर आधारित रहता है और बिना भेदभाव के प्रत्येक नागरिक को विकास का समान अवसर प्रदान करना ही इसका उद्देश्य है।
(iii) व्यक्ति की रक्षा तथा विकास : व्यक्ति का विकास ही सामाजिक जीवन का उद्देश्य होता है। कानून का लक्ष्य व्यक्ति के जीवन, धन तथा स्वतंत्रता की रक्षा करना, तथा उसके विकास में आनेवाली बाधाओं को दूर करना है। कानून पैशाचिक प्रवृतियों पर प्रतिबन्ध
लगाकर व्यक्तियों को कुमार्ग पर जाने से रोकता है तथा उसकी भिन्न-भिन्न शक्तियों के विकास में सहायक होता है
(iv) आवश्यकताओं की पूर्ति : व्यक्ति के विकास के लिए भौतिक आवश्यकतों की पूर्ति आवश्यक है। जिस समाज में अधिकांश व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होगी, उस समाज के व्यक्तियों के व्यक्तित्व का विकास स्वप्नमात्र है। कानून का उद्देश्य यह है कि
ऐसी व्यवस्था करे जिससे नागरिकों की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हो।
(v) स्वतंत्रता की रक्षा : कानून का उद्देश्य मनुष्य की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है। प्रसिद्ध रोमन विद्वान सिसरो लिखता है, “हम स्वतंत्रत होने के लिए कानून के गुलाम बनते हैं।” मनुष्य की समात्रिक उन्नति के मार्ग में जो बाधाएं हैं, उन्हें दूर करने का नाम ही स्वतंत्रता है और यह स्वतंत्रता कानून द्वारा ही प्राप्त होती है। वस्तुत: कानून सामाजिक जीवन की सफलता की कुंजी है।
(vi) उद्योग-धंधों की रक्षा : कानून का एक उद्देश्य उद्योग धंधों को रक्षा करना भी है। कानून द्वारा ही व्यक्तिगत सम्पत्ति की रक्षा होती है और ऐसी व्यवस्था का निर्माण होता है, जिसमें विभिन्न व्यवसायों का विकास हो। कानून के बल पर लोग दूर-दूर स्थानों में जाकर पूँजी लगाते तथा वाणिज्य एवं व्यवसाय करते हैं।
कानून के प्रकार : राजनीतिक शास्त्र के अंतर्गत कानूनों का वर्गीकरण कई आधारों पर किया जाता है। कुछ विद्वान कानून का वर्गीकरण कानून-निर्माण करने वाली सत्ता के आधार पर करते हैं। कुछ विद्वान कानून का वर्गीकरण निजी या सार्वजनिक विशेषताओं के आधार पर करते हैं।
कानून के विभिन्न प्रकारों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है-
(i) राष्ट्रीय कानून : राष्ट्रीय कानून वे कानून हैं जिनका संबंध राज्य की भूमि, उसके निवासी तथा राज्य के अंतर्गत संगठित विविध समुदायों से होता है। राष्ट्रीय कानून संपूर्ण राष्ट्रीय जीवन को व्यवस्थित करते हैं।
(ii) अंतर्राष्ट्रीय कानून : अंतर्राष्ट्रीय कानून वे नियम हैं, जो विविध राज्यों के पारस्परिक संबंध निश्चित करते हैं। इसे राज्य एक राज्य के प्रति कैसा व्यवहार करे, इसका निर्णय अंतर्राष्ट्रीय कानून के ही अंतर्गत होता है। विज्ञान की प्रगति तथा यातायात की सुविधाओं के कारण अंतर्राष्ट्रीय कानून में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। प्रो. हॉलैण्ड के अनुसार, “अंतर्राष्ट्रीय कानून आचरण के वे नियम हैं, जिनमें संपूर्ण सभ्य राष्ट्र पारस्परिक रूप अपने को बँधा हुआ समझते हैं और जिन नियमों में वह शक्ति होती है, जो मनुष्य की अंतरात्मा में होती है, जो उसे देश के नियमों के पालन के लिए प्रेरित करती है और जो उन राष्ट्रों के विचार में अपराध करने पर लागू हो सकते हैं। ओपेनहाइम के अनुसार, “अंतर्राष्ट्रीय कानून प्रथाओं ओर परंपराओं का वह समूह है, जो सभ्य राज्यों द्वारा अपने आपसी संबंध में कानूनी तौर पर बाध्य समझा जाता है।”
(iii) सांविधानिक कानून : प्रत्येक राज्य में दो प्रकार के कानून होते हैं। एक प्रकार के कानून से राज्य शासित होता है और दूसरे प्रकार के कानून द्वारा राज्य अपने नागरिकों पर शासन करता है। संवैधानिक कानून राज्य की शासन-व्यवस्था के आधार होते हैं। वे राज्य के कर्तव्य, राज्य-शासन का संगठन, उसमें विभिन्न अंगों के पारस्परिक संबंध और शासितों के अधिकारों तथा शासक और शासित के सबंध का नियमन करते हैं। सांविधानिक कानून लिखित और अलिखित दोनों होते हैं। ये कानून निर्मित या विकसित भी होते हैं।
(iv) साधारण कानून : संविधानिक कानूनों को छोड़कर राज्य के अन्य कानून साधारण कानून कहलाते हैं। इन कानूनों द्वारा राज्य नागरिकों का आचरण नियमित तथा नियंत्रित करता है। साधारण कानूनों के निर्माण सामान्यतः विधानमंडल द्वारा है, परंतु रीति-रिवाज, धर्मशास्त्र, नजीर इत्यादि भी इनके आधार होते हैं।
(v) व्यक्तिगत कानून : व्यक्तिगत कानून वे कानून हैं, जो मनुष्य के पारस्परिक संबंध निर्धारित करते हैं। व्यक्तिगत कानूनों का संबंध मनुष्य के सामाजिक जीवन से नहीं, अपतुि इनमें नागरिकों के परस्परिक संबंध का विश्लेषण रहता है। साधारण कानून केवल यह बताते हैं कि एक नागरिक का दूसरे नागरिक के साथ क्या संबंध होना चाहिए। दीवानी के कानून, जायदाद खरीदने या बेचने से संबद्ध कानून, कर्ज-संबधी कानून, विवाह-संबंधी कानून इत्यादि व्यक्तिगत कानून हैं।
(vi) सार्वजनिक कानून : सार्वजनिक कानून वे कानून हैं जो व्यक्ति का राज्य के साथ संबंध निर्धारित करते हैं। सार्वजनिक कानून के द्वारा नागरिकों को यह बताया जाता है कि उन्हें सार्वजनिक और सामाजिक क्षेत्र में किस प्रकार का कार्य नहीं करना चाहिए। उदाहरणार्थ, चोरी-डकैती, नरहत्या, धोखा इत्यादि रोकने के कानून सार्वजनिक कानून हैं। सार्वजनिक और व्यक्तिगत कानून का विभेद करते हुए हॉलैंड ने बताया, “ व्यक्तिगत कानून से संबंद्ध दोनों पक्ष नागरिक ही होते हैं और राज्य उनके बीच एक निष्पक्ष पंच का काम करता है। सार्वजनिक कानूनों में राज्य यद्यपि एक निष्पक्ष पंच के रूप में विद्यमान रहता है, तथापि वह दोनों संबद्ध पक्षों में एक पक्ष अपना ही रहता है।”
(vii) प्रशासकीय कानून : प्रशासकीय कानून वे कानून हैं, जिनसे सरकारी कर्मचारियों के पद, उत्तरदायित्व तथा अधिकारों का नियमन होता है। प्रो. डायसी के अनुसार, “ये (प्रशासकीय कानून) वे नियम हैं, जो राज्य के सभी कर्मचारियों के अधिकारों तथा कर्तव्यों को निश्चित करते हैं।” प्रो. गेटेल के अनुसार, “यह (प्रशासकीय कानून) सार्वजनिक कानून का वह अंश
है, जो प्रशासकीय अधिकारियों का संगठन और उनकी योग्यता का निर्धारण करता है और व्यक्तिगत
रूप में नागरिकों को उनके अधिकारों का उल्लंघन किए जाने की स्थिति में सुरक्षा का उपाय बताता है।” प्रशासकीय कानूनों को लागू करने के लिए प्रशासकीय न्यायालय पृथक होते हैं। इंग्लैंड, अमेरिका तथा भारत में सभी नागरिकों के लिए एक ही तरह के कानून हैं, अत: इन देशों में विधि का शासन है। फ्रांस, इटली, स्विटजरलैंड इत्यादि देशों में सरकारी कर्मचारियों के
पृथक न्यायालय एवं कानून हैं, जिन्हें प्रशासकीय कानून कहा जाता है।
(i) सामान्य कानून : प्रशासकीय कानून की तरह ही सामान्य कानून भी सार्वजनिक कानून के अंतर्गत आते हैं। सामान्य कानून राज्य तथा व्यक्तियों के बीच के संबंध का निश्चय करते हैं। इसके निम्नलिखित भेद हैं:
(a) संविधि : संविधि वे कानून हैं, जिनका निर्माण राज्य का कानून बनाने वाली संस्था दैनिक शासन करने के लिए करती है।
(b) अध्यादेश : अध्यादेश उन नियमों को कहते हैं, जो आसाधारण परिस्थितियों का सामना करने के लिए सरकार की कार्यकारिणी द्वारा बनाए जाते हैं। साधारणत: अध्यादेशों की अवधि तीन महीने, छह: महीने या एक वर्ष की होती है।
(c) नजीर या मुकदमे के कानून : नजीर या मुकदमे के कानून वे कानून हैं, जिन्हें न्यायाधीश मुकदमों पर विचार तथा निर्णय करते समय बनाते हैं। ऐसे कानूनों का प्रयोग वकील अपने मुकदमों के सिलसिले में करते हैं।
(d) प्रथागत कानून : प्रथागत कानून वे कानून हैं, जिनकी उत्पत्ति प्रथाओं या रीति-रिवाजों से होती है। ये कानून नहीं हैं लेकिन न्यायालय इन्हें अनुविहित कानून की तरह मान्यता प्रदान करते हैं।
प्रश्न 6. सामाजिक व्यवस्था से क्या आशय है? इसे कैसे बनाये रखा जाता है?
उत्तर-सामाजिक व्यवस्था का तात्पर्य : सामाजिक व्यवस्था का तात्पर्य सामाजिक घटनाओं की नियमित तथा क्रमबद्ध पद्धति से है। सामाजिक व्यवस्था संरचनात्मक तत्वों के मान्य संबंधों का कुलक है। समस्त सामाजिक संगठनों में सामाजिक व्यवस्था पायी जाती है। इसकी संरचना व्यक्तियों के बीच अंत:क्रिया से होता है। सामाजिक व्यवस्था वास्तव में भूमिकाओं का कुलक है। सामाजिक व्यवस्था के सभी अंग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से परस्पर जुड़े हुए होते हैं।
सामाजिक व्यवस्था समाज द्वारा व्यापक रूप से स्वीकृत मानका तथा मूल्या का समूह होती है। सामाजिक व्यवस्था के सदस्यों से सामाजिक मानकों के पालन करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति इन मानकों का सैदव पालन ही करें, वे इनसे विचलित भी हो सकते हैं।
सामाजिक व्यवस्था की परिभाषाएँ : मार्शल जोन्स के अनुसार, “सामाजिक व्यवस्था वह स्थित है, जब समाज की विभिन्न क्रियाशील इकाइयाँ परस्पर तथा संपूर्ण समाज के साथ अर्थपूर्ण तरीके से संबंधित होती है।”
पारसंस के अनुसार, “सामाजिक व्यवस्था अनिवार्य रूप से अन्तः क्रियात्मक संबंधों का जाल है।”
लूमिस के अनुसार, “ सामाजिक व्यवस्था सदस्यों की प्रतिमानित अंत:क्रिया से निर्मित होती है।”
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि-
(i) समाज में अनेक भाग पाये जाते हैं।
(ii) समाज के विभिन्न भागों में प्रकार्यात्मक संबंध पाये जाते हैं।
(iii) सामाजिक व्यवस्था का निर्माण समाज की संस्कृतिक के अनुसार होता है।
सामाजिक व्यवस्था की विशेषताएँ :
(i) सामाजिक अंत:क्रिया सामाजिक व्यवस्था का मुख्य आधार है।
(ii) सामाजिक व्यवस्था उद्देश्यपूर्ण अंत:क्रियाओं का परिणाम है।
(iii) सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न अंगों में क्रमबद्ध संबद्धता पायी जाती है।
(iv) सामाजिक व्यवस्था में विभिन्न तत्वों में पायी जाने वाली एकता का आधार प्रकार्यात्मक संबंध होते हैं।
(v) प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र, समाज तथा काल से जुड़ी होती है।
(vi) संस्कृति सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार होती है।
(vii) सामाजिक व्यवस्था द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
(viii) सामाजिक व्यवस्था में बदलती हुई परिस्थितियों से अनुकूलन की क्षमता होती है।
(ix) सामाजिक व्यवस्था द्वारा प्रकार्यात्मक संतुलन के माध्यम से सामाजिक जीवन में संतुलन बनाए रखा जाता है।
प्रश्न 7. अपराध के विभिन्न कारण क्या हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-मनुष्य अपराध क्यों करता है? इस प्रश्न का उत्तर देना सरल नहीं है। किसी मनुष्य के द्वारा अपराध करने के अनेक उद्देश्य हो सकते हैं। कभी-कभी अपराधी बिना किसी उद्देश्य के अपराध कर बैठता है। वास्तव में, अपराध एक प्रवृति है। जब कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसके अनेक कारण हो सकते हैं।
अपराध के कारण : अपराध के कारणों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है।
(i) भौगोलिक कारक, (ii) जैविकीय कारक,
(iii) आर्थिक कारक, (iv)वैयक्तिक कारक,
(v) सामाजिक कारक तथा (vi) अन्य कारक ।
(i) भौगोलिक कारक : भौगोलिकवादियों ने भौगोलिक पर्यावरण में अपराध के अनेक कारण खोजे हैं। उनके अनुसार भौगोलिक पर्यावरण अपराध को प्रोत्साहित करता है। भौगोलिकवादियों के अनुसार अपराध के कारण निम्नलिखित हैं:
(a) जलवायु : माण्टेस्कू जो एक प्रसिद्ध भौगोलिकवादि हुआ है, का विश्वास है कि भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर अपराधों की दरें भी बढ़ती जाती हैं। उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों की और बराबर होने पर मद्यपान अधिक देखा जा सकता है। भूगोलशास्त्रियों के अनुसार गर्म
तथा आर्द्र जलवायु भी अपराध की प्रकृति निश्चित करती है।
(b) प्राकृतिक अवस्थाएँ : अपराधशास्त्री साम्ब्रासो का कथन है कि पहाड़ी क्षेत्रों में मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक बलात्कार के अपराध होते हैं। उसका विश्वास है कि मैदानी क्षेत्रों में व्यक्ति से संबंधित अपराध अधिक होते हैं। इसी मत के अनुसार समुद्रतटीय प्रदेशों में अपेक्षाकृत अधिक अपराध होते हैं।
(C) ऋतुएँ : भूगोलशास्त्री यह भी मानते हैं कि एक विशेष ऋतु में एक विशेष प्रकार के उपराध होते हैं।
भूगोलशास्त्री लैकेसन ने अपराध तथा ऋतुओं में संबंध स्थापित किया है। उसका कथन है :-
(i) शिशु-हत्या के माह जनवरी, फरवरी, मार्च तथा अप्रैल है।
(ii) संपत्ति से संबंधित अपराध का माह जनवरी तथा दिसंबर है।
(iii) जून तथा जुलाई में बलात्कार तथा मानव-हत्या के अपराधा बढ़ जाते हैं।
(iv) युवतियों पर बलात्कार सबसे अधिक जून में तथा सबसे कम नवंबर में किए जाते हैं।
(v) उसने जनवरी तथा अक्टूबर के माह पितृ-हत्या के लिए बताए हैं।
इस प्रकार भूगोलशास्त्री भौगोलिक पर्यावरण को ही अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं परंतु आधुनिक समय में समाजशास्त्रियों के द्वारा इसे स्वीकार नहीं किया जाता। अपराधों के लिए भौगोलिक कारकों के अतिरिक्त अन्य परिस्थितियाँ भी उत्तरदायी हो सकती हैं।
(ii) जैविकीय कारक : कुछ विद्वानों के अनुसार अपराध का कारण व्यक्ति की जैवकीय विशेषताएँ होती हैं- अपराध करने से संबंधित उनके तर्क इस प्रकार हैं:
(a) वंशानुक्रम : कुछ विद्वानों, जिनमें लाम्ब्रासो प्रमुख है, का विश्वास है कि अपराध का एक मात्र कारण दोषपूर्ण वंशानुक्रम है। इसके अनुसार अपराधी जन्मजात होते हैं। वे जन्म से ही कुछ ऐसी विशेषताएं लेकर पैदा होते हैं जो अपराधी प्रवृति को बढ़ावा देती है। इस प्रकार लाम्ब्रोसों के अनुसार अपराध के सभी आधार वंशनुक्रम में निहित होते हैं। डगडेल का कथन
है कि चरित्रहीन माता-पिता की सन्तान भी चरित्रहीन होती है। उसने इस तथ्य का 1877 में ज्यूक्स के वंशजों का अध्ययन करके पता चलाया। सन् 1720 में जन्म लेने वाला ज्यूक्स एक चरित्रहीन व्यक्ति था। उसकी पत्नी भी उसी के समान चरित्रहीन थी। नन ने इसमें लिखा है, “5 पीढ़ियों के लगभग 1200 व्यक्तियों में से 300 की बचपन में मृत्यु हो गयी। 310 ने दरिद्रगृहों में जीवन वितम। 440 रोग के कारण मर गए। 130 दण्ड-प्राप्त अपराधी थे। केवल 20 ने कोई
व्यवसाय सीखा।”
(b) शारीरिक तथा मानसिक दोष : कुछ विद्वानों का कथन है कि शारीरिक दोष अपराध प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। शरीरिक विकृतियां; जैसे-लंगड़ाना, काना, बहरापन आदि किसी व्यक्ति को अपराधी बना देती है। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि शारीरिक ग्रंथियाँ मनुष्य में असंतुलन उत्पन्न कर देती है। ग्रंथियाँ किसी अपराध का कारण बन जाती हैं। इन ग्रंथियों से होने वाले स्राव की अधिकता या कमी संवेगात्मक तनाव तथा उत्तेजना उत्पन्न कर देती है। यह तनाव तथा उत्तेजना अपराध का कारण बन जाती है।
बाल अपराध का एक मुख्य कारण बालक का मंदबुद्धि होना है। मानसिक दुर्बलता अनेक
मानसिक दोषों को जन्म देती है। यही दोष अपराध के कारण बन जाते हैं। गोडार्ड का विश्वास है कि मंद-बुद्धि व्यक्ति अपने कार्यों के परिणामों के विषय में नहीं सोच पाते । वे उचित-अनुचित में भी भेद नहीं कर पाते। अत: उनका स्वभाव अपराधी-स्वभाव हो जाता है।
(c) लैंगिक भिन्नता : समाजशासत्रियों ने लिंग को अपराध का एक प्रमुख कारक माना है। संसार के सभी सभ्य समाजों में स्त्रियां उतने अपराध नहीं करती, जितने पुरुष करते हैं। यह बात सभी समूहों में, सभी प्रकार के अपराधों में तथा सभी आयु के व्यक्तियों में समान रूप से सत्य है। भारतीय कारागारों में पुरुष अपराधियों की संख्या स्त्री अपराधियों से कहीं अधिक होती है।
(d) आयु का प्रभाव : आयु भी अपराध का एक कारक है। एक विशेष आयु में, एक विशेष प्रकार के अपराध किए जाते हैं। युवकों की अपेक्षा बृद्ध अपसब कम करते हैं, परंतु वृद्धावस्था के अपराध यौन-अपराधों से संबंधित होते हैं। लगभग 20 से 25 वर्ष तक की आयु
के व्यक्ति डकैती, चोरी, गबन, जालसाजी तथा आवारागर्दी के अपराध करते हैं। 20 से 30 वर्ष की आयु के व्यक्ति यौन-अपराध अधिक करते हैं।
(iii) आर्थिक कारक : कुछ आर्थिक कारक भी अपराध के लिए उत्तरदायी होते हैं।
प्रमुख आर्थिक कारक इस प्रकार हो सकते हैं-
(a) निर्धनता : निर्धनता भी अपराध का एक मुख्य कारण है। निर्धन व्यक्ति अनेक प्रकार के आर्थिक अपराध कर बैठते हैंइसका कारण यह है कि निर्धन व्यक्ति अपनी मौलिक आवश्यकताएँ पूरी नहीं कर पाते। अन्य व्यक्तियों को आराम से रहता देखकर वे भी उसी प्रकार से रहने की कामना करते हैं। फलस्वरूप, वे चोरी करते हैं। जालसाजी तथा गबन आदि अपराध धन की कमी तथा बढ़ती हुई आवश्यकता के कारण ही किए जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति पर अकस्मात् उत्तरदायित्व आ जाता है तो वह इसे पूरा करने के लिए चोरी या गबन करता है। नौकरानी-पेशा व्यक्ति विवाह के पश्चात् प्राय: गबन करते देखे गए हैं।
(b) बेकारी : निर्धनता की भांति बेकारी भी अपराध प्रवृति को बढ़ावा देती है। बेकार व्यक्ति अपनी भोजन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाता। ऐसे व्यक्ति अपना पेट भरने के लिए अपराध करते देखे गए हैं। बालक केवल पेट भरने के लिए चोरी करते पकड़े गए
(c) औद्योगीकरण : जहाँ औद्योगीकरण से अनेक लाभ हुए हैं, वहां इसने अनेक समस्याएँ भी उपस्थित कर दी हैं। औद्योगीकरण के कारण श्रम की गतिशीलता में वृद्धि हुई है। नगरों का विकास हुआ है। नगरों की जनसंख्या में वृद्धि हुई है। जनसंख्या की वृद्धि ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया है। श्रमिक नगरों में अकेले ही आते हैं। उनके परिवार के सदस्य ग्रामों में ही निवास करते हैं। फलस्वरूप,श्रमिक मद्यपान तथा वेश्यावृत्ति जैसे आचरण करने लगते हैं। ये सीभी प्रवृतियां अपराध को बढ़ावा देती हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि श्रमिकों के पारिवारिक नियंत्रण में कमी आ गई है। वे बुरी संगत में पड़कर अनेक अपराध कर बैठते हैं।
(d) नगरीकरण : नगरीकरण ने अनेक समस्याएँ उपस्थित कर दी हैं। नगरीकरण के कारण निवास स्थान की कमी हो गयी है। गंदी बस्तियों का विकास हो गया है। नगरों में जनसंख्या तीव्रगति से बढ़ रही है; परंतु उस अनुपात में भवनों का निर्माण नहीं हो पा रहा है। स्थानाभाव के कारण पति-पत्नी तथा उनके बच्चे एक ही कमरे में रहते हैं। इस प्रकार बालकों को वे अनुभव प्राप्त हो जाते हैं जो उन्हें इस आयु में नहीं होने चाहिए। इस प्रकार उनका नैतिक पतन हो जाता
है। नैतिक पतन अपराध प्रवृति को बढ़ाता है।
नगरों में अनेक स्थान होते हैं जो अपराधों को बढ़ावा देते हैं। सिनेमा, नाइट-क्लब, कैबरे, शराबखाना, नाचघर, जुआ खेलने के अड्डे आदि व्यक्ति की अपराधी प्रवृति को उभारते हैं। नगरों की अत्यधिक भीड़ अपराधियों को छिपा लेती है। इसी कारण ग्रामों की अपेक्षा नगरों में
अधिक अपराध होते हैं।
(e) व्यापार चक्र : व्यापार में अनेक उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इसे ही व्यापार चक्र कहते हैं। व्यापार में उतार-चढ़ाव अपराध को बढ़ावा देता है। बांगर के अनुसार अनाज के मूल्य तथा अपराध में सीधा संबंध होता है। जब अनाज के भाव गिर जाते हैं तो अपराध-दर भी कम हो जाती है। अनाज के भाव बढ़ने पर अपराध की दर भी बढ़ जाती है।
(f) अनाज का उत्पादन : किसी वर्ष अनाज का उत्पादन कम होता है तो किसी वर्ष अधिक। अनाज का उत्पादन कम होने पर अपराधों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। जब अनाज अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है तो अपराध कम होते हैं।
(iv) वैयक्तिक कारक : किसी व्यक्ति के कुछ वैयक्तिक कारक भी अपराध के कारण बन जाते हैं। कुछ वैयक्तिक कारण निम्नलिखित हैं;
(a) शैक्षणिक योग्यता : एक सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित व्यक्तियों की अपेक्षा कम अपराध करते हैं परंतु कुछ गंभीर अपराध; जैसे-तस्करी, जालसाजी, गबन, भ्रूण-हत्या आदि अपराध शिक्षित व्यक्ति ही करते हैं। उनके द्वारा किए गए अपराधों की प्रकृति ऐसी होती है कि वे कानून की पकड़ में आसानी से नहीं आ पाते हैं।
(b) मद्यपान : मद्यपान भी अपराध का एक कारण माना जाता है। व्यक्ति शराब पीकर अपना आपा खो बैठता है और वह कोई भी अपराध कर बैठता है। वास्तव में, मद्यपान कोई अपराध नहीं है। इसे एक बुराई या समस्या माना जा सकता है परंतु मद्यपान अपराध को बढ़ावा देता है। मद्यपान के प्रभाव से मानसिक चेतना समाप्त हो जाती है। व्यक्ति उचित तथा अनुचित में भेद नहीं कर पाता। वह चोरी, डकैती, बलात्कार आदि कर बैठता है। होती होली बांगर का कथन है कि अधिकांश अपराधी, शसबी माता-पिता की संतान होते हैं।
निराशा, प्रेम में असफलता आदि व्यक्ति को शराबी बना देते हैं। कुछ अपराधों को करने से पूर्व खराब पीना आवश्यक होता है। कुछ विद्वानों के अनुसार, अपराध की सफलता के लिए यह आवश्यक समझा जाता है। इस प्रकार मद्यपान अपराध भी है और अपराध का कारक भी।
(v) सामाजिक कारक : अपराध के लिए सामाजिक कारक भी विशेष महत्वपूर्ण होते हैं। सामाजिक कारक निम्नलिखित हो सकते हैं।
(a) टूटे परिवार : परिवार से आशय उन परिवारों से है जहाँ या तो माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है या उनमें तालाक हो चुका है। इस प्रकार के परिवारों की परिस्थतियों अपराध व्यवहार को प्रोत्साहित करती हैं। इंग्लैंड में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि अधि कांश व्यक्ति शराब पीने लगते हैं या वेश्यागमन करने लगते हैं। इस प्रकार अपराध प्रवृति को बढ़ावा मिलता है।
(b) अपराधी परिवार : यदि परिवार के कुछ व्यक्ति अपराधी हैं तो अन्य व्यक्ति भी अपराधी हो सकते हैं। अन्य सदस्यों को देखकर बालक भी अपराध करना सीख जाते हैं ग्लयूक के एक अध्ययन से पता चलता है कि 84% अपराधी ऐसे परिवारों के थे जहां घर के अन्य सदस्य भी अपराधी थे।
(c) धर्म : धर्म स्वयं अपराध का कारण नहीं है। प्रत्येक धर्म सदाचरण की शिक्षा देता है। परंतु धर्म उस समय अपराध का कारण बन जाता है, जब व्यक्ति धर्मांध होकर सांप्रदायिक झगड़ा कर बैठता है। व्यक्ति धर्म की आड़ प्राय: अनेक अपराध करते है। धर्म के आधार पर ही अनेक जनजातियों में नरबलि दी जाती है। पुजारी भ्रष्टाचार में लिप्त रहते देखे गए हैं। आतंकवाद धर्म की आड़ में ही फलता-फूलता है।
(d) समाचार पत्र : समाचार-पत्रों में अनेक प्रकार के अपराधों के समाचार छपते हैं। समाचार-पत्रों से बालक अपराध करने के तरीके सीख जाते हैं। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से समाचार-पत्र अपराध करने को प्रोत्साहित करते हैं।
(e) चलचित्र : आजकल के चलचित्र कामुकता तथा अपराधों से भरे रहते हैं। बालक तथा बालिकाएं सिनेमा देखकर अपराध करने की ओर अग्रसर होते हैं। चलचित्र में व्यक्तियों का रहन-सहन का स्तर अत्यंत उच्च दिखाया जाता है। सिनेमा देखने वाले भी उसी प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। इसी प्रयत्न में वे अनेक अपराध कर बैठते हैं। सिनेमा में स्त्रियों का नग्न प्रदर्शन देखकर अनेक व्यक्ति अपना संतुलन खो बैठते हैं। नग्नता तथा कामुकता का प्रचार आधुनिक चलचित्रों की विशेषता है। चलचित्रों में अपराध करने की अनेक प्रविधियां दिखायी जाती हैं। ये प्रविधियां समाज में अपराधी व्यवहार में वृद्धि करती है।
(f) युद्ध : युद्ध भी अपराध का एक मुख्य कारण है। युद्ध काल में अपराधों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है। युद्ध के समय पुरुष युद्ध क्षेत्र में चले जाते हैं। स्त्रियों को उनके स्थान पर कार्य करना पड़ता है। बालक चोरी तथा अनेक यौन अपराध करने लगते हैं। व्यापारी वर्ग में भी युद्ध के समय चोर-बाजारी, मिलावट, नफाखोरी, धोखाधाड़ी, सामान को जमा करने आदि की प्रवृति बढ़ जाती है। यह प्रवृति अनेक समस्याओं को जन्म देती है। युद्ध के समय आर्थिक अपराध बढ़ जाते हैं। युद्ध के समय लड़कियां अधिक अपराध करते हुए पाई गई हैं। युद्ध के समय चारों ओर हिंसात्मक वातावरण रहता है। इससे तनाव तथा उत्तेजना बढ़ती है। ये बातें अपराध को बढ़ावा देती हैं।
(g) सामाजिक कुरीतियाँ : अनेक सामाजिक कुरीतियां; जैसे विधवा विवाह-निषेध, दहेज प्रथा, जातिवाद, अस्पृश्यता आदि अपराधों को बढ़ावा देती हैं। यदि किसी युवती-विधवा का विवाह नहीं किया जाता और वह संयम से रहने में असमर्थ है तो वह स्वाभाविक है कि वह यौन-अपराध कर बैठेगी। दहेज प्रथा भी अनेक प्रकार के अपराधों को जन्म देती है। कभी-कभी
माता-पिता दहेज न जुटा सकने की कारण अपनी पुत्रियों का विवाह बूढ़ों, विधुर या बीमार व्यक्यिों से कर देते हैं। ऐसी अवस्था में कुछ स्त्रियां आत्म हत्या कर लेती हैं। माता-पिता अपना पुत्रियों का विवाह करने के लिए कर्ज लेते हैं। वे जीवन भर उस कर्ज से दबे रहते हैं। इसी कारण अनेक समाजों में पुत्रियों को उनके माता-पिता जन्म होते ही मार देते हैं।
जाति प्रथा भी अनेक अपराधों को जन्म देती है। जातीय-संघर्ष, जातीय पक्षपात इसके परिणाम हैं। भारत में अस्पृश्यता एक भयंकर बुराई है। हरिजनों को किस प्रकार सताया जाता है, इसका उदाहरण हमें प्रतिदिन समाचार-पत्रों में मिलता रहता है। यह अपराध सामाजिक जीवन को कलंकित करता रहता है।
(vi) अन्य कारक : उपरोका वर्णित कारकों के अतिरिक्त कुछ अन्य कारक भी अपराध प्रवृति को बढ़ावा देते हैं। उनमें से कुछ कारक निम्नलिखित हैं:
(a) वैवाहिक स्थिति : कुछ व्यक्तियों का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं होता। विवाह-विच्छेद इसी का ही परिणाम होता है। प्रायः देखा गया है कि अविवाहित व्यक्ति तथा विधुर यौन अपराध अधिक करते हैं। ऐसे व्यक्तियों का पारिवारिक जीवन विघटित होता है। ये असानी से अपराध करने की ओर अग्रसर हो जाते हैं।
(b) मनोरंजन का अभाव : स्वस्थ्य मनोरंजन के अभाव में भी व्यक्ति अपराध कर बैठता है । कुछ व्यक्तियों का मनोरंजन ही अपराध करना होता है। वे बिना किसी उद्देश्य के अपराध कर बैठते हैं।
(C) धन का असमान वितरण : धन का असमान वितरण भी अपराध को जन्म देता है। हमारे समाज में एक ओर तो गगनचुम्बी भवन खड़े हैं तो दूसरी ओर झोपड़ियां हैं। निर्धन, निकों को देखकर स्वयं भी उसी प्रकार का जीवन यापन करना चाहते हैं परंतु धन के अभाव में वे ऐसा नहीं कर पाते। फलस्वरूप, धन कमाने की लालसा में वे चोरी, डकैती आदि आर्थिक अपराध कर बैठते हैं।
प्रश्न 8. अपराध ‘वैयक्तिक विघटन’ है? इसे कैसे रोका जा सकता है। अपने सुझाव दीजिए।
उत्तर-अपराध समाज के लिए गंभीर समस्या है। समाज को संगठित बनाए रखने के लिए अपराध को रोकना आवश्यक है। हम बता चुके हैं कि अपराध किए जाने का कोई एक कारण नहीं होता। अत: उसका निषेध भी आसान नहीं है।
अपराध की रोकथाम : अपराथ की रोकथाम के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं:
(i) अपराध निषेध के लिए शिक्षा का उपयुक्त वातावरण तैयार किया जाना चाहिए। उपयुक्त वातावरण होने पर समाज का वातावरण दूषित नहीं होगा तथा व्यक्तियों की अपराध की मनोवृत्तियों पर भी अंकुश लग सकेगा।
(ii) सामाजिक परिस्थितियों में सुधार लाया जाना चाहिए। सम्गज की परिस्थितियों में सुधार करके अपराध रोके जा सकते हैं। सपाज से जाति-प्रथा समाप्त की जानी चहिए। विधवा-विवाह पर लगा नियंत्रण समाप्त किया जाना चाहिए। समाज में बाल-विवाह की प्रथा समाप्त की जानी चाहिए। यदि सामाजिक परिस्थितियों में सुधार लाया जा सके तो अपराध की स्थिति में पर्याप्त सुधार लाया जा सकता है।
(iii) अपराध का एक कारण स्वस्थ्य मनोरंजन का अभाव बताया है। कुछ व्यक्ति मनोरंजन के लिए अपराध कर बैठते हैं। समाज में, यदि अस्वस्थ कर मनोरंजन के स्थान पर स्वस्थ मनोरंजन प्रदान किए जा सकें तो अपराध की प्रवृति पर रोक लगाई जा सकती है। समाज-विरोधी तथा अपराध प्रवृति को उकसाने वाले चलचित्रों पर भी रोक लगाई जानी चाहिए।
(iv). टूटे परिवारों की दशा सुधारी जानी चाहिए। सदरलैंड के अनुसार टूटे परिवारों की परिस्थितियों में सुधार करने पर अपराध प्रवृति पर अंकुश लगाया जा सकता है। भारत में विवाह परंपरागत विधि से ही होते हैं। इसके स्थान पर लड़के तथा लड़कियों को अपना जीवन-साथी स्वयं चयन करने की अनुमति दान की जानी चाहिए। इससे परिवार टूटने से बच सकेंगे।
(v.) लोम्ब्रोसो का कथन ‘ कि अपराधी उन्मजात होते हैं। वह वंशानुक्रम को ही अपराध का कारण मानता है। यदि यह सत्य है कि अपर धी जन्मजात होते हैं तो उनकी प्रजनन शक्ति को समाप्त कर देना चाहिए। जब वह बच्चों का उत्पन्न ही न कर सकेंगे तो समाज में अपराधी बालक उत्पन्न ही न हो सकेंगे, परंतु यह सुझाव व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता। अपराधी ऐसा
करने के लिए तैयार ही न होंगे।
(vi) अपराधी को ऐसी स्थिति में रखा जाना चाहिए कि अपराध की प्रवृति धीरे-धीरे समाप्त हो जाए, परंतु यह एक मनौवैज्ञानिक तथ्य है कि अपराधी की आदतों को एकदम नहीं तोड़ा जा सकता। नैतिक शिक्षा इसमें कुछ योग दे सकती है।
(vii) गंदी बरियाँ भी अपराध प्रवृति को बढ़ावा देती हैं। औद्योगिक नगरों में तो मुख्य कारण गंदी बस्तियाँ हा होती हैं। गंदी बस्तियों के निवासियों के लिए उचित आवास व्यवस्था करके अपराधी बनने से रोका जा सकता है। इस प्रकार औद्योगिक नगरों में अपराध की दर घटायी जा सकती है।
(viii) न्यायालय में कभी-कभी अपराधी छूट जाते हैं और निर्दोष दंड पा जाते हैं। क्या निर्दोष व्यक्ति को समाज के सभी सदस्यों के द्वारा अपराधी माना जाना चाहिए? क्या उसके साथ अपराधी जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? न्याय का यह तकाजा है कि उसकी परिस्थितयों का निरीक्षण किया जाए। उसकी हरसंभव ढग से सहायता की जानी चाहिए।
(ix) कुछ व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हैं। अपनी मानसिक विकृति के कारण ही वे अपराध कर बैठते हैं। ऐसे मानसिक रोगियों का उपचार किया जाना चाहिए। मानसिक रूप से स्वस्थ हो जाने पर ऐसे व्यक्ति अपराध नहीं करेंगे।
पर्यावरण तथा अपराध : लोम्ब्रोसो अपने कुछ अध्ययनों के आधार पर यह मत व्यक्ति
किया कि अपराधी जन्मजात होते हैं। परंतु आज के अधिकतर विद्वान इस मत से सहमत नहीं हैं। वे यह नहीं मानते हैं कि अपराधी जन्मजात होते हैं। पर्यावरण या वातावरण ही मनुष्य का अपराधी बना देता है। टूटे परिवार, बुरी संगति, निर्धनता, गंदी. बस्तियाँ आदि व्यक्ति को अपराधी बनने में सहायक होती हैं। ये कारण वंशानुक्रम से संबंध नहीं रखते। उनका संबंध पर्यावरण से होता है। इस प्रकार पर्यावरण व्यक्ति को अपराधी बनाता है न कि वंशानुक्रमा वस्तुत: मनुष्य अपने पर्यावरण की उपज है। व्यक्ति का आचरण प्राय: उसका पर्यावरण ही निश्चित करता है। एक कहावत है.” मनुष्य अपनी संगति से ही जाना जाता है।” बुरी संगत में रहने वाले बालक प्राय: बुरी आदतों का शिकार हो जाते हैं। चलचित्र जो सामाजिक वातवारण का ही एक अंग है। अपराध प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है।
प्रत्येक समाज में अपराध की धारणा भी भिन्न-भिन्न होती है। जो कार्य एक समाज में अपराध माना जाता है, वह आवश्यक नहीं है कि एक दूसरे समाज में भी अपराध माना जाता हो। फिर अपराधी जन्मजात कैसे हो सकते हैं? अत: यह सही नहीं है कि अपराधी जन्मजात होते हैं पर्यावरण उन्हें अपराधी बनाता है।
प्रश्न 9. ग्रामीण समुदाय की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-भारत की आत्मा ग्रामों में निवास करती है। भारत में लगभग साढ़े पाँच लाख गांव हैं। ग्रामीण परिवेश आज भी भारतीय संस्कृति की विशेषताओं को प्रदर्शित करते हैं। ग्रामीण समुदाय की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(i) कृषि-मुख्य व्यवसाय : कृषि भारत में जीवनयापन का साधन ही नहीं है वरन यह एक जीवनशैली है। ग्रामीण परिवेश के सभी संबंध कृषि द्वारा प्रभावित होते हैं। कृषि के अतिरिक्त ग्रामों में कुम्हार, बढ़ई, लुहार आदि दस्तकार भी होते हैं परन्तु वे भी अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर ही निर्भर करते हैं।
(ii) संयुक्त परिवार प्रणाली : भारतीय ग्रामीण जीवन में संयुक्त परिवार प्रणाली का बहुत अधिक महत्व है। यद्यपि शहरों में भी संयुक्त परिवार पाए जाते हैं परंतु उनका महत्व ग्रामों में अधिक है।
(iii) जाति व्यवस्था : जाति व्यवस्था सदैव भारतीय ग्रामीण समुदाय का आधार रही है। सामाजिक अंत:क्रिया, धार्मिक अनुष्ठान, व्यवसाय और अन्य बातें काफी सीमा तक जाति के मापदंडों से प्रभावित होती हैं।
(iv) जजमानी व्यवस्था : यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बंधन-दूसरे जातिगत परिवारों से संबंधित होते हैं। प्रत्येक गाँव में दो प्रकार के परिवार रहते हैं। एक तो वे हैं जो भूमि के स्वामी हैं और दूसरे वे जो सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं। सेवाओं के बदले में अन्न और नकद मुद्रा प्रदान की जाती है। त्योहारों के अवसर पर पारिश्रमिक और पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है। यह जजमानी प्रथा विभिन्न जातियों को स्थायी संबंधों में बांधे रखती है।
(v) पंचांग का महत्त्व : अधिकतर गाँवों में परंपरागत भारतीय पंचांग के अनुसार सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कार्य किए जाते हैं। दिन-प्रतिदिन के कार्यों में मांगलिक अवसरों और तिथियों का बहुत अधिक महत्व है।
(vi) सामुदायिक भावना : गाँव के सभी सदस्य व्यक्तिगत रूप से एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। उनके संबंध व्यक्तिगत होते हैं। जीवन की सरलता और मित्रता की भावना ग्रामीण जीवन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। अपराध, चोरी, हत्या, दुराचार आदि कम होते हैं। लोग ईश्वर से डरते हैं और परंपरावादी होते हैं। वे नगरीय जीवन की चकाचौंध और मोह से कम प्रभावित होते हैं। साधारण जीवन व्यतीत करते हैं। उनका व्यवहार रीतियों और परंपराओं से संचालित होता है।
(vii) निर्धनता और अशिक्षा : ग्रामीण जनसंख्या का एक बड़ा भाग गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करता है। यहाँ मौलिक नागरिक सुविधाओं का भी अभाव होता है। स्वास्थ्य सुविधाएँ, यातयात, परिवहन, संचार के साधनों की कमी से जीवन-स्तर नीचा है। यद्यपि सरकार ने ग्रामीणों की दशा सुधारने के लिए बहुत प्रयत्न किए हैं परंतु कृषि की उत्पादकता कम है और नगरिक सुविधाओं की कमी है।
(viii) रूढ़िवाद : भारत के ग्रामों में सामाजिक परिवर्तन की गति धीमी है। व्यवसाय में परिवर्तन आसानी से संभव नहीं है। ग्रामीण स्वभाव से रूढ़िवादी होते हैं । उनके सोचने का आधार, नैतिक मूल्य और परंपराएँ सभी रूढ़िवाद पर निर्भर करते हैं।
(ix) कठोर सामाजिक नियंत्रण : परिवार, जाति और धर्म की कट्टरता बहुत अधिक होती है। सदस्यों के लिए अनौपचारिक नियमों का पालन करना बहुत आवश्यक होता है। पंचायत गलत कामों के लिए लोगों को दंडित करती है।
प्रश्न 10. नगरीय समुदाय की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-नगर ग्रामों का बड़ा रूप है। आधुनिक भारतीय नगरों में पाश्चात्य नगरों के समान सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में सम्भव नहीं है। भारत के नगरों की कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(i) सामाजिक विषमता : नगर ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है। ये विभिन्न प्रकार के लोगों और संस्कृतियों के मिलन का केन्द्र है। संसार के विभिन्न देशों के लोग यहाँ आकर रहना पसंद करते हैं। एक छोटे से क्षेत्र में बड़ी जनसंख्या के निवास करने के कारण जनसंख्या का केन्द्रीकरण हो जाता है
(ii) सामाजिक नियंत्रण : नगर ऐसे -पान हैं जहाँ व्यक्ति सामाजिक नियंत्रण से मुक्त है। यहाँ अकेलेपन का भी बोध होता है और सत्ता के दबाव भी अधिक होते हैं। नगर का आकार जितना बड़ा होता है उतनी ही बड़ी संख्या नियंत्रण की होती है।
(iii) द्वितीयक समूह : आकार के विशाल होने के कारण नगर प्राथमिक वर्ग के अनुरूप कार्यशैली नहीं होता। व्यक्ति मुख्य रूप से एक-दूसरे से अनजान होते हैं और एक-दूसरे के प्रति उदासीन होते हैं। नगरों में संबंध प्रायः औपचारिक होते हैं।
(iv) स्वैच्छिक संस्थाएँ : नगरों की जनसंख्या का आकार, इसकी विभिन्नताएँ और आसानी से बनने वाले कारक वैच्छिक संस्थाओं के लिए एक पूर्ण अथवा आदर्श बनाते हैं। नगरों में द्वितीयक समूह एक प्रकार की स्वैच्छिक विशेषता प्राप्त कर लेते हैं। इनकी सदस्यता रिश्तेदारी पर निर्भर नहीं करती। नगरों में विभिन्न क्लब और संस्थाएँ होती हैं जिनके अपने नियम और कानून होते हैं।
(v) व्यक्तिवाद : नगरों में अवसरों की अधिकता होती है और सामाजिक गतिशीलता होती है। ये सभी व्यक्ति को अपना स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए बाध्य करते हैं और अपने भविष्य के लिए योजनाएँ बनाने को प्रेरित करते हैं। प्रतियोगिता अधिक होने के कारण परिवार की देखभाल के कम अवसर मिलते हैं। स्वार्थ और व्यक्तिवाद को नगरीय जीवन में बढ़ावा मिलता है।
(vi) सामाजिक गतिशीलता : श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण के कारक नगरीय जीवन में सामाजिक और व्यावसायिक गतिशीलता देखने को मिलती है। नगरों का प्रबंध योग्य और सक्षम नागरिकों द्वारा संचालित होता है।
(vii) असमानता : नगरों में अत्यधिक गरीबी और समृद्धि दोनों पाई जाती है। एक ओर झुग्गी झोपड़ी होती है तो दूसरी ओर शानदार बंगले। जनसंख्या की विभिन्नता और उनकी रुचियों और विचारों के विषय में सहनशीलता ओर विभिन्नता नगरों की एक विशेषता है।
(viii) स्थान के लिए प्रतियोगिता : बड़े नगरों में कुछ व्यावसायिक केन्द्र अपनी गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं। वहाँ बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर, थियेटर, बड़े होटल, आभूषण की
दुकानें आदि केन्द्रित होती हैं। महँगी व्यावसायिक सेवाएँ जैसे डायग्नोस्टिक क्लीनिक, कानूनी दफ्तर, बैंक आदि केन्द्रित हो जाते हैं। ये सब नगर के केन्द्रिय भाग में स्थित होते हैं।
प्रश्न 11. भारत के ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों में समानताओं तथा असमानताओं में अंतर कीजिए।
उत्तर-भारत के ग्रामीण और नगरीय समुदाय सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। सोरोकिन और जिम्मरमैन ने निम्नलिखित के आधार पर ग्रामीण और नगरीय अंतरों को स्पष्ट किया है:
प्रश्न 12. ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक व्यवस्था की कुछ विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर-ग्रामीण क्षत्र में सामाजिक व्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:
(i) ग्रामीण समुदाय जनसंख्या की दृष्टि से लघु होते हैं। जनसंख्या का घनत्व भी कम होता है।
(ii) ग्रामीण समुदायों में सजातीयता पायी जाती है।
(iii) ग्रामीण समुदायों में धर्म, जाति तथा वर्ग के आधार पर अधिक स्पष्ट अन्तर पाये जाते हैं।
(iv) ग्रामीण समुदायों में एक भाषाई समूह के व्यक्ति एक साथ रहते हैं।
(v) ग्रामीण समुदायों में व्यक्तियों की आय का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष स्रोत कृषि है।
(vi) ग्रामीण समुदायों में कृषि के अतिरिक्त अन्य व्यवसायों में बहुत कम लोग कार्य करते हैं।
(vii) ग्रामीण समुदायों में जातीय कठोरता अधिक पायी जाती है।
(viii) ग्रामीण समुदायों में अंत: सामुदायिक संबंध कम घनिष्ठ अथवा पूर्णतया अनुपस्थित‌ होते हैं।
(ix) ग्रामीण समुदायों में व्यक्तियों के मध्य पारस्परिक संबंध अनौपचारिक तथा व्यक्तिगत स्तर पर पाए जाते हैं।
(x) ग्रामीण समुदायों में व्यक्तियों में सामाजिक कृतज्ञता की भावना अपेक्षाकृत अधिक पायी जाती है।
(xi) ग्रामीण समुदायों में सामाजिक गतिशीलता कम पायी जाती है।
(xii) ग्रामीण समुदायों में सामाजिक विघटन तथा अलगाव कम पाया जाता है।
(xiii) ग्रामीण समुदायों में व्यक्तियों के मध्य प्राथमिक संबंध पाए जाते हैं तथा सामाजिक अंतःक्रिया का दायरा सीमित होता है।
(xiv) ग्रामीण समुदाय में विवाह का परिवारिक महत्व होता है।
प्रश्न 13. ग्रामीण और नगरीय समुदाय में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-ग्रामीण और नगरीय समुदायों में अंतर करना सरल नहीं है क्योंकि गाँव की अनेक विशेषताएँ
नगरों में पाई जाती हैं फिर भी ग्रामीण और नगरीय समुदायों में निम्नलिखित अन्तर हैं:
(i) ग्रामीण समुदाय की जनसंख्या कम होती है जबकि नगरीय समुदाय का विस्तार क्षेत्र अधिक होता है। वहाँ अनेक लोग विभिन्न कार्य करते हैं।
(ii) ग्रामीण समुदाय में कृषि और समान उद्योग-धंधों के कारण सभी सदस्यों की संस्कृति समान होती है। नगरों में सांस्कृतिक विभिन्नता देखने को मिलती है।
(iii) सामुदायिक भावना में अंतर नगरीय क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग मिल-जुलकर कार्य करते हैं।
(iv) ग्रामों में कृषि व्यवस्था होने के कारण सामान्यत: संयुक्त परिवार ही पाए जाते हैं। किंतु नगरीय परिवार का आकर छोटा होता है।
(v) ग्रामीण समुदाय में विवाह एक धार्मिक संस्कार है किंतु नगरीय समुदायों में आजकल प्रेम पर आधरित विवाह भी पाए जाते हैं।
(vi) ग्रामीण समुदाय में बाल विवाह, पर्दा प्रथा, विधवा पुनर्विवाह निषेध आदि बातें पाई जाति हैं परंतु नगरीय समुदायों में सामान्यतः इनका अभाव पाया जाता है।
(vii) ग्रामीण समुदाय में स्त्रियों का सामाजिक स्तर नीचा होता है। उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था नहीं होती जबकि नगरों में स्त्रियों का सामाजिक स्तर पुरुषों के समान होता है। उन्हें शिक्षा के समान अवसर प्राप्त होते है।
(viii) ग्रामीण समुदाय में परिवार, पड़ोस, प्रथाएँ, रीति-रिवाज, धर्म और जाति, पंचायत आदि सामाजिक नियंत्रण के साधन हैं.जबकि नगरों में पुलिस तथा कानून ही सामाजिक व्यवहार के नियंत्रण के औपचारिक साधन हैं।
(ix) ग्रामीण समुदाय में व्यक्ति का जीवन सरल, पवित्र और परंपरावादी होता है इसलिए व्यक्ति बराईया से बचा रहता है। लेकिन नगरों में व्यक्ति शराब आदि का शिकार हो जाता है। इसलिए नगरों में अपराध अधिक होते हैं।
(x) नगरों में अधिक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं इसलिए व्यक्ति का जीवन-स्तर ऊंचा रहता है। सामाजिक गतिशीलता भी अधिक होती है जबकि ग्रामों में इन सुविधाओं का अभाव पाया जाता है।
में पर्याप्त अंतर देखने को मिलता है।
उपर्युक्त आधार पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि ग्रामीण समुदाय और नगर समुदाय में पर्योप्त अंतर देखने को मिलता है।
प्रश्न 14. सामाजिक परिवर्तन से आपका क्या अभिप्राय है? [B.M. – 2009 *A%]
उत्तर-सामाजिक परिवर्तन का अर्थ : सामाजिक परिवर्तन का अभिप्राय सामाजिक संरचना तथा सामाजिक संबंधों में होने वाले परिवर्तनों से है। इस प्रकार सामाजिक संस्थाओं, प्रस्थितियों, भूमिकाओं तथा प्रतिमानों में समय-समय में होने वाले परिवर्तनों की प्रक्रिया को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। सामाजिक परिवर्तन की गति सैदव समान नहीं होती है। कभी-कभी ये परिवर्तन धीमी गति से तो कभी-कभी तीव्र गति से होते हैं।
सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा :
(i) के. डेविस : के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तनों से हमारा अभिप्राय केवल उन परिवर्तनों से है जो सामाजिक संगठन में होते हैं, अर्थात् समाज की संरचना तथा समाज के कार्यों में।”
(ii) मैरिल तथा एल्ड्रिज के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य यह है कि समाज के अधिकांश व्यक्ति इस प्रकार के कार्यों में संलग्न हैं जो उनके पूर्वजों से भिन्न हैं।”
(iii) मेकाइवर तथा पेज के अनुसार : “समाजशास्त्री के रूप में हमारा प्रत्यक्ष संबंध केवल सामाजिक संबंधों से है, अत: केवल सामाजिक संबंधों में होने वाले परिवर्तनों को हो हम सामाजिक परिवर्तन कह सकते हैं।”
(iv) एंडरसन तथा पार्कर के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन में समाजकीय प्रकारों या प्रक्रियाओं की संरचना या क्रिया में परिवर्तन निहित है।”
(v) गिन्सबर्ग के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन से मैं सामाजिक संरचना में परिवर्तन समझता हूं। उदाहरण के लिए, समाज के आकार में उसके संगठन या उसके भागों के संतुलन में या उसके संगठन के स्वरूपों में।”
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा निरंतर चलने वाली सामाजिक प्रक्रिया है। इसकी गति धीमी अथवा तीव्र हो सकती है। सामाजिक परिवर्तन वस्तुतः सामाजिक प्रक्रियाओं, प्रतिमानों, अंतःक्रियाओं अथवा संगठन आदि में होने वाले परिवर्तनों को निर्दिष्ट करता है।
सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप : सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(i) सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक प्रघटना है: सामाजिक परिवर्तन एक निरंतर होने वाली सार्वभौमिक प्रघटना है। यह प्रत्येक समाज में घटित होता है। सामाजिक परिवर्तन की गति आधुनिक तथा प्रगतिशील समाजों में तीव्र तथा पिछड़े हुए समाजों में मंद होती है।
(ii) सामाजिक परिवर्तन एक अपरिहार्य प्रघटना है : सामाजिक परिवर्तन एक अपरिहार्य प्रघटना है। परिवर्तन प्रकृति का सार्वभौम नियम है। ग्रीन के अनुसार, “परिवर्तन के प्रति उत्साही अनुक्रिया प्राय: जीवन का ढंग बन गई है।”
(iii) सामाजिक परिवर्तन एक निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती : सामाजिक परिवर्तन के विषय में समाजशास्त्री कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। सामाजिक परिवर्तन की गति के विषय में भी निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है। कभी-कभी सामाजिक परिवर्तन अकस्मात् तथा अनेपक्षित हो जाते हैं।
प्रश्न 15. जनसंख्या वृद्धि समाज में किस प्रकार सामाजिक परिवर्तन लाती है?
उत्तर-जनसंख्या में वृद्धि समाज में निम्न प्रकार से सामाजिक परिवर्तन लाती है:
(i) आर्थिक जीवन में परिवर्तन : जनसंख्या के आधार तथा संघटन में परिवर्तन आने से व्यक्तियों का आर्थिक जीवन प्रभावित होता है। आर्थिक जीवन में होने वाला परिवर्तन सामाजिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक पक्षों को प्रभावित करता है।
(ii) जनसंख्या की वृद्धि तथा संसाधनों की उपलब्धता : जनसंख्या की वृद्धि तथा संसाधनों विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता में संतुलन आवश्यक है। यदि जनसंख्या की वृद्धि के अनुपात में संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाते हैं तो सामाजिक संतुलन तथा परिवर्तन की गति दोषपूर्ण हो जाती है। समाज में असुरक्षा, अंसतुलन तथा विघटन के तत्व अधिक सक्रिय हो जाते हैं। इस नकारात्मक परिवर्तन के कारण आर्थिक तथा सामाजिक व्याधियाँ उत्पन्न हो
जाती हैं। सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप बाधित हो जाता है।
(iii) जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक संस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव डालती है : जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक संस्थाओं के विकास को न केवल मंद कर देती है वरन् उनकी विकासोन्मुख दिशा को अवरुद्ध कर देती है। किसी भी जनसंख्या में निम्नलिखित दोष हो सकते हैं:
(a) उच्च जन्म तथा मृत्यु दर
(b) शिशुओं तथा वृद्धों की अधिक जनसंख्या
(c) पुरुषों तथा स्त्रियों के अनुपात में अंसतुलन
(d) ग्रामीण जनसंख्या की अधिकता
जनसंख्या के उपर्युक्त दोष समाज में विघटन, बेकारी, निर्धनता, अपराधों में वृद्धि तथा पिछड़ापन उत्पन्न करते हैं। इनके कारण सामाजिक परिवर्तन की गति धीमी तथा दोषयुक्त हो जाती है।
प्रश्न 16. वे कौन से सामाजिक परिवर्तन हैं? जो तकनीकी तथा अर्थव्यवस्था द्वारा लाए गए हैं।
उत्तर-तकनीकी तथा अर्थव्यवस्था सामाजिक परिवर्तन के लिए निम्न प्रकार से उत्तरदायी हैं:
(i) तकनीकी विकास समाजिक परिवर्तन के मूल कारक के रूप में : तकनीकी विकास किसी भी समाज में सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप को निर्धारित करता है। प्रौद्योगिकीय नवाचार, आविष्कार तथा प्रसार, परंपरागत समाज में सामाजिक परिवर्तन की गति तीव्र कर देते हैं।
(ii) तकनीकी उन्नति सामाजिक संस्थाओं के स्वरूप को बदल देती है : तकनीकी विकास के कारण समाजिक संस्थाओं के स्वरूप तथा संरचना में परिवर्तन हो जाता है। सामाजिक संस्थाओं की कार्यपद्धति में जटिलता बढ़ती जाती है। प्राथमिक संबंधों के स्थान पर द्वितीयक तथा तृतीयक संबंधों का महत्व उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है।
आग्बर्न के अनुसार “प्रौद्योगिकी समाज को हमारे पर्यावरण में परिवर्तन द्वारा जिसके प्रति हमें अनुकूलित होना पड़ता है, परिवर्तित होती है। यह परिवर्तन प्रायः भौतिक पर्यावरण में आता है तथा हम इन परिवर्तनों के साथ जो अनुकूलन करते हैं, उससे प्रथाओं तथा सामाजिक संस्थाओं में परिवर्तन हो जाता है।”
(iii) तकनीकी विकास के कारण सामाज सरल से जटिल की ओर अग्रसर होता है: प्रौद्योगिक विकास के साथ-साथ समाज में विकास होता है। प्रारंभ में मनुष्य के पास बहुत सरल प्रोद्योगिक ज्ञान था लेकिन प्रौद्योगिकी में विकास के साथ-साथ सामाजिक संरचनाओं में जटिलता बढ़ती चली गई। प्रारंभिक अवस्था में प्रौद्योगिकी का आधार पशु शक्ति था जो कि अब औद्योगिक तकनीक में बदल गया है। प्रौद्योगिकी में प्रगति के कारण सरल श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण में बदल गया है। जटिल तथा विशेषीकृत श्रम विभाजन से अनेक क्षेत्रों में व्यावसायिक दक्षता का विकास हुआ है।
(iv) संचार साधनों में तीन परिवर्तन : संचार साधनों में तेजी से होने वाले परिवर्तनों ने सामाजिक अंतःक्रिया के प्रभाव को व्यापक बना दिया है। संचार के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी परिवर्तनों ने क्रांति कर दी है। रेडियो, टेलीफोन, दूरदर्शन आदि ने जनमत को प्रभावित किया है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री आग्बन ने संस्कृति की एकरूपता तथा विसरण मनोरंजन, यातायात शिक्षा,धर्म, सूचना प्रसारण उद्योग, व्यापार तथा शासन प्रणाली आदि पर रेडियो के 150 तात्कालिक तथा
दूरगामी सामाजिक प्रभावों को सूचीबद्ध किया है।
(v) यातायात के साधनों में क्रांतिकारी परिवर्तन : यातायात के साधनों में क्रांतिकारी परिवर्तनों से सामाजिक दूरी कम हुई है सामाजिक तथा सांस्कृतिक पृथक्ता के अवरोध तेजी से समाप्त हो रहे हैं। पारस्परिक सहयोग तथा अन्योयाश्रितता बढ़ रहे हैं। सार्वभौमिक भ्रातृत्व की भावना बढ़ रही है।
प्रश्न 17. प्रसार को सांस्कृतिक परिवर्तन के माध्यम के रूप में समझाइए।
उत्तर-प्रसार सांस्कृतिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम है। यह तथ्य निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट हो जाता है-
(i) विभिन्न संस्कृतियों के मध्य संपर्क तथा प्रसार के कारण ही सामाजिक मूल्य, विचार तथा प्रौद्योगिकी को एक समाज. दूसरे समाज से ग्रहण करता है।
(ii) प्रसार के माध्यम से ही एक पिछड़ा समाज विकसित समाजों के सांस्कृतिक लक्षण अपनाता है। इससे पिछड़े समाजों में तेजी से परिवर्तन आते हैं।
(iii) ग्रैबनर, एंकरमान तथा सेहिट आदि विद्वानों के अनुसार संस्कृति का प्रसार किसी स्थान विशेष से न होकर विभिन्न स्थानों से हुआ है।
(iv) सांस्कृतिक लक्षणों का प्रसार अथवा दो से अधिक संस्कृतियों के सदस्यों के मध्य होने वाले आमने-सामने के संपर्क तथा अंर्तक्रियाओं के माध्यम से होता है। प्रसार शैक्षणिक संस्थाओं तथा जनसंचार के माध्यमों के द्वारा भी होता है। इस प्रकार प्रसार सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(v) सांस्कृतिक लक्षणों का तीव्र गति से प्रसार व्यक्तियों के भौतिक जीवन में द्रुतगामी परिवर्तन लाता है। दूसरी ओर, अभौतिक तत्व जैसे धर्म, विचारधारा, विश्वास तथा मूल्यों में परिवर्तन धीमी गति से होते हैं, आम्बर्न का मत है कि जब अभौतिक संस्कृति भौतिक संस्कृति के साथ समंजन नहीं कर पाती है तो वह (अभौतिक संस्कृति) भौतिक संस्कृति से पिछड़ जाती है। आर्बन ने इस स्थिति को सांस्कृतिक विडंबना कहा है।
प्रश्न 18. ऑगस्त कोंत को सामाजिक परिवर्तन संबंधी विचार समझाइए।
उत्तर-प्रसिद्ध समाजशास्त्री ऑगस्त कोंत ने सामाजिक परिवर्तन के संबंध में रेखीय सिद्धांत प्रतिपादित किया है। रेखीय सिद्धांत के अनुसार समाज धीरे-धीरे सभ्यता की उच्च से उच्चतर अवस्था की ओर अग्रसर होता है। परिवर्तन तथा विकास का यह क्रम सदैव आगे की ओर बढ़ता है।
ऑगस्त कोंत ने सभी समाजों के विकास में निम्नलिखित तीन अवस्थाओं का उल्लेख किया है:
(i) धार्मिक अवस्था, (ii) अध्यात्मिक अथवा तात्विक अवस्था, (iii) प्रत्यक्षवादी अवस्था।
धार्मिक अवस्था के अंतर्गत मानव-मन विभिन्न प्रघटनाओं, पदार्थों तथा वस्तुओं की व्याख्या करने का प्रयत्न करता है। धार्मिक स्तर पर सभी प्रघटनाओं का कारण अधिभौतिक सत्ता है।
अधिभौतिक सत्ता की अवधारणा निम्नलिखित चार अवस्थाओं से होकर गुजरती है :
(i) जादू-टोने में विश्वास, (ii) ईश्वर को मनुष्य के आकार का मानने का सिद्धांत, (iii) बहुदेवतावाद,
(iv) एक देववाद ।
अध्यात्मिक अथवा तात्विक अवस्था वास्तव में धार्मिक अवस्था का परिवर्तित स्वरूप है। धार्मिक अवस्था जो स्थान अधिभौतिक सत्ता का था वह अब अमूर्त सिद्धांतों में बदल जाता है।
प्रत्यक्षवादी अवस्था को वैज्ञानिक अथवा सकारात्मक अवस्था भी कहा जाता है। इस अवस्था के अंतर्गत अधिभौतिक या अमूर्त सिद्धांतों के स्थान पर तर्क तथा अवलोकन पर आधारित सिद्धांतों का विकास होता है। ऑगस्त कोंत का मत है कि व्यक्ति के मस्तिष्क का विकास मनुष्य जाति के मस्तिष्क के विकास कि प्रक्रिया को दिखाता है। इस दृष्टिकोण से व्यक्ति तथा समाज में कोई भिन्नता नहीं है। इस विश्लेषण के आधार पर समाज के विकास के तीन सोपन हैं :
(i) धार्मिक सोपन, (ii) आध्यात्मिक सोपान तथा
(iii) प्रत्यक्षवादी अथवा वैज्ञानिक सोपान ।
प्रश्न 19. हरबर्ट स्पेंसर के सामाजिक उद्विकास संबंधी विचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-हरबर्ट स्पेंसर ने डार्विन के जैविकीय उद्विकास के सिद्धांत के द्वारा सामाजिक परिवर्तन को समझने के लिए अपनाया है। इसे सामाजिक डार्विनवाद कहा गया। स्पेंसर का मत है कि समाजों में परस्पर प्रातियोगिता होती है।
हरबर्ट स्पेंसर के समाज की उद्विकासीय व्याख्या में समाज को व्यक्तियों की सामूहिक संख्या का नाम दिया है। स्पेंसर के अनुसार, ” इस प्रकार उद्विकास का सूत्र समस्त अर्थों में स्वयं को अभिव्यक्त करता है। अधिक विशाल आकार, संसक्तता, रूप बाहुल्य एवं निश्चितता की ओर प्रगति होती है।’
हरबर्ट स्पेंसर का मत है कि प्राणियों के शरीर के आकार में वृद्धि के साथ जिस रूप में उनकी संरचना में वृद्धि होती है, ठीक उसी प्रकार जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ समाज के आकार में वृद्धि होती है।
स्पेंसर का कहना है कि जिस प्रकार प्राणियों की सरंचना सरल से जटिल हो जाती है उसी प्रकार की जटिलता उद्विकास के साथ-साथ समाज में भी दृष्टिगोचर होती है।
सामाजिक उद्विकास की स्पेंसर ने निम्नलिखित विशेषताएँ बतायी है।
(i) समाज का उद्विकास सदैव सरल स्थिति से जटिल स्थिति की ओर होता है।
(ii) जैसे-जैसे सामाजिक उद्विकास में वृद्धि होती है वैसे-वैसे समाज में सजातीयता के स्थान पर विजातीयता की स्थिति उत्पन्न होने लगती है।
(iii) समाज का विकास कम विभिन्नीकृत स्थिति से अधिक विभिन्नीकृत स्थिति की और होने लगता है।
(iv) सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया निरन्तर निम्न स्तर से उच्चतम स्तर की ओर बढ़ती है। हरबर्ट स्पेंसर की उद्विकास की अवधारणा में विकास तथा प्रगति की अवधारणाएँ भी सम्मिलित होते हैं, लेकिन स्पेंसर विकास तथा प्रगति में अंतर नहीं कर पाए।
प्रश्न 20. नगरीय क्षेत्रों में सामाजिक व्यवस्था के सामने कौन से चुनौतियाँ हैं?
उत्तर-नगरीय क्षेत्र में सामाजिक व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं :
परिवारिक संरचना व्यवस्था में विकृतिः नगरीय समुदाय में परिवारिक संरचना व्यवस्था विकृति की स्थिति में है। संयुक्त परिवार का विघटन हो रहा है। एकाकी परिवार का तेजी से विकास हो रहा है। एकाकी परिवारों में महिलाओं की प्रस्थिति तथा भूमिका में परिवर्ततन आ गए हैं। नगरों में महिलाओं तथा बचों के विकास के प्रति एक नई चेतना दिखाई देती है। परिवार में आवश्यक जरूरतों की पूर्ति के लिए भी लोगों की सक्रिय उत्तेजना बनी रहती है। आधुनिक सुख-सुविधा के हर समान को जुटाने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार गाँव के पुश्तैनी
मकान मे मिल-जुलकर फूस तथा झोपड़ी में रहने वाला परिवार नगरों में आकार एक सुनिश्चित,
सुनियोजित, सुरुचिपूर्ण परिवार का सँवारने का प्रयास करता है।
अंत:पीढ़ी संघर्ष की स्थितिः नगरीय परिवारों में अंत:पीढ़ी संघर्ष की प्रक्रिया दिखाई देती है। पुरानी पीढ़ी तथा नई पीढ़ी के बीच विभिन्न प्रश्नों को लेकर संघर्ष की उत्पन्न हो जाती है। यह संघर्ष धार्मिक कर्मकांड के आधार पर हो सकता है। जातिगत संकीर्णताओं के आधार पर भी हो सकता है। पुरानी पीढ़ी अतीत की स्मृतियों तथा महिलाओं से सम्मोहित होती है। नई पीढ़ी आसमान की ऊँचाई को छूना चाहती है। घर एक है, परिवार एक है, फिर भी पिता और पुत्र में अनेक मुद्दों को लेकर तनव जारी है। पुत्र चाहता है हर प्रश्न का समाधान आत्म सम्मान तथा तार्किकता के आधार पर हो। पिता परंपरा का परित्याग करने के लिए तैयार नहीं होता है। इस प्रकार पीढ़ियों के अंत:संघर्ष के कारण नगरीय समुदाय के परिवार की संरचना व्यवस्था तथा प्रकार्य में व्यापक परिवर्तन का अनुभव किया जा सकता है। यही व्यवस्था भंग की दशा है।
विवाहेतर यौन संबंध : संयुक्त परिवार व्यवस्था के कमजोर पड़ जाने के पश्चात् अनेक मूल्यों तथा मानदंडों में गिरावट का अनुभव किया गया है। समाजशास्त्री अध्ययनों के आधार पर स्पष्ट होता है कि हाल के वर्षों में परिवार के क्षेत्र में यौन संबंधों को लेकर कहीं दबे रूप में कहीं खुले रूप में वाद-विवाद प्रारंभ हो चुका है। भूमंडलीकरण तथा खुले बाजारों के कारण परिवार के विभिन्न संबंधों को लेकर घमासान चल रहा है। नगरीय समुदाय के परिवारों में विवाहेतर
यौन संबंधों की घटनाओं में तेजी वृद्धि हो रही है।
अपरिचय बोध : डेविस रिजमैन ने अपनी पुस्तक ‘Lownly Crowd’ में स्पष्ट किया है कि भीड़ में भी अपने-आप को मनुष्य अकेला अनुभव करता है। वह दबावों में होता है। वह तनाव से मुक्त होना चाहता है। तनाव से मुक्त नहीं हो पाता है। ममफोर्ड तथा एरिक फ्राम ने भी नगरीय समुदाय की तीव्र जिंदगी का विश्लेषण किया है। एरिक फ्राम ने अपनी पुस्तक ‘सेन सोसाइटी’ में स्पष्ट किया है कि क्या हम इन तनावों के बढ़ते हुए बोझ के बावजूद संतुलित मस्तिष्क को बनाये रख पाएँ। स्पष्ट है कि नगरीय समुदाय में परिवर्तन की प्रक्रिया बड़े पैमाने
पर चल रही है और इस प्रक्रिया के अंतर्गत नगरीयसामाजिक व्यवस्था के पुराने मिथक टूट रहे हैं।
संकट में बुजुर्ग : ग्रामीण परिवेश में एक अकेले व्यक्ति का जीवन भी सहज एवं स्वभाविक रूपों में व्यतीत हो सकता है। गांवों में नातेदारी संबंधों का अस्तित्व अभी भी बना हुआ हैं। नगरों में यह संभव नहीं है। महानगरों, बड़े नगरों तथा बुजुर्ग अकेले अथवा पत्नी के साथ बड़े मकानों में रहते है। बीमार होने पर देखभाल करने वाला कोई नहीं होता है। भय के कारण अंजान लोगों से सहयोग ले नहीं सकते हैं। फिर भी आए दिन बुजुर्ग दंपतियों की हत्या हो जाती है। हत्यारे का पता तक नहीं चल पाता है। इस प्रकार अवकाश प्राप्त व्यक्ति एक तरह से अपने परिवार के सदस्यों से भी उपेक्षित होता है। असुरक्षा एवं संशय की स्थिति में अपने-आप को असहाय मानता है।
प्रश्न 21. सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप के रूप में प्रगति को समझाइए।
उत्तर-प्रगति का अर्थ : प्रगति गतिशील पक्ष है। पगति का तात्पर्य भौतिक तथा नैतिक प्रगति से है। कोत का मत है प्रगति का.अवलोकन समाज के सभी पक्षों में किया जा सकता है। प्रगति का स्वरूप भौतिक, नैतिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक हो जाता है। बौद्धिक अवस्था को इतिहास में सर्वाधिक मूलभूत अवस्था माना जाता है। जनसंख्या के घनत्व में वृद्धि बौद्धिक प्रगति का मुख्य कारक है। जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ श्रम विभाजन में विशेषीकरण अपरिहार्य है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मजूमदार ने प्रगति में निम्नलिखित छ: तत्वों का होना आवश्यक बताय है
(i) व्यक्ति के सम्मान में वृद्धि ।
(ii) प्रत्येक मानव-व्यक्ति के लिए सम्मान
(iii) अध्यात्मिक खोज तथा सत्य के अन्वेषण हेतु अधिक स्वतंत्रता मिलना।
(iv) प्रकृति एवं व्यक्ति की रचनाओं के सौंदर्यात्मक आनंद तथा सृजनात्मकता हेतु स्वतंत्रता।
(v) एक सामाजिक व्यवस्था को पहले चार मूल्यों को आगे बढ़ाती है।
(vi) सभी व्यक्तियों के लिए न्याय तथा समता सहित सुख, स्वतंत्रता तथा जीवन की वृद्धि करना।
प्रगति की परिभाषा:
(i) आग्बर्न तथा निमाकॉफ के अनुसार, “प्रगति किसी सामान्य समूह द्वारा दर्शनीय भविष्य हेतु वांछित समझे गए उद्देश्य की ओर गति है।”
(ii) मेकाइवर के अनुसार, “जब हम प्रगति की बात करते हैं तो हम केवल दिशा को सूचित नहीं करते हैं, वरन् उस दिशा को जो किसी अंतिम लक्ष्य, किसी उद्देश्य की ओर ले जाती है जिसे आदर्श रूप में निश्चित किया गया है, न कि कार्यरत शक्तियों के वस्तुपरक विचार से।’
(iii) लूम्ले के अनुसार, “प्रगति परिवर्तन है लेकिन यह इच्छित अथवा स्वीकृत दिशा में परिवर्तन है।”
(iv) गुरविच तथा मूर के अनुसार, “प्रगति स्वीकृत मूल्यों के संदर्भ में इच्छित उद्देश्य की ओर बढ़ना है।”
(v) हाबहाउस के अनुसार, “सामाजिक प्रगति से मैं सामाजिक जीवन के उन गुणों की वृद्धि समझता हूं जिन्हें व्यक्ति मूल्यों से आंक सकें तथा तार्किक रूप से
मूल्य संबध्द कर सकें।”
प्रगति सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप में:
(i) प्रगति सामाजिक परिवर्तन का सशक्त तथा तर्किक कारक है।
(ii) प्रगति किसी विशिष्ट दिशा से उद्देश्यपूर्ण तथा इच्छित परिवर्तन है।
(iii) प्रगति की अवधारणा परिवर्तनशील होती है। जो कारक, कारण तथा प्रतीक आज प्रगतिशील समझे जाते हैं, उन्हें आने वाले कल में अवनति का प्रतीक भी समझा जा सकता है।
(iv) प्रगति सचेत प्रयत्नों का परिणाम है। कार्ल मार्क्स प्रगति को समाज का नियम मानता है।
(v) सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में प्रगति की ऐसी निश्चित अवधारणाएं विकसित करना कठिन है, जो सार्वकालिक तथा सार्वभौमिक हैं।
(vi) सामाजिक गतिशीलता प्रगति का केंद्रीय तत्व है। कोई भी सामाजिक व्यवस्था प्रगति तथा विकास की अनुपस्थिति में आगे नहीं बढ़ सकती है।
(vii) समकालीन सामाजिक अध्ययनों में समाज की प्रगति को साधारणतया औद्योगीकरण तथा आधुनिक तकनीक के विकास में संबद्ध किया गया है।

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