11-sociology

bihar board class 11 sociology | सस्कृति तथा समाजीकरण

bihar board class 11 sociology | सस्कृति तथा समाजीकरण

image

bihar board class 11 sociology | सस्कृति तथा समाजीकरण

सस्कृति तथा समाजीकरण

       ( Culture and Sociolization )
              भूमिका
→संस्कृति , समाजिक संगठन के संदर्भ में मानव व्यवहार को समझने की महत्वपूर्ण अवधारणा है । सामाजिक अंतःक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न मानदंड संस्कृति की उत्पत्ति का मुख्य स्रोत व्यक्तियों के द्वारा किया जाता है ।
→ए ० एल ० कोबर तथा सी ० क्लूखोन ने अपने लेख ” The Concept of Culture : A Criticial Review of Definition में कहा है कि संस्कृति चिंतन के प्रतिमानित तरीकों , भावनाओं तथा प्रतिक्रियाओं , प्रमुख रूप से प्रतीकों द्वारा अर्जित तथा हस्तांतरित , मानव समूह द्वारा विशिष्ट उपलब्धियों के निर्माण करने वाले तथा व्यक्ति के कौशल का साकार स्वरूप है । संस्कृति के आवश्यक तत्वों में जिसमें परंपरागत जैसे ऐतिहासिक परिणाम तथा श्रेष्ठताएँ एवं विचार मुख्य हैं , उसमें तथा विशेष रूप से उससे जुड़े हुए मूल्यों से निर्मित होती है ।
→समाजीकरण – शिशु जन्म के समय न तो बोल सकता है और न ही चल सकता है । वह अपनी विभिन्न आवश्यकताओं के लिए केवल रो सकता है लेकिन शिशु धीरे – धीरे चलना , बोलना तथा परिवार के सदस्यों को पहचानना व उनके संपर्क में आना सीखता है । अत : हम कह सकते हैं कि समाजीकरण सामाजिक संपर्क के कारण व्यक्ति द्वारा सीखने की प्रक्रिया है ।
    रोज तथा ग्लेजर के अनुसार , “ समाजीकरण समाज तथा संस्कृति के विश्वासों , मूल्यों प्रतिमानों तथा सामाजिक भूमिकाओं को सीखने की प्रक्रिया है । ” परिवार समाजीकरण की प्राथमिक इकाई है तथा समाज का संपूर्ण प्रतिनिधित्व करता है । परिवार में समाज में पाए जाने वाले समस्त आदर्श प्रतिमान , मूल्य , व्यवहार , परिस्थितियाँ तथा भूमिकाएँ पाई जाती हैं । प्रसिद्धि समाजशास्त्री विलियम जे ० ने समाजीकरण की प्रक्रिया के निम्नलिखित कारक बताए हैं-
( i ) माता – पिता , अध्यापकों तथा मित्रों में बच्चे के प्रति लगाव की भावना तथा सहज स्नेह ।
( ii ) समाजीकरण की प्रक्रिया में बच्चे का माता – पिता तथा अन्य व्यक्तियों से तादात्म्य होना ।
( iii ) माता – पिता की सत्ता ।
( iv ) व्यवहारों की समरूपता ।
( v ) बच्चे की आजादी ।
( vi ) तर्कपूर्ण स्पष्टीकरण ।
( vii ) दंड ।
   स्व का विकास व्यक्तित्व का केन्द्रबिन्दु है । यह एक सामाजिक सत्य है । ‘ स्व ‘ का तात्पर्य ‘ मैं ‘ अथवा ‘ मुझको ‘ से है । ‘ स्व ‘ की अवधारणा का विकास दूसरे व्यक्तियों के साथ सामाजिक संपर्क से होता है ।
→समाजीकरण के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं-
( i ) कूले का आत्मदर्पण का सिद्धान्त ,
( ii ) मीड का अन्य से भूमिका ग्रहण का सिद्धांत , ( iii ) फ्रायड का समाजीकरण का विश्लेषणात्मक →सिद्धान्त संस्कृति के तीन मुख्य आयाम बताए गए हैं- ( i ) संज्ञानात्मक आयाम , ( ii ) प्रतिमानात्मक आयाम तथा ( iii ) भौतिक आयाम । →आगबर्न के अनुसार संस्कृति के दोनों पहलू अर्थात् भौ तक तथा अभौतिक व्यक्तित्व के निर्माण पर प्रभाव डालते हैं । आगवर्न द्वारा संस्कृति पिछड़ेपन अथवा विडंबना की अवधार ” पी प्रस्तुत की है ।
                  शब्दावली
( 1 ) लघु परंपरा – इसमें संस्कृति की मौखिक विशेषताएँ या परंपराएं शामिल हैं जो ग्रामीण स्तर पर स्वीकृत हैं ।
( ii ) महान परंपरा – इसमें सांस्कृतिक विशेषताएँ या परंपराएं शामिल हैं जो लिखित हैं तथा समाज के पड़े – लिखे अभिजात वर्ग द्वारा व्यापक रूप से स्वीकृत हैं ।
( iii ) सांस्कृतिक विकासवाद – वह संस्कृति का एक सिद्धान्त है , जो यह तर्क देता है कि प्राकृतिक स्पीशोज की तरह ही संस्कृति का विकास भी विभिन्नता तथा प्राकृतिक चयन द्वारा होता है ।
( iv ) संपत्ति व्यवस्था – सामंतवादी यूरोप में व्यवसाय के अनुसार श्रेणी प्रदान करने को एक व्यवस्था थी । कुलीन वर्ग , पुरोहित वर्ग तथा तृतीय सम्पत्ति ‘ तीन तरह की संपत्तियाँ थीं । तिम संपदा मुख्यतया व्यवसायियों तथा मध्यम श्रेणी के लोगों की थी । प्रत्येक राज संपदा अपने प्रतिनिधि का स्वयं चयन करती थी । किसानों तथा मजदूरों को वोट देने का अधिकार नहीं था ।
( v ) सामाजिक भूमिकाएं – यह किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति या प्रस्थिति के व्यक्तियों के साथ जुड़े अधिकार तथा उत्तरदायित्व हैं ।
( vi ) समाजीकरण – वह प्रक्रिया जिसके द्वारा हम समाज का सदस्य बनना सीखते हैं ।
( vii ) उप – संस्कृति – एक वृहत् संस्कृति के अंदर लोगों के ऐसे समूह का निर्धारण करना जो संकेतों , मूल्यों तथा आस्थाओं को वृहत् संस्कृति से प्रायः उधार लेता है तथा प्रायः इन्हें विकृत , अतिरजित या विपरीत कर देता है ताकि अपने आप को अलग दर्शा सके ।
( viii ) स्वयं की छवि – दूसरों की निगाह में आपकी छवि ।
   पाठ्यपुस्तक एवं परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
( Textbook and Other Important Questions for Examination )
                वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
           ( Objective Type Questions )
1. समाजीकरण के अभिकरण हैं-
( अ ) परिवार
( ब ) स्कुल
( स ) जाति
( द ) उपरोक्त सभी                उत्तर- ( द )
2. नगरीय समुदाय में जनसंख्या घनत्व पाया जाता है-
( अ ) काफी
( ब ) कम
( स ) साधारण
( द ) विरल                         उत्तर-( अ )
3 . सहभागी अवलोकन के द्वारा अनुसंधान किया जाता है
( अ ) एक समूह का
( ब ) एक पुरुष का
( स ) एक महिला का
( द ) पशुओं के समूह का        उत्तर- ( अ )
4 . बंद प्रश्नावली में उत्तरदाता को उत्तर देने की होती है
( अ ) स्वतंत्रता
( ब ) सीमाएँ
( स ) छुट
( द ) विकल्पों की स्वतंत्रता           उत्तर- ( ब )
5. सामाजिक अनुसंधान की समस्या निम्नलिखित से कौन – सा है ?
( अ ) वस्तुनिष्ठता
( ब ) चक्रीय
( स ) रेखीय
( द ) पाराबोलिक                       उत्तर- ( द ) 6. निम्नलिखित में असत्य कथन छाँटिये-
( अ ) सामाजिक सर्वेक्षण में सामाजिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है ।
( ब ) सामाजिक सर्वेक्षण का निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है ।
( स ) सामाजिक सर्वेक्षण एक वैज्ञानिक पद्धति है । ( द ) सामाजिक सर्वेक्षण सदैव व्यक्तिगत रूप से किया जाता है ।                        उत्तर- ( द ) 7 . जन्म द्वारा प्रदत्त प्रस्थिति कहलाती है
( अ ) वर्ण
( ब ) संघ
( स ) जाति
( द ) समूह                             उत्तर- ( स ) 8 . समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा हम सीखते हैं ( अ ) समाज का सदस्य बनना
(ब ) राजनीतिक दल का सदस्य बनना
( स ) धार्मिक संस्था का सदस्य बनना
( द ) उपरोक्त सभी                     उत्तर- ( अ ) 9 . सामान्यतया विस्तृत दल द्वारा किये जानेवाले अनुसंधान हैं
( अ ) साक्षात्कार
( ब ) अनुसूची
( स ) सर्वेक्षण
( द ) प्रश्नावली                          उत्तर- ( द ) 10. असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता की स्थिति होती है
( अ ) समूह में शामिल होना
( ब ) समूह में शामिल नहीं होना
( स ) समूह के साथ अंत : क्रिया करना
( द ) समूह से संबंध स्थापित करना।   उत्तर- ( द ) 11. खुली प्रश्नावली में उत्तरदाता अपने उत्तर देने में होता है-
( अ ) बंधा हुआ
( ब ) चयन हेतु बाध्य
( स ) सीमित
( द ) स्वतंत्र।                            उत्तर-( द )
             अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं
       ( Very Short Answer Type Questions ) प्रश्न 1.सामाजिक विज्ञान में संस्कृति की समझ , दैनिक प्रयोग के शब्द “ संस्कृति से कैसे भिन्न है ? उत्तर – जिस प्रकार सामाजिक विज्ञान में हमें किसी स्थान का पता लगाने के लिए मानचित्र की आवश्यकता होती है उसी प्रकार समाज में व्यवहार करने के लिए हमें संस्कृति की आवश्यकता पड़ती है । संस्कृति एक सामान्य समझ है जिसे समाज में अन्य व्यक्तियों के साथ सामाजिक अंतःक्रिया के माध्यम से सीखा तथा विकसित किया जाता है । प्रश्न 2. संस्कृति शब्द की उत्पत्ति तथा अर्थ बताइए । उत्तर – संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषण के ‘ कोलरे ‘ शब्द से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘ जमीन जोतना ‘ अथवा ‘ खेती करना ‘ है । यंग तथा मैक के अनुसार , ” संस्कृति सीखा हुआ तथा भागीदारी का व्यवहार है । ” संस्कृति किसी एक व्यक्ति का विशेष व्यवहार नहीं होता है । संस्कृति वह व्यवहार है जिसे व्यक्ति सामाजिक अन्त : क्रिया के माध्यम से समूह में सहभागिता के कारण प्राप्त करता है ।
प्रश्न 3. संस्कृति के मुख्य तत्त्व कौन – कौन से हैं ? उत्तर – संस्कृति के मुख्य तत्त्व हैं-
( i ) व्यक्तियों द्वारा समाज के सदस्य के रूप में ग्रहण की गई आदतें तथा अक्षमताएँ ।
( ii ) भाषा तथा उपकरण बनाने की विधियाँ ।
( iii ) ज्ञान , विश्वास , प्रथा , कला , कानून तथा नैतिकता ।
रौबर्ट बियरस्टेड ने अपनी पुस्तक ‘ The Social Order ‘ में संस्कृति के तीन तत्व बताए हैं : ( i ) विचार ( ii ) प्रतिमान ( ii ) पदार्थ ।
प्रश्न 4. संस्कृति के तीन मुख्य आयाम बताइए । उत्तर – संस्कृति के तीन मुख्य आयाम निम्नलिखित हैं-
( i ) संज्ञानात्मक आयाम – संज्ञान अथवा ज्ञान की प्रक्रिया में सभी व्यक्ति अपनी भागीदारी करते हैं । इसमें धर्म , अंधविश्वास , वैज्ञानिक तथ्य , कलाएँ तथा मिथक शामिल किए जाते हैं ।
( ii ) प्रतिमानात्मक आयाम – समाजशास्त्र के प्रतिमानात्मक आयामों के अन्तर्गत सोचने के बजाए कार्य करने के तरीकों का उल्लेख किया जाता है । इसके अन्तर्गत नियमों , अपेक्षाओं तथा प्रतिमानात्मक पद्धतियों को सम्मिलित किया जाता है ।
( iii ) भौतिक आयाम – संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत आवास , औजार , कपड़ा , आभूषण तथा संगीत के उपकरण आदि सम्मिलित किए जाते हैं ।
प्रश्न 5. संस्कृति के दो प्रमुख भाग कौन – से हैं ? उत्तर – संस्कृति के दो प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं- ( i ) भौतिक संस्कृति – इसके अंतर्गत मूर्त , पार्थिक तथा पदार्थगत संस्कृति को सम्मिलित किया जाता है । संस्कृति का यह पक्ष मनुष्यों द्वारा निर्मित वस्तुगत तथा पदार्थगत होता है । प्रौद्योगिकी , कला , उपकरण तथा वस्त्र आदि इसमें सम्मिलित किए जाते हैं ।
( ii ) अभौतिक संस्कृति – इसे अंतर्गत विचार , ज्ञान , कला , परंपरा तथा विश्वास को सम्मिलित किया जाता है । यह अमूर्त तथा अपदार्थगत पक्ष है। प्रश्न 6. संस्कृति की अवधारणा के मुख्य चिंतकों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर – संस्कृति की अवधारणा की व्याख्या करने वाले चिंतकों को निम्नलिखित दो श्रेणियाँ में बांटा गया है :
( 1 ) मानवशास्त्रीय व्याख्या के अनुसार संस्कृति के अध्ययन के माध्यम से व्यक्ति तथा उसमें विभिन्न व्यवहारों को समझा जा सकता है । मानवशास्त्रियों द्वारा संस्कृति की अवधारणा तथा आदिम समुदायों के संदर्भ में संस्कृति के विभिन्न प्रतिरूपों का अध्ययन किया गया है । प्रमुख मानवशास्त्री – चिंतक हैं- ( a ) टालयर , ( b ) आर . बेनडिक्स ,
( c ) लिंटन , ( d ) मैलिनोवस्की , ( e ) कोबर । ( ii ) कुछ समाजशास्त्रियों के द्वारा संस्कृति को समाज के एक अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। तथा इन चिंतकों के अनुसार समाज एक व्यापक अवधारणा है तथा जिसका संबंध व्यक्ति तथा समूह के अंतसंबंध से है । संस्कृति का तात्पर्य प्रतिमानात्मक व्यवस्था , मूल्यों तथा व्यवहाण से है । इस विचारधारा के चिंतक प्रमुख समाजशास्त्री हैं : ( a ) समनर , ( b ) दुर्खाइम , ( c ) मैक्स वैबर , ( d ) सोरोकिन , ( e ) पारसस ।
प्रश्न 7. संस्कृति के चार प्रमुख लक्षण बताइए ।
उत्तर – संस्कृति के चार प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं
( 1 ) संस्कृति अर्जित व्यवहार है जिसे सीखा जाता है ।
( ii ) संस्कृति परिवर्तनशील , गतिशील तथा सापेक्षिक है ।
( iii ) संस्कृति संरचित होती है , इसका निर्माण चिंतन के प्रतिमानों , अनुभवों तथा व्यवहारों से होता है ।
( iv ) संस्कृति को विभिन्न पहलुओं में विभाजित किया जा सकता है ।
प्रश्न 8. संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर- ( i ) संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों के अंतर्गत अंधविश्वास , वैज्ञानिक तथ्य , मिथक , कला तथा धर्म शामिल हैं ।
( ii ) विचार संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों की ओर संकेत करते हैं । इसके अन्तर्गत विश्वासों तथा ज्ञान को शामिल किया जाता है ।
प्रश्न 9. संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम का संक्षेप में वर्णन कीजिए ।
उत्तर- ( i ) संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत अपेक्षाओं , नियमों तथा प्रतिमानात्मक पद्धतियों को सम्मिलित किया जाता है ।
( ii ) संस्कृति के प्रतिमानित आयामों के द्वारा व्यक्तियों की अंत : क्रिया की पुनरावृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाता है । प्रतिमानों को जनरीतियों , रूढ़ियों , प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है तथा इनके द्वारा व्यवहार को निर्देशित किया जाता है ।
प्रश्न 10. संस्कृति के भौतिक आयाम को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर- ( 1 ) संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत कुछ वस्तुएँ जैसे कि कपड़ा , आवास , उपकरण , आभूषण , रेडियो तथा संगीत के वाद्य – यंत्र आदि आते हैं ।
( ii ) भौतिक संस्कृति में उन वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है जो पौतिक वस्तुएँ हैं तथा जिनका समाज के सदस्यों द्वारा उपयोग किया जाता है । प्रश्न 11. सांस्कृतिक पिछड़ेपन अथवा सांस्कृतिक विलंबना से आप समझते हैं ?
उत्तर – सांस्कृतिक पिछड़ेपन अथवा संस्कृति विलंबना की अवधारणा का विवरण प्रसिद्ध समाजशास्त्री आगबर्न द्वारा किया गया है । आगवर्न के अनुसार भौतिक संस्कृति जैस तकनीकी इत्यादि का विकास तथा परिवर्तन तेजी से होता है । दूसरी तरफ , अभौतिक संस्कृति चिंतन के प्रतिमानित तरीकों , भावनाओं तथ प्रतिक्रियाओं , प्रमुख रूप से प्रतीकों द्वारा अर्जित तथा हस्तांतरित , मानव व समूह द्वारा विशिष्ट उपलब्धियों के निर्माण करने वाले तथा व्यक्ति के कौशल का साकार स्वरूप है । संस्कृति के आवश्यक तत्वों में जिसमें परंपरागत जैसे ऐतिहासिक परिणाम तथा श्रेष्ठताएँ एवं विचार मुख्य हैं , उसमें विशेष रूप से उससे जुड़े हुए मूल्यों से निर्मित होती है ।
संस्कृति के तीन आयाम बताए गए हैं :-
( 1 ) संज्ञात्मक आयाम , ( ii ) प्रतिमानात्मक आयाम तथा ( iii ) भौतिक आयाम ।
आगबर्न के अनुसार संस्कृति के दोनों पहलू अर्थात् भौतिक तथा अभौतिक व्यक्तित्व के निर्माण पर प्रभाव डालती हैं । आगबर्न द्वारा सांस्कृतिक पिछडेपन अथवा विलंबना की अवधारणा प्रस्तुत की गई है ।
प्रश्न 12. प्रौद्योगिकी क्या है ?
अथवा , प्रौद्योगिकी से आप क्या समझते हैं ? वे अलग – अलग समाजों में भिन्न – भिन क्यों होती है?
उत्तर – प्रौद्योगिकी का तात्पर्य तकनीकी मानदंडों अथवा तकनीक से होता है । वैचारिक तर्ज पर प्रौद्योगिकी समाज की संस्कृति का समन्वित भाग होती है ।
प्रौद्योगिकी अथवा तकनीकी मानदंड अलग – अलग समाजों में पृथक् – पृथक पाए जाते हैं समाजों में विभेदीकरण उनके द्वारा प्राप्त की गई प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों के आधार पर किया जाता है।
प्रश्न 13.समाजीकरण क्या है ?
उत्तर – समाजीकरण का अर्थ – व्यक्तियों द्वारा सामाजिक संपकों के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को ही समाजीकरण कहा जाता है । समाजीकरण की प्रक्रिया से ही प्राणी सामाजिक प्राणी बनता है । समाजीकरण की परिभाषा-
रोज तथा ग्लेजर के अनुसार , ” समाजीकरण समाज तथा संस्कृति के विश्वासों , मूल्यों तथा प्रतिमानों एवं सामाजिक भूमिकाओं को सीखने की प्रक्रिया है । “
गुडे के अनुसार , ” समाजीकरण के अंतर्गत वे समस्त प्रक्रियाएँ आती हैं जिनसे कोई बचपन से वृद्धावस्था तक अपने सामाजिक कौशल , भूमिका , प्रतिमान , मूल्य तथा व्यक्तित्व के प्रति रूप ग्रहण करता है । “
ऑगबर्न के अनुसार , ” समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिससे कि व्यक्ति समूह के आदर्श नियमों के अनुसार व्यवहार करना सीखता है । “
एच ० टी ० मजूमदार के अनुसार , ” समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मूल प्रकृति मानव प्रकृति में बदल जाती है तथा पुरुष व्यक्ति बन जाता है । ” जॉनसन के अनुसार , ” समाजीकरण एक प्रकार का सीखना है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने के योग्य बनाता है । ” उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि समाजीकरण मानवीय शिशु के जैविकीय प्राणी रूप से सामाजिक मनुष्य में रूपांतरण है ।
                 लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
         ( Short Answer Type Questions )
प्रश्न 1.समाजीकरण के विभिन्न स्तर बताइए ।
उत्तर – प्रसिद्ध समाजशास्त्री गिडिंग्स ने समाजीकरण के दो स्तर बताए हैं- ( i ) प्राथमिक समाजीकरण तथा ( ii ) द्वितीयक समाजीकरण ।
( i ) प्राथमिक समाजीकरण शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था में होता है । यह समाजीकरण का सबसे महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक बिन्दु है क्योंकि बच्चा मूलभूत व्यवहार प्रतिमान इसी स्तर पर सीखता है । प्राथमिक समाजीकरण के तीन उप स्तर हैं- ( a ) मौखिक अवस्था , ( b ) शैशवावस्था तथा ( c ) किशोरावस्था ।
परिवार प्राथमिक समाजीकरण का सशक्त माध्यम है।
( ii ) द्वितीयक समाजीकरण के अंतर्गत व्यक्ति व्यवसाय तथा जीविका के साधनों की खोज में प्राथमिक समूहों के अलावा अन्य समूहों से अपने मूल्यों , प्रतिमानों , आदशों , व्यवहारों तथा सांस्कृतिक मानदंडों को ग्रहण करता है । समाजशास्त्री ऐसे समूहों को संदर्भ समूह कहते हैं । प्रसिद्ध समाजशास्त्री रॉबर्ट के . मर्टन इस सामाजिक प्रघटना को सदस्यता समूह के स्थान पर असदस्यता समूह की ओर अभिमुखता कहते हैं ।
 प्रश्न 2. “ व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा निर्णायक होती है । ” स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार की भूमिका ( 1 ) परिवार व्यक्ति के समाजीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा निर्णायक भूमिका निभाता प्रतिनिधित्व करती है ।
 ( ii ) बच्चा परिवार में विभिन्न भूमिकाओं तथा प्रस्थितियों से अपना तादात्म्य स्थापित करता है । ( iii ) बच्चा शैशवावस्था से तीन वर्ष की अवस्था तक परिवार तक ही सीमित रहता है । परिवार में ही वह भाषा , चलना , बोलना तथा परिवार के सदस्यों के बारे में जानता है । यह समाजीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण है । किंबाल यंग के अनुसार , ” समाज के अंतर्गत समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सबसे महत्वपूर्ण है , इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता एवं पिता ही साधारणतया अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं । ” किंबाल यंग ने आगे कहा है कि , “ परिवार की स्थिति के अंतर्गत मौलिक अंत : क्रियात्मक साँचा बच्चे तथा माता का है । “
प्रश्न 3. ‘ स्व ‘ व्यक्तित्व का केन्द्र है । स्पष्ट कीजिए । उत्तर – व्यक्ति अपने बचपन से ही भूमिका की संरचना को सीखता तथा आत्मसात करता है । व्यक्ति के ‘ स्व ‘ का विकास इसी प्रकार होता है । कूले , फ्रायड , मीड तथा पारसंस जैसे विद्वानों का मत है कि ‘ स्व ‘ का विकास व्यक्ति की ग्रहणशीलता तथा समूह द्वारा शिशु के अपने प्रतिमानों के अनुरूप ढालने के प्रयत्नों का मिला – जुला स्वरूप है ।
‘ स्व ‘ का अर्थ मैं तथा मुझसे से है लेकिन ‘ स्व ‘ की अवधारणा का विकास बच्चे के मन में स्वाभाविक वृद्धि की प्रक्रिया के कारण नहीं होता है । वस्तुतः ‘ स्व ‘ की अवधारणा दूसरे व्यक्तियों से संपर्क के कारण ही विभाजित होती है । ‘ स्व ‘ के विकास में भाषा का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है तथा भाषा समाज की देन होती है ।
सी ० एच ० कूले का मत है कि ‘ स्व ‘ एक सामाजिक सत्य है जिसका विकास प्राथमिक समूह तथा सामाजिक अंत : क्रिया की भूमिका के कारण होता है ।
प्रश्न 4. ‘ समाजीकरण के साथ सीखने की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से संबद्ध है । ‘ स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – सीखने की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति कुछ बातों को स्वयं सीख जाता है । उदाहरण के लिए , माता के स्तन से दुग्धपान करना , चलना तथा परिवार में माता – पिता तथा अन्य सदस्यों को पहचानना ।
   सीखने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है तथा व्यक्ति की समझ तथा ज्ञान में लगातार विकास होता रहता है । इस प्रकार , समाजीकरण सीखने की ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत व्यक्ति सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप वांछित व्यवहारों को सौख जाता है ।
सीखने की उत्प्रेरक दशाएँ जिसके कारण बच्चा सीखता है -( i ) व्यक्ति की स्वयं की आवश्यकताएँ, ( ii ) नई बातों के प्रति उत्सुकता तथा सीखने की प्रवृत्ति , ( iii ) पुरस्कार तथा दंड , ( iv ) नई परिस्थितियों में समायोजन ।
प्रश्न 5. अनुकरण पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए । उत्तर – अनुकरण का अर्थ : अनुकरण सीखने की एक प्रक्रिया है । बच्चों द्वारा दूसरों के व्यवहार का अनुकरण उस स्थिति में किया जाता है , जब उन्हें पुरस्कार मिलता है । कुछ विद्वानों का मत है कि चेतनावस्था अथवा अचेतनावस्था में किए जाने वाले समस्त कार्य अनुकरण के अंतर्गत आते हैं । अनुकरण की परिभाषा-
थाउलस के अनुसार , “ अनुकरण एक प्रतिक्रिया है जिसके लिए उत्तेजक दूसरे को उसी प्रकार की प्रतिक्रिया का ज्ञान है । “
मैक्डूगल के अनुसार , ” अनुकरण केवल एक मनुष्य द्वारा उन क्रियाओं , जो दूसरे के शरीर संबंधी व्यवहार से संबंधित हैं , की नकल करने पर लागू होता है । “
मीड के अनुसार , ” अनुकरण दूसरों के व्यवहारों या कार्यों को जान – बूझकर अपनाने को कहते हैं । ” अनुकरण का वर्गीकरण – गिंसबर्ग के अनुकरण को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया है- ( i ) प्राणिशास्त्रीय अनुकरण , ( ii ) भाव – चालक अनुकरण तथा ( ii ) विवेकशील अथवा सप्रयोजन अनुकरण ।
प्रश्न 6. फ्रायड द्वारा व्यक्तित्व की किन तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं का वर्णन किया गया है ? उत्तर – सिगमंड फ्रायड ने व्यक्तित्व के निर्माण की तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं का उल्लेख किया है- ( i ) इड , ( ii ) अहं तथा ( iii ) पराअहं ।
     इड में व्यक्ति की सभी अनुवांशिक तथा मूल प्रवृत्तियों का मनोवैज्ञानिक पहलू सम्मिलित होता है । इड सुख के सिद्धान्त पर आधारित होता है । अहं वास्तविकता के सिद्धान्त पर आधारित होता है । अहं व्यक्ति की क्रिया को निर्देशित करता है पराअहं व्यक्तित्व के विकास की तीसरी अवस्था है । पराअहं व्यक्तित्व का नैतिक पहलू है तथा यह आदर्श के सिद्धान्त से निर्देशित होता है । इसके द्वारा समाज के आदर्श प्रतिमानों तथा मूल्यों का प्रतिनिधित्व किया जाता है ।
प्रश्न 7. भौतिक संस्कृति से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर – भौतिक संस्कृति का तात्पर्य इस प्रकार है ( i ) समाज के सदस्यों के रूप में व्यक्ति जिन वस्तुओं पर अधिकार रखता है वह भौतिक संस्कृति कहलाती है ।
( ii ) भौतिक संस्कृति मानव – निर्मित , वस्तुपरक तथा मूर्त होती है ।
( iii ) कुछ विद्वानों ने संस्कृति के पदार्थगत तथा भौतिक पक्ष पर अधिक बल दिया है ।
( iv ) आदिम समय से लेकर वर्तमान समय तक व्यक्तियों द्वारा निर्मित उपकरण , गृह निर्माण की पद्धति , वस्त्र , संचार तथा यातायात के साधन , आभूषण आदि भौतिक वस्तुएँ हैं । इन भौतिक वस्तुओं को समाज के सदस्य ग्रहण करते हैं तथा उनका उपयोग करते हैं ।
( v ) इस प्रकार व्यक्तियों द्वारा रचित मूर्त वस्तुओं को भौतिक संस्कृति कहा जाता है । पदार्थ चूँकि अत्यधिक स्पष्ट होता है इसलिए संस्कृति को समझने का सरल स्वरूप है ।
( vi ) जब किसी पुरातत्त्वशास्त्री द्वारा किसी प्राचीन नगर अथवा स्थान की खुदाई की जाती है तो उसे अनेक प्रकार के टेराकोटा , शिल्पकृतियाँ , रंगदार भूरे बर्तन तथा सिक्के इत्यादि मिलते हैं। वास्तव में ये सभी वस्तुएँ प्राचीन भौतिक संस्कृति के अवशेष कहे जाते हैं । इन वस्तुओं को ‘ सांस्कृतिक पदार्थ ‘ भी कहा जाता है ।
प्रश्न 8. अभौतिक संस्कृति से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर – अभौतिक संस्कृति से तात्पर्य है-
( i ) अभौतिक संस्कृति का स्वरूप आंतरिक तथा अमूर्त होता है
( ii ) अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत संज्ञानात्मक प्रतिमान आयामों तथा व्यक्तियों द्वारा रचित अमूर्त वस्तुओं को शामिल किया जाता है ।
( iii ) अभौतिक संस्कृति में विचार , भावनाएँ , ज्ञान , कला , प्रथा , विश्वास तथा कानून आदि को सम्मिलित किया जाता है । वास्तव में , विचारों तथा भावनाओं के स्तर पर संस्कृति अमूर्त होती है । ( iv ) व्यक्ति द्वारा समाज के सदस्य के रूप में सीखे तथा विकसित किए गए प्रतीक तथा संचार माध्यम भी संस्कृति में सम्मिलित किए जाते हैं । भाषा , वर्णला , धार्मिक चिह्न जैसे चाँद , सूरज , क्रास तथा स्वास्तिक आदि ऐसे प्रतीक चिन्ह जिनके पीछे एक अर्थ छिपा होता है ; इस प्रकार संस्कृति को उसके अर्थ के रूप में ही समझा जा सकता है ।
प्रश्न 9. “ क्या संस्कृति उच्च और निम्न हो सकती है ? ” समझाइए ।
उत्तर – समाजशास्त्रीय रूप से जैसा कि हरस्कोविट्स का मत है , ” संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है । ” प्रत्येक व्यक्ति समाज में रहकर व्यवहार के प्रतिमानों को सीखता रहता है । सीखने की यह प्रक्रिया सामाजिक अंत : क्रिया के माध्यम से शिशुकाल से ही शुरू हो जाती है । प्रत्येक समाज की संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमान भिन्न होते हैं जो उसे दूसरे समाज से पृथक करते हैं।         संस्कृति एक व्यापक तथा विस्तृत अवधारणा है जैसा कि टायलर ने लिखा है कि ” संस्कृति वह जटिल संपूर्णता है जिसके अन्तर्गत ज्ञान , विश्वास , कला , नैतिकता , कानून , प्रथा एवं सभी प्रकार की क्षमताएँ तथा आदतें , जो मनुष्य समाज के सदस्यों के नाते प्राप्त करता है , आती हैं । ” टायलर की परिभाषा से स्पष्ट है कि प्रत्येक संस्कृति ज्ञान , विज्ञान , कला , विश्वास तथा क्षमताओं आदि  के आधार पर पृथक् होती है । इस प्रकार संस्कृति की भिन्नता ही अलग – अलग सांस्कृतिक क्षेत्र बना देती है ।
  संस्कृतियों की उपलब्धियाँ भौतिक तथा अभौतिक सांस्कृतिक क्षेत्रों में उनकी प्रगति से आंकी जाती है। कुछ संस्कृतियों का भौतिक पक्ष अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील हो सकता है ।
‌  विभिन्न संस्कृतियों के बीच परस्पर आदान – प्रदान सदैव चलता रहता है । एक संस्कृति दूसरी संस्कृति के प्रतिमानों को ग्रहण करती है लेकिन कोई भी संस्कृति अपने मूल्यों का पूर्ण लुप्तिकरण नहीं चाहती है । भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान पश्चिमी संस्कृति को भारतीय संस्कृति पर थोपने का प्रयास किया गया , लेकिन इसका विरोध किया गया । इस प्रकार , साधारणतया एक संस्कृति दूसरी संस्कृति के भौतिक पक्ष को तो ग्रहण कर लेती है , लेकिन अभौतिक पक्ष के संदर्भ में ऐसा नहीं होता है । संस्कृति की संरचना चिंतन के प्रतिमानों , अनुभवों तथा व्यवहारों के माध्यम से होती है । चूँकि इन सभी तत्वों में भिन्नता पायी जाती है अतः विभिन्न संस्कृतियों में भिन्नता स्वाभाविक है ।
प्रश्न 10. संस्कृति को समाज से किस प्रकार भिन्न किया जा सकता है ?
उत्तर – संस्कृति तथा समाज दो पृथक् – पृथक् अवधारणाएं हो सकती हैं , लेकिन उनके बीच पाए जाने वाला संबंध इस अवधारणात्मक पर्दे को खत्म कर देता है । अध्ययन की सुविधा के लिए संस्कृति तथा समाज के संबंधों का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के तहत किया जा सकता है- ( i ) समाज तथा संस्कृति दोनों ही व्यक्तियों के बीच पारस्परिक अंत : क्रिया का परिणाम है । मेकाइवर तथा पेज के अनुसार , ” समाज सामाजिक संबंधों का जाल है । ” हॉबेल के अनुसार , ” सांस्कृतिक मनुष्य मस्तिष्क में उत्पन्न हुई है । “
( ii ) संस्कृति तथा समाज एक – दूसरे के पूरक हैं । कोई भी समाज संस्कृति के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता है , ठीक इसी प्रकार संस्कृति भी समाज के बिना सार्थक नहीं हो सकती है ।
( iii ) समाज संस्कृति के हस्तांतरण , गतिशीलता , परिवर्तन , विकास तथा सामंजस्य के लिए सामाजिक वातावरण प्रस्तुत करता है । दूसरी तरफ , संस्कृति के विकास के बिना सामाजिक परिवेश शून्य हो जाता है ।
( iv ) संस्कृति समाजीकरण की प्रक्रिया का मुख्य तत्व है । जन्म के समय बालक का स्वरूप प्राणिशास्त्रीय होता है । संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमान ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं । ( v ) संस्कृति सीखे हुए प्रतिमानों का कुल योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुण का नतीजा नहीं है ।
( vi ) संस्कृति वस्तुतः सामाजिक व्यवस्था का आधार होती है लेकिन समाज की अनुपस्थिति में सांस्कृतिक विकास सामाजिक निर्वात में नहीं हो सकता ।
इस प्रकार समाज तथा संस्कृति एक – दूसरे के पूरक होने के साथ अपरिहार्य भी हैं । एक की अनुपस्थिति में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है ।
प्रश्न 11. संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर – प्रतिमानात्मक आयामों का अर्थ -( i ) संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत नियमों , अपेक्षाओं तथा मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है ।
( ii ) प्रतिमानात्मक आयाम संस्कृति के दूसरे बड़े तत्त्व के रूप में जाने जाते हैं । संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों द्वारा व्यक्तियों के बीच अंत : क्रिया की पुनरावृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाता है । पूर्वानुमानों का इसमें आलोचनात्मक महत्त्व होता है। ( iii ) प्रतिमानों के द्वारा व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित किया जाता है । प्रतिमान जनरीतियों , रूढ़ियों , प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किए जा सकते हैं ।
( iv ) प्रतिमान की अवधारणा के अंतर्गत चिंतन के बजाए कार्य करने के तरीकों को अधिक महत्त्व प्रदान किया जाता है ।
( v ) आचरण में प्रतिमानों की उपस्थिति निहित होती है जबकि व्यवहार , आवेग अथवा प्रत्युत्तर हो सकता है । व्यक्ति के आचरण को मान्यता समाज द्वारा निर्धारित प्रतिमानों से ही प्राप्त होती है । प्रतिमान सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य हैं । इस प्रकार प्रतिमान तथा मूल्य संस्कृति को समझने हेतु एक केन्द्रीय अवधारणा है । प्रश्न 12. सांस्कृतिक विलंबन की अवधारणा की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर – सांस्कृतिक विलम्बन की अवधारणा : प्रसिद्ध समाजशास्त्री विलियम एफ ऑगवर्न द्वारा सांस्कृतिक विलंबन की अवधारणा का विकास किया गया है । समाज का आकार छोटा होने पर परिवर्तन की गति धीमी होती है तथा समाज में एकता पायी जाती है । ऐसी स्थिति में समाज में सामाजिक संतुलन पाया जाता है । दूसरी तरफ समाज में परिवर्तन की गति तीव्र होने पर शियानहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।
ऑगबर्न का मत है कि समय के संदर्भ में संस्कृति में सदैव परिवर्तन जारी रहता है । जैसा कि हम जानते हैं कि संस्कृति के दो पक्ष होते हैं -( i ) भौतिक पक्ष तथा ( ii ) अभौतिक पक्ष ।
संस्कृति के भौतिक पक्षों अर्थात् उत्पादन , तकनीक , उपकरण तथा यातायात एवं संचार के साधनों में तेजी से परिवर्तन होता है । जबकि , संस्कृति के अभौतिक पक्षों अर्थात् जनरीतियों , प्रथाओं , विचारों तथा विश्वासों आदि में परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत बहुत धीमी होती है । संस्कृति के दोनों पक्षों अर्थात् भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति में होने वाले परिवर्तन यदि साथ – साथ नहीं हो रहे हैं अथवा संस्कृति के जिस पक्ष में परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत धीमी है , तो तनाव तथा दबाव उत्पन्न होता है । इसके फलस्वरूप सांस्कृतिक संतुलन बिगड़ जाता है । संस्कृति के दोनों पक्षों के एकीकरण तथा पुनः सामंजस्य के स्तर तक पहुंचने में समय लगता है । ऑगवन ने इस स्थिति को सांस्कृतिक विलंबन का नाम दिया है । सांस्कृतिक विलंबन की स्थिति को एक उदाहरण से अच्छी तरह से समझा जा सकता है । ब्रिटिश शासन के दौरान अनेक भारतीयों ने अंग्रेजी शिक्षा तथा वेशभूषा को तो स्वीकार किया , लेकिन वे अपनी सामाजिक प्रथाओं तथा जाति व्यवस्था से पृथक् नहीं हो सके । कभी – कभी ऐसा भी होता है कि तीव्र गति से परिवर्तन होने की स्थिति में पुराने सांस्कृतिक प्रतिमान तो प्रभावहीन हो जाते हैं , लेकिन उनके स्थान पर नए सामाजिक प्रतिमान विकसित नहीं हो पाते हैं । ऐसी स्थिति में प्रतिमानहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।
प्रश्न 13. हम कैसे दर्शा सकते हैं कि संस्कृति के विभिन्न आयाम मिलकर समग्र बनाते हैं ?
उत्तर – संस्कृति के तीन आयाम प्रचलित हैं ( i ) संज्ञानात्मक – इसका संदर्भ हमारे द्वारा देखे या सुने गए को व्यवहार में लाकर उसे अर्थ प्रदान करने की प्रक्रिया से है । जैसे अपने मोबाइल फोन की घंटी को पहचानना , किसी नेता के कार्टून की पहचान करना ।
( ii ) मानकीय – इसका संबंध आचरण के नियमों से है । जैसे अन्य व्यक्तियों के पत्रों को न खोलना , निधन पर कर्मकांडों का निष्पादन ।
( iii ) भौतिक – इसमें भौतिक साधनों के प्रयोग से संभव कोई भी क्रियाकलाप शामिल है । भौतिक पदार्थों में उपकरण या यंत्र भी शामिल हैं । जैसे इंटरनेट चेटिंग , जमीन पर अल्पना बनाने के लिए चावल के आटे का उपयोग किया जाता है ।
               दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तरी।
          ( Long Answer Type Questions )
प्रश्न 1. संस्कृति को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर – संस्कृति का शाब्दिक अर्थ – संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के कोलरे ‘ शब्द से हुई है , जिसका अर्थ है कृषि कार्य अथवा जमीन जोतना । ( i ) संस्कृति का सामान्य अर्थ – मनुष्यों की समस्त कृतियाँ तथा सीखे हुए व्यवहार संस्कृति के अंतर्गत सम्मिलित किए जाते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते रहते हैं । प्रत्येक समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति होती है जो उसे दूसरे समाजों से पृथक् कर देती है । कोई भी व्यवहार जिसे व्यक्ति समाज से प्राप्त करता है अथवा जो समूह में सहभागिता के कारण व्यक्ति की आदत का हिस्सा बना जाता है , उसे सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है । अतः संस्कृति व्यक्ति द्वारा सीखने अथवा विकसित होने को वह प्रक्रिया है जो सामाजिक अंतःक्रिया के साथ – साथ चलती है । संस्कृति की परिभाषा – विभिन्न मानवशास्त्रियों तथा समाजशास्त्रियों तो ने संस्कृति की अवधारणा को अलग – अलग प्रकार से परिभाषित किया है-
यंग तथा मैक के अनुसार , ” संस्कृति सीखा हुआ तथा भागीदारी का व्यवहार है । “
हॉबेत के अनुसार , “ संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है । “
हकोविट्स के अनुसार , “ संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है । “
टायलर के अनुसार , ” संस्कृति वह जटिल संपूर्णता है जिसके अंतर्गत ज्ञान , विश्वास , कला , नैतिकता , कानून , प्रथा तथा सभी तरह की क्षमताएँ एवं आदतें जो व्यक्ति समाज के एक सदस्य के नाते प्राप्त करता है , आती हैं । “
राल्फ लिंटन के अनुसार , “ संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है , यह विचारों तथा आदतों का संग्रह है , जिन्हें व्यक्ति सीखते हैं , भागीदारी करते हैं तथा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को हस्तांतरिक करते हैं । “
क्लाइड क्लूखोन के अनुसार , ” संस्कृति व्यक्तियों के समग्र जीवन का एक तरीका है । ” संस्कृति की उपरोक्त परिभाषाओं से निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-
( i ) संस्कृति की उत्पत्ति व्यक्ति के मस्तिष्क से हुई है ।
( ii ) संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुणों का परिणाम नहीं है । ( iii ) संस्कृति का हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को होता है ।
( iv ) संस्कृति मनुष्य की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करती है ।
( v ) संस्कृति गतिशील तथा परिवर्तनशील होती है । प्रश्न 2. संस्कृति की अवधाराणा का उद्भव कैसे हुआ ?
उत्तर – संस्कृति का अर्थ : संस्कृति के अंतर्गत व्यक्तियों की समस्त कृतियाँ तथा सीखे हुए व्यवहार को सम्मिलित किया जाता है । यंग तथा मैक के अनुसार , ” संस्कृति सीखा हुआ और भागीदारी का व्यवहार है । ” व्यवहार का तात्पर्य विचार , भावना तथा बाह्य क्रियाओं से है । जहाँ तक किसी भी व्यवहार का संस्कृति का हिस्सा बनने का सवाल है , यह तभी होता है जबकि ज्यादातर समूह के सदस्यों की उसमें भागीदारी हो । इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति का विशेष व्यवहार संस्कृति नहीं हो सकता है । वास्तव में , जिस व्यवहार को व्यक्ति समाज से प्राप्त करता है या जो समूह में सहभागिता के कारण व्यक्ति की आदत का हिस्सा बन जाता है , उसे सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है । अत : कहा जा सकता है कि संस्कृति व्यक्ति द्वारा सीखने तथा विकसित करने की वह प्रक्रिया है जो सामाजिक अंतःक्रिया के साथ – साथ चलती है । प्रसिद्ध मानवशास्त्री टायलर के अनुसार , ” संस्कृति एक ऐसी जटिल संपूर्णता है जिसके अंतर्गत ज्ञान , विश्वास , कला , नैतिकता , कानून , प्रथा तथा समाज के एक सदस्य के रूप में मनुष्य द्वारा प्राप्त अन्य क्षमताएँ तथा आदतें शामिल की जाती हैं । हॉबेल ने भी कहा है कि ” संस्कृति सीखे हुए व्यवहारों या प्रतिमानों का कुल योग है । ” हरस्कोविट्स के अनुसार , ” संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है । ” उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर संस्कृति के निम्नलिखित प्रमुख तत्व हैं ( a ) व्यक्ति द्वारा समाज के सदस्य के रूप में धारण की गई आदतें तथा क्षमताएं ।
( b ) भाषा तथा उपकरण बनाने के तरीके ।
( c ) विश्वास , ज्ञान , कला , नैतिकता , प्रथा तथा कानून ।
( d ) सांस्कृतिक प्रतिमान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते हैं ।
( e ) संस्कृति सदैव गतिशील तथा परिवर्तनशील होती है ।
( ii ) संस्कृति का शाब्दिक अर्थ – संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के कोलरे शब्द से हुई है जिसका तात्पर्य कृषि कार्य करना अथवा जमीन जोतना है । 18 वीं तथा 19 वीं सदियों में संस्कृति शब्द व्यक्तियों के परिमार्जन के लिए प्रयोग होने लगा । इसी कारण राल्फ लिंटन ने कहा है कि ” संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है । इसमें व्यक्ति विचारों तथा व्यवहारों को सीखता है , एक – दूसरे से ग्रहण करता है तथा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को हस्तांतरित करता है । “
( iii ) भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति – भौतिक संस्कृति का स्वरूप मूर्त होता है । इसके अन्तर्गत उपकरण , प्रौद्योगिकी , उद्योग तथा यातायात एवं संचार को सम्मिलित किया जाता है । अभौतिक संस्कृति का स्वरूप अमूर्त होता है । इसके अंतर्गत विश्वास , ज्ञान विचार , कला , प्रथा तथा कानून आदि सम्मिलित किए जाते हैं ।
( iv ) संस्कृति के प्रमुख आयाम – संस्कृति के निम्नलिखित तीन प्रमुख आयाम हैं-
( a ) संज्ञानात्मक आयाम – संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों के अंतर्गत अंधविश्वासों , वैज्ञानिक तथ्यों , धर्म तथा कलाओं को सम्मिलित किया जाता है । ( b ) प्रतिमानात्मक आयाम – संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामां के अंतर्गत नियमों , अपेक्षाओं तथा मानकीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है ।
( c ) भौतिक आयाम – संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत मौलिक दशाओं का उल्लेख किया जाता है । इसमें आवास , कपड़ा , उपकरण , आभूषण , यातायात तथा संचार के साधनों को सम्मिलित किया जाता है ।
प्रश्न 3. समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका की विवेचना कीजिए ।
उत्तर – समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका – परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है । परिवार समाज का दर्पण है । इसके अंतर्गत समाज में पाए जाने वाले सभी आदर्श , मूल्य , प्रस्थितियाँ , व्यवहार प्रतिमान तथा भूमिकाएँ पायी जाती हैं । यही कारण है कि परिवार समाजीकरण की प्रक्रिया का सशक्त तथा प्राथमिक माध्यम है । समाजीकरण सीखने की प्रक्रिया है तथा इसके जरिए समाज की विशेषताओं तथा तत्त्वों को ग्रहण किया जाता है मेकाइवर के अनुसार , “ समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा समाजिक प्राणी एक – दूसरे के साथ अपने व्यापक तथा घनिष्ठ संबंध स्थापित करते हैं जिसमें वे एक – दूसरे से अधिकाधिक बंध जाते हैं तथा एक – दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों की भावना का विकास करते हैं , जिसमें वे अपने एवं दूसरों के व्यक्तित्व को अधिक अच्छी तरह समझने लगते हैं तथा जिसमें वे निकट एवं अधिक साहचर्य की जटिल संरचना का निर्माण करते हैं । “
पारिवार समाजीकरण के सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में : परिवार समाज का प्राथमिक समूह है । परिवार के सभी सदस्यों की अपनी – अपनी प्रस्थितियाँ तथा भूमिकाएँ होती हैं । उदहारण के लिए , माता – पिता तथा परिवार के अन्य सदस्य अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह निर्धारित मापदंडों के अनुरूप करते हैं । बच्चा परिवार के आदर्शों , मूल्यों तथा प्रतिमान को आत्मसात् करता है तथा उनके साथ अपना तादात्म्य कायम करता है । इस प्रकार परिवार बच्चे के समाजीकरण की प्रक्रिया की नर्सरी है , जहाँ से बच्चा समाजीकरण की प्रक्रिया से निकलकर समाज में अनुकूलन करना सीखता है । जॉनसन के अनुसार , “ परिवार विशेष रूप से इस प्रकार संगठित रहता है जो समाजीकरण को संभव बनाता है । ” किंबाल यंग के अनुसार , ” पारिवारिक स्थिति के अंतर्गत मौलिक अंत : क्रियात्मक साँचा बच्चे तथा माता का है । ” किंवाल यंग ने आगे कहा है कि ” समाज के अंतर्गत , समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सबसे महत्वपूर्ण है , इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता एवं पिता ही साधारणतया अत्यधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं । ‘
    अपने जन्म से लेकर तीन वर्ष तक बालक प्राय : परिवार से बाहर कोई संबंध नहीं रखता है । परिवार के सदस्यों के मूल्यों , प्रतिमानों तथा व्यवहारों आदि का बच्चे के समाजीकरण पर काफी अधिक प्रभाव पड़ता है । उदाहरण के लिए , जो माता – पिता परिवार में बच्चों को सशक्त सामाजिक तथा सांस्कृतिक आधार प्रदान करते हैं , उन परिवारों में समाजीकरण की प्रक्रिया निर्दोष रूप से चलती रहती है ।
   दूसरी तरफ , जिन परिवारों में बच्चों को संतुलित सामाजिक तथा सांस्कृतिक आधार नहीं मिल पाता , वहाँ समाजीकरण की प्रक्रिया में बाधा पड़ जाती है । प्रत्येक परिवार अपने बच्चों को समाज के मूल्यों तथा प्रतिमानों के अनुरूप ढालने का प्रयास करता है।
   किंबल यंग के अनुसार सांस्कृतिक अनुकूलन परिवार में ही होता है । किंबाल यंग ने इस बारे में लिखा है कि ” यह इस प्रकार से माना गया है जिसमें परिवार के सदस्य और विशेष रूप से माता पिता एक दिए हुए समाज के मौलिक सांस्कृतिक प्रतिमानों का परिचय बच्चे को देते हैं । ” अंततः हम कह सकते हैं कि परिवार समाजीकरण की प्रक्रिया का अत्यंत महत्वूपर्ण तथा निर्णायक माध्यम है । प्रश्न 4.समाजीकरण की प्रक्रिया में व्यक्ति के विकास का वर्णन कीजिए ।
उत्तर – समाजीकरण की प्रक्रिया तथा व्यक्ति का विकास-( i ) सामाजीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति समाज के आदर्शों , प्रतिमानों , मूल्यों तथा व्यवहारों को सीखता है । जॉनसन के अनुसार , “ समाजीकरण एक सोखता है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने योग्य बनाता है । “
( ii ) समाजीकरण प्रत्येक समाज में पाया जाता है। इस प्रक्रिया के द्वारा प्राणी न केवल सामाजिक मनुष्य बनता है वरन् मानव भी बनता है ।
( iii ) जन्म के समय मनुष्य पशु के समान होता है । समाज में ही मनुष्य का समाजीकरण होता है । प्रसिद्ध विद्वान अरस्तू के अनुसार , ” मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । ” प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैक्डूगल ने सामूहिकता की मूल प्रवृत्ति का उल्लेख किया है ।
( iv ) यदि व्यक्ति को जन्म के समय सामाजिक परिवेश नहीं मिल पाता है तो वह सामाजिक मानव नहीं बन पाता है ।
इस संबंध में निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं-
 ( i ) कमला तथा अमला -1920 ई ० में बंगाल में पादरी जे . सिंह को भेड़ियों के पास से दो बच्चे मिले । कमला की आयु 8 वर्ष थी तथा अमला की 17 वर्ष थी । ये बच्चे भेड़ियों के समान ही रहते थे तथा खाते थे । दिन के समय ये बच्चे अधिक चलते – फिरते नहीं थे , जबकि रात के समय घूमते थे । सामाजिक परिवेश में पालन – पोषण के बाद इनके व्यवहार तथा मूल प्रवृत्तियों में परिवर्तन आया । अमला की मृत्यु 15 महीने बाद हो गई । कमला 5 % साल तक लगातार सीखने के बाद भी ठीक से नहीं चल पाती थी । दौड़ने के समय हाथों का प्रयोग करती थी । वह केवल 45 शब्द ही सीख पायी । 17 वर्ष की आयु में उसकी भी मृत्यु हो गयी ।
( ii ) अवेरान का जंगली बालक – फ्रांस के अवैरान जगल में एक बालक मिला था । वह जानवरों की तरह खाता था तथा उन्हीं की तरह हरकतें करता था । फ्रांस के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक पिनेल ने इस बालक को जड़बुद्धि कहकर छोड़ दिया । 11 वर्ष की आयु में भी यह बालक । साल के बालक की क्षमताएँ रखता था । ईतार्द ने पिनेल के विश्लेषण को स्वीकार नहीं किया । उसने कहा कि यदि यह बालक जड़बुद्धि होता तो जंगल की विषम परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाता । ईताई ने उसे पाला । धीरे – धीरे वह बालक समाजीकरण की धारा में बहने लगा । वह गर्मी तथा सर्दी में अंतर करने लगा । यद्यपि वह बोलना तो नहीं सीख सका तथापि प्रसन्नता तथा क्रोध के उद्वेगों को प्रकट करने लगा । सांकेतिक भाषा का प्रयोग करने लगा । उदाहरण के लिए , यदि वह बालक दूध चाहता था तो दूध का बर्तन आगे कर देता था । ईताद ने The Wild Boy of Aveyron में लिखा है कि ‘ विक्टर ने एक जंगली से यह सीखा कि किस प्रकार मानव समाज में रहना चाहिए तथा साधारण इच्छाओं को किस प्रकार एक लिखित भाषा में अभिव्यक्त करें , लेकिन उसने अन्य समान आयु के बालकों से कभी योग्यता की बारबरी नहीं की । बचपन में मानव समाज के अभाव ने बालक में इतनी अधिक रुकावटें उत्पन्न कर दी कि अत्यधिक प्रयत्लों के बावजूद भी बहुत कम परिणाम निकले । इसके अतिरिक्त , अन्ना तथा ईजावेल के उदाहरण भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जन्म के समय मनुष्य केवल एक पशु होता है , समाज ही उसे मानव बनाता है । समाज में अंतःक्रिया द्वारा ही व्यक्ति सामाजिक गुणों , व्यवहारों , आदर्शा , प्रतिमानों तथा मूल्यों को सीखता है । गिटलर के अनुसार , “ सामाजिक जीव बनने के लिए , मनुष्य को आदतें , विश्वासों , ज्ञान , अभिवृत्तियों तथा स्थायी भावों जैसे उच्च जैविक लक्षणों को प्राप्त करना चाहिए , जो उसमें अन्य व्यक्तियों की संगति से विकसित होते हैं तथा जिनमें ये गुण पाए जाते हैं । ” अंत में कहा जा सकता है कि बचपन से लेकर मृत्यु मनुष्य तक समाज से कुछ न कुछ सीखता रहता है । समाज के मूल्यों , आदर्शों , प्रतिमानों के साथ तादाम्य ही समाजीकरण कहलाता है । समाजीकरण के मुख्य चरण – समाजीकरण की प्रक्रिया के निम्नलिखित चरण व्यक्ति के विकास में सहायक हैं-
( 1 ) शिशु का समाजीकरण – शैशवावस्था में समाजीकरण की प्रक्रिया परिवार में होती है । बच्चा अपने माता – पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों से सामाजिक अंत : क्रिया करता है । परिवार में ही वह भाषा , चलना – फिरना तथा खाना – पीना सीखता है । यह समाजीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण है।
( 11 ) बालक का समाजीकरण – समाजीकरण के द्वितीय चरण में बालक पड़ोस , मित्रमंडली , विद्यालय , अध्यापकों तथा सहपाठियों के संपर्क में आता है । उसकी सामाजिक अंत : क्रिया का क्षेत्र व्यापक हो जाता है ।
( iii ) किशोरावस्था में समाजीकरण – समाजीकरण का यह तीसरा चरण है । इस अवस्था में समाजीकरण परिवेश से अत्यधिक प्रभावित होता है। नगरीय , ग्रामीण तथा जनजातीय इलाकों में समाजीकरण के अभिकर्ता पृथक् – पृथक होते हैं । ( iv ) वयस्क समाजीकरण – समाजीकरण की प्रक्रिया के इस चरण में समाजीकरण में आयाम तथा अभिकर्ता बदल जाते हैं । समाजीकरण का दायरा अत्यधिक व्यापक हो जाता है । व्यक्ति भविष्य की विभिन्न भूमिकाओं की तैयारी वर्तमान में ही करने लगता है । इस प्रकार के समाजीकरण को पूर्वपेक्षित समाजीकरण कहते हैं ।
प्रश्न 5. संस्कृति की विशेषताओं की सूची दीजिए । उत्तर – हरस्कोविट्स का मत है कि ” संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है । ” सी.एस.कून ने कहा है कि ” संस्कृति उन विधियों का कुल योग है , जिनमें मनुष्य एक पौढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सीखने के कारण रहता है । “
संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
( i ) संस्कृति व्यक्तियों की कृति है – संस्कृति का निर्माण , विकास तथा गति व्यक्तियों के बीच सांस्कृतिक अंत : क्रिया के जरिए होती है । होबेल के अनुसार , “ संस्कृति व्यक्ति के मस्तिष्क में उत्पन्न हुई है । ” व्यक्तियों में संस्कृति का निर्माण करने तथा उसे ग्रहण करने की क्षमता होती है । यही कारण है कि कोंत तथा क्रोबर ने व्यक्ति को अतिप्राणी कहा है ।
( ii ) संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है – संस्कृति को व्यक्तियों द्वारा सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग कहा जाता है । व्यक्ति सांस्कृतिक प्रतिमानों के विभिन्न स्वरूपों को समाज में रहकर ही सीखता है । हॉबेल के अनुसार , “ संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुण का परिणाम नहीं है । “
( iii ) संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरिक होती है – संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरण सतत् रूप से चलता रहता है । सी ० एस ० कून के अनुसार , “ संस्कृति उन विधियों का कुल योग है , जिनमें व्यक्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सीखने के कारण रहता ( iv ) संस्कृति व्यक्तियों की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है – संस्कृति मनुष्य की सामाजिक तथा प्राणिशास्त्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। मेलिनवॉस्की ने मानव आवश्यकताओं को निम्नलिखित तीन श्रेणीयों में बाँटा है-
( a ) प्राथमिक अथवा मौलिक आवश्यकताएँ – भोजन तथा मैथुन आदि मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं । ये मनुष्य के सामाजिक तथा प्राणिशास्त्रीय अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं ।
( b ) द्वितीयक आवश्यकताएँ – द्वितीयक आवश्यकताओं में उन सभी कार्यों तथा प्रविधियों को सम्मिलित किया जाता है जो मनुष्य के जीवन के सुगम संचालन हेतु आवश्यक हैं ।
( c ) तृतीयक आवश्यकताएँ – तृतीयक आवश्यकताओं के अंतर्गत शिक्षा , धर्म , राजनीति तथा आर्थिक संस्थाएँ , विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी आदि आते हैं ।
( v ) भाषा संस्कृति का मुख्य वाहक है – भाषा के माध्यम से ही संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमानों का पीढ़ी – दर – पीढ़ी हस्तांतरण होता रहता है । इस प्रकार , भाषा संचित ज्ञान को हस्तांतरित करने का मुख्य वाहक है ।
( vi ) संस्कृति की प्रकृति गतिशील होती है – संस्कृति कभी भी स्थिर नहीं होती है । यह सदैव गतिशील रहती है । यह गति कम या अधिक हो सकती है । जैसा कि हम जानते हैं कि भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति गतियों में अन्तर आने से सांस्कृतिक विलंबन की स्थिति हो जाती हैं । ( vii ) संस्कृति सदैव आदर्शात्मक होती है : संस्कृति व्यक्ति के समक्ष समूह के आदर्श तथ्य प्रस्तुत करती है । ये आदर्श तथा प्रतिमान ही मनुष्य के व्यक्तित्व के प्रमुख तत्व होते हैं । संस्कृति प्रत्येक परिस्थिति के लिए मानव व्यवहार के आदर्श प्रतिमान प्रस्तुत करती है ।
( viii ) सामाजिक व्यवस्था का प्रमुख आधार : संस्कृति सामाजिक प्रतिमानों , सामाजिक संरचना तथा सामाजिक व्यवस्था का निर्माण तथा विकास करती है । इस प्रकार , संस्कृति सामाजिक व्यवस्था का आधार है ।
हरकोविट्स ने संस्कृति के निम्नलिखित लक्षण बताए हैं-
( i ) संस्कृति एक सीखा हुआ तथा अर्जित व्यवहार है ।
( ii ) संस्कृति मानव अनुभवों के प्राणिशास्त्रीय पर्यावरण संबंधी मनोवैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक तत्वों से प्राप्त होती है ।
( iii ) संस्कृति संरचित होती है । इसके अंतर्गत चिंतन , भावनाओं तथा व्यवहारों के संगठित प्रतिमान सम्मिलित होते हैं ।
( iv ) संस्कृति को पहलुओं में विभाजित किया जाता है ।
( v ) संस्कृति गतिशील होती है
( vi ) संस्कृति परिवर्तनशील तथा सापेक्षिक होती है।
( vii ) संस्कृति के द्वारा नियमितताओं को प्रदर्शित किया जाता है जो कि विज्ञान की पद्धतियाँ के द्वारा इसके विश्लेषण की अनुमति देता है ।
( viii ) संस्कृति एक यंत्र है जिसमें व्यक्ति सामंजस्य तथा संपूर्ण समायोजन द्वारा रचनात्मक अनुभवों को प्राप्त करता है ।
प्रश्न 6. संस्कृति के मुख्य अंग कौन से हैं ?
उत्तर- राल्फ लिंटन के अनुसार , “ संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है । इसमें व्यक्ति विचारों तथा व्यवहारों को सीखता है , एक – दूसरे से ग्रहण करता है तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करता है । “
संस्कृति के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं-
( i ) संज्ञानात्मक आयाम , ( ii ) प्रतिमानात्मक आयाम , ( iii ) भौतिक आयाम ।
( i ) संज्ञानात्मक आयाम- ( a ) संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम के अंतर्गत अंधविश्वास , वैज्ञानिक तथ्य , मिथक , कला तथा धर्म सम्मिलित हैं ।
( b ) संज्ञानात्मक आयाम संस्कृति के एक महत्वपूर्ण तत्व हैं जो चिंतन की पद्धतियों को प्रतिबिंबित करते हैं । विचारों के द्वारा संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम को स्पष्ट किया जाता है जिसमें ज्ञान तथा विश्वास सम्मिलित होते हैं । विचार समाज में रहने वाले व्यक्तियों की बौद्धिक धरोहर होते हैं । शिक्षित समाज में विचारों को पुस्तकों तथा दस्तावेजों के रूप में अभिलेखित कर लिया जाता है ।
( c ) दूसरी तरफ अशिक्षित समाज में विचारों का निर्माण लोकरीतियों तथा जनजातीय दंत कथाओं से होता है । इस प्रकार विचार संस्कृति का प्रथम मुख्य तत्व है ।
( d ) जहाँ तक संज्ञान की प्रक्रिया का सवाल है , इसके निर्माण में सभी लोग भागीदारी करते हैं , सभी लोग चिंतन करते हैं , अनुभव करते हैं पहचानते हैं तथा अतीत की वस्तुओं का स्मरण करते हैं व उन्हें वास्तविक तथा काल्पनिक भविष्य के बारे में प्रक्षेपित करते हैं । संज्ञान एक सामाजिक प्रक्रिया है जो व्यक्तियों को समझने के योग्य बनाती है तथा उन्हें उनके वातावरण से संबद्ध करती है । ( e ) संस्कृति द्वारा सांस्कृतिक विश्वासों को व्यापक आधार पर स्वीकार किया जाता है । कुछ विश्वास , आदतें तथा परम्पराएँ सत्ता की अपील पर माने जाते हैं लेकिन वास्तविक रूप से ये असत्य होते हैं । दूसरी तरफ , जो आदतें तथा परंपराएँ अन्य अधिकारिक स्रोतों पर आधारित होती हैं तथा जिन्हें आलोचनात्मक अवलोकन द्वारा प्रमाणित किया जाता है , उन्हें सत्य – स्वीकार किया जाता है ।
( ii ) प्रतिमानात्म आयाम- ( a ) संस्कृति के प्रतिनात्मक आयामों के अंतर्गत नियमों , अपेक्षाओं तथा मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है ।
( b ) प्रतिमानात्मक आयाम संस्कृति के दूसरे बड़े तत्व के रूप में जाने जाते हैं । संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों द्वारा व्यक्तियों के बीच अंत : क्रिया को प्रोत्साहित किया जाता है । पूर्वानुमानों का इसमें आलोचनात्मक महत्त्व होता है ।
( c ) प्रतिमानों के द्वारा व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित किया जाता है । प्रतिमान जनरीतियों , रूढ़ियों , प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किए जा सकते हैं । प्रतिमान की अवधारणा के अंतर्गत चिंतन बजाए कार्य करने के तरीकों को अधिक महत्व प्रदान किया जाता है ।
( d ) आचरण में प्रतिमानों की उपस्थिति निहित होती है जबकि व्यवहार , आवेग अथवा प्रत्युत्तर हो सकता है । व्यक्ति का आचरण मान्य समाज द्वारा निर्धारित प्रतिमानों से ही प्राप्त होती है । प्रतिमान सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य हैं । इस प्रकार , प्रतिमान तथा मूल्य संस्कृति को समझने हेतु एक केन्द्रीय अवधारणा है । ( iii ) भौतिक आयाम- ( a ) संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत कुछ वस्तुएँ जैसे कि कपड़ा , आवास , उपकरण , आभूषण , रेडियो तथा संगीत वाद्ययंत्र आदि आते हैं ।
( b ) भौतिक आयामों में उन वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है , जिन्हें समाज के सदस्यों द्वारा ग्रहण किया जाता है अथवा जिन्हें वे उपयोग में लाते हैं । ( c ) व्यक्तियों द्वारा रचित मूर्त वस्तुओं को भौतिक संस्कृति कहते हैं । पदार्थ अत्यधिक स्पष्ट होने के कारण संस्कृति को जानने का सरलतम स्वरूप है । ( d ) भौतिक संस्कृति के साथ अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों तथा प्रतिमानात्यक आयामों को सम्मिलित किया जाता है । भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति के तत्वों में घनिष्ठ संबंध होता है ।
प्रश्न 7.समाजीकरण के विभिन्न अभिकरणों अथवा संस्थाओं का वर्णन कीजिए ।
उत्तर – समाज समाजीकरण की प्रक्रिया को संभव बनाता है । इस संबंध में किंबाल यंग ने उचित ही कहा है , ” समाज के अंतर्गत , समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सर्वाधिक महत्वपूर्ण है , इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता तथा पिता ही साधारणतया अत्यधि क महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं । “
  समाजीकरण के अन्य माध्यमों में पड़ोस , संबंधी , प्राथमिक समूह के सदस्य , साथ ही साथ द्वितीयक समूह बाद की सदस्यता में आते हैं । “
समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण निम्नलिखित हैं- ( i ) परिवार – परिवार समाजीकरण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अभिकरण है । परिवार समाज के आदर्शा , मूल्यों , प्रतिमानों तथा व्यवहारों का प्रतिनिधित्व करता है । समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक है । जॉनसन के अनुसार , ” परिवार विशेष रूप से इस प्रकार संगठित रहता है जो समाजीकरण को संभव बनाता है । ” परिवार की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति का बच्चों के विकास पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है । किंबाल यंग के अनुसार , ” ……. जिसमें परिवार के सदस्य तथा विशेष रूप से माता तथा पिता एक दिए हुए समाज के मौलिक सांस्कृतिक नियमों से बच्चे को परिचय दिलाते हैं । “
( ii ) समान आयु समूह – समान आयु समूह समाजीकरण का प्राथमिक तथा सशक्त अभिकरण है । बच्चा परिवार से बाहर आपनी आयु के बच्चों के साथ अंत : क्रिया करता है वह अन्य बच्चों के साथ खेलता है तथा पारस्परिकता के नए आयाम सीखता है ।
( iii ) पड़ोस – पड़ोस भी समाजीकरण का सशक्त माध्यम है । बच्चे पड़ोस में रहने वाले व्यक्तियों के संपर्क में आकर अनेक बातें सीखते हैं ।
( iv ) नातेदारी समूह – नातेदारी समूह भी समाजीकरण के महत्वपूर्ण अभिकरण हैं । नातेदारी समूहों में बच्चे समाजीकरण की अनेक बातें सीखते हैं ।
( v ) शिक्षा संस्थाएँ – शिक्षण संस्थाएँ समाजीकरण का द्वितीयक तथा औपचारिक माध्यम हैं । बच्चा स्कूल में अपने सहपाठियों तथा अध्यापकों के संपर्क में आकर अनेक बातें सीखता है ।
( vi ) अन्य द्वितीयक समूह : प्राथमिक समूहों के अलावा द्वितीयक समूह भी समाजीकरण की प्रक्रिया में महत्वूपर्ण भूमिका निभाते हैं । द्वितीयक समूहों के अंतर्गत राजनीतिक दल , जाति , सांस्कृतिक समूह , वर्ग , भाषा समूह , धार्मिक समूह तथा व्यावसायिक समूह आदि आते हैं ।
प्रश्न 8. समाजीकरण के महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का आलोचनात्मक विवेचना कीजिए ।
अथवा , फ्रायड के समाजीकरण की तीन अवस्थाएं क्या हैं ?
उत्तर -समाजीकरण के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-
( i ) कुले का “ आत्मदर्पण ” का सिद्धान्त – प्रसिद्ध समाजशास्त्री चार्ल्स एच . कूले ने अपनी पुस्तक ‘ Human Nature and the Social Order में आत्मदर्पण ‘ की अवधारणा का उल्लेख किया है । कूले के अनुसार स्व का विकास व्यक्त्वि तथा समाजीकरण के विकास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है । कूले के अनुसार स्व के विकास तथा व्यक्तित्व निर्माण में निम्नलिखित तीन तत्व महत्वपूर्ण हैं-
( a ) अन्य व्यक्तियों की दृष्टि में हमारे स्वरूप तथा आकृति की कल्पना ।
( b ) स्वयं की कल्पना में वह जैसा दिखाई पड़ता है , उस पर वह स्वयं के विषय में क्या निर्णय करता है।
( c ) गौरव तथा ग्लानि से युक्त आत्मबोध । कूले का मत है कि ‘ स्व ‘ अथवा ‘ मैं ‘ की अवधारणा का विकास दूसरे व्यक्तियों के संपर्क में आने से ही होता है । इस प्रकार , ‘ स्व ‘ का विचार सामाजिक उत्पाद है , जिसे सामाजिक स्व भी कहते हैं । कूले का मत है कि स्व का विकास समाज में होता है । यह अन्य व्यक्तियों के साथ पारम्परिक अंत : क्रिया के द्वारा उत्पन्न होता है । नवजात शिशु का अपना कोई ‘ स्व ‘ नहीं होता है । उसकी अपने विषय में उसी समय रुचि जागृत होती है जब वह सचेत होता है । यदि समाज में बालक के व्यवहार का व्यक्तियों द्वारा प्रशंसा की जाती है तो वह गर्व का अनुभव करता है। दूसरी तरफ , यदि उसके व्यवहार की आलोचना की जाती है तो ग्लानि का अनुभव करता है । बालक के व्यवहार की निरंतर प्रशंसा होने पर उसमें आत्मविश्वास उत्पन्न होता है तथा बाह्यमुखी व्यक्तित्व का विकास होता है । दूसरी तरफ , निरन्तर आलोचना होने की स्थिति में बालक हतोत्साहित हो जाता है तथा अंतर्मुखी व्यक्तित्व का विकास होता है। समाज में व्यक्ति के विचार , मनोवृत्तियाँ , मूल्य , आदर्श , प्रतिमान तथा आदतें उसके निकट इन्हीं कारकों पर निर्भर करता है । रहने वाले व्यक्तियों के विचारों तथा मनोवृत्तियों पर आधारित होते हैं तथा बालक का समाजीकरण कूले का मत है कि प्राथमिक समूह जैसे परिवार , मित्र , समूह तथा पड़ोस आदि समाजीकरण में निर्णायक तथा प्रभावी भूमिका निभाते हैं । प्राथमिक समूहों में आमने – सामने के अनौपचारिक संबंध होते हैं । कूले का मत है कि स्व के विकास में यही जानना आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति एक – दूसरे  के प्रति किस तरह सोचते हैं तथा वया निर्णय देते हैं , वरन् स्वयं को दूसरे व्यक्तियों के निर्णय के दर्पण में देखना भी आवश्यक है ।
( ii ) मीड की भूमिका ग्रहण का सिद्धान्त : मीड का मत है कि ‘ स्व ‘ की धारणा का अस्तित्व एवं विकास अन्य व्यक्तियों की भूमिका ग्रहण करने पर निर्भर करता है । दूसरों से भूमिका ग्रहण करने का तात्पर्य है कि हम अन्य व्यक्तियों के विचार तथा भावनाओं को स्वीकार करते हैं । उदाहरण के लिए , इस शृंखला में सर्वप्रथम माता – पिता तथा परिवार के अन्य सदस्य तथा फिर मित्र व अध्यापक आदि आते हैं ।
   मीड का विचार है कि व्यक्तियों की अंत : क्रिया का आधार प्रतीक होते हैं । प्रतीक निर्मित होते हैं एवं वस्तु अथवा घटक की आंतरिक प्रकृति से इनका कोई संबंध नहीं होता है । मानव अंतःक्रिया के लिए प्रतीक अपरिहार्य हैं । अत : हम कह सकते हैं कि समाज के अस्तित्व के लिए प्रतीक आवश्यक हैं । मानव समाज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतीक भाषा है । इसलिए , प्रतीकों में समाज के सदस्यों द्वारा भाग लिया जाता है । पीड ने इस प्रक्रिया को भूमिका ग्रहण कहा है । में भूमिका ग्रहण की प्रक्रिया बच्चे के जन्म से ही आरंभ हो जाती है । आरंभ में बच्चों के द्वारा माता – पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों की भूमिकाओं से तादात्म्य स्थापित किया जाता है । मीड इस प्रकार के तादात्म्य को विशिष्ट अन्य का नाम देता है । बच्चे के विकास के साथ – साथ उसका तादात्म्य सामान्यीकृत अन्य के साथ हो जाता है । जब तक बच्चा दूसरों के साथ तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता या अन्यों की भूमिकाओं को समझ नहीं पाता है वह केवल ‘ मैं ‘ होता है , लेकिन जब बच्चे का सामान्यीकृत अन्य की भूमिकाओं से तादात्म्य हो जाता है तो उसका मैं ‘ मुझ ‘ में बदल जाता है । मैं का मुझ में परिवर्तन बच्चे के समाजीकरण के विषय में बताता है ।
     जॉर्ज हरबर्ट मीड का मत है कि व्यक्ति तथा समाज को पृथक नहीं किया जा सकता है । समाज ही व्यक्ति को एक मानव प्राणी के रूप में परिवर्तित करता है । व्यक्ति द्वारा पहले सामाजिक पर्यावरण की रचना की जाती है , इसके बाद वह उसी से आकृति प्राप्त करता है । समाज में अन्य व्यक्तियों के साथ अंत : क्रिया से व्यक्ति के स्व का विकास होता है । अंतः क्रिया के लिए संचार आवश्यक है । संचार का आधार प्रतीक होते हैं , जिन्हें व्यक्तियों द्वारा परस्पर समझा जाता है ।
( iii ) फ्रायड का विश्लेषणात्मक सिद्धान्त – फ्रायड ने समाजीकरण के सिद्धान्त में कहा है कि व्यक्तियों का निर्माण व्यक्ति में पायी जाने वाली जैविकीय , मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक क्षमताओं के मध्य होने वाली क्रियाओं का परिणाम होता है । फ्रायड का मत है कि बच्चे में व्यक्तित्व का प्रमुख भाग 5 वर्ष की आयु तक विकसित हो जाता है । व्यक्ति के शेष जीवन काल में इसी व्यक्तित्वों का विस्तार होता है ।( a ) चेतन ,( b ) अवचेतन तथा ( c ) अचेतन। मानव मस्तिष्क का चेतन क्षेत्र उसे जीवन की वर्तमान घटना तथा क्रियाओं से संबद्ध होता है । मस्तिष्क के अचंतन क्षेत्र में निकट भूत की घटनाओं तथा अनुभवों के एकत्रीकरण होता है । मस्तिष्क के अवचेतन क्षेत्र में भूतकाल की घटनाओं के अनुभव होते हैं । मानव मस्तिष्क में एकत्रित अनुभव व्यविषय के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । ये अनुभव किसी न किसी रूप में प्रकट होने का प्रयास करते रहते हैं । फ्रायड व्यक्तियों के निर्माण में निम्नलिखित तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं को महत्वपूण मानते हैं- ( a ) इड , ( b ) अहं . ( c ) पराअहं ।
 उपरोक्त वर्णित अवस्थाएँ परस्पर अंत : क्रिया करती हैं तथा इससे मानव व्यवहार का जन्म होता है ।
  फ्रायड ने इड को वास्तविक मानिसक यथार्थ माना है । इसके अंतर्गत व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक , आनुवंशिकी तथा मूल प्रवृत्ति सम्मिलित होती है । यह सुख के सिद्धान्त पर कार्य करता है तथा व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक कर्जा का भंडार है । इड समाज के नियमों , मूल्यों तथा आदर्शों से दूर रहता है । इसका मूल उद्देश्य किसी भी तरह से अपनी जरूरतों की पूर्ति करना है । भले ही वह पूर्ति कल्पना या स्वप्न में हो , लेकिन मात्र कल्पना से तो जरूरत पूरी होने का तनाव कम हो सकता । उदाहरण के लिए , पानी की कल्पना प्यास शांत नहीं कर सकती । इसके बाद , द्वितीय मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का निर्माण होता है । इसे अहं कहते हैं । अहं का प्रकार्य वास्तविक सिद्धान्त पर आधारित होता है । जहाँ तक इड तथा अहं में अंतर का प्रश्न है ; इड मस्तिष्क के विषयक यथार्थ को जानता है , जबकि अहं वस्तुगत यथार्थ तथा विषयक यथार्थ में अंतर करता है । अहं की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि मूर्त साधनों पर निर्भर करता है । व्यक्ति की विभिन्न जरूरतें केवल काल्पनिक साधनों से पूर्ण नहीं हो सकती । अहं इस बात का भी विश्लेषण करता है कि समाज के लिए क्या उचित या क्या अनुचित है ? अहं इड के लक्ष्यों में रुकावट नहीं डालता वरन् उन्हें संगठित रूप में आगे बढ़ाता है । व्यक्तित्व की तृतीय अवस्था परामहं है । यह मानव व्यक्तित्व का नैतिक पहलू है , जो आदर्शवाद के सिद्धान्त से निर्देशित होता है । परामहं समाज में ठन मूल्यों , आदशों तथा प्रतिमानों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें बच्चे ने समाजीकरण की प्रक्रिया के समय आत्मसात् कर लिया है । पराअहं का मुख्य उद्देश्य इस बात का निर्णय करना है कि मानव की आवश्यकतओं को पूरा करने के लिए जिन साधनों को चुना गया है वे समाज द्वारा स्थापित प्रतिमानों के अनुसार उचित हैं अथवा अनुचित । पराअहं के मुख्य कार्य की उन तीव्र इच्छाओं पर नियंत्रण लगाना है , जो समाज द्वारा स्वीकृत नहीं है । इड , अहं तथा पराअहं क्रमश : जैविकीय , मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक कारक हैं , जो वस्तुतः एक – दूसरे को संतुलित करने का कार्य करते हैं । इन्हीं से व्यक्तित्व का निर्माण तथा विकास हता है । अहं के अव्यवस्थित होने पर व्यक्तित्व का विकास अव्यवस्थित हो सकता है । इस प्रकार की स्थिति में इड अहं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है तो व्यक्तित्व के अनैतिक तथा आपराधिक होने की संभावना बढ़ जाती है ।
प्रश्न 9. उल दो संस्कृतियों की तुलना करें जिनसे आप परिचित हों । क्या नृजातीय बनना कठिन नहीं है?
 उत्तर – पाषाणयुगीन तथा कांस्ययुगीन संस्कृति में तुलना-
         >>>>पाषाणयुगीन संस्कृति<<<<
( i )हथियार एवं औजार पत्थर के थे । वर्तन मिट्टी या पत्थर के बनाए जाते थे ।
( ii ) खेती हाथ या लकड़ी को कुदाल से की जाती थी । अत : कृषि सीमित होती थी ।
iii ) जीवन सर्वथा ग्रामीण था , आत्म – निर्भर ग्रामीण व्यवस्था थी ।
( iv ) लोग प्रायः पैदल चलते थे । भार ढोने के लिए पशुओं का तथा नदियों में लट्ठों को बांधकर उन पर बोझ रखा जाता था ।
( v ) रेशों से मोटे व भद्दे दिखाई देने वाले वस्त्र बनाए जाते थे ।
( vi ) भाषा तो थी , परन्तु अभी लोपि का आविष्कार नहीं हुआ था ।
( vii ) मानव का ज्ञान सीमित था और विकास धीमी तथा थोड़ा था।
( viii ) कार्य विभाग मनोरंजन व शिकार और पेट भरने तक ही सीमित था ।
       >>>>कांस्ययुगीन संस्कृति<<<<
( i ) हथियारों , औजारों और बर्तनों के लिए , ताँबा , कांसा आदि धातुएँ प्रयोग में लाई जाती थीं ।
( ii ) कृषि यंत्र तथा लकड़ी और कांसे के फल वाले हल प्रयोग में लिए जाते थे । सिंचाई के लिए नहरें थीं ।
( iii ) अधिक कृषि उपज के उपयोग और कृषि उपयोगी व्यवसायों की जरूरत ने नगरों को जन्म दिया । व्यापार , विनिमय , मुद्रा आदि से आर्थिक विकास हुआ । नए शिल्पी और दस्तकार उभरकर सामने आए ।
( iv ) जल नौकाएँ , पहिएदार बैलगाड़ियाँ तथा सवारियों के लिए पशुओं का प्रयोग किया जाता था। ( v ) ऊन – रेशे और कपास के सुंदर एवं उपयोगी वस्त्र बनाए जाने लगे थे ।
( vi ) विभिन्न सभ्यताओं की अपनी – अपनी लिपियाँ थीं और अपना साहित्य था ।
( vii ) ज्ञान – विज्ञान , आविष्कार एवं यंत्रीकरण ने मानव विकास की गति तीव्र कर दी ।
( viii ) शिकार के अतिरिक्त चौपड़ , चित्रकारी व मूर्तिकला , संगीत , नृत्य और धार्मिक सामाजिक उत्सव प्रिय शौक थे ।
क्या नृजातीय बनाना कठिन नहीं है ?
जब संस्कृतियों एक – दूसरे के संपर्क में आई तभी नृजातीयता की उत्पति हुई । नृजातीयता से आशय अपने सांस्कृतिक मूल्यों का अन्य संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार तथा आस्थाओं का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग करने से है । इसका अर्थ है कि जिन सांस्कृतिक मूल्यों को मानदंड या मानक के रूप में प्रदर्शित किया गया था उन्हें अन्य संस्कृतियों की आस्थाओं तथा मूल्यों से श्रेष्ठ माना जाता है । इस दृष्टि से नृजातीय बनाना कठिन है ।
प्रश्न 10. सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए दो विभिन्न उपागमों की चर्चा कीजिए ।
उत्तर – सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए विभिन्न उपागमों का प्रयोग फिया जाता है । उनमें से दो प्रमुख हैं ( 1 ) ऐतिहासिक उपागम – किसी भी विषय के सही ज्ञान के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का सहारा लेना ही पड़ता है । इतिहास में मानवजाति की घटनाओं का भंडार छिपा है । संस्कृति की . उत्पत्ति , विकास तथा वर्तमान स्वरूप के विषय की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए इतिहास के पन्नों को उलटना ही पड़ेगा । यह बात निर्विवाद है कि किसी भी संस्कृति का निर्माण एक साथ एक ही समय में नहीं हुआ है , इसलिए संस्कृति के परिवर्तनों की जानकारी के अध्ययन के लिए ऐतिहासिक उपागम की आवश्यकता पड़ती है। ( 11 ) दार्शनिक उपागम – सांस्कृतिक परिवर्तनों के अध्ययन के लिए दार्शनिक उपागम पर से जोर दिया जाता है । कुछ समाजशास्त्री सांस्कृतिक परिवर्तनों को दार्शनिक दृष्टि से भी स्पष्ट का लेते हैं । इस कारण इस उपागम की महत्ता है ।
प्रश्न 11. क्या विश्वव्यापीकरण को आप आधुनिकता से जोड़ते हैं ? नृजातीयता का प्रेक्षण करें तथा उदाहरण दें ।
उत्तर – विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया वात्सव में आधुनिकीकरण की ही प्रक्रिया है । विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया में अन्य देशों से जो संस्कृति आयात की गई है उसने आधुनिकता को बढ़ावा दिया है । नृजातीय जब संस्कृतियाँ एक – दूसरे के संपर्क में आईं , तभी नृजातीयता की उत्पत्ति हुई । नृजातीयता से आशय अपने सांस्कृतिक मूल्यों का अन्य संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार तथा आस्थाओं का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग करने से है । इसका अर्थ है कि जिन सांस्कृतिक मूल्यों को मानदंड या मानक के रूप में प्रदर्शित किया गया था उन्हें अन्य संस्कृतियों की आस्थाओं तथा मूल्यों से श्रेष्ठ माना जाता है । नृजातीय तुलनाओं में निहित सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना उपनिवेशवाद की स्थितियों में स्पष्ट दिखाई देती है । थॉमस बाबींटोम मेकॉले के ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत की शिक्षा ( 1835 ई ० ) के प्रसिद्ध विवरण में नृजातीयता का दृष्टांत दिया है जब वे कहते हैं , ” हमें इस समय ऐ ऐसे वर्ग का निर्माण अवश्य करना चाहिए जो हमारे तथा हमारे द्वारा शासित लाखों लोगों के बची द्विभाषियों का कार्य करे , व्यक्तियों का ऐसा वर्ग जो खून तथा रंग में भारतीय हो परन्तु रुचि में , विचार में , नैतिकता तथा प्रतिभा में अंग्रेज हो । ” तृजातीयता विश्वबंधुता के विपरीत है जोकि अंतर के कारण अन्य संस्कृतियों को महत्त्व देती है । विश्वबंधुता में कोई भी व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के मूल्यों तथा आस्थाओं का मूल्यांकन अपने मूल्य तथा आस्थाओं के अनुसार नहीं करता । यह विभिन्न सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को मानता तथा उन्हें अपने अंदर समायोजित करता है तथा एक – दूसरे को संस्कृति को समृद्ध बनाने के लिए सांस्कृतिक विनिमय च लेन – देन को बढ़ावा देता है । विदेशी शब्दों को अपनी शब्दावली में लगातार शामिल करके अंग्रेजी भाषा अंतर्राष्ट्रीय संप्रेषण का मुख्य साधन बनकर उभरी है । पुनः हिन्दी फिल्मों के संगीत की लोकप्रियता को पाश्चात्य पॉप संगीत तथा साथ ही भारतीय लोकगीत की विभिन्न परंपराओं तथा भंगड़ा और गजल जैसे अर्द्धशास्त्रीय संगीत से ली गई देन का परिणाम मान सकते हैं । एक आधुनिक समाज सांस्कृतिक विभिन्नता का प्रशंसक होता है तथा बाहर से पड़ने वाले सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे बंद नहीं करता परन्तु ऐसे सभी प्रभावों को सदैव इस प्रकार शामिल किया जाता है कि ये देशीय संस्कृति के तत्वों के साथ मिल सकें । विदेशी शब्दों को शामिल करने के बावजूद अंग्रेजी अलग भाषा नहीं बन पाई और न ही हिन्दी फिल्मों के संगीत ने अन्य जगहों से उधार लेने के बावजूद अपना स्वरूप खोया । विविध शैलियों , रूपों , श्रव्यों तथा शिल्पों को शामिल करने से विश्वव्यापी संस्कृति को पहचान प्राप्त होती है । आज सार्वभौमिक विश्व में , जहाँ संचार के आधुनिक साधनों से संस्कृतियों के बीच अंतर कम हो रहे हैं , एक विश्वव्यापी दृष्टि व्यक्ति को अपनी संस्कृति को विभिन्न प्रभावों द्वारा सशन करने की स्वतंत्रता देती है ।
प्रश्न 12. आपके अनुसार आपकी पीढ़ी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण क्या है ? यह पहले अलग कैसे था ? आप इसके बारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर – हमारी पीढ़ी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण विद्यालय है । ‘ विद्यालय एक सामान्य प्रक्रिया है , जहाँ पढ़ाए जाने वाले विषयों की एक निश्चित पाठ्यचर्चा होती है । विद्यालय समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण होते हैं । कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार औपचारिक पाठ्यक्रम के साथ – साथ बच्चों को सिखाने के लिए कुछ अप्रत्यक्ष पाठ्यक्रम भी होता है । भारत तथा दक्षिणी अफ्रीका में कुछ ऐसे विद्यालय हैं जहाँ लड़कों की अपेक्षा लड़कियों से अपने कमरे साफ करने की आशा की जाती है । कुछ विद्यालयों में , इसके समाधान के लिए प्रयास किए जाते हैं जिसके तहत लड़के तथा लड़कियों से ऐसे काम करने को कहा जाता है जिनके बार में सामान्यतया उनसे आशा नहीं की जाती है ।
 पहले शिक्षा का अधिक महत्व नहीं था इसलिए यह वर्तमान से हटकर था ।

Leave a Comment

image
error: Content is protected !!