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bihar board 12th biology notes | वंशागति और विविधता के सिद्धांत

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bihar board 12th biology notes | वंशागति और विविधता के सिद्धांत

वंशागति और विविधता के सिद्धांत

[PRINCIPLES OF INHERITANCE AND VARIATION]
               महत्त्वपूर्ण तथ्य
• पुनर्योजना (रीकोंबीनेशन)-अजनकीय जीन संयोजनों के उत्पादन को पुनर्योजना कहते हैं।
• सहलग्नता-एक ही क्रोमोसोम की जीन जोड़ियों के साथ होने का दयोतन करता है।
• लिंग-क्रोमोसोम-X क्रोमोसोम की लिंग निर्धारण में भूमिका होने पर इसे लिंग-क्रोमोसोम कहा गया।
• नर विषम युग्मकता (हिटिरोगेमिटी)-कुछ युग्मकों में X क्रोमोसोम और कुछ में Y क्रोमोसोमा इस प्रकार की लिंग निर्धारण क्रियाविधि को नर विषम युग्मकता (हिटिगेमिटी) कहते हैं।
• उत्परिवर्तन (म्यूटेशन)-उत्परिवर्तन वह क्रिया है जो डी एन ए अनुक्रम में बदलाव ला देती है इसके परिणामस्वरूप जीव के जीनोटाइप और फीनोटाइप में परिवर्तन आ जाता है।
• बिंदु उत्परिवर्तन (पॉइंट म्यूटेशन)-डी एन ए के एकल क्षार युग्म के परिवर्तन भी उत्परिवर्तन को जन्म देते हैं। इसे बिंदु उत्परिवर्तन कहते हैं।
• उत्परिवर्तन (म्यूटाजन)-उत्परिवर्तनों का जन्म अनेक रासायनिक और भौतिक कारकों द्वारा होता है। इन्हें उत्परिवर्तजन कहते हैं।
• असुगुणिता (एन्युप्लोइडी)-कोशिका विभाजन के समय क्रोमेटेड के विसंयोजन की
अनुपस्थिति के कारण एक क्रोमोसोम की अधिकता या हानि हो जाती है इसे असुगुणिता कहते हैं।
• बहुगुणिता (पालीप्लोइडी)-कोशिका द्रव्य विभाजन न सकने के कारण क्रोमोसोम का एक पूरा समुच्चय अधिक हो जाता है। इसे बहुगुणिता कहते हैं।
• जीन-जीन आनुवंशिकता की इकाइयाँ है। किस जीन में कौन-सा विशेष लक्षण अभिव्यक्त होगा, इसकी सूचना इसमें निहित होती है।
• जीनोटाइप-क्रोमोसोम में स्थित कारक जो लक्षणों का नियमन कहते हैं। ‘जीनोटाइप’ कहे जाते हैं।
• फीनोटाइप-शारीरिक रूप से व्यक्त लक्षणों को फीनोटाइप कहा जाता है।
• परीक्षार्थ संकरण-F2के लंबे पौधे के जीनोटाइप-निर्धारण के लिए मेडल ने F2 के लंबे
पौधे का बौने पौधे से संकरण किया। इसे उन्होंने परीक्षार्थ संकरण नाम दिया।
     NCERT पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
अभ्यास (Exercises)
1. मेंडल द्वारा प्रयोगों के लिए मटर के पौधे चुनने क्या लाभ हुए?
उत्तर-मेंडल द्वारा प्रयोगों के लिए मटर के पौधे चुनने से लंबे या बौने पौधे तथा पीले या हरे बीज प्राप्त हुए। इसके कारण उसे वंशागति नियमों का आधारभूत ढाँचा तैयार करने में सहायता मिली।
2. निम्न में भेद करो-
(क) प्रभाविता और अप्रभाविता
(ख) समयुग्मजी और विषमयुग्मजी
(ग) एक संकर और द्विसंकर।
उत्तर-(क) प्रभाविता और अप्रभाविता में अंतर-F1 विषमुयग्मजी Tt का फीनोटाइप दिखने में बिल्कुल TT जनक के समान होता है। इसलिए उसने प्रस्ताव किया कि असमान कारकों के जोड़े में से कोई एक-दूसरे के ऊपर प्रभावी हो जाता है (जैसा कि F1 में) इसे प्रभावी कहा गया। दूसरे को अप्रभावी नाम दिया गया। अप्रभावी में T(लंबाई का कारक होती है) t (बौनेपन का कारक होती है) के ऊपर प्रभावी हो जाता है।
(ख) समयुग्मजी और विषमयुग्मजी में अंतर-मटर की लंबी या बौनी प्रजाति में अलील जोड़ा समयुग्मजी (होमोजाइगस) क्रमशः TTया होगा। दूसरे शब्दों में समयुग्मजी मामलों में अलील समान हो सकते हैं जैसे Tr, tt और विषमयुग्मजी मामलों में असमान हो सकते हैं, जैसे-Tt.
(ग) एक संकर और द्विसंकर में अंतर-एक कारक जैसे ऊँचाई को नियंत्रित करने वाले जीन को एकल संकर (मोनोहाइब्रिड) कहा जाता है और TTऔर tt के बीच के क्रॉस (संकरण) को जिसमें एक से अधिक कारक नियंत्रित होते हैं, द्विसंकर कहा जाता है।
चित्र : मेंडल द्वारा अध्ययन किए गए मटर के पौधे के विपर्यास विशेषकों के सात जोड़े
3. कोई द्विगुणित जीन 6 स्थलों के लिए विषययुग्मजी हैं, कितने प्रकार के युग्मकों का उत्पादन संभव है?
उत्तर-जब अर्धसूत्रण (मीओसिस) कोशिका-विभाजन के समय लंबे और बौने पौधे युग्मकों का उत्पादन करते हैं तो जनकीय जोड़े के अलील एक-दूसरे से अलग-अलग हो जाते हैं, और केवल एक ही अलील युग्मक में प्रेषित होगा। अलीलों का यह विसंयोजन यादृच्छिक (रैंडम) होता है और युग्मक में कोई एक अलील होने की संभावना 50 प्रतिशत होती है।
4. एक संकर क्रॉस का प्रयोग करते हुए, प्रभाविता नियम की व्याख्या करें।
उत्तर-एक संकर संकरण प्रयोगों के अपने प्रेक्षणों को आधार बनाकर मेंडल ने इनकी वंशागति संबंधी अपनी समझ के सारे रूप में दो सामान्य नियम प्रस्तावित किए। उनमें से एक नियम है प्रभाविता का नियम (लॉ ऑफ डोमिनेस)। प्रभाविता नियम के अनुसार-
(क) लक्षणों का निर्धारण कारक नामक विविक्त (डिस्क्रीट ) इकाइयों द्वारा होते हैं।
(ख) कारक जोड़ों में होते हैं।
(ग) यदि कारक जोड़ों के दो सदस्य असमान हों तो इनमें से एक कारक दूसरे कारक पर प्रभावी हो जाता है अर्थात् एक ‘प्रभावी’ और ‘अप्रभावी’ होता है।
(घ) F1 में केवल एक जनक लक्षण का प्रकट होना तथा F2 में दोनों जनक लक्षणों का प्रकट होना, प्रभाविता के नियम के द्वारा समझा जा सकता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि F2 में 3:1 का अनुपात क्यों पाया जाता है।
5. परीक्षार्थ संकरण की परिभाषा लिखें और चित्र बनाएँ।
उत्तर-F2 के लंबे पौधे के जीनोटाइप-निर्धारण के लिए मेंडल ने F2 के लंबे पौधे का बौने पौधे से संकरण किया। इसे उन्होंने परीक्षार्थ संकरण नाम दिया।
चित्र : परीक्षार्थ संकर का आरेखी प्रतिरूप
6. एक ही जीन स्थल वाले समयुग्मजी मादा और विषमयुग्मजी नर के संकरण से प्राप्त प्रथम संतति पीढ़ी के फीनोटाइप वितरण का पनेट वर्ग बनाकर प्रदर्शन करो।
उत्तर-पनेट वर्ग से आसानी से समझा जा सकता है कि यादृच्छिक (रैंडम) निषेचन के परिणामस्वरूप 1/4 TT, 1/2 Tt और 1/4 tt जीनोटाइप पैदा करते हैं। साथ ही केवल ‘लंबा’ फीनोटाइप दृष्टिगोचर होता है। F2 अवस्था में 3/4 पौधे लंबे होते हैं जिनमें से कुछ TT और कुछ Tt होते हैं। बाहर से देखने पर TT और
Tt पौधों में भेद नहीं किया जा सकता। अत: जीनोटाइप जोड़े Tt से केवल एक ही लक्षण (T) ‘लंबे’ की अभिव्यक्ति होती है। इसीलिए कहा जाता है कि लक्षण ‘लंबा’, बौने लक्षण अर्थात् अलील । के ऊपर प्रभावी हो जाता है। इसी लक्षण (प्रभाविता) का यह असर होता है कि F1 के सारे के सारे पौधे लंबे होते हैं ( भले ही जीनोटाइप Tt हो) और F2 पीढ़ी में 3/4 पौधे लंबे होते हैं।
(चित्र : मेंडल द्वारा संकरित शुद्ध वंशक्रमलंबे तथा शुद्ध वंशक्रम बौने पौधों की क्रॉस को समझने के लिए पनेट वर्ग का उपयोग।)
(भले ही जीनोटाइप के लिहाज से 1/4 A Tt और 1/4 TT हो) अंत में जीनोटाइप अनुपात 3/4 लंबे (1/4TT, 1/2 Tt ) और 1/4 ठिगने (tt) दूसरे शब्दों में 3 : 1 का अनुपात पर जीनोटाइप अनुपात होता है 1:2:1.
7. पीले बीज वाले लंबे पौधों (YyTt) का संकरण हरे बीज वाले लंबे (yyTt) पौधे से करने पर निम्न में से किस प्रकार के फीनोटाइप संतति की आशा की जा सकती है।
(क) लंबे-हरे. (ख) बौने-हरे।
उत्तर-पीले बीज वाले लंबे पौधों (YyTI) का संकरण हरे बीज वाले लंबे (yyTt) पौधे से करने पर निम्न फीनोटाइप संतति की आशा की जा सकती है :
(क) माता-पिता (पौधों के ) जीनोटाइप को हम इस प्रकार भी लिख सकते हैं।
TTYY एवं ttyy
युग्मक Ty और ty निषेचन पर TtYy संतति उत्पन्न करते हैं। हरे पर पीला रंग निश्चित होता है और बोने पर लंबा आकार निश्चित होता है।
(ख)TTYY तथा ttyy→ TtYy
8. दो विषय युग्मजी जनकों को क्रॉस 0 और 0 किया गया। मान लें दो स्थल (loci) सहलग्न है, तो द्विसंकर क्रॉस में F1 पीढ़ी के फीनोटाइप के लक्षणों का वितरण
क्या होगा?
उत्तर-F1 पीढ़ी के नर (अण्डा) और मादा (पराग) के द्योतन के लिए क्रमशः 0 और 0 के प्रतीकों को काम में लाया गया है। लिंग-सहलग्न जीनों के अध्ययन के लिए मोरंगन ने ड्रोसोफिला में कई द्विसंकर क्रॉस किए। मोरगन ने पीले शरीर और श्वेत आँखों वाली मक्खियों का संकरण भूरे शरीर और लाल आँखों वाली मक्खियों के साथ किया और संततियों को आपस में क्रॉस करवाया। उसने देखा कि ये दो जीन जोड़ी एक-दूसरे से स्वतंत्र विसंयोजित नहीं हुई और F2, का अनुपात 9:3:3:1 से काफी भिन्न मिला।
9. आनुवंशिकी में टी. एच. मोरगन के योगदान का संक्षेप में उल्लेख करें।
उत्तर-मोरगन ने फल-मक्खियों (फ्रूटफ्लाई-ड्रोसोफिला मेलमोगैस्टर) पर काम किया, जो ये ऐसे अध्ययनों के लिए उपयुक्त पाई गई। इन्हें प्रयोगशाला में सरल कृत्रिम माध्यमों पर रखा जा सकता था। ये अपनी जीवन चक्र दो सप्ताह में पूरा कर सकती थीं और इनमें एकल मैथुन से विशाल संख्या में संतति मक्खियों का उत्पादन संभव था। साथ ही लिंगों का विभेदन स्पष्ट था। नर और मादा की आसानी से पहचान की जा सकती थी। साथ ही इसमें आनुवंशिक विविधताओं के अनेक प्रकार थे जो कम क्षमता वाले माइक्रोस्कोप से देखे जा सकते थे।
थामट हंट मोरमन तथा उसके साथियों ने वंशागति का क्रोमोसोम-वाद या सिद्धांत के प्रयोगात्मक सत्यापन किए और यौन जनन उत्पादन विभेदन के लिए खोज के आधार की नींव डाली।
लिंग-सहलग्न जीनों के अध्ययन के लिए मोरगन ने ड्रोसोफिला में कई द्विसंकर क्रॉस किए। ये मेंडल द्वारा मटर में किए गए द्विसंकर क्रॉसों के समान थे।
मोरगन तथा उसके साथी जानते थे कि जीन, क्रोमोसोम में स्थित हैं और इन्होंने शीघ्र ही यह भी जान लिया कि जब द्विसंकर क्रॉस में दो जीन जोड़ी एक ही क्रोमोसोम में स्थित होती हैं तो जनकीय जीन संयोजनों का अनुपात अजनकीय प्रकार से काफी ऊँचा रहता है। मोरगन ने इसका कारण दो जीनों का भौतिक संयोग या जुड़ा होना बतलाया। मोरगन ने इस घटना के लिए सहलग्नता शब्द दिया जो एक ही क्रोमोसोम की जीन जोड़ियों के साथ होने का दद्योतन करता है। साथ ही अजनकीय जीन संयोजनों के उत्पादन को पुनर्योजन कहा गया। मोरगन तथा उसके दल ने यह भी पता किया कि एक ही क्रोमोसोम में स्थित होने पर भी कुछ जीन जोड़ी में अधिक सहलग्नत थीं अर्थात् पुनर्योजन बहुत कम था। मोरगन के शिष्य एल्फ्रेड स्टर्टीवेंट ने एक ही क्रोमोसोम के जीन युग्मों की पुनर्योजन आवृत्ति को जीनों के बीच की दूरी का माप मानकर क्रोमोसोम में इनकी स्थिति के चित्र (रीकोम्बीनेशन मैप) बना दिए। आजकल पूरे जीनोम के अनुक्रम के निर्धारण के लिए आनुवंशिक नक्शे बहुत अधिक काम में लाए लाते हैं। ऐसा ही बाद में पानव जीनोम अनुक्रमण परियोजना में भी वर्णित किया गया।
 
(चित्र : सहलग्नता-मोरगन द्वारा किए गए दो द्विसंकर क्रॉसों के परिणाम, क्रॉस A में जीन y और w के बीच संकरण दिखलाया गया है, क्रॉस B में है और m जीनों के बीच का संकरण है।
यहाँ प्रभावी अन्य प्रकार के अलील को (+) प्रतीक से दिखाया गया है।
नोट कीजिए कि y और w के बीच W और m की अपेक्षा सहलग्नता बलवती है।
10. वंशावली विश्लेषण क्या है? यह विश्लेषण किस प्रकार उपयोगी है?
उत्तर-मेंडल के कार्य की पुन: खोज के बाद मानव के लक्षण प्रतिरूपों की वंशागति के विश्लेषणा की बात शुरू हुई। यह स्पष्ट है कि मटर के पौधे और अन्य जीवों में किए गए तुलनार्थ संकर प्रयोग मानव में संभव नहीं है। इसलिए यही विकल्प रह जाता है कि विशेष लक्षण की वंशागति के संबंध नहीं है। इसलिए यही विकल्प रह जाता है कि विशेष लक्षण की वंशागति के संबंध में वंश के इतिहास का अध्ययन किया जाए। कई पीढ़ियों तक जारी लक्षणों के ऐसे विश्लेषण को वंशावली विश्लेषण कहते हैं। इस प्रक्रिया में वंश वृक्ष (फैमिली ट्री) में एक विशेष लक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी विश्लेषण किया जाता है।
मानव आनुवंशिकी में वंशावली अध्ययन एक महत्त्वपूर्ण उपकरणा होता है जिसका उपयोग विशेष लक्षण, असामान्यता या रोग का पता लगाने में किया जाता है।
(चित्र : प्रतीकात्मक वंशावली विश्लेषण (अ) अलिंगी क्रोमोसोम पर प्रभावी विशेषक जैसे मायोटोनिक दुष्पोषण (डिस्ट्रोफी), (ब) आलंगी क्रोमोसोम पर – अप्रभावी विशेषक जैसे दात्र कोशिका अरक्तता (सिकल सेल एनिमिया)
मेंडलीय विकारों को बंशागति के उदाहरण को किसी परिवार में वंशावली विश्लेषण द्वारा योजा जा सकता है।
11. मानव में लिंग-निर्धारण कैसे होता है?
उत्तर-मानव का लिंग निर्धारण XY प्रकार का होता है। कुल 23 जोड़े क्रोमोसोम में से 22 जोड़े नर और मादा में बिल्कुल एक जैसे होते हैं, इन्हें अलिंग क्रोमोसोम कहते हैं। मादा में X क्रोमोसोमों का एक जोड़ा भी होता है और नर में X के अतिरिक्त एक क्रोमोसोम Y होता है जो नर लक्षण का निर्धारक होता है। नर में शुक्रजनन के समय दो प्रकार के युग्मक बनते हैं। कुल
उत्पन शुक्राणु संख्या का 50 प्रतिशत X युक्त होता है और शेष 50 प्रतिशत Y युक्त होता है। इनके साथ अलिंग क्रोमोसोम तो होते ही हैं। मादा में केवल एक ही प्रकार के शुक्राणु बनते हैं जिसमें X क्रोमोसोम होता है। अण्डाणु के X या Y धारी क्रोमोसोमों से निषेचित होने की प्रायिकता बराबर-बराबर रहती है। यदि अण्डाणु का निषेचन X धारी शुक्राणु से हो गया तो युग्मनज (जाइगोट) मादा (XX) में परिवर्धित हो जाता है। इसके विपरीत Y क्रोमोसोम पारी शुक्राणु से
निषेचन होने पर नर संतति जन्म लेती है। स्पष्ट है कि शुक्राणु की आनुवंशिक संरचना ही शिशु के लिंग का निर्धारण करती है।
12. शिशु का रुधिर वर्ग 0 है। पिता का रुधिर वर्ग A और माता का B है। जनकों के जीनोटाइप मालूम करें और अन्य संतति में प्रत्याशित जीनोटाइपों की जानकारी प्राप्त करें।
उत्तर-मानव में ABO रुधिर वर्गों का निर्धारण करने वाली विभिन्न प्रकार की लाल रुधिर कोशिकाएं हैं। ABO रुधिर वर्गों का नियंत्रण जीन ‘I’ करती है। लाल रुधिर कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्ली में सतह से बाहर निकलते हुए शर्करा बहुलक होते हैं। इस बहुलक का प्रकार क्या होगा जहाँ इस बात का नियंत्रण जीन ‘I’ से होता है। इस जीन ‘I’ के तीन अलील IA. IB और i होते हैं। अलील IAऔर अलील IB कुछ भिन्न प्रकार की शर्करा का उत्पादन करते हैं और अलील i किसी भी प्रकार की शर्करा का उत्पादन नहीं करती। मानव जीन (2n) द्विगुणित होता है इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में इन तीन में से दो प्रकार के जीन अलील होते हैं। IA और IB तो i के ऊपर पूर्णरूप से प्रभावी होते हैं अर्थात् जब IA और i विद्यमान हो तो केवल IA अभिव्यक्ति होता है और जब IB और i विद्यमान हो तो केवल IB अभिव्यक्त होता है, i तो शर्करा बनता ही नहीं।
जब IA और IB दोनों उपस्थित हों तो ये दोनों अपने-अपने प्रकार की शर्करा की अभिव्यक्ति कर देते हैं। यह घटना ही सह-प्रभाविता है। इसी कारण लाल रुधिर कोशिकाओं मेंA और B दोनों प्रकारों की शर्करा होती है। तीन भिन्न अलील होने के कारण इनके 6 संयोजन संभव है। इस प्रकार ABO रुधिर वर्गों के 6 विभिन्न जीनोटाइप होंगे (देखें तालिका)।
                      तालिका
             
13. निम्न शब्दों को उदाहरण समेत समझाएँ-
(अ) सह-प्रभाविता
(ब) अपूर्ण प्रभाविता
उत्तर-(अ) सह-प्रभाविता (को-डोमिनेंस)-सह-प्रभाविता ऐसी घटना है जिसमें Fl पीढ़ी दोनों जनकों से मिलती-जुलती है। इसका एक अच्छा उदाहरण मानवों में रुधिर वर्गों का निर्धारण करने वाली विभिन्न प्रकार की लाल रुधिर कोशिकाएँ हैं।
(ब) अपूर्ण प्रभाविता (इंकप्लीट डोमिनेंस)-जब मटर वाले प्रयोग को अन्य विशेषकों के संदर्भ में दोहराया गया तो पता चला कि कभी-कभार F1 में ऐसा फीनोटाइप आ जाता है जो किसी भी जनक से नहीं मिलता-जुलता और इनके बीच जैसा लगता है। श्वान पुष्प (स्नेपड्रेगन/एंटीराइनम) में पुष्प रंग की वंशागति अपूर्ण प्रभाविता को समझने के लिए अच्छा उदाहरण है। तद्रूप प्रजननी लाल फूल वाली (RR)और तद्रूप प्रजननी सफेद फूल वाली (rr) प्रजाति के संकरण के परिणामस्वरूप F1 पीढ़ी गुलाबी फूलों (Rr)वाली प्राप्त हुई। जब इस F1, संतति को स्वयं परागित किया गया तो परिणामों का अनुपात I(RR)लाल : 2(Rr) गुलाबी : 1(rr) सफेद था। यहाँ पर जीनोटाइप अनुपात वही था जो किसी भी मेंडलीय एक संकरण में संभावित होता है लेकिन फीनोटाइप अनुपात अर्थात् 3 : 1 प्रभावी अप्रभावी बदल गया। इस उदाहरण में R कारकाr
कारक पर पूर्णतः प्रभावी नहीं रहा अतः लाल (RR), सफेद (rr) से गुलाबी (Rr) प्राप्त हो गया।
14. बिंदु-उत्परिवर्तन क्या है? एक उदाहरण दें।
उत्तर-क्रोमोसोमों के रूपांतर असामानताओं तथा विपथनों को जन्म देते हैं। ऐसे क्रोमोसोमीय विपथन कैंसर कोशिकाओं में सामान्यत: देखें जाते हैं।
इसके अतिरिक्त डी. एन. ए. के एकल क्षार युग्म (बेस पेपर) के परिवर्तन भी उत्परिवर्तन को जन्म देते हैं। इसे बिन्दु उत्परिवर्तन (पॉइंट म्यूटेशन ) कहते हैं। इस प्रकार के उत्परिवर्तन का जाना माना उदाहरण दाँत्र कोशिका अरक्तता (सिकल सेल एनिमिया) नामक रोग है। डी. एन. ए. के क्षार युग्मों के घटने-बढ़ने से फ्रेम शिफ्ट उत्परिवर्तन उत्पन्न होते रहते हैं।
15. वंशागति के क्रोमोसोमवाद को किसने प्रस्तावित किया?
उत्तर-वॉल्टर सटन ने वंशागति के क्रोमोसोमवाद को प्रतिवादित किया था।’
16. किन्हीं दो अलिंग सूत्री आनुवंशिक विकारों का उनके लक्षणों सहित उल्लेख करें।
उत्तर-(1) दाँत्र कोशिका-अरक्तता (सिकल सेल एनिमिया)-यह अलिंग क्रोमोसोम लग्न अप्रभावी लक्षण है जो जनकों से संतति में तभी प्रवेश करता है जबकि दोनों जनक जीन के वाहक होते हैं (विषुमयुग्मजी)। इस रोग का नियंत्रण अलील का एकल जोड़ी HbAऔर Hbs करता है। रोग का लक्षण (फीनोटाइप) तीन संभव जीनोटाइपों में से केवल HbS (HbS HbS) वाले
समयुग्मकी व्यक्तियों में दर्शित होता है। विषमयुग्मकी (HbAHbS) व्यक्ति रोगमुक्त होते हैं लेकिन वे रोग के वाहक होते हैं।
इस विकार का कारण हीमोग्लोबिन अणु की बीटा ग्लोबिन श्रृंखला की छठी स्थिति में एक अमीनो अम्ल ग्लूटैमिक अम्ल (Glu) का वैलीन द्वारा प्रतिस्थापन है। ग्लोबिन प्रोटीन में एमीनो अम्ल का यह प्रतिस्थापन बीटा ग्लोबिन जीन के छठे कोडोन मेंGAGकाGUGद्वारा प्रतिस्थापन के कारण होता है। निम्न ऑक्सीजन तनाव में उत्परिवर्तित हीमोग्लोबिन अणु में बहुलकीकरण हो जाता है जिसके कारण RBC का आकार द्वि-अवतल बिंब से बदलकर दाँत्राकार ( हांसिए के आकार का) हो जाता है।
फीनाइल कीटोनूरिया-यह जन्मजात उपापचयी दोष भी अलिंग क्रोमोसोम अप्रभावी लक्षण की भाँति ही वंशागति प्रदर्शित करती है। रोगी व्यक्ति में फीनाइल ऐलेनीन अमीनो अम्ल को टाइरोसीन अमीनो अम्ल में बदलने के लिए आवश्यक एक एंजाइम की कमी हो जाती है। परिणामस्वरूप फीनाइल ऐलेनीन एकत्रित होता जाता है और फीनाइल पारूविक अम्ल तथा अन्य व्यत्पन्नों में बदलता जाता है। इनके एकत्रीकरण से मानसिक दुर्बलता आ जाती है। वृक्क द्वारा कम
अवशोषित हो सकने के कारण ये मूत्र के साथ उत्सर्जित हो जाते हैं।
    परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न :
1. जॉन ग्रेगर मेंडल किसके लिए प्रसिद्ध है-
(a) कोशिका सिद्धांत
(b) उपार्जित लक्षणों की वंशागति
(c) म्यूटेशन सिद्धांत
(d) आनुवंशिकी सिद्धांत
उत्तर-(d) आनुवंशिकी सिद्धांत
2. एक लाल पुष्पी मटर के पौधे का संकरण सफेद पुष्पी मटर के पौधे से किया गया
F1 पीढ़ी में लाल पुष्प थे। अत: सफेद पुष्प गुण है-
(a) प्रभावी
(b) अप्रभावी
(c) म्यूटेण्ट
(d) मिश्रित जीन
उत्तर-(b) अप्रभावी।
3. एक-संकर क्रॉस में बैक क्रॉस का अनुपात होता है-
(a)9:3:2:1
(b) 1:1
(c) 1:2:1
(d) 3:1
उत्तर-(b) 1 : 1.
4. RR (लाल) rr (सफेद) से संकरित किया गया। सभी RW संतानें गुलाबी थीं। यह इसका प्रमाण है कि R जीन है-
(a) संकर
(b) अप्रभावी
(c) अपूर्ण प्रभावी
(d) म्यूटेण्ट
उत्तर-(c)अपूर्ण प्रभावी।
5. निम्न में से test cross कौन-सा है-
(a) Tt × Tt
(b) TT × Tt
(c) TT × TT
(d) Tt x tt
उत्तर- (b) Tt x tt
6. वर्ष 1900 आनुवंशिकी वैज्ञानिकों के लिए महत्त्वपूर्ण था क्योंकि इसी वर्ष हुई-
(a) जीन की खोज
(b) सहलग्नता की खोज
(c) वंशागतित्व का गुणसूत्र मत
(d) मेंडल के नियमों की पुनर्लोज
उत्तर-(d) मेंडल के नियमों की पुनर्योज।
7. अपूर्ण प्रभाविकता किसमें देखी गई-
(a) लैथायरस ओडोरेंटस
(b) पीजम सटाइवम
(c) मिराविलिस जलापा
(d) फोर-ओ-क्लॉक प्लॉट
उत्तर-(c) मिरोबिलिस जलापा।
8. मेंडल की सफलता का मुख्य कारण था-
(a) उन्होंने वंशागति का रिकार्ड रखा था
(b) उन्होंने मटर पर प्रयोग किया
(c) उन्होंने संतानों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया
(d) संकरण में उन्होंने पहले एक-एक गुणका अध्ययन किया
उत्तर-(a) उन्होंने वंशागति का रिकार्ड रखा था।
9. मेंडल की सफलता का कारण था-
(a) उन्होंने प्राकृतिकवरण का उपयोग किया
(b) उन्होंने उत्परिवर्तन का उपयोग किया
(c) उन्होंने अपने प्रयोगों के लिए मटर का प्रयोग किया
(d) उपरोक्त में कोई कुछ नहीं
(e) उपरोक्त सभी।
उत्तर-(c) उन्होंने अपने प्रयोगों के लिए मटर का प्रयोग किया।
10. जीन प्रारूप IB IB और IB IO से कौन-सा रुधिर वर्ग उत्पन्न होता है-
(a) A
(b) B
(c) AB
(d)0
उत्तर-(b) BI
11. निम्नलिखित में से कौन-सा मेंडल ने प्रस्तावित नहीं किया था-
(a).प्रभाविकता
(b) विसंयोजन
(c) स्वतंत्र अपव्यूहन
(d) अपूर्ण प्रभाविता
उत्तर-(d)अपूर्ण प्रभाविता।
12. मेंडल ने मटर पर प्रयोग किया-
(a) उन्नीसवीं शताब्दी में
(b) बीसवीं शताब्दी में
(c) सोलहवीं शताब्दी में
(d) अठारहवीं शताब्दी में
उत्तर-(a) उन्नीसवीं शताब्दी में।
13. स्वपरागण करने वाले पौधों पर पर-परागण सम्पन्न करने के लिए विपुंसन करते हैं, इस प्रक्रिया में कौन-सा भाग पुष्प से हटा दिया जाता है-
(a) बाह्य दल
(b) बीजाण्ड
(c) वर्तिकान
(d) पुंकेसर
उत्तर-(d) पुंकेसर।
14. मानव के जीनोम में सामान्यतः होता है-
(a) 44A + XY
(b) 44A + XXYY
(c)44A + X
(d) 44A + 4X
उत्तर–(a)44A + XY
15. क्रोमोसोम किसके बने होते हैं-
(a) DNA
(b) RNA
(c) प्रोटीन
(d) DNA, RNA और प्रोटीन
उत्तर-(d) DNA, RNA और प्रोटीन।
16. एक जनक द्वारा एक इकाई के रूप में वंशागत गुणसूत्रों का एक सम्पूर्ण समुच्चय कहलाता है-
(a) जीनोम
(b) समजीवी
(c) जीरियाड
(d) सुगुणित
उत्तर-(a) जीनोमा
17. मनुष्य में ऑटोसोम की संख्या-
(a) 10 जोड़ी
(b) 20 जोड़ी
(c) 23 जोड़ी
(d) 22 जोड़ी
उत्तर-(d) 22 जोड़ी।
18. मेंडल ने मटर की फली में कितने विपरीत लक्षणों, गुणों को चुना-
(a) 2
(b)3
(c)4
(d)7
उत्तर-(d)71
19. वह कौन-सा आनुवंशिक दोष है जिसमें शरीर हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता ?
(a) हीमोफीलिया
(b) थैलेसीमिया
(c) तपेदिक
(d) पीलिया
उत्तर-(b) थैलेसीमिया।
20. मानव शुक्राणु में कितने गुणसूत्र पाए जाते हैं?
(a) 46
(b) 44
(c) 23
(d) 22
उत्तर-(c) 231
21. स्त्रियों में सेक्स (लिंग) गुणसूत्र कौन-से होते हैं?
(a)XX
(b) एक X तथा Y नहीं
(c) XY
(d) एक Y तथा X नहीं
उत्तर-(a)XX
II. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :
1. मेंडल के नियमों को विस्तार देकर ‘वंशागति का……….. कहा जाने लगा।
2. यदि जीन एक ही क्रोमोसोम में स्थित हो तो मेंडल का…………… नियम लागू नहीं होता।
3…………………मानचित्र वास्तव में, एक ही क्रोमोसोम में स्थित जीनों के विन्यास से संबंद्ध होते हैं।
4. अनेक जीन केवल मादा में प्रकट होती है और……….. सहलग्न जीन कहलाती है।
5. सामान्य नारी में 22 जोड़े अलिंग क्रोमोसोम के और…………… सेक्स क्रोमोसोम का होता है।
उत्तर-1. क्रोमोसोमवाद, 2. स्वतंत्र अपव्यूहन,
3. सहलग्नता,4. लिंग, 5. एक जोड़ा।
III. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है और कौन-सा असत्य है :
1. अलील एक ही जीन के थोड़ा सा भिन्न रूप होते हैं।
2. आनुवंशिक दोषों का औषधियों से उपचार नहीं किया जा सकता।
3. यदि अपराध स्थल पर अपराधी का कोई एक बाल, रक्त की बूंद अथवा वीर्य पड़ा मिला हो तो उससे अपराधी का डी एन ए पहचानने में मदद मिलती है और संदिग्ध व्यक्ति के डी एन ए से उसकी तुलना करके सच का पता लगाया जा सकता है।
4. जब अण्डे में X-धारी शुक्राणु संलयित होता है, तब संतान नर होती है।
5. जब Y-धारी शुक्राणु अण्डे से संलयित होता है तब एक मादा संतान होती है।
6. वंशागति का अर्थ है लक्षणों का माता-पिताओं से संतानों में पहुँचना।
उत्तर-1.सत्य, 2. असत्य, 3. सत्य, 4. असत्य,
5. असत्य, 6. सत्य।
IV. स्तंभ-I में दिए गए पदों का स्तंभ-II पदों के साथ सही मिलान करें:
       
उत्तर-(a)-5, (b)-9, (c)-7, (d)-2, (e)-8, (f)-3, (g)-4, (h)-6.
           अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. मेंडल के कारकों को आज क्या नाम दिया जाता है?
उत्तर-जीन।
प्रश्न 2. मानवों में अलिंग गुणसूत्र की संख्या क्या होती है?
उत्तर-22 जोड़े 44 गुणसूत्र।
प्रश्न 3. X तथा Y गुणसूत्रों को लिंग गुणसूत्र क्यों कहा जाता है?
उत्तर-इनके मौजूद होने से व्यक्ति का सेक्स (लिंग) निर्धारित होता है।
प्रश्न 4. मानव देह-कोशिकाओं में गुणसूत्रों की द्विगुणित संख्या क्या है?
उत्तर-461
प्रश्न 5. उस वैज्ञानिक का नाम बताइए जिसने वंशागति के नियम बताए।
उत्तर-ग्रेगर जॉन मेंडल।
प्रश्न 6. मेंडल द्वारा कहे गए ‘कारकों’ को आज क्या कहा जाता है?
उत्तर-जीन (gene)
प्रश्न 7. जीन कहाँ पर स्थित होते हैं?
उत्तर-जीन गुणसूत्रों के नियम विस्थलों (loci) पर पाए जाते हैं।
प्रश्न 8. मेंडल को आनुवंशिकी का जन्मदाता क्यों कहा जाता है?
उत्तर-मेंडल को आनुवंशिकी का जन्मदाता इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह पहला व्यक्ति था जिसने वंशागति में निहित सिद्धांतों की खोज की।
प्रश्न 9. व्युत्क्रम प्रसंकरण किसे कहते हैं?
उत्तर-व्युत्क्रम प्रसंकरण में जनकों के लिंग बदल दिये जाते हैं।
प्रश्न 10. वंशागति के क्रोमोसोम सिद्धांत को किसने प्रस्तुत किया था?
उत्तर-वंशागति के क्रोमोसोम सिद्धांत को ‘बोवरी तथा सटन’ ने प्रस्तुत किया था।
प्रश्न 11. जिन क्रोमोसोमों की सेक्स निर्धारण में कोई भूमिका नहीं होती, उन्हें क्या कहते हैं?
उत्तर-जिन क्रोमोसोमों की सेक्स निर्धारण में कोई भूमिका नहीं होती, उन्हें ‘ऑटोसोम’ कहते हैं।
प्रश्न 12. मेंडल की सफलता के पीछे क्या कारण थे?
उत्तर-मेंडल की सफलता के पीछे मुख्य तीन कारण थे-(i) अच्छी सामग्री का चयन, (ii) लक्षण का चयन, (iii) मेंडल की तकनीक।
प्रश्न 13. आनुवंशिकता किसे कहते हैं?
उत्तर-लक्षणों की आनुवंशिकता के अध्ययन को आनुवंशिकता कहते हैं।
प्रश्न 14. विपुंसन किसे कहते हैं?
उत्तर-पुष्पों से पराग कोषों को निकाल देना विपुंसन (emasculation) कहलाता है।
प्रश्न 15. एलील किसे कहते हैं?
उत्तर-एक ही गुण के विभिन्न विपर्यायी रूपों से प्रकट करने वाले कारकों को एक-दूसरे का एलील कहते हैं।
प्रश्न 16. समयुग्मजी से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर-कोशिका में यदि किसी गुण के दोनों कारक एक-से हों, तो समयुग्मजी (homozygous) कहलाते हैं।
प्रश्न 17. वंशावली विश्लेषण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-वंशावली विश्लेषण किसी व्यक्ति के वंश में किसी लक्षण की वंशागति के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण साधन है।
प्रश्न 18. बहुप्रभाविता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-जब एक जीन एक से अधिक गुणों को प्रभावित करें तो इसे बहुप्रभाविता कहते हैं।
                   लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. हीमोफिलिया को रक्तस्रावी रोग क्यों कहा जाता है?
उत्तर-हीमोफिलिया से ग्रस्त रोगियों में या तो केवल एक ही दोषी जीन होता है जो X गुणसूत्र पर होता है (नर में) या उसमें दोनों ही दोषी जीन होते हैं जो XX गुणसूत्रों पर विद्यमान होते हैं (मादा में )। सामान्य जीन से वे पदार्थ बनते हैं जिनके द्वारा रक्त का स्पंदन नहीं होता। परिणामत: एक बार रक्त का बहना शुरू हो जाने के बाद वह रुकता ही नहीं।
प्रश्न 2. निम्नलिखित की परिभाषा लिखिए-
वंशागति, विभिन्नता, आनुवंशिक दोष, लिंग गुणसूत्र।
उत्तर-(i) वंशागति (heredity) का अर्थ है-लक्षणों का माता-पिताओं से संतानों में पहुँचना। एक ही परिवार के सदस्यों में पायी जाने वाली समानता ‘वंशागति’ के कारण होती है।
(ii) विभिन्नता-एक ही परिवार के सदस्यों के बीच पाए जाने वाले अंतर जनकों के अभिलक्षणों के अलग-अलग संयोजित कारण होते हैं। इन अंतरों को विभिन्नताएँ’ (Variation) कहते हैं।
(iii) आनुवंशिक दोष-कभी-कभार जनकों में मौजूद कोई दोष जीन द्वारा संतान में पहुँच सकता है। ऐसे व्यक्ति में आनुवंशिक दोष आ जाया करते हैं।
(iv) लिंग गुणसूत्र-मानव गुणसूत्रों में एक जोड़ी गुणसूत्र X तथा Y होते हैं। ये गुण लिंग का निर्धारण करते हैं। इसीलिए इन्हें लिंग गुणसूत्र कहते हैं।
प्रश्न 3. हीमोफिलिया अधिकतर लड़कों में ही क्यों पाया जाता है?
उत्तर-हीमोफिलिया में जीन X गुणसूत्र पर होते हैं और इसलिए यह दोष माँ से पुत्र में पहुँचता है। माँ में दो Xगुणसूत्र होते हैं जिसमें से हो सकता है कि एक Xगुणसूत्र होते हैं संभव है कि एक Xगुणसूत्र पर सामान्य जीन हो, इसलिए वह सामान्य (दोषरहित) होती है। इसी तरह माँ की बेटी भी सामान्य हो सकती है, क्योंकि उससे माँ के एक दोषपूर्णx गुणसूत्र के साथ पिता का सामान्य Xगुणसूत्र आया हुआ होगा। लेकिन नर में केवल एक ही र गुणसूत्र होता है और यदि उस पर दोषपूर्ण जीन मौजूद हुआ तब व्यक्ति को यह आनुवंशिक दोष हो ही जाएगा।
प्रश्न 4. मनुष्यों में लिंग निर्धारण का आधार क्या है?
उत्तर-एक युग्मक में 22 अलिंग सूत्र तथा 1 लिंग गुणसूत्र होता है। जब माता का अण्डा तथा पिता का शुक्राणु परस्पर संलयित होते हैं, तब फिर से द्विगुणित संख्या प्राप्त हो जाती है। युग्मज से एक व्यष्टि बनता है जिसका लिंग इस बात पर निर्भर करता है कि उस में दो गुणसूत्र है या एक Y। दो X गुणसूत्रों वाले युग्मजों से मादाएँ बनती हैं और एक X तथा एक Y गुणसूत्रों वाले युग्मजों से नर बनते हैं।
अण्डे सभी एक प्रकार के होते हैं। इनमें 22 अलिंग सूत्र तथा एक अकेला Xगुणसूत्र होता है। । शुक्राणु दो प्रकार के होते हैं-(1)22 गुणसूत्र तथा एक Xगुणसूत्र या (ii) 22 गुणसूत्र तथा एक Y गुणसूत्र वाले। जब अण्डे से X-धारी शक्राणु संलयित होता है, तब संतान मादा होती है जिसमें 44अलिंगसूत्र तथा दोX गुणसूत्र होते हैं। यदि Y-धारी शुक्राणु अण्डे से संलयित होता है तब एक नर संतान होती है जिसमें 44अलिंग सूत्र और X और Y लिंग सूत्र होते हैं।
प्रश्न 5. किसी व्यक्ति की पहचान में डी.एन.ए. फिंगर प्रिंटिंग एक सुनिश्चित पक्का परीक्षण क्यों कहा जाता है?
उत्तर-क्योंकि व्यक्ति के शरीर की प्रत्येक कोशिका का डी.एन.ए. एक समान होता है और यह माता-पिता के डी.एन.ए. से मिलता-जुलता होता है क्योंकि बच्चों को अपना डी.एन.ए. अपने माता-पिता से ही मिलता है। जैसा कि हमारी अंगुलियों के निशानों के विषय में हैं। वैसे ही हर व्यक्ति का अपना डी.एन.ए. भी सबसे अलग होता है। यदि अपराध स्थल पर अपराधी का कोई एक बाल, रक्त की बूंद अथवा वीर्य पड़ा मिला हो तो उससे अपराधी का डी.एन.ए. पहचानने में मदद
मिलती है। संदिग्ध व्यक्ति के डी.एन.ए. से उसकी तुलना करके सच पता लगाया जा सकता है।
प्रश्न 6. जीनों की रासायनिक प्रकृति कैसी होती है?
उत्तर-जीनों की रासायनिक प्रकृति-अव तक हम जान चुके हैं कि जीन ही वंशागति लक्षणों के वाहक हैं एवं ये गुणसूत्रों पर होते हैं। अनेक वैज्ञानिकों के कार्य से हमें ज्ञात है कि जीन इन रासायनिक अणुओं के खंड होते हैं। जिन्हें हम DNA अथवा डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड (deoxyribonucleic acid) कहते हैं। एक गुणसूत्र में डी.एन.ए. परीक्षण जिसे ‘डी.एन.ए.’
फिंगर प्रिंटिंग (DNA fingerprinting) कहते हैं, के द्वारा पहचाना जा सकता है। ऐसा इसलिए कि व्यक्ति के शरीर की प्रत्येक कोशिका का डी.एन.ए. एक समान होता है और यह डी.एन.ए. अपने माता-पिता से ही मिलता है। जैसा कि हमारी उंगलियों के निशानों के विषय में है, वैसे ही हर व्यक्ति का अपना डी.एन.ए. भी सबसे अलग होता है। यदि अपराध स्थल पर अपराधी का कोई एक बाल, रक्त की बूंद अथवा वीर्य पड़ा मिला हो तो उससे अपराधी का डी.एन.ए. पहचानने में मदद मिलती है और संदिग्ध व्यक्ति के डी.एन.ए. से उसकी तुलना करके सच पता लगाया जा सकता है।
प्रश्न 7. मनुष्यों में लिंग का निर्धारण कैसे होता है?
उत्तर-मनुष्यों में लिंग निर्धारण-शुक्राणुओं और अण्डों के गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है। एक युग्मक में 22 अलिंग सूत्र तथा 1 लिंग गुणसूत्र होता है। जब माता का अण्डा तथा पिता का शुक्राणु परस्पर संलयित होते हैं, तब फिर से द्विगुणित संख्या प्राप्त हो जाती है। युग्मज (जाइगोट) से एक व्यष्टि बनता है जिसका लिंग इस बात पर निर्भर करता है कि उस में दो X गुणसूत्रों वाले युग्मजों से मादाएँ बनती हैं और एक X तथा एक Y गुणसूत्रों वाले युग्मजों से नर बनते हैं।
अण्डे सभी एक प्रकार के होते हैं। इनमें 22 अलिंग सूत्र तथा एक अकेला X गुणसूत्र होता है। शुक्राणु दो प्रकार के होते हैं- (1) 22 गुणसूत्र तथा एक Xगुणसूत्र या (ii)22 गुणसूत्र तथा एक Y गुणसूत्र वाले जब अण्डे से X-धारी शुक्राणु संलयित होता है, तब संतान मादा होती है।
प्रश्न 8. समयुग्मजी और विषमयुग्मजी क्या है?
उत्तर-समयुग्मजी और विषमयुग्मजी (Homozygous and Heterozygous)-मेण्डल के अनुसार, प्रत्येक जनक (parent) की कायिक कोशिका में एक ही गुण को व्यक्त करने के लिए दो कारक होते हैं। जब दोनों कारक एकसमान हों (जैसे-TT.tt, RR, IT) तो ऐसी दशा समयुग्मजी (homozygous) कहलाती है। इसके विपरीत, जब दोनों कारक एक-दूसरे से भिन हों, तो ऐसी दशा समयुग्मजी (homozygous) कहलाती है। इसके विपरीत, जब दोनों कारक एक-दूसरे से भिन्न हों, तो ऐसी दशा विषययुग्मजी (heterozygous) कहलाती है।
फीनोटाइप और जीनोटाइप (Phenotype and Genotype)-जीवधारी के दो लक्षण प्रत्यक्ष रूप से दिखाई पड़ते हैं, उसे फीनोटाइप कहते हैं। जैसे पौधे का लम्बापन (tallness)।
जीवधारी के आनुवंशिक संगठन को उसका जीनोटाइप कहते हैं, जोकि कारकों का बना होता है। उदाहरणत: TT(कोशिकाओं में दो कारक-दोनों लम्बे लक्षण वाले) जीनोटाइप कहलाता है।
प्रश्न 9. मेंडल का प्रभाविता नियम क्या है?
उत्तर-प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)-‘जब एक जोड़ा विरोधी लक्षणों को धारण करने वाले दो शुद्ध जनकों में परस्पर संकरण कराया जाता है, तो उनकी संतानों में विरोधी लक्षणों में से केवल एक प्रभावी लक्षण परिलक्षित होता है और दूसरा अप्रभावी लक्षण व्यक्त नहीं हो पाता।’
उदाहरण-मटर के पौधे में ऊँचाई के गुण के दो विरोधी रूप, लम्बापन (tallness) और बौनापन (dwarfness) पर ति पार किया जाये। शुद्ध लम्बे पौधों में लम्बाई के समयुग्मजी कारकों का जोड़ा होगा। लम्बे पौधों के जीनोटाइपTTहोगा। इसी प्रकार शुद्ध बौने पौधों का जीनोटाइप tt होगा। जब लम्बे (TT) और धोने (tt) पौधों के बीच संकरण कराया जायेगा, तो F1, पीढ़ी के सभी पौधों में जीनोटाइप (Tt) होगा अर्थात् एक कारक लम्बेपन का (T) और दूसरा बौनेपन का (t) होगा। चूँकि T और t में से T प्रभावी है, अत: F1, पीढ़ी के सभी पौधे लम्बे होंगे।
   
                    चित्र
इससे स्पष्ट होता है कि आनुवंशिक गुणों का सम्मिश्रण नहीं होता।
       दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. आनुवंशिक दोष क्या है? यह कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-कभी-कभार जनकों में मौजूद कोई दोषी जीन संतान में पहुँच सकता है। जिसके कारण उत्पन्न होने वाली संतान वंशागति दोष से ग्रस्त पैदा होती है। एक बच्चे में आनुवंशिक दोष आ गया है। उसका कारण निम्न चित्र में दर्शाया गया है-
चित्र : आनुवंशिक दोष का ग्राफीय निरूपण।
वंशागत दोष अनेक प्रकार के होते हैं इनमें से कुछ केवल एक ही दोषी जीन के कारण हो सकते हैं और कभी-कभी दो दोषी जीनों के कारण होते हैं जैसा कि ऊपर Rh नेगेटिव के मामले में दिखाया गया है। आनुवंशिक दोषों का औषधियों से उपचार नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक ऐसे विधियों की खोज में लगे हुए हैं जिनके द्वारा किसी व्यक्ति में मौजूद दोष जीन को हटाया जा सके अथवा उसके स्थान पर एक सामान्य जीन डाला जा सके। इसे जीन-प्रति यापन चिकित्सा (genereplacement therapy) कहते हैं।
सामान्य पाए जाने वाले तीन वंशागत दोष हैं-थैलेसीमिया (Thallasernia), हीमोफिलिया तथा वर्णाधता (Colour blindness)।
(क) थैलेसीमिया (Thallasemia)-इस दोष से ग्रस्त रोगियों में सामान्य हीमोग्लोबिन बना सकने की क्षमता नहीं होती (हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं का वह वर्णक है जो ऑक्सीजन को ऊत्तक तक पहुँचाता है)। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उस व्यक्ति में हीमोग्लोबिन के उत्पादन का नियंत्रण करने वाले जीन-जोड़े में दोनों ही जीन दोषी होते हैं। थैलेसीमिया रोगियों को जीवित रखने के लिए उन्हें बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है।
(ख) हीमोफिलिया (Haemophilia)-हीमोफिलिया से ग्रस्त रोगियों में या तो केवल एक ही दोषी जीन होता है जो x गुणसूत्र पर होता है (नर में ) या उसमें दोनों ही दोषी जीन होते हैं जो XXगुणसूत्रों पर विद्यमान होते है (मादा में)। सामान्य जीन से वे पदार्थ बनते हैं जिनके द्वारा रक्त का स्कंदन नहीं होतापिरिणामतः एक बार रक्त का बहना शुरू हो जाने के बाद वह रूकता ही नहीं।
(ग) वर्णाधता (Colour blindness)-मनुष्यों में अनेक प्रकार की वर्णांधताएँ पायी जाती हैं, परंतु इस आनुवंशिक दोष से सर्वाधिक ग्रस्त लोग वे हैं जो हरे और नीले रंग में भेद नहीं कर पाते। यह भी हीमोफिलिया के ही जैसा आनुवंशिक दोष है जो एक दोषी जीन (नर में) अथवा दोनों दोषी जीन (मोदा में) के कारण होता है।
हीमोफिलिया तथा वर्णाधता दोषों में जीन X-गुणसूत्र पर होते हैं और इसलिए यह दोष माँ से पुत्र में पहुँचता है। माँ में दो X-गुणसूत्र पर होते हैं और इसलिए यह दोष माँ से पुत्र में पहुँचता है। माँ में दो Xगुणसूत्र होते हैं जिसमें से हो सकता है कि एक Xगुणसूत्र पर सामान्य जीन हो, इसलिए वह सामान्य (दोषरहित) होती है। इसी तरह उस माँ की बेटी भी सामान्य हो सकती है, क्योंकि उसमें माँ के एक दोषपूर्ण ४ गुणसूत्र के साथ पिता का सामान्य X गुणसूत्र आया हुआ होगा। परंतु नर में केवल एक ही गुणसूत्र होता है और यदि उस पर दोषपूर्ण जीन मौजूद हुआ तब व्यक्ति को यह आनुवंशिक दोष हो ही जाएगा।
प्रश्न 2. तुलनात्मक लक्षण वाले पौधों का संकरण से आप क्या समझते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर-तुलनात्मक लक्षण वाले पौधों का संकरण (Hybridisation of Plants with Alternate forms of a Trait)-सबसे पहले मेंडल ने शुद्ध लम्बे पौधों (लम्बाई 6-7.5 फीट) व शुद्ध बौने पौधों (लम्बाई लगभग 1.5 फीट) के बीच संकरण कराया। ऐसा संकरण जिसमें एक ही लक्षण के दो विभिन्न रूपों के अध्ययन के लिए संकरण कराया जाता है, इसको एक संकर संकरण (monohybrid cross) कहते हैं। इसके लिए एक पौधे के परागकण लेकर दूसरे पौधे के वर्तिकान पर रखकर कृत्रिम पर-परागण कराया। पर-परागण कराने से पहले मेंडल पुष्पों के पुमुगों को परिपक्व होने से पूर्व ही निकाल देते थे, ताकि स्व-परागण न हो पाए। पर-परागण के बाद जायांग को ढंक देते थे ताकि किसी अन्य पुष्पी पौधे के परागकण उस पर न पहुँच सके। यह काम उन्हें हर पुष्प के साथ करना पड़ता था और पुष्पों की संख्या हजारों में होती थी।
फसल पूरी होने पर काटी गई और प्राप्त बीजों को मेंडल ने उगा दिया। इन बीजों से उत्पन्न पौधे प्रथम सन्तानीय पीढ़ी (first filial generation or F1) कहलाते हैं। मेण्डल ने पाया कि प्रथम सन्तानीय पीढ़ी के सभी पौधे लम्बे थे। इन पर इस बात को कोई असर नहीं था कि परागकण या जायांग कौन-सी किस्म के थे-लम्बे अथवा बौने। चाहे लम्बी किस्म के पौधों के परागकणों से बौने पौधों के जायांग निषेचित कराये गये अथवा बौने पौधों के परागकणों से लम्बे पौधों के जायांग निषेचित कराये गये-परिणाम एक जैसे ही मिले। उन्हें लगा कि ऐसा हो सकता है कि पौधों का लम्बापन (tellness), बौनेपन (dwarfness) पर हावी है।
परंतु मेंडल सिर्फ पौधों की लम्बाई (height) के संबंध में ही प्रयोग नहीं कर रहे थे। जैसा कि आपको पहले बता चुके हैं, छः अन्य लक्षणों का भी वह अध्ययन कर रहे थे। परंतु सभी लक्षणों के साथ प्रयोगों के परिणाम बिल्कुल एक जैसे निकले-कोई एक विशेषता दूसरी पर हावी थी। (बीजों की गोल आकृति झुरींदार आकृति पर बीजपत्री का पीला रंग हरे रंग पर इत्यादि)
निष्कर्ष-F1, पीढ़ी के पौधों में लक्षण का केवल एक ही रूप मिलता है, चाहे वह ‘नर जनक का हो चाहे मादा। लक्षण का जो रूप में प्रकट हुआ वह प्रभावी (dominant) कहलाया, तथा जो रूप छिप गया, वह क्षीण या अप्रभावी (recessive) कहलाया।
प्रश्न 3. F1, पीढ़ी के पौधों में स्वपरागण विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर-F1 पीढ़ी के पौधों में स्वपरागण (Self-pollination of F1. Generation Plants)- F1 पीढ़ी में बौनेपन का गुण कहाँ छिप गया? इस रहस्य को जानने के लिए मेण्डल ने F1 पीढ़ी के पौधों में स्व-परागण होने दिया। उन्होंने पौधों की परागण व निषेचन की क्रिया में कोई दखलअंदाजी नहीं की। प्राकृतिक ढंग से खुद-ब-खुद स्वपरागण होने दिया। उनका काम सिर्फ देखभाल तक सीमित रहा। यदि कोई फूल खराब निकलता, या उसकी वर्तिकान नौका जैसी आकृति से बाहर नकली रहती तो वह उसे नष्ट कर देते थे। हानिकारक कीड़े-मकोड़ों से वह पौधों की रक्षा करते रहे-इसलिए नहीं कि फसल बचानी थी बल्कि इसलिए कि कहीं कीड़े-मकोड़े एक फूल के परागकण दूसरे फूल पर पहुँचाकर पर-परागण न करा दें।
फसल कटने पर प्राप्त बीजों को बोया गया। इन बीजों से उत्पन्न पौधे द्वितीय सन्तानीय पीढ़ी (second fillial or F2 ageneration) कहलाते हैं। जो पौधे उगे, उनको देखने पर आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए।F2 पीढ़ी के पौधे एक-से नहीं थे। 787 लम्बे पौधों के अलावा 277 बौने पौधे भी थे। लम्बे पौधों और बौने पौधों में 2.84:1(लगभग 3:1) का अनुपात था।
केवल लम्बाई ही नहीं, बल्कि अन्य तुलनात्मक लक्षणों के मामलों में भी यही परिणाम सामने आए। प्रभावी व अप्रभावी लक्षणों वाले पौधों की संख्या में लगभग 3:1 का अनुपात था-
चित्र : मेंडल का पीढ़ी परिणाम।
3 : 1 के इस अनुपात को मेंडलीय अनुपात (Mendelian ratio) कहते हैं यह एक संकरीय अनुपात (Monohybrid ratio) कहते हैं।
निष्कर्ष-F2, पीढ़ी तक के प्रयोगों से मेंडल द्वारा निकाले गए निष्कर्ष संक्षेप में इस प्रकार हैं-
(i) F1 में किसी लक्षण का केवल एक ही प्रभावी रूप प्रकट होता है।
(ii) F2 पीढ़ी में लक्षण के दोनों रूप प्रकट हो जाते हैं।
(iii) लक्षण के प्रभावी रूप में आवृत्ति अप्रभावी रूप की तुलना में तिगुनी होती है।
प्रश्न 4. F2 पीढ़ी के पौधों में स्वपरागण विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर-F2 पीढ़ी के पौधों में स्वपरागण (Self-pollination of F2 generation plants)-मेंडल ने अपने प्रयोगों को और आगे बढ़ाया। उन्होंने जानना चाहा कि स्वपरागण से प्राप्त तीसरी पीढ़ी (F2 generation or third filial generation) कैसी होती है। पौधों में स्वपरागण से प्राप्त बीजों को बोए जाने पर जो F, पीढ़ी के पौधे प्राप्त हुए, उनसे उन्हें फिर नये परिणाम प्राप्त हुए।
उन्होंने पाया कि अप्रभावी लक्षणों वाले पौधों में कोई वियोजन नहीं होता। वे अपनी जैसी ही संतान उत्पन्न करते हैं, उनकी सारी संतान एकरूप होती है। सात पीढ़ियों तक मेंडल ने उन्हें ऐसा ही पाया।
जहाँ तक प्रभावी (dominant) लक्षण वाले पौधों का प्रश्न है, उनके व्यवहार में एकरूपता नहीं थी। उनमें से कुछ में तो वियोजन नहीं हुआ, परन्तु बाकी में उसी प्रकार का 3 : 1 का वियोजन‌ देखने को मिला जैसा कि F2 पीढ़ी में। वियोजन होने वाले तथा न होने वाले पौधों के बीच 1:2 का अनुपात था। उदाहरणत:F2 पीढ़ी के बौने पौधों से प्राप्त बीजों को जब बोया गया तो उनसे उगे पौधे बौने निकले, परन्तु लम्बे पौधों से प्राप्त बीजों को जब बोया गया तो उनसे दो प्रकार के परिणाम निकले-
(i) एक तिहाई (33.3%) लम्बे पौधों से प्राप्त बीजों ने लम्बे पौधों को ही जन्म दिया।
(ii) दो तिहाई (66-7%) लम्बे पौधों ने फिर लम्बे तथा बौने पौधों को 3 : 1 के अनुपात में जन्म दिया। इन दो-तिहाई लम्बे पौधों का व्यवहार F1 पीढ़ी के लम्बे पौधों की तरह ही था।
 
निष्कर्ष-F2 पीढ़ी से प्राप्त 3 : 1 का अनुपात वास्तव में 1:2: 1 या 1/4 : 1/2 : 1/4 होना चाहिए। एक-चौथाई प्रभावी लक्षण वाले शुद्ध पौधे, आधे संकर पौधे व एक-चौथाई अप्रभावी लक्षण वाले शुद्ध पौधे होते हैं।
प्रश्न 4. टेस्ट क्रॉस तथा बैक क्रॉस क्या है? वर्णन कीजिए।
उत्तर-परीक्षण संकरण या टेस्ट क्रॉस (Test Cross)-जैसा कि हम पहले समझ चुके हैं, प्रभावी फीनोटाइप (जैसे लम्बापन ), दो प्रकार के जीनोटाइपों के कारण हो सकता है-समयुग्मजी (TT) अथवा विषमयुग्मजी (Tt) ऐसे लम्बे पौधों का जीनोटाइप पता कैसे लगे? इसके लिए मेंडल ने एक परीक्षण (test) की विधि विकसित की। इसे टेस्ट क्रॉस (test cross) कहते हैं।
प्रभावी फीनोटाइप परन्तु अज्ञात जीनोटाइप वाले जीवधारी का संकरण समुयग्मजी अप्रभावी
(homozygous recessive)लक्षण वाले जीवों से कराते हैं तथा इस संकरण से उत्पन्न संतानों के फोतोटारष देखते हैं, उदाहरण के लिए, अज्ञात जीनोटाइप वाले लम्बे (TT/Tt) पौधों का संकरण, बीन पौधे (11)से कराते हैं-
(i) यदि अज्ञात जीनोटाइप वाला लम्बा पौधा समयुग्मजी होता है, तो सभी संतानें लम्बी होंगी।
(ii) यदि अज्ञात जीनोटाइप वाला लम्बा पौधा विषमयुग्मजी होता है, तो 50% संतानें लम्बी और 50% बौनी होंगी।
बैक क्रॉस (Back Cross) या प्रतीप संकरण-यदि F, पीढ़ी की संतानों को किसी भी जनक से संकरित कराया जाए, चाहे वह प्रभावी लक्षणों वाला या अप्रभावी लक्षणों वाला हो ऐसे संकरण के प्रतीप संकरण (back cross) कहते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा बैक क्रॉस का उपयोग लाभदायक लक्षणों को समयुग्मजी स्थिति में लाने हेतु किया जाता है।

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