12-biology

bihar board 12 biology | जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग

bihar board 12 biology | जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग

[ BIOTECHNOLOGY : PRINCIPLES AND PROCESSES ]
                  महत्त्वपूर्ण तथ्य
• आनुवंशिकतः रूपांतरित जीव – ऐसे पौधे , जीवाणु , कवक व जंतु जिनके जींस हस्तकौशल द्वारा परिवर्तित किए जा चुके हैं । आनुवंशिकत : रूपांतरित जीव कहलाते हैं ।
• पारजीवी जंतु – ऐसे जंतुओं जिनके डीएनए में परिचालन द्वारा एक अतिरिक्त ( बाहरी ) जीन व्यवस्थित होता है जो अपना लक्षण व्यक्त करता है उसे पारजीवी जंतु कहते हैं ।
• बायोपाइरेसी – मल्टीनेशनल कंपनियों व दूसरे संगठनों द्वारा किसी राष्ट्र या उससे संबंधित लोगों से बिना व्यवस्थित अनुमोदन व क्षतिपूरक भुगतान के जैव संसाधनों का उपयोग करना बायोपाइरेसी कहलाता है ।
      NCERT पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
       अभ्यास ( Exercises )
1. बीटी ( Bt ) आविष के रवे कुछ जीवाणुओं द्वारा बनाए जाते हैं लेकिन जीवाणु स्वयं को नहीं मारते हैं , क्योंकि-
( क ) जीवाणु आविष के प्रति प्रतिरोधी हैं ।
( ख ) आविष अपरिपक्व हैं ।
( ग ) आविष निष्क्रिय होता है ।
( घ ) आविष जीवाणु की विशेष थैली में मिलता है । उत्तर- ( ग ) आविष निष्क्रिय होता है- क्योंकि कीट इस निष्क्रिय जीव विष को खाता है , इसके रवे आँत में क्षारीय पीएच के कारण घुलनशील होकर सक्रिय रूप में परिवर्तित हो जाते हैं । सक्रिय जीव विष मध्य आँत की उपकलीय कोशिकाओं की सतह से बंधकर उसमें छिदों का निर्माण करते हैं , जिस कारण से कोशिकाएँ फूलकर फट जाती हैं और परिणामस्वरूप कीट की मृत्यु हो जाती है ।
2. परजीवी जीवाणु क्या है ? किसी एक उदाहरण द्वारा सचित्र वर्णन करो ।
उत्तर – ऐसे जन्तु जिनके डीएनए में परिचालक द्वारा एक अतिरिक्त ( बाहरी ) जीन व्यवस्थित होता है जो अपना लक्षण व्यक्त करता है उसे पारजीवी जंतु कहते हैं । उदाहरण के लिए आनुवंशिक प्रौद्योगिकी द्वारा तैयार किया गया मानव इंसुलिन । मधुमेह का नियंत्रण निश्चित समय अंतराल पर इंसुलीन लेने से ही संभव है । इंसुलिन दो छोटी पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाओं का बना होता है , शृंखला ‘ ए ‘ व श्रृंखला ‘ बी ‘ जो आपस में डाईसल्फाइड बंधों द्वारा जुड़ी होती हैं । 1983 में एली लिली नामक एक अमेरिकी कंपनी ने दो डीएनए अनुक्रमों को तैयार किया जो मानव इंसुलिन की श्रृंखला ए और बी के अनुरूप थे जिसे ई . कोलाई के प्लामिड में प्रवेश कराकर इंसुलिन शृंखलाओं का उत्पादन कि । इन अलग – अलग निर्मित शृंखलाओं ए और बी को निकालकर डाईसल्फाइड बंध बनाकर आपस में संयोजित कर मानव इंसुलिन का निर्माण किया गया।
चित्र : प्राक – इंसुलिन का सी – पेप्टाइड के अलग होने के बाद इंसुलिन में परिपक्वता
3. आनुवंशिक रूपांतरित फसलों के उत्पादन के लाभ व हानि का तुलनात्मक विभेद कीजिए ।
उत्तर – आनुवंशिक रूपांतरित फसलों का उपयोग कई प्रकार से लाभदायक है-
( i ) अजैव प्रतिबलों ( ठंडा , सूखा , लवण , ताप ) के प्रति अधिक सहिष्णु फसलों का निर्माणा ।
( ii ) रासायनिक पीड़कनाशकों पर कम निर्भरता करना ( पीड़कनाशी – प्रतिरोधी फसल ) ।
( iii ) कटाई पश्चात् होने वाले नुकसानों को कम करने में सहायक ।
( iv ) पौधों द्वारा खनिज उपयोग क्षमता में वृद्धि ( यह शीघ्र मृदा उर्वरता समापन को रोकता है) । ( v ) खाद्य फसलों के पोषणिक स्तर में वृद्धि , उदाहरणार्थ विटामिन ए समृद्ध धान ।
( vi ) तदनुकूल पौधों के निर्माण में सहायक है , जिनसे वैकल्पिक संसाधनों के रूप में उद्योगों में वसा , ईधन व भेषजीय पदार्थों की आपूर्ति की जाती है ।
   आनुवंशिक रूपांतरित फसलों के उत्पादन से होने वाली हानि इस प्रकार है
 ( i ) इस प्रकार की फसलों के उत्पादन से यह संभावना है कि कीट एवं पीड़क इस प्रकार की फसलों के प्रति प्रतिरोधी हो जायेंगे । फिर उपयोग के लिए नये पीड़कनाशी एवं कीटनाशियों की जरूरत पड़ेगी ।
( ii ) इस प्रकार की फसलें लोगों में एलर्जी उत्पन्न कर सकती है ।
( iii ) आनुवंशिक रूपांतरित फसलें बहुत महंगी पड़ती हैं और इनकी प्रक्रिया बहुत लम्बी है , इसलिए छोटे किसान हर बार रूपांतरित फसलों के बीज नहीं खरीद सकते ।
( iv ) इस विधि द्वारा उत्पादित कुछ फसलें बीज पैदा नहीं कर सकती । इसलिए किसानों को प्रत्येक बार नए बीज खरीदने होंगे ।
4. काई प्रोटींस क्या है ? उस जीव का नाम बताओ जो इसे पैदा करता है । मनुष्य इस प्रोटीन को अपने फायदे के लिए कैसे उपयोग में लाता है ?
उत्तर – विशिष्ट बीटी जीव विष जीन को बैसीलस थुरीनजिएसिस से पृथक् कर कई फसलों जैसे कपास में समाविष्ट किया जा चुका है । जींस का चुनाव फसल व निर्धारित कीट पर निर्भर करता है , जबक सर्वाधिक बीटी जीव विष कीट – समूह विशिष्टता पर निर्भर करते हैं । जीव विष जिस जीन द्वारा कूटबद्ध होते हैं उसे क्राई कहते हैं । ये कई प्रकार के होते हैं । उदाहरणस्वरूप जो प्रोटींस जीन क्राई 2 एबी द्वारा कूटबद्ध होते हैं वे कपास के मुकुल कृमि को नियत्रित करते हैं जबकि नाई 1 एबी मक्का छेदक को नियंत्रित करता है ।
  बैसीलस थूरीनजिएंसीस की कुछ नस्लें ऐसी प्रोटीन का निर्माण करती हैं जो विशिष्ट कीटों जैसे – लीथीडोप्टेशन , कोलियोप्टेरान व डीप्टेरान को मारने में सहायक है । इससे कीटनाशकों के उपयोग की आवश्यकता नहीं होती है । जिससे फसलों में कीटनाशक रसायनों का प्रयोग कम होता है । जिससे जल और मृदा प्रदूषण रहित रहती है जो मानव के स्वास्थ्य और लंबे जीवन के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो रही है ।
5. जीन चिकित्सा क्या है ? एडीनोसीन डिएमीनेज ( एडीए ) की कमी का उदाहरण देते हुए सचित्र वर्णन करें ।
उत्तर – जीन चिकित्सा , ऐसा एक प्रयास है जिसके द्वारा किसी बच्चे या भ्रूण में चिह्नित किए गए जीन दोषों का सुधार किया जाता है । उसमें रोग के उपचार के लिए जीनों को व्यक्ति को कोशिकाओं या ऊत्तकों में प्रवेश कराया जाता है । आनुवंशिक दोष वाली कोशिकाओं के उपचार के लिए सामान्य जीन को व्यक्ति या भ्रूण में स्थानांतरित करते हैं जो निष्क्रिय जीन की क्षतिपूर्ति कर उसके कार्यों को संपन्न करते हैं ।
  जीन चिकित्सा का पहले पहल प्रयोग वर्ष 1990 में एक चार वर्षीय लड़की में एडीनोसीन डिएमीनेज ( एडीए ) की कमी से दूर करने के लिए किया गया था । यह एंजाइम प्रतिरक्षातंत्र के कार्य के लिए बहुत आवश्यक होता है । कुछ बच्चों में एडीए की कमी का उपचार अस्थिमज्जा के प्रत्यारोपण से होता है । जबकि दूसरों में एंजाइम प्रतिस्थापन चिकित्सा द्वारा उपचार किया जाता है जिसमें सुई द्वारा रोगी को सक्रिय एडीए दिया जाता है । जीन चिकित्सा में सर्वप्रथम रोगी के रक्त से लसीकाणु को निकालकर शरीर से बाहर संवर्धन किया जाता है । सक्रिय एडीए का सी डीएनए ( पश्च विषाणु संवाहक का प्रयोग कर ) लसीकाणु में प्रवेश कराकर अंत में रोगी के शरीर में वापस कर दिया जाता है । ये कोशिकाएँ मृतप्राय होती हैं । इसलिए आनुवंशिक निर्मित लसीकाणुओं को समय – समय पर रोगी के शरीर से अलग करने की आवश्यकता होती है । यदि मज्जा कोशिकाओं से विलगित अच्छे जीनों को प्रारंभिक भ्रूणीय अवस्था की कोशिकाओं से उत्पादित एडीए में प्रवेश करा दिए जाएं तो एक स्थायी उपचार हो सकता है ।
6. ई . कोलाई जैसे जीवाणु में मानव जीन की क्लोनिंग एवं अभिव्यक्ति के प्रायोगिक चरणों का आरेखीय निरूपण प्रस्तुत करें ।
उत्तर – पुनर्योगज डीएनए तकनीक ( Recombinant DNA Technology ) – पुनर्योगज DNA प्राप्त करने के लिए तीन विधियाँ प्रयुक्त की गई हैं-
( अ ) DNA की दो श्रृंखलाओं के अंतिम छोर पर नई DNA श्रृंखलाएं जोड़कर – यदि हम एक DNA के सिरे पर कुछ क्षारक ( जैसे TTTTT ) जोड़ दें तथा दूसरे DNA के सिरे पर इसके संयुग्मी क्षारक ( AAAAAA ) जोड़ दें और फिर इन दोनों प्रकार के DNA को मिलायें , तो नई लड़ियां आपस में H – bond बनाकर दो भिन्न DNA अणुओं को संयुक्त कर देंगी । इस कार्य के लिए विशेष एंजाइम का उपयोग किया जाता है जिसे को संयुक्त कर देंगी । इस कार्य के लिए विशेष एंजाइम का उपयोग किया जाता है जिसे टर्मिनल ट्रांसफरेज ( terminal transferase ) कहते हैं ।
अनजुड़े स्थानों को डीएनए लाइपेज ( DNA ligase ) नामक एंजाइम द्वारा भर देते हैं ।
( ब ) नियंत्रण एंजाइमों की सहायता से ( With the help ofrestriction enzymes ) – इस विधि में संयुग्मी क्षारकों के बीच हाइड्रोजन बंध बनाकर संकरित DNA का निर्माण करते हैं । परन्तु एक विशेष एंजाइम ,
नियंत्रण एंजाइम ( restrictionen zymes ) का उपयोग करते हैं । इस प्रकार के लगभग 100 एंजाइम अब उपलब्ध हैं । ये एंजाइम चाकू की तरह कार्य करते हैं तथा DNA श्रृंखला को विशिष्ट स्थानों पर इस प्रकार से काट देते हैं कि वांछित जीनों वाले खंड प्राप्त हो सकते हैं ।
उदाहरण के लिए ई . कोलाई से ईको आर आई ( Eco RI ) नामक नियंत्रण एंजाइम पृथक् किया गया है । यह DNA अणु में क्षारकों के निम्न क्रम को पहचान कर उसे क्षारक G तथा A के मध्य काट देता है-
भिन्न – भिन्न स्रोतों से प्राप्त दो DNA के टुकड़ों को मिला दिया जाये तो संयुग्मी बेस आपस में हाइड्रोजन आबंध बनाकर द्विकुंडलित रचना बना लेते हैं । जो स्थान बिना जुड़े रहते हैं , उन्हें DNA लाइपेज की सहायता से जोड़ लिया जाता है , जैसा कि पहली विधि में किया गया था । स्पष्ट है कि Eco RI तथा DNA ligase की सहायता से विभिन्न जीवों के जीनों को संयुक्त कराके संकरित जीन तैयार किये जा सकते हैं । संकरित जीन में दोनों ही जीवों के गुण उपस्थित होंगे । यहाँ तक कि ऐसे जीव , जिनमें कोई समानता नहीं है । ( हाथी और मनुष्य , चूहा और बंदर , टमाटर और आम ) इत्यादि । यही नहीं , पौधों और जंतुओं के बीच भी संकरण की संभावना बढ़ गई ।
( स ) क्लोनिंग ( Cloning ) – यह विधि सबसे अधिक सरल तथा उपयोगी सिद्ध हुई है । आप जानते हैं कि कोशिकाओं में DNA का प्रतिकृतिकरण होता रहता है । परन्तु यह भी तभी होता है , जब स्वयं जीन इसका आदेश देता है । कोशिका में इन ‘ प्रतिकृतिकरण जीनों ‘ की संख्या बहुत कम होती है । जैसे , कुछ जीवाणुओं के गुणसूत्र में 300-500 तक जीन होते हैं , परन्तु ‘ प्रतिकृतिकरण जीन ‘ केवल एक ही होता है । इस जीन की एक विशेषता यह भी है कि यदि इसे मूल DNA से अलग करके किसी दूसरे DNA के साथ जोड़ दिया जाये तो यह उसकी प्रतिकृति करने लगता है । जीवाणुओं के प्लाज्मिड ( plasmid ) में भी यह जीन उपस्थित होता है । यही कारण है कि जिन जीवाणु कोशिकाओं में प्लाज्मिड होता है , वे तेजी से गुणन करती हैं ।
चित्र : क्लोनिंग की प्रक्रिया की रूपरेखा शरीर में प्रत्येक पदार्थ के संश्लेषण के लिए कोई निश्चित जीन उत्तरदायी होता है । यदि इस विशिष्ट जीन के साथ प्लाज्मिड के साथ पहले बताई विधियों द्वारा संकरित करा दिया जाये और इस संकरित DNA को पुनः जीवाणु की कोशिका में स्थापित करके उपयुक्त संवर्धन माध्यम में उगने दिया जाये , तो जीवाणु में वह जीन उसी पदार्थ का संश्लेषण करता है जो कि वह मूल शरीर में करता था । इस समस्त प्रक्रिया को क्लोनिंग ( cloning ) कहते हैं । पोषी जीवाणु के लिए ई . कोलाई का उपयोग किया जाता है ।
7. तेल के रसायन शास्त्र तथा आरडीएनए जिसके बारे में आपको जितना भी ज्ञान प्राप्त है , उसमें आधार बीजों तेल हाइड्रोकार्बन हटाने की कोई एक विधि सुझाएँ ।
उत्तर – जैव प्रौद्योगिकी – आणविक जैव तकनीका । 8. इंटरनेट से पता लगाएं कि गोल्डन राइस ( गोल्डन धान ) क्या है ?
उत्तर – गोल्डन राइस चावल जैव प्रौद्योगिको द्वारा उत्पन्न चावल की एक किस्म ( ओरयजा सटीका ) है । इस किस्म के चावल के खाद्य भागों में बेटा – करोटीन ( प्रो – विटामिन A ) जो कि जैव संश्लेषित है । इसके बारे में वैज्ञानिक रिपोर्ट प्रथम बार 2000 में ‘ साईस मैगजीन ‘ में प्रकाशित हुई थी । 2005 में गोल्डन राइस 2 की एक और किस्म पैदा की गई जिसमें 23 गुणा ज्यादा बेटा – करोटीन थी । ये किस्म मानव के प्रयोग के लिए उपलब्ध हैं ।
      अंकुरित / जर्म germanylgermasyi – PP
                चित्र : गोल्डन राइस
9. क्या हमारे रक्त में प्रोटीओजेज तथा न्यूक्लीऐजेज हैं ?
उत्तर – नहीं ।
10. इंटरनेट से पता लगाएं कि मुखीय सक्रिय औषधि प्रोटीन को किस प्रकार बनाएंगे । इस कार्य में आनेवाली मुख्य समस्याओं का वर्णन करें ।
उत्तर – डियूटेरियम एक्सचेंज मास स्पेक्ट्रोमेक्टरी Deuterium Exchange Mass Spectrometry ( DXMS ) तकनीक प्रोटीन संरचना और उसके प्रकार्यों का अध्ययन करने के लिए एक शक्तिशाली माध्यम है । इस विधि का प्रयोग करके हम मुख्य औषधि प्रोटीन का निर्माण कर सकते हैं लेकिन इस प्रकार के कार्य में आनेवाली समस्याएँ लेबर और समय की है । इसलिए मुख्य प्रोटीनों का निर्माण कम किया जाता है । यह एक जटिल प्रक्रम द्वारा तैयार होती है ।
    परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न :
1. नियासीन ‘ विटामिन है
( a ) BI
( b ) B2
( c ) B12
( d ) B4
उत्तर- ( d ) B4
2. निम्नलिखित में से कौन – सा रेशेदार प्रोटीन का उदाहरण है ?
( a ) इंसुलिन
( b ) हीमोग्लोबिन
( c ) फाइनोइन
( d ) ग्लूकोजन
उत्तर- ( c ) फाइनोइन
3. प्रथम पारजीवी गाय का नाम क्या था ?
( a ) रोजी
( b ) बबली
( c ) हीरा
( d ) मोती
उत्तर- ( a ) रोजी ।
4. खाद्य उत्पादन में वृद्धि के लिए हम कौन – सी संभावना के बारे में सोच सकते हैं ?
( a ) कृषि रसायन आधारित कृषि
( b ) कार्बनिक कृषि
( c ) आनुवंशिकः निर्मित फसल आधारित कृषि ( d ) उपरोक्त सभी
उत्तर- ( d ) उपरोक्त सभी ।
5. निम्न में से जैव प्रौद्योगिकी का अनुसंधान क्षेत्र कौन – सा है ?
( a ) उन्नत जीवों का निर्माण करना
( b ) सर्वोत्तम परिस्थितियों का निर्माण करना
( c ) प्रोटीन / कार्बनिक यौगिक के शुद्धीकरण में उपयोग करना
( d ) उपरोक्त सभी
उत्तर- ( d ) उपरोक्त सभी ।
6. खाद्य उत्पादन में वृद्धि हेतु कौन – सी संभावना हम सोच सकते हैं ?
( a ) रसायन आधारित कृषि
( b ) कार्बनिक कृषि
( c ) आनुवंशित आधारित कृषि
( d ) उपरोक्त सभी
उत्तर- ( d ) उपरोक्त सभी ।
7. आरएनए अंतरक्षेप क्या है ?
( a ) पीड़कनाशी
( b ) कोशिकीय सुरक्षा की विधि
( c ) प्रोटीन
( d ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- ( d ) इनमें से कोई नहीं ।
8. सूत्रकृमि विशिष्ट जीनों को परपोषी पौधों में किसके उपयोग द्वारा प्रवेश कराया गया है ?
( a ) एग्रोबैक्टिरियम संवाहक
 ( b ) कवक
( c ) यीस्ट
( d ) खरपतवार
उत्तर- ( a ) एग्रोबैक्टिरियम संवाहका
9. मधुमेह रोगियों के द्वारा उपयोग में लाया जाने वाला इंसुलिन किसके अग्नाशय से निकाला जाता है ?
( a ) सूअर
( b ) बकरी
( c ) मुर्गा
( d ) भैंस
उत्तर- ( a ) सूअर ।
10. यदि एक व्यक्ति आनुवंशिक रोग के साथ पैदा हुआ है , तो उसका रोग किस चिकित्सा पद्धति द्वारा ठीक किया जा सकता है ?
( a ) होमोपद्धति
( b ) ऐलोपैथी
( c ) शल्य चिकित्सा
( d ) जीन चिकित्सा
उत्तर- ( d ) जीन चिकित्सा ।
11. जीन चिकित्सा का प्रथम बार प्रयोग कब किया था ?
( a ) 1990 में
( b ) 2000 में
( c ) 1890 में
( d ) 1999 में
उत्तर- ( a ) 1990 में ।
12. निम्न में पारजीवी जंतु कौन – सा है ?
( a ) मछली
( b ) खरगोश
( c ) सूअर
( d ) उपरोक्त सभी
उत्तर- ( d ) उपरोक्त सभी ।
II . रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :
1 . ………… एक प्रकार का जीवविष है ।
2 . …….. सभी समीमकेंद्र की जीनों में कोशकीय सुरक्षा की एक विधि है ।
3. वर्तमान समय में लगभग………….. चिकित्सीय औषधियों विश्व में मनुष्य के प्रयोग हेतु स्वीकृत हो चुकी है ।
4. ………………..में सर्वप्रथम रोगी के रक्त से लसीकाणु को निकालकर शरीर से बाहर संवर्धन किया जाता है । 5. मानव अल्फा – लेक्टएल्बुमिन मानव ……………… हेतु एक अत्यधिक संतुलित पोषक तत्त्व है ।
उत्तर -1 . बीटा ( Bt ) , 2. आरएनए अंतरक्षेप , 3. 30 पुनर्योगज , 4. जीन , 5. लसीकाणु , शिशु ।
  III . निम्नलिखित में से कौन – सा कथन सत्य है और कौन – सा असत्य है
1. आनुवंशिकत : रूपांतरित जीवों का निर्माण एक या एक से अधिक जीन का , एक जीव से दूसरे जीव में रूपानांतरण की प्राकृतिक विधि के अतिरिक्त पुनर्योगज ‘ डीएनए प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए किया गया है ।
2. जीएम पौधों का उपयोग फसल उत्पादन बढ़ाने , पश्च फसल उत्पाद नुकसान में कमी व फसलों का प्रतिबंधों के प्रति अधिक सहनशील बनाने में अत्यंत उपयोगी है ।
3. पुनर्योगज चिकित्सीय औषधियाँ मनुष्य के प्रोटीन के समतुल्य हैं । इस कारण से इनका प्रतिरक्षात्मक अवांछित प्रभाव नहीं पड़ता है ।
4. जीवाणु में रचित मानव इंसुलिन जो संरचनात्मक प्राकृतिक अणु के पूर्णतया समान है ।
5. भारत में धान की केवल किस्में ही मिलती हैं ।
6. किसी राष्ट्र या उससे संबंधित लोगों के बिना व्यवस्थित अनुमोदन व क्षतिपूरक भुगतान के जैव संसाधनों का उपयोग करना बायोपाइरेसी कहलाता है ।
उत्तर – 1.सत्य , 2. सत्य , 3. सत्य , 4. सत्य , 5. असत्य , 6. सत्य ।
IV . स्तंभ -1 में दिए गए पदों का स्तंभ- II पदों के साथ सही मिलान करें :
  अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. जैव प्रौद्योगिकी के तीन विवेचनात्मक अनुसंधान क्षेत्रों के नाम बताइए ।
उत्तर- ( i ) उन्नत जीवों के रूप में सर्वोत्तम उत्प्रेरक का निर्माण करना ,
( ii ) उत्प्रेरक के कार्य हेतु अभियांत्रिकी द्वारा सर्वोत्तम परिस्थितियों का निर्माण करना तथा
( iii ) अनुप्रवाह प्रक्रम तकनीक का प्रोटीन / कार्बनिक यौगिक के शुद्धीकरण में उपयोग करना ।
प्रश्न 2. कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करके खाद्य उत्पादन में वृद्धि के लिए हम कौन – सी तीन संभावनाओं के बारे में सोच सकते हैं ?
उत्तर- ( i ) कृषि रसायन आधारित कृषि , ( ii ) कार्बनिक कृषि और ( iii ) आनुवंशिकतः निर्मित फसल आधारित कृषि ।
प्रश्न 3. बीटी से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर – बीटी एक प्रकार का जीवविष है जो एक जीवाणु जिसे बैसीलस थुरीनजिएसीस ( संक्षेप में बीटी ) कहते हैं , से निर्मित होता है ।
प्रश्न 4. क्राई किसे कहते हैं ?
उत्तर – जींस का चुनाव फसल व निर्धारित कीट पर निर्भर करता है , जबकि सर्वाधिक बीटी जीव विष कीट – समूह विशिष्टता पर निर्भर करते हैं । जीव विष जिस जीन द्वारा कूटबद्ध होते हैं उसे क्राई कहते हैं ।
प्रश्न 5. विश्व में किसके द्वारा प्रथम बार इंसुलिन श्रृंखलाओं का उत्पादन शुरू हुआ ?
उत्तर -1983 में एली लिली नामक एक अमेरिकी कंपनी ने दो डीएनए अनुक्रमों को तैयार किया जो मानव इंसुलिन की श्रृंखला ए और बी के अनुरूप होती हैं और ई . कोलाई के प्लामिड में प्रवेश कराकर इंसुलिन शृंखलाओं का उत्पादन शुरू किया। प्रश्न 6. जीन चिकित्सा का सबसे पहला प्रयोग कब और किस पर किया गया था?
उत्तर – जीन चिकित्सा का सबसे पहला प्रयोग वर्ष 1990 में एक चार वर्षीय लड़की में एडीनोसीन डिएमीनेज ( एडीए ) की कमी से दूर करने के लिए किया गया था।
प्रश्न 7. रोग की प्रारंभिक पहचान करने की कुछ विधियों के नाम बताएँ ।
उत्तर – पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिक , पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया व एंजाइम सहलग्न प्रतिरक्षा सकती है । शोषक आमापन ( एलाइजा ) कुछ ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा रोग की प्रारंभिक पहचान की जा सकती है।
प्रश्न 8. वर्तमान में कौन – कौन सी बीमारियों के लिए पारजीवी नमूने उपलब्ध हैं ?
उत्तर – वर्तमान समय में मानव रोगों जैसे – कैंसर , पुटीय रेशमयता , रूमेटवाएड संधिशोथ व एल्माइजर हेतु पारजीवी नमूने उपलब्ध हैं ।
प्रश्न 9. सर्वप्रथम पारजीवी गाय ‘ रोजी ‘ के दूध की विशेषता बताइए ।
उत्तर – वर्ष 1977 में सर्वप्रथम पारजीवी गाय रोजी ‘ ऐ मानव प्रोटीन संपन्न दुग्ध ( 2.4 ग्राम प्रति लीटर ) प्राप्त किया गया । इसके दूध में मानव अल्फा – लेक्टएल्बुमिन मिलता है जो मानव शिशु हेतु अत्यधिक संतुलित पोषक तत्त्व है जो कि साधारण गाय के दूध में नहीं मिलता है ।
प्रश्न 10. भारत सरकार द्वारा बनाए गए उस संगठन का नाम बताइए जो कि जी एम अनुसंधान संबंधी कार्यों की वैज्ञानिकता तथा जनसेवाओं के लिए जीएम जीवों के सन्निवेश की सुरक्षा आदि के विषय में निर्णय लेगा ?
उत्तर – जीईएसी ( जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी अर्थात् आनुवंशिक अभियांत्रिकी संस्तुति समिति ) ।
प्रश्न 11. भारत में धान की कितने प्रकार की किस्में मिलती हैं ?
उत्तर – एक अनुमान के अनुसार केवल भारत में धान की लगभग 2 लाख किस्में मिलती हैं ।
         लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. जैव पदार्थों से ऊर्जा प्राप्त करने की कुछ विधियाँ एक तालिका बनाकर समझाइए ।
उत्तर – जैव पदार्थों के ऊर्जा प्राप्त करने की विधियाँ
प्रश्न 2. सूक्ष्मजीवियों की सहायता से बनने वाले कुछ कार्बनिक अम्लों के बारे में बताइए । उत्तर – अनेक कार्बनिक अम्लों का उत्पादन सूक्ष्मजीवों में किण्वन की सहायता से किया जाता है । इनमें से कुछ इस प्रकार हैं
( i ) सिट्रिक अम्ल ( Citric Acid ) – एस्पर्जिलस नाइजर ( Aspergillus niger ) नामक कवक द्वारा शर्करा के किण्वन से प्राप्त किया जाता है ।
( ii ) उलूकोनिक अम्ल ( Gluconic Acid ) – एस्पर्जिलस नाइजर ( A. niger ) , पैनिसिलियम परप्यूरोजेनम ( Penicillium purpurogenum ) नामक कवकों तथा एसिटोबैक्टर एसिटाई ( Acetobacter aciti ) नामक जीवाणु की ग्लूकोज पर क्रिया द्वारा उत्पन्न होता है ।
( iii ) लैक्टिक अम्ल ( Lactic Acid ) – अनेक जीवाणु जैसे लैक्टोबैसिलस बलोरिकस , लै डेलबुएकाई , स्ट्रैप्टोकोकस लैक्टिस की स्टार्च , शीरे इत्यादि पर क्रिया से बनाया जाता है ।
प्रश्न 3. टीकों का निर्माण कैसे किया जाता है ?
उत्तर – टीकों ( Vaccines ) का निर्माण- अनेक बीमारियों जैसे चेचक , डिप्थीरिया , टिटनेस व पोलियों आदि की रोकथाम के लिए टीके लगाए जाते हैं । परन्तु इन टीकों को तैयार करने की वर्तमान विधि काफी कठिन एवं खर्चीली है । आशा की जाती है कि क्लोनिंग द्वारा न केवल इन रोगों के टीकों को , अपितु अनेक अन्य रोगों के टीकों को भी बहुत कम खर्च पर तैयार किया जा सकता है ।
    गत वर्षों में मलेरिया पर काबू पाने के लिए टीकों के निर्माण की दिशा में कुछ प्रगति हुई है । इनमें से कुछ टीके तो मच्छर द्वारा काटे जाने के समय रक्षा करते हैं वाइवेक्स से स्पोरोजोइट एंटीजन के जीन को पृथक् कर दिया जाता है । इस जीन के माध्यम से या तो एंटीजन संश्लेषित किया जाता है ( जिससे टीका तैयार किया जाता है ) , या इसे किसी जीवाणु में अन्य परजीवियों के एंटीजनों के साथ प्रत्यारोपित किया जाता है ताकि सम्मिन टीका ( composite vaccine ) मिल सके ।
प्रश्न 4. जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव तकनीकी के क्या – क्या अनुप्रयोग हो सकते हैं ? जितना आप बता सकते हैं , बताइए ।
उत्तर – जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव तकनीकी के अनुप्रयोग ( Applications of Genetic Engineering and Biotechnology ) – यद्यपि विकास के प्रारंभिक स्तर पर जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव तकनीकी का क्षेत्र विकसित है , फिर भी मनुष्य के स्वास्थ्य के क्षेत्र में और दवाइयाँ , कृषि और उद्योग में इनका योगदान महत्त्वपूर्ण है-
( i ) जेनेटिक इंजीनियरिंग की सहायता से अनेक जेनेटिक व्यतिक्रम ( disorber ) का आरंभिक अवस्था में पहचानना और इलाज करना संभव हुआ है ।
( ii ) बहुत से जैव तकनीकी उत्पाद दवाइयों के रूप में प्रयोग किए जाते हैं । उनमें से कुछ नीचे दिए गए हैं-
( a ) मानव इंसुलिन हॉर्मोन – मधुमेह के उपचार के लिए उपयोग किया जाता है ।
( b ) इंटरफेरॉन वायरसरोधी के रूप में ।
( c ) रक्त थक्का कारक हीमोफिलिआ के उपचार में।
( d ) टीके कई संक्रामक रोगों के निदान में ।
( iii ) कई बैक्टीरिया तथा सूक्ष्म जीवाणुओं में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की सहायता से जीन परिवर्तन किया जा चुका है , जिससे ये कई उपयोगी प्रक्रियाएँ संपन्न करते हैं ।
( iv ) इनकी सहायता से कच्चे पदार्थो से उपयोगी पदार्थों को प्राप्त किया जा सकता है । प्रदूषण को रोका जा सकता है ।
( v ) कृषि क्षेत्र में पौधों में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधकता बढ़ाकर फसलों को उन्नत किया जा सकता है । खाद्य और रासायनिक उद्योग में भी जेनेटिक इंजीनियरिंग की सहायता से सूक्ष्म जीव विशिष्ट कार्य कर सकते हैं ।
   दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. प्रतिजैविक क्या है ? इनका उत्पादन कैसे किया जाता है ?
उत्तर – प्रतिजैविक ( antibiotics ) वे रासायनिक पदार्थ हैं जो किसी सूक्ष्मजीवी में उपापचय के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं , तथा दूसरे सूक्ष्मजीवी को मार डालते हैं । सन् 1928 में सर एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने देखा कि पेनिसिलियम ( Penicillium ) नामक कवक से कोई ऐसा पदार्थ निकला जो स्टॅफिलोकोक्कस ऑरियस ( Staphylococcus aureus ) नामक जीवाणु को मार डालता है ।
इस पदार्थ का नाम पेनिसिलीन ( Penicillin ) रखा गया । अगले दशक में इस पदार्थ को पृथककत करने में सफलता मिली । सन् 1943 में वैक्समैन ( Waksman ) ने स्ट्रेप्टोमाइसीन ( Streptomycin ) नामक प्रतिजैविक का पृथककरण किया । तब से अनेक प्रतिजैविकों की खोज की जा सकी है और इन व्यावसायिक स्तर पर उत्पादित किया जा रहा है । इनमें से कुछ प्रतिजैविक व उनके स्रोत ( सूक्ष्मजीवी ) निम्नलिखित है-
( i ) बैसिट्रेसिन – बैसिलस लाइकेनिफार्मिस ,
( ii ) क्लोरोमाइसिटिन – स्ट्रेप्टोमाइसीज वेनिजुएली ,
( iii ) टेट्रासाइक्लीन – स्ट्रेप्टोमाइसीज ऑरिओफेसिएन्स ,
( iv ) एरिथ्रोमाइसीन – स्ट्रेप्टोमाइसीज एरिथ्रीएस । प्रतिजैविकों का उत्पादन – जिस सूक्ष्मजीवी से प्रतिजैविक प्राप्त करना हो , तो उसे उपयुक्त संवर्धन माध्यम में उगा लेते हैं । बाद में सूक्ष्मजीवी के एक – समान संवर्धन के लिए माध्यम को निरंतर हिलाते रहते हैं । बाद में सूक्ष्मजीवी को छानकर या अन्य विधियों द्वारा अलग कर देते हैं तथा शेष माध्यम में से प्रतिजैविक को रासायनिक विधियों से अलग कर लेते हैं ।
प्रश्न 2. आनुवंशिक प्रौद्योगिकी में ऊतक संवर्धन की क्या भूमिका है ?
उत्तर – इंसुलिन व मानव वृद्धि हाँर्मोन ( Insulin and Human Growth Hormones ) – मानव शरीर में कुछ ऊत्तकों में ऐसी प्रोटीन उत्पन्न होती है जो शरीर की कुछ विशिष्ट क्रियाओं पर नियंत्रण रखती है । इन प्रोटीनों के संश्लेषण में गड़बड़ होने से शरीर रोगी हो जाता है । ऐसी दशा में इन प्रोटीनों को औषधियों के रूप में रोगी को प्रदान करना आवश्यक हो जाता है। उदाहरण के तौर पर , अग्नाशय की कुछ कोशिकाओं में इंसुलिन उत्पन्न होती है , जो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है । परन्तु मधुमेह के रोगियों में इंसुलिन पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न नहीं होता , अंतः उनको औषधि के रूप में इंसुलिन देनी पड़ती है । यही कारण है कि इंसुलिन को काफी अधिक मात्रा में संश्लेषित करना पड़ता है । संश्लेषण विधि जटिल होने के कारण इंसुलिन काफी महंगी होती है । मानव शरीर में उत्पन्न कुछ अन्य प्रोटीन – औषधि यों जैसे – मानव – वृद्धि हॉर्मोन ( ह्यूमन ग्रोथ हॉर्मोन ) , इंटरफेरॉन , रेनिन आदि के साथ भी यही समस्या है ।
 
 प्रोटीनों के संश्लेषण के लिए विशिष्ट जीनों को प्राप्त कर लिया जाए तो क्लोनिंग द्वारा इन प्रोटीनों को कृत्रिम रूप से संश्लेषित किया जा सकता है । इस प्रकार जीन – इंजीनियरिंग विधि से तैयार कुछ बैक्टीरिया फैक्ट्री की तरह कार्य करने लगते हैं और इनकी सहायता से बहुत कम लागत में अनेक औषधियाँ तैयार की जा सकती हैं ।
सन् 1982 में जैव – तकनीक द्वारा सर्वप्रथम इंसुलिन प्राप्त करने में सफलता मिली । इस प्रकार से संश्लेषित इंसुलिन को ‘हूमूलिन ‘ नाम दिया गया । कुछ व्यक्ति बौने होते हैं , इसका कारण उनमें एक विशिष्ट हॉर्मोन की कमी है , जिसको मानव – वृद्धि हॉर्मोन ( Human Growth , Hormone , HGH ) कहते हैं । यह शरीर में इतनी अल्प मात्रा में होता है कि इसको किसी बौने के इलाज के लिए पर्याप्त मात्रा में प्राप्त करना कठिन कार्य है परन्तु हाल ही में क्लोनिंग द्वारा इस हॉर्मोन को संश्लेषित करने में सफलता मिल गई है ।
प्रश्न 3. आनुवंशिकी इंजीनियरिंग का फसलों के विकास में क्या महत्त्व रहा है ?
उत्तर – इस तकनीक से किसी जीवधारी में ऐसे जीन को प्रविष्ट कराना संभव हो गया है , जो हमें नहीं पाया जाता । यह तीन प्रकार से किया जा सकता है-
( i ) एग्रोबैक्टीरिया टयूमिफेसियन्स ( Agrobacterium tumefaciens )- अन्य कोई उपयुक्त जीवाणु के प्लाज्पिड पर किसी विशेष लक्षण के जीन संलयन करा देते हैं । प्लाज्मिड को पुनः जीवाणु में डाल देते हैं । यह जीवाणु जब पौधे पर संक्रमण करता है , तो इन विशिष्ट जीनों को वह पौधे की कोशिकाओं में पहुँचा देता है । जिन कोशिकाओं में यह जीन होता है उन्हें ट्रांसजिनिक कोशिकाएं ( transgenic ) कहते हैं।
     ( ii ) दो कोशिकाओं के बीच में कुछ क्षणों के लिए उच्च ऊर्जा विभव कायम करते हैं , जिससे DNA जीवद्रव्यक के अन्दर पहुँच जाता है ।
    ( iii ) कोशिकाओं में सूक्ष्म क्षेपकों ( injectors ) की सहायता से वांछित DNA का अंतःक्षेपण ( injection ) दिया जा सकता है ।
   अब उत्तक को ऐसे माध्यम पर संवर्धित करते हैं , जिस पर केवल ट्रांसजेनिक कोशिकाएं ही वृद्धि कर सकती हैं ।
           
 प्रश्न 4. पारजीवी जंतुओं का उत्पादन क्यों किया जाता है ? इस तरह के परिवर्तन से मानव को क्या लाभ है ?
उत्तर – मानव के लिए पारजीवी जन्तु निम्न कारणों से महत्त्वपूर्ण हैं-
( क ) सामान्य शरीर क्रिया व विकास – पारजीवी जन्तुओं का निर्माण विशेषरूप से इस प्रकार किया जाता है जिनमें जीनों के नियंत्रण व इनका शरीर के विकास व सामान्य कार्यों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है । उदाहरणार्थ – विकास में भागीदार जटिल कारकों जर्स – इंसुलिन की तरह विकास कारक का अध्ययन । दूसरी जाति ( स्पीशज ) के जीस को प्रवेश कराने के उपरांत उपरोक्त कारकों के निर्माण में होने वाले परिवर्तनों से होने वाले जैविक प्रभाव का अध्ययन तथा कारकों की शरीर में जैविक भूमिका के बारे में सूचना मिलती है ।
( ख ) रोगों का अध्ययन – अनेकों पारजीवी जंतु इस प्रकार निर्मित किए जाते हैं जिनके रोग के विकास में जीन की भूमिका प्रमुख होती है । यह विशिष्ट रूप से निर्मित है जो मानव रोगों के लिए नमूने के रूप में प्रयोग किए जाते हैं ताकि रोगों के नए उपचारों का अध्ययन हो सके । वर्तमान समय में मानव रोगों जैसे – कैंसर , पुटीय रेशमयता ( सिस्टीक फाइब्रोसिस ) रूमेटवाएड संधिशोथ व एल्माइजर हेतु पारजीवी नमूने उपलब्ध हैं ।
( ग ) जैविक उत्पाद – कुछ मानव रोगों के उपचार के लिए औषधि की आवश्यकता होती है जो जैविक उत्पाद से बनी होती हैं । ऐसे उत्पादों को बनाना अक्सर बहुत महंगा होता है । पारजीवी जंतु जो उपयोगी जैविक उत्पाद का निर्माण करते हैं उनमें डीएनए के भाग ( जीनों ) को प्रवेश कराते हैं जो विशेष उत्पाद के निर्माण में भाग लेते हैं । उदाहरण – मानव प्रोटीन ( अल्फा -1 एंटीट्रिप्सीन ) का उपयोग इंफासीमा के निदान में होता है । ठीक उसी तरह का प्रयास फिनाइल कीटोनूरिया ( पीकेयू ) व पुटीय रेशमयता के निदान हेतु किया गया है । वर्ष 1977 में सर्वप्रथम पारजीवी गाय ‘ रोजी ‘ मानव प्रोटीन संपन्न दुग्ध ( 2.4 ग्राम प्रति लीटर ) प्राप्त किया गया । इस दूध में मानव अल्फा – लेक्टाएल्बुमिन मिलता है जो मानव शिशु हेतु अत्यधिक संतुलित पोषक तत्त्व है जो साधारण गाय के दूध में नहीं मिलता है ।
( घ ) रासायनिक सुरक्षा परीक्षण – यह आविष सुरक्षा परीक्षण कहलाता है । यह वही विधि है जो औषधि आविषालुता परीक्षण हेतु प्रयोग में लाई जाती है । पारजीवी जंतुओं में मिलने वाले कुछ जीन इसे आविषालु पदार्थों के प्रति अतिसंवेदनशील बनाते हैं । जबकि अपारजीवी जंतु में ऐसा नहीं है । पारजीवी जंतुओं को आविषालु पदार्थों के संपर्क में लाने के बाद पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है । उपरोक्त जंतुओं में आविषालुता परीक्षण करने से कम समय में परिणाम प्राप्त हो जाता है ।

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