9th hindi

class 9th hindi notes | पद

पद

class 9th hindi notes

वर्ग – 9

विषय – हिंदी

पाठ 3 – पद

पद
                                                       लेखक – गुरु गोविन्द सिंह
                   कवि – परिचय

गुरु गोविन्द सिंह का जन्म बिहार की राजधानी पटना में सन् 1666 ई . में हुआ था । पटना में ही माता गुजरी देवी ने उन्हें गुरुमुखी सिखाईं । इनका मूलनाम गोविंद राय था । 1699 ई . में आनंदपुर के केशवगढ़ नामक स्थान पर दयाराम , धर्मदास , मुहमचंद , साहिबचंद , हिम्मत इन पाँच सिखों को मृत्युंजयी बनाकर ‘ सिंह ‘ बनाया और गोविंद राय से गोविंद सिंह बने ।
गुरु गोविन्द सिंह सिक्खों के दसवें और अन्तिम गुरु थे । उनकी प्रतिभा शस्त्र से लेकर शास्त्र तक दिखलाई पड़ती है । वे औरंगजेब के समकालीन थे । औरंगजेब की कट्टर धार्मिकतावाद का उन्होंने पुरजोर विरोध किया । शक्ति संघटन के लिए हिमालय की शरण ली और वहीं पहाड़ियों में अपना निवास स्थान बनाया तथा 20 वर्ष तक ऐकान्तिक साधना की । इस एकान्तिक साधना के अनेक शुभ परिणाम निकले । उन्होंने फारसी और संस्कृत के ऐतिहासिक – पौराणिक ग्रन्थों का विशद अध्ययन कर लिया । हिन्दी कवियों द्वारा उन्होंने पंजाब में पहली बार वीर रस के काव्य का प्रणयन कराया और स्वयं काव्य की रचना की । काल के हिसाब से वे रीतिकाल के कवि ठहरते हैं । घुड़सवारी ; तीरंदाजी में असाधारण निपुणता प्राप्त की । आखेट विद्या में दक्षता प्राप्त की और कठोर जीवन व्यतीत करने का अभ्यास किया । अनंगपाल के पश्चात् गुरु गोविंद सिंह के समान कोई भी राजनीतिक नेता नहीं हुआ । गुरु गोविन्द सिंह ने भलीभांति समझ लिया कि हिन्दुओं में धर्म तो है किन्तु राजनीतिक जागरूकता और चेतना नहीं है और राष्ट्रीय एकीकरण में तत्कालीन जाति – व्यवस्था अधिक बाधक है ।
गुरु गोविन्द सिंह द्वारा ‘ खालसा पन्थ ‘ का निर्माण उनके जीवन की सर्वोपरि सफलता है । गुरु गोविन्द सिंहजी की वाणी में शान्त एवं वीर रस की प्रधानता है । परमात्मा की स्तुति में भक्ति ; ज्ञान और वैराग्य की मन्दाकिनी प्रवाहित हुई है । युद्धों के वर्णन में वीर रस प्रधान है । रौद्र और वीर रस उसके अंगीभूत हैं । इसमें यों तो सभी अलंकारों के उदाहरण मिल सकते हैं किन्तु उपमा , रूपक और दृष्टान्त का बाहुल्य है । गुरु गोविन्द सिंहजी की भाषा प्रधानतया व्रजभाषा है किन्तु बीच – बीच में अरबी – फारसी और संस्कृत शब्दों की भी प्रचुरता है । उनकी भाषा में सरिता का प्रवाह एवं निर्झर का कलकल निनाद है । उनकी समस्त वाणी परमात्मा की भक्ति तथा देशभक्ति की अलौकिक वर्णन में व्यक्त हुई है ।
              

कविता का सारांश

पद -1

गुरु गोविन्द सिंह ने अपने प्रथम – छंद के माध्यम से महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किया है । समाज के विभिन्न मतों के मानने वालों का वर्णन किया है । समाज में कोई मुंडिया संन्यासी है । कोई योगी है , ब्रह्मचारी है और कोई जात – पात को मानने वाला है । हिन्दू , मुसलमान , ईसाई और अन्य वर्ग के लोग हैं , परन्तु मानव की जाति सब एक है । वे कहते हैं कि जो काम करीम का है वही राजीक का और रहीम का है । दूसरा भेद – भाव कोई नहीं है । मनुष्यों को सारे भ्रमों को भुलाने का संदेश रचनाकार ने दिया है । महत्वपूर्ण बात यह कही है कि सेवा एक ही प्रकार की करनी चाहिए । सबके गुरु एक हैं । एक ही प्रकाश है और एक ही स्वरूप है । कवि ने प्रकारान्तर -से एकात्मकता का वर्णन किया है । एकेश्वरवादी मतों को अभिव्यक्त कर सामाजिक , मानवीय और राष्ट्रीय एकता की स्थापना पर भी बल प्रदान किया है । अध्यात्मवादी विचार अनूठे हैं । प्रथम पद में अनुप्रास , रूपक एवं अन्य अलंकारों की छटा है ।

पद -2

कवि गुरु गोविन्द सिंह ने अपने दूसरे पद के सहारे आध्यात्मिक तथ्य को काव्यात्मक सौन्दर्य प्रदान किया है । उनका कहना है कि एक आग के कण के सम्पर्क से विशाल आग की लपट उत्पन्न होती हैं । वस्तुओं को भस्म करती हैं । नाम अलग हो परन्तु जल कर अन्ततः उसी आग में मिलते हैं । एक धूल से अनेक धूलें बनती हैं और सारी वस्तुएँ धूल मिश्रित हो जाती हैं । कवि ने व्यावहारिक तर्क प्रदान किया है । उनका कहना है कि जलाशय इत्यादि में जल की तरंगें उठती है तो किनारे तक पहुंच कर अपना रूप समाप्त करती हैं । एक मरती है तो दूसरी जीवित होती है । विश्व में रूप एवं आकार विभिन्न हैं । अभूत ही भूत है और भूत ही अभूत है । आत्मा ही परमात्मा है और परमात्मा ही आत्मा है । कवि ने एक दार्शनिक तथ्य का स्पष्टीकरण देने का अनोखा कार्य किया है । मिट्टी जन्मदायिनी है । पुनः सारी चीजें मिट्टी में मिल जाती हैं यह पद दार्शनिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

कविता का भावार्थ

1. प्रथम पद में गुरु गोविंद सिंह कहते हैं कि कोई आदमी संन्यासी हो गया , कोई जोगी हुआ , कोई ब्रह्मचारी , कोई यति ( योगी ) को मानता देखकर भाग जाता है , कोई इमाम अर्थात् इस्लाम धर्म का पुरोहित बन जाता है , कोई शुद्ध करने । हिंदू , तुर्क , कोई जो अपने स्वामी को पीड़ित वाला । सभी मनुष्य की ही जाति है । सभी को एक ही जानता हैं । जो कृपा करनेवाला भगवान है वही राज करनेवाला , वही दया करने वाला है ।वह किसी एक – दूसरे में भेद नहीं करता है । एक ही सेवा करने योग्य है , वह गुरुदेव है । मैं उसे एक स्वरूप में जानता हूँ जिसकी ज्योति जलाई जा सके ।
2. जैसे एक कण चिंगारी से करोड़ों आग जल उठता है , वह निराला है , फिर वह उसी आग में मिल जाता है । जैसे एक धूल अनेक धूल का निर्माण करते हैं वैसे ही धूल के कण फिर उसी धूल में समा जाते हैं । जिस प्रकार एक नदी में करोड़ों तरंग उपजते हैं और फिर वही पानी के तरंग उसी पानी के कहे जाते हैं । वैसे ईश्वर जो भूत नहीं है वह प्रगट होकर जिससे उपजता है उसी में समा जाता है ।

कविता के साथ

प्रश्न 1. ईश्वर ने मनुष्य को सर्वोत्तम कृति के रूप में रचा है । कवि के अनुसार मनुष्य वस्तुतः एक ही ईश्वर की संतान है , उसे खेमों में बाँटना उचित नहीं है । इस क्रम में उन्होंने किन उदाहरणों का प्रयोग किया है ?

उत्तर कोऊ भयो मुंडिया संन्यासी , कोक जोगी भयो
             कोऊ ब्रह्मचारी कोक जतियन मानवो ।
             हिन्दू तुरक कोक राफजी इमाम साफी
             मानस की जात सबै एकै पहचानवो ।
कवि यहाँ मानव मात्र की एकता का पक्षधर है , उसे खेमों में बाँटना उचित नहीं है इसीलिए सभी को एक जाति का मानता है ।

प्रश्न 2. कवि ने मानवीय संवेदना को मनुष्यता के किस डोर से बाँधे रखने की बात कहीं है ?

उत्तर – इस संसार में सभी मनुष्य एक हैं बल्कि उनके नाम अलग – अलग हैं । सभी ने अपनी इच्छानुसार अपना धर्म , विचार , व्यवहार के कारण कोई योगी कहता है , कोई तुर्क कहता है , कोईहिंदू कहता है । कवि मानता है कि यह विभेद सिर्फ ऊपरी है । मनुष्य मात्र तो मनुष्य है । वह कहता है कि जिस ईश्वर की आराधना तुम अलग – अलग नामों से करते हो वह वस्तुतः एक ही है ।

प्रश्न 3. गुरु गोविन्द सिंह के इन भक्ति पदों के माध्यम से सामाजिक कलह और भेदभाव को कम किया जा सकता है । भक्ति पद से उदाहरण देकर समझाएँ ।

उत्तर –     हिन्दू तुरक कोऊ राफजी इमाम साफी
               मानस की जात सबै एकै पहचानवो ।
इन पंक्तियों से यह ध्वनित होता है कि कोई व्यक्ति चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान सभी मनुष्य ही है , अतः उन्हें खेमों में बाँटना उचित नहीं है । ये पंक्तियाँ हमारे सामाजिक विभेद , भेद – भाव को मिटाने का काम करते हैं ।

प्रश्न 4. भाव स्पष्ट करें :

( क )   ” तैसे विस्वरूप ते अभूत भूत प्रगट होई ,
             ताही ते उपज सबे ताही में समाहिंगे ।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ गुरु गोविंद सिंह के पद से उद्धृत हैं । इन पंक्तियों में गुरुगोविन्द सिंह ने उस ईश्वर को , परमात्मा को विश्वरूप में पहचान की है । वे मानते हैं कि वह अजर – अमर व्यापक और बहुरूपी है । इसी विश्वरूपी परमात्मा से सबकुछ उत्पन्न हुआ है और इसी से लाभ होगा ।

(ख).        ” एक ही सेव सबही को गुरुदेव एक एक
                  ही स्वरूप ; एकै जोत जानबो । ‘
उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ गुरु गोविंद सिंह के ‘ पद ‘ कोऊ भयो मुडिया संन्यासी से उद्धृत हैं । कवि ने यह कहना चाहा है कि एक वही सेवा करने लायक है जो सबका गुरुदेव है । उसका स्वरूप एक ही है , उसकी जाति भी एक ही है । यह संसार उसकी ही ज्योति से प्रकाशित होती है । इन पंक्तियों में तमाम भेदों के पीछे मनुष्य की अंतर्वी एकता की प्रतिष्ठा की गई है । समाज में ऊपरी विभेदों के भीतर आंतरिक एकता की अनुमति तक इस पद की व्याप्ति है । कवि मानवमात्र की एकता का पक्षधर है । वह एकत्वपूर्ण आत्मबोध के कारण ईश्वर की एकता गुरु स्वरूप और ज्योति की एकता की प्रतिष्ठा करता है ।

भाषा की  बात

प्रश्न 1. पयार्यवाची शब्द लिखें ।

उत्तर – आग -अग्नि , पावक , अनल , दहन , कृशानु हुताशन , धूम्रकेतु , हव्यवाहन , वह्नि ।
संन्यासी- संत , साधु , योगी , यति ।
गुरु- शिक्षक ।

प्रश्न 2. निम्नलिखित शब्दों के विपरीतार्थक लिखें ।

उत्तर – एक -अनेक
आग -पानी
भूत -भविष्य
प्रकट -अंतर्धान ।
प्रश्न 3. संन्यासी का संधि विच्छेद करें ।
उत्तर – सम् + न्यासी ।

प्रश्न 4. दोनों पदों का आज की हिंदी में रूपांतरण कीजिए ।

उत्तर – कविता का सामान्य अर्थ वाला अंश देखें ।

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