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9th class hindi notes | कड़बक

कड़बक

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9th class hindi notes

वर्ग – 9

विषय – हिंदी

पाठ 2 – कड़बक

कड़बक
                               –मंझन
                 कवि – परिचय

मंझन हिन्दी के एक प्रसिद्ध सूफी कवि थे । इनके जीवन के संबंध में बहुत ही कम जानकारी प्राप्त है । अनुमानतः इनका जन्म सोलहवीं सदी के आरंभ में हुआ था । इनका पूरा नाम गुफतार मियां ‘ मंझन ‘ था । इनका मूल निवास अनूपगढ़ था ।
सूफी कवि ‘ मंझन ‘ के यश का एक पात्र आधार उनकी रचित मधुमालती है । कवि के जीवन – काल के विषय में विद्वानों में मतभेद है परन्तु रचना – काल के हिसाब से वे शेरशाह के उत्तराधिकारी सलीमशाह के समय मौजूद थे जो 1545 ई . में गद्दी पर बैठा था । कवि ने सन् 1545 ई . में ‘ मधुमालती ‘ की रचना की । सूफियों से प्रभावित होने के कारण कवि ‘ मंझन ‘ ने अपनी कृति में सूफियों की प्रेम – पद्धति का अनुकरण किया है । प्रेम के द्वारा ही परमात्मा को पाया जा सकता है । इस अवधारणा को ध्यान में रखकर ही ‘ मंझन ‘ ने मधुमालती में प्रेम वर्णन किया है । कवि ने मधुमालती में नायक – नायिका के प्रथम दर्शनजन्य प्रेम के साथ पूर्व जन्म के प्रणय – संस्कारों की महत्ता दिखलाई है । नायक के प्रेम की गम्भीरता एवं एकोन्मुखता का परिचय इस बात से मिलता है कि वह एक और मधुमालती की प्राप्ति के लिए भांति – भांति के कष्टों को सहन कर लेता है तथा दूसरी ओर महासुन्दरी प्रेमा के प्रणय – प्रस्ताव को ठुकरा देता है । सामान्यतः हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्यों में नायक को बहुपलीवादी दिखाया गया है , किन्तु यह प्रेमाख्यान इसका अपवाद है । अन्य प्रेमाख्यानक काव्यों की तुलना में कवि की कल्पना क्षितिज के तारों के समान झिलमिल दिखाई पड़ती है । इसका कारण है कथा के निर्वाह में अकुशलता । कथा में बारहमासे का औचित्य न होने पर भी इसका निर्वाह किया गया है । कवि धरातल पर कम कल्पना – लोक में अधिक विचरण करता दिखलाई पड़ता है । परन्तु इससे प्रेम का आदर्श कहीं उद्वेलित नहीं होता है । नायक को अप्सराएँ उड़ाकर मधुमालती की चित्रसारी में रख आती हैं और वहीं नायक नायिका को देखता है । कवि प्रेम की अखंडता दिखाकर प्रेमतत्व की व्यापकता और नित्यता का आभास दिलाता है । सूफियों के अनुसार यह सारा जगत एक ऐसे रहस्यमय प्रेमसूत्र से बँधा है जिसका अवलंबन करके जीवन उस प्रेममूर्ति तक पहुँचने का मार्ग पा सकता है और यह मार्ग प्रेम की विरहावस्था है । ईश्वर का विरह सूफियों के यहाँ प्रधान सम्पत्ति है जिसके बिना साधना के मार्ग में कोई प्रवृत्त नहीं हो सकता । कवि की विशेषता इस बात में है कि कवि ने कथा को सुखान्त बनाया है । साधारणतः हिन्दी के सूफी कवियों ने अपनी कहानी को दुःखान्त बनाया है लेकिन ‘ मंझन ‘ ने अपनी कहानी का अन्त नायक – नायिका के सुखद् मिलन से किया है । कुल मिलाकर मधुमालती में कवि ने अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा और अपने आध्यात्मिक ज्ञान का बहुत सुन्दर परिचय दिया है ।
कविता का भावार्थ

1. इस सार में प्रेम अमूल्य , अनमोल अंगूठी के नगीने के समान है । यह प्रेम जिसे हो गया वह धन्य हो गया । प्रेम के ही कारण संसार है । प्रेम की गहराई में जाकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है । प्रेम के प्रकारा से सारी दृष्टि प्रकाशित हो उठती है । प्रेम के इस संसार में कोई जोड़ नहीं है । वे विरल होते हैं जिन्हें यह प्रेम होता है । इस प्रेम को पाना बड़े सौभाग्य की बात है । चारो युग में यह शब्द बड़ी ऊंची स्वर में सुनाई दिया । जो इस रास्ते में अपना मन लगा दिया वह राजा हो गया । प्रेम चारों दिशाओं का बाजार है जो व्यापारी इसे प्राप्त करना चाहता है कर इसे अमित न करे ।
2. इस संसार में कोई अमर नहीं है । मारने से उसे मृत्यु भी मार नहीं पाती है । प्रेम के आग में जो सही से तपा वह संसार में काल से भी बच गया । प्रेम के शरण में जो जीव चला गया वह अपने आप उबर गया । वह किसी के मारने से कैसे मरेगा क्योंकि प्रेम अमर है । एक वार जो प्रेम को पा लेता है उसके नजदीक काल भी नहीं आते हैं । प्रेम के कारण जिसकी मृत्यु हुई उसके लिए मृत्यु का फल अमृत हो गया । निश्चय ही वह शरीर अमर हो गया । जो जीव काल को इस संसार में जानता है , नियम से प्रेम के शरण में जाता है । फिर दोनों संसार और काल सभी से प्रेम हो जाता है ।

कविता के साथ

प्रश्न 1. कवि ने प्रेम को संसार में अंगूठी के नगीने के समान अमूल्य माना है । इस पंक्ति को ध्यान में रखते हुए कवि के अनुसार प्रेम के स्वरूप का वर्णन करें ।
उत्तर – कवि का मानना है कि प्रेम इस संसार में अमूल्य , अनमोल अंगूठी के नगीने के समान है । अर्थात् अंगूठी का नगीना जितना अमूल्य , अनमोल हो सकता है , जितना वह कष्ट से मिलता है उतना ही अनमोल प्रेम होता है । यह प्रेम जिस व्यक्ति को हो जाता है इस संसार में आकर उसका जन्म लेना धन्य हो जाता है । यह संसार भी उसी प्रेम के कारण है । यह दुनिया कार्य – कारण संबंध पर आधारित है । प्रेम की गहराई में जाकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है । प्रेम के प्रकाश से ही सारी सृष्टि प्रकाशित हो उठती है ।

प्रश्न 2. कवि ने सच्चे प्रेम की क्या कसौटी बताई है ?
उत्तर – कवि ने सच्चे प्रेम के लिए अपनी सहदयता का परिचय देते हुए ‘ उदारता ‘ को केन्द्र में रखा है । इस संसार में प्रेम अद्वितीय है । अत : इस प्रेम को पाने के लिए व्यक्ति को ‘ प्रेम पंथ सिर देई सो राजा ‘ प्रेम में सब तरह से तन – मन – धन लगा देने को कहा है । यदि व्यक्ति प्रेम में सिर दे देता है तो वह राजा हो जाता है । प्रेम इस संसार में अनमोल है । प्रेम की गहराई में जाकर ईश्वर को पाया जा सकता है । कवि ने कहा है कि वे विरल होते हैं जो प्रेम में अपना जीवन देते हैं । प्रेम के कारण ही यश संसार है , अतः सबसे प्रेम करो ।

प्रश्न 3. ‘ प्रेम गहा विधि परगट आवा ‘ से कवि ने मनुष्य की किस प्रवृत्ति की ओर संकेत किया है ?
उत्तर – तल्लीनता की प्रवृत्ति , उसमें खो जाने की प्रवृत्ति । आज मनुष्य ईश्वर को इधर – उधर खोजता – फिरता है लेकिन कवि का मानना है कि जिस मनुष्य ने प्रेम को गहराई से जान लिया , उसमें तल्लीन होकर पाने की कोशिश की स्वयं ईश्वर वहाँ प्रकट हो जाते हैं । मनुष्य यदि ईश्वर को पाना चाहता है तो उसे प्रेम की गहराई में जाना होगा ।

प्रश्न 4. आज मनुष्य ईश्वर को इधर – उधर खोजता फिरता है लेकिन कवि ” मंझन ‘ का मानना है कि जिस मनुष्य भी प्रेम को गहराई से जान लिया स्वयं ईश्वर वहाँ प्रकट हो जाते हैं । यह भाव किन पंक्तियों से व्यंजित होता है ।

उत्तर – प्रेम लागि संसार उपावा । प्रेम गहा विधि प्रगट आवा ।

प्रश्न 5 , कवि की मान्यता है कि प्रेम के पथ पर जिसने भी अपना सिर दे दिया वह राजा हो गया । यहाँ ‘ सिर देना ‘ का अर्थ स्पष्ट करें |
उत्तर– तल्लीन होना । जीवन का सबकुछ प्रेम में ही विसर्जित कर देना । कवि ने प्रेम को अंगूठी के अनमोल नगीने के समान माना है । साथ ही यह कहा है कि प्रेम की गहराई में जाकर ईश्वर को पाया जा सकता है । यह प्रेम नाम शब्द चारों युग में ऊँचे शोर से ध्वनित हो रहा है । वे विरले हैं जो प्रेम में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं और अपना सिर दे दिया ।

प्रश्न 6. प्रेम से व्यक्ति के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ? पठित पदों के आधार पर तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए ।
उत्तर – प्रेम से व्यक्ति के जीवन पर अनेक प्रभाव पड़ता है । जो व्यक्ति इस संसार में एक – दूसरे से प्रेम करते हैं वे एक सहृदय समाज , सुखद वातावरण का निर्माण करते हैं । इससे सारा जगत धन्य हो जाता है । कवि का मानना है कि संसार प्रेम के कारण ही है और प्रेम विश्वास की डोर पर टिकी होती है । प्रेम से ही ईश्वर को पाया जा सकता है ।

प्रश्न 7. सप्रसंग व्याख्या करें :
प्रेम हाट चहुँ दिसि हैं पसरीगै बनिजौ जे लोइ
        लाहा औ फल गाहक जनि डहकावै कोई ॥
उत्तर – प्रस्तुत पक्तियाँ मध्यकालीन कवि ‘ मंझन ‘ के कड़बक से ली गई हैं । इन पंक्तियों के माध्यम से कवि प्रेम की उच्चभूमि , उसके आदर्शों को वकालत करते हुए कहता है कि प्रेम चारों दिशाओं का बाजार है , जो व्यापारी इस पाना चाहते हैं वे फल की चिंता न करते हुए इसे पा लें । और दूसरों को भ्रमित न करें । आशय यह है कि प्रेम इस जीवन का सारतत्व है । प्रेम अद्वितीय है । यह अनमोल है और अनमोल वस्तु बड़ी कठिनाई एवं लगन से प्राप्त होती है । अतः जो व्यक्ति इसे पाना चाहते हैं उसे पाने की कोशिश करें परन्तु दूसरों को भ्रमित न करें ।

प्रश्न 8. भाव सौंदर्य स्पष्ट करें :

( क ) एक बार जो मरि जीउ पावै । काल बहुरि तेहि नियर आवै ।
उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘ मंझन ‘ रचित ‘ मधुमालती ‘ से उद्धृत कड़बक पाठ से ली गयी हैं । इस कड़बक के माध्यम से कवि कहना चाहता है कि जो व्यक्ति एक बार प्रेम के कारण मृत्यु पाया वह अमर हो गया । उसके नजदीक काल भी नहीं आ पाते हैं । अर्थात् प्रेम में इतनी शक्ति है कि वह जीवन को अमर बना देता है । व्यक्ति यश पाने का भागी बनता है । जो व्यक्ति प्रेम के शरण में आते हैं वे स्वयं अपने आप उबर जाते हैं । प्रेम किसी के मारने से नहीं मरता । वह इस संसार में अमर है । इसी के सहारे कई लोग अमर हुए हैं ।

( ख ) मिरितुक फल अंबित होई गया । निहचै अमर ताहि के कया ।
उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ मंझन रचित ‘ मधुमालती ‘ से उद्धृत हैं । कवि कहना चाहता है कि प्रेम के कारण जिसने मृत्यु को प्राप्त किया उसके लिए मृत्यु का फल अमृत के समान हो गया । निश्चय ही उसकी काया ( शरीर ) अमर हो गया । प्रेम में सर्वस्व समर्पण से व्यक्ति के निजी जीवन में आत्मिक सुन्दरता आ जाती है । अत : व्यक्ति प्रेम के शरण में जाकर स्वयं उबर जाता है । उसके नजदीक काल भी नहीं पहुंच पाते हैं । जो जीव इस काल संसार को जानता है वह प्रेम के शरण में जाकर अपना जीवन धन्य करता है ।

प्रश्न 9. प्रेम में सर्वस्व समर्पण से व्यक्ति के निजी जीवन में आत्मिक सुंदरता आ जाती है , वह परिपक्वता कवि के विचारों में किस प्रकार आती है ? स्पष्ट करें ।

उत्तर – यह परिपक्वता कवि के इन विचारों से आती है जिसमें कवि ने कहा है कि ‘ मिरितु का फल अबित होइ गया । निहचै अमर ताहि के कया । ‘ अर्थात् जिस व्यक्ति ने प्रेम में अपना सर्वस्व न्योछावर किया उसके लिए मृत्यु अमृत के समान हो गया , उसकी काया अमर हो गई । व्यक्ति इस संसार में यश पाने के ख्याल से ही अच्छे – बुरे कर्म करता है । यदि प्रेम वह मार्ग है जिसके सहारे ईश्वर को , अमरता को पाया जा सकता है तो व्यक्ति को प्रेम करना चाहिए । यदि इस प्रेम के कारण सर्वस्व न्योछावर भी करना पड़े तो वह जायज है । कवि की यही दृष्टि है ।

प्रश्न 10. प्रेम के शरण में जाने पर जीव की क्या स्थिति होती है ?

उत्तर – प्रेम के शरण में जाने पर जीव की काया निश्चित रूप से अमर हो जाती है । वह काल – समय , देश – संसार , सामाजिक मोह माया से उठकर अमरता को प्राप्त कर लेता है । प्रेम में सर्वस्व समर्पण से व्यक्ति के निजी जीवन में आत्मिक सुंदरता आ जाती है । यही नहीं व्यक्ति प्रेम के शरण में जाकर हर कष्टों से अपने आप स्वयं उबर जाता है । उसके नजदीक काल भी नहीं आ पाते ।

भाषा की बात

प्रश्न 1. निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखें ।

उत्तर – संसार -जगत , भुवन , विश्व
सिर -मस्तक
हाट- बाजार
पथ- रास्ता , राह
प्रेम -प्यार ।

प्रश्न 2. निम्नलिखित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द लिखें ।

उत्तर – ऊँच -नीच
अमृत -विष
प्रगट -अंतर्धान
प्रेम- वैर
सिर -पैर ।

प्रश्न 3. निम्नलिखित शब्दों के मानक रूप लिखें ।

उत्तर – सबद- शब्द
मिरितु- मृत्यु
पेम -प्रेम
सिस्टि -सृष्टि
दोसर -दूसरा
गाहक -ग्राहक
अंब्रित-  अमृत ||

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