9TH SST

class 9 economics book – कृषक मजदूर

कृषक मजदूर

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class 9 economics book

class – 9

subject – economics

lesson 6 – कृषक मजदूर

कृषक मजदूर
इकाई की मुख्य बातें-भारत की कुल आबादी का 64 प्रतिशत जनता कृषि क्षेत्र में लगी हुई है। इनमें से 75% आबादी कृषक मजदूर के रूप में हैं। ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारण कृषक मजदूर की आर्थिक दशा काफी दयनीय है।
कृषक मजदूर से हमारा मतलब गाँव में काम करने वाले उन लोगों से है जो कृषि के कार्य में मजदूर के रूप में काम करते हैं। 1950-51 की प्रथम कृषिश्रम जाँच समिति के अनुसार कृषि श्रमिक वे लोग है जो कृषि कार्य में लगे हैं और जो वर्ष में जितने दिन काम करते हैं उसका आधा
या आधे से अधिक भाग मजदूरी पर करते हैं। अतः वर्ष के आधे या उससे अधिक भाग तक मजदूरी के आधार पर जो व्यक्ति कृषि कार्य में लगे हों, उन्हें कृषि श्रमिक कहा गया है।
सामान्यतः कृषक मजदूर को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है-
1. खेत में काम करने वाले मजदूर-जैसे हलवाहे फसल काटने वाले आदि इन्हें पूर्ण रूप से कृषक मजदूर कहा जा सकता है जिसने अपने काम के क्रम में कुछ कुशलता प्राप्त कर ली है।
2. कृषि से सम्बद्ध अन्य कार्य करनेवाले मजदूर-जैसे कुआँ खोदने वाले, गाड़ीवान आदि। इन्हें अर्द्ध कुशल मजदूर कहा जाता है।
3. वैसे मजदूर जो कृषि के अलावे अन्य सहायक उद्योगों में लगे हुए हैं-जैसे बढ़ई, लोहार आदि। इन्हें ग्रामीण कलाकार भी कहा जा सकता है।
राष्ट्रीय श्रम आयोग ने कृषक मजदूर को दो भागों में बाँटा है-
1. भूमिहीन श्रमिक-ये ऐसे श्रमिक हैं जिनके पास खेती करने के लिए अपनी कोई भूमि नहीं होती।
2. बहुत छोटा किसान-ये ऐसे श्रमिक हैं जिनके पास बहुत थोड़ी मात्रा में अपनी भूमि होती है। अतः ये अपना अधिकांश समय श्रमिकों के रूप में व्यतीत करते हैं।

बिहार में कृषक मजदूरों की निम्नलिखित समस्याएँ हैं-
1. कम मजदूरी-बिहार में कृषक मजदूरों की मजदूरी बहुत ही कम दी जाती है। उनके पास चूँकि कोई वैकल्पिक साधन नहीं है। इसलिए वे कम मजदूरी पर भी काम करने
को मजबूर हैं।
2. मौसमी रोजगार-बिहार में कृषक मजदूरों को साल में सिर्फ 4 महीने काम मिल पाता है इसलिए वे इसके आसानी से शिकार हो जाते हैं।
मजबूर है।
3. काम के अधिक घंटे-बिहार में कृषक मजदूरों की एक बड़ी समस्या यह है कि उनके काम के घंटे निश्चित नहीं है।
4. ऋणग्रस्तता-बिहार में कृषक मजदूरों की मजदूरी कम होने के कारण वे सदा ही ऋणग्रस्त रहते हैं। इसके चलते उन्हें महाजन या बड़े किसान की बेकारी करनी पड़ती है।
5. निम्न जीवन स्तर-कृषक मजदूरों का जीवन स्तर काफी निम्न है। उनकी मजदूरी कम होने से ये रोटी, कपड़ा और मकान की न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते हैं।
6. आवास की समस्या-बिहार में कृषक मजदूरों को मालिक या ग्राम समाज की भूमि पर उनकी अनुमति से एक झोपड़ी बनाकर रहते हैं जो बिल्कुल ही आवास के लायक नहीं होती है।
7. बंधुआ मजदूर-ऐसे कृषक मजदूर किसी ऋण के चलते मालिक के यहाँ आजन्म या ऋण चुकता होने तक भोजन के बदले काम करते हैं। उनके काम में परिवार के अन्य सदस्य भी हाथ बँटाते रहते हैं जिन्हें कुछ मजदूरी दे दिया जाता है (ऐसे मजदूर बंधुआ मजदूर कहलाते हैं।
8. सहायक धंधों का अभाव-यदि गाँव में फसल बर्बाद हो जाते हैं तो कृषक मजदूर को जीवन-निर्वाह का अन्य कोई साधन नहीं मिल पाता जिसके चलते वे कर्ज में दिन-प्रतिदिन और ज्यादा डूबते चले जाते हैं।
9. संगठन का अभाव-बिहार में कृषक मजदूरों के संगठन के अभाव में मेलजोल करने की क्षमता नहीं होती है। इसके चलते वे अपनी मजदूरी बढ़वाने, कार्य के घंटे नियमित करने, बेगारी बंद कराने की आवाज तक उठा नहीं पाते।
10. कृषि में मशीनीकरण से बेकारी-बिहार में कृषि में मशीनों के प्रयोग के चलते कृषक मजदूरों में बेकारी बढ़ती जा रही है। यह एक गंभीर समस्या है।
11. निम्न सामाजिक स्तर-बिहार में अधिकांश कृषक मजदूर अनुसूचित जाति एवं पिछड़ी जातियों के हैं जिनका सदियों से शोषण होता आ रहा है। इससे इनका सामाजिक स्तर निम्न कोटि का बना हुआ रहता है।

बिहार कृषक मजदूरों का पलायन
बिहार में कृषक मजदूरों के सामने गरीबी, बेरोजगारी तथा भूखमरी की समस्याएँ उत्पन्न होती है जिसके कारण वे हीनभावना से ग्रसित हो जाते हैं। इन सब कारणों से वे रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर जाते हैं। ‘पलायन’ का अर्थ होता है रोजगार की तलाश में
एक जगह से दूसरे जगह जाना। इधर बिहार के अधिकतर कृषक मजदूर पंजाब, हरियाणा, असम, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि की ओर पलायन कर रहे हैं।

कृषक मजदूरों की समस्या का निदान
बिहार में कृषक मजदूरों की समस्या का निदान निम्न रूप से किया जा सकता है-
1. कृषि पर आश्रित उद्योगों का विकास-बिहार में कृषक मजदूरों की समस्याओं को हल करने के लिए कृषि पर आधारित उद्योगों का विकास किया जाना चाहिए ताकि कृषक मजदूर खाली समय में इनमें काम करके अपनी आय में वृद्धि कर जीवन स्तर को सुधार सके।
2. लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास-ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि उद्योगों के साथ-साथ लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास भी किया जाना चाहिए जिससे कि भूमिहीन श्रमिक इसमें खप सकें।
3. न्यूनतम मजदूरी नियमों का उचित क्रियान्वयन-बिहार में भी भारत के अन्य राज्यों की तरह न्यूनतम मजदूरी के नियमों का उचित ढंग से पालन किया जाना चाहिए।
4. कार्य के घंटे को निश्चित करना-कृषक मजदूरों के कार्य के घंटे निश्चित किये जाने चाहिए। यदि मालिक इस निर्धारित घंटों से अधिक काम लेता है तो उन्हें अतिरिक्त मजदूरी देने की व्यवस्था होनी चाहिए।
5. कार्य दशाओं में सुधार-कृषक मजदूरों के कार्य दशाओं में सुधार कर उसको समय-समय पर छुट्टियाँ मिलनी चाहिए और यदि कार्य दिवस पर कोई दुर्घटना हो जाए तो
श्रमिकों को उचित सहायता एवं मुआवजा दी जानी चाहिए।
6. मकानों का निर्माण-कृषक मजदूरों को रहने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में मकानों का निर्माण कर उनको उपलब्ध करा देना चाहिए।
7. कृषि श्रम कल्याण केन्द्रों की स्थापना-गाँवों में प्रखण्ड स्तर पर कृषि श्रम कल्याण केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए जिससे कि मजदूर अपनी चोट तथा बीमारी आदि का इलाज करा सकें।
8. ग्रामीण रोजगार केन्द्रों की स्थापना-ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए ताकि रोजगार संबंधी सूचनाएँ कृषक मजदूरों को मिल सके और वे शहरी क्षेत्रों में जाकर रोजगार प्राप्त कर सकें।
9. कृषि मजदूरों के लिए भूमि की व्यवस्था-भूमि व्यवस्था में सुधारकर अतिरिक्त भूमि को कृषि मजदूरों को दिलाने का प्रयास किया जाना चाहिए। साथ ही बंजर भूमि या खाली भूमि को भी उचित प्रकार से खेती योग्य बनाकर इनमें बाँटी जानी चाहिए।
10. कृषि मजदूरों के लिए उचित संगठन की व्यवस्था-इनके लिए संगठन की व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे कि मजदूरों का शोषण बन्द हो सके।
11. सहकारी संस्थाओं की स्थापना-ऐसे सहकारी संस्थाओं की स्थापना की जानी चाहिए जो मजदूरों को ऋण सुविधाएँ दे सके और ऋण की वापसी किश्तों में ले सके। इसके लिए ब्याज दर भी कम होनी चाहिए।
12. शिक्षा का प्रसार-कृषक मजदूरों में शिक्षा का व्यापक प्रचार एवं प्रसार से उनकी समस्याओं को हल करने में योगदान दे सकता है।
13. भूदान-आचार्य बिनोवा भावे ने भूमिहीन कृषक मजदूरों की समस्याओं को सुलझाने के उद्देश्य से एक आंदोलन चलाया, जिसे भू-दान कहते हैं। उन्होंने बड़े-बड़े भूमिपति से अतिरिक्त भूमि माँगकर भूमिहीन मजदूरों को देने के लिए एक आंदोलन चलाया था। इससे कृषक मजदूरों में आत्मविश्वास तथा साहस बढ़ा है।
कृषक मजदूरों की समस्या को सुलझाने का सरकारी प्रयास निम्नलिखित हैं-
(i) न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948) कृषि पर भी लागू कर दिया गया है।
(ii) भूमिहीन मजदूरों को मकान बनाने के लिए मुफ्त प्लॉट (जगह) उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पंचवर्षीय योजनाओं में व्यवस्था की गयी है।
(iii) जमींदारी प्रथा समाप्त करने के चलते बहुत सी भूमि अतिरिक्त बची थी। जिसको इन भूमिहीनों में बाँट दिया गया है।
(iv) 1976 में आपातकाल के दौरान अधिनियम बनाकर बंधुआ मजदूर प्रथा को समाप्त कर दिया।
(v) जोत की सीलिंग (उच्चतम निर्धारित सीमा) से बची हुई भूमि, बंजर भूमि को कृषक मजदूरों के बीच वितरित किया जा रहा है।
(vi) कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास करने के उद्देश्य से ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार ने कई ग्रामीण औद्योगिक बस्तियाँ स्थापित की है।
(vii) केन्द्रीय सरकार ने कृषक मजदूरों के लिए स्थायी समिति की नियुक्ति की है।
(viii) भूमिहीन मजदूरों को पुराने ऋणों से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से भिन्न-भिन्न राज्यों ने कानून बनाये है।
(ix) बाल श्रमिक निरोधन अधिनियम के कारण कृषक मजदूरों के बच्चों के शोषण को कानूनी अपराध घोषित किया गया है।
(x) सरकार ने ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम शुरू की है। जिसका उद्देश्य ग्रामीण भूमिहीनों के लिए रोजगार के अवसरों में सुधार तथा वृद्धि करना है।

प्रश्न और उत्तर
I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1.सही उत्तर का संकेताक्षर (क, ख, ग, घ) लिखें।
2001 में बिहार में कृषक मजदूरों की संख्या थी-
(क) 48%
(ख) 42%
(ग) 52%
(घ) 26.5%
उत्तर-(क)

2.1991 में बिहार में कृषक मजदूरों की संख्या थी-
(क) 26.1%
(ख) 37.1%
(ग) 26.5%
(घ) 37.8%
उत्तर-(ख)

3. बिहार के कृषक मजदूर हैं-
(क) अशिक्षित
(ख) शिक्षित
(ग) ज्ञानी
(घ) कुशल
उत्तर-(क)

4.सामान्यतः कृषक मजदूर को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-
(क) तीन
(ख) दो
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर-(क)

5. ऐसे मजदूर जिनके पास खेती करने के लिए अपनी कोई भूमि नहीं होती है उन्हें कहते हैं-
(क) छोटा किसान
(ख) बड़ा किसान
(ग) भूमिहीन मजदूर
(घ) जमींदार
उत्तर-(ग)

II.रिक्त स्थानों की पूर्ति करें :
1.जो मजदूर कृषि का कार्य करते हैं. उन्हें हम ………
मजदूर कहते हैं।
2. क्वेसने ने कहा था कि दरिद्र कृषि, दरिद्र राजा, दरिद्र…………..
3.बिहार में अधिकांश कृषक मजदूर…………. एवं पिछड़ी जातियों के हैं।
4.बिहार में अब कृषि कार्यों में………… का प्रयोग होने लगा है।
5.. बिहार के कृषक मजदूर रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर………..कर रहे हैं।
उत्तर-1. कृषक, 2. देश, 3. अनुसूचित जाति, 4. मशीन, 5. पलायन।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न
(उत्तर 20 शब्दों में दें)
प्रश्न 1. कृषक मजदूर से हमारा क्या मतलब है ?
उत्तर-प्रथम कृषि जाँच समिति के अनुसार-“कृषि श्रमिक वे लोग हैं, जो कृषि कार्य में लगे हैं और जो वर्ष भर में जितने दिन काम करते हैं, उसका आधा या आधे से अधिक भाग
मजदूरी पर करते हैं। अतः वर्ष के आधे या उससे अधिक भाग तक मजदूरी के आधार पर जो व्यक्ति कृषि कार्य में लगे हों, उन्हें कृषक मजदूर कहा जाएगा।’

प्रश्न 2. कृषक मजदूर को कितने भागों में बाँटा जा सकता है ?
उत्तर-सामान्यतः कृषक मजदूर को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है-
(i) खेत में काम करने वाले मजदूर।
(ii) कृषि से संबंध अन्य कार्य करने वाले मजदूर।
(ii) वैसे मजदूर जो कृषि के अलावे अन्य सहायक उद्योगों में भी लगे

प्रश्न 3. भूमिहीन मजदूर किसे कहेंगे ?
उत्तर-भूमिहीन मजदूर ऐसे श्रमिक हैं जिनके पास खेती करने के लिए अपनी कोई भूमि नहीं होती है। उनकी आजीविका का प्रमुख साधन मजदूरी ही होती है।

प्रश्न 4. बंधुआ मजदूर की परिभाषा दें।
उत्तर-ऐसे कृषक मजदूर जो किसी ऋण के चलते मालिक के यहाँ आजन्म या ऋण चुकता होने तक भोजन के बदले काम करते हैं। उनके काम में परिवार के अन्य सदस्य भी हाथ बँटाते रहते हैं जिन्हें कुछ मजदूरी दे दिया जाता है ऐसे मजदूर बंधुआ मजदूर कहलाते हैं।

प्रश्न 5. पलायन का अर्थ बतावें।
उत्तर-पलायन का अर्थ होता है रोजगार की तलाश में एक जगह से दूसरे जगह पर जाना। यह गरीबी, बेरोजगारी तथा भूखमरी के कारण उत्पन्न होती है। इधर बिहार के कृषक मजदूर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मुंबई आदि की ओर पलायन कर रहे हैं।

प्रश्न 6. भूदान आंदोलन पर प्रकाश डालें।
उत्तर-आचार्य विनोवा भावे ने भूमिहीन कृषक मजदूरों की समस्याओं को सुलझाने के उद्देश्य से एक आंदोलन चलाया जिसे भूदान कहते हैं। उन्होंने बड़े-बड़े भूमिपति से अतिरिक्त भूमि माँगकर भूमिहीन मजदूरों को देने के लिए एक आंदोलन चलाया था। ऐसे इस योजना में बहुतों ने
अपनी जमीन दी, जिसका कोई उपयोग नहीं हो सकता पर इससे मजदूरों में आत्मविश्वास तथा साहस बढ़ा है।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
(उत्तर 100 शब्दों में दें)
प्रश्न 1. बिहार में कृषक मजदूरों की वर्तमान दशा एवं समस्याओं का उल्लेख करें।
उत्तर-बिहार में कृषक मजदूरों की वर्तमान दशा बहुत ही दयनीय है। उन्हें रोजगार की तलाश में पलायन, दूसरे राज्यों में करना पड़ता है। पलायन के समय उन्हें विभिन्न प्रकार की पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को झेलना पड़ता है। कई स्थानों पर इनकी दशा
गुलामों जैसी है। बिहार के कृषक मजदूर काफी गरीब हैं। इनका सारा जीवन बेकारी, शोषण, उत्पीड़न तथा अनिश्चिता से भरा हुआ है।
कृषक मजदूरों की निम्नलिखित प्रमुख समस्याएँ हैं-

1. कम मजदूरी-बिहार में कृषक मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या कम मजदूरी की है। उनके पास चूँकि कोई वैकल्पिक साधन नहीं हैं। इसलिए वे कम मजदूरी पर भी काम करने को मजबूर है।
2. मौसमी रोजगार-बिहार में इनको पूरे वर्ष काम न मिलकर केवल कुछ समय के लिए किसी खास मौसम में ही काम मिल पाता जो कि एक समस्या है।
3. काम के अधिक घंटे-बिहार में कृषक मजदूरों की एक बड़ी समस्या यह है कि उनके कार्य के घंटे निश्चित नहीं हैं। जिससे उनके श्रम का उचित कीमत नहीं मिल पाता है।
4. ऋणग्रस्तता-बिहार में कृषक मजदूरों की मजदूरी कम होने के कारण वे सदा ही ऋणग्रस्त होते हैं। इसके चलते उन्हें महाजन या बड़े किसानों की बेगारी करनी पड़ती है।
5. निम्न जीवन स्तर-कृषक मजदूरों का जीवन स्तर काफी निम्न है। उनकी मजदूरी कम होने से ये रोटी, कपड़ा और मकान की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाते हैं।
6. आवास की समस्या-बिहार के कृषक मजदूरों की कोई स्थायी आवास नहीं होती है फलतः वे दूसरों पर इसके लिए आश्रित रहते हैं।
7. बंधुआ मजदूर-ऐसे कृषक मजदूर किसी ऋण के चलते मालिक के यहाँ आजन्म या ऋण चुकता होने तक भोजन के बदले काम करते हैं। इसमें उनका परिवार भी साथ होता है जिन्हें कम मजदूरी दिया जाता है।
8. सहायक धंधों का अभाव-यदि प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप होता है तो इन्हें जीवन निर्वाह का अन्य कोई साधन नहीं मिल पाता है जिसके चलते वे कर्ज में दिन प्रतिदिन और डूबते चले जाते हैं।
9. संगठन का अभाव-संगठन के अभाव के कारण कृषक मजदूरों में मेलजोल की क्षमता नहीं होती है। इसके चलते वे अपनी मजदूरी बढ़वाने, कार्य के घंटे नियमित करने, बेकारी बंद कराने की आवाज तक उठा नहीं पाते।
10. कृषि में मशीनीकरण से बेकारी-बिहार में अब कृषि कार्यों में मशीनों का प्रयोग होने लगा है। इसके चलते कृषक मजदूरों में बेकारी बढ़ती जा रही है।
11. निम्न सामाजिक स्तर-बिहार में अधिकांश कृषक मजदूर अनुसूचित जाति एवं पिछड़ी जातियों के हैं जिनका सदियों से शोषण होता आ रहा है। इससे उनका सामाजिक स्तर निम्न कोटि का बना हुआ रहता है।

प्रश्न 2. बिहार में कृषक मजदूरों की संख्या क्यों तेजी से बढ़ती जा रही है ? इसकी दशा में सुधार लाने के लिए उपाय बताएँ।
उत्तर-बिहार में कृषक मजदूरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं-
(i) प्राकृतिक आपदा-बिहार में बाढ़ से होने वाली बर्बादी से बचने के लिए लोग मजबूरी में मजदूरी करते हैं। इससे उनकी संख्या में वृद्धि हो रही है।
(ii), जनसंख्या वृद्धि-बिहार में जनसंख्या की वृद्धि दर काफी तीव्र है जिससे कृषक मजदूरों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।
(iii) प्राकृतिक संसाधनों का अभाव-इसके चलते भी कृषक मजदूरों की संख्या में वृद्धि हो रही है क्योंकि इसके बिना कोई भी रोजगार संभव नहीं है।
(iv) सरकार की उपेक्षा-बिहार में रोजगार के प्रति सरकार की उपेक्षा से कृषक मजदूरों की संख्या में वृद्धि दर्ज होती जा रही है।
(v) गरीबी-बिहार में गरीबों की संख्या अत्यधिक है जिससे लोग मजबूरी में कृषक मजदूरी करने पर उतर जाते हैं। जिससे उनकी संख्या में वृद्धि हो रही है।

बिहार में कृषक मजदूरों की दशा में सुधार के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं-
(i) कृषि पर आधारित उद्योगों का विकास करना चाहिए।
(ii) न्यूनतम मजदूरी के नियमों का उचित क्रियान्वयन किया जाना चाहिए।
(iii) कृषि मजदूरों के लिए भूमि की व्यवस्था किया जाना चाहिए।
(iv) उनके लिए सहकारी संस्थाओं की स्थापना की जानी चाहिए।
(v) कृषक मजदूरों के काम के घंटे निश्चित किये जाने चाहिए।

प्रश्न 3. बिहार में कृषक मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक उपायों पर प्रकाश डालें।
उत्तर-बिहार में कृषक मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक उपाय निम्न हैं-
1. कृषि पर आधारित तथा आश्रित उद्योगों का विकास करना चाहिए।
2. लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास किया जाना चाहिए।
3. कृषक मजदूरी पर न्यूनतम मजदूरी नियमों का उचित क्रियान्वयन करना चाहिए।
4. कृषक मजदूरों के काम के घंटों को निश्चित करना चाहिए।
5. कृषक मजदूरों के कार्य दशाओं में सुधार किए जाने चाहिए।
6. इनके आवास के लिए मकानों का निर्माण किया जाना चाहिए।
7. इनके लिए कृषि श्रम कल्याण केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए।
8. इनके लिए ग्रामीण रोजगार केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए।
9. कृषि मजदूरों के लिए भूमि की व्यवस्था की जानी चाहिए।
10. कृषि मजदूरों के लिए उचित संगठन की व्यवस्था की जानी चाहिए।
11. इनके लिए सहकारी संस्थाओं की स्थापना की जानी चाहिए।
12. इनके बीच शिक्षा का प्रचार, प्रसार होनी चाहिए।
13. भूदान आंदोलन को प्रभावशाली तरीके से लागू की जानी चाहिए।

प्रश्न 4. कृषक मजदूरों की दशा सुधारने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए प्रयासों पर प्रकाश डालें।
उत्तर-सरकार ने कृषक मजदूरों की दशा को सुधारने के लिए निम्न प्रयास किए हैं-
(i) न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948) को कृषि पर भी लागू कर दी गयी है।
(ii) भूमिहीन मजदूरों को मकान बनाने के लिए मुफ्त प्लॉट (जगह) उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पंचवर्षीय योजनाओं की व्यवस्था की गयी है।
(iii) जमींदारी प्रथा समाप्त करने के चलते बहुत सी भूमि अतिरिक्त बची थी जिसको इन भूमिहीन मजदूरों में बाँट दिया गया है।
(iv) 1976 में आपातकाल के समय एक अधिनियम बनाकर बंधुआ मजदूर प्रथा को समाप्त कर दिया गया है।
(v) जोत की सीलिंग (उच्चतम निर्धारित सीमा) से बची हुई भूमि, बंजर भूमि को कृषक मजदूरों के बीच वितरित किया जा रहा है।
(vi) कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास करने के उद्देश्य से ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार ने कई ग्रामीण औद्योगिक बस्तियाँ स्थापित की हैं।
(vii) इन्हें वित्तीय सुविधा देने के लिए कृषि सेवा समितियाँ की स्थापना की गयी है।
(viii) भूमिहीन मजदूरों को पुराने ऋणों से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से भिन्न-भिन्न राज्यों ने कानून बनाये है।
(ix) केन्द्रीय सरकार ने कृषक मजदूरों के लिए एक स्थायी समिति की नियुक्ति की है।
(x) सरकार ने ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी कार्यक्रम शुरू की है जिसका उद्देश्य ग्रामीण भूमिहीनों के लिए रोजगार के अवसरों में सुधार तथा वृद्धि करना है।
(xi) बाल श्रमिक निरोधक अधिनियम के द्वारा कृषक मजदूरों के बच्चों के शोषण को कानूनी अपराध घोषित किया गया है।
(xii) इसके अलावे, हमारी सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं में कृषक मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए अनेक प्रयास किये हैं।

प्रश्न 5. बिहार में कृषक मजदूरों के पलायन से उत्पन्न समस्याओं पर प्रकाश डालें। इनका निदान कैसे किया जा सकता है ?
उत्तर-बिहार में कृषक मजदूरों के पलायन से अनेक तरह की समस्याएँ उत्पन्न हो रही है। एक तरफ बिहार में कृषक मजदूरों की संख्या में कमी हो रही है तथा कृषि कार्य के लिए मजदूर उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ बिहारी कृषक मजदूरों का अन्य राज्यों में काफी शोषण
हो रहा है। पंजाब, हरियाणा तथा अन्य राज्यों में बिहार कृषक मजदूरों से अधिक घंटे तक काम कराया जाता है। वर्ष 2007 में असम में बिहारी मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार किया गया था। कई मजदूरों की हत्या कर दी गई। इसके चलते बिहारी मजदूर बिहार की ओर आने लगे हैं। इसी तरह की घटना 2008 में मुंबई में भी हुई। अतः यह एक गंभीर समस्या बनी हुई हैं।
बिहार से कृषक मजदूरों के पलायन से उत्पन्न समस्याओं का निदान निम्न प्रकार से किया जा सकता है-
(i) ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पर आधारित उद्योगों की स्थापना की जाय।
(ii) ग्रामीण रोजगार केन्द्रों की स्थापना की जाय।
(iii) ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा का व्यापक प्रसार की जाय।
(iv) इन्हें मुफ्त आवास की सुविधा मुहैया करायी जाय।
(v) इनका उचित संगठन की व्यवस्था की जाय।

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