8th sanskrit

8th class sanskrit note | नीति श्लोकाॖः

नीति श्लोकाॖः

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8th class sanskrit note

वर्ग – 8

विषय – संस्कृत

पाठ 8 – नीति श्लोकाॖः

 नीति श्लोकाॖः
( कर्तृवाच्य , कर्मवाच्य )

[ नीति श्लोक जीवन को सुचारू रूप…….. श्लोक दिये गये हैं ।

1. कस्य दोषः……….. सौख्यं निरन्तरम् ।। ( 3.1 )

अर्थ — किसके कुल में दोष नहीं है । कौन रोग से पीड़ित नहीं होता है । व्यसन ( आदत ) किसको प्राप्त नहीं है । किसकी दोस्ती सदैव रहती है ।
2. आचारः कुलमाख्याति ……..भोजनम् ॥ ( 3.2 )

अर्थ — आचार ( चाल – चलन ) से कुल की जानकारी होती है । भाषण ( भाषा ) से देश ( स्थान ) की जानकारी होती है । श्रद्धा से स्नेह की जानकारी होती है । शरीर से भोजन की जानकारी होती है ।

3. अधमा धनमिच्छन्ति …….महतां धनम् ॥ ( 8.1 )

अर्थ – नीच लोग धन की इच्छा करते हैं । मध्यम प्रकार के लोग धन और मान दोनों चाहते हैं तथा उत्तम लोग केवल मान चाहते हैं क्योंकि मान ही महान व्यक्तियों का सबसे बड़ा धन है ।

4. विद्वान् प्रशस्यते लोके….सर्वत्र पूज्यते।( 8.20 )

अर्थ – विद्वान संसार में प्रशंसा पाते हैं । विद्वानों को सब जगह महत्वपूर्ण स्थान मिलता है । विद्या के द्वारा सब कुछ पाया जा सकता है । विद्या का सब जगह पूजा होती है ।

5.दृष्टिपूर्त न्यसेत्पादं…….. पूतं समाचरेत् ।। ( 10.2 )

अर्थ – दृष्टि से पवित्र कर पैर रखना चाहिए ( आँख से देखकर पैर बढ़ाना चाहिए ) पानी वस्त्र से छानकर पीना चाहिए । शास्त्र से पवित्र कर ( शास्त्र सम्मत ) बात बोलना चाहिए और मन से पवित्र कर ( सोच – समझकर ) आचरण ( काम ) करना चाहिए ।

6.अनित्यानि शरीराणि  ………..कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ।

अर्थ – शरीर अनित्य ( अस्थायी ) है । घन – सम्पत्ति भी स्थायी नहीं है । मृत्यु स्थायी और निकट है । इसलिए धर्म संग्रह ( धर्माचरण ) अवश्य करना चाहिए ।
7. जलबिन्दुनिपातेन………. धर्मस्य च धनस्य च ॥

अर्थ – जैसे जलबुन्दों को संग्रह करने से क्रमशः घड़ा भर जाता है । वही बात है सभी विधाओं , सभी धर्मों और सब प्रकार के धन संग्रह करने में ।
8. यथा धेनुसहस्रेषु वरसो ….. कर्तारमनुगच्छति ।। ( 13.15 )

अर्थ -जैसे हजारों गायों के बीच में बछड़ा ( गाय का बच्चा ) छोड़ दिया जाय तो वह अपने माता के पास पहुँच जाता है । उसी प्रकार मनुष्य जो काम करता है वह किया हुआ काम कर्ता ( करने वाले ) के पीछे – पीछे चलता है । अर्थात् कर्म फल अवश्य मिलता है ।

शब्दार्थ –

कस्य = किसका / की / के । कुले = वंश में , खानदान में । व्याधिना = रोग से । केन = किससे , किसके द्वारा । सौख्यम् = मित्रता , दोस्ती । आचारः = चाल – चलन । कुलमाख्याति ( कुलम् + आख्याति ) = वंश को बताता है । सम्भ्रमः = आदर , श्रद्धा , व्याकुलता । वपुः = शरीर । अधमाः = नीच लोग । महताम् = महान् व्यक्तियों का / को / के । प्रशस्यते = प्रशंसित होता है । लोके = संसार में । गौरवम् = महत्त्वपूर्ण । पूज्यते = पूजी जाती है । अनित्यानि = अस्थायी , अस्थिर । विभवो ( विभवः ) = धन – सम्पत्ति , ऐश्वर्य । शाश्वतः = स्थायी , सदा रहने वाला । सनिहितो ( सन्निहितः ) = समीप । कर्तव्यो ( कर्तव्यः ) = करने योग्य , करना चाहिए । धर्मसंग्रहः = धर्म का संचय , धार्मिक कार्य । पूर्यते = पूरा होता है , भरता है । हेतु = कारण । सर्वविद्यानाम् = सभी विद्याओं का / की / के । धेनुसहस्रेषु = हजारों गायों में । वत्सो ( वत्सः ) = बछड़ा । मातरम् = माता को , माँ के पास । कृतम् = किया गया । कतारमनुगच्छति ( कर्तारम् + अनुगच्छति ) = कर्ता के पीछे जाता है । दृष्टिपूतम् = आँखों से पवित्र अर्थात् अच्छी तरह देखा गया । न्यसेत् = रखना चाहिए । पादम् = पैर । वस्त्रपूतम् = कपड़े से पवित्र किया हुआ अर्थात् छना हुआ । पिबेज्जलम् ( पिबेत् + जलम् ) = जल पीना चाहिए । शास्त्रपूतम् = शास्त्रों द्वारा पवित्र किया गया अर्थात् शास्त्रसम्मत । मनःपूतम् = मन से पावन किया गया अर्थात् मन से सोचा गया । समाचरेत् = आचरण करना चाहिए ।

संधि विच्छेद

नास्ति = न + अस्ति ( दीर्घ सन्धि ) । वपुराख्याति = वपुः + आख्याति ( विसर्ग सन्धि ) । पिबेजलम् = पिबेत् + जलम् ( व्यंजन सन्धि ) । वरेद्वाक्यम् = वदेत् + वाक्यम् ( व्यञ्जन सन्धि ) । नैव = न + एव ( वृद्धि संधि ) । यच्च = यत् + च ( व्यञ्जन सन्धि ) । कुलमाख्याति = कुलम् + आख्याति । देशमाख्याति देशम् + आख्याति । स्नेहमाख्याति = स्नेहम् + आख्याति । धनमिच्छन्ति = धनम् + इच्छन्ति । कर्तारमनुगच्छति = कर्तारम् + अनुगच्छति ।

प्रकृति – प्रत्यय – विभागः

आख्याति= आ + √ख्या लट् लकार , प्रथम पुरुष , एकवचन
इच्छन्ति=√इच्छ , लट् लकार , प्रथम पुरुष , बहुवचन प्रशस्यते= प्र +√ शंस् + यक् ( कर्मवाच्य ) , प्रथम पुरुष , एकवचन
लभते= √लभ् आत्मनेपद , प्रथम पुरुष , एकवचन
पूज्यते=√ पूज + यक् ( कर्मवाच्य ) , प्रथम पुरुष , एकवचन
न्यसेत्= नि + √अस् विधिलिङ , प्रथम पुरुष , एकवचन
पिबेत=√पा ( पिब् ) , विधिलिङ् लकार , प्रथम पुरुष ,
वदेत्=√वद्  विधिलिङ् लकार , प्रथम पुरुष , एकवचन
समाचरेत् =सम् + आ +  √चर् , विधिलिङ् लकार , प्रथम पुरुष , एकवचन
कर्तव्यः= √कृ + तव्यत् , पुल्लिंग , एकवचन
पूर्यते =√पृ +यक् ( य ) कर्मवाच्य , प्रथम पुरुष , एकवचन
अनुगच्छति= अनु + √गम् ( गच्छ ) लट् लकार , प्रथम पुरुष , एकवचन

अभ्यासः
मौखिक :
1. पाठे दत्तानां पद्यानां सस्वरवाचनं कुरुत
( पाठ में दिये गये श्लोकों को आवाज के साथ पढ़ें ) ।
2. अधोलिखितानां पदानां अर्थं वदत्
आख्याति , वपुः , इच्छन्ति , महताम् , अनित्यम् , निपातेन , अनुगच्छति , वत्सः ।
उत्तरम् — आख्याति = बताता है । वपुः = शरीर । इच्छन्ति = इच्छा करते हैं । महताम् = महान व्यक्तियों का । अनित्यम् = अस्थाई । निपातेन = संग्रह करने से । अनुगच्छति = पीछे चलता है । वत्सः = बछड़ा ।
3. निम्नलिखितानां पदानां सन्धि – विच्छेदं सन्धि वा कुरुत नैव , वपुराख्याति , पिबेज्जलम् न्देद्वाक्यम् , यत् + च , यसेत् + पादम् ।
उत्तरम् – नैव = न + एव । वपुराख्याति = वपुः + आख्याति । वेदेदाक्यम् = वेदेत् वाक्यम् । यत् + च = यच्च । न्यसेत् + पादम् = न्यसेत्पादम् ।

लिखित-
4. एकपदेन उत्तरत –
( क ) विद्वान् कुत्र प्रशस्यते ?
उत्तरम् – विद्वान् लोके प्रशस्यते ।
( ख ) के धनम् इच्छन्ति ?
उत्तरम् – अधमाः धन इच्छन्ति ।
( ग ) महतां धनं किमस्ति ?
उत्तरम्- महतां धनं मानम् अस्ति ।
( घ ) बेनु सहस्रेषु वत्सः कुत्र गच्छति ?
उत्तरम् -धेनुसहस्रेषु वत्सः मातरम् गच्छति ।
( ङ ) वस्त्रपूतं कि पिवेत् ?
उत्तरम् – वस्त्रपूतं जलं पिबेत ।
5. अधोलिखितेषु पदेषु प्रयुक्तां विभक्तिं वचनं च लिखत-
पदानि           विभक्तिः             वचनम्
यथा- लोके           सप्तमी              एकवचनम्
उत्तरम् –
निपातेन           तृतीया             एकवचनम्
धनस्य              षष्ठी                एकवचनम्
महताम्           षष्ठी                 बहुवचनम्
व्याधिना          तृतीया             एकवचनम्
कुले               सप्तमी             एकवचनम्
मातरम्           द्वितीया              एकवचनम्
मानः              प्रथमा                एकवचनम्

6. अधोलिखितानि पदानि प्रयुज्य वाक्यानि रचयत-
विद्वान् , आख्याति , व्यसनम् , पूज्यते , घरः , वत्सः , लभते ।
उत्तरम् –
विद्वान्     –विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।
आख्याति –कुलम् आचार : आख्यति ।
व्यसनम् —व्यसनम् केन न प्राप्तम् ।
पूज्यते —- विद्या सर्वत्र पूज्यते ।
घर :—— घर : जलबिन्दु निपातेन पूर्यते ।
वत्सः——– वत्सः मातरम् अनुगच्छति ।
लभते——- विद्याया सर्वं लभते ।
7. उचित कथनानां समक्षम् “ आम् ” अनुचित कथनानां समक्षं ” न ” इति लिखत-
यथा -आचारः कुलं न आख्याति        ( न )
उत्तरम्-
( क ) विद्या सर्वत्र पूज्यते । (आम्)
( ख ) दृष्टिपूतं पादं न न्यसेत् । ( न)
( ग ) सर्वे व्याधिना पीडिताः भवन्ति ।( आम्)
( घ ) अधमाः मानम् इच्छन्ति । ( न )
( ङ ) मध्यमाः केवलं धनम् इच्छन्ति । ( न )
( च ) शरीरम् अनित्यम् भवति । ( न )
8. अधोलिखितानि पदानि निर्देशानुसारं परिवर्तयत  यथा — दोषः ( षष्ठी एकवचन ) दोषस्य ।
( क ) विद्या ( द्वितीया द्विवचन ).
उत्तरम् – विद्ये
( ख ) विद्वान् ( तृतीया द्विवचन )
  उत्तरम् – विद्वदभ्यां
( ग ) जलम् ( सप्तमी बहुवचन )
उत्तरम् -जलेसु
( घ ) भोजनम् ( चतुर्थी एकवचन )
उत्तरम् – भोजनाय
( ङ ) माता ( पंचमी बहुवचन )
उत्तरम् – मातृभ्यः

9. अधोलिखितानां पदानां विलोम पदानि लिखत –
दोषः सौख्यम् , उत्थानम् विद्या , मानम् , नित्यम् अद्यमः ।
उत्तरम्-
दोषः = गुण । सौख्यम् = असौख्यम् । उत्थानम् = पतनम् । विद्या = अविद्या । मानम् = अपमानम् । नित्यम् = अनित्यम् । अधमः = उत्तमः ।

10. लङ्लकारे परिवर्तनं कुरुत
लट्लकारः                         लड़्लकारः
यथा – गजः धावति                गजः अधावत् ।
उत्तरम्
( क ) वत्सः दुग्धं पिबति         वत्सः दुग्धं अपिबत् ।
( ख ) शरीरं नित्यं न अस्ति      शरीरं नित्यं न आसीत् । ( ग ) दुग्धं श्वेतं भवति           दुग्धं श्वेतं अभवत् ।
( घ ) स : विद्यालये पठति      सः विद्यालये अपठत् । ( ङ ) ते गृहं गच्छन्ति             ते गृहं अगच्छन् ।
( च ) बालकौ हसतः            बालकौ अहसताम् ।
( छ ) त्वं किं वदसि               त्वं किं अवदः ।

11. मञ्जूषातः पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत ( अधमः , उत्तमः , मध्यमः , आचारः , कर्तव्यः , घटः , अनुगच्छति )
उत्तरम्
( क ) उत्तमः मानम्  इच्छति ।
( ख ) अधमः धनं इच्छति ।
( ग ) जलबिन्दु निपातेन घटः पूर्यते ।
( घ ) त्वया धर्मसंग्रहः कर्तव्यः ।
( ङ ) कृतं कर्म कर्तारम् अनुगच्छति ।
( च ) मध्यम : धनं मानं च इच्छति ।
( छ ) आचारः कुलम् आख्याति ।

12.     एकवचन.         द्विवचन.              बहुवचन
उत्तरम्    एकवचन.       द्विवचन         बहुवचन ( क )    गच्छति            गच्छतः          गच्छन्ति ( ख ).  अभवत्           अभवताम्          अभवन् ( ग )     अस्ति               स्त :                सन्ति ( घ ) धनस्य.               धनयोः              धनेभ्यः
( ङ ) विद्या                 विद्ये                 विद्याः
( च ) घनाय                धनाभ्यां

धनेभ्यः 13. समानार्थकानि पदानि मेलयत
उत्तरम् – ( क ) विद्वान् = विज्ञः । ( ख ) वपुः = शरीरम् । ( ग ) हेतुः = कारणम् । ( घ ) घटः = कुम्भः । ( ङ ) धनम् = वित्तम् । ( च ) जलम् = तोयम् । ( छ ) गृहम् = सदनम् । ( ज ) गजः = हस्ती ।

                 योग्यता – विस्तारः

   पाठ से सम्बन्ध
जीवन के संतुलित तथा बुद्धिमतापूर्वक संचालन के लिए नीति का महत्व है । नीति मानव नयति उन्नतिं नीतिः । प्रस्तुत पाठ में आचार्य चाणक्य के प्रसिद्ध ग्रन्थ से जो नीतिश्लोक लिये गये हैं उनमें बहुमूल्य जीवनदर्शन निहित है । उन्हें क्रमश : देखें –
श्लोक 1 : दु : ख के समय आश्वासन प्राप्त करना – कोई सदा सुखी नहीं रहता ।
श्लोक 2 : इसमें विभिन्न पदार्थों का कार्यकारण सम्बन्ध दिया गया है ।
जैसे — आचरण देखकर किसी के वंश का ज्ञान , भाषा देखकर उसका मूलनिवासस्थान जानना , श्रद्धा देखकर मेह को समझना , शरीर देखकर किसी के खान – पान का अनुमान करना ।
श्लोक 3 : उत्तम , मध्यम , अधम व्यक्तियों का अन्तर उनकी कामना से प्रकट होता है कि वे धन या सम्मान या दोनों चाहते हैं ।
श्लोक 4 : विद्या और विद्वान् की महत्ता का निरूपण ।
श्लोक 5 : अपने दैनिक कार्यों में पवित्र करने वाले पदार्थों का परिचय । जैसे पदविन्यास में दृष्टि का महत्त्व है तो आचरण में मन का महत्त्व है । पूत ( पवित्र किया हुआ ) का लक्ष्यार्थ सभी स्थितियों में पृथक् – पृथक् है । जैसे – दृष्टि पूत का अर्थ है- कपड़े से छानकर , पूत का अर्थ – शास्त्र से विचार करके और मनपूत का अर्थ है- मन में समझकर ।
श्लोक 6 : संसार की अनित्यता और धर्म की नित्यता का अन्तर यहाँ दिखाया गया है । महाभारत का एक श्लोक इस विषय में उदाहरण योग्य है

न जातु कामान् न भयान्न लोभात् ।
      धर्म त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।।
     धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये ।
     जीवो नित्यः हेतुरस्य त्वनित्यः ।।

श्लोक 7 : धर्म और धन का संग्रह क्रमश : धैर्यपूर्वक होता है , उतावलेपन से नहीं ।
श्लोक 8 : कर्म का फल अवश्य मिलता है चाहे कोई नहीं भी हो ।

व्याकरण से सम्बद्ध
यहाँ कुछ प्रमुख अव्ययों के अर्थ प्रयोगसहित अतिरिक्त ज्ञान के लिए दिये जाते हैं ।
कालवाचक अव्यय सर्वदा , निरन्तरम् = हमेशा , सदा । छात्रः सर्वदा / निरन्तरं विद्याभ्यासं करोति । सम्प्रति , अधुना , इदानीम् = इस समय । सम्प्रति / अधुना / इदानीं गृहं गन्तुं वयम् उत्सुकाः स्म:।

ह्यः = बीता हुआ कल । ह्यः अस्माकं गृहे कः आगतः ?
श्वः = आने वाला कल । श्वः मम पिता नगर , गमिष्यति ।
अद्य = आज । कः दिनाङ्कः अस्ति ?
सायम् = शाम । सायम् उद्यानस्य भ्रमणं करणीयम् । चिरम् =देर तक । अध्यक्षः सभायां चिरं तिष्ठति ।
कदा = कब ( कस्मिन् काले ) । त्वं पाटलिपुत्रं कदा गमिष्यसि ? बालकः कदा पुस्तकं पठति ?
यदा , तदा = जब , तब । यदा मेघः गर्जति तदा मयूरः नृत्यति ।
ऐषमः = इस वर्ष ( अस्मिन् वर्षे ) । ऐषमः वर्षा पर्याप्ता न आसीत् ।

प्रकारवाचक अव्यय :
शनैः , शनैः – शनैः = धीरे – धीरे । वृद्धः शनै : / शनैः शनैः चलति ।
भूयः , मुहुः , पुनः =फिर । शिक्षकः भूयः / मुहुः / पुनः वर्गम् आगच्छति ।
मुहुर्मुहुः = बार – बार ( पुनः पुनः ) । मशकः मुहुर्मुहुः दशति ।
यथा , तथा = जिस प्रकार , उस प्रकार । त्वं यथा करोषि तथा फलं भवति ।
कथम् = किस प्रकार , कैसे , क्यों । त्वं कथं गमिष्यसि , यानेन पदातिः वा ?
इत्थम् , एवम् = इस प्रकार ( अनेन प्रकारेण ) । इत्थं शिक्षकः कथं मां ताडयति ? सः अस्मान् पाठयति ।

सम्यक् = अच्छी तरह । त्वं सम्यक् जानासि यत् अहं न गतः ।
कदाचित् = कभी , शायद । स कदाचित् अत्र आगतः आसीत् ।
कदाचिदपि = कभी भी । तत्र अहं कदाचिदपि न गतः ।।

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