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bihar board class 8th hindi note | बालगोबिन भगत

बालगोबिन भगत

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bihar board class 8th hindi note

वर्ग – 8

विषय – हिंदी

पाठ 4 – बालगोबिन भगत

बालगोबिन भगत
                                      -रामवृक्ष बेनीपुरी

रामवृक्ष बेनीपुरी रचित रेखाचित्र बालगोबिन भगत …….. रूप से भी परिचित होंगे ।
बालगोबिन भगत मँझौले कद , गोरे – पतले थे , उम्र 60 वर्ष के पके बाल – दाढ़ी , लेकिन साधुओं की तरह जटा नहीं । एक लंगोटी तथा सिर पर कबीरपंथी टोपी , जाड़े के समय एक काली कम्बल ओढ़ लेते । ललाट पर सदैव रामानन्दी चंदन , गले में तुलसी – माला उनको वैष्णव होने का संकेत देता था । बालगोबिन एक गृहस्थ थे । बेटा – पतोहु सभी उनके घर में थे । कुछ खेती – बारी भी थी , जिसे वे परिश्रमपूर्वक किया करते थे ।
वे कबीर को अपना आदर्श मानते थे , वही उनके मालिक ( साहब ) थे , क्योंकि खेत में उपजे सारे अन्न को माथे चढ़कर साहब के दबार ( संगत ) में ले जाते । फिर प्रसाद मानकर उपयोग के अनुकूल अन्न लाया करते ।
वे गृहस्थ होकर भी महान साधु थे । क्योंकि वे किसी का कुछ नहीं छुते , यहाँ तक दूसरों के खेत में शौच तक नहीं करते । किसी से झगड़ा नहीं करते , लेकिन दो टुक बात करने में संकोच नहीं करते ।
वे सदैव कबीर के दोहे या पद गाते दिखते थे । आषाढ़ में धान रोपते समय भादों में अधरतिया , कार्तिक में प्रभाती और गर्मी के दिनों में संझा गौत से परिवेश मुखरित होते रहते थे ।
उनके कुछ प्रेमी भी थे जो मंडली के रूप में बालगोबिन भगत के भजन में साथ देते थे । बालगोबिन भगत अपने प्रेमी मंडली के साथ इतना आनन्द विभोर हो जाते कि खंजड़ी बजाते हुए वे नाच उठते थे ।
बालगोबिन भगत की संगीत – साधना का चरम – उत्कर्ष तो उस दिन दिखाई पड़ा , जिस दिन उसका इकलौता बेटा मर गया । जिसे वे बहुत मानते थे । जिसका कारण था बेटा सुस्त एवं बोदा जैसा था । बेटा का मृत शरीर के पास वे धुन – लय में अपना गीत गा रहे थे । बीच – बीच में रोती विलाप करती पतोहु के पास जाकर रोने के बदले उत्सव मनाने को कहते । वे बार – बार कहते आत्मा परमात्मा से जा मिला है । इससे बड़ा आनन्द क्या हो सकता है । लोग उसे पागल मान रहे थे ।
बेटा के श्राद्ध – कर्म करने के बाद पतोहु के भाई को बुलाकर साथ कर दिया और आदेश देते हुए कहा , इसकी दूसरी शादी कर देना । पतोहु जो अत्यन्त सुशील थी , रो – रोकर कहती रही मैं चली जाऊँगी तो बुढ़ापे में आपको खाना कौन बनायेगा । बीमार पड़ने पर पानी कौन देगा । लेकिन बालगोबिन का निर्णय अटल था उसने कहा — ” तू चली जा , नहीं तो मैं इस घर वे चला जाऊँगा । ” बेचारी चली जाती है ।
बालगोबिन हर वर्ष 30 कोस पैदल चलकर गंगा स्नान जाते , लेकिन रास्ते में कुछ नहीं खाते केवल पानी पी – पीकर वापस घर आकर ही खाते । इस बार जब वे लौटे तो सुस्त पड़ गये । बीमार पड़ गये , लेकिन स्नान पूजा , संगीत – साधना , खेती – बारी कुछ भी नहीं छोड़ा । एक दिन लोगों ने शाम का संगीत सुना लेकिन प्रातःकालीन संगीत नहीं सुनकर बालगोबिन के पास जाते हैं तो देखा बालगोबिन का मृत शरीर पड़ा है ।

      शब्दार्थ

कमली = कंबल । कलेवा = सुबह का जलपान , यात्रा करते समय साथ रखा गया भोजन । पुरवाई = पूरब की ओर से बहने वाली हवा । अधरतिया = आधी रात । खेजड़ी = डफली के ढंग का परंतु आकार में उससे छोटा एक वाद्ययंत्र । निस्तब्धता = सन्नाटा , सुनसान । लोही = प्रात : काल की लालिमा । आवृत = | का हुआ । कुश = एक प्रकार की नुकीली घास । योदा = कम बुद्धिवाला । संबल = सहारा । जीने = सीढी ।

                    प्रश्न – अभ्यास
  पाठ से-

1. बालगोबिन भगत गृहस्थ थे । फिर भी उन्हें साधु क्यों कहा जाता था ?

उत्तर — बालगोबिन बेटा – पोहु वाले गृहस्थ थे लेकिन उनका आचरण साधु जैसा था । साधु आडम्बरों या अनुष्ठानों के पालन के निर्वाह से नहीं होता । यदि कोई जटाजुट बढ़ा लें तो साधु नहीं हो सकता । वस्तुतः साधु वह है जो आचरण में शुद्धता रखता है । बालगोबिन भगत को दिनचर्या कर्तव्यनिष्ठता और आत्म ज्ञान उन्हें साधु बना दिया था ।

2. भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएं किस तरह व्यक्त की ?

उत्तर – भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर विलाप नहीं करते दिखे । बल्कि मग्न हो गीत गा रहे थे उनकी भावना का वह चरम – उत्कर्ष था । वो अपने पतोहु से कहते थे – आनन्द मनाओ । एक आत्मा परमात्मा से मिल गया । उनकी भावना थी कि मृत्यु के बाद आत्मा – परमात्मा से मिल जाता है जो आनन्ददायक बात है । इस भावना को वे संगीत से तथा पोहु को यथार्थता का ज्ञान देकर भावना को व्यक्त कर रहे थे ।

3. पुत्र – वधु द्वारा पुत्र को मुखाग्नि दिलवाना भगत के व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है ?

उत्तर – विवाह के बाद पति पर पली का सबसे अधिक अधिकार है । पत्नी का भी कर्तव्य सबसे अधिक पति के प्रति ही होता है । गृहस्थ आश्रम में दोनों एक – दूसरे के पूरक हैं । अत : पतोहु को सबसे बड़ा अधिकारी मान उसी से मुखाग्नि दिलवाया । यह कार्य भगत के व्यक्तित्व की सच्चाई और महानता को दर्शाता है ।

पाठ से आगे–

1. “ धर्म का मर्म आचरण में है , अनुष्ठान में नहीं ” स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर – बालगोबिन भगत साघु थे लेकिन साधु जैसा वेश – भूषा नहीं था । आचरण की पवित्रता और दिनचर्या से वे साधु ही धे । गृहस्थ होकर भी साधु जैसा आचरण ही धर्म का मर्म है न कि साधु जैसा आडम्बर करके ।

2. बालगोबिन भगत कबीर को “ साहब ” मानते थे । इसके क्या – क्या कारण हो सकते हैं ?

उत्तर – बालगोबिन कबीर पंथी होंगे । वे कबीर के पद से अधिक प्रभावित होंगे । भगत जी आडम्बर से दूर रहकर मानव सेवा में विश्वास रखते होंगे । कबीर के आदर्श को बालगोबिन भगत मानते होंगे । इसीलिए वे कबीर को ही अपना ” साहब ” मानते थे ।

3. बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र को मृत्यु पर भी शोक प्रकट नहीं किया । उनके इस व्यवहार पर अपनी तर्कपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त कीजिए ।

उत्तर — बालगोबिन भगत अपने पुत्र के मृत्यु पर भी शोक प्रकट नहीं किया । उनका यह व्यवहार हमारे विचार से सत्य था । मृत्यु प्राणी को जन्म प्रदान करता है । फिर मृत्यु से शारीरिक कष्ट भी तो दूर होता है । अतः मृत्यु पर शोक करना अज्ञानता ही तो है । क्या मृत व्यक्ति के प्रति हजारों वर्ष तक शोक किया जाय तो वह लौट सकता है ? कदापि नहीं ।

4. अपने गाँव – जवार में उपस्थित किसी साधु का रेखाचित्र अपने शब्दों में प्रस्तुत करें ।

उत्तर – हमारे गाँव में एक साधु रहते हैं । बिल्कुल साधु रूप स्वभाव आचार – विचार सब में साधु । सुना गया कि कुछ साल पूर्व सम्भवतः 40-50 वर्ष पूर्व हमारे गाँव में आकर एक मंदिर में डेरा डाला । लोग उन्हें साधु – बाबा कहकर सम्मान देते हैं । साधु बाबा को कभी हमने   गुस्सा या नाखुश नहीं देखा । हंसते हुए सारी समस्याओं को निदान वे कर देते हैं । किसी के घर में कलह झगड़ा – झंझट हो साधु बाबा तुरन्त सुलझा देते हैं । भोजन के लिए भिक्षाटन या किसी से याचना नहीं करते । गाँव के लोग उनके भोजन का प्रबन्ध स्वयं कर देते हैं ।
प्रातः स्नान पूजा वे सम्भवत : 5 बजे प्रातः तक कर लेते । इसके बाद गाँव के गली – गली में जाकर गीत गाते हुए गुजरते हैं ।
” उठ जाग मुसाफिर मोर भई , रैन गई क्यों सोवत है ” की आवाज सुनते बाल – युवा – वृद्ध सभी उठकर अपने – अपने काम में लग जाते हैं ।
किसी के बारे में जब साधु – बाबा को पता चलता है कि रोग से पीड़ित हो गया है तो साधु बाबा इलाज के लिए प्रबन्ध करते हैं और उन्हें अस्पताल तक ले जाते हैं । उसका समुचित इलाज करवाते हैं ।
उनके माध्यम से जाने पर इलाज में डॉक्टर भी कोताही नहीं करते । पंचायत में भी उनकी भूमिका निर्णायक माना जाता है । इसे जो कहा सबके लिए मान्य है । धन्य हैं साधु बाबा जिनके कारण हमारे गाँव के लोग बड़े खुश एवं सम्पन्न हैं । किसी को कोर्ट – कचहरी नहीं जाना पड़ता है ।

5. अपने परिवेश के आधार पर वर्षा – ऋतु का वर्णन करें ।

उत्तर – हमारे गाँव नदी के किनारे बसा है । गाँव के तीनों ओर झील हैं । जब वर्षा ऋतु आता है तो हमारे गाँव के चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता है । लोगों को बड़ी परेशानी होती है । गाँव में साग – सब्जी की कमी हो जाती है । सबसे अधिक जलावन की दिक्कत गाँव में होती है ।
जब वर्षा ऋतु आती है तो लोग गाँव से बाहर धान रोपने के लिए निकल जाते हैं । गाँव से अधिक खेतों में लोग दिखाई पड़ते हैं । जब वर्षा होती रहती है तो गाँव थमा जैसा लगता है । अधिक वर्षा से गाँव वालों को बड़ी हानि उठानी पड़ती है ।
6. अब सारा संसार निस्तब्धता में सोया है , बालगोबिन भगत का संगीत जाग रहा है , जगा रहा है । ” व्याख्या कीजिए ।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारे पाठ्यपुस्तक ” किसलय भाग -3 ” के ” बालगोबिन भगत ” पाठ से संकलित है । इस पाठ के लेखक ” रामवृक्ष बेनीपुरी ” जी हैं । यह पाठ एक ” रेखाचित्र ” है ।
बालगोबिन की संगीत साधना गर्मी हो या वर्षा सदैव चलता रहता था । भादो को रात में भी चाहे वर्षा होती रहे या बिजली की करकराहट रहे । यहाँ तक मेढ़क की टर्र – टर्र आवाज भी बालगोबिन के गीत को प्रभावित नहीं कर पाती । आधी रात में उनका गाना सबों को चौका देता । जब सारा संसार निस्तब्धता में सोया है । बालगोबिन भगत का संगीत जाग रहा है , जगा रहा है ।

7. रूढ़ीवादिता से हमें किस प्रकार निपटना चाहिए ? किसी एक रूढ़ीवादी परम्परा का उल्लेख करते हुए बताइए कि आप किस प्रकार निपटेंगे ?

उत्तर – रूढ़ीवादिता हमारे समाज के लिए अभिशाप है । इससे निपटने के लिए हमें दृढ़ संकल्प होना चाहिए । हमारा समाज रूढ़ीवादिता से संक्रमित है जिसके कारण समाज के लोगों का जीवन कठिनाइयों से भर जाता है । उदाहरण में किसी के मरने पर खूब भोज करना हमारे विचार से उचित नहीं ।
कोई गरीब का बाप मर जाता है तो गाँव के लोग उसे भोज करने को विवश कर देते हैं । परिणामस्वरूप निर्धन व्यक्ति कर्ज लेकर भोज करते हैं । फिर वे महाजन के चंगुल से निकलने के लिए वर्षों दुःख झेलते हैं । क्या जरूरत है कर्ज लेकर भोज करने की । हम अपने गाँव में रूढीवादिता से होने वाले नुकसान का ज्ञान कराकर लोगों को रूढीवादिता से दूर करने का प्रयास करेंगे ।

इन्हें भी जानिए

1. योजक चिह –

( क ) माता – पिता , लड़का – लड़की , पाप – पुण्य जिन पदों के दोनों खंड प्रधान हो , वहाँ योजक चिह्न लगाया जाता है ।
( ख ) ऊपर – नीचे , माता – पिता , पाप – पुण्य , भाई – बहन दो विपरीतार्थक शब्दों के बीच योजक चिह्न लगाया जाता है ।
( ग ) उल्टा – पुल्टा , अनाप – शनाप , रोटी – वोटी जब दो शब्दों में से एक सार्थक और दूसरा निरर्थक हो तो वहाँ योजक चिह्न का प्रयोग होता है ।
       इस पाठ में प्रयुक्त वैसे शब्दों का चयन कीजिए जो योजक चिह्न से जुड़े हों एवं उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए ।
2. उद्धरण चिह्न का प्रयोग : जहाँ किसी पुस्तक से कोई वाक्य ज्यों – का – त्यों उद्धृत किया जाय वहाँ दुहरे उद्धरण चिह्न ( ” ” ) एवं जहाँ कोई विशेष एवं पुस्तक , समाचार पत्र , लेखक का उपनाम , शीर्षक इत्यादि उद्धृत किया जाय वहाँ इकहरे उद्धरण चिह्न ( ) का प्रयोग होता है । जैसे-
” जीवन विश्व की संपत्ति है । ” – जयशंकर प्रसाद ‘ कामायनी ‘ की कथा संक्षेप में लिखिए ।
‘ निराला ‘ पागल नहीं थे ।
‘ हिन्दुस्तान ‘ एक हिन्दी दैनिक पत्र है।

3. रेखाचित्र — जब किसी व्यक्ति , वस्तु , स्थान , घटना , दृश्य आदि का इस प्रकार वर्णन किया जाय कि पाठक के मन पर उसका हू – ब – हू चित्र बन जाये तो उसे रेखाचित्र कहते हैं । यथा ‘ बालगोबिन भगत ‘ पाठ का पहला अनुच्छेद । रेखाचित्र में किसी साधारण पात्र की असाधारण विशेषताओं को किया जाता है ।

व्याकरण

1. इस पाठ में प्रयुक्त वैसे शब्दों का चयन कीजिए जो योजक चिह्न से जुड़े हों एवं उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए ।

उत्तर –
लगौटी – मात्र बालगोबिन भगत लगौटी – मात्र धारण करते थे ।
साफ – सुथरा – मकान को साफ – सुथरा रखना चाहिए ।
दो – टुक वह हमेशा दो – टुक बात करता है ।
कभी – कभी — बालगोबिन भगत गाते – गाते कभी – कभी नाच उठते थे ।
सदा – सर्वदा – हमें सदा – सर्वदा पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए ।
पानी भरे – पानी – भरे खेत में वे काम करते दिखते थे ।
स्वर – तरंग — बालगोबिन भगत के स्वर – तरंग लोगों को तुरन्त आकर्षित कर लेता था ।
टर – टर्र – मेढ़क की टर – टर्र वर्षा ऋतु में सुनाई पड़ता है ।
डिमक – डिमक – बालगोबिन भगत की खंजरी डिमक – डिमक बज उठती थी ।
गाते – गाते – वह गाते – गाते मस्ती में नाचने लगते थे ।
बार – बार – भगत के सिर पर से कमली बार – बार खिसक जाता था ।प्रेम – मंडली – बालगोबिन के प्रेमी – मंडली उनके गायन में साथ देता था ।
धीरे – धीरे – धीरे – धीरे लोग वहाँ आ गये ।
गंगा – स्नान – गंगा – स्नान से पुण्य होता है ।
संगीत – साधना — बालगोबिन भगत की संगीत – साधना निर्मल थी ।

2 . इस पाठ में आए दस क्रिया – विशेषण छाँटकर लिखिए ।

उत्तर -.( i)दो – टुक बात करना ।
( ii ) चहक उठना ।
( iii ) खाम – खाह झगड़ा ।
( iv ) चमक उठना ।
( v ) बच्चे का उछलना ।
( vi ) धीरे – धीरे स्वर ।
( vii ) खेलते बच्चे ।
( viii ) गंगा स्नान ।
( ix ) डिमक – डिमक बजना

गतिविधि-

1. किसी खास प्रयोजन / खास मौसम पर गाए जाने वाले गीत को ढूंढिए एवं कक्ष में सुनाइए ।

उत्तर – छात्र स्वयं करें ।

2. इस पाठ में आषाढ़ , भादो , कातिक , फागुन एवं माघ विक्रम संवत कैलेंडर के मासों के नाम हैं । शेष बचे मासों के नाम लिखिए ।

उत्तर – चैत , वैशाख , जेठ , सावन , आश्विन , अगहन , पूस । ।।

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