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10 class physics notes | प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन

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10 class physics notes | प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन

                                              क्रियाकलाप 16.1
प्रश्न 1. कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के विनियमन के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक
का पता लगाइए।
उत्तर-क्योटो प्रोटोकॉल में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के नियमन के लिए अंतर्राष्ट्रीय
मानकों की चर्चा की गई है। वातावरण में होने वाले परिवर्तनों से संबंधित यह सम्मेलन संयुक्त
राष्ट्र संघ की देख-रेख में आयोजित किया गया था। इस समझौते के तहत औद्योगिक राष्ट्रों को
1990 में अपने कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य हरित गैस उत्सर्जन के स्तर में 5.2% की कमी
लाने के लिए कहा गया है। ऑस्ट्रेलिया एवं आइसलैंड के लिए क्रमशः 8% तथा 10% के राष्ट्रीय
लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
स्पष्टतः क्योटो प्रोटोकॉल के अधिकतर उपबंध विकसित देशों पर लागू होते हैं।
ये समझौते जापान के क्योटो शहर में दिसंबर 1997 में हुआ तथा 16 फरवरी 2005 को
इसे लागू किया गया। दिसंबर, 2006 तक 169 देशों तथा सरकारी प्रतिष्ठानों ने इस समझौते का
अनुमोदन कर था। हालाँकि अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ अपवाद भी हैं। चीन एवं
भारत जैसे देश जिन्होंने इसका अनुमोदन कर दिया है, उन्हें वर्तमान समझौते के तहत अपने CO2 उत्सर्जन की मात्रा में कोई कटौती नहीं करनी होगी।
प्रश्न 2. इस विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए कि हम इन मानकों को प्राप्त करने
हेतु क्या कर सकते हैं?
उत्तर-संदूषण मानव मात्र के लिए एक सबसे बड़ी समस्या के रूप में उभर कर सामने
आ रही है। यह मानव के अस्तित्व के लिए खतरा बने इससे पहले इससे निबटने की आवश्यकता
है। किंतु यह जन सामान्य की सहभागिता के बिना संभव नहीं है। हम CO2 के उत्सर्जन को कई
तरीकों से रोक सकते हैं। जैसे-किसी वाहन के इस्तेमाल की जगह पैदल चलना या साइकिल का
उपयोग करना, लालबत्ती पर वाहनों के इंजन को बंद रखना, बल्ब की जगह कम खपत वाली
ट्यूब लाईट का उपयोग करना, लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करना, जाड़े के दिनों में
गर्म रखने वाले उपकरणों का कम उपयोग करना, आदि ये उपाय ऊर्जा व्यय को निश्चित रूप
से कम करेंगे तथा अंतत: इसका प्रभाव ऊर्जा गृहों द्वारा उत्सर्जित होने वाले CO2 की मात्रा पर
पड़ेगा। लोगों को CO2 के आधिक्य मात्रा से होने वाले समस्याओं से अधिक संख्या में उनकी
सहभागिता सुनिश्चित की जा सके।
                                               क्रियाकलाप 16.2
प्रश्न 1. ऐसे अनेक संगठन हैं जो पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने में लगे हैं।
वे ऐसे क्रियाकलापा का भी प्रोत्साहन करते हैं जिससे हमारे पर्यावरण एवं प्राकृतिक संरक्षण
को बढ़ावा मिलता है। अपने आसपास के क्षेत्र/शहर/कस्बे/गाँव में कार्य करने वाले संगठनों
के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर-दिल्ली में ऐसे कई संगठन हैं जो हमारे पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण
के लिए कार्य कर रहे हैं। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-
(i) विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (CSE)
(ii) भारतीय वन्य जीवन ट्रस्ट (WTI)
(iii) विकास विकल्प
(iv) कल्पवृक्ष
(v) सृष्टि
(vi) ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (TERI)
(vii) वातावरण
(viii) इंडिया हैबिटैट सेन्टर (IHC)
प्रश्न 2. पता लगाइए कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आप क्या योगदान दे
सकते हैं?
उत्तर-तीन “R” अर्थात् Reduce (कम करना), Recycle (पुनः चक्रण) तथा Reuse
(पुनः उपयोग) पर कार्य की शुरुआत करके हम इस समस्या को प्रभावी रूप से कम करने
अपना योगदान दे सकते हैं। विद्युत, जल, कोयला, पेट्रोलियम आदि की बचत करके भी इस
समस्या को कम किया जा सकता है। नई वस्तुओं के निर्माण के लिए उपलब्ध संसाधनों का दोहन करने की जगह (प्लास्टिक, कागज, काँच तथा धातुओं से बनी वस्तुओं का पुनः चक्रण तथा पुनः उपयोग भी इस समस्या से निपटने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।
                                      क्रियाकलाप 16.3
प्रश्न 1. सार्व सूचक (Universe indicator) की सहायता से अपने घर में आपूर्त पानी
का pH ज्ञात कीजिए।
उत्तर-सार्व सूचक (Universe indicator) द्वारा pH ज्ञात करना-युनिवर्सल इंडीकेटर
एक pH इंडीकेटर है जो pH के विभिन्न परासों वाले विलयनों में रखे जाने पर विभिन्न रंग प्रदर्शित करता है।
पानी के कुछ नमूने अलग-अलग परखनलियों में लिए जाते हैं। इन परखनलियों में ड्रॉपर
की सहायता से युनिवर्सल इंडीकेटर की कुछ बूंँदें डाली जाती हैं। परखनली में रखे पानी के रंग
में आया परिवर्तन, उनके pH की जानकारी देता है।
रंग तथा निष्कर्ष
लाल-अत्यधिक अम्लीय
नारंगी/पीला-अम्लीय
हरा-उदासीन
नीला-भस्मीय/क्षारीय
बैंगनी-अत्यधिक भस्मीय/क्षारीय
लिटमस पत्र द्वारा pH ज्ञात करना-पानी के कुछ नमूने अलग-अलग बीकरों में लिये जाते
हैं तथा इनमें लिटमस कागज डाला जाता है। पत्र के रंग में आने वाले परिवर्तनों से नमूनों की
प्रकृति ज्ञात की जा सकती है। यदि रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो वह नमूना उदासीन है
अर्थात् उसका pH 7 है।
रंग तथा निष्कर्ष-
• लाल-अत्यधिक अम्लीय
• नारंगी-अम्लीय
• नीली-भस्मीय/क्षारीय
• बैंगनी- अत्यधिक भस्मीय/क्षारीय
प्रश्न 2. अपने अड़ोस-पड़ोस के जलाशय (तालाब, झील, नदी, झरने ) का pH भी
ज्ञात कीजिए।
उत्तर-निर्देश-उपरोक्त विधि से इन जलस्रोतों के पानी के PH की भी जांँच की जा सकती है।
प्रश्न 3. क्या अपने प्रेक्षण के आधार पर आप बता सकते हैं कि जल प्रदूषित
अथवा नहीं?
उत्तर-उनके pH के आधार पर यह आसानी से निर्धारित किया जा सकता है कि जल
प्रदूषित है अथवा नहीं। शुद्ध जल उदासीन होता है तथा उसका pH 7 होता है। किंतु यदि जल
प्रदूषित है तो उसका pH7 से कम या अधिक होगा।
                                    क्रियाकलाप 16.4
प्रश्न 1. क्या आप कई वर्षों के बाद किसी गाँव अथवा शहर में गए हैं ? यदि हाँ,
तो क्या पिछली बार की अपेक्षा नए घर एवं सड़कें बन हैं ? आपके विचार में इन्हें
बनाने के लिए आवश्यक वस्तुएँ कहाँ से प्राप्त हुई होंगी ?
उत्तर-हाँ, पिछली बार की अपेक्षा नए घर एवं सड़कें बन गई हैं। मैं सोचता हूँ कि नए
घरों के निर्माण के लिए लकड़ियाँ वनों से लाई गई हैं। प्लाईवुड भी लकड़ियों के संसाधित उत्पाद
हैं जो वनों से प्राप्त होते हैं। ईंटें मिट्टी से बनाई जाती हैं तथा प्रयुक्त स्टील लौह अयस्कों से प्राप्त
किया जाता है।
उसी तरह कोलतार जो सड़कें बनाने में प्रयुक्त होती है, भी खानों से प्राप्त होता है। सीमेंट
विभिन्न अयस्कों तथा पत्थरों, आदि से बनता है। ग्रेनाईट खदानों से प्राप्त होता है।
प्रश्न 2. उन पदार्थों की सूची बनाइए तथा उनके स्रोत का भी पता लगाइए।
उत्तर- पदार्थ                संभावित स्रोत
         लकड़ियाँ                       वन
         प्लाईवुड                         वन
         ईंटें                                मिट्टी
         सीमेंट                           पत्थर, रसायन
         स्टील                             खदान
         पेंट                                रसायन
         कोयला                           खदान
         ग्रेनाईट                            चट्टान
         संगमरमर                         पत्थर
         प्लास्टिक                          रसायन
प्रश्न 3. अपने द्वारा बनाई गई सूची को अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए। क्या
आप ऐसे उपाय सूझा सकते हैं जिनसे इन वस्तुओं के उपयोग में कमी लाई जा सके।
उत्तर-हम निश्चित रूप से इन वस्तुओं के उपयोग में कमी ला सकते हैं। कंक्रीट के बीम
अथवा ऐलुमिनियम या फाइबर से बने खिड़कियों या दरवाजों के उपयोग द्वारा हम लकड़ी के
उपयोग को कम कर सकते हैं।
आजकल राख से बनी ईंटें उपलब्ध हैं जो हल्के होने के साथ-साथ अन्य कई खास गुणों
वाली होती हैं। इनका उपयोग मिट्टी से बनी ईंटों की जगह किया जा सकता है। उसी तरह कोलतार की जगह सीमेंट के उपयोग द्वारा सड़कें बनाई जा सकती हैं। वनों को बचाने के लिए
ईंधन के रूप में लकड़ी का उपयोग कम-से-कम करना चाहिए। CNG या LPG का
उपयोग बढ़ाना चाहिए।
(ii) इमारतों में जहाँ तक संभव हो लकड़ी व प्लाईवुड के स्थान पर लोहे या ऐलुमिनियम
का उपयोग करें।
                                              पाठगत प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. पर्यावरण-मित्र बनने के लिए आप अपनी आदतों में कौन-से परिवर्तन ला
सकते हैं?
उत्तर-हम कई तरीकों से और अधिक पर्यावरण-मित्र बन सकते हैं। जैसे-हम तीन २.
जैसी कहावतों पर काम कर सकते हैं, अर्थात् उपयोग कम करना, पुनः चक्रण तथा पुनः उपयोग। इन कहावतों को अपनी आदतों में शामिल करके हम और अधिक पर्यावरण-मित्र बन सकते हैं।
प्रश्न 2. संसाधनों के दोहन के लिए कम-अवधि के उद्देश्य के परियोजना के क्या
लाभ हो सकते हैं ?
उत्तर-इससे यह लाभ हो सकता है कि बिना किसी उत्तरदायित्व के अधिक-से-अधिक
मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है।
प्रश्न 3. यह लाभ, लंबी अवधि को ध्यान में रखकर बनाई परियोजनाओं के लाभ
से किस प्रकार भिन्न है ?
उत्तर-कम-उद्देश्य में परियोजनाओं का एकमात्र लाभ है कि संसाधनों का अधिक-से-अधिक
दोहन द्वारा हम अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त करते हैं। इन योजनाओं के तहत भावी पीढ़ियों के
लिए हमारा कोई उत्तरदायित्व ध्यान में नहीं होता। दूसरी तरफ, लंबी अवधि की योजनाओं का
उद्देश्य संसाधनों का संपोषित विकास के लिए उपयोग करते हुए, आने वाली पीढ़ियों के उपयोग
के लिए उन्हें सुरक्षित रखना होता है।
प्रश्न 4. क्या आपके विचार में संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए ? संसाध
नों के समान वितरण के विरुद्ध कौन-कौन-सी शक्ति कार्य कर सकती हैं ?
उत्तर-हमारी धरती सभी के लिए उपलब्ध है। सभी प्राणियों का संसाधनों पर समान
अधिकार है। यदि कोई व्यक्ति इन संसाधनों का अत्यधिक उपयोग कर रहा है तो इसका सीधा
मतलब है कि किसी को इसकी कमी झेलनी पड़ रही होगी। फलतः एक संघर्ष शुरू होता है जिससे पर्यावरण का नुकसान पहुंचता है।
किंतु मुट्ठी भर कुछ अमीर और शक्तिशाली लोग हैं जो संसाधनों का समान वितरण नहीं
चाहते। वे इन संसाधनों को अपने लिए लाभ के एक विशाल स्रोत के रूप में देखते हैं।
                                   क्रियाकलाप 16.5
प्रश्न 1. जिन वन उत्पाद का आप प्रयोग करते हैं, उनकी एक सूची बनाइए।
उत्तर-लकड़ी, विभिन्न प्रकार के फल, जड़ी-बूटी, औषधि, बाँस आदि।
प्रश्न 2. आपके विचार में वन के निकट रहने वाला व्यक्ति किन वस्तुओं का उपयोग
करता होगा?
उत्तर-वन के निकट रहने वाला व्यक्ति लकड़ी, फल, जड़ी-बूटी, सूखी पत्तियाँ (ईंधन
के लिए), बाँस, चारा, आदि का उपयोग करता है। इसके अतिरिक्त वे वन का उपयोग मछली
मारने तथा शिकार करने वाले स्थान के रूप में करते हैं। यहाँ वे अपने पशुओं/मवेशियों को
भी चराते हैं।
प्रश्न 3. वन के अंदर रहने वाला व्यक्ति किन वस्तुओं का उपयोग करता होगा ?
उत्तर-वन के अंदर रहने वाला व्यक्ति अपनी प्रत्येक आवश्यकता के लिए धन पर ही निर्भर
करता है। ऊपर (प्रश्न 2) में बताए गए सभी तरह के उपयोग वन के अंदर रहने वाले व्यक्ति
द्वारा होता है।
प्रश्न 4. अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए कि उपरोक्त व्यक्तियों की
आवश्यकता में क्या कोई अंतर है अथवा कोई अंतर नहीं है एवं इनके कारण का भी पता
लगाइए।
उत्तर-शहरों या गाँवों में रहने वाले लोग वन के नजदीक रहने वाले अथवा वन में रहने
वाले लोगों की अपेक्षा वन पर कम निर्भर करते हैं। एक व्यक्ति जो शहर में रहता है उसे विभिन्न
वन उत्पादों जैसे-फल, लकड़ी, जड़ी-बूटी, औषधि आदि की आवश्यकता होती है जबकि वे लोग जो वन के नजदीक या वन के अंदर रहते हैं वे लगभग अपनी प्रत्येक आवश्यकता को पूर्ति
जैसे-भोजन, आवास आदि के लिए पूर्णतया वन पर निर्भर करते हैं। उन्हें जलावन की लकड़ी,
सूखी पत्ती, झोंपड़ी, टोकरी आदि बनाने के लिए बाँस और लकड़ी की आवश्यकता होती है। खेती के औजार, मछली पकड़ने तथा शिकार करने आदि के औजारों के लिए भी वे वन पर ही निर्भर करते हैं। इसके अतिरिक्त उनके पशु तथा मवेशी आदि वहीं चरते हैं अथवा वे वन से ही उनके लिए चारा इकट्ठा करते हैं। इस तरह देखा जा सकता है कि उपरोक्त आवश्यकताओं में अंतर है। इसका मुख्य कारण उनका परिवेश है।
                                      क्रियाकलाप 16.6
प्रश्न 1. किन्हीं दो वन उत्पादों का पता लगाइए जो किसी उद्योग के आधार हैं।
उत्तर-(i) लकड़ी-प्लाईवुड उद्योग के लिए।
(ii) तेंदू पत्ता-बीड़ी उद्योग के लिए।
प्रश्न 2. चर्चा कीजिए कि यह उद्योग लंबे समय तक संपोषित हो सकता है। अथवा
क्या हमें इन उत्पादों की खपत को नियंत्रित करने की आवश्यकता है ?
उत्तर-जिस तरीके से हमारे वन संसाधनों का दोहन हो रहा है, यह निश्चित रूप से कहा
जा सकता है कि उद्योग लंबे समय तक संपोषित नहीं हो सकते हैं। उद्योगों द्वारा वनों का
अविवेकपूर्ण तरीके से दोहन किया जा रहा है, क्योंकि ये इन वनों को केवल माल का स्रोत मानते
हैं। एक क्षेत्र में उनकी आवश्यकता पूरी हो जाने के बाद ये दूसरे क्षेत्र में पहुँच जाते हैं। इन संसाधनों का संपोषित तरीकों से उपयोग करने की जरूरत है किन्तु ऐसा लगता है कि उद्योग इस संकल्पना में विश्वास नहीं करते और यदि संपोषित विकास के उपाय नहीं अपनाए गए तो आने वाले दिनों में मानव सभ्यता के लिए खतरा उत्पन्न हो जाएगा। इस तरह के व्यवहार को तत्काल रोकने की आवश्यकता है। उपलव्य संसाधनों के नित्रित ढंग से उपयोग किए जाने पर बल दिए जाने की आवश्यकता है।
                                     क्रियाकलाप 16.7
निम्न के द्वारा वनों को होने वाली क्षति पर वाद-विवाद कीजिए:
प्रश्न 1. राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटकों के लिए आराम गृह (Rest house) का निर्माण
करना।
उत्तर-वनों में पर्यटकों के लिए बनाए गए आराम गृह कई तरह के क्रियाकलापों के केंद्र
बन जाते हैं जिससे वन की प्राकृतिक शांति तथा पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। दूसरी तरफ पर्यटक वन. का केवल अपनी छुट्टियाँ बिताने वाले एक स्थल के रूप में उपयोग करते हैं। वे वनों को कई तरीकों से नुकसान पहुंचाते हैं जैसे-कूड़ा-करकट फैलाकर।
प्रश्न 2. राष्ट्रीय उद्यानों में पशुओं को चराना।
उत्तर-राष्ट्रीय उद्यानों में पशुओं को चराना, प्राकृतिक भोजन श्रृंखला या वन के जैव
पिरामिड को नुकसान पहुंँचाता है। वनों में रहने वाले दूसरे जीवों से उनका भोजन छिन जाता है।
फलतः संपूर्ण वन का पर्यावरण प्रभावित होता है।
प्रश्न 3. पर्यटकों द्वारा प्लास्टिक बोतल, थैलियों तथा अन्य कचरों को राष्ट्रीय उद्यान
में फेंकना।
उत्तर-पर्यटक प्लास्टिक बोतल या अन्य कूड़ा-कचरा फेंककर प्रदूषण फैलाते हैं जो अंततः
वन के पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंचाते हैं। कूड़े-कचरों के सड़ने से रोगकारक जीवाणु चारों
तरफ फैलाते हैं जो वन के पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं।
                                       पाठगत प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. हमें वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण क्यों करना चाहिए?
उत्तर-वन जैव विविधता के तप्त स्थल हैं। किसी क्षेत्र की जैव विविधता को जानने का
एक तरीका वहाँ पाए जाने वाली प्रजातियों की संख्या है। हालाँकि अनेक प्रकार के जीवों
(बैक्टीरिया, कवक, फर्न, फूल वाले, कीड़े, केंचुआ, पक्षी, सरीसृप आदि) का होना भी महत्त्वपूर्ण
है। संरक्षण का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य विरासत से प्राप्त जैव विविधताओं की सुरक्षा है। प्रयोगों
तथा वस्तुस्थिति के अध्ययन से हमें पता चलता है कि विविधता के नष्ट होने से पारिस्थितिक
स्थायित्व भी नष्ट हो सकता है।
प्रश्न 2. संरक्षण के लिए कुछ उपाय सुझाइए।
उत्तर-वन संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना होगा कि यह पर्यावरण एवं विकास दोनों
के हित में हो। दूसरे शब्दों में जब पर्यावरण अथवा वन संरक्षित किए जाएँ, उनके सुनियोजित
उपयोग का लाभ स्थानीय लोगों को मिलना चाहिए। यह विकेन्द्रीकरण की एक ऐसी व्यवस्था
है जिससे आर्थिक विकास एवं पारिस्थितिक संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
क्रियाकलाप 16.8
प्रश्न 1. महाराष्ट्र के एक गाँव में जल की कमी की दीर्घकालीन समस्या से जूझ रहे
ग्रामीण एक जल मनोरंजन पार्क का घेराव कर लेते हैं। इस पर वाद-विवाद कीजिए कि
क्या यह उपलब्ध जल का समुचित उपयोग है?
उत्तर-यह संसाधन के असमान वितरण का एक सरल उदाहरण है। एक तरफ जहाँ लोगों
को अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जल उपलब्ध नहीं है वहीं दूसरी तरफ
अन्य व्यक्तियों द्वारा अपने मनोरंजन के लिए इसका अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है। यह कुछ ऐसी घटना है जिसे जितनी जल्दी हो सके रोका जाना चाहिए।
                                      क्रियाकलाप 16.9
प्रश्न 1. एक एटलस की सहायता से भारत में वर्षा के पैटर्न का अध्ययन कीजिए।
उत्तर-भारत में सामान्यतः जून के पहले सप्ताह में प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिणी सिरे पर
मानसून के आगमन के साथ वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। इसके बाद यह दो शाखाओं-अरब
सागर शाखा तथा बंगाल की खाड़ी शाखा में बँट जाती है। अरब सागर शाखा 10 जून तक मुंबई
पहुंँच जाती है। बंगाल की खाड़ी भी तेजी से आगे बढ़ती है तथा जून के पहले सप्ताह में असम
पहुँच जाती है। ऊंँची पर्वत श्रृंखलाओं द्वारा मानसूनी हवाओं को पश्चिम की तरफ गंगा के विशाल मैदानों के ऊपर मोड़ दिया जाता है। अरब सागर शाखा सौराष्ट्र-कच्छ तथा भारत के मध्यवर्ती हिस्से में पहुंँच जाती है। अरब सागर शाखा तथा बंगाल की खाड़ी शाखा गंगा के मैदान के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में एक-दूसरे से मिल जाती हैं। दिल्ली को सामान्यतः जून के अंत तक बंगाल की खाड़ी शाखा से वर्षा प्राप्त होती है। जुलाई के पहले सप्ताह तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा तथा पूर्वी राजस्थान में मानसून पहुंच जाता है। मध्य जुलाई तक मानसून हिमाचल प्रदेश तथा शेष भारत में पहुँच जाता है।
मानसून का वापस लौटना अपेक्षाकृत एक धीमी प्रक्रिया है। इसकी शुरुआत सितम्बर के
आरंभ में उत्तर-पूर्वी राज्यों से होती है। मध्य अक्तूबर तक यह प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी आधे
हिस्से से लौट चुका होता है। प्रायद्वीप के दक्षिणी आधे हिस्से से मानूसन बहुत तेजी से लौटता
है। दिसंबर के आरंभ तक पूरे देश से मानसून लगभग लौट चुका होता है।
द्वीपों को पहला मानसून अप्रैल के पहले सप्ताह से लेकर मई के पहले सप्ताह तक प्राप्त होता
है जबकि दिसंबर के पहले सप्ताह से जनवरी के पहले सप्ताह के बीच यहाँ से मानसून वापस लौट चुका होता है। इस समय के अंत तक शेष भारत शीत लहर के प्रभाव में आ चुका होता है।
प्रश्न 2. ऐसे क्षेत्रों की पहचान कीजिए जहाँ पर जल की प्रचुरता है तथा ऐसे क्षेत्रों
की जहाँ इसकी बहुत कमी है ?
उत्तर-भारी वर्षा वाले क्षेत्र (अर्थात्, जहाँ प्रतिवर्ष 200 cm से अधिक वर्षा होती
है)-इनमें महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र, गोआ, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, अरुणाचल
प्रदेश एवं असम शामिल हैं।
हल्की वर्षा वाले क्षेत्र (अर्थात्, जहाँ प्रतिवर्ष 50-100 cm वर्षा होती है)-इनमें ऊपरी
गंगा घाटी, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा एवं पंजाब के कुछ हिस्से, जम्मू एवं कश्मीर, दक्कन का
पठार तथा सिंधु का मैदान शामिल हैं।
शुष्क या अर्द्धशुष्क क्षेत्र (जहाँ प्रतिवर्ष 50 cm से कम वर्षा होती है)-इनमें कश्मीर
का उत्तरी हिस्सा, दक्षिणी पंजाब, हरियाणा का कुछ भाग, पश्चिमी राजस्थान, थार, कच्छ प्रायद्वीप तथा पश्चिमी घाट के वर्षा-छाया क्षेत्र शामिल हैं।
                                         पाठगत प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. अपने निवास क्षेत्र के आस-पास जल संग्रहण की परंपरागत प्रणाली का पता
लगाइए।
उत्तर-जल संग्रहण भारत में पुरानी पद्धति है। राजस्थान में खादिन, बड़े पात्र एवं नाड़ी,
महाराष्ट्र में बंधारस एवं ताल, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में बंधिस, बिहार में आहर तथा
पाइन, हिमाचल प्रदेश में कुल्ह, जम्मू के काँदी क्षेत्र में तालाब तथा तमिलनाडु में एरिस, केरल
में सुरंगम, कर्नाटक में कवा आदि प्राचीन जल संग्रहन तथा जल परिवहन संरचनाएँ आज भी
उपयोग में हैं।
हमारे क्षेत्र, राजस्थान में खादिन, अत्यधिक प्रचलित है। 15वीं सदी में सबसे पहले पश्चिमी
राजस्थान में, जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा डिजाईन की गई यह प्रणाली राज्य के कई हिस्सों में आज भी प्रचलन में है।
खादिन जैसे ‘ढोरा’ भी कहा जाता है, जमीन पर बहते हुए पानी को कृषि में उपयोग करने
के लिए विकसित की गई थी। इसकी प्रमुख विशेषता निचली पहाड़ी की ढलानों के आर-पार
पूर्वी छोर पर बनाए जाने वाला लंबा (100-300 मी.) बाँध है।
इसमें पानी की आधिक्य मात्रा को बाहर निकालने की भी व्यवस्था होती है।
खादिन पद्धति खेतों में बहने वाली वर्षा जल के संग्रहण पर आधारित प्रणाली है। बाद में
जल से तृप्त जमीन का उपयोग विभिन्न फसलों के उत्पादन के लिए किया जाता है।
प्रश्न 2. इस पद्धति की पेय जल व्यवस्था (पर्वतीय क्षेत्रों, मैदानी क्षेत्र अथवा पठार
क्षेत्र में) से तुलना कीजिए।
उत्तर-पहाड़ी क्षेत्रों में जल संभर प्रबंधन, मैदानी क्षेत्रों से पूर्ण रूप से भिन्न होता है।
जैसे-हिमाचल प्रदेश में, इसके कुछ हिस्सों में आज से करीब चार सौ. वर्ष पहले, नहर सिंचाई
की एक स्थानीय प्रणाली विकसित की गई जिसे कुल्ह कहा जाता था। नदियों में बहने वाले जल
को मानव निर्मित छोटी-छोटी नालियों द्वारा पहाड़ी के नीचे के गाँवों तक पहुंचाया जाता था। इन
कुल्हों में बहने वाले पानी का प्रबंधन गाँवों के लोग आपसी सहमति से करते थे। यह जानना बड़ा रोचक होगा कि कृषि के मौसम में जल सबसे पहले दूरस्थ गाँव को दिया जाता था फिर उत्तरोत्तर ऊंँचाई पर स्थित गाँव उस जल का उपयोग करते थे। कुल्ह की देख-रेख एवं प्रबंध के लिए
दो-तीन लोग रखें जाते थे, जिन्हें गाँव वाले वेतन देते थे। सिंचाई के अतिरिक्त इस कुल्ह से जल
का भूमि में अंतःसवण भी होता रहता था जो विभिन्न स्थानों पर झरने को भी जल प्रदान करता
रहता था।
प्रश्न 3. अपने क्षेत्र में जल के स्रोत का पता लगाइए। क्या इस स्रोत से प्राप्त जल उस
क्षेत्र के सभी निवासियों को उपलब्ध है ?
उत्तर-हमारे क्षेत्र के जल के मुख्य स्रोत भूमिगत जल तथा नगर-निगम द्वारा आपूर्ति जल
हैं। कभी-कभी खासकर गर्मी के दिनों में इन स्रोतों से प्राप्त होने वाले जल में कुछ कमी आ जाती
है तथा इनकी समान उपलब्धता भी संभव नहीं होती।
                                     क्रियाकलाप 16.10
प्रश्न-कोयले का उपयोग ताप-बिजलीघरों में एवं पेट्रोलियम उत्पाद जैसे कि डीजल
एवं पेट्रोल यातायात के विभिन साधनों-मोटरवाहन, जलयान एवं वायुयान में प्रयोग किया
जाता है। आज के युग में विद्युत साधित्रों एवं यातायात में विद्युत के प्रयोग के बिना जीवन
की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अतः क्या आप कुछ ऐसी युक्ति सोच सकते हैं जिससे
कोयला एवं पेट्रोलियम के उपयोग को कम किया जा सके ?
उत्तर-अधिकतर ताप विद्युत गृह में कोयले का उपयोग किया जाता है। अतः विद्युत को
बचाकर हम कोयले की बचत कर सकते हैं। ऐसे कई तरीके हैं जिनके द्वारा हम विद्युत की बचत
कर सकते हैं। जैसे-अनावश्यक पंखों एवं बल्बों को बंद करके, बल्ब की जगह ट्यूबलाइटों का
प्रयोग करके, लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करके।
इसी तरह पेट्रोलियम के उत्पादों की बचत के लिए हमें छोटी दूरियों के लिए वाहनों का
उपयोग करने की जगह या तो पैदल चलना चाहिए या फिर साइकिल का उपयोग करना चाहिए।
रेडलाइट पर गाड़ी का इंजन बंद कर देनी चाहिए, भोजन पकाने के लिए कूकर का उपयोग करना चाहिए तथा गाड़ियों के पहियों में हवा का दबाव सही रखना चाहिए।
                                 क्रियाकलाप 16.11
प्रश्न-आपने वाहनों से निकलने वाली गैसों के यूरो-I एवं यूरो-II मानक के विषय
में तो अवश्य ही सुना होगा। पता लगाइए कि ये मानक वायु प्रदूषण कम करने में किस
प्रकार सहायक हैं?
उत्तर-यूरो मानक से तात्पर्य यूरोप में पेट्रोल एवं डीजल वाहनों को मान्यता प्राप्त उत्सर्जन
स्तर से है। इन मानकों के अनुसार वाहन निर्माताओं को अपने वाहन के इंजन के डिजाईन में इस
तरह का सुधार लाना होता है कि प्रदूषक उत्सर्जन का स्तर वर्तमान स्तर से कभ हो। यूरो-1 के
तहत CO का उत्सर्जन स्तर 2.75 ग्रा./किमी. है तथा यूरो-II में यह स्तर 2.20 ग्रा./किमी. है।
इन् मानकों को लागू करके प्रदूषण स्तर में काफी कमी लाई गई है।
                                       अभ्यास
प्रश्न 1. अपने घर को पर्यावरण-मित्र बनाने के लिए आप उसमें कौन-कौन-से
परिवर्तन सुझा सकते हैं.?
उत्तर-तीन ‘R’ अर्थात् कर्म करना, पुनः चक्रण तथा पुनः उपयोग, को लागू करके हम
पर्यावरण को प्रभावी ढंग से सुरक्षित रख सकते हैं।
कम करने का अर्थ है कि कम-से-कम वस्तुओं का प्रयोग करना। हम बिजली के पंखे
एवं बल्ब का स्विच बंद करके विद्युत का अपव्यय रोक सकते हैं। हम टपकने वाले नल की मरम्मत कराकर जल की बचत कर सकते हैं। हमें अपने भोजन को फेंकना नहीं चाहिए।
पुनः चक्रण का अर्थ है प्लास्टिक, काँच, धातु की वस्तुएँ तथा ऐसे ही पदार्थों के पुनः चक्रण
द्वारा दूसरी उपयोगी वस्तुओं के निर्माण में प्रयोग जब तक आवश्यक न हो हमें इनका नया
उत्पाद/संश्लेषण नहीं करना चाहिए।
पुनः उपयोग का अर्थ है किसी वस्तु का बार-बार उपयोग करना। उदाहरण के लिए प्रयुक्त
लिफाफों को फेंकने की जगह इसका हम फिर से उपयोग कर सकते हैं।
प्रश्न 2. क्या आप अपने विद्यालय में कुछ परिवर्तन सुझा सकते हैं जिनसे इसे
पर्यानुकूलित बनाया जा सके।
उत्तर-जैसा कि पहले प्रश्न के उत्तर में चर्चा की गई है कि हम तीन ‘R’ को लागू कर
अपने विद्यालय को भी पर्यानुकूलित बना सकते हैं।
प्रश्न 3. इस अध्याय में हमने देखा कि जब हम वन एवं वन्य जंतुओं की बात करते
हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। इनमें से किसे वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने
के अधिकार दिए जा सकते हैं ? आप ऐसा क्यों सोचते हैं ?
उत्तर-इन चार दावेदारों जैसे, वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले लोगों, सरकार का
वन विभाग, उद्योगपति तथा वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी में मेरे विचार में उत्पादों के हेतु
निर्णय लेने के अधिकार दिये जाने के लिए स्थानीय लोग सर्वाधिक उपयुक्त हैं। क्योंकि स्थानीय
लोग वन का संपोषित तरीके से उपयोग करते हैं। सदियों से ये स्थानीय लोग इन वनों का उपयोग
करते आ रहे हैं साथ ही इन्होंने ऐसी पद्धतियों का भी विकास किया है जिससे संपोषण होता आ
रहा है तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए उत्पाद बचे रहेंगे। इसके अतिरिक्त गड़रियों द्वारा वनों
के पारंपरिक उपयोग ने वन के पर्यावरण संतुलन को भी सुनिश्चित किया है।
दूसरी तरफ वनों के प्रबंधन से स्थानीय लोगों को दूर रखने का हानिकारक प्रभाव वन की
क्षति के रूप में सामने आ सकता है। वास्तव में वन संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना होगा
कि यह पर्यावरण एवं विकास दोनों के हित में हो तथा नियंत्रित दोहन का फायदा स्थानीय लोगों
को प्राप्त हो।
प्रश्न 4. अकेले व्यक्ति के रूप में आप निम्न के प्रबंधन में क्या योगदान दे सकते
हैं ? (a) वन एवं वन्य जन्तु (b) जल संसाधन (c) कोयला एवं पेट्रोलियम ?
उत्तर-(a) वन एवं वन्य जन्तु-स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना वनों का प्रबंधन
संभव नहीं है। इसका एक सुंदर उदाहरण अराबारी वन क्षेत्र है जहाँ एक बड़े क्षेत्र में वनों का
पुनर्भरण संभव हो सका। अतः, मैं लोगों की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करना चाहूँगा। मैं
संपोषित तरीके से संसाधन के समान वितरण पर जोर देना चाहूँगा ताकि इसका फायदा सिर्फ मुट्ठी भर अमीर एवं शक्तिशाली लोगों को ही प्राप्त न हो।
(b) जल संसाधन-अपने दैनिक जीवन में हम जाने-अनजाने पानी की एक बहुत मात्रा का
अपव्यय करते हैं जिसे निश्चित रूप से रोका जाना चाहिए। मैं यह सुनिश्चित करना चाहूँगा कि
मुझमें ऐसी आदतों का विकास हो जिसके द्वारा पानी बचाना संभव हो सके। इसके अतिरिक्त जल संभर तकनीकी की सहायता से भी जल को संरक्षित किया जा सकता है।
(C) कोयला एवं पेट्रोलियम-वर्तमान में ये ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं। इन्हें हम कई तरीकों
से बचा सकते हैं। उदाहरण के लिए-
(i) ट्यूबलाईट का उपयोग करके।
(ii) अनावश्यक बल्ब तथा पंखों का स्विच बंद करके।
(iii) सौर उपकरणों का उपयोग करको
(iv) वाहनों की जगह पैदल अथवा साईकिल द्वारा छोटी दूरियाँ तय करके।
(v) यदि हम वाहन का प्रयोग करते हैं, तो जब हम रेड लाइट पर रुकते हैं तो हमें अपने
वाहन के इंजन को बंद कर देना चाहिए।
(vi) लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करके।
(vii) वाहनों के टायरों में हवा का उपयुक्त दवाव रखकर।
प्रश्न 5. अकेले व्यक्ति के रूप में आप विभिन्न प्राकृतिक उत्पादों की खपत कम
करने के लिए क्या कर सकते हैं ?
उत्तर-विभिन्न प्राकृतिक उत्पादों की खपत निम्नलिखित तरीकों से कम की जा सकती है-
(i) अनावश्यक बल्ब तथा पंखे बंद करके हम बिजली की बचत कर सकते हैं।
(ii) बल्ब की जगह हम ट्यूबलाईट का उपयोग कर सकते हैं।
(iii) लिफ्ट की जगह सीढ़ी का इस्तेमाल करके हम बिजली की बचत कर सकते हैं।
(iv) छोटी दूरियाँ तय करने के लिए हम वाहनों की जगह पैदल अथवा साइकिल का उपयोग
करके पेट्रोल की बचत कर सकते हैं।
(v) जब गाड़ियाँ रेड लाईट पर खड़ी होती हैं तो उनका इंजन बंद करके हम पेट्रोल की
बचत कर सकते हैं।
(vi) टपकने वाले नलों की मरम्मत कराकर हम पानी की बचत कर सकते हैं।
(vii) हम खाने को व्यर्थ में न फेंककर भोजन की बचत कर सकते हैं।
प्रश्न 6. निम्न से संबंधित ऐसे पाँच कार्य लिखिए जो आपने पिछले एक सप्ताह में
किए हैं-
(a) अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों का दबाव को और बढ़ाया है।
 उत्तर-(a) अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण-
(i) अनावश्यक पंखे एवं बल्ब को बंद करके हमने बिजली बचाई।
(ii) वाहन की जगह पैदल चलकर हमने पेट्रोल बचाया।
(iii) हमने टपकने वाले नल की मरम्मत कराकर पानी बचाया।
(iv) हमने लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल कर बिजली बचाई।
(v) हमने चटनियों के खाली बोतल का उपयोग मसाले रखने के लिए किया।
(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को और बढ़ाया है-
(i) दाढ़ी बनाते समय हमने पानी का अपव्यय किया है।
(ii) मैं सो गया किंतु टेलीविजन चलता रहा।
(iii) कमरे को गर्म रखने के लिए बिजली उपकरणों का उपयोग किया।
(iv) ट्यूबलाईट की जगह बल्ब का उपयोग किया।
(v) अपना भोजन फेंका।
प्रश्न 7. इस अध्याय में उठाई गई समस्याओं के आधार पर आप अपनी जीवन-शैली
में क्या परिवर्तन लाना चाहेंगे जिससे हमारे संसाधनों के संपोषण को प्रोत्साहन मिल सके ?
उत्तर-हम अपनी जीवन शैली में तीन ‘Rs’ की संकल्पना को लागू करना चाहेंगे। ये तीन
‘Rs’ हैं-कम करना, पुनः चक्रण, पुन: उपयोग। ये हमें संसाधनों के संपोषित उपयोग में हमारी
मदद करते हैं।
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