10th hindi

राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा जो नर दुःख में दुःख नहिं मानै

राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा जो नर दुःख में दुःख नहिं मानै

राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा जो नर दुःख में दुःख नहिं मानै

class – 10

subject – hindi

lesson 1

राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा,
जो नर दुःख में दुःख नहिं मानै ।
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-गुरुनानक
कविता का सारांश
―――――–――――
प्रथम पद में गुरु नानक कहते हैं कि एक राम-नाम के जाप के बिना जगत में जन्म व्यर्थ है। कठोर बातें करना, अखाद्य खाना और ईश्वर का नाम न लेना, इस जगत् में व्यर्थ जीवन व्यतीत करना है। पुस्तकें पढ़ना, व्याकरण का ज्ञान सब उलझ-उलझ कर करना है यदि गुरु ने ज्ञान नहीं
दिया। डंड-कमंडल, शिखा, जनेऊ और तीर्थ-यात्राएँ किसी काम की नहीं। राम नाम के जिनः शांति नहीं मिलती। जटा बढ़ाना, नंगे रहना, भभूत रमाना और धरती पर सोना कोई जीना नहीं है। गुरू प्रसाद से ही मुक्ति मिलती है। इस ‘हरिरस’ को नानक ने घोल कर पी लिया है।
दूसरे पद में गुरु नानक कहते हैं कि मनुष्य वही है जो सुख-दुख को एक समान मानता है। जिसके मन में किसी का भय नहीं है, जो सोना को मिट्टी समझता है, जिसे न स्तुति की इच्छ: हो, न निंदा की चिंता, जो मोह-लोभ, हर्ष-शोक से मुक्त हो और जिसके हृदय में राम का वास
है। जिस पर गुरु की कृपा होती है वही यह तथ्य जानता है। नानक इसी ईश्वर में लीन है जैसे पानी में पानी समा जाता है।
सरलार्थ
―――――
निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक गुरुनानक निर्गुण भक्तिधारा के प्रखर कवि हैं । पंजावी समिश्रित ब्रजभाषा इनकी रचना का मूलाधार है । कबीर की तरह इनकी रचनाएँ भले ही न हों फिर भी धर्म-उपासना, कर्मकाण्ड आदि के स्थान पर प्रेम की पीर की अनुभूति स्पष्ट झलकती है।
पहले पद में कवि ने बाहरी वेश-भूषा, पूजा-पाठ और कर्मकाण्ड के स्थान पर सरल हृदय से राम-नाम की कीर्तन पर बल दिया है । वस्तुतः कवि ने दशरथ पुत्र राम की स्तुति न कर परम ब्रह्म उस सत्य की उपासना करने पर बल दिया है जो अगोचर और निराकारी है। नाम कीर्तन ही इस भवसागर से मुक्ति दिलाती है। जिसने जन्म लेकर राम की कीर्तन नहीं की है, उसका जीवन निरर्थक है । उसका खान-पान, रहन-सहन आदि विष से परिपूर्ण होता है । संध्या, जप-पाठ आदि करने से मुक्ति नहीं मिलती है । जटा बढ़ाकर ‘भस्म लगाने’, तीर्थाटन करने से आध्यात्मिक
सुख की प्राप्ति नहीं होती है । गुरु कृपा और राम नाम ही जीवन की सार्थकता है
दूसरे पद में कवि ने सुख-दुख में एक समान उदासीन रहते हुएं मानसिक दुर्गुणों से ऊपर उठकर अंत:करण की निर्मलता हासिल करने पर जोर दिया है । ईर्ष्या, लोभ, मोह आदि से परिपूर्ण मानव के पास ईश्वर फटकता तक नहीं है। जिस प्रकार पानी-पानी के साथ मिलकर अपना स्वरूप
उसी में अर्पण कर देता है। उसी प्रकार गुरु की कृपा पाकर मनुष्य ईश्वर-रूपी स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।

पद्यांश पर आधारित अर्थ ग्रहण-संबंधी प्रश्न
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1. राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा।
बिखु खावै बिख बोलै बिनु नावै निहफलु मटि भ्रमना।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-गुरु नानक ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा ।

(iii) किसके बिना यह जीवन व्यर्थ है?
उत्तर-राम नाम के बिना यह जीवन व्यर्थ है। अत: राम का नाम सदैव लेना चाहिए।

(iv) मनुष्य क्या खाता है और क्या बोलता है?
उत्तर-मनुष्य विष-ही खाता है और विष-भाषण भी करता है। अर्थात् मनुष्य का जीवन जहर से भरा हुआ है। ईर्ष्यायुक्त तथा वैमनस्य युक्त

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर-प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित काव्य-पाठ-‘राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा, से ली गयी है। इन पंक्तियों द्वारा कवि मनुष्य जाति को संदेश देते हुए कहता है कि इस संसार में राम के नाम के बिना जनम व्यर्थ है। इस जन्म का सार्थक मोल नहीं। मनुष्य का लक्षण बन गया है-बिष-पान करना, विष-भाषण करना और बिना नाम के बेकार बनकर मतिभ्रम की तरह जिधर-तिधर भटकना। इन पंक्तियों में राम नाम की महिमा का गुणगान है।
2. पुसतक पाठ व्याकरण बखाण संधिआ करम निकाल करै।
बिनु गुरसबद मुकति कहा प्राणी राम नाम बिनु अरुझि मरै॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-गुरु नानक ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा ।

(iii) व्याकरण किसकी व्याख्या करता है?
उत्तर-व्याकरण नामक पुस्तक संधि-कर्म की व्याख्या करती है।

(iv) किसके बिना मुक्ति असंभव है?
उत्तर-बिना गुरु शब्द के मुक्ति असंभव है यानी गुरु का महत्त्व मनुष्य के जीवन में सदैव बना रहेगा। गुरु बिना सत्य-मार्ग का ज्ञान असंभव है।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर-प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्यपुस्तक के “राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा” काव्य पाठ से ली गयी है। इन काव्य-पंक्तियों का प्रसंग मानव जीवन से जुड़ा हुआ है। कवि कहता है कियाकरण की किताब संधि-कर्म की जिस प्रकार व्याख्या करती है ठीक वैसा ही गुरु का काम राम नाम की महिमा का ज्ञान बिना गुरु के असंभव है। गुरु द्वारा ही शब्द-ज्ञान मिलता है। बिना जान के मुक्ति असंभव है। बिना ज्ञान के राम नाम की महिमा से हम दूर रह जाते हैं, अनभिज्ञ रह जाते हैं। इस प्रकार व्याकरण और गुरु दोनों का कार्य-व्यापार समान है। जिस प्रकार व्याकरण संधि-कर्म की व्याख्या कर हमें पाठ-ज्ञान कराता है, ठीक उसी प्रकार सिद्ध गुरु द्वारा ही राम नाम के महत्त्व का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। इस मायावी संसार से बिना गुरु शब्द के मुक्ति असंभव है।

3. डंड कमंडल सिखा सूत धोती तीरथ गवनु अति भ्रमनु करे।
राम नाम बिनु सांति न आवै जपि हरि हरि नाम सु पारि परै॥

(i) उपर्युदा पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर–गुरु नानक ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा ।

(iii) मनुष्य क्या लेकर भरमता/भटकता रहता हैं?
उत्तर-मनुष्य डंड कमंडल, शिखा, सूत, धोती, तीरथ के झूठे चक्कर में पड़कर जीवन भर भटकता रहता है और उसे मुक्ति नहीं मिलती।

(iv) किस नाम के बिना शांति नहीं?
उत्तर-राम नाम के बिना इस जीवन में शांति पाना असंभव है। राम ही शांति, मर्यादा और उदात्त व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक है।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें ।
उत्तर-प्रस्तुत पंक्तियाँ (कविता) हमारी पाठ्यपुस्तक के राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा’ नामक काव्य पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग मानव जीवन में व्याप्त पाखंड है।
कवि कहता है कि मनुष्य बाहरी आडम्बरों के फेरे में पड़कर भटक रहा है। उसे सत्य का ज्ञान ही नहीं। वह डंड, कमंडल, शिखा, सूत, धोती, तीरथ आदि के साथ सारा जीवन भरमता रहता है यानी भटकता रहता है। वह सत्य मार्ग से दूर चला जाता है।
राम नाम के बिना शांति कैसे मिले? बिना हरिनाम के स्मरण के इस भवसागर से मुक्ति मिल सकती है क्या? यहाँ सांसारिक आडंबरों के बीच जी रहे मानव की मूर्खता के विषय में कवि ध्यान दिलाता है। वह बताता है कि इस मायावी संसार से मुक्ति तभी मिलेगी जब हम सही रूप
में, सच्चे मन से हरि स्मरण करेंगे। यहाँ गूढ़ भाव यह है कि मानव जीवन सत्य पर आधारित होना चाहिए। मनुष्य को पाखंड से दूर रहकर निर्मल मन और भाव से प्रभु-पूजा करनी चाहिए।

4. जटा मुकुट तन भसम लगाई, वसन छोड़ि तन नगन भया।
जेते जीअ जंत जल-थल महीअल जत्र तत्र तू सरब जीआ
गुरु परसादी राखिले जन कोउ हरिरस नानक झोलि पीआ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-गुरु नानक ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा ।

(iii) मनुष्य किस प्रकार के आडंबर में जीता है?
उत्तर-मनुष्य सिर पर मुकुट पहन लेता है, शरीर में राख का लेपन कर लेता है। जटा बढ़ा लेता है और नंगे रूप में बिना वस्त्र के जीता है। यह उसका बाहरी आडंबर से युक्त जीवन है।

(iv) गुरु नानक ने किस रस का पान किया है?
उत्तर-गुरु नानक ने हरि रस की झोली यानी रस, शर्बत पिया है। कहने का भाव यह है कि तन में, मन में, वचन में हरि नाम ही परिव्याप्त है।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर-प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘रामनाम बिनु बिरथे जगि जनमा’ काव्य पाठ से ली गयी है। इन पंक्तियों का संबंध मनुष्य के जीवन में व्याप्त अनेक तरह की विसंगतियों से है।
कवि कहता है कि मनुष्य जटा बढ़ा लेता है तन में राख पोत लेता है और मुकुट धारण कर लेता है। सारे वस्त्रों का परित्याग कर आधुनिक युग में नग्न रहने लगा है। जिस प्रकार इस जल-थल पर जंतु जीते हैं ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी सर्वत्र जीता है, विचरण करता है। लेकिन
अंत में गुरु नानक जी कहते हैं कि ऐ मनुष्यों-गुरु का प्रसाद ग्रहण कर लो। गुरु नानक ने तो हरि रस की झोलि यानी रस, शर्बत पी ही लिया है।
इन पंक्तियों में कवि के कहने का भाव यह है कि बिना ईश्वर के साथ लगातार संबंध बनाये, आस्था रखे, इस जीवन का कल्याण नहीं, मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। आडंबर में जीने पर मुक्ति पाना असंभव है। आडंबर से दूर रहकर निर्मल भाव से ईश्वर की साधना कर ही हम मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।
जो नर दुःख…….
――–――――――–
5. जो नर दुख में दुख नहिं मान।
सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जाने।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-गुरु नानक ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धव हैं ?
उत्तर-जो नर दुख में दुख नहिं मानै ।

(iii) गुरु नानक की दृष्टि में सही मनुष्य/सच्चा नर कौन है?
उत्तर-गुरु नानक की दृष्टि में सच्चा नर या सही मनुष्य वही है जो दुख में जीते हुए भी दुख से ऊपर उठकर जीए। कहने का आशय यह है कि निर्लिप्त भाव से जीवन जीए।

(iv) सच्चे मनुष्य की क्या पहचान है?
उत्तर-सुख, सनेह और भय के बीच भी जो निर्भय होकर, विकाररहित शुद्ध भाव से जीए वही सच्चा मनुष्य है। जो सोना को भी माटी समझे, यानी जो लोभ-मोह से मुक्त होकर समभाव से जीवन जीए वही, सच्चा मानव है।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर-प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “जो नर दुख में दुख नहिं मान” नामक काव्य-पाठ से ली गयी है।
इन पंक्तियों का प्रसंग मानव-जीवन में आए दुख से है।
कवि कहता है कि वही मनुष्य सही मनुष्य है जो अपने जीवन में आए दुःख से नहीं घबराए, उसे दु:ख नहीं माने बल्कि धैर्य के साथ उसका सामना करे। वही मनुष्य सच्चा मानव है जो निर्लिप्त भाव से जीवन जीये। सुख, सनेह और भय तीनों स्थितियों में जो विकाररहित और निर्भय होकर
रहे, जो सोना को भी माटी समझे, वही सच्चा इन्सान है। वही ईश्वर के निकट है। वह मायावी जगत से दूर है। ऐसे मनुष्य से ही इस धरा का कल्याण संभव है। इन पंक्तियों में गुरु नानक ने भौतिक दुनिया की मोह-माया से मुक्त होकर जीनेवाले नर की प्रशंसा की है।

6. नहिं निंदा नहिं अस्तुति जाके, लोभ मोह अभिमाना।
हरष सोक तें रहै नियारो, नाहि मान अपमाना॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-गुरु नानक ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-जो नर दुख में दुख नहिं मानै ।

(iii) गुरू नानक ने सच्चे मानव के कौन-कौन-से गुण बताये हैं?
उत्तर-जो मनुष्य निंदा और स्तुति के बीच तटस्थ भाव रखे, लोभ, मोह, अभिमान से मुक्त जीवन जीए, हर्ष-शोक के बीच प्रज्ञावान बना रहे, मान-अपमान से मुक्त होकर कुंठारहित जीवन जीऐ वही सही मानव है, वही सच्चा महामानव है।

(iv) मान-अपमान की कौन परवाह नहीं करता है?
उत्तर-जो सच्चे महापुरुष होते हैं, जो इस मायावी संसार में रहकर भी उत्तम विचार रखते हैं, मान-अपमान की जो परवाह नहीं करते वे ही सच्चे महामानव हैं। लोक देवता हैं।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर-प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “जो नर दुख में दुख नहिं मान” नामक काव्य-पाठ से ली गयी है।
इन पंक्तियों का प्रसंग मनुष्य के सद्विचारों से जुड़ा हुआ है।
कवि कहता है कि जो मनुष्य निंदा और स्तुति के बीच समभाव से जीता है, जो लोभ, मोह, अभिमान से मुक्त है, हर्ष और शोक के निकट रहकर भी जो अशोक के रूप में जीए, जिसे मान-अपमान की चिंता नहीं हो, वह सच्चा मानव है, महामानव है। इन काव्य पंक्तियों में गुरु नानक
ने महामानव के लक्षणों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। उन्होंने इस मायावी लोक में निर्लिप्त भाव से जीनेवाले कर्मवीरों की प्रशंसा की है। उनके गुणों को बताया है।

7. आसा मनसा सकल त्यागि कै जग तें रहै निरासा।
काम क्रोध जेहि परसे नाहिन तेहिं घट ब्रह्म निवासा।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-गुरु नानक ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-जो नर दुख में दुख नहिं मानै ।

(iii) किस मनुष्य के घर में ब्रह्म निवास करते हैं?
उत्तर-आशा-निराशा के बीच तटस्थ भाव से जो जीये, सांसारिकता के भँवर जाल से जो मुक्त रहे, काम-क्रोध से दूर रहे, उसी नर में ब्रह्म का वास होता है। यानी वह ईश्वर के निकट है।

(iv) कैसे मनुष्य को काम-क्रोध स्पर्श नहीं कर पाते हैं?
उत्तर- जो मनुष्य सांसारिकता से मुक्त होकर जीवन जीता है, उसे काम-क्रोध स्पर्श नहीं कर सकते यानी उनका प्रभाव नहीं पड़ता है।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें।
उत्तर-प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “जो नर दुख में दुख नहिं मानें” काव्य-पाठ से ली गयी हैं।
इन पंक्तियों का प्रसंग मनुष्य के सात्विक जीवन से जुड़ा हुआ है।
कवि कहता है कि वही मनुष्य महामानव है, जो मानसिक विकारों से दूर रहे, जिसने आकांक्षाओं पर विजय प्राप्त कर लिया हो, जिसने सन्मार्ग, ग्रहण कर लिया है, इस जग से जिसे कोई मोह-माया नहीं, जो आशा और निराशा के बीच महाप्रज्ञ के रूप में जीये वही लोकोत्तर महामानव है। काम-क्रोध जिसे स्पर्श नहीं कर सका हो उसी के घर में, कंठ में ब्रह्म निवास करता है। कहने का गूढभाव यह है कि सांसारिकता से जो मुक्त होकर जीवन जीता है वही ब्रह्म के निकट है, ईश्वर के निकट है, उसी का जीवन सार्थक है।

8. गुरु किरपा जेति नर पै कीन्हीं तिन्ह यह जुगति पिछानी।
नानक लीन भयो गोबिन्द सो ज्यों पानी सँग पानी।

(i), उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-गुरु नानक ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-जो नर दुख में दुख नहिं मानै ।

(iii) गुरु नानक किसमें लीन हो जाते हैं? वे किस प्रकार लीन होने की व्याख्या करते हैं?
उत्तर-जैसे पानी में पानी को मिलाने पर कोई रूप, रंग, आकार में अंतर नहीं दिखता ठीक उसी प्रकार गुरु नानक भी ईश्वर में लीन होकर एक हो गए हैं। कहने का भाव यह है कि किसी भी प्रकार के विकार अब शेष नहीं रह गए हैं। नर का नारायण में मिलना उसके स्वरूप में अन्तर्निहित हो जाने से है। गुरुनानक ने स्वयं को ईश्वरत्व के रूप में ढाल लिया है।

(iv) गुरु नानक किसकी कृपा की महत्ता का वर्णन करते हैं?
उत्तर-गुरु नानक गुरु-कृपा की महत्ता का वर्णन करते हैं। बिना गुरु-ज्ञान के मोक्ष असंभव है। इससे रहित होकर ईश्वर का ज्ञान, सत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें ।
उत्तर-प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठयपुस्तक के “जो नर दुख में दुख नहिं मानै ” नामक काव्य-पाठ से ली गयी हैं।
इन पंक्तियों का प्रसंग गुरु-कृपा के महत्त्व से जुड़ा हुआ है।
कवि कहता है कि जिस मनुष्य पर गुरु-कृपा हो जाती है, उसे जुगति की क्या जरूरत है। उसे किसी प्रकार के उपाय करने, यत्न करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। गुरु नानक पर गुरु की कृपा का ही प्रभाव है कि वे गोविन्द यानी ईश्वर का साक्षात्कार प्राप्त कर सके। जिस प्रकार पानी में पानी को मिलाने पर कोई विकार नहीं दिखता बल्कि दोनों एकात्म रूप में दिखते हैं। दोनों एक समान ही दिखते हैं ठीक उसी प्रकार आत्मा-परमात्मा का भी मिलन होता है। दोनों में रूप या रंग का अंतर नहीं होता है। दोनों मिलकर एकाकार, एक रंग, एक रूप को प्राप्त कर लेते हैं।
इन काव्य पंक्तियों में गुरु महिमा, ईश्वर भक्ति और आत्मा-परमात्मा के रूपाकार पर सूक्ष्म प्रकाश डाला गया है।
बोध और अभ्यास
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*कविता के साथ :
प्रश्न 1. कवि किसके बिना जगत् में यह जन्म व्यर्थ मानता है ?
उत्तर-कवि राम-नाम के बिना जगत में यह जन्म व्यर्थ मानता है । राम नाम के बिना व्यतीत होनेवाला जीवन केवल विष का भोग करना है।

प्रश्न 2. वाणी कब विष के समान हो जाती है?
उत्तर-जब वाणी बाह्य आडंबर से सम्पन्न होकर राम-नाम को त्याग देती है तब वह विष हो जाती है । राम-नाम के अतिरिक्त उच्चरित ध्वनि काम-क्रोध, मद्-लोभ आदि से परिपूर्ण होती है।

प्रश्न 3. नाम-कीर्तन के आगे कवि किन कर्मों की व्यर्थता सिद्ध करता है?
उत्तर-नाम-कीर्तन के आगे कवि संध्या, वेदपाठ, कमंडल और शिखा, जनेऊ आदि कार्यों को निरर्थक मानता है । जटा बढ़ाने और भस्म लगाने से मुक्ति नहीं मिलती है। इस संसारिक जीवन में केवल राम-नाम का जाप ही एक ऐसा साधन है जिससे भवसागर पार किया जा सकता है।

प्रश्न 4. प्रथम पद के आधार पर बताएँ कि कवि ने अपने युग में धर्म साधना के कैसे-कैसे रूप देखे थे ?
उत्तर-कवि ने अपने युग में बाह्य आडम्बरों से परिपूर्ण जगत को देखा है। लोग पूजा-पाठ, तीर्थ आदि करने पर विशेष बल देते थे । जीवन आन्तरिक दुख और कलह से परिपूर्ण था। इसे ही वे अपना जीवन का आधार बनाकर शांति की खोज में इधर-उधर भटकते थे।

प्रश्न 5. हरिरस से कवि का अभिप्राय क्या है?
उत्तर-हरिरस से अभिप्राय गुरु-कृपा और ईश्वर रसास्वादन से है जिसने अपने जीवन को राम-नाम में सराबोर कर दिया उसने इस भवसागर से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर लिया।

प्रश्न 6. कवि की दृष्टि में ब्रह्म का निवास कहाँ है ?
उत्तर-कवि की दृष्टि में ईश्वर का वास, ईर्ष्या, क्रोध, काम आदि से रहित मानव के हृदय में है।

प्रश्न 7. गुरु की कृपा से किस युक्ति की पहचान हो पाती है ?
उत्तर-गुरु की कृपा से ईश्वर से एकाकार होने की युक्ति मिलती है । जिस तरह पानी-पानी के साथ मिलकर अपने अस्तित्व को अर्पण कर देता है। उसी प्रकार मानव भी ईश्वर के परमपद को प्राप्त कर अपने जीवन को उसी में समर्पण कर देता है।

प्रश्न 8. व्याख्या करें
(क) राम-नाम बिनु अरुझि मरै ।
(ख) कंचन माटी जाने ।
(ग) हरष सोक तें रहै नियारो, नहि मान अपमाना ।
(घ) नानक लीन भयो गोविंद सो, ज्यों पानी संग पानी ।
उत्तर-(क) प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने जीवन की प्रासांगिकता पर विशेष बल दिया है । बाह्य आडम्बर में लगा हुआ मानव सांसारिक सुख की लिप्सा करता है ईश्वर से विरक्त होकर वह ईर्ष्या, क्रोध, मद से युक्त होकर संसार का अंधकूप बना रहता है । जीवन अबूझ पहेली है। अतः, जीवन की सार्थकता राम-नाम के जाप में है।

(ख) प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि ने सांसारिक गतिविधियों पर कुठाराघात किया है। ईश्वर-भक्ति के बिना जीवन शून्य है । बाह्य-आडम्बर में स्थित वह कंचन को मिट्टी समझने लगता है । आध्यात्मिक सुख को छोड़कर वह सांसारिक वैभव की खोज में इधर-उधर भटकने लगता है

(ग) प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि ने सांसारिक जीवन से दूर एक नई पहचान बनाने पर बल दिया है । ईश्वर के चरणों में समर्पित रहनेवाला सांसारिक हर्ष, शोक, मान, अपमान आदि जैसी गतिविधियों पर ध्यान नहीं देता है । राम-नाम ही उसका, जीवन है और ईश्वर स्तुति ही उसके जीवन की पराकाष्ठा है।

(घ) प्रस्तुत पंक्ति के द्वारा कवि ने राम-नाम के माध्यम से परम तत्त्व पाने की महत्ता पर बल दिया है । परमात्मा में लीन होनेवाला सांसारिक जीवन से दूर रहता है । गुरु कृपा पाकर वह गोविन्द से एकाकार प्राप्त कर लेता है ।

प्रश्न 9. आधुनिक जीवन में उपासना के प्रचलित रूपों को देखते हुए नानक के इन पदों की क्या प्रासंगिकता है ? अपने शब्दों में विचार प्रस्तुत करें।
उत्तर-वर्तमान परिवेश में रहन-सहन, खान-पान आदि के साथ-साथ उपासना, पूजा-पाठ में भी काफी बदलाव आ गया है । इस भौतिकवादी युग में सांसारिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए लोग तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं । ईश्वर की भक्ति सहज मन से नहीं, दिखावे के रूप में की जाती हैं। पूजा-पाठ, तीर्थ पर बल दिया जाने लगा है। इनपर अधिक-से-अधिक खर्च किये जाते हैं ताकि ये कार्य अच्छे ढंग से सम्पन्न हो जाएँ। ऐसी आम धारणा अधिक देखने को मिल रही है। नानक के पद आज की भक्ति भावना पर व्यंग्य हैं। नानक ने पूजा-पाठ, कर्मकांड, तीर्थ आदि के स्थान पर सच्चे हृदय से राम-नाम के कीर्तन पर बल दिया है

भाषा की बात
प्रश्न 1. गुरुनानक के इन पदों से मिलते-जुलते कबीर के पद एकत्रित करें
उत्तर-बिरथे―व्यर्थ
गुरुसबद―गुरु का आदेश
माटी―मिट्टी
बिखु―विष
करम―कर्म
सरब―सब कुछ
नियारो―अलग,पृथक
निहफलु―निष्फल
महितल―धरती पर
जुगाती― उपाय
मति– बुद्धि
तीरथभगवनु– तीर्थ पर जाना

प्रश्न 2. दोनों पदों में प्रयुक्त सर्वनामों को चिह्नित करें और उनके भेद बताएँ।
उत्तर-कहाँ : प्रश्नवाचक सर्वनाम
कोई : अनिश्चयवाचक सर्वनाम
तें : पुरुषवाचक सर्वनाम
यह : निश्चयवाचक सर्वनाम
सो : संबंधवाचक सर्वनाम

प्रश्न 3. निम्नलिखित शब्दों का वाक्य-प्रयोग करते हुए लिंग निर्णय करें।
उत्तर-जग : जग बड़ा है।
मुक्ति : उसे मुक्ति मिल गई।
धोती : धोती नई है।
जल : जल गंदा है।
भस्म : भस्म लग गई।
कंचन : कंचन महँगा है।
जुगति : उसकी जुगति अंगुठी चुराने की है।
स्तुति : ईश्वर की स्तुति करनी चाहिए ।

प्रश्न 4. निम्नलिखित विशेषणों का स्वतंत्र वाक्य प्रयोग करें।
उत्तर-व्यर्थ : राम के बिना जीवन व्यर्थ है।
निष्फल : प्रयोग निष्फल हो गया ।
नग्न : वह नग्न बैठा है
सर्व : सर्व नष्ट हो गया ।
न्यारा: संसार न्यारा है।
सकल : आतंकवाद पर सकल विश्व एक हो ।

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