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William Harvey Biography in Hindi – विलियम हार्वे की जीवनी

William Harvey Biography in Hindi – विलियम हार्वे की जीवनी

William Harvey Biography in Hindi

विलियम हार्वे का जन्म 1 अप्रैल 1578 को इंग्लैंड के फोकस्टोन में हुआ था. वह एक धनी परिवार में पैदा हुए थे. उनके पिता थॉमस हार्वे एक सफल व्यवसायी थे, जो मेकस्टोन के मेयर थे. उनकी मां जोएन हॉक ने नौ बच्चों को जन्म दिया जिनमें से विलियम सबसे बड़े थे. विलियम हार्वे ने अपनी शिक्षा की शुरुआत फोकस्टोन के एक छोटे से प्राथमिक विद्यालय में की.

किंग्स ग्रामर स्कूल में पढ़ने के दौरान वे अपने चाचा के घर में रहते थे और अपने स्कूल का अधिकांश समय क्लासिक्स सीखने में व्यतीत करते थे. अकादमिक और कानूनी कार्यों के लिए पूरे यूरोप में लैटिन भाषा आवश्यक थी. विलियम हार्वे ने एलिजाबेथ ब्राउन से शादी की, जो प्रमुख चिकित्सक लैंसलॉट ब्राउन की बेटी थी. इन्हें कोई भी संतान नहीं थी.

विलियम हार्वे शरीर में रक्त के संचार का सही वर्णन करने वाले पहले व्यक्ति थे. उन्होंने बताया कि धमनियां और नसें एक पूर्ण सर्किट बनाती हैं. यह सर्किट दिल से शुरू होता है और दिल तक वापस जाता है. दिल के नियमित संकुचन से पूरे शरीर में रक्त का प्रवाह होता है.

वर्ष 1593 में 15 वर्ष की आयु में युवा हार्वे ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एक मेडिकल छात्र के रूप में दाखिला लिया.

उन्होंने अपनी जीवन लागत और शिक्षण शुल्क का भुगतान करने के लिए छह वर्षों के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त की. छात्रवृत्ति के अंतिम दो वर्षों में, उन्होंने फ्रांस, जर्मनी और इटली के विश्वविद्यालयों में कुछ समय बिताया, विज्ञान और चिकित्सा के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त की.

वर्ष 1599 में 21 वर्ष की आयु में विलियम हार्वे ने पडुआ विश्वविद्यालय इटली में दाखिला लिया. जो अपने चिकित्सा और शरीर रचना पाठ्यक्रमों के लिए प्रशंसित था. (दिलचस्प बात यह है कि जब हार्वे पडुआ पहुंचे, तो गैलीलियो को गणित, भौतिकी और खगोल विज्ञान पढ़ाते हुए सात साल हो चुके थे.)

पडुआ विश्वविद्यालय में हार्वे पर सबसे अधिक प्रभाव उनके शिक्षक हिरेमोनस फैब्रिअस का था. जो एक कुशल शारीरिक रचनाकार और सर्जन थे. दोनों दोस्त बन गए और हार्वे ने फैब्रिकियस से सीखा कि विच्छेदन ने मानव शरीर की बेहतर समझ के लिए मार्ग की पेशकश की. फैब्रिअस ने 1574 में मानव नसों में वाल्व की खोज की थी, हालांकि उन्होंने 1603 तक अपनी खोज प्रकाशित नहीं किया था.

विलियम हार्वे का कैरियर – William Harvey Life History

उनकी प्रवृत्ति जीवित पशु पर शल्य-क्रिया (Operation) करने की थी। वह पशुओं के वक्ष स्थल खोलकर उसके स्पंदन-क्रिया (Flutter-action) का प्रतिपादन किया करते। उन्होंने देखा की हृदय गति करता है और अगले ही क्षण में गतिविहीन हो जाता है, और यह गति और आगति दोनों, इसी क्रम में निरंतर आवृति करती चलती है। उन्होंने जीवित प्राणी के हृदय को हाथ में थामा और अनुभव किया की हृदय एक क्षण कठोर हो जाता है दूसरे ही क्षण कोमलता ग्रहण कर लेता है। जब हृदय में यह कठोरता आती है तो वह आकृति में छोटा हो जाता हैं, और शिथिलता की दशा में उसकी आकृति कुछ बढ़ जाती है। दोनों अवस्था में उसका रंग एक सा नहीं रहता – जब वह सख्त और सुकुड़ा हुआ होता है, तब निस्बतन कुछ ज्यादा पीला होता है।

अनेक प्राणियों में अनेकानेक परीक्षण करके विलियम हार्वे इस परिणाम पर पहुंचे कि हमारा हृदय एक खोखली पेशी की शक्ल का है, और पेशी में जब सक्रियता आती है, कुछ बल आता है तब उसके अंदर का यह रिक्त-स्थान सिकुड़न शुरू कर देता है और खून को बाहर फेंकना शुरु कर देता है और, इसी कारण, उसने कुछ पीलापन आ जाता है। यही पेशी जब शिथिल होती है, उसमें वह तनाव नहीं होता उसकी आंतरिक रिक्तता में बाहर से खून भर जाता है और इसी कारण इसमें कुछ लाली भी आ जाती है। यह हमारा दिल इस प्रकार से एक पंप ही है।

इस मूल्य स्थापना को प्रतिष्ठित करके हार्वे ने अब शरीर में रक्त-संचार की प्रक्रिया का अध्ययन शुरू कर दिया। उसने देखा कि रक्त की धमनिया स्पंदित हो उठती है उस क्षण जब हृदय सिकुड़ रहा होता है। यदि एक सुई चुभो दी जाए तो उनसे खून का एक फवारा-सा छूटने और बंद होने लगेगा। यही नहीं, इन धमनियों को शरीर के विभिन्न स्थानों पर अवरुद्ध करते हुए, वे इस परिणाम पर पहुंचे की स्पंदन की यह प्रक्रिया उनकी कोई अपनी प्रक्रिया नहीं हैं, अपितु सर्वथा हृदय की गति पर ही निर्भर करती है।

अब उनकी रुचि इस प्रश्न के समाधान में जाग उठी की रक्त (Blood) का कितना परिणाम इन धमनियों के माध्यम से शरीर में पहुंचता है। यह अनुमान करके की प्रत्येक स्पंदन में हृदय से 2 औंस रक्त का गमनागमन होता है, और 1 मिनट में वह 72 स्पंदन करता है, बड़ी जल्दी ही उन्होंने यह गणना कर ली की हृदय एक मिनट में एक गैलेन से ज्यादा या शायद दिन में 1500 गैलेन से ज्यादा खून जिस्म में पम्प करता है।

हार्वे के मन में यह सवाल उठा कि यह हो कैसे सकता है, और अपने प्रश्न का उत्तर देते हुए वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ऐसा तभी संभव है जब कि रक्त का प्रवाह हृदय से ही आरंभ हो और, सारे शरीर से घुम कर फिर से हृदय में ही वापस लौट आए, अर्थात रक्त-संचार का एक ‘परिक्रमा का मार्ग’ होना चाहिए। हार्वे ने शरीर-रचना की पुन: परीक्षा की, और कुछ परिक्षण और भी किए। शिराओं और धमनियों का, नीली और लाल नसों का, बड़ी सूक्षमता के साथ अध्ययन किया और उन्होंने पाया कि उनमें खून के बहने की दिशा हमेशा एक ही रहती है। दोनों में ही एक तरह का कुछ volvo कि-सी शक्ल का, एकाधिकार द्वारा, पर्दा-सा लगा होता हैं जो धमनियों में तो रक्त को हृदय से बाहर ही प्रवाहित होने देता है, और शिराओ में हृदय की ओर ही।

इन एकमुखी द्वारों की उपयोगिता भी उन्होंने पशुओं के हृदय पर परीक्षण करके प्रत्यक्ष प्रमाणित कर दी। एक शिरा को खोलकर उसमें उन्होंने लंबी पतली-सी एक सलाख डाल दी। यह सलाख बड़े आराम के साथ दिल की ओर तो चलती गई किंतु विपरीत दिशा में उसकी यह गति एकदम अवरुद्ध हो गई, क्योंकि,-  बीच में volvo ने जैसे अपने दरवाजे बंद कर लिए थे। फिर परिक्षण किए गए और फिर परीक्षण किए गए कि कहीं कुछ गलती रह गई हो। और तब कहीं जाकर, रक्त के संचार का सही चित्र उपस्थित हो सका की हृदय से निकलकर, धमनियों के मार्ग से प्रवृत्ति होता हुआ और शिराओं के मार्ग से प्रत्यावृत्त हुआ, खून फिर से दिल में ही वापस आ जाता है।

उन्होंने इस बात का पता लगाया की रक्त ह्रदय से फेफड़ों में जाता है, जहाँ यह शुद्ध होकर वापस ह्रदय में आता है। शरीर में रक्त-संचार का प्रथम अवशेषण 78 पृष्ट का एक निबंध के रूप में 1628 में प्रकाशित हुआ। शीर्षक था ‘On Motion of Heart and Blood in Animals’ इसके द्वारा यह विज्ञान के क्षेत्र के एक बड़े बद्धमूल अंधविश्वास को उखाड़ फेंकने में सफल रहे थे। इसके बाद से प्राणियों के शरीर कार्यों के संबंध में हमारा ज्ञान बहुत ही अधिक स्थिरता के साथ निरंतर आगे ही आगे बढ़ता आया है।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार एक अरब डाक्टर इब्न-अल-नफीस (Ibne-Al-Naffis , 1205-1288) ने भी यही खोज पहले ही कर ली थी। परन्तु इसका श्रेय विलियम हार्वे को ही जाता है। हार्वे 1628 में, राजा जेम्स प्रथम और उनके उत्तराधिकारी राजा चार्ल्स प्रथम के चिकित्सक नियुक्त हुए। हार्वे को गुस्सा बहुत जल्दी आता था और वह हमेशा एक खंजर रखते थे। 1628 में उन्हें नाइट की उपाधि मिली।

रक्त का परिसंचरण (William Harvey Inventions)

हार्वे ने अपने शौध के दौरान चिकित्सा पाठ्य पुस्तकों के पारंपरिक ज्ञान को अनदेखा किया. अपनी टिप्पणियों को बनाने और अपने निष्कर्षों को बनाने के लिए प्राथमिकता दी.

1628 में 50 वर्ष की आयु में हार्वे ने अपनी कृति प्रकाशित की. जिसे आमतौर पर डी मोटो कॉर्डिस – द मोशन ऑफ द हार्ट कहा जाता है. अंग्रेजी में इसका पूरा शीर्षक है: एनाटोमिकल स्टडीज ऑन द मोशन ऑफ द हार्ट एंड ब्लड इन एनिमल्स. डी मोटो कॉर्डिस हार्वे दिल के कार्य और शरीर के चारों ओर रक्त के संचलन का सही वर्णन करने वाले पहले व्यक्ति बने.

हार्वे का ज्ञान उन टिप्पणियों से आया जो उन्होंने जीवित जानवरों की नसों और धमनियों के माध्यम से बहने वाले रक्त से बनायीं थीं.

हार्वे ने आखिरकार कुछ गलतियां नही की. जो गैलेन ने इतने साल पहले की थी. फिर भी गैलेन के शौध और उनकी कुछ शिक्षाएँ उपयोगी थीं. एक समय पर गैलेन को रोम से भागना पड़ा क्योंकि उनके तरीकों से रोम के क्वैक चिकित्सकों के करियर को खतरा था.

1651 में 73 वर्ष की आयु में हार्वे ने चिकित्सकों के कॉलेज को एक नया पुस्तकालय बनाने की अनुमति देने के लिए गुमनाम रूप से धन दान किया. जब दान दाता की पहचान ज्ञात हुई और कॉलेज ने हार्वे के सम्मान में एक प्रतिमा का निर्माण किया गया.

विलियम हार्वे मृत्यु (William Harvey Death)

हार्वे का निधन 79 वर्ष की आयु में 3 जून 1657 को अपने एक भाई के घर पर हुआ. मृत्यु का कारण संभवतः मस्तिष्क रक्तस्राव था. विलियम हार्वे की कब्र हेम्पस्टीड गाँव में, एसेक्स के इंग्लिश काउंटी में हैं.

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