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Meera Bai Biography in Hindi | मीरा बाई की जीवनी

Meera Bai Biography in Hindi | मीरा बाई की जीवनी

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Meera Bai Biography in Hindi

मीराबाई भगवान कृष्ण की भक्त थी और मीराबाई को प्रेमभक्ति का अग्रणी प्रतिपादक कहा जाता है

हरि तुम हरो जन की भीर।

द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढायो चीर॥

भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप शरीर।

हिरणकश्यपु मार दीन्हों, धरयो नाहिंन धीर॥

बूडते गजराज राखे, कियो बाहर नीर।

दासि ‘मीरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।

वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥

जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।

खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥

सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।

‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥

पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे।

मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।

लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥

विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे।

‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥

मीराबाई (1498 – 1547) एक राजपूत राजकुमारी थी जो उत्तरी भारत के राजस्थान राज्य में रहती थी | मीराबाई भगवान कृष्ण की भक्त थी और मीराबाई को प्रेमभक्ति का अग्रणी प्रतिपादक कहा जाता है| उन्होंने कृष्ण की प्रशंशा में व्रज भाषा और  राजस्थानी भाषा में भजन गाये थे |

मीरा बाई का जन्म 1504 ईस्वी में राजस्थान के मेड़ता जिले के चौकरी गाँव में हुआ था |मीराबाई  के पिता रतन सिंह. जोधपुर के संस्थापक राव जोधा जी राठोड़ के वंशज, राव दुदा के पुत्र थे | मीरा बाई को उनके दादाजी ने पाल पोसकर बड़ा किया |शाही परिवारों के रीती रिवाज के अनुसार उनकी शिक्षा में शास्त्रों का ज्ञान , संगीत , तीरंदाजी , तलवारबाजी , घुड़सवारी और रथ चलाना आता था | उन्हें युद्ध की आपदा आने पर अस्र-शस्र चलाना भी सिखाया गया था | हालंकि इन सबके साथ मीराबाई का बचपन कृष्ण चेतना के वातावरण में बिता जिसके कारण उनका जीवन भक्ति की ओर मुड गया |

जीवन परिचय
जन्म-1498
जन्म स्थान-कुड़की {मेड़ता}
पूरा नाम-मीराँ
पति-भोजराज [1516–1521] पिता-राव रत्नसिंह
माता-वीर कुमारी
दादा-राव दूदा
मृत्यु-1557
मृत्यु स्थान-द्वारका

मीराबाई का जन्म, परिवार एवं प्रारंभिक जीवन:-

श्री कृष्ण  की सबसे बड़ी साधक एवं महान अध्यात्मिक कवियत्री मीराबाई जी के जन्म के बारे में कोई भी पुख्ता जानकारी नहीं है, लेकिन कुछ विद्धानों के मुताबिक उनका जन्म 1498 ईसवी में राजस्थान के जोधपुर जिले के बाद कुडकी गांव में रहने वाले एक राजघराने में हुआ था। इनके पिता का नाम रत्नसिंह था, जो कि एक छोटे से राजपूत रियासत के राजा थे।

मीराबाई जी जब बेहद छोटी थी तभी उनके सिर से माता का साया उठ गया था, जिसके बाद उनकी परवरिश उनके दादा राव दूदा जी ने की थी, वे एक धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, जो कि भगवान विष्णु के घोर साधक थे। वहीं मीराबाई पर अपने दादा जी का गहरा असर पड़ा था। मीराबाई बचपन से ही श्री कृष्ण की भक्ति में रंग गई थीं।

जीवनकाल सम्बंधी तथ्य
मीराबाई के जन्म काल तथा जीवन-वृत्त के विषय में बहुत मतभेद हैं। श्यामचंद्र कपूर ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में उल्लेखित किया है-
प्रियादास ने संवत् 1769 वि. में भक्तमाल की टीका ‘भक्तिरस बोधिनी’ में लिखा है कि मीरा की जन्म भूमि मेड़ता थी।
नागरीदास ने लिखा है कि मेड़ता की मीराबाई का विवाह राणा के अनुज से हुआ था।
कर्नल टॉड ने ‘एनलस एण्ड एंटिक्वटीज ऑफ़ राजस्थान’ में मीरा का विवाह राणा कुम्भा से लिखा है।
पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपने उदयपुर राज्य के इतिहास में लिखा है कि महाराणा साँगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज का विवाह मेड़ता के राव वीरमदेव के छोटे भाई रत्नसिंह की पुत्री मीराबाई के साथ संवत् 1573 वि. में हुआ था।
स्मरण रहे कि कर्नल टॉड अथवा उन्हीं के आधार पर जिन विद्वानों ने मीरा को कुम्भा की स्त्री माना है, वे दन्त कथाओं के आधार पर गलती कर गए हैं। सर्वप्रथम विलियम क्रुक ने बताया कि वास्तव में मीराबाई राणा कुम्भा की पत्नी नहीं थीं, वरन् साँगा के पुत्र भोजराज की पत्नी थीं।
पण्डित रामचन्द्र शुक्ल ने अपने इतिहास में लिखा है कि- ‘इनका जन्म संवत् 1573 वि. में केकड़ी नाम के एक गाँव में हुआ था और विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी के साथ हुआ था।’
डॉक्टर गणपतिचन्द्र गुप्त ने इनका जन्म सन् 1498 ई. (संवत् 1555 वि.) के लगभग माना है।

  कृष्ण से लगाव
मीराबाई के बालमन में कृष्ण की ऐसी छवि बसी थी कि यौवन काल से लेकर मृत्यु तक उन्होंने कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना। जोधपुर के राठौड़ रतन सिंह की इकलौती पुत्री मीराबाई का मन बचपन से ही कृष्ण-भक्ति में रम गया था। उनका कृष्ण प्रेम बचपन की एक घटना की वजह से अपने चरम पर पहुँचा था। बाल्यकाल में एक दिन उनके पड़ोस में किसी धनवान व्यक्ति के यहाँ बारात आई थी। सभी स्त्रियाँ छत से खड़ी होकर बारात देख रही थीं। मीराबाई भी बारात देखने के लिए छत पर आ गईं। बारात को देख मीरा ने अपनी माता से पूछा कि “मेरा दूल्हा कौन है?” इस पर मीराबाई की माता ने उपहास में ही भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की तरफ़ इशारा करते हुए कह दिया कि “यही तुम्हारे दूल्हा हैं”। यह बात मीराबाई के बालमन में एक गाँठ की तरह समा गई और अब वे कृष्ण को ही अपना पति समझने लगीं।

विवाह
मीराबाई के अद्वितीय गुणों को देख कर ही मेवाड़ नरेश राणा संग्राम सिंह ने मीराबाई के घर अपने बड़े बेटे भोजराज के लिए विवाह का प्रस्ताव भेजा। यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया और भोजराज के साथ मीरा का विवाह हो गया। इस विवाह के लिए पहले तो मीराबाई ने मना कर दिया था, लेकिन परिवार वालों के अत्यधिक बल देने पर वह तैयार हो गईं। वह फूट-फूट कर रोने लगीं और विदाई के समय श्रीकृष्ण की वही मूर्ति अपने साथ ले गईं, जिसे उनकी माता ने उनका दूल्हा बताया था। मीराबाई ने लज्जा और परंपरा को त्याग कर अनूठे प्रेम और भक्ति का परिचय दिया।

पति की मृत्यु
विवाह के दस वर्ष बाद ही मीराबाई के पति भोजराज का निधन हो गया। सम्भवत: उनके पति की युद्धोपरांत घावों के कारण मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद ससुराल में मीराबाई पर कई अत्याचार किए गए। सन्‌ 1527 ई. में बाबर और सांगा के युद्ध में मीरा के पिता रत्नसिंह मारे गए और लगभग तभी श्वसुर की मृत्यु हुई। सांगा की मृत्यु के पश्चात भोजराज के छोटे भाई रत्नसिंह सिंहासनासीन हुए, अतएव निश्चित है कि अपने श्वसुर के जीवनकाल में ही मीरा विधवा हो गई थीं। सन्‌ 1531 ई. में राणा रत्नसिंह की मृत्यु हुई और उनके सौतेले भाई विक्रमादित्य राणा बने।
?लौकिक प्रेम की अल्प समय में ही इतिश्री होने पर मीरा ने परलौकिक प्रेम को अपनाया और कृष्ण भक्त हो गई। वे सत्संग, साधु-संत-दर्शन और कृष्ण-कीर्तन के आध्यात्मिक प्रवाह में पड़कर संसार को निस्सार समझने लगीं। उन्हें राणा विक्रमादित्य और मंत्री विजयवर्गीय ने अत्यधिक कष्ट दिए। राणा ने अपनी बहन ऊदाबाई को भी मीरा को समझाने के लिए भेजा, पर कोई फल न हुआ। वे कुल मर्यादा को छोड़कर भक्त जीवन अपनाए रहीं। मीरा को स्त्री होने के कारण, चित्तौड़ के राजवंश की कुलवधू होने के कारण तथा अकाल में विधवा हो जाने के कारण अपने समाज तथा वातावरण से जितना विरोध सहना पड़ा उतना कदाचित ही किसी अन्य भक्त को सहना पड़ा हो। उन्होंने अपने काव्य में इस पारिवारिक संघर्ष के आत्मचरित-मूलक उल्लेख कई स्थानों पर किए हैं।
सन्‌ 1533 ई. के आसपास मीरा को ‘राव बीरमदेव’ ने मेड़ता बुला लिया। मीरा के चित्तौड़ त्याग के पश्चात सन्‌ 1534 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। विक्रमादित्य मारे गए तथा तेरह सहस्र महिलाओं ने जौहर किया। सन्‌ 1538 ई. में जोधपुर के राव मालदेव ने बीरमदेव से मेड़ता छीन लिया। वे भागकर अजमेर चले गए और मीरा ब्रज की तीर्थ यात्रा पर चल पड़ीं। सन्‌ 1539 ई. में मीरा वृंदावन में रूप गोस्वामी से मिलीं। वे कुछ काल तक वहां रहकर सन्‌ 1546 ई. के पूर्व ही कभी द्वारिका चली गईं। उन्हें निर्गुण पंथी संतों और योगियों के सत्संग से ईश्वर भक्ति, संसार की अनित्यता तथा विरक्ति का अनुभव हुआ था। तत्कालीन समाज में मीराबाई को एक विद्रोहिणी माना गया। उनके धार्मिक क्रिया-कलाप राजपूत राजकुमारी और विधवा के लिए स्थापित नियमों के अनुकूल नहीं थे। वह अपना अधिकांश समय कृष्ण को समर्पित मंदिर में और भारत भर से आये साधुओं व तीर्थ यात्रियों से मिलने तथा भक्ति पदों की रचना करने में व्यतीत करती थीं।

मीराबाई की कृष्ण भक्ति को देख ससुरालियों ने रची थी उन्हें मारने की साजिश:

श्री कृष्ण भक्ति की वजह से मीराबाई जी के अपने ससुराल वालों से रिश्ते दिन पर दिन खराब होते जा रहे थे और फिर ससुराल वालों ने जब देखा कि किसी तरह भी मीराबाई की कृष्ण भक्ति कम नहीं हो रही है, तब उन्होंने कई बार विष देकर मीराबाई को जान से मारने की कोशिश भी की, लेकिन वे श्री कृष्ण भक्त का बाल भी बांका नहीं कर सके।

  • मीराबाई को दिया जहर का प्याला:

बड़े साहित्यकारों और विद्धानों की माने तो एक बार हिन्दी साहित्य की महान कवियित्री मीराबाई के ससुराल वालों ने जब उनके लिए जहर का प्याला भेजा, तब मीराबाई ने श्री कृष्ण को जहर के प्याले का भोग लगाया और उसे खुद भी ग्रहण किया, ऐसा कहा जाता है कि, मीराबाई की अटूट भक्ति और निश्छल प्रेम के चलते विष का प्याला भी अमृत में बदल गया।

  • मारने के लिए फूलों को टोकरी में भेजा सांप:

प्रख्यात संत मीराबाई की हत्या करने के पीछे एक और किवंदित यह भी प्रचलित है कि, जिसके मुताबिक एक बार मीराबाई के ससुराल वालों ने  उन्हें मारने के लिए फूलों की टोकरी में एक सांप रख कर मीरा के पास भेजा था, लेकिन जैसे ही मीरा ने टोकरी खोली, सांप फूलों की माला में परिवर्तित हो गया।

  • राणा विक्रम सिंह ने भेजी कांटों की सेज:

श्री कृ्ष्ण की दीवानी मीराबाई को मारने की कोशिश में एक अन्य किवंदति के मुताबिक एक बार राणा विक्रम सिंह ने उन्हें मारने के लिए कांटो की सेज (बिस्तर) भेजा, लेकिन, ऐसा कहा जाता है कि, उनके द्धारा भेजा गया कांटो का सेज भी फूलों के बिस्तर में बदल गया।

श्री कृष्ण की अनन्य प्रेमिका और कठोर साधक मीराबाई की हत्या के सारे प्रयास विफल होने के पीछे लोगों का यह मानना है कि, भगवान श्री कृष्ण अपनी परम भक्त की खुद आकर सुरक्षा करते थे, कई बार तो श्री कृष्ण ने उन्हें साक्षात दर्शन भी दिए थे।

 द्वारिका में वास
इन सब कुचक्रों से पीड़ित होकर मीराबाई अंतत: मेवाड़ छोड़कर मेड़ता आ गईं, लेकिन यहाँ भी उनका स्वछंद व्यवहार स्वीकार नहीं किया गया। अब वे तीर्थयात्रा पर निकल पड़ीं और अंतत: द्वारिका में बस गईं। वे मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्ण भक्तों के सामने कृष्ण की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं। सन्‌ 1543 ई. के पश्चात मीरा द्वारिका में रणछोड़ की मूर्ति के सन्मुख नृत्य-कीर्तन करने लगीं। सन्‌ 1546 ई. में चित्तौड़ से कतिपय ब्राह्मण उन्हें बुलाने के लिए द्वारिका भेजे गए। कहते हैं कि मीरा रणछोड़ से आज्ञा लेने गईं और उन्हीं में अंतर्धान हो गईं। जान पड़ता है कि ब्राह्मणों ने अपनी मर्यादा बचाने के लिए यह कथा गढ़ी थी। सन्‌ 1554 ई. में मीरा के नाम से चित्तौड़ के मंदिर में गिरिधरलाल की मूर्ति स्थापित हुई। यह मीरा का स्मारक और उनके इष्टदेव का मंदिर दोनों था।
गुजरात में मीरा की पर्याप्त प्रसिद्धि हुई। हित हरिवंश तथा हरिराम व्यास जैसे वैष्णव भी उनके प्रति श्रद्धा भाव व्यक्त करने लगे।

मीरा बाई और अकबर

भक्तिशाखा की महान संत और कवियित्री मीराबाई जी के कृष्ण भक्ति के लिए उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। श्री कृष्ण की प्रेम रस में डूबकर मीराबाई जी द्धारा रचित पद, कवतिाएं और भजनों को समस्त उत्तर भारत में गाया जाने लगा। वहीं जब मीराबाई जी का श्री कृष्ण के प्रति अद्भुत प्रेम और उनके साथ हुई चमत्कारिक घटनाओं की भनक मुगल सम्राट अकबर को लगी, तब उसके अंदर भी मीराबाई जी से मिलने की इच्छा जागृत हुई।

दरअसल, अकबर ऐसा मुस्लिम मुगल शासक था, जो कि हर धर्म के बारे में जानने के लिए उत्साहित रहता था, हालांकि मुगलों की मीराबाई के परिवार से आपसी रंजिश थी, जिसके चलते मुगल सम्राट अकबर का श्री कृष्ण की अनन्य प्रेमिका मीराबाई से मिलना मुश्किल था।

लेकिन मुगल सम्राट अकबर, मीराबाई के भक्ति भावों से इतना अधिक प्रेरित था, कि वह भिखारी के वेश में उनसे मिलने गया और इस दौरान अकबर ने मीराबाई के श्री कृष्ण के प्रेम रस में डूब भावपूर्ण भजन, कीर्तन सुने, जिसे सुनकर वह मंत्रमुग्ध हो गया और मीराबाई को एक बेशकीमती हार उपहार स्वरुप दिया।

वहीं कुछ विद्धानों की माने तो मुगल सम्राट अकबर की मीराबाई से मिलने की खबर मेवाड़ में आग की तरह फैल गई, जिसके बाद राजा भोजराज ने मीराबाई को नदी में डूबकर आत्महत्या करने का आदेश दे डाला।

जिसके बाद मीराबाई ने अपने पति के आदेश का पालन करते हुए नदी की तरफ प्रस्थान किया, कहा जाता है कि जब मीराबाई नदी में डूबने जा रही थी, तब उन्हें श्री कृष्णा साक्षात् दर्शन हुए, जिन्होंने न सिर्फ उनके प्राणों की रक्षा की, बल्कि उन्हें राजमहल छोड़कर वृन्दावन आकर भक्ति करने के लिए कहा, जिसके बाद मीराबाई, अपने कुछ भक्तों के साथ श्री कृष्ण की तपोभूमि वृन्दावन चली गईं और अपने जीवन का ज्यादातर समय वहीं बिताया।

जीव गोस्वामी से भेंट
एक प्रचलित कथा के अनुसार मीराबाई वृंदावन में भक्त शिरोमणी जीव गोस्वामी के दर्शन के लिये गईं। गोस्वामी जी सच्चे साधु होने के कारण स्त्रियों को देखना भी अनुचित समझते थे। उन्होंने मीराबाई से मिलने से मना कर दिया और अन्दर से ही कहला भेजा कि- “हम स्त्रियों से नहीं मिलते”। इस पर मीराबाई का उत्तर बडा मार्मिक था। उन्होंने कहा कि “वृंदावन में श्रीकृष्ण ही एक पुरुष हैं, यहाँ आकर जाना कि उनका एक और प्रतिद्वन्द्वी पैदा हो गया है”। मीराबाई का ऐसा मधुर और मार्मिक उत्तर सुन कर जीव गोस्वामी नंगे पैर बाहर निकल आए और बडे प्रेम से उनसे मिले। ?इस कथा का उल्लेख सर्वप्रथम प्रियादास के कवित्तों में मिलता है-

‘वृन्दावन आई जीव गुसाई जू सो मिल झिली, तिया मुख देखबे का पन लै छुटायौ।

महान कवियत्री मीराबाई और उनके गुरु रविदास जी

श्री कृष्ण भक्ति शाखा की महान कवियत्री मीराबाई और उनके गुरु रविदास जी की मुलाकात और उनके रिश्ते के बारे में कोई साक्ष्य प्रमाण नहीं मिलता है।

ऐसा कहा जाता है कि वे अपने गुरु रैदास जी से मिलने अक्सर बनारस जाया करती थी, संत रैदास जी से मीराबाई की मुलाकात बचपन में हुई थी, वे अपने दादा जी के साथ धार्मिक समागमों में वे संत रैदास जी से मिली थे। वहीं कई बार अपने गुरु रैदास जी के साथ मीराबाई जी सत्संग में भी शामिल हुई थी।

इसके साथ ही कई साहित्यकार और विद्धानों के मुताबिक संत रैदास जी मीराबाई के अध्यात्मिक गुरु थे। वहीं मीराबाई जी ने भी अपने पदों में संत रविदास जी को अपना गुरु बताया है, मीराबाई जी द्धारा रचित उनका पद इस प्रकार है-

“खोज फिरूं खोज वा घर को, कोई न करत बखानी।सतगुरु संत मिले रैदासा, दीन्ही सुरत सहदानी।। वन पर्वत तीरथ देवालय, ढूंढा चहूं दिशि दौर।मीरा श्री रैदास शरण बिन, भगवान और न ठौर।। मीरा म्हाने संत है, मैं सन्ता री दास।चेतन सता सेन ये, दासत गुरु रैदास।। मीरा सतगुरु देव की, कर बंदना आस।जिन चेतन आतम कह्या, धन भगवान रैदास।। गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुर से कलम भिड़ी।सतगुरु सैन दई जब आके, ज्याति से ज्योत मिलि।।मेरे तो गिरीधर गोपाल दूसरा न कोय। गुरु हमारे रैदास जी सरनन चित सोय।।”

मीराबाई के इस पद से स्पष्ट होता है कि, मीराबाई ने, संत रैदास जी को ही अपना सच्चा और अध्यात्मिक गुरु माना था और उन्होंने रविदास जी से ही संगीत, सबद एवं तंबूरा बजाना सीखा था। आपको बता दें कि मीराबाई जी ने अपने भजनों, पदों आदि में ज्यादातर भैरव राग का ही इस्तेमाल किया है।

मीरा का पत्र
अपने परिवार वालों के व्यवहार से पीड़ित और फिर परेशान होकर मीराबाई द्वारका और फिर वृंदावन आ गई थीं। वह जहाँ भी जाती थीं, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता। लोग उन्हें देवियों के जैसा प्यार और सम्मान देते थे। इसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को एक पत्र भी लिखा था-
स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई।
बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।।
घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।
साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।
मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।

मीराबाई के पत्र का जबाव गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रकार दिया था-
जाके प्रिय न राम बैदेही।
सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेहा।।_
नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ।
अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ।।

मीराबाई की साहित्यिक देन

मीराबाई,सगुण भक्ति धारा की महान अध्यात्मिक कवियत्री थी, इन्होंने श्री कृष्ण के प्रेम रस में डूबकर कई कविताओं, पदों एवं छंदों की रचना की। मीराबाई जी की रचनाओं में उनका श्री  कृष्ण के प्रति अटूट  प्रेम, श्रद्धा, तल्लीनता, सहजता एवं आत्मसमर्पण का भाव साफ झलकता है।

मीराबाई ने अपनी रचनाएं राजस्थानी, ब्रज और गुजराती भाषा शैली में की है।  सच्चे प्रेम से परिपूर्ण मीराबाई जी की रचनाओं  एवं उनके भजनों को आज भी पूरे तन्मयता से गाते हैं। मीराबाई जी ने अपनी रचनाओं में बेहद शानदार तरीके से अलंकारों का भी इस्तेमाल किया है।

मीराबाई ने बेहद सरलता और सहजता के साथ अपनी रचनाओं में अपने प्रभु श्री कृष्ण के प्रति प्रेम का वर्णन किया है।इसके साथ ही उन्होंने प्रेम पीड़ा को भी व्यक्त किया है। आपको बता दें कि मीराबाई जी की रचनाओं में श्री कृष्ण के प्रति इनके ह्रदय के अपार  प्रेम देखने को मिलता है, मीराबाई द्धारा लिखी गईं कुछ प्रसिद्ध रचनाओं के नाम नीचे लिखी गए हैं, जो कि इस प्रकार है –

  • नरसी जी का मायरा
  • मीराबाई की मलार
  • गीत गोविंन्द टिका
  • राग सोरठ के पद
  • राग गोविन्दा
  • राग विहाग
  • गरबा गीत

मीराबाई की वाणी लगभग 45 रागों में उपलब्ध होती है-
1.राग झिंझोटी 2.राग काहन्ड़ा 3.राग केदार 4.राग कल्याण 5.राग खट 6.राग गुजरी 7.राग गोंड 8.राग छायानट 9.राग ललित 10.राग त्रिबेणी 11.राग सूहा 12.राग सारंग 13.राग तोड़ी 14.राग धनासरी 15.राग आसा 16.राग बसंत 17.राग बिलाबल 18.राग बिहागड़ो 19.राग भैरों 20.राग मल्हार 21.राग मारु 22.राग रामकली 23.राग पीलु 24.राग सिरी 25.राग कामोद 26.राग सोरठि 27.राग प्रभाती 28.राग भैरवी 29.राग जोगिया 30.राग देष 31.राग कलिंगडा़ 32.राग देव गंधार 33.राग पट मंजरी 34.राग काफी 35.राग मालकौंस 36.राग जौनपुरी 37.राग पीलु 38.राग श्याम कल्याण 39.राग परज 40.राग असावरी 41.राग बागेश्री 42.राग भीमपलासी 43.राग पूरिया कल्याण 44.राग हमीर 45.राग सोहनी

अतः इस प्रकार वाणी का अध्ययन करने से यह ज्ञात होता है कि मीराबाई ने अपनी वाणी में छन्द, अलंकार, रस और संगीत का पूर्णतया प्रयोग किया और इसे आध्यात्म का मार्ग बनाया, जो कि वर्तमान के लिए प्रेरणा है। ?मीराबाई ने ‘भारतीय शास्त्रीय संगीत’ को संजोए रखने में एक अनोखी कड़ी जोड़ दी, जिसका प्रमाण तथा पुष्टि विभिन्न ग्रन्थों के अवलोकन करने पर स्पष्ट होती है। अतः इस पद्धति को मीराबाई ने अपनाया और अपनी वाणी को संगीत के साथ जोड़कर आध्यात्म के साथ-साथ संगीत का भी प्रचार-प्रसार किया, साथ ही संगीत को जीवित रखने में भी अपनी सहमति तथा हिस्सेदारी पाई।

मीराबाई की मृत्यु

कुछ पौराणिक कथाओं के मुताबिक भक्ति धारा की महान कवियित्री मीराबाई जी ने अपने जीवन का आखिरी समय द्धारका में व्यतीत किया, वहीं करीब 1560 ईसवी में जब एक बार मीराबाई बेहद द्धारकाधीश मंदिर में श्री कृष्ण के प्रेम भाव में डूबकर भजन -कीर्तन कर रही थी, तभी वे श्री कृष्ण के पवित्र ह्रद्य में समा गईं।

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