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bihar board class 11 sociology | प्राकृतिक वनस्पति

bihar board class 11 sociology | प्राकृतिक वनस्पति

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bihar board class 11 sociology | प्राकृतिक वनस्पति

प्राकृतिक वनस्पति
(NATURAL VEGETATION)
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उसके आदर्श उत्तर
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न :
(i) प्रोजेक्ट टाईगर का उद्देश्य क्या था-
(क) शेरों का शिकार करना
(ख) अवैध शिकार को रोककर शेरों की सुरक्षा
(ग) शेरों को चिड़ियाघरों में रखना
(घ) शेरों पर चित्र बनाना।
उत्तर-(ख)
(ii) नन्दा देवी जीव आरक्षण क्षेत्र किस राज्य में है-
(क) बिहार
(ख) उत्तरांचल
(ग) उत्तर प्रदेश
(घ) उड़ीसा।
उत्तर-(ख)
(iii) संदल किस प्रकार के वन की लकड़ी है?
(क) सदाबहार
(ख) डेल्टा वन
(ग) पतझड़ीय
(घ) कंटीले वन।
उत्तर-(ग)
(iv) IUCN द्वारा कितने जीव आरक्षण स्थल मान्यता प्राप्त हैं-
(क)1
(ख) 2
(ग) 3
(घ)4
उत्तर-(घ)
(v) वन नीति के अधीन वन क्षेत्र का लक्ष्य कितना था-
(क) 33%
(ख) 55%
(ग)44%
(घ) 22%
उत्तर-(क)
(vi) चंदन वन किस प्रकार का वन है-
(क) सदाबहार
(ख) डेल्टाई
(ग) पर्णपाती
(घ) कोटेदार
उत्तर-(ग)
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।
(i) प्राकृतिक वनस्पति क्या है? जलवायु की किन परिस्थितियों में उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं?
उत्तर- प्राकृतिक वनस्पति से अभिप्राय उस पौधा समुदाय से है, जो लम्बे समय तक बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के उगता है और इसकी विभिन्न प्रजातियाँ वहाँ पाई जाने वाली मिट्टी और जलवायु में यथासंभव स्वयं को ढाल लेती हैं। उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन उष्ण और आर्द्र प्रदेशों में पाए जाते हैं, जहाँ वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है और औसत वार्षिक तापमान 22° सेल्सियस से अधिक रहता है।
(ii) जलवायु की कौन-सी परिस्थितियाँ सदाबहार वन उगने के लिए अनुकूल हैं?
उत्तर-सदाबहार वन ऊष्ण और आर्द्र प्रदेशों में पाए जाते हैं, जहाँ वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है और औसत वार्षिक तापमान 20-22° सेल्सियस से अधिक रहता है।
(iii) सामाजिक वानिकी से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर–सामाजिक वानिकी का अर्थ है पर्यावरणीय, सामाजिक व ग्रामीण विकास में मदद के उद्देश्य से वनों का प्रबंध और सुरक्षा तथा ऊसर भूमि पर वनरोपण। राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976-79) ने सामाजिक वानिकी को तीन वर्गों में बाँटा है-शहरी वानिकी, ग्रामीण वानिकी और फार्म वानिकी।
(iv) जीव मंडल निचय को पारिभाषित करें। वन क्षेत्र और वन आवरण में क्या अंतर है?
उत्तर-जीव मंडल निचय (आरक्षित क्षेत्र) विशेष प्रकार के भौतिक और तटीय पारिस्थितिक तंत्र है, जिन्हें यूनेस्को (UNESCO) के मानव और जीव मंडल प्रोग्राम (MAB) के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है। जीव मंडल निचय के तीन मुख्य उद्देश्य है-(i) जीव विविधता और पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण, (ii) पर्यावरण और विकास का मेल-जोल, (iii) अनुसंधान और देख-रेख के लिए अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क।
वन क्षेत्र राजस्व विभाग के अनुसार अधिसूचित क्षेत्र है, चाहे वहाँ वृक्ष हो या न हो, जबकि वन आवरण प्राकृतिक वनस्पति का झुरमुट है और वास्तविक रूप में वनों से ढंका है। वन क्षेत्र राज्यों के राजस्व विभाग से प्राप्त होता है जबकि वन आवरण की पहचान वायु चित्रों और उपग्रहों से प्राप्त चित्रों से की जाती है।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दें।
(i) वन संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
उत्तर-वन संरक्षण नीति के अंतर्गत निम्न कदम उठाए गए है। सामाजिक वानिकी-सामाजिक वानिकी का अर्थ पर्यावरणीय, सामाजिक व ग्रामीण
विकास में मदद के उद्देश्य से वनों का प्रबंध और सुरक्षा तथा ऊसर भूमि पर वनरोपण।
सामाजिक वानिकी को तीन वर्गों में बाँटा गया है-शहरी वानिकी, ग्रामीण वानिकी और फार्म वानिकी। सार्वजनिक भूमि जैसे-पार्क, सड़कों, हरित पट्टी, औद्योगिक व व्यापारिक स्थलों पर वृक्ष लगाना और उनका प्रबंध इत्यादि से शहरी वानिकी को बढ़ावा दिया जाता है। कृषि वानिकी का अर्थ कृषि योग्य तथा बंजर भूमि पर पेड़ और फसलें एक साथ लगाना। फार्म वानिकी के अंतर्गत किसान अपने खेतों में व्यापारिक महत्त्व वाले या दूसरे पेड़ लगाते है।
वन विभाग इसके लिए छोटे और मध्यम किसानों को निःशुल्क पौधे उपलब्ध कराता है। इस प्रकार की योजना के अंतर्गत कई प्रकार की भूमि जैसे-खेतों की मेड़, चरागाह, घास स्थल, घर के पास पड़ी खाली जमीन और पशुओं के बाड़ों में भी पेड़ लगाए जाते हैं। कृषि वानिकी का उद्देश्य वानिकी और खेती एक साथ करना है, जिससे खाद्यान्न, चारा, इंधन, इमारती लकड़ी और फलों का उत्पादन एक साथ किया जाय। समुदायिक वानिकी सार्वजनिक भूमि जैसे-गाँव-चरागाह, मंदिर-भूमि, सड़कों के दोनों ओर, नहर किनारे , रेल पट्टी के साथ पटरी और विद्यालयों में पेड़ लगाना है। इस योजना का एक उद्देश्य भूमिविहीन लोगों को वानिकीकरण से जोड़ना तथा इससे उन्हें लाभ पहुंचाना है जो केवल भूस्वामियों को ही प्राप्त होते हैं।
(ii) वन और वन्य जीव संरक्षण में लोगों की भागीदारी कैसे महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर-वन और वन्य प्राणी संरक्षण का दायरा काफी बढ़ा है और इसमें मानव कल्याण की असीम संभावनाएं निहित हैं। यद्यपि इस लक्ष्य को तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब हर व्यक्ति इसका महत्त्व समझे और अपना योगदान दे।
वन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में हमें बहुत अधिक आर्थिक व सामाजिक लाभ पहुंचाते हैं। अतः वनों के संरक्षण की मानवीय विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वनों और जनजाति समुदायों में घनिष्ठ सम्बन्ध है और इनमें से एक का विकास दूसरे के बिना असंभव है। वनों के विषय में इनके प्राचीन व्यावहारिक ज्ञान को वन विकास में प्रयोग किया जा सकता है।
जनजातियों को वनों से गौण उत्पाद संग्रह करने वाले न समझकर, उन्हें वन संरक्षण में भागीदार बनाया जाना चाहिए।
हमें पर्यावरण संतुलन बनाए रखना चाहिए तथा पारिस्थितिक असंतुलित क्षेत्रों में वन लगाना चाहिए। देश की प्राकृतिक धरोहर जैव-विविधता तथा आनुवांशिक पूल का संरक्षण करना चाहिए। मृदा अपरदन तथा मरुस्थलीयकरण को रोकने का प्रयास करना चाहिए तथा बाढ़ व सूखे पर नियंत्रण पाने की कोशिश करते रहनी चाहिए। वनों की उत्पादकता बढ़ाकर वनों पर निर्भर ग्रामीण जनजातियों को इमारती लकड़ी, ईंधन, चारा और भोजन उपलब्ध करवाना चाहिए और लकड़ी के स्थान पर हमें अन्य वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। पेड़ लगाने को बढ़ावा देने के लिए, पेड़ों की कटाई रोकने के लिए जन-आन्दोलन चलाना चाहिए तथा हमें वन्य प्राणियों का शिकार नहीं करना चाहिए। दुर्लभ प्राणियों और पौधों को संरक्षित रखने के लिए उनकी संख्या में बढ़ोतरी के लिए प्रयास करना चाहिए।
परियोजना/क्रियाकलाप
भारत के रेखा मानचित्र पर निम्नलिखित को पहचान कर चिह्नित करें।
(i) मैग्रोव वन वाले क्षेत्र।
(ii) नंदा देवी, सुंदर वन, मन्नार की खाड़ी और नीलगिरी, जीवमंडल निचय।
(iii) भारतीय वन सर्वेक्षण मुख्यालय की स्थिति का पता लगाएँ और रेखांकित करें।
उत्तर-
पाठ्य-पुस्तक पर आधारित अन्य प्रश्न एवं उसके आदर्श उत्तर
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
1. भारत का कुल कितना भौगोलिक क्षेत्र वनों के अन्तर्गत है?
उत्तर-22%
2. भारत का कुल कितना क्षेत्र (हेक्टेयर में) वनों के अन्तर्गत है?
उत्तर-750 लाख हेक्टेयर।
3. लकड़ी के दो प्रयोग लिखें।
उत्तर-(i) इमारत निर्माण के लिये। (ii) ईंधन के लिए लकड़ी।
4. लकड़ी का एक औद्योगिक प्रयोग लिखें।
उत्तर- खेलो का सामान बनाना, रेयॉन उद्योग।
5. बाँस तथा वन के घास के दो उपयोग लिखो।
उत्तर-(i) कागज बनाने के लिए, (ii) कृत्रिम रेशा।
6. वनों से प्राप्त तीन उत्पादों के नाम लिखें।
उत्तर- रबड़, गोंद तथा चमड़ा रंगने वाले पदार्थ।
7. उन दो भौगोलिक तत्त्वों के नाम लिखो जो वनों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं।
उत्तर-(i) वर्षा की मात्रा, (ii) ऊंचाई।
8. उष्ण कटिबन्धीय सदावहार वनों के लिए आवश्यक वार्षिक वर्षा तथा तापमान बताओ।
उत्तर- (i) 200 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा, (ii) 25° – 27°C
9. पतझड़ीय मानसून वनों के लिए आवश्यक वार्षिक वर्षा तथा तापमान बताओ।
उत्तर-150-200 सेंटीमीटर।
10. उस राज्य का नाम बताओ जहां उष्ण कटिबन्धीय सदावहार वन पाये जाते हैं।
उत्तर-केरल।
11. भारत के एक प्रदेश क नाम बताओ जहाँ काटे तथा झाड़ियों के वन पाये जाते हैं ?
उत्तर-थार मरुस्थल।
12. हिन्द महासागर में द्वीपों के समूह बताएं जहाँ उष्ण कटिबन्धीय वन पाये जाते हैं।
उत्तर-अण्डमान-निकोबार द्वीप।
13. उष्ण कटिबन्धीय सदावहार वनों में पाये जाने वाले तीन महत्त्वपूर्ण पेड़ों के नाम लिखो।
उत्तर-रोजवुड, अर्जुन, आबनूस।
14. मानसून वनों को पतझड़ीय वन क्यों कहते हैं?
उत्तर-क्योंकि ये गर्मियों में अपने पत्ते गिरा देते हैं।
15. उन तीन राज्यों के नाम बताएं जहां मानसून वन पाये जाते हैं।
उत्तर-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा झारखण्ड।
16. मध्य प्रदेश के एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक वृक्ष का नाम बताएँ।
उतर-सागवान।
17. भारत के दो राज्य बतायें जहां देवदार के वृक्ष मिलते हैं।
उत्तर-जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश।
18. काँटेदार वन के दो पेड़ों के नाम बतायें।
उत्तर-खैर तथा खजूरी।
19. बबूल के वृक्ष से कौन-से उत्पाद प्राप्त होते हैं?
उत्तर-गोंद तथा रंगने वाले पदार्थ।
20. ज्वारीय वन में गुंझलदार जड़ों का क्या कार्य है?
उत्तर-यह कीचड़ में वृक्षों का संरक्षण करती है।
21. भारत का वन अनुसंधान केन्द्र कहाँ पर स्थित है?
उत्तर-देहरादून में।
22. ज्वारीय वन में पाये जाने वाले दो पेड़ो के नाम लिखें।
उत्तर- सुन्दरी, गुर्जन।
23. वैज्ञानिक नियम पर वनो के अन्तर्गत कुल कितना क्षेत्र होना चाहिए।
उत्तर-33%
24. कोणधारी वन के तीन वृक्षों के नाम लिखें।
उत्तर–पाइन, देवदार, सिल्वर फर्र।
25. 3500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर किस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है?
उत्तर-एल्पाइन चरागाह।
26. उन दो राज्यों के नाम लिखें जहाँ देवदार पाये जाते हैं।
उत्तर-जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश।
27. मयरो बोलान वृक्ष का उपयोग बताएँ।
उत्तर-रंगने वाले पदार्थ प्रदान करना।
28. ज्वारीय वातावरण में कौन-से वन मिलते हैं?
उत्तर- मैंग्रोव वन।
29. भारत में आर्थिक पक्ष से कौन-सा वनस्पति क्षेत्र महत्वपूर्ण है?
उत्तर-पतझड़ीय वन।
लघु उत्तरीय प्रश्न
1. भारत में वनों के क्षेत्र के कम होने के क्या कारण हैं?
उत्तर-किसी प्रदेश के कुल क्षेत्र के कम-से-कम 1/3 भाग में वनों का विस्तार होना चाहिए ताकि उस प्रदेश में पारिस्थितिक स्वास्थ्य कायम रखा जा सके। भारत में कई कारणों से वन सम्पत्ति का कम विस्तार है-
(i) वनों के विशाल क्षेत्र की कटाई,
(ii) स्थानान्तरित कृषि की प्रथा,
(iii) अत्यधिक मृदा अपरदन,
(iv) चरागाहों की अत्यधिक चराई,
(v) लकड़ी एवं ईधन के लिए वृक्षों की कटाई.
(vi) मानवीय हस्तक्षेप।
2. वन सम्पदा के संरक्षण के लिए क्या तरीके अपनाए जा रहे हैं?
उत्तर-जनसंख्या के अत्यधिक दबाव तथा पशुओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि के कारण वन सम्पदा का संरक्षण आवश्यक है। वन संरक्षण कृषि एवं चराई के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता के कारण आवश्यक है। इसके लिए वनवर्द्धन के उत्तम तरीको को अपनाया जा रहा है। तेजी से उगने वाले पौधों की जातियों को लगाया जा रहा है। घास के मैदानों का पुनर्विकास किया जा रहा है। वन क्षेत्रों का विस्तार किया जा रहा है।
3. भारत में विभिन्न प्रकार के घासों का वर्णन करो।
उत्तर-घासें-बारहमासी घासों की 60 प्रजातियाँ हैं। इनसे मिलकर ही हमारा पारितन्त्र बना है, जो हमारे पशुधन के जीवन का आधार है। वास्तविक चारागाह और घास भूमियाँ लगभग 12.04 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तीर्ण हैं। चराई के लिए अन्य भूमि, वृक्ष-फसलों और उद्यानों, बंजर भूमि तथा परती भूमि के रूप में हैं। जिनका क्षेत्रफल क्रमशः 37 लाख हेक्टेयर, 15 लाख हेक्टेयर और 23.3 लाख हेक्टेयर है। वनों के अपकर्ष (डिग्रेडेशन) और विनाश के परिणामस्वरूप ही चरागाह और घासभूमियाँ विकसित हुई हैं। कालान्तर में चारागाह सवाना में बदल जाते हैं। हिमालय की अधिक ऊचाइयों वाले उप-अल्पाइन और अल्पाइन क्षेत्रों में वास्तविक चारागाह पाए जाते हैं। भारत में घास के तीन पृथक् आवरण है। ऊष्ण कटिबंधीय -यह मैदानों में पाया जाता है। उपोष्ण कटिबंधीय घास भूमियाँ मुख्य रूप से हिमालय की पर्वत में ही पाई जाती हैं।
4. वन संरक्षण क्यों आवश्यक है?
उत्तर-वनों का संरक्षण-मनुष्यों और पशुओं की बढ़ती हुई संख्या का प्राकृतिक वनस्पति पर दुष्प्रभाव पड़ा है। जो क्षेत्र कभी वनों से ढंके थे; आज अर्द्ध-मरुस्थल बन गए हैं। राजस्थान में भी कभी वन थे। पारिस्थितिक सन्तुलन के लिए वन अनिवार्य है। मानव का अस्तित्व और विकास पारिस्थितिक सन्तुलन पर निर्भर है। सन्तुलित पारितन्त्र और स्वस्थ पर्यावरण के लिए भारत के कम-से-कम एक तिहाई भाग पर वन होना चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश के एक चौथाई भाग पर भी वन नहीं है। इसलिए वन संसाधनों की संरक्षण और प्रबन्धन के लिए एक नीति की आवश्यकता है।
5. भारत की वन नीति के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर-सन् 1988 में नई राष्ट्रीय वन नीति, वनों के क्षेत्रफल में हो रही कमी को रोकने के लिए बनाई गई थी। (i) इस नीति के अनुसार देश के 33 प्रतिशत भू-भाग को वनों कोअन्तर्गत लाना था। संसार के कुल भू-भाग का 27 प्रतिशत तथा भारत का लगभग 19 प्रतिशत भू-भाग वनों से ढंका है।
 (ii) वन नीति में आगे कहा गया है कि पर्यावरण की स्थिरता कायम रखने का प्रयत्न किया जायगा तथा जहां पारितन्त्र का सन्तुलन बिगड़ गया
है, वहां पुनः वनारोपण किया जाएगा। (iii) आनुवांशिक संसाधनों की जैव विविधता को देश की प्राकृतिक विरासत कहा जाता है। इस विरासत का संरक्षण, वन नीति का अन्य उद्देश्य है।
(iv) इस नीति में मृदा अपरदन, मरुभूमि के विस्तार तथा सूखे पर नियन्त्रण का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। (v) इस नीति में जलाशयों में गाद के जमाव को रोकने के लिए बाढ़ नियन्त्रण का भी प्रावधान है। (vi) इस नीति के और भी उद्देश्य है जैसेः अपरदित और अनुत्पादक भूमि पर सामाजिक वानिकी और वनरोपण द्वारा वनावरण में अभिवृद्धि, वनों की उत्पादकता बढ़ाना, ग्रामीण और जन-जातीय जनसंख्या के लिए इमारती लकड़ी, जलावन, चारा और भोजन जुटाना (vii) यही नहीं इस नीति में महिलाओं को शामिल करके, व्यापक जनान्दोलन द्वारा वर्तमान वनों पर दबाव कम करने के लिए भी बल दिया गया है।
6. नम उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार एवं अर्द्ध-सदावहार वनों की दो मुख्य विशेषताएँ बताइए। ये भी बताइए कि ये मुख्यत: किन प्रदेशों में पाए जाते हैं?
उत्तर-नम उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन-ये वन उष्ण कटिबन्धीय वनों के समान सदाबहार घने वन होते हैं। ऊष्ण-आर्द्र जलवायु के कारण ये वन तेजी से बढ़ते हैं तथा अधिक ऊचे होते हैं। भारत में पाए जाने वाले ये वन कुछ खुले तथा दूर-दूर पाए जाते हैं। इन वनों में कठोर लकड़ी के वृक्ष मिलते हैं जिनके शिखर पर छाता जैसा आकार बन जाता है। भारत में ये वन पश्चिमी घाट के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में (केरल तथा कनार्टक) पाए जाते हैं। ये, वन शिलांग पठार के पर्वतीय प्रदेश में पाए जाते हैं। महोगनी, खजूर, बांस मुख्य वृक्ष हैं।
अर्द्ध-सदाबहार वन-ये वन पश्चिमी घाट तथा उत्तर-पूर्वी भारत में कम वर्षा के क्षेत्रों में मिलते हैं। ये मानसूनी पतझड़ीय वन हैं।
7. भारत में उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन कहाँ पाए जाते हैं? ऐसे वनों की वनस्पति भूमध्यरेखीय वनों से किस प्रकार समान हैं तथा किस प्रकार से असमान हैं?
उत्तर-भारत में उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में शिलांग पठार, असम प्रदेश तथा पश्चिमी घाट पर पाए जाते हैं। ये वन भूमध्यरेखीय वनों से मिलते-जुलते है क्योंकि ये कठोर लकड़ी के वन है तथा ये अधिक आर्द क्षेत्रों में मिलते हैं जहां 200 सें.मी. से अधिक वार्षिक वर्षा होती है। ये वन भूमध्यरेखीय वनों की भान्ति घने नहीं हैं, परन्तु ये वन अधिक खुले-खुले मिलते हैं तथा इनका उपयोग आसान हो जाता है।
8. सामाजिक वानिकी पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर-सामाजिक वानिकी (Social Forestry)-(i) 1976 के राष्ट्रीय कृषि आयोग ने पहले-पहल ‘सामाजिक वानिकी शब्दावली का प्रयोग किया था। इसका अर्थ है-ग्रामीण जनसंख्या के लिए जलावन, छोटी इमारती लकड़ी और छोटे-छोटे वन उत्पादों की आपूर्ति करना।
(ii) अनेक राज्य सरकारों ने सामाजिक वानिकी के महत्वाकाक्षी कार्यक्रम शुरू किए गए है। अधिकतर राज्यों में वन विभागों के अन्तर्गत सामाजिक वानिकी के अलग से प्रकोष्ठ बनाए गए हैं।
(iii) सामाजिक वानिकी के मुख्य रूप से तीन अंग हैं-
कृषि वानिकी-किसानों को अपनी भूमि पर वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित करना; वन-भूखण्ड (वुडलाट्स) -वन विभागों द्वारा लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए सड़कों के किनारे, नहर के तटों, तथा ऐसी अन्य सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण;
सामुदायिक वन-भूखण्ड-लोगों द्वारा स्वयं बराबर की हिस्सेदारी के आधार पर भूमि पर वृक्षारोपण।
(iv) सामाजिक वानिकी योजनाएं असफल हो गई, क्योंकि इसमें उन निर्धन महिलाओं की शामिल नहीं किया गया, जिन्हें इससे अधिकतर फायदा होना था। यह योजना पुरुषोन्मुख हो गई। यही नहीं, यह कार्यक्रम लोगों की आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने वाले कार्यक्रम के स्थान पर किसानों का धनोपार्जन कार्यक्रम बन गया।
(v) सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के द्वारा उत्पादित लकड़ी ग्रामीण भारत के गरीबों को न मिलकर, नगरों और कारखानों में पहुंचने लगी है। इससे गांवों में रोजगार के अवसर घटे हैं और अन्न-उत्पादन करने वाली भूमि पर पेड़ लग गए इससे अनिवासी भू-स्वामित्व को बढ़ावा मिला है।
9. कौन-सी वनस्पति जाति बंगाल का आतंक मानी जाती है और क्यों?
उत्तर-कुछ विदेशज बनस्पति जाति के कारण कई प्रदेशों में समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। भारत में वनस्पति का 40% भाग विदेशज हैं। ये पौधे चीनी -तिब्बती, अफ्रीका तथा इण्डो-मलेशियाई क्षेत्र से लाए गए है। जलहायसिंथ पौधा भारत में बाग के सजावट के पौधे के रूप में लाया गया था। इस पौधे के फैल जाने के कारण पश्चिमी बंगाल में जलमार्गों नदियों तलाबों तथा नालों के मुँह बड़े पैमाने पर बन्द हो गए हैं। इस पौधे के हानिकारक प्रभावों के कारण इसे ‘बंगाल का आतंक” (Terror of Bengal) भी कहा जाता है।
10. “हमारी अधिकांश प्राकृतिक वनस्पति वस्तुतः प्राकृतिक नहीं है।” इस कथन की व्याख्या करो।
उत्तर-यह कथन काफी हद तक सही है कि भारत में अधिकांश ‘प्रकृतिक वनस्पति वस्तुतः प्राकृतिक नहीं है। इस देश मानवीय निवास के कारण प्राकृतिक वनस्पति का अधिकतर भाग नष्ट हो गया है या परिवर्तित हो गया है। अधिकांश वनस्पति अपनी कोटि तथा गुणों के उच्च स्तर के अनुसार नहीं है। केवल हिमालय प्रदेश के कुछ अगम्य क्षेत्रों में एवं थार मरुस्थल के कुछ भागों को छोड़ कर अन्य प्रदेशों में प्राकृतिक वनस्पति वस्तुतः प्राकृतिक नहीं है। इन प्रदेशों की वनस्पति स्थानिक जलवायु तथा मिट्टी के अनुसार पनपती है तथा इसे प्राकृतिक कहा जा सकता है।
11. भारत में मुख्य वनस्पतियों के प्रकार को प्रभावित करने वाले भौगोलिक घटकों के नाम वताइए तथा उनके एक-दूसरे पर पड़ने वाले प्रभाव का परीक्षण कीजिए।
उत्तर-भारत में विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। वनस्पति की प्रकार, सघनता आदि वातावरण में कई तत्वों पर निर्भर है। भारत में वनस्पति विभाजन के अनुसार उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार एवं मानसूनी वन, शीतोष्ण वन, घास के मैदान आदि वनस्पति को निम्नलिख्ति भौगोलिक घटक प्रभावित करते हैं
(i) वर्षा की मात्रा,
(ii) धूप,
(iii) ताप की मात्रा,
(iv) मिट्टी की प्रकृति।
ये जलवायुविक घटक अन्य स्थानिक तत्त्वों के साथ मिल कर एक-दूसरे पर विशेष प्रभाव डालते है। अधिक वर्षा तथा उच्च तापमान के कारण असम तथा पश्चिमी घाट पर ऊष्मा कटिबन्धीय सदाबहार वनस्पति पाई जाती है। परन्तु मरुस्थलीय क्षेत्रों में कम वर्षा के कारण कांटेदार झाड़ियां पाई जाती है। कई भागों में मौसमी वर्षा के कारण पतझडी़य वनस्पति पाई जाती है। उष्ण जलवायु के कारण अधिकतर चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष पाए जाते हैं परन्तु हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में कम तापमान के कारण कोणधारी वन तथा अल्पला घास पाई जाती है। स्थानीय मिट्टी के प्रभाव से नदी के डेल्टाई क्षेत्रों में ज्वारीय वन या मैगरोव पाई जाती है। इसी प्रकार बाद-ग्रस्त क्षेत्रों में बबूल वृक्ष मिलते हैं।
12. “हिमालय क्षेत्रों में ऊँचाई के क्रम के अनुसार उष्ण कटिबन्धीय से लेकर अल्पाईन वनस्पति प्रदेशों तक का अनुक्रम पाया जाता है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-हिमालय पर्वत में दक्षिणी ढलानों से लेकर उच्च पर्वतीय क्षेत्रों तक विभिन्न प्रकार की वनस्पति मिलती है। ऊंचाई के क्रम के अनुसार वर्षा तथा ताप की मात्रा में अन्तर पड़ता है। इस अन्तर के प्रभाव से वनस्पति में एक क्रमिक अन्तर पाया जाता है। धरातल के अनुसार तथा ऊचाई के साथ-साथ वनों के प्रकार में भिन्नता आ जाती है। इस क्रम के अनुसार उष्ण कटिबन्धीय से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक का विस्तार पाया जाता है।
(i) उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन-हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढलानों पर 1200 मीटर की ऊंचाई तक उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती प्रकार के वन पाए जाते है। यहाँ वर्षा की मात्रा अधिक होती है। यहां सदाबहार घने वनों में साल के उपयोगी वृक्ष पाए जाते है।
(ii) शीत उष्ण कटिबन्धीय वन-2000 मीटर की ऊंचाई पर नम शीत ऊष्ण प्रकार के घने वन पाए जाते हैं। इनमें ओक, चेस्टनट और चीड़ के वृक्ष पाए जाते है।
(iii) शंकुधारी वन-दो हजार से अधिक ऊंचाई पर शकुधार वृक्षों का विस्तार मिलता है। यहाँ कम वर्षा तथा अधिक शीत के कारण वनस्पति में अन्तर पाया जाता है। स्परूस, देवदार, चिनार और अखरोट के वृक्ष पाए जाते हैं। हिम रेखा के निकट पहुंचने पर बर्च, जूनीपर आदि वृक्ष पाए जाते है।
(iv) अल्पाइन चरागाहें -3000 मीटर से अधिक ऊँचाई के कई भागों में छोटी-छोटी घास के कारण चरागाहें पाई जाती हैं। पश्चिमी हिमालय में गुजरों जैसी जन-जातियाँ मौसमी पशुचारण हेतु इन चरागाहों का उपयोग करते है।
13. प्राकृतिक वनस्पति को परिभाषित कीजिए। जलवायु की उन परिस्थितियों को वर्णन कीजिए, जिसमें उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं।
उत्तर-प्राकृतिक वनस्पति उन वनस्पतियों को कहा जाता है जो मानव के प्रत्यक्ष या परोक्ष सहायता के बिना पृथ्वी पर उगते है और अपने आकार संरचना तथा अपनी जरूरतों को प्राकृतिक पर्यावरण के अनुसार ढाल लेते हैं। निम्न परिस्थितियों में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं।
(i) जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 20 cm से अधिक हो,
(ii) जहाँ सापेक्ष आर्द्रता 70% से अधिक हो।
अर्थात् जहाँ अधिक वर्षा हो, उच्च आर्द्रता हो तथा उच्च तापमान हो वहीं उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. भारत के विभिन्न प्रकार के वनों के भौगोलिक वितरण तथा आर्थिक महत्त्व का वर्णन करो।
उत्तर-भारत की वन सम्पदा (ForrestWealthof India)-प्राचीन समय में भारत के एक बड़े भाग पर वनों का विस्तार था, परन्तु अब बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वन क्षेत्र घटता जा रहा है। इस समय देश में 747 लाख हेक्टेयर क्षेत्रों पर वनों का विस्तार है जो कि देश के कुल क्षेत्रफल का 22.7% भाग है। भारत में प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र लगभग 0.1 हेक्टेयर है जो कि बहुत कम है। भौगोलिक दृष्टि से मध्य प्रदेश में सबसे अधिक वन क्षेत्र हैं।
भारतीय वनों का वर्गीकरण-भारत में वनों का वितरण वर्षा, तापमान तथा ऊंचाई के अनुसार है। भारत में निम्नलिखित प्रकार के वन पाए जात हैं-
(i) उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)-ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहा औसत वार्षिक वर्षा 200 सेमी से अधिक तथा औसत तापमान 24°C है। इन वनों का विस्तार निम्नलिखित प्रदेशों में है-
(a) पश्चिमी घाट तथा पश्चिमी तटीय मैदान,
(b) अण्डमान द्वीप समूह,
(c) उत्तर-पूर्व में हिमालय पर्वत की ढलानों पर।
अधिक वर्षा तथा ऊचे तापमान के कारण ये वन बहुत घने होते हैं। ये सदाबहार वन हैं तथा भूमध्य रेखीय वनों की भाँति कठोर लकड़ी के वन हैं। वृक्षों की ऊंचाई 30 से 60 मीटर तक है। इन वनों में रबड़, महोगनी, आबनूस लौह-काष्ठ, ताड़ तथा चीड़ के वृक्ष पाए जाते है। इन वृक्षों की लकड़ी फर्नीचर, रेल के स्लीपर, जलपोत निर्माण, नावे बनाने में प्रयोग की
जाती हैं।
(ii) पतझड़ीय मानसूनी वन (Monsoon Deciduous Forests)-ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते है जहां औसत वार्षिक वर्षा 100 सेमी से 200 सेमी तक होती है। इसलिए इन्हें पतझड़ीय वन कहते हैं। ये वन निम्नलिखित प्रदेशों में मिलते है
(a) तराई प्रदेश,
(b) डेल्टाई प्रदेश,
(c) पश्चिमी घाट की पूर्वी ढलान,
(d) प्रायद्वीप का पूर्वी भाग-मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु ये वन अधिक घने नहीं होते। इनमें वृक्ष कम ऊंचे होते हैं। ये वृक्ष लगभग 30 मीटर तक ऊंचे होते हैं। इन वृक्षों को सुगमतापूर्वक काटा जा सकता है। कई भागों में कृषि के लिए इन वनों को साफ कर दिया गया है।
आर्थिक महत्त्व (Economical Importance)-इन वनों में साल, सागौन, चन्दन, रोजवुड, आम, महुआ आदि वृक्ष पाए जाते हैं। साल वृक्ष की लकड़ी रेल के स्लीपर तथा डिब्बे बनाने के काम में आती है। सागौन की लकड़ी बहुत मजबूत होती है। इसका प्रयोग इमारती लकड़ी तथा फर्नीचर में किया जाता है। इन वृक्षों पर लाख, बीड़ी, चमड़ा रंगने तथा कागज बनाने के उद्योग आधारित है।
(iii) शुष्क वन (Dry Forests)-ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहां औसत वार्षिक वर्षा 50 सेमी से 100 सेमी तक होती है। ये वन निम्नलिखित क्षेत्रों में मिलते हैं-
(a) पूर्वी राजस्थान,
(b) दक्षिणी हरियाणा,
(c) दक्षिणी-पश्चिमी उत्तर प्रदेश
(d) कर्नाटक पठार
ये वृक्ष वर्षा की कमी के कारण अधिक ऊंचे नहीं होते। इन वृक्षों की जड़ें लम्बी तथा वाष्पीकरण को रोकते हैं।
आर्थिक महत्त्व (Economic Importance)-इन वनों में शीशम, बबूल, कीकर, हल्दू आदि वृक्ष पाए जाते है। ये कठोर तथा टिकाऊ लकड़ी के वृक्ष होते हैं। इनका उपयोग कृषि यन्त्र, फर्नीचर, लकड़ी का कोयला, बैलगाड़ियां बनाने में किया जाता है।
(iv) डेल्टाई वन (Deltaic Forests) -ये वन डेल्टाई क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन्हें ज्वारीय वन (Tidal Forests) भी कहते हैं। मैनग्रोव वृक्ष के कारण इन्हें मैनग्रोव वन (Mangrove Forests) भी कहते है। ये वन निम्नलिखित डेल्टाई क्षेत्रों में मिलते है-
(a) गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुन्दर वन),
(b) महानदी, कृष्णा, गोदावरी डेल्टा,
(c) दक्षिणी-पूर्वी तटीय क्षेत्र।
ये वन प्रायः दलदली होते हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में सुन्दरी नामक वृक्ष मिलने के कारण इसे ‘सुन्दर वन’ कहते है।
आर्थिक महत्व (Economic Importance)-इन वनों में नारियल, मैनग्रोव, ताड़, सुन्दरी आदि वृक्ष मिलते है। ये वन आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इनका प्रयोग ईंधन, इमारती लकड़ी, नावें बनाने तथा माचिस उद्योग में किया जाता है।
(v) पर्वतीय वन (Mountain Forests)-ये वन हिमालय प्रदेश की दक्षिणी ढलानों पर कश्मीर से लेकर असम तक पाए जाते हैं। पूर्वी हिमालय में वर्षा की मात्रा अधिक है।
वहां सदाबहार तथा चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों की अधिकता के कारण कोणधारी वन पाए जाते हैं। इस प्रकार पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमी हिमालय के वनों में काफी अन्तर मिलता है। हिमालय प्रदेश में दक्षिणी ढलानों से लेकर उच्च पर्वतीय क्षेत्रों तक विभिन्न प्रकार की वनस्पति मिलती है। ऊंचाई के क्रमानुसार वर्षा तथा ताप की मात्रा में भी अन्तर पड़ता है। धरातल के अनुसार तथा ऊचाई के साथ-साथ वनों के प्रकार में भिन्नता आ जाती है। इस क्रम के अनुसार उष्ण कटिबन्धीय से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक का विस्तार पाया जाता है।
(a) उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन-हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढलानों पर 1200 मीटर की ऊंचाई तक उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती प्रकार के वन पाए जाते है। वहां वर्षा की मात्रा अधिक होती है। वहां सदाबहार घने वनों में साल के उपयोगी वृक्ष पाए जाते हैं।
(b) शीत उष्ण कटिबन्धीय वन-2000 मीटर की ऊंचाई पर नम शीत उष्ण प्रकार के घने वन पाए जाते हैं। इनमें ओक, चेस्टनट और चीड़ के वृक्ष पाए जाते है। चीड़ के वृक्ष से बिरोजा तथा तारपीन का तेल प्राप्त किया जाता है। इसकी हल्की लकड़ी होती है जिससे चाय की पेटियां बनाई जाती है।
(c) शंकुधारी वन- दो हजार से अधिक ऊंचाई पर शंकुधारी वृक्षों का विस्तार मिलता है। यहां कम वर्षा तथा अधिक शीत के कारण वनस्पति में अन्तर पाया जाता है। यहाँ स्परुस, देवदार, चिनार और अखरोट के वृक्ष पाए जाते है। हिम रेखा के निकट पहुंचने पर बर्च, जूनीपर आदि वृक्ष पाए जाते हैं। देवदार की लकड़ी रेल के स्लीपर, पुला डिब्बे बनाने में प्रयोग की जाती है। सिवरफर का प्रयोग कागज की लुग्दी, पैकिंग का सामान तथा दियासलाई बनाने में किया जाता है।
(d) अल्पाइन चरागाहें -3000 मीटर से अधिक ऊंचाई के कई भागों में छोटी-छोटी घास के कारण चरागाहें पाई जाती हैं। पश्चिमी हिमालय में गुजरों जैसी जन-जातियाँ मौसमी पशु चारण द्वारा इन चरागाहों का उपयोग करते हैं।
2. भारत में वास्तविक वनावरण का वितरण बताएँ।
उत्तर-वनक्षेत्र की भांति वनावरण में भी बहुत अन्तर है। जम्मू और कश्मीर में वास्तविक वनावरण एक प्रतिशत है, जबकि अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह की 92 प्रतिशत भूमि पर वास्तविक वनावरण है। परिशिष्ट 1 में दी गई सारणी से स्पष्ट है कि 9 ऐसे राज्य हैं जहां कुल क्षेत्रफल के एक तिहाई भाग से अधिक पर वनावरण है। एक तिहाई वनावरण पारितन्त्र का सन्तुलन बनाए रखने के लिए मानक आवश्यकता है। चार ऐसे राज्य हैं जहाँ वन का प्रतिशत आदर्श स्थिति जैसा ही है। अन्य राज्यों में वनों की स्थिति असंतोषजनक या संकटपूर्ण है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि तीन नवीन राज्यों, उत्तरांचल, झारखंड और छत्तीसगढ़ में प्रत्येक के कुल क्षेत्रफल के 40 प्रतिशत भाग पर वन हैं। इन राज्यों के पृथक् आँकड़े न मिलने के कारण इन्हें इनके पूर्व राज्यों में ही सम्मिलित किया गया है।
वास्तविक वनावरण के प्रतिशत के आधार पर भारत के राज्यों को चार प्रदेशों में विभाजित किया गया है-
(i) अधिक वनावरण वाले प्रदेश, (ii) मध्यम वनावरण वाले प्रदेश
(iii) कम वनावरण वाले प्रदेश, (iv) बहुत कम वनावरण वाले प्रदेश।
(i) अधिक वनावरण वाले प्रदेश-इस प्रदेश में 40 प्रतिशत से अधिक वनावरण वाले राज्य सम्मिलित हैं। असम के अलावा सभी पूर्वी राज्य इस वर्ग में सम्मिलित हैं। असम के अलावा सभी पूर्वी राज्य इस वर्ग में शामिल है। जलवायु की अनुकूल दशाएं मुख्य रूप से वर्षा और तापमान अधिक वनावरण में होने का मुख्य कारण हैं। इस प्रदेश में भी वनावरण भिन्नताएं पाई जाती हैं। अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह और मिजोरम, नागालैण्ड तथा अरुणाचल प्रदेश के राज्यों में कुल भौगोलिक क्षेत्र के 80 प्रतिशत भाग पर वन पाए जाते हैं। मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम और दादर और नागर हवेली में वनों का प्रतिशत 40 और 80 के बीच हैं।
(ii) मध्यम वनावरण वाले प्रदेश–इसमें मध्य प्रदेश, उड़ीसा, गोवा, केरल, असम और हिमाचल प्रदेश सम्मिलित है। गोवा में वास्तविक वन क्षेत्र 33.79 प्रतिशत है, जो कि इस प्रदेश में सबसे अधिक है। इसके बाद असम और उड़ीसा का स्थान है। अन्य राज्यों में कुल क्षेत्र के 30 प्रतिशत भाग पर वन हैं।
(iii) कम वनावरण वाले प्रदेश- यह प्रदेश लगातार नहीं है। इसमें दो उप-प्रदेश है। एक प्रायद्वीप भारत में स्थित है। इसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं। दूसरा उप-प्रदेश उत्तरी भारत में है। इसमें उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य शामिल है।
(iv) वहुत कम वनावरण वाले प्रदेश–भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग को इस वर्ग में रखा जाता है। इस वर्ग में शामिल राज्य हैं-राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और गुजरात।
इसमें चंडीगढ़ और दिल्ली दो केन्द्र शासित प्रदेश भी हैं। इनके अलावा पश्चिम बंगाल का राज्य भी इसी वर्ग में है। भौतिक और मानवीय कारणों से इस प्रदेश में बहुत कम वन है।
3. भारत में प्राकृतिक वनस्पति किस प्रकार वर्षा के वार्षिक वितरण पर आश्रित हैं? अपने उत्तर को उचित उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-भारत में प्राकृतिक वनस्पति वर्षा के वार्षिक वितरण पर आश्रित है जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 200cm से अधिक होती है वहाँ उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं। रबड़, महोगिनी, एबीनी, नारियल, बाँस, बेत एवं आदनवुड के वृक्ष मुख्य रूप से उगते हैं। ये वन अंडमान निकोबार, असम, मेघालय, नागालैंड, नागपुर, मेजोरम, त्रिपुरा एवं पश्चिम बगाल में पाये जाते हैं।
वार्षिक वर्षा जहाँ 70 से 200cm होती हैं वहाँ उष्णकटिबंधीय पर्णपाती बन उगते है। इन वनों का विस्तार तोता के मध्य एव निचली घाटी, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उडीसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट, तमिलनाडु में है। प्रमुख वृक्ष साल, चंदन, सागवान, शीशम, आम आदि हैं।
वार्षिक वर्षा 50 cm. से कम जिन क्षेत्रों में है वहाँ उष्णकटिबंधीय काँटेदार वन पाये जाते है। बबूल, कीकर, बेर, खजूर, खैर, नीम, खेजड़ी, पलास आदि के वृक्ष मुख्य रूप से राजस्थान, द-पू. में पंजाब, मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में आते हैं। शुष्क जलवायु के कारण इनके पत्ते छोटे खाल मोटी तथा जड़ें खरी होती हैं।
इस प्रकार जहाँ अधिक वर्षा होती है वहाँ लंबे-लंबे वृक्ष उगते हैं जो आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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