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bihar board 12 political | जन-आंदोलनों का उदय

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bihar board 12 political | जन-आंदोलनों का उदय

                         (RISE OF POPULAR MOVEMENTS)
                                                स्मरणीय तथ्य
• जन-आन्दोलन―वे आन्दोलन जो जन-हित या लोगों की किसी सामान्य समस्या या
समस्याओं में प्राय: दलगल राजनीति से अलग रहकर चलाये जाते हैं। उदाहरणार्थ चिपको
आंदोलन, दलित पैंथर्स आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन आन्दोलन, आदि।
• सामाजिक आन्दोलन-जो किसी भी संगठन द्वारा मुख्यतया सामाजिक समस्याओं जैसे
19वीं शताब्दी के जाति प्रथा, सती प्रथा या नारी मुक्ति आन्दोलन।
• आर्थिक आन्दोलन-वे आन्दोलन जो मुख्य रूप से जुड़े हुए हों जैसे किसान
आन्दोलन, मजदूर आन्दोलन, नेशनल फिश वर्कर्स फोरम का आन्दोलन आदि।
• नामदेव ढसाल-मराठी के प्रसिद्ध कवि जिनकी दो कविताएँ–’अंधेरे की पथयात्रा’
और ‘सूरजमुखी आशीषों वाला फकीर’ बहुत प्रसिद्ध हुई थीं।
• दलित पैंथर्स संगठन-दलित युवाओं द्वारा 1972 में गठित हुआ।
• ‘बामसेफ’-आपातकाल के बाद (1976 के बाद) बैकवर्ड-एंड माइनॉरिटी एम्पलाईज
फेडरेशन ने दलित पैधर्स की अवनति से उत्पन्न रिक्त स्थान की पूर्ति की।
• हरित क्रांति के बाद दो मुख्य नकदी फसलें बनी-(1) गन्ना तथा 2. गेहूँ।
• जाति पंचायत-वह पंचायत जो जाति विशेष की समस्याएँ ग्रामीण तथा शहरी दोनों
क्षेत्रों में उठाये तथा उनका समाधान करने से जाति मंच का प्रयोग करें।
• ताड़ी-विरोधी आंदोलन-चितूर जिले (आन्ध्र प्रदेश) की महिलाओं द्वारा देशी शराब
(या ताड़ी) के विरुद्ध अक्टूबर 1992 का आन्दोलन।
• ताड़ी-विरोधी आंदोलन का नारा-‘ताड़ी की बिक्री बंद करो।’
• एम के एस०एस०-मजदूर किसान शक्ति संगठन।
• अनुपम मिश्र-प्रसिद्ध गाँधीवादी चिपको आंदोलन के आरंभिक दौर के टिप्पणी कार।
            एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक एवं अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न एवं उनके उत्तर
                                                 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1. चिपको आंदोलन के बारे में निम्नलिखित में कौन-कौन-से कथन गलत हैं :
Which of these statements are incorrect The Chipko Movement
(क) यह पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए चला एक पर्यावरण आंदोलन था
(was an environmental movement to prevent cutting down of trees)
(ख) इस आंदोलन ने पारिस्थितिकी और आर्थिक शोषण के मामले उठाए
(raised questions of ecological and economic exploitation)
(ग) यह महिलाओं द्वारा शुरू किया गया शराब-विरोधी आंदोलन था
(was a movement against alcoholism started by the women)
(घ) इस आंदोलन की मांग थी कि स्थानीय निवासियों का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर
नियंत्रण होना चाहिए (demanded that local communities should have
control over their natural resources)              [NCERT, T.B.Q.1]
उत्तर-(क) √ (ख) √ (ग) x (घ) √
2. निम्नलिखित वाक्यों के सामने गलत तथा सही लिखिए-
(क) अधिकांश विद्वान् मानते हैं कि जन आंदोलन लोकतंत्र में व्यर्थ है और यह समय,
धन और जनशक्ति की बर्बादी है।
(ख) जन आंदोलनों को भारतीय समाज के सर्वाधिक धनी, पूँजीपतियों, पुराने जमींदारों,
जागीरदारों और स्वतंत्रता के समय देशी रजवाड़ों के शासकों ने लामबद्ध किया।
(ग) हमारे लोकतांत्रिक ढाँचे और जनमत की अभिव्यक्ति और निर्माण में जन आंदोलन
 महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते है।
(घ) चिपको आंदोलन में अनेक पुरुषों और महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उन्हें कटने से
बचाकर स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण निर्माण में प्रशंसनीय योगदान किया।
उत्तर-(क) गलत, (ख) गलत, (ग) सही, (घ) सही।
3. नीचे लिखे कुछ कथन गलत हैं। इसकी पहचान करें और जरूरी सुधार के साथ उन्हें
दुरुस्त करके दोवारा लिखें
(Some of the statements below are incorrect, identify the incorrect
statements and rewrite those with necessary correction.)
(क) सामाजिक आंदोलन भारत के लोकतंत्र को हानि पहुंँचा रहे हैं
(ख) सामाजिक आंदोलन की मुख्य ताकत विभिन्न सामजिक वर्गों के बीच व्याप्त उनका
जनाधार है
(ग) भारत के राजनीतिक दलों ने कई मुद्दों को नहीं उठाया। इसी कारण सामाजिक
आंदोलन का उदय हुआ                                         [NCERT, T.B.Q.2]
ठीक वाक्य नीचे दिए गए हैं :
(क) यह कथन गलत है क्योंकि : सामाजिक आंदोलन भारत के लोकतंत्र को हानि पहुंचा
रहे हैं।
(ख) यह कथन ठीक है क्योंकि : सामाजिक आंदोलन की मुख्य ताकत विभिन्न सामजिक
वर्गों के बीच व्याप्त उनका जनाधार हैं।
(ग) यह कथन गलत है क्योंकि : भारत के राजनीतिक दलों ने कई सामाजिक, आर्थिक
मुद्दों को नहीं उठाया। इसी कारण सामाजिक आंदोलन का उदय हुआ।
4. ‘भारतीय किसान यूनियन’ किस प्रदेश के किसानों का संगठन था?     [B.M. 2009A]
(क) उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा के किसानों का
(ख) बिहार तथा झारखंड के किसानों का
(ग) गुजरात के किसानों का
(घ) दक्षिण भारत के किसानों का                         उत्तर-(घ)
5. ई. वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ ने किस आंदोलन का नेतृत्व किया? [B.M. 2009A]
(क) द्रविड़ आंदोलन का
(ख) ताड़ी-विरोधी आंदोलन का
(ग) बिहार आंदोलन का
(घ) उपर्युक्त सभी                                            उत्तर-(क)
6. चिपको आंदोलन के संस्थापक थे- [Board Exam. 2009A; B.M. 2009A)
(क) चंडी प्रसाद भट्ट
(ख) सुंदरलाल बहुगुणा
(ग) देवी लाल
(घ) इनमें से कोई नहीं                                      उत्तर-(क)
7. ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा किसने दिया?       [Board Exam. 2009A; B.M. 2009A]
(क) जयप्रकाश नरायण ने
(ख) इंदिरा गांधी ने
(ग) जगजीवन राम ने
(घ) राजनारायण ने                            उत्तर-(क)
8. 1974 का छात्र-आंदोलन कहाँ हुआ?                  [B.M. 2009A]
(क) बिहार में
(ख) उत्तर प्रदेश में
(ग) बंगाल में
(घ) मद्रास में                                     उत्तर-(क)
9. बिहार आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?               [B.M. 2009A]
(क) कर्पूरी ठाकुर ने
(ख) जय प्रकाश नरायण ने
(ग) सत्येन्द्र नारायण सिंह ने
(घ) विश्वनाथ प्रताप सिंह ने                   उत्तर-(ख)
10. ‘सूचना का अधिकार’ कब अधिनियम बना? [Board Exam. 2009A; B.M. 2009A]
(क) 2003 में
(ख) 2004 में
(ग) 2005 में
(घ) 2006 में                                               उत्तर-(ग)
11. मेधा पाटेकर का नाम किस आंदोलन से जुड़ा है?               [B.M. 2009A]
(क) नर्मदा बचाओ आंदोलन
(ख) चिपको आंदोलन
(ग) टेहरी बाँध रोको आंदोलन
(घ) पर्यावरण प्रदूषण रोको आंदोलन                उत्तर-(क)
12. जनता दल का गठन कब हुआ?                  [B.M. 2009A]
(क) 11 अक्टूबर, 1988
(ख) मई, 1977
(ग) 31 अक्टूबर, 1984
(घ) इनमें से कोई नहीं                                  उत्तर-(क)
13. मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करना किस राजनीतिक दल के चुनाव
घोषणा-पत्र (1991) में था?                           [B.M.2009A]
(क) जनता दल
(ख) भाजपा
(ग) समाजवादी पार्टी
(घ) कांग्रेस                                                  उत्तर-(क)
14. जल, जंगल और जमीन के नारे से संबंधित आंदोलन कौन-सा है ? [B.M. 2009A]
(क) नर्मदा बचाओ आंदोलन
(ख) चिपको आंदोलन
(ग) नक्सल आंदोलन
(घ) इनमें से कोई नहीं                                   उत्तर-(ख)
15. मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्णय किस प्रधानमंत्री के काल
में हुआ?                                                                     [B.M.2009A]
(क) चौधरी चरण सिंह
(ख) वी.पी. सिंह
(ग) एच. डी. देवगौड़ा
(घ) चन्द्रशेखर                                            उत्तर-(ख)
16. पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण के संदर्भ में न्यायपालिका का निर्देश क्या है?
                                                                                   [B.M. 2009A]
(क) आरक्षण नहीं दिया जाय
(ख) आरक्षण को समय सीमा में बाँधा जाय
(ग) क्रीमी लेयर से ऊपर वाले को आरक्षण न दिया जाय
(घ) इनमें से कोई नहीं                                         उत्तर-(ग)
17. राष्ट्रीय महिला आयोग के गठन का निर्णय कब लिया गया? [B.M. 2009A]
(क) 1975
(ख) 1990
(ग) 1985
(घ) 2005                                                      उत्तर-(ख)
18. आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय तथा गरीबी के उन्मूलन के साथ ही आर्थिक विकास
रूपी उद्देश्य केवल निम्न के भीतर ही संभव है-                [B.M.2009A]
(क) तानाशाही
(ख) राजतंत्र
(ग) अराजकता
(घ) लोकतंत्रात्मक ढाँचा                       उत्तर-(घ)
19. ‘सामाजिक न्याय के साथ विकास’ का सूत्र किस पंचवर्षीय योजना में अपनाया
गया?                                                      [B.M.2009A]
(क) तीसरी पंचवर्षीय योजना
(ख) चौथी पंचवर्षीय योजना
(ग) पांचवीं पंचवर्षीय योजना
(घ) छठी पंचवर्षीय योजना                      उत्तर-(ख)
20. अखित भारतीय किसान कांग्रेस की स्थापना किसने की? [B.M.2009A]
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) राजेन्द्र प्रसार
(ग) सरदार बल्लभ भाई पटेल
(घ) चौधरी चरण सिंह                             उत्तर-(ख)
21. यह किस आंदोलन का नारा है “निजी सार्वजनिक है सार्वजनिक निजी है” [B.M.2009A]
(क) किसानों का आंदोलन
(ख) महिलाओं के आंदोलन
(ग) मजदूरों के आंदोलन
(घ) पर्यावरण की सुरक्षा के आंदोलन                उत्तर-(ख)
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
1. जन आंदोलन की प्रकृति पर अतिलघु टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-जन आदोलन वे आंदोलन होते हैं। जो प्रायः समाज के संदर्भ या श्रेणी के श्रेणीय
अथवा स्थानीय हितो, मांगों और समस्याओं से प्रेरित होकर प्रायः लोकतांत्रिक तरीके से चलाए
जाते हैं। उदाहरण के लिए 1973 में चलाया गया चिपको आंदोलन भारतीय किसान यूनियन द्वारा चलाया गया आंदोलन, दलित पैंथर्स आंदोलन, आंध्र प्रदेश ताड़ी विरोधी आंदोलन, समय-समय पर चलाए गए छात्र आंदोलन, नारी मुक्ति और सशक्तिकरण समर्थित आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन आदि जन आंदोलन के उदाहरण हैं।
2. उत्तराखंड में कुछ गाँव में जंगलों की कटाई के विरोध में किस प्रकार एक प्रसिद्ध
आंदोलन का रूप ग्रहण किया?
उत्तर-1973 में पेड़ों को बचाने के लिए सामूहिक कार्यवाही ने एक असाधारण घटना ने
वर्तमान उत्तराखंड राज्य के स्त्री-पुरुषों की एकजुटता ने वनों की व्यावसायिक कटाई का घोर विरोध किया। इस विरोध का मूल कारण था। कि सरकार ने जंगलों की कटाई
लिए अनुमति दी थी। गाँव के लोगों ने अपने विरोध को जताने के लिए एक नयी तरकीब अपनायी। इन लोगों ने पेड़ों को अपनी बाँहों में घेर लिया ताकि उन्हें कटने से बचाया जा सके। यह विरोध अगामी दिनों में भारत के पर्यावरण आंदोलन के रूप में परिणत हुआ और ‘चिपको आंदोलन के नाम से विश्वप्रसिद्ध हुआ।
3. नामदेव ढसाल कौन था? उनके दलित पैंथर्स समर्थक (पक्षधर) विचारों का उनकी
एक मराठी कविता के आधार पर संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-नामदेव ढसाल मराठी में प्रसिद्ध कवि थे। उन्होंने अनेक रचनाएँ लिखी जिनमें से
कुछ बहुत प्रसिद्ध (गोलपीठ) अंधेरे में पदयात्रा और सूरजमुखी अशीशो वाला फकीर थी।
विचार (Thoughts)–(i) नामदेव दलितों के प्रति सच्ची हमदर्दी रखते थे। वे यह मानते
थे कि वह सदियों तक दूषित सामाजिक अथवा जाति प्रथा के कारण कष्ट उठाते रहे हैं।
(ii) वे यह मानते थे कि अब अन्याय रूपी सामाजिक व्यवस्था के अंधकार का अंत और
सामाजिक समानता और न्यायरूपी सूरज के उदय हाने का समय आ गया है।
(iii) नामदेव यह मानते थे कि दलित पँथर्स लोग अपने हक और न्याय के लिए खुद खड़े
होंगे और समाज को बदलेंगे। वे प्रगति करके आकाश को छू लेंगे। वह सूरजमुखी की भाँति प्रगति, न्याय और समानता की ओर अपना रुख करेंगे।
4. महिला राष्ट्रीय आयोग का गठन कब हुआ? इसके अधीन कौन-कौन-से उपायों को
सम्मिलित किया जिनके द्वारा महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हो।
उत्तर-महिलाओं के अधिकार और कानूनी अधिकारों की सुरक्षा के लिए 1990 में संसद ने
महिलाओं के लिए राष्ट्रीय आयोग की स्थापना के लिए कानून बनाया जो 31 जनवरी 1992 को
अस्तित्व में आया। इसके अन्तर्गत कानून की समीक्षा अत्याचारों की विशिष्ट व्यक्तिगत शिकायतों
में हस्तक्षेप और जहाँ कहीं भी उपयुक्त और संभव हो महिलाओं के हितों की रक्षा के उपाय
सम्मिलित हैं।
5. स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति में क्या-क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर-स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति को असमानता से समानता तक लाने के
जागरूक प्रयास होते रहे हैं। वर्तमान काल में महिलाओं को पुरुषों के साथ समानता का दर्जा प्राप्त है। महिलाएँ किसी भी प्रकार की शिक्षा या प्रशिक्षण को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं परंतु ग्रामीण समाज में अभी भी महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है जिसे दूर किया जाना चाहिए। यद्यपि कानूनी तौर पर महिलाएंँ पुरुषों के समान अधिकार रखती है परंतु आदि काल में चली आ रही पुरुष प्रधान व्यवस्था में व्यावहारिक रूप में महिलाओं के साथ अभी भी भेदभाव किया जाता है।
6. शिक्षा और रोजगार में पुरुषों और महिलाओं की स्थिति का अंतर बताइए।
उत्तर-पुरुषों और महिलाओं की स्थिति में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में अंतर है। स्त्री
साक्षरता 2001 में 54.16 प्रतिशत थी जबकि पुरुषों की साक्षरता 75.85 प्रतिशत थी। शिक्षा के अभाव के कारण रोजगार, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की सफलता सीमित है।
7. मई 1961 में केन्द्र सरकार के काका कालेलकर आयोग की सिफारिशें अस्वीकार
करने के बाद राज्य सरकारों को क्या परामर्श दिया था?
उत्तर-केन्द्र सरकार ने मई 1961 में अन्य पिछड़ी जातियों की अखिल भारतीय सूची को
समाप्त करते हुए अनुसूचित जातियों तथा जन जातियों के अतिरिक्त किसी भी जाति को आरक्षण न देने का निर्णय लिया। अगस्त 1961 में इसने राज्य सरकारों को परामर्श दिया कि यदि वे पिछड़ी जातियों के निर्धारण की कोई कसौटी तय नहीं कर पायी हैं तो इसके लिए जाति के बजाय आर्थिक आधार को अपनाना अच्छा होगा।
8. बाबा साहब अंबेडकर पर अति संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
 उत्तर-डॉ. भीमराव अंबेडकर (1891-1956) —इनका जन्म 1891 में एक महर खानदान
में हुआ था। इन्होंने इंग्लैंड एवं अमेरिका से वकालत की शिक्षा ग्रहण की थी। 1923 में इन्होंने
वकालत प्रारंभ की। 1926 से 1934 तक ये बंबई विधान परिषद् के सदस्य रहे। इन्होंने गोलमेज
सम्मेलन में भी भाग लिया। 1942 में यह वायसराय के कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य नियुक्त
किए गए। इन्हें भारत की संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। इन्हें आजाद भारत का न्यायमंत्री भी बनाया गया। इन्होंने हिंदू कोड बिल पास करवाया एवं संविधान में हरिजनों को
आरक्षण दिलवाया। 1956 में इनका निधन हो गया।
9. मंडल आयोग की महत्त्वपूर्ण सिफारिशों का उल्लेख कीजिए। [B.M.2009A]
उत्तर-जनता पार्टी द्वारा नियुक्त मंडल की अध्यक्षता में आयोग की 1978 में ली गई तीन प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित थीं―
(i) अन्य पिछड़ी जातियों (Other backward classes = OBCs) को सरकारी सेवाओं में
27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जाए।
(ii) केंद्रीय तथा राज्य सरकारों द्वारा शासित वैज्ञानिक, तकनीकी तथा व्यावसायिक संस्थाओं
में अन्य पिछड़ी जातियों (OBCs) के लिए 27% आरक्षण निश्चित किया जाए।
(iii) अन्य पिछड़ी जातियों को आर्थिक सहयोग के लिए सरकार एक पृथक् आर्थिक संस्था
को चाहे तो निश्चित करे।
10. किन्हीं उन प्रमुख चार नेताओं का उल्लेख कीजिए जिन्होंने समाज के दलितों के
कल्याण के लिए प्रयास किए।
उत्तर-(i) ज्योतिराव फूले ने भारतीय समाज के तथाकथित पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए
आवाज उठाई, संगठन बनाए और लेख लिखे। वे ब्राह्मणवाद के कट्टर विरोधी थे।
(ii) मोहनदास करमचंद गांँधी, उन्होंने हरिजन संघ, हरिजन नाम से पत्रिका और छुआछूत
उन्मूलन और तथाकथित हरिजनों (जिन्हें प्राय: दलित कहा जाना अधिक सही माना जाता है) के
कल्याण के लिए बहुत प्रयास किया।
(iii) डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन भर दलितों के उत्थान के लिए कार्य किए,
संगठन बनाए और भारतीय संविधान की रचना के दौरान छुआछूत के व्यवहार करने वाले लोगों
को दोषी मानकर कानून के अंतर्गत कठोर दंड दिए जाने की व्यवस्था कराई।
(iv) कांशीराम ने डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान् समाज-सुधारक को अपना आदर्श और
प्रेरणास्रोत मानकर बहुजन समाज पार्टी की रचना की। यह दल उनके संपूर्ण जीवन में कार्यरत रहा। आज भी यह दल उनके कल्याण के लिए कार्यरत है।
                                              लघु उत्तरीय प्रश्न
1. जन आंदोलन के द्वारा पढ़ाए जाने वाले प्रमुख पाठों या सबकों (Lessons) का
संक्षेप मे उल्लेख कीजिए।
उत्तर-जन आंदोलन के सबक (Lesson from popular movement)-(i) जन
आंदोलनों ने लोगों को लोकतंत्र को ज्यादा बढ़िया ढंग से समझने में सहायता दी है। जो लोग जन
आंदोलन आयोजित करते रहे हैं, वे नेता और जन साधारण-स्त्री-पुरुष, छात्र-छात्राएँ, ग्रामीण
शहरी, किसान, मजदूर, गैर-सरकारी संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता आदि ये भलीभांँति इन आंदोलनों के कारण सीख गए कि लोकतंत्र में अंतिम सत्ता जनता में निहित होती है। लोग धरनों, प्रदर्शनों, विरोध मोर्चा, सत्याग्रह, अनशन आदि के द्वारा जिद्दी से जिद्दी व्यक्ति और सरकार को झुका सकते हैं।
(ii) हमें जन आंदोलनों के इतिहास से यह भी शिक्षा मिलती है। यह आंदोलन गैर दलीय
आंदोलन अनियमित ढंग से तुरंत खड़े नहीं हो जाते। इसलिए इन्हें समस्या के तौर पर नहीं देखा
जाना चाहिए।
(iii) लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली है जो दलीय प्रणाली पर आधारित होती है लेकिन
जन आंदोलनों का आदेश दलीय राजनीति की कमियों और दोषों को दूर करना होता है। इसीलिए
चाहे सत्ताधारी दल हो या सभी विरोधी दल हों, वे जन आंदोलनों के स्वरूप, विकास, प्रगति से
जुड़े समाचारों को प्रेस और दूरदर्शन पर बड़े ध्यान से पढ़ते, सुनते और देखते हैं। इसीलिए यह
लोकतंत्र और दलगत राजनीति के अहम हिस्से माने जाते हैं।
(iv) समस्याओं की अभिव्यक्ति (Expression of Problems)-(क) जन आंदोलन
सामाजिक आंदोलनों के रूप में प्रगति की सीढ़ियों पर चढ़ते हैं तो उनके द्वारा समाज के उन
नए वर्गों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को अभिव्यक्ति मिलती है जो अपनी दिक्कतों को
चुनावी राजनीति के माध्यम से हल नहीं करा पाते। इसीलिए विभिन्न सामाजिक समूहों, दलितो,
अनुसूचित जनजातियों, अनुसूचित जातियों, अन्य पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और समाजविरोधी गतिविधियों में लिप्त माफियाओं एवं बाहुबलियों को रोकने में सहायक बेहतर (Better) माध्यम के रूप में इन आंदोलनों को उपयोग में लाना ज्यादा आसान है।
(ख) समाज के गहरे तनावों और जनता के क्षोभ को एक सार्थक दिशा देकर इन आंदोलनों
ने एक तरह से लोकतंत्र की रक्षा की है। सक्रिय भागेदारी के नए रूपों के प्रयोग ने भारतीय लोकतंत्र के जनाधार को बढ़ाया है।
(ग) इन आंदोलनो के आलोचक अक्सर यह दलील देते हैं कि हड़ताल धरना और रैली
जैसी सामूहिक कार्रवाइयों से सरकार के कामकाज पर बुरा असर पड़ता है। उनके अनुसार इस तरह की गतिविधियों से सरकार की निर्णय प्रक्रिया बाधित होती है तथा रोजमर्रा की लोकतांत्रिक व्यवस्था भंग होती है।
2. जन आंदोलनों की कमियों एवं त्रुटियों को संक्षेप में लिखिए। [B.M. 2009A]
उत्तर-(i) जन-आंदोलनों द्वारा लामबंद की जाने वाली जनता सामाजिक और आर्थिक रूप
से वंचित तथा अधिकारहीन वर्गों से संबंध रखती हैं। जन-आंदोलनों द्वारा अपनए गए तौर-तरीकों से मालूम होता है कि रोजमर्रा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इन वंचित समूहों को अपनी बात कहने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता था।
(ii) किंतु कुल मिलाकर सार्वजनिक नीतियों पर इन आंदोलनों का कुल असर काफी सीमित
रहा है। इसका एक कारण तो यह है कि समकालीन सामाजिक आंदोलन किसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द ही जनता को लामबंद करते हैं। इस तरह वे समाज के लिए एक वर्ग का ही प्रतिनिधित्व कर पाते हैं। इसी सीमा के चलते सरकार इन आंदोलनों की जायज मांगों को ठुकराने का साहस कर पाती हैं। लोकतांत्रिक राजनीति वंचित वर्गों के व्यापक गठबंधन को लेकर ही चलती है जबकि जन-आदोलनों के नेतृत्व में यह बात संभव नहीं हो पाती।
(iii) राजनीतिक दलों को जनता के विभिन्न वर्गों के बीच सामंजस्य बैठाना पड़ता है,
जन-आंदोलनों के नेतृत्व इस वर्गीय हित के प्रश्नों को कायदे से नहीं संभाल पाता। राजनैतिक
दलों ने समाज के वंचित और अधिकारहीन लोगों के मुद्दों पर ध्यान देना छोड़ दिया है। पर
जन-आंदोलन का नेतृत्व भी ऐसे मुद्दों को सीमित ढंग से ही उठा पाता है।
(iv) विगत वर्षों में राजनीतिक दलों और जन-आंदोलनों का आपसी संबंध कमजोर होता
गया है। इससे राजनीति में एक सूनेपन का माहौल पनपा है। हाल के वर्षों में, भारत की राजनीति
में यह एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है।
3. नर्मदा बचाओ आंदोलन का मूल्यांकन कीजिए।                  [B.M. 2009A]
उत्तर-(i) लोगों द्वारा 2003 में स्वीकृत राष्ट्रीय पुनर्वास नीति को नर्मदा बचाओ जैसे
सामाजिक आंदोलन की उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है। परंतु सफलता के साथ ही नर्मदा बचाओ आंदोलन को बाँध के निर्माण पर रोक लगाने की मांग उठाने पर तीखा विरोध भी झेलना पड़ा है।
(ii) आलोचकों का कहना है कि आंदोलन का अड़ियल रवैया विकास की प्रक्रिया, पानी की
उपलब्धता और आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार को बांँध का काम आगे बढ़ाने की हिदायत दी है लेकिन साथ ही उसे यह भी आदेश दिया गया है कि प्रभावित लोगों का पुनर्वास सही ढंग से किया जाए।
(iii) नर्मदा बचाओ आंदोलन, दो से भी ज्यादा दशकों तक चला। आंदोलन ने अपनी मांँग
रखने के लिए हरसंभव लोकतांत्रिक रणनीति का इस्तेमाल किया। आंदोलन ने अपनी बात
न्यायपालिका से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक से उठायी। आंदोलन की समझ को जनता के सामने
रखने के लिए नेतृत्व ने सार्वजनिक रैलियों तथा सत्याग्रह जैसे तरीकों का भी प्रयोग किया परंतु
विपक्षी दलों सहित मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के बीच आंदोलन कोई खास जगह नहीं बना पाया।
(iv) वास्तव में, नर्मदा आंदोलन की विकास रेखा भारतीय राजनीति में सामाजिक आदोलन
और राजनीतिक दलों के बीच निरंतर बढ़ती दूरी को बयान करती है। उल्लेखनीय है कि नवे दशक के अंत तक पहुंँचते-पहुंँचते नर्मदा बचाओ आंदोलन से कई अन्य स्थानीय समूह और आंदोलन
भी आ जुड़े। ये सभी आंदोलन अपने अपने क्षेत्रों में विकास की वृहत परियोजनाओं का विरोध
करते थे। इस समय के आस-पास नर्मदा बचाओ आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे
समधर्मा आंदोलनों के गठबंधन का अंग बन गया।
4. भारतीय किसान यूनियन, किसानों की दुर्घटना की तरफ ध्यान आकर्षित करने वाला
अग्रणी संगठन है। नब्बे के दशक में इसने किन मुद्दों को उठाया और इसे कहाँ तक
सफलता मिली?
The Bharatiya Kisan Union is a leading organisation highlighting the
plight of farmers. What were the issues addressed by it in the nineties and to what extent were they successful?           [NCERT, T.B.Q.4)
उत्तर-भारतीय किसान यूनियन द्वारा उठाए गए मुद्दे (Issued raised by Bhartiya
Kisan Union)―
(i) बिजली की दरों में बढ़ोतरी का विरोध किया।
(ii) 1980 के दशक के उत्तरार्ध से भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के प्रयास हुए और
इस क्रम में नगदी फसल के बाजार को संकट का सामना करना पड़ा। भारतीय किसान यूनियन ने गन्ने और गेहूँ की सरकारी खरीद मूल्य में बढ़ोतरी करने,
(iii) कृषि उत्पादों के अंतर्राज्यीय आवाजाही पर लगी पाबंदियाँ हटाने,
(iv) समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति करना।
(v) किसानों के लिए पेंशन का प्रावधान करने की मांग की।
सफलताएँ (Success)-(i) जिला समाहर्ता के दफ्तर के बाहर तीन हफ्तों तक डेरा डाले
रहे। इसके बाद इनकी मांग मान ली गई। किसानों का यह बड़ा अनुशासित धरना था और जिन
दिनों वे धरने पर बैठे थे उन दिनों आस-पास के गांवों से उन्हें निरंतर राशन-पानी मिलता रहा।
मेरठ के इस धरने को ग्रामीण शक्ति को या कहें कि काश्तकारों की शक्ति का एक बड़ा प्रदर्शन
माना गया।
(ii) बीकेयू (BKU)― जैसी माँगें देश के अन्य किसान संगठनों ने भी उठाई। महाराष्ट्र के
शेतकारी संगठन ने किसानों के आंदोलन को ‘इंडिया’ की ताकतों (यानी शहरी औद्योगिक क्षेत्र)
के खिलाफ ‘भारत’ (यानी ग्रामीण कृषि क्षेत्र) का संग्राम करार दिया।
(iii) 1990 के दशक के शुरुआती सालों तक बीकेयू ने अपने को सभी राजनीतिक दलों से
दूर रखा था। यह अपने सदस्यों की संख्या बल के दम पर राजनीति में एक दबाव समूह की तरह
सक्रिय था। इस संगठन ने राज्यों में मौजूद अन्य किसान संगठनों को साथ लेकर अपनी कुछ माँगें मनवाने में सफलता पाई। इस अर्थ में किसान आंदोलन अस्सी के दशक में सबसे ज्यादा सफल सामाजिक-आंदोलन था।
(iv) इस आंदोलन की सफलता के पीछे इसके सदस्यों की राजनीतिक मोल-भाव की क्षमता
का हाथ था। यह आंदोलन मुख्य रूप से देश के समृद्ध राज्यों में सक्रिय था। खेती को अपनी
जीविका का आधार बनाने वाले अधिकांश भारतीय किसानों के विपरीत बीकेयू जैसे संगठनों के
सदस्य बाजार के लिए नगदी फसल उपजाते थे। बीकेयू की तरह राज्यों के अन्य किसान संगठनों
ने अपने सदस्य उन समुदायों के बीच से बनाए जिनका क्षेत्र की चुनावी राजनीति में रसूख था।
महाराष्ट्र का शेतकारी संगठन और कर्नाटक को रैयत संघ ऐसे किसान संगठनों के जीवंत
उदाहरण हैं।
5. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने नर्मदा घाटी की बाँध परियोजनाओं का विरोध क्यों
किया?
Why did the Narmada Bachao Aandolan oppose the dam projects in the
Narmada Valley?                                                [NCERT, T.B.Q.7]
उत्तर-(i) बांध से प्राकृतिक नदियाँ, पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है।
(ii) जिस क्षेत्र में बाँध बनाए जाते हैं वहाँ रह रहे गरीबों के घर-बार, उनकी खेती योग्य भूमि,
वर्षों से चले आ रहे कुटीर धंधों पर भी बुरा असर पड़ता है। उदाहरण के लिए सरदार सरोवर
परियोजना पूरी होने पर संबंधित राज्यों (गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र) के 245 गाँव जल-मग्न
(डूब) के क्षेत्र में आ रहे थे।
(iii) प्रभावी गांँवों के करीब ढाई लाख लोगों के पुनर्वास का मामला उठाया जा रहा था।
(iv) परियोजना पर किए जाने वाले खर्च में हेरा-फेरी के दोष और खमियाँ उजागर करना भी
परियोजना विरोधी स्वयं सेवकों का उद्देश्य था।
(v) वे प्रभावित लोगों को आजीविका और उनकी संस्कृति के साथ-साथ पर्यावरण को बचाना
भी चाहते थे। वे जल, जंगल और जमीन पर प्रभावित लोगों का नियंत्रण या उन्हें उचित मुआवजा और उनका पुनर्वास चाहते थे।
6. उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में (अव उत्तराखंड) 1970 में किन कारणों से चिपको
आंदोलन का जन्म हुआ? इस आंदोलन का क्या प्रभाव पड़ा?
Identify the reasons which led to the Chipko Movement in U.P in early
1970s. What was the impact of this movement?
                                                          [B.M. 2009ABNCERT,T.B.Q.3]
उत्तर-चिपको आंदोलन के कारण (Causes of Chipko Movement)-(i) इस
आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के दो-तीन गांवों से हुई थी। इसके पीछे एक कहानी है। गाँव
वालों ने वन विभाग से कहा कि खेती-बाड़ी के औजार बनाने के लिए हमें Ash tree काटने की
अनुमति दी जाए। वन-विभाग ने अनुमति देने से इनकार कर दिया। बहरहाल, विभाग ने
खेल-सामग्री के एक विनिर्माता को जमीन का यही टुकड़ा व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए आबंटित कर दिया। इससे गांव वालों में रोष पैदा हुआ और उन्होंने सरकार के इस कदम का विरोध किया। यह विरोध बड़ी जल्दी उत्तराखंड के अन्य इलाकों में भी फैल गया।
(ii) क्षेत्र की पारिस्थितिकी और आर्थिक-शोषण के कहीं बड़े सवाल उठने लगे। गाँववासियों
ने मांँग की कि जंगल की कटाई का कोई भी ठेका बाहरी व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए और
स्थानीय लोगों का जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर कारगर नियंत्रण होना चाहिए।
(iii) लोग चाहते थे कि सरकार लघु-उद्योगों के लिए कम कीमत की सामग्री उपलब्ध कराए
और इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी संतुलन को नुकसान पहुंचाए बगैर यहाँ का विकास सुनिश्चित करे। आंदोलन ने भूमिहीन वन कर्मचारियों का आर्थिक मुद्दा भी उठाया और न्यूनतम मजदूरी की गारंटी की मांँग की।
(iv) इलाके में सक्रिय जंगल कटाई के ठेकेदार यहाँ के पुरुषों को शराब की आपूर्ति का भी
व्यवसाय करते थे। महिलाओं ने शराबखोरी की लत के खिलाफ भी लगातार आवाज उठायी।
इससे आंदोलन का दायरा विस्तृत हुआ और उसमें कुछ और सामाजिक मसले आ जुड़े।
प्रभाव (Effects)-अंत में चिपको आंदोलन को सफलता मिली और सरकार ने पंद्रह
सालों के लिए हिमालयी क्षेत्र में पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी ताकि इस अवधि में क्षेत्र का
वनाच्छादन फिर से ठीक अवस्था में आ जाए। बहरहाल, बात इस आंदोलन की सफलता की तो
है ही, साथ ही हमें यह भी याद रखना होगा कि यह आंदोलन सत्तर के दशक और उसके बाद के
सालों में देश के विभिन्न भागों में उठे अनेक जन-आंदोलनों का प्रतीक बन गया।
7. आंध्र प्रदेश में चले शराव विरोधी आंदोलन ने देश का ध्यान कुछ गंभीर मुद्दों की
तरफ खींचा। ये मुद्दे क्या थे?
Theanti-arrack movement in Andlıra Pradesh drew theattentionofthecountry to some serious issues. What were these issues?                      [NCERT, T.B.Q.5)
उत्तर-आंध्र प्रदेश में शराब-विरोधी आंदोलन द्वारा चलाए गए जिन गंभीर मुद्दों की
तरफ ध्यान खींचा (Issue and item attention drawn by anti arrct movement
launcted in Andhra Pradesh)-ताड़ी-विरोधी आंदोलन का नारा बहुत साधारण था-‘ताड़ी
की बिक्री बंद करो। लेकिन इस साधारण नारे ने क्षेत्र के व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों तथा महिलाओं के जीवन को गहरे प्रभावित किया।
(ii) ताड़ी व्यवसाय को लेकर अपराध एवं राजनीति के बीच एक गहरा नाता बन गया था।
राज्य सरकार को ताड़ी की बिक्री से काफी राजस्व की प्राप्ति होती थी इसलिए वह इस पर प्रतिबंध नहीं लगा रही थी।
(iii) स्थानीय महिलाओं के समूहों ने इस जटिल मुद्दे को अपने आंदोलन में उठाना शुरू
किया। वे घरेलू हिंसा के मुद्दे पर भी खुले तौर पर चर्चा करने लगीं। आंदोलन ने पहली बार
महिलाओं को घरेलू हिंसा जैसे निजी मुद्दों पर बोलने का मौका दिया।
(iv) ताड़ी-विरोधी आंदोलन महिला आंदोलन, का एक हिस्सा बन गया। इससे पहले घरेलू
हिंसा, दहेज प्रथा, कार्यस्थल एवं सार्वजनिक स्थानों पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ काम करने वाले महिला समूह आमतौर पर शहरी मध्यवर्गीय महिलाओं के बीच ही सक्रिय थे और यह बात पूरे देश पर लागू होती थी। महिला समूहों के इस सतत कार्य से यह समझदारी विकसित होनी शुरू हुई कि औरतों पर होने वाले अत्याचार और लैंगिक भेदभाव का मामला खासा जटिल है।
(v) आठवें दशक के दौरान महिला आंदोलन परिवार के अंदर और उसके बाहर होने वाली
यौन हिंसा के मुद्दों पर केंद्रित रहा। इन समूहों ने दहेज प्रथा के खिलाफ मुहिम चलाई और लैंगिक
समानता के सिद्धांत पर आधारित व्यक्तिगत एवं संपत्ति कानूनों की मांँग की।
(vi) इस तरह के अभियानों ने महिलाओं के मुद्दों के प्रति समाज में व्यापक जागरुकता पैदा
की। धीरे-धीरे महिला आंदोलन कानूनी सुधारों से हटकर सामाजिक टकराव के मुद्दों पर भी खुले
तौर पर बात करने लगा।
(vii) नवें दशक तक आते-आते महिला आंदोलन समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात
करने लगा था। आपको ज्ञात ही होगा कि संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के अंतर्गत महिलाओं को स्थानीय राजनीतिक निकायों में आरक्षण दिया गया है।
8. क्या आंदोलन और विरोध की कार्यवाहियों से देश का लोकतंत्र मजबूत होता है?
अपने उत्तर की पुष्टि में उदाहरण दीजिए।
Do movements and protests in a country strengthen democracy? Justify
your answer with examples.                              [NCERT, T.B.Q. 8]
उत्तर-अहिंसक और शांतिपूर्ण वाले गाँधीगिरी के आंदोलन और कानून के दायरे में रहकर
देश का लोकतंत्र मजबूत होता है। हम अपने उत्तर की पुष्टि में निम्न उदाहरण दे सकते हैं-
(i) चिपको आंदोलन अहिंसक, शांतिपूर्ण चलाया गया एक व्यापक जन आंदोलन था। इससे
पेड़ों की कटाई, वनों का उजड़ना रुका। पशु-पक्षियों, गिरिजनों को जल, जंगल, जमीन और
स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण मिला। सरकार लोकतांत्रिक मांगों के सामने झुकी।
(ii) वामपंथियों द्वारा शांतिपूर्ण चलाए गए किसान और मजदूर आंदोलन द्वारा जन-साधारण
में जागृति, राष्ट्रीय कार्यों में भागीदारी और सरकार को सर्वहारा वर्ग की उचित माँगों के लिए जगाने में सफलता मिली।
(iii) दलित पैंथर्स नेताओं द्वारा चलाए गए आंदोलनों, लिखे गए सरकार विरोधी साहित्यकारों
की कविताओं और रचनाओं ने, आदिवासी, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और
पिछड़ी जातियों में चेतना पैदा की। दलित पैंथर्स राजनैतिक दल और संगठन बने। जाति भेद-भाव और छुआछूत को धक्का लगा। समाज में समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, राजनैतिक न्याय को सुदृढ़ता मिली।
(iv) ताड़ी विरोधी आंदोलन ने नशाबंदी और मद्य निषेध के विरोध में वातावरण तैयार किया।
महिलाओं से संबंधित अनेक समस्याएँ (यौवन उत्पीड़न, घरेलू समस्या, दहेज प्रथा और महिलाओं को विधायिकाओं में आरक्षण दिए जाने) मामले उठे। संविधान में कुछ संशोधन हुए और कानून
बनाए गए।
9. दलित-पैंथर्स ने कौन-से मुद्दे उठाए?                            [NCERT, T.B.Q.9]
What issues did the Dalit Panthers address?
उत्तर-बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक के शुरुआती सालों से शिक्षित दलितों की पहली
पीढ़ी ने अनेक मंचों से अपने हक की आवाज उठायी। इनमें ज्यादातर शहर की झुग्गी बस्तियों में
पलकर बड़े हुए दलित थे। दलित हितों की दावेदारी के इसी क्रम में महाराष्ट्र में दलित युवाओं
का एक संगठन ‘दलित पँथर्स’ 1972 में बना।
(i) आजादी के बाद के सालों में दलित समूह मुख्यतया जाति आधारित असमानता और
भौतिक साधनों के मामले में अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ रहे थे। वे इस बात को
लेकर सचेत थे कि संविधान में जाति आधारित किसी भी तरह के भेदभाव के विरुद्ध गारंटी दी
गई है।
(ii) आरक्षण के कानून तथा सामाजिक न्याय की ऐसी ही नीतियों का कारगर क्रियान्वयन
इनकी प्रमुख माँग थी।
(iii) भारतीय संविधान में छुआछूत की प्रथा को समाप्त कर दिया गया है। सरकार ने इसके
अंतर्गत ‘साठ’ और ‘सत्तर के दशक में कानून बनाए। इसके बावजूद पुराने जमाने में जिन जातियों को अछूत माना गया था, उनके साथ इस नए दौर में भी सामाजिक भेदभाव तथा हिंसा का बरताव कई रूपो में जारी रहा।
(iv) दलितों की बस्तियाँ मुख्य गाँव से अब भी दूर होती थीं। दलित महिलाओं के साथ
यौन-अत्याचार होते थे। जातिगत प्रतिष्ठा की छोटी-मोटी बात को लेकर दलितों पर सामूहिक जुल्म ढाये जाते थे। दलितों के सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न को रोक पाने में कानून की व्यवस्था नाकाफी साबित हो रही थी।
10. पर्यावरणीय आंदोलन का संक्षेप में वर्णन कीजिए।                  [B.M.2009A]
उत्तर-(1) स्वतंत्र भारत को वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए अनेक स्थानों पर अभ्यारण्यों
(Centuries) की स्थापना की गई और इन अभ्यारण्यों में सभी प्रकार के जीवों की सुरक्षा की
व्यवस्था की गई, जिससे जंगलों की संख्या बढ़े और वातावरण स्वच्छ हो।
(2) पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी गई तथा सर्वत्र वृक्षारोपण कार्य प्रारंभ किया गया। वृक्षों
की कटाई रोकने के लिए उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में चिपको आंदोलन चलाया गया। यह
आंदोलन सुंदर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में चलाया गया। भूभागीय विकास के लिए कृषि क्षेत्र में
नए बीजों, खादों और अन्य संसाधनों का विकास किया जा रहा है।’
(3) सिंचाई के लिए विभिन्न बाँधों की स्थापना की गई है। इन बाँधों से सिंचाई एवं विद्युत
उत्पादन दोनों का कार्य चलने लगा है।
(4) भारत में विकास की क्रांति के संदर्भ में कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति का नारा दिया गया
और अन्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त की गई।
(5) सड़कों के विकास के लिए यातायात की दिशा में क्रांति लाई गई और चारों तरफ सड़कों
का जाल बिछाया गया।
(6) रेलवे लाइनों को बिछाकर रेल का विस्तार किया गया। दूरसंचार के साधनों में क्रांति
लाकर घर-घर तक टेलीफोन कनेक्शन स्थापित किए गए तथा इंटरनेट की व्यवस्था की गई।
(7) वाणिज्य, उद्योग के क्षेत्र में क्रांति लाकर बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना की गई और
अंतर्राष्ट्रीय में बाजार को खोजकर यूरोपीय बाजार में दाखिला दिया गया। स्वतंत्रता के बाद
भारत में विभिन्न क्षेत्रों का क्रांति लाकर विकास किया गया―
(क) वन्य विस्तार एवं वृक्षारोपण क्रांति
(ख) जल योजना के संबंध में क्रांति
(ग) कृषि विकास में हरित क्रांति
(घ) दूर परिवहन के क्षेत्र में क्रांति
(ङ) दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति
इस प्रकार भारत की रक्षा के लिए भूमंडल बचाओ अभियान के अंतर्गत भारत की प्राकृतिक
एवं वातावरणीय सुरक्षा व्यापक रूप से की जा रही है।
11. संक्षेप में गैर-सरकारी संगठनों की मजदूर कल्याण स्वास्थ्य शिक्षा नागरिक
अधिकार, नारी उत्पीड़न तथा पर्यावरण से संबंधित उनके पहलुओं की भूमिका का
उल्लेख कीजिए।
उत्तर-भारत में सरकार के साथ-साथ गैर-सरकारी संगठन भी विभिन्न सामाजिक समस्याओं
से जुड़े मामलों को उठाते रहे हैं। ये मामले मजदूर, पर्यावरण, महिला कल्याण आदि मामलों के
साथ जुड़े हुए रहे हैं।
भारत में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका मजदूरों के कल्याण, स्वास्थ्य के विकास, शिक्षा
के प्रसार और नागरिकों के अधिकारों के रक्षण, नारी उत्पीड़न की समाप्ति, कृषि के विकास,
वृक्षारोपण आदि के क्षेत्र में व्यापक रूप में रही है। गैर-सरकारी संगठनों में-(क) अंतर्राष्ट्रीय
चैंबर ऑफ कॉमर्स, (ख) रेडक्रॉस सोसाइटी, (ग) एमनेस्टी इंटरनेशनल, (घ) मानवाधिकार आयोग आदि संगठन विश्व स्तर पर सभी देशों में फैले हुए हैं। इन गैर-सरकारी संगठनों ने इन क्षेत्र में अपनी भूमिका द्वारा निम्नलिखित विकास किया-
(1) इन गैर-सरकारी संगठनों ने मानव जाति के अधिकारों की रक्षा की। विश्व के विभिन्न
देशों में इनकी स्थापित शाखाएँ विभिन्न सरकारों द्वारा मानव अधिकारों की रक्षा करवाती हैं।
(2) इन गैर-सरकारी संगठनों ने विभिन्न देशों में वृक्षारोपण में सहयोग दिया।
(3) इन गैर-सरकारी संगठनों ने रोजगारोन्मुख योजना चलाकर मजदूरों को विभिन्न कार्यों का
प्रशिक्षण दिया।
(4) ये गैर-सरकारी संगठनों स्वास्थ्य के क्षेत्र में दवा छिड़काव, टीकाकरण, विभिन्न प्रकार
की दवाओं के वितरण और बीमारियों की रोकथाम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
(5) इन गैर-सरकारी संगठनों ने कृषि के क्षेत्र में उन्नति के लिए सरकारों से निवेदन कर
विकासात्मक कार्य करवाया। खाद, बीज आदि की व्यवस्था में योगदान दिया।
(6) विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों ने बच्चों की शिक्षा के लिए शिक्षण कार्य किया एवं सामग्रियाँ
वितरित की। इस तरह गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका मानव जाति के विकास और समस्याओं
के समाधान में व्यापक रूप से हो रही है।
12. काका कालेलकर की अध्यक्षता में नियुक्त गठित आयोग संविधान की किस धारा
के अंतर्गत नियुक्त किया गया? इस आयोग की सिफारिशों को क्यों नहीं स्वीकृत
किया गया?
उत्तर-काका कालेलकर आयोग की नियुक्ति (Appointment of Kaka
Kalelkar)-भारतीय संविधान की धारा 340 (1) के अंतर्गत भारतीय राष्ट्रपति ने काका
कालेलकर की अध्यक्षता में 1953 में आयोग गठित किया। इस आयोग का गठन सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो की स्थिति को सुधारने हेतु और उन कठिनाइयों को दूर करने के लिए आवश्यक दिशा में कदम उठाने हेतु, सुझाव देने हेतु की गई थी।
काका कालेलकर की सिफारिशों को अस्वीकृति (Nonacceptance of suggestion
of Kaka Kalelkar Contmission)-काका कालेलकर आयोग ने मार्च 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस आयोग ने 2399 जातियों को पिछड़ी जातियों की श्रेणी में रखा था परंतु इस की सिफारिश को स्वीकार नहीं कि गया क्योंकि इस आयोग ने उनके विकास के लिए
किसी रियायत की सिफारिश नहीं की थी, क्योंकि कालेलकर स्वयं लोक सेवाओं में किसी भी
समुदाय के लिए रियासत के विरुद्ध इस आधार पद था कि ‘सेवाएँ नौकरों के लिए नहीं हैं परंतु
समाज के लिए हैं’ (Services are not for servants but for the services of the entire society)
13. ज्योतिराव फूले पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-ज्योतिराव फूले (1827-1890)-ज्योतिराव गोविंदराव फूले को ज्योतिबा फूले के
नाम से जाना जाता था। ये पश्चिमी भारत के एक महान् समाज-सुधारक थे। ये निम्न माली जाति
से संबंध रखते थे इसलिए ये हिंदू समाज में निम्न जातियों की स्थिति से परिचित थे। इनके पूर्वज
फूल-मालाओं का व्यापार करते थे। ये बाल्यकाल से ही चिंतनशील थे एवं इनकी शिक्षा स्कॉटिश
मिशन स्कूल में हुई थी। ज्योतिबा फूले तत्कालीन भारतीय समाज की कुरीतियों को दूर करने हेतु
जीवन भर संघर्ष करते रहे एवं नारी को समाज में उच्च स्थान दिलाने हेतु आजीवन प्रयत्नशील
रहे। इनकी 28 नवंबर, 1890 को मृत्यु हो गई।
14. अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?
उत्तर-अनुच्छेद 340 में कहा गया है कि सरकार अन्य पिछड़ी जाति के लिए आयोग
नियुक्त कर सकती है। पहली बार 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में इस प्रकार का
आयोग नियुक्त किया गया। इस आयोग ने 2399 जातियों को पिछड़ी जातियों में सम्मिलित किया। 1978 में वी•वी• मंडल की अध्यक्षता में इस आयोग ने 3743 प्रजातियों को पिछड़ी जाति में शामिल करने की सिफारिश की। कमीशन ने 27 प्रतिशत नौकरियाँ अन्य पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित की। 1998-99 से निम्न कार्यक्रम अन्य पिछड़े वर्ग के लिए शुरू किया गया।
(1) परीक्षा पूर्व कोचिंग अन्य पिछड़े वर्ग के उन लोगों के बच्चों के लिए जिनकी आय 1
लाख रु• से कम हो।
(2) अन्य पिछड़े वर्ग के लड़के-लड़कियों के लिए हॉस्टल।
(3) प्री-मैट्रिक छात्रवृत्तियाँ।
(4) पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्तियाँ।
(5) सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक दशा सुधारने के लिए कार्यरत स्वैच्छिक संगठनों की
सहायता करना।
15. भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए सरकार
द्वारा चलाए जा रही विभिन्न योजनाओं का परीक्षण कीजिए।
उत्तर―भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष योजनाएँ
चलाई गई हैं।
(6) शिक्षा के क्षेत्र में सभी राज्यों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उच्च
स्तर तक शिक्षा निःशुल्क कर दी गई है। विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में इनके लिए स्थान आरक्षित
किए गए हैं।
(ii) तृतीय पंचवर्षीय योजना में छात्राओं के लिए छात्रावास योजना प्रारंभ की गई। नौकरियों
में आरक्षण के अतिरिक्त रोजगार दिलाने में सहायक प्रशिक्षण एवं निपुणता बढ़ाने वाले कई कार्यक्रम भी प्रारंभ किए गए हैं।
(iii) 1987 में भारत के जनजातीय सरकारी बाजार विकास संघ की स्थापना की गई। 1992-93 में जनजातीय क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की गई। 1997-2002 की नौंवी योजना अवधि में ‘आदिम जनजाति समूह’ के विकास के लिए अलग कार्य योजना की व्यवस्था की गई।
(iv) मार्च 1992 में बाबा साहब अंबेडकर संस्था की स्थापना की गई। इन सबके अतिरिक्त
इस समय 194 जनजातीय विकास योजनाएं चल रही हैं। कुछ राज्यों द्वारा शोध, शिक्षा, प्रशिक्षण, गोष्ठी, कार्यशाला, व्यावसायिक निवेश, जनजातीय शोध संस्थाओं की स्थापना, जनजातीय साहित्य का प्रकाशन आदि के कार्यक्रम चलाए गए हैं।
16. महिला सशक्तिकरण के साधन के रूप में संसद और राज्य विधान सभाओं में सीटें
आरक्षित करने की माँग का परीक्षण कीजिए।
उत्तर-किसी भी देश के संपूर्ण विकास के लिए सभी क्षेत्रों में स्त्रियों और पुरुषों की अधिकतम
भागीदारी होनी चाहिए। पुरुष और महिलाएँ दोनों ही कंधे से कंधा मिलाकर एक सुखी और
सुव्यवस्थित निजी पारिवारिक और सामाजिक जीवन व्यतीत करें। हमारे देश में जनसंख्या के
लगभग आधे हिस्से की क्षमता का कम उपयोग सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए एक गंभीर बाधा है। 1952 से 1999 तक संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम रहा है।
महिला आंदोलन चुनावी संस्थाओं में महिलाओं के आरक्षण के लिए संघर्ष करता रहा है।
73वें और 74वें संविधान संशोधन के द्वारा महिलाओं को पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिकाओं एवं नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त हुआ है। इस आंदोलन को केवल आंशिक सफलता मिली है। संसद और राज्य विधान सभाओं में ऐसे ही आरक्षण के लिए संघर्ष जारी है लेकिन जहाँ लगभग सभी राजनीतिक दल खुले तौर पर इस माँग का समर्थन करते हैं वहीं जब यह विधेयक संसद के समक्ष पेश होता है तो किसी न किसी प्रकार इसे पारित नहीं होने दिया जाता है।
17. महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति 2001 के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख करें।
[B.M. 2009A]
उत्तर-2001 में भारत सरकार ने महिला सशक्तिकरण के लिए एक राष्ट्रीय नीति घोषित
की। इस नीति के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-(1) सकारात्मक आर्थिक और सामाजिक नीतियों
द्वारा ऐसा वातावरण तैयार करना जिसमें महिलाओं को अपनी पूर्व क्षमता को पहचानने का मौका मिले और उनका पूर्ण विकास हो।
(2) महिलाओं द्वारा पुरुषों की भाँति राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नागरिक
सभी क्षेत्रों में समान स्तर पर भी मानवीय अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं का कानूनी और
वास्तविक उपभोग।
(3) स्वास्थ्य देखभाल, प्रत्येक स्तर पर उन्नत शिक्षा, जीविका एवं व्यावसायिक मार्गदर्शन,
रोजगार, समान पारिश्रमिक, व्यावसायिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक पदों आदि में महिलाओं की समान सुविधाएँ।
(4) न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाकर महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव का
उन्मूलन राष्ट्रीय नीति के अनुसार, केंद्रीय तथा राज्य मंत्रालयों को केंद्रीय, राज्यस्तरीय महिला एवं
शिशु कल्याण विभागों और राष्ट्रीय एवं राज्य महिला आयोगों के साथ सहभागिता के माध्यम से
विचार-विमर्श करके नीति को ठोस कार्यवाही में परिणत करने के लिए समयबद्ध कार्य योजना
बनानी होगी।
18. दहेज प्रथा पर अति संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-भारतीय स्त्रियों की दशा दहेज प्रथा के कारण बड़ी ही दर्दनाक और शोचनीय बनी
हुई है। निर्धन परिवारों की लड़कियों के लिए वर तलाशना बड़ा कठिन हो रहा है। आज 21वीं सदी में भी बहुत-सी बहुओं को दहेज के लालच में जला दिया जाता है। धनी परिवारों में भी दहेज की मांँग बढ़ी है। समाज के पढ़े-लिखे एवं उच्च स्तर के लोग भी दहेज प्रथा से अछूते नहीं रहे। गरीब माता-पिता की नींद हराम हो गई है। शिक्षा के प्रसार के बाद भी दहेज प्रथा बढ़ रही है। यद्यपि कामकाजी महिलाओं वाले परिवार में दहेज की प्रथा का चलन कम है।
19. महिलाओं की शिक्षा और रोजगार संबंधी स्थिति पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति में पुरुषों की अपेक्षा अधिक
अंतर है। 2001 में स्त्री साक्षरता दर 54.16 प्रतिशत थी जबकि पुरुषों में यह 75.85 प्रतिशत थी। स्वतंत्रता के समय महिलाओं की साक्षरता दर 7.9 प्रतिशत थी जबकि 2001 में यह बढ़कर 54.16 प्रतिशत हो गई। इसके बावजूद, अशिक्षित महिलाओं की संख्या इन दशकों में और भी बढ़ गई। इसका कारण जनसंख्या में वृद्धि तथा लड़कियों को विद्यालय में दाखिला न दिलवाना एवं शिक्षा की औपचारिक व्यवस्था में लड़कियों का स्कूल छोड़ जाना है। निरक्षरता एवं शिक्षा के अभाव के
कारण रोजगार का प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की सफलता सीमित है।
                                             दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. बीसवीं शताब्दी के 70 और 80 के दशकों में उदित-विकसित हुए गैर-राजनैतिक
दलों वाले (अथवा राजनैतिक दलों में स्वतंत्र) आंदोलन पर एक लेख लिखिए।
उत्तर-गैर-राजनैतिक अथवा राजनैतिक दलों से स्वतंत्र आंदोलन (Non-Political
movementorfreemovementfrom Political Parties)-कारण और कार्य में चोली-दामन का संबंधन होता है। आजादी के बाद लगभग 20वर्षों के बाद दो दशकों तक अनेक ऐसे आंदोलन उदित और विकसित हुए जिन्हें राजनीतिज्ञ और राजनीति विज्ञान के विद्वान् लोग गैर राजनीतिक अथवा राजनैतिक दलों से स्वतंत्र आंदोलनों की संज्ञा देते हैं। ये आंदोलन न तो सरकारी पक्ष के प्रचार माध्यम होते हैं और न ही विरोधी दलों की कठपुतलियाँ बनकर उन्हें सत्ता के दायरे के समीप पहुंँचाने वाले महत्त्वपूर्ण कारक होते हैं। वस्तुतः गैर-राजनैतिक आंदोलन या राजनैतिक दलों से स्वतंत्र आंदोलन स्वयं सेवी संगठनों द्वारा चलाए जाते हैं। इन्हें सर्वसाधारण के समर्थन के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी एजेंसियों का सहयोग और समर्थन भी मिलता है। जिन्हें हम मानववादी सर्वकल्याणकारी एजेंसियों कह सकते हैं।
राजनैतिक स्वतंत्र आंदोलन के कारण (Causes of Non-Political Movement)-
(i) गैर कांग्रेसवाद का असफल होना (Unsuccessfulness of non-
Congressism)-‘सत्तर’ और ‘अस्सी’ के दशक में समाज के कई तबकों का राजनीतिक दलों
के आचार-व्यवहार से मोहभंग हुआ। इसका तात्कालिक कारण तो यही था। कि जनता पार्टी के
रूप में गैर-कांग्रेसवाद का प्रयोग कुछ खास नहीं चल पाया और इसकी असफलता से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल भी कायम हुआ था।
(ii) केंद्रीय सरकार की आर्थिक नीतियों ने निराशा (Disappointment from
Economic policy of the central government)-अप्रैल 1951 से बड़े जोर-शोर से देश
में पंचवर्षीय योजनाएंँ चालू की गई लेकिन इन पंचवर्षीय योजनाओं की फूट 1970 के दशक के
शुरू होने के साथ ही निकल गई। सरकार बेरोजगारी, गरीबी, महंँगाई नहीं रोक सकी। इसलिए
सरकार की आर्थिक नीतियों से लोगों को मोहभंग हुआ था। देश ने आजादी के बाद नियोजित
विकास (Planned Development) का मॉडल को अपनाने के पीछे दो लक्ष्य थे-आर्थिक
संवृद्धि और आय का समतापूर्ण बँटवारा। आप इसके बारे में तीसरे अध्याय में पढ़ चुके हैं। आजादी के शुरुआती 20 सालों में अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय संवृद्धि हुई, लेकिन बावजूद गरीबी और असमानता बड़े पैमाने पर बनी रही।
(iii) आर्थिक और सामाजिक असमानताएँ (Economic and Social
inequalities)-देश को स्वतंत्र हुए 20 साल से भी अधिक हो गए। गाँधी जी के सपने के
अनुसार गरीबों के चक्षुओं (नेत्रों) से आँसू पोंछने का सपना तो दूर रहा, आर्थिक समृद्धि होने के
बावजूद उसका लाभ हर वर्ग को नहीं हुआ। सरल शब्दों में अमीरों और गरीबों में खाई पनपी।
धनी और धनी, निर्धन और गरीब होते चले गए। जातियों के आधार पर भारतीय समाज जो लिंग
भेद-भाव और असमानता की कुरीति से बुरी तरह ग्रसित था। बीसवीं शताब्दी के स्तर और अस्सी के दशकों में जाति और लिंग पर आधारित मौजूदा असमानताओं ने गरीबी के मसले को और ज्यादा जटिल तथा धारदार बना दिया। शहरी-औद्योगिक क्षेत्र तथा ग्रामीण कृषि-क्षेत्र के बीच भी एक न पाटी जा सकने वाली खाई पैदा हुई। समाज के विभिन्न समूहों के बीच अपने साथ हो रहे अन्याय और वंचना का भाव प्रबल हुआ।
(iv) अनेक समूहों की लोकतंत्र में विश्वास की जड़ें हिल उठी (The roots of fail
in democracy was shaken in several group of the people)-राजनीतिक धरातल पर सक्रिय कई समूहों का विश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी राजनीति से उठ गया। वे समूह
दलगल राजनीति से अलग हुए और अपने विरोध को स्वर देने के लिए इन्होंने आवाम को लामबंद करना शुरू किया। इस काम में छात्र तथा समाज के विभिन्न तबकों के राजनीतिक कार्यकर्ता आगे आए और दलित तथा आदिवासी जैसे हाशिए पर धकेल दिए गए समूहों को लाभबंद करना शुरू किया।
(v) मध्यम वर्गीय नौजवानों की भूमिका (Role of middle class yontity-देश के
मध्यवर्ग के युवा कार्यकर्ताओं ने गांँव के गरीब लोगों के बीच रचनात्मक कार्यक्रम तथा सेवा संगठन चलाए। इन संगठनों के सामाजिक कार्यों की प्रकृति स्वयंसेवी थी इसलिए इन संगठनों को स्वयंसेवी संगठन या स्वयंसेवी क्षेत्र के संगठन कहा गया।
(III) राजनैतिक दलों से स्वतंत्र संगठन की उल्लेखनीय भूमिका (Role of
independent and Non-Political Organisations)-स्वतंत्र राजनैतिक संगठनों का
मानना था कि स्थानीय मसलों के समाधान में स्थानीय नागरिकों की सीधी और सक्रिय भागीदारी
राजनीतिक दलों की अपेक्षा कहीं ज्यादा कारगर होगी।
इन संगठनों को विश्वास था। कि लोगों की सीधी भागीदारी से लोकतांत्रिक सरकार की प्रकृति
में सुधार आएगा।
अब भी ऐसे स्वयंसेवी संगठन शहरी और ग्रामीण इलाकों में लगातार सक्रिय हैं बहरहाल,
अब इनकी प्रकृति बदल गई है। बाद के समय में ऐसे अनेक संगठनों का वित्त-पोषण विदेशी
एजेंसियों से होने लगा। ऐसी एजेंसियों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सर्विस-एजेंसियां भी शामिल हैं। इन
संगठनों को बड़े पैमाने पर अब विदेशी धनराशि प्राप्त होती है जिससे स्थानीय पहल का आदर्श
कुछ कमजोर हुआ है।
2. क्या आप शराब विरोधी आंदोलन को महिला-आंदोलन का दर्जा देंगे? कारण
बताएँ।
Would you consider the anti-arrack movement as a woman’s movement?
Why?                                                           [NCERT,T.B.Q.6]
उत्तर-हाँ, हम शराब विरोधी आंदोलन को महिला आंदोलन का दर्जा देंगे। क्योंकि-
(क) यह आंदोलन दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में ताड़ी-विरोधी आंदोलन महिलाओं का एक
स्वतःस्फूत आंदोलन था ये महिलाएं अपने आस-पड़ोस में मदिरा की बिक्री पर पाबंदी की मांग
कर रही थी। वर्ष 1992 के सितंबर और अक्तूबर माह से ग्रामीण महिलाओं ने शराब के खिलाफ
लड़ाई छेड़ रखी थी। यह लड़ाई माफिया और सरकार दोनों के खिलाफ थी। इस आंदोलन ने ऐसा रूप धारण किया कि इसे राज्य में ताड़ी-विरोधी आंदोलन के रूप में जाना गया।
(ख) आंध्र प्रदेश के नेल्लौर जिले के एक दूर-दराज के गांव दूबरगंटा में 1990 के शुरुआती
दौर में महिलाओं के बीच प्रौढ़-साक्षरता कार्यक्रम चलाया गया जिसमें महिलाओं ने बड़ी संख्या
में पंजीकरण कराया। कक्षाओं में महिलाएं घर के पुरुषों द्वारा देशी शराब, ताड़ी आदि पीने की
शिकायतें करती थी। ग्रामीणों को शराब की गहरी लत लग चुकी थी। इसके चलते वे शारीरिक
और मानसिक रूप से भी कमजोर हो गए थे। शराबखोरी से क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही थी। शराब की खपत बढ़ने से कर्ज का बोझ बढ़ा। पुरुष अपने काम से लगातार गैर-हाजिर रहने लगे। शराब के ठेकेदार ताड़ी व्यापार एक एकाधिकार बनाये रखने के लिए अपराधों में व्यस्त थे। शराबखोरी से सबसे ज्यादा दिक्कत महिलाओं को हो रही थी। इससे परिवार की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। परिवार में तनाव और मारपीट का माहौल बनने लगा। नेल्लोर में महिलाएँ ताड़ी के खिलाफ आगे आई और उन्होंने शराब की दुकानों को बंद कराने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। यह खबर तेजी से फैली और करीब 5000 गाँवों की महिलाओं ने आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। प्रतिबंध-संबंधी एक प्रस्ताव को पास कर इसे जिला कलेक्टर को भेजा गया। नेल्लोर जिले में ताड़ी की नीलामी 17 बार रद्द हुई। नेल्लोर जिले का यह आदोलन धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गया।
(ग) ताड़ी विरोधी आंदोलन से अपने जीवन से जुड़ी सामाजिक समस्याएँ जैसे-दहेज
प्रथा, घरेलू हिंसा, घर से बाहर यौन उत्पीड़न, समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार, परिवार
में लैंगिक भेदभाव आदि के विरुद्ध उन्होंने व्यापक जागरूकता पैदा की।
(घ) महिलाओं ने पंचायतों, विधान सभाओं, संसद ने अपने लिए एक-तिहाई स्थानों के
आरक्षण और सरकार के सभी विभागों जैसे-वायुयान, पुलिस सेवाएँ आदि में समान अवसरों
और पदोन्नति की बात की। उन्होंने न केवल धरने दिए, प्रदर्शन किए, जुलूस निकाले बल्कि
विभिन्न मुद्दों पर महिला आयोग, राष्ट्रीय आयोग और लोकतांत्रिक मंचों से भी आवाज उठाई।
(ङ) संविधान में 73वाँ व 74वाँ संशोधन हुआ। स्थानीय निकायों में महिलाओं के स्थान
आरक्षित हो गए। विधानसभाओं और संसद में आरक्षण के लिए विधेयक अभी पारित नहीं हुए
अनेक राज्यों में शराब बंदी लागू कर दी है और महिलाओं के विरुद्ध अत्याचारों पर कठोर दंड
दिए जाने की व्यवस्था की गई है।
3. भारत में स्त्री उत्थान के लिए उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-स्त्री उत्थान के लिए उठाए गए कदम (Steps taken for uplifiment of
Women)-स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारत में स्त्रियों की दशा में सुधार लाने के लिए बहुत-से
कदम उठाए गए हैं।
(1) महिला अपराध प्रकोष्ठ तथा परिवार न्यायपालिका (Cells of crimes against
Women and family courts)-यह महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए
सुनवाई करते हैं। विवाह, तलाक, दहेज, पारिवारिक मुकदमे भी सुनते हैं।
(2) सरकारी कार्यालयों में महिलाओं की भर्ती (Recruitment of woman in
government)-लगभग सभी सरकारी कार्यालयों में महिला र्मचारियों की नियुक्ति की जाती
है। अब तो वायुसेना, नौसेना तथा थलसेना और सशस्त्र सेनाओं के तीनों अंगों में अधिकारी पदों पर स्त्रियों की भर्ती पर लगी रोक को हटा लिया गया है। सभी क्षेत्रों में महिलाएं कार्य कर रही हैं।
(3) स्त्री शिक्षा (Women Education)-स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत में स्त्री शिक्षा
का काफी विस्तार हुआ है।
(4) राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women)-1990 के एक्ट
के अंतर्गत एक राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई है। महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, पश्चिम
बंगाल, त्रिपुरा, दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, असम एवं गुजरात राज्यों में भी महिला आयोगों की
स्थापना की जा चुकी है। ये आयोग महिलाओं पर हुए अत्याचार, उत्पीड़न, शोषण तथा अपहरण आदि के मामलों की जांच पड़ताल करते हैं। सभी राज्यों में महिला आयोग स्थापित किए जाने की माँग जोर पकड़ रही है और इन आयोगों को प्रभावी बनाने की मांग भी जोरों पर है।
(5) महिलाओं का आरक्षण (Reservation of Seats for Women)-महिलाएंँ कुल
जनसंख्या की लगभग 50 प्रतिशत हैं परंतु सरकारी कार्यालयों, संसंद, राज्य विधान मंडलों आदि में इनकी संख्या बहुत कम है। 1993 के 73वें व 74वें संविधान संशोधनों द्वारा पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिकाओं में एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं। संसद तथा राज्य विधानमंडलों में भी इसी प्रकार आरक्षण किए जाने की मांँग जोर पकड़ रही है। यद्यपि इस ओर प्रयास किया जा रहा है परंतु सर्वसम्मति के अभाव में जब भी यह विधेयक संसद में लाया जाता है तो विभिन्न लग जाते हैं। अभी तक यह विधेयक पारित नहीं कराया गया है यद्यपि सभी राजनैतिक दल इसके समर्थन में बातें तो बहुत करते हैं पर किसी ने ईमानदारी से इस विधेयक का समर्थन करने की ओर ध्यान नहीं दिया है।
उपर्युक्त प्रयासों के अतिरिक्त अखिल भारतीय महिला परिषद् तथा कई अन्य महिला संगठन
स्त्रियों के अत्याचार, उत्पीड़न और अन्याय से बचाने, उन पर अत्याचार तथा बलात्कार करने
वाले अपराधियों को दंड दिलवाने तथा महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए प्रयत्नशील हैं।
4. मंडल आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशें, उन्हें कार्यान्वयन और उनके परिणामों पर
एक लेख लिखिए।                                                       [B.M. 2009A]
                              अथवा,
मंडल आयोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।            [Board Exam. 2009A]
उत्तर-(1) नियुक्ति (Appointment)-भारतीय संविधान की धारा 340 (i) के अंतर्गत
केंद्रीय सरकार की सिफारिश पर देश के राष्ट्रपति ने 1978 में मोरारजी देसाई सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बिंदेश्वरी प्रसाद के मंडल की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग (याद रहे पहला पिछड़ा वर्ग आयोग काका कालेलकर की अध्यक्षता में नियुक्त किया गया) गठित किया गया। इसके पाँच अन्य सदस्य भी थे। इस आयोग ने दिसंबर 1980 में अपना काम पूरा किया और दो भागी प्रतिवेदन में अपनी रिपोर्ट दी।
मंडल आयोग ने पिछड़े वर्ग की पहचान के लिए जाति को उचित आधार माना। हिंदू समाज
में पिछड़े वर्गों को पहचानने के लिए आयोग ने 11 संकेतों का निर्माण किया है : चार सामाजिक
जाति-आधारित पिछड़ेपन को स्थापित करते हैं। इन आधारों को अलग-अलग महत्त्व देते हुए
आयोग ने भारत की कुल जनसंख्या के बड़े भाग अर्थात् 52 प्रतिशत को अन्य पिछड़ी जातियों
में गिना अर्थात् अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों से अतिरिक्त अन्य।
(II) मंडल आयोग द्वारा सिफारिशें (Recommendations of Mandal
Commission)-पिछड़ी जातियों को दी जाने वाली रियायतें कोई आसान कार्य नहीं था। कुछ
राज्यों में पिछड़ी जातियों तथा गरीब वर्गों के लिए आरक्षण लागू करना आसान था, परंतु इसने,
आरक्षण-विरोधियों द्वारा उत्पन्न विरोध को भी सामने लाकर खड़ा कर दिया। 1978 में बिहार में
‘अग्रणीय ब्लाक’ तथा ‘पिछड़ी जातियों के मध्य हिंसात्मक विरोध हुआ। 1980 में गुजरात, मध्य
प्रदेश, आंध्र प्रदेश और यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश में भी यही हाल था। इसीलिए, पिछड़ी जातियों
की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए जनता सरकार ने 1978 में मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग को गठित किया था। इस आयोग द्वारा निम्नलिखित सिफारिशें की गई-
(1) पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।
(2) केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा संचालित सभी वैज्ञानिक, तकनीकी और व्यावसायिक
संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएँ।
(3) पिछड़े वर्गों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा अलग से वित्तीय
संस्थानों की स्थापना की जाए।
भारत सरकार ने 7 अगस्त 1990 को इन सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की।
(III) मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा और प्रतिक्रिया
(Declaration to implement the recommendation of Mandal Commission and
its reactions)-बी-पी. मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सन् 1980 में पेश की थी तथा इसे
संसद के सामने अप्रैल 1982 में रखा गया था। कांग्रेस सरकार ने इस प्रतिवेदन को न तो अस्वीकृत किया और न ही स्पष्ट रूप से स्वीकार किया। वास्तव में इसे चुपचाप अलमारी में रख दिया गया था। जनवरी 1990 में सत्ता में आई राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने आयोग की सिफारिशों को लागू करने के कदम उठाए। इसने सभी राज्य सरकारों से उनके विचार पूछे तथा अंतत: प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने सात अगस्त, 1990 को घोषणा की और 17 अप्रैल, 1990 को नौकरियों में 27% आरक्षण की मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के औपचारिक आदेश जारी कर दिए गए। इसका अर्थ यह हुआ कि अब नौकरियों में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए 22.5 प्रतिशत व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण होगा। सन् 1963 में सर्वोच्च न्यायालय ने बालाजी नामक केस के निर्णय में कहा था कि सामान्यतः कुल मिलाकर आरक्षण 50% से कम ही होगा।
(IV) मंडल और आरक्षण का विरोध (Mandal and Reservation opposition)-
बी.पी. मंडल आयोग की रिपोर्ट ने एक भयंकर विवाद को उत्पन्न कर दिया। एक विचित्र बात
यह है कि यह विवाद दक्षिण तथा वामपंथी के मध्य नहीं लड़ा जा रहा है; अपितु विवाद के दोनों
तरफ, दोनों ही प्रकार के लोग उपस्थित है वे जो, चाहते हैं कि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया
जाए, का विश्वास था कि इससे सामाजिक तथा शैक्षणिक पिछड़ापन कुछ मात्रा में घट जाएगा
और पिछड़ा हुआ वर्ग जो भारत की जनसंख्या में 52 प्रतिशत है, को जीने के लिए अवसर प्रदान करेगा। इस निर्णय का समान रूप से विरोध करने वालों का विश्वास था कि इससे जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा। कुछ जैसे ‘महाराष्ट्र महा-मंडल’ (Maharashtra Maha-Mandal) का दावा है कि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने पर देश में गृह-युद्ध शुरू हो जाएगा। एस.वाई. कोल्हतकर (S.Y. Kalhatkar) ‘जीवन मार्ग में इन सिफारिशों का समर्थन करते हुए तथा सचेत करते हुए लिखता है कि इसे लागू करने के लिए कोई आंदोलन संगठित न किया जाए, क्योंकि इससे जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा। उसके अनुसार औषधि के रूप में वामपंथी लोकतंत्रात्मक मोर्चे को विकसित किया जाए ताकि उसके द्वारा बढ़ती हुई महंगाई तथा बेरोजगारी के विरुद्ध संघर्ष संभव हो।
(V) मंडल आयोग का कार्यान्वयन के परिणाम (Results of Implementation of
Mandal Commission)-भारत सरकार ने सामान्य जातियों के गरीबों को स्थान देने के लिए
दस प्रतिशत आरक्षण करते हुए संशोधन किया (जिन्हें इस सिफारिश ने आवरण नहीं किया था)।
परंतु यह विरोधियों को संतुष्ट नहीं कर पाया। इस घोषणा की संवैधानिकता को लेकर अतिशीघ्र
सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, और इसकी सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायधीशों
की पीठ ने सुनी जिसने अपना फैसला 16 नवंबर, 1992 को दिया और इस पीठ के महत्त्वपूर्ण
निर्णय निम्नलिखित हैं-
(i) केंद्रीय सरकार द्वारा 27 प्रतिशत आरक्षण स्वीकार कर लिया गया।
(ii) सामान्य जातियों के आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोंगों के लिए रोजगार में दस प्रतिशत
आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया क्योंकि इसके पश्चात् सभी आरक्षणों का जोड़
59.5 प्रतिशत बन जाता है (वह है अनुसूचित जातियों को 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियों
को 7.5 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत तथा गरीब वर्गों का 10 प्रतिशत) और बचे
हुए 40.5 प्रतिशत रोजगार पर शेष भारतीय समुदाय को संतुष्ट रहना पड़ेगा। न्यायालय ने यह
स्पष्ट किया कि अपसामान्य (abnormal) परिस्थितियों को छोड़कर, आरक्षण 50 प्रतिशत से
अधिक नहीं होना चाहिए।
(iii) पिछड़े समुदायों की मलाईदार परतों को पिछड़े वर्ग की सूची से हटा दिया जाना चाहिए।
(iv) पदोन्नति के मामले में आरक्षण लागू नहीं होगा।
टिप्पणी या निष्कर्ष (Comment and Conclusion)-इन निर्णयों के बावजूद भी कुछ
राज्यो के कानून 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण उपलब्ध करा रहे हैं। सन् 1993 में तमिलनाडू
विधान सभा ने 69 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध करवाने के लिए एक अधिनियम पास किया है।
कर्नाटक सरकार ने 24 अक्टूबर, 1994 को एक अधिनियम के द्वारा 73 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध करवाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हें स्वीकार नहीं किया है। इस प्रकार कानूनी रूप से आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत तक ही अनुमति प्राप्त है जबकि आरक्षण सूची को और अधिक श्रेणीप्रद करने की मांँग बढ़ती जा रही है।
                                                    ★★★

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