11-geography

bihar board 11 class geography notes | पृथ्वी पर जीवन

bihar board 11 class geography notes | पृथ्वी पर जीवन

bihar board 11 class geography notes | पृथ्वी पर जीवन

15. पृथ्वी पर जीवन
(LIFE ON THE EARTH)
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उसके आदर्श उत्तर
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न :
  निम्नलिखित में से कौन जैवमंडल में सम्मिलित हैं-
(क) केवल पौधे
(ख) केवल प्राणी
(ग) सभी जैव व अजैव जीव
(घ) सभी जीवित जीव
 उत्तर-(ग)
(ii) उष्णकटिबन्धीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं-
(क) प्रेचरी
(ख) आयरन ऑक्साइड
(ग) सवाना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ग)
(iii) चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है-
(क) आयरन कानिट (ख) आयरन ऑक्साइड
(ग) आयरन नाइट्राइट
(घ) आयरन सल्फेट
उत्तर-(घ)
(iv) प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्वन
डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है।
(क) प्रोटीन
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) एमिनोएसिड
(घ) विटामिन्स
उत्तर-(ख)
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-जीवधारियों के आपस में व उनका भौतिक पर्यावरण के अंतर्सम्बन्धों का वैज्ञानिक अध्ययन ही पारिस्थितिकी है। पारिस्थिति ही प्रमुख रूप से जीवधारियों के जन्म, विकास, वितरण, प्रवृत्ति व उनके लिए प्रतिकूल अवस्थाओं में भी जीवित रहने से सम्बन्धित है, तथा भूमि, जल और वायु में क्रियाशील ऊर्जा प्रवाह और पोषण शृंखला का भी अध्ययन पारिस्थितिकी है।
(ii) पारितंत्र (Ecological System) क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्र प्रकारों को बताएँ।
उत्तर-किसी विशेष क्षेत्र में किसी विशेष समूह के जीवधारियों का भूमि, जल अथवा वायु (अजैविक तत्त्वों) में ऐसा अंतर्सम्बन्ध जिसमें ऊर्जा प्रवाह व पोषण शृखलाएं स्पष्ट रूप से समायोजित हों, उसे पारितंत्र (Ecological System) कहा जाता है। प्रमुख पारितंत्र दो प्रकार के हैं-स्थलीय (Terrestrial) पारितंत्र व जलीय (aquatic) पारितंत्र। वन, घास, क्षेत्र, मरुस्थलीय और टुण्ड्रा (Tundra) संसार के कुछ प्रमुख पारितंत्र है।
(iii) खाद्य शृंखला क्या है? चराई खाद्य श्रृंखला का एक उदाहरण देते उसके अनेक स्तर बताएँ?
उत्तर-प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीयक उपभोक्ताओं के भोजन बनते हैं। द्वितीयक उपभोक्ता फिर तृतीयक उपभोक्ताओं के द्वारा खाए जाते हैं। यह खाद्य क्रम और इस क्रम से एक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊर्जा प्रवाह ही खाद्य शृंखला (food chain) कहलाती है।
चराई खाद्य श्रृंखला पौधों (उत्पादक) से शुरू होकर मांसाहारी (तृतीयक उपभोक्ता) तक जाती है, जिसमें शाकाहारी मध्यम स्तर पर हैं। हर स्तर पर ऊर्जा का ह्रास होता है जिसमें श्वसन, उत्सर्जन व विघटन प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं। खाद्य श्रृंखला में तीन से पाँच स्तर होते हैं और हर स्तर पर ऊर्जा कम होती है। उदाहरण-
(i) घास →हिरण → शेर।
(ii) घास →कीट → मेढ़क→ पक्षी।
(iv) खाद्य जाल (food web) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित वताएँ।
उत्तर-खाद्य श्रृंखलाएँ पृथक अनुक्रम पर होकर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। प्रजातियों के इस प्रकार जुड़े होने को खाद्य जाल (food web) कहा जाता है। उदाहरणार्थ-एक चूहा जो अन्न पर निर्भर है, वह अनेक द्वितीयक उपभोक्ताओं का भोजन है और तृतीयक माँसाहारी अनेक द्वितीयक जीवों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक मांसाहारी जीव एक से अधिक प्रकार के शिकार पर निर्भर हैं।
(v) बायोम (Biome) क्या है?
उत्तर-किसी भौगोलिक क्षेत्र में समस्त पारिस्थितिक तंत्र एक साथ मिलकर एक और भी बड़ी इकाई का निर्माण करते है जिसको बायोम (Biome) कहते है। उदाहरण के लिए मरुस्थली बायोम या वन बायोम में कोई तालाब, झील, घास का मैदान या वन भी दृष्टिगोचर हो सकते हैं।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।
(i) संसार के विभिन्न वन बायोम (Forest biomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ का वर्णन करें।
उत्तर-स्थिति तथा विस्तार-सदाबहार वर्षा वन बायोम पादप तथा प्राणियों के विकास तथा वृद्धि के लिए अनुकूलतम दशायें प्रदान करता है क्योंकि इसमें वर्ष भर उच्च वर्षा तथा तापमान रहता है। इसी कारण से इसे अनुकूलतम बायोम (Opotimum biome) कहते हैं। इस बायोम का सामान्यतः विस्तार 10° उ• तथा 10° द• अक्षांशों के मध्य स्थित है।
(ii) जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeo-chemical cycle) क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Fixation) कैसे होता है, वर्णन करें?
उत्तर- -सूर्य ऊर्जा का मूल स्त्रोत है जिस पर सम्पूर्ण जीवन निर्भर है। यही ऊर्जा जैवमंडल में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा जीवन प्रक्रिया आरम्भ करती है, जो हरे पौधे के लिए भोजन व ऊर्जा का मुख्य आधार है। प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन व कार्बनिक यौगिक में परिवर्तित हो जाती है। धरती पर पहुंचने वाले सूर्यातप का बहुत छोटा भाग (केवल 0.1 प्रतिशत) प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया में काम आता है इसका आधे से अधिक भाग पौधे की श्वसन-विसर्जन क्रिया में और शेष भाग अस्थाई रूप से पौधे के अन्य भागों में संचित हो जाता है।
विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 100 करोड़ वर्षों में वायुमंडल व जलमंडल की संरचना में रासायनिक घटकों का संतुलन लगभग एक जैसा अर्थात् बदलाव रहित रहा है। रासायनिक तत्त्वों का यह संतुलन पौधे व प्राणी ऊतकों से होने वाली चक्रीय प्रवाह के द्वारा बना रहता है। यह चक्र जीवों द्वारा रासायनिक तत्त्वों के अवशोषण से आरम्भ होता है और उनके वायु. जल व मिट्टी में विघटन से पुनः आरम्भ होता है। ये चक्र मुख्यतः सौर ताप से संचालित होते है। जैवमडल में जीवधारी व पर्यावरण के बीच ये कहे जाते है। जैव भू-रासायनिक चक्र के दो प्रकार है-एक गैसीय (gaseouscycle) और दूसरा तलछटी चक्र (Sedimentary cycle)। गैसीय चक्र में पदार्थ का मुख्य भंडार/स्त्रोत वायुमडल के महासागर है। तलछटी चक्र के प्रमुख भंडार पृथ्वी की भूपर्पटी पर पाई जाने वाली मिट्टी तलछट व अन्य चट्टानें है।
(iii) पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) क्या है? इसके असंतुलन का रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।
उत्तर-किसी पारितंत्र या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की | अवस्था ही पारिस्थितिक संतुलन है। यह तभी संभव है जब जीवधारियों की विविधता अपेक्षाकृत स्थायी रहे। क्रमश परिवर्तन भी हो, लेकिन ऐसा प्राकृतिक अनुक्रमण (natural Succession) के द्वारा ही होता है। इसे पारितंत्र में हर प्रजाति की संख्या के एक स्थाई संतुलन
के रूप में भी वर्णित किया जा सकता है। यह संतुलन निश्चित प्रजातियों में प्रतिस्पर्धा व आपसी सहयोग से होता है। कुछ प्रजातियों के जिंदा रहने के संघर्ष से भी पर्यावरण संतुलन प्राप्त किया जाता है। संतुलन इस बात पर भी निर्भर करता है कि कुछ प्रजातियाँ अपने भोजन व जीवित रहने के लिए दूसरी प्रजातियों पर निर्भर रहती हैं इसके उदाहरण विशाल घास के
मैदानों में मिलते हैं जहाँ शाकाहारी जंतु अधिक संख्या में होते हैं। दूसरी तरफ मांसाहारी कम संख्या में होते हैं तथा शाकाहारियों के शिकार पर निर्भर होते हैं, अतः इनकी संख्या नियंत्रित रहती है।
पारिस्थितिक असंतुलन के कारण हैं- नई प्रजातियों का आगमन, प्राकृतिक विपदाएं और मानव जनित कारक भी है। मनुष्य के हस्तक्षेप से पादप समुदाय का संतुलन प्रभावित होता है जो अन्तोगत्वा पूरे पारितंत्र के संतुलन को प्रभावित करता है। इस असंतुलन से कई अन्य द्वितीयक अनुक्रमण आते हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर जनसंख्या दबाव से भी पारिस्थितिक बहुत प्रभावित हुई है। इसने पर्यावरण के वास्तविक रूप को लगभग नष्ट कर दिया है और सामान्य पर्यावरण पर भी बुरा प्रभाव डाला है। पर्यावरण असंतुलन से ही प्राकृतिक आपदाएँ जैसे-बाढ़, भूकम्प, बीमारियाँ और कई जलवायु सम्बन्धी परिवर्तन होते है।
विशेष आवास स्थानों में पौधों व प्राणी समुदायों में घने अंतर्सम्बन्ध पाए जाते हैं। निश्चित स्थानों पर जीवों में विविधता वहाँ के पर्यावारणीय कारकों का संकेतक है। इन कारको का समुचित ज्ञान व समझ ही पारितंत्र व संरक्षण के बचाव के प्रमुख आधार है।
परियोजना कार्य
प्रत्येक बायोम की प्रमुख विशेषताओं को बताते हुए विश्व के मानचित्र पर विभिन्न बायोम के वितरण दर्शाइए।
उत्तर-सवाना बायोम-
जलवायु-सवाना बायोम की जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ हैं-स्पष्ट शुष्क तथा आर्द्र ऋतुएँ, वर्ष भर ऊँचा तापमान तथा अधिक सूर्यातप। औसत वार्षिक वर्षा 500 से 2000 मिलीमीटर के बीच होती है तथा किसी भी महीने में तापमान 20 सेंटीग्रेड से नीचे नहीं जा पाता है। आर्द्रता तथा तापमान के आधार पर तीन ऋतुएँ होती हैं (मोटे तौर पर दो ही ऋतुएँ
होती हैं परन्तु तापमान के आधार पर शुष्क ऋतु को गर्म एवं शीत दो उपभागों में विभक्त कर लिया जाता है)। शीत शुष्क ऋतु-दिन का तापमान ऊँचा रहता है, 26° से 32° सेण्टीग्रेड। रात्रि मे यह कम होकर 21° सेण्टीग्रेड हो जाता है। उष्ण शुष्क ऋतु-सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, सूर्यातप अधिकाधिक प्राप्त होने के कारण तापमान 32° से 38° सेण्टीग्रेड के बीच रहता है तथा उष्णतर ऋतु-सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा का 80 से 90 प्रतिशत स्तर वर्षाकाल में ही प्राप्त होता है। ज्ञातव्य है कि भूमण्डल के विभिन्न सवाना प्रदेशों में वर्षा की मात्रा में पर्याप्त अन्तर होता है, जो धरातलीय बनावट तथा भूमध्यरेखा से दूरी के कारण होता है।
 यथा-ब्राजील के सवाना प्रदेश (इसे स्थानीय भाषा मे Cerrado कहते हैं, इस प्रदेश का उच्चावच सागरतल से 1300 मीटर के बीच है) में औसत वार्षिक तापमान 20° से 26° सेण्टीग्रेड तथा औसत वार्षिक वर्षा 750 से 2000 मिलीमीटर (एण्डीज के पास) तक होती है जिसका 90 प्रतिशत भाग 7 (उत्तरी भाग में) से 11 (दक्षिणी भाग में) महीनों वाली आर्द्र तथा शुष्क ऋतु में प्राप्त होता है। औसत वार्षिक तापमान 22° सेण्टीग्रेड तथा अधिकतम तापमान 32° सेण्टीग्रेड होता है परन्तु मासिक अन्तर 2° सेण्टीग्रेड से भी कम होता है। इसके विपरीत भारतीय सवाना में अधिकतम तापमान (मई तथा जून में) 45° से 48° सेण्टीग्रेड एवं न्यूनतम तापमान (जनवरी में) 5° सेण्टीग्रेड या उससे भी कम हो जाता है, औसत वार्षिक वर्षा 1500 मिलीमीटर से भी कम होती है तथा इसका 80 से 90 प्रतिशत भाग 15 जून से 15 सितम्बर के मध्य प्राप्त हो जाता है।
वनस्पति समुदाय-सवाना बायोम में घासों का बाहुल्य होता है। घासें तथा अन्य शाकीय पौधे (herbaceous plants) वनस्पति समुदाय के लम्बवत् स्तरीकरण के सबसे नीचले स्तर (धरातलीय स्तर) का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरा (मध्यवर्ती) स्तर झाड़ियो का तीसरा (सबसे ऊपरी स्तर) वृक्षों का होता है। सवाना बायोम में घासे सर्वप्रधान होती है जिनकी बनावट स्थूल (coarse) तथा कड़ी होती हैं। इनकी पत्तियाँ चपटी होती है तथा इनकी (घासोंकी) ऊँचाई 80 सेण्टीमीटर तक या उससे अधिक होती है। घासों में सर्वप्रथम तथा सर्वोच्च हाथी घास (elephant grass) होती है जिसकी ऊंचाई 5 मीटर तक होती है। इनका आकार गुच्छेदार होता है। ज्ञातव्य कि समस्त धरातल घासों के सतत आवरण से ढका नहीं होता है, अपितु बीच-बीच में नग्न धरातल भी होता है। इन घासों की पत्तियों की बनावट (चपटी तथा बड़े आकार की) ऐसी होती है कि इनसे वाष्पोत्सर्जन (transpiration) शुष्क तथा तर सभी ऋतुओं में तीव्र गति से होता है, अतः शुष्क मौसम में ये अपनी पत्तियाँ गिरा देती है तथा घास आवरण खुला तथा विरल हो जाता है, परन्तु आर्द्र मौसम के आते ही इनमें पुन: हरी पत्तियाँ तेजी से निकल आती हैं तथा वे पुनः हरी-भरी हो जाती हैं। इन घासों की जड़ें बारीक शाखाओं एवं प्रतिशाखाओं के घने जाल वाली होती हैं। इन घासों की जड़ें बारीक शाखाओं प्रतिशाखाओं के घने जाल वाली होती हैं जो लगभग 2.5 मीटर की गहराई तक मिट्टियों में प्रविष्ट हो जाती हैं। वृक्षों का स्वभाव जल की सुलभता पर निर्भर करता है कुछ ऐसी विशिष्ट प्रजातियाँ होती हैं जिनकी संरचना इस प्रकार की होती है कि शुष्क मौसम में पत्तियों द्वारा होने वाला सदाबहार स्वभाव को बनाये रहती है। कुछ वृक्षों की प्रजातियों में स्टोमैटा को बन्द करके शुष्क मौसम में जल संचित करने के गुण नहीं होते हैं। ऐसे वृक्षों की पत्तियाँ शुष्क मौसम में गिर जाती है तथा ये वृक्ष पर्णपाती वृक्षों की श्रेणी में आते हैं। वृक्षों की जड़ें सवाना प्रदेश के शुष्क एवं तर मौसमों के मुताबिक होती है, अर्थात् ये इतनी लम्बी होती हैं कि शुष्क मौसम में भौम जल स्तर (ground water table) से जल प्राप्त कर सकें। सामान्य रूप में इनकी जड़ें 5 से 20 मीटर की गहराई तक धरातल में प्रविष्ट होती हैं। H.Watter (1971) ने कुछ झाड़ियों को (tamrixSPP) 50 मीटर लम्बी जड़ों का उल्लेख किया है। शुष्क मौसम में तथा अग्निकांड के बाद ये वृक्ष अपनी इन लम्बी जड़ों से नीचे से जल ऊपर खींचते हैं तथा अपना अस्तित्व बनाये रहते हैं। कुछ वृक्षों की जड़ें कन्द (turbes) वाली होती है। वृक्षों की सामान्य ऊँचाई 15 मीटर तक होती है। तनों से छोटी-छोटी शाखाएं निकलती हैं तथा छाल एक सेण्टीमीटर तक मोटी होती है। ज्ञातव्य है कि वृक्षों की प्रजातियाँ बहुत कम होती हैं। कभी-कभी तो किसी क्षेत्र में केवल एक ही प्रजाति का प्रभुत्व होता है यथा तंजानिया से सेनेगल तक baobah प्रजाति तथा सूडान एवं आयबरी कोस्ट के सवाना में ताड़ का ही प्रभुत्व पाया जाता है।
क्षेत्र विशेष में घासों तथा वृक्षों के अनुपात के आधार पर सवाना बायोम को निम्न प्रकारों में विभक्त करते हैं-
(i) वन सवाना (Woodland Savanna)–यहाँ वृक्षों तथा झाड़ियों का प्रभुत्व होता है जिनके द्वारा ऊपरी वितान (upper canopy) अत्यन्त सघन हो जाता है परन्तु वांछित सूर्य प्रकाश धरातल तक पहुंच जाता है जिस कारण धरातल पर शाकीय पादपों (herbaceous plants) का निचला स्तर पूर्णतया विकसित हो जाता है। उपरिनिवासी पादपों (epiphytes)
का प्रायः अभाव होता है।
(ii) वृक्ष सवाना (Tree Savanna) -उस समय विकसित होता है जब धरातल पर घासों का प्राधान्य होता है तथा वृक्ष दूर-दूर बिखरे होते हैं।
(iii) झाड़ी सवाना (Shrub Savanna)-इसमें धरातल पर घासों का बाहुल्य होता है, वृक्षों का सर्वथा अभाव होता है तथा छोटी-छोटी झाड़ियाँ होती हैं।
(iv) घास सवाना (Grass Savanna)- इसका विकास वहाँ होता है जहाँ वृक्ष तथा झाड़ियाँ अनुपस्थित होती हैं तथा घासों का घना किन्तु लगातार आवरण विस्तृत क्षेत्रों पर विकसित होता है।
सभी सवाना बायोम की एक उभय विशेषता यह है कि इन्हें समय-समय पर जलाया जाता है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि जैविक पदार्थ नष्ट हो जाता है तथा जन्तुओं की जनसंख्या घटती जाती है। ज्ञातव्य है कि बार-बार आग लगाये जाने के कारण यहाँ के पादपों में कुछ ऐसी विशेषतायें विकसित हो गई हैं कि कुछ अग्नि प्रतिरोधी (fire resistant) प्रजातियों का विकास हो गया है (यथा Imperata spp, एक प्रकार की घास) ।
ज्ञातव्य है कि सवाना बायोम में विस्तृत घास क्षेत्र एवं वृक्षों की कम संख्या के कारण जन्तुओं में गतिशीलता अधिक होती है। इसी कारण से यहाँ पर वृहदाकार स्तनधारी जन्तु(हाथी, जिराफ, गैण्डा आदि) तथा पक्षी (Courses, bustards, game birds, ostriches,gazelles आदि) तथा बिना उड़ने वाले पक्षी (emu) आदि पाये जाते है।
सवाना बायोम में वनस्पति की संरचना तथा उसमें मौसमी परिवर्तन एवं बिना रीढ़ वाले प्राणियों में पूर्ण सह-सम्बन्ध पाया जाता है। रीढ़विहीन प्राणियों में कीटों (यथा- मक्खियाँ-flies (diptera), टिड्डी grasshoppers, दीमक-termitesisopteres, anyShymenoptera, springtails) तथा संधिपाद प्राणियों (जोड़ों से निर्मित पैर वाले-arthropods यथा मकड़ा, बिच्छू आदि) की असंख्य जनसंख्या पायी जाती है। उदाहरण के लिए ऊंची घास वाले पश्चिमी अफ्रीका के गायना सवाना प्रदेश में oligochaeteworms,spiders तथा insects का घनत्व शुष्क मौसम में प्रति 300 वर्ग मीटर क्षेत्र में 50,000 से 60,000 तथा आई मौसम में 1,00,000 पाया जाता है। वर्षा काल लघु प्राणियों (यथाspringtails, ants earwigs, cockroaches, small crickets,carabid bettles आदि) तथा शुष्क मौसम में बड़े जीवों (रीढविहीन, यथा locusts, grasshoper, mantids तथा(circkets) की प्रधानता रहती है।
उल्लेखनीय है कि सवाना बायोम में प्राणियों (रीढ़वाले तथा रीढ़विहीन, लघ्वाकार कीट से लेकर वृहदाकार हाथी तक) की अत्याधिक जनसंख्या के बावजूद उनमें आहार के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा नहीं होती है क्योकि इस बायोम की वनस्पतियों के मुताबिक शाकाहारी प्राणियों के आहार ग्रहण की आदतों में विशिष्टतायें पायी जाती हैं। उदाहरणार्थ-जिराफ वृक्षों की पत्तियों पर निर्भर करता है, जेबरा ऊंची घासों के ऊपरी भाग एवं झाड़ियों को खाता है, wildbeest मध्यम ऊँचाई की घासों को चराता है तथा gazells (हिरण परिवार) सबसे छोटी घासों का सेवन करता है। स्पष्ट है कि सवाना बायोम में चराई अनुक्रम (grazingsiccession) का पूर्ण विकास हुआ है। खुरवाले जन्तुओं (ungulates) की मौसमी गतिशीलता में भी पर्याप्त अन्तर होता है। इस विभिन्न मौसमी गतिशीलता के कारण भी आहार के लिए तगड़ा संघर्ष नहीं हो पाता है। मौसमी गतिशीलता के स्वाभाव के आधार पर G.Morel (1968) ने खुरवाले जानवरों को निम्न 5 श्रेणियों में विभक्त किया है-
(i) मौसमी भ्रमण रहित जन्तु-giraffe, grant’s gazelle, hartebeest.
(ii) शुष्क मौसम में आंशिक भ्रमण करने वाले जन्तु-impala.
(iii) वर्षा काल में आंशिक भ्रमण करने वाले जन्तु-watrhog, dikdik, water-buck, rhino.
(iv) शुष्क मौसम में प्रवास करने वाले जन्तु-buffalo, zebra, wildbesst, cland,elephant.
(v) मार्गीय प्रवासी (passage migrants) जन्तु-भैसा, जेबरा तथा हाथी।
सवाना प्रदेश में आये दिन वनस्पतियों को जलाने से वहाँ के प्राणियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इस क्रिया (burning) के कारण प्राणियों के प्रकार तथा उनकी संख्या में निरन्तर ह्रास हो रहा है।
प्राणी समुदाय-उल्लेखनीय है कि विश्व के विभिन्न महाद्वीपों के सवाना बायोम के विभिन्न क्षेत्रों में प्राणियों में विषमता पायी जाती है क्योकि इन भौगोलिक क्षेत्रों का अलग-अलग रूपो में विकास हुआ है तथा इनमें मानव प्रभाव का चरण तथा उसकी तीव्रता विभिन्न रही है। सवाना प्रदेश में आर्द्र एवं शुष्क ऋतुओं की पर्यावरण सम्बन्धी दशाओं में परिवर्तन के कारण वनस्पति आवरण में अंतरण होता है जिस कारण आहार की बहुलता (आर्द्र ऋतु में) तथा अल्पता (शुष्क ऋतु में) होती है। इसके बावजूद कुछ प्रकार के जन्तुओ की संख्या अन्य तथा हाथियों के बड़े-बड़े झुण्ड पाये जाते हैं। इसके विपरीत अमेरिकी तथा आस्ट्रेलियाई बायोम प्रकारो से बहुत अधिक मिलती है। अफ्रीकी सवाना में चरने वाले बड़े जन्तुओं की सबसे अधिक किस्में पायी जाती है। जेब्रा, antelope, wildbeast, जिराफ, हिप्पोपोटामस सवाना में पक्षियों को छोड़कर उक्त प्राणी कम संख्या में पाये जाते हैं। आस्ट्रेलिया में Marsupials (पेट के बाहा भाग में बनी थैली में बच्चों को रखने वाले जन्तुओं का वंश यथा-कंगारू) का प्रभुत्व है। इनकी 50 प्रजातियाँ पायी जाती है। इनमें बड़े आकार वाले  लाल कंगारू (Macropus rufus, 1.5 मीटर ऊँचे) से लेकर लघु आकार वाली wallaby (M browni, 30 सेंटीमीटर ऊंचे) प्रजातियाँ होती है। दक्षिणी अमेरिकी सवाना में चरने वाले दीर्घ जन्तुओं में deer तथा guanaco प्रमुख है। इसके अलावा यहाँ पर tucans, parrots,nightjars,kingfishers,doves finches, parakets तथा wood peckers (कठफोडवा) भारी संख्या में मिलते हैं।
रूम-सागरीय बायोम -रूम-सागरीय बायोम का विस्तार दोनों गोलार्द्धों में महाद्वीप के पश्चिमी भाग में 30° से 40° अक्षाशों के बीच पाया जाता है। इस बायोम के अन्तर्गत रूम सागर के किनारे फैले यूरोपीय भाग, उत्तरी अमेरिका में कैलिफोर्निया, उ.प. अफ्रीका का रूमसागरीय तटवर्ती भाग, द. अमेरिका में मध्य में चिली, द. अफ्रीका का सुदूर द.प. भाग तथा द.प. आस्ट्रेलिया के तटवर्ती भाग आते हैं। इस प्रदेश की जलवायु की प्रमुख विशेषता है-गर्म शुष्क ग्रीष्मकाल तथा शीत आई शरद् काल।
शरद् तथा बसंत कालीन वर्षा के जल द्वारा मिट्टियों की नमी बढ़ जाती है तथा बसन्तकाल में वनस्पतियों में अधिकतम वृद्धि होती है। ग्रीष्मकाल में तापमान बढ़ने तथा वर्षा के अभाव में जल की न्यूनता के कारण वनस्पतियों की वृद्धि का स्थगन हो जाता है। यद्यपि रूमसागरीय प्रदेश विभिन्न महाद्वीपों में काफी बिखरे हैं तथापि इनकी वनस्पति तथा बायोम संरचना में पर्याप्त समानता होती है। इस बायोम की वनस्पतियों की संरचना इस तरह की होती है कि वे ग्रीष्मकालीन शुष्कता को सहन कर सकें। पत्तियाँ मोटी तथा कठोर होती हैं (sclerophyllous) तथा तनों की छाल मोटी होती है। पादप समुदाय में वृक्ष तथा झाड़ियाँ प्रमुख होती हैं। अधिकांश पादप सदाबहार होते हैं। झाड़ियों के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानीय नाम हैं यथा- -यूरोपीय भाग में maquis of machia. कैलिफोर्निया में chaparal द. अफ्रीका में fynbos या fynboschi कई वृक्षों की पत्तियों में शुष्कानुकूलित संरचना (Xeromorphicstructure) होती है यथा मोटी बाहा त्वचा, ग्रन्थिल रोयें, बन्द रन आदि। कुछ वृक्षों (यथा mastic tree) शुष्क काल में अपने रंध्रों (stomata) को बन्द करके वाष्पोत्सर्जन (transpiration) (artemisia) न्यूनतम कर देते हैं। कुछ पत्तियों का आकार छोटा होता है (यथा chamise) ताकि कम से कम वाष्पोत्सर्जन हो सके। कुछ वृक्षों की पत्तियाँ काँटे जैसी होती हैं। कुछ पौधों के विस्तृत जड़ तंत्र होते हैं (यथा almond), कुछ पौधों की गहरी मूसली जड़ (trap root) होती है जो शैलों की संधियों में भी प्रविष्ट हो जाती हैं कुछ पौधों की जड़ें भूमि के ऊपर भी विस्तृत होती है तथा नीचे गहराई तक भी प्रविष्ट होती है (यथा-chamise) कुछ पौधों में कन्द (bulbतथा tubers) होते हैं। ये पौधे रंग-बिरगे फूल वाले होते हैं। वसन्त काल में ये खिलते हैं तथा रंग-बिरंगे दृश्य प्रस्तुत करते हैं। ग्रीष्मकाल में ये प्रसुप्तावस्था में होते हैं परंतु कंदो(bulbs) से आई शीतकाल के प्रारम्भ होते ही नये कल्ले निकल आते हैं (यथा hyaxinthus,crocus, lilium,orchisआदि)
यूरोपियन रूमसागरीय बायोम में वनस्पति समुदाय में तीन लम्बवत् स्तर पाये जाते हैं। ऊपरी स्तर का प्रमुख वृक्ष ओक है जिसके दो वर्ग है-सदाबहार ओक तथा पर्णपाती ओक। ओक की कई प्रजातियाँ पायी जाती हैं। ऊँचाई के साथ वृक्षों का क्रम बदलता जाता  है, सबसे नीचे सदाबहार ओक, बढ़ती ऊंचाई के साथ क्रमशः पर्णपाती ओक, बीच, पाइन तथा फर का क्रम पाया जाता है। दूसरा स्तर झाड़ियों का होता है जिसमें सर्वप्रमुख mquis या macchia है। इसका आवरण इतना घना होता है कि यह अप्रवेश्य हो जाता है। इसकी ऊँचाई 2 मीटर या उससे अधिक होती है। प्रमुख प्रजातियाँ हैं-arbutus, pistacia, phamnus, ceratonio आदि। इनसे गोंद, रेजिन, टैनिन, रंग आदि प्राप्त किये जाते हैं।
लगातार पशुचारण, जलाने तथा कटाई द्वारा maquis का रूपान्तरण garrigue (स्थानीय नाम) में हो गया है। Garrigue का भी मानव द्वारा विदोहन होने पर उसका रूप बदल गया है जिसे batha कहते हैं। सबसे निचले स्तर में शाकीय पौधों का आवरण होता है। उत्तरी अमेरिका (कैलिफोर्निया) बायोम में वनस्पति समुदाय में सर्वप्रमुख वृक्ष ओक
(विभिन्न प्रजातिया) तथा चैपरेल झाड़ियाँ हैं। ओक की ऊँचाई 6 से 23 मीटर तक होती है, तना छोटा होता है तथा फैला हुआ मुकुट (crowns) होता है। निचला स्तर घासों का होता है। कम उर्वर तथा हल्की मिट्टी वाले भागों में चैपरेल की घनी झाड़ियों का विकास होता है।
यह यूरोपिय maquis का समकक्षी होता है। इसी तरह बौनी झाड़ियों वाथा (यूरोपिय) की तरह यहाँ पर सेज झाड़ियाँ होती है। दक्षिणी अमेरिका के चिली में कैलिफोर्निया के समान ही वनस्पतियाँ पायी जाती है। चिली में कैलिफोर्निया के चैपरेल के समान झाड़ी को मैटोरेल कहते हैं।
उपर्युक्त रूमसागरीय क्षेत्रों के बायोम में शकाहारी स्तनधारी जन्तुओं में mule deer,browsers (कैलिफोर्निया), guanacos (चिली) आदि प्रमुख हैं। रोडेण्ट्स के कई परिवार पाये जाते हैं जिनमें खरगोश की कई प्रजातियाँ प्रमुख होती हैं। भक्षक जन्तुओं में coyote(खरगोश का प्रमुख भक्षक), liards, snakes प्रमुख हैं तथा raptorial birds में kites,
falcons तथा hawks का प्रमुख स्थान है।
शीतोष्ण घास प्रदेश बायोम (Temperate GrasslandBiome)-शीतोष्ण घास प्रदेश का विस्तार उत्तरी गोलार्द्ध में महाद्वीपों के आन्तरिक भागों (उत्तरी अमेरिका का प्रेयरीतथा यूरेशिया का स्टेपी प्रदेश) में पाया जाता है, जहाँ महाद्वीपीय जलवायु (ग्रीष्मकाल तथाशीतकालीन दशाओं में अत्याधिक अन्तर होता है) का विकास हुआ है तथा शुष्कता का
साम्राज्य रहता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में इसका विस्तार दक्षिण अमेरिका में अर्जेन्टाइना तथा युरूग्वे (पम्पाज), दक्षिण अफ्रीका के उच्च पर्वतीय भाग (वेल्ड), आस्ट्रेलिया के दक्षिण उत्तरी गोलार्द्ध के शीतोष्ण घास मैदानों में महाद्वीपीय जलवायु की प्रधानता होती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में महाद्वीपीयता का प्रभाव कम होता है। अधिकांश भागों में सर्वाधिक वर्षा
ग्रीष्म काल में होती है। इन सभी क्षेत्रों में घासें सर्वप्रमुख वनस्पति समुदाय होती हैं जो चरम समुदाय (climax community) की द्योतक हैं। इनमें सर्वप्रमुख सदाबहार घासे होती हैं।
शाकीय पौधे (herbaceousplants) वृक्ष तथा झाड़ियाँ गौण होती हैं। ज्ञातव्य है कि अधिकांश घास मैदान मानव क्रिया-कलापों का प्रतिफल हैं। प्रत्येक क्षेत्र में वनस्पति प्रकार, मृदा तथा जलवायु में तथा पादप समुदाय एवं प्राणी समुदाय में पूर्ण सहसम्बन्ध पाया जाता है। घासों का ऊपरी वितान (canopy) उनकी पत्तियाँ का होता है। पुष्पी कल्ले लघु समय तक ही रहते हैं। पुष्पों में पंखुड़ियों नहीं होती है। उनका परागण (pollination) हवा द्वारा होता है। बीजों का हवा द्वारा शीघ्र विसरण (dispersal) हो जाता है। ज्ञातव्य है कि घास मैदान के सभी प्रदेशों के अधिकांश भागों में मौलिक घास आवरण को साफ कर दिया गया है तथा उनमें खाद्यान्नों की खेती की जाती है। ये प्रदेश विश्व को प्रमुख अन्न भण्डार तथा दुग्ध व्यवसाय के क्रोडस्थल है।
(i) यूरोपीय भाग में इस घास प्रदेश को स्टेपी बायोम कहते है जिसका सर्वाधिक विकास रूस में हुआ है। इसी रूसी स्टेपी का विस्तार पूर्वी यूरोप से प. साइबेरिया तक विस्तृत क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तर में शीतोष्ण कोणधारी वनों तथा द.पू. में शुष्क प्रदेशीय बायोम के मध्य स्टेपी बायोम स्थित है। उत्तरी शीतोष्ण कोणधारी वनों तथा दक्षिण में शुद्ध घास बहुल स्टेपी बायोम के मध्य वन स्टेपी की संक्रमण मेखला (transitionalzone) पायी जाती है।
इस तरह वन स्टेपीज तथा घास स्टेपीज रूस के समस्त क्षेत्रफल के 12 प्रतिशत भाग पर फैले हैं। वन स्टेपीज के यूरोपीय भाग में ओक, लाइम, एल्म तथा मैपिल वृक्षों की बहुलता है जबकि प. साइबेरिया में बर्च, आस्पेन तथा विलो वृक्षों का मिश्रण प्रधान है, इन वन स्टेपीज के मध्य छिटपुट रूप में fescues तथा feather grasses (sita Koeleria) के वंशों वाले क्षेत्र पाये जाते हैं जिन्हें मीडोस्टेपीज (meadowsteppes) कहते हैं। वन स्टेपीज में 500 से 600 मिलीमीटर तक वार्षिक वर्षा होती है जबकि घास स्टेपीज का विकास 400 से 500 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा वाले भागों में हुआ है। उत्तर से दक्षिण दिशा में जलवायु, वनस्पति तथा मृदा में क्रमिक परिवर्तन होता जाता है। सबसे उत्तर में चरनोज्म मिट्टियों के साथ घास स्टेपीज की स्थिति है। दक्षिण की ओर जाने पर शुष्कता बढ़ती है अतः अर्द्धशुष्क स्टेपीज तथा चेस्टनट मृदा पायी जाती है और दक्षिण जाने पर अर्द्ध-शुष्क तथा शुष्क रेगिस्तान प्रारम्भ हो जाता है। उत्तर से दक्षिण वनस्पतियों का निम्नांकित अनुक्रम पाया जाता है-(i) वन स्टेपीज(इसका वर्णन ऊपर किया गया है), (ii) मीडो स्टेपीज में टर्फ वाली घासों की प्रजातियों (Stipa तथा Fescue) तथा कई प्रकार के पुष्पी शाकीय पौधे (यथा-trifolum तथा कई प्रकार के dairy) पाये जाते हैं, (iii) घास स्टेपीज में घास की प्रमुख किस्में Stipa की गुच्छेवाली प्रजातियाँ हैं तथा शुष्कानुकूलित झाड़ियों की Artemisa प्रजातियाँ प्रमुख है तथा
(iv) गहरे रंग की चेस्टनट मिट्टियों के साथ शुष्कानुकूलित झाड़ियाँ (artemisia प्रजाति) पायी जाती हैं।
(ii) उत्तरी अमेरिकी प्रेयरी का विकास संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा के पश्चिम में रॉकीज पर्वत तथा पूर्व में शीतोष्ण पर्णपाती वनों के मध्य विस्तृत क्षेत्रों में हुआ है। वार्षिक वर्षा पूर्व (1050 मिलीमीटर) से पश्चिम (400 मीलीमीटर से कम) घटती जाती है। इस प्रेयरी प्रदेश में घासों की ऊँचाई में पूर्व से पश्चिम (क्रमशः उच्च घास, मध्यम घास तथा छोटी घास) श्रेणीकरण (ordering) पाया जाता है। (i) उच्च घास प्रेयरी की मेखला सबसे पूर्व में पायी जाती है। प्रमुख घास प्रजाति bluestem होती है जिसकी ऊंचाई 1.5 से 2.4 मीटर होती है। इन घासों के मध्य में स्थान-स्थान पर ओक तथा हिकरी वृक्षों के झुरमुट पाये जाते है।, (ii) मिश्र प्रेयरी का सर्वाधिक विकास संयुक्त राज्य अमेरिका के वृहद मैदान में हुआ है।
वास्तव में मिश्र प्रेयरी का विस्तार उच्च घास प्रेयरी की पश्चिम में उत्तर (कनाडा से प्रारम्भ होकर)-दक्षिण (टक्साज तक) विस्तृत चौड़ी पट्टी में पाया जाता है जिसमें मध्यम तथा कम ऊंचाई की घासें पायी जाती है (ऊंचाई 0.6 से 1.2 मीटर तक)। प्रमुख प्रजातियाँ हैं Stippa commata (नुकीली घासें-डोरा जैसी), sand dropseed (sporobolus cryptandrus),western wheatgrass (agropyron smithii), junegrass, blue grama तथा buffalo grass, तथा (iii) लघु घास प्रेयरी का विस्तार Great Plains के पश्चिमी भाग पर पाया जाता है। घासों की ऊंचाई 60 सेण्टीमीटर से कम होती है।
(iii) दक्षिणी अमेरिकी पम्पाज का सर्वाधिक विस्तार अर्जेन्टाइना (समस्त क्षेत्रफल के 12 प्रतिशत भाग पर) में हुआ है। अमेरिकी प्रेयरीज तथा यूरोपीय स्टेपीज की तुलना में पम्पाज अधिक आर्द्र हैं। पूर्व में वार्षिक वर्षा 900 मिलीमीटर तथा पश्चिमी एवं द.पू. में 450 मिलीमीटर तक होती है। आर्द्र पम्पाज का विस्तार पूर्वी भाग में पाया जाता है जहाँ लम्बी एवं ऊंची घासें पायी जाती हैं। पश्चिम की ओर जाने पर शुष्कता बढ़ती जाती है अत: घासे छोटी पायी जाती हैं। इस पश्चिमी भाग को अर्द्ध आर्द्र पम्पाज कहते हैं। पम्पाज में कई वंश(genera) तथा प्रजातियों (species) की घासे पायी जाती हैं यथा – Birza, Bromus Panicum, Paspaluim Lolium आदि। इनमें कई स्तर (layers) पाये जाते है। मनुष्य ने
इस क्षेत्र में दलहनी जाति के lucene पौधों का रोपण किया अधिकांश पम्पाज को साफ करके गेहूं के खेतों में बदल दिया गया है।
(iv) अफ्रीकी वेल्ड (veld) का विस्तार दक्षिणी अफ्रीका में 1500 से 2000 मीटर ऊंचाई वाले पठार के पूर्वी भाग में दक्षिण ट्रान्सवाल, Orange Free State तथा लिसोथी के कुछ भागों पर पाया जाता है। ज्ञातव्य है कि इस पठार के 1500 से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले भागों पर वर्षा की अनिश्चितता, शुष्कता की अधिकता, रात्रि में पाला की प्रचंडता तथा शरद काल में दैनिक तापान्तर की अधिकता के कारण वृक्षों का उगना तथा विकसित होना सम्भव नहीं हो पाता है, अतः चरम घास समुदाय का विकास हुआ है। उल्लेखनीय है कि धरातलीय बनावट, मृदा ऊंचाई तथा जलवायु में भिन्नता के कारण घासों की संरचना में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है, अतः वेल्ड घास बायोम को कई उपभागों में विभक्त किया गया है-(i) थेमाडा वेल्ड-1500 से 1750 मीटर की ऊंचाई पर विकसित हुआ है जहाँ औसत वर्षा 650 से 750 मिलीमीटर तक होती है। Black turf soils पर विकसित होने वाले प्रमुख घास Redgrass (Themeda triandra) है। अन्य घास प्रकारों में ristida Eragrostis तथा Hyparrhenia प्रमुख हैं, (ii) अल्पाइन वेल्ड का विकास 2000 से 2500 मीटर ऊंचाई.
वाले भागों (Darkensberg पर्वत पर) पर हुआ है जिसमें Themeda के साथ Festuca तथा Bromus घासें पायी जाती है। यहाँ के प्राणी जीवन को मनुष्य ने बड़े पैमाने पर प्रभावित तथा परिमार्जित किया है। प्रारम्भ में game, antelopes, zebras (शकाहारी) तथा शेर,लकड़बाग्घा, हायना, सियार (सभी मांसाहारी) के बड़े झुण्ड पाये जाते थे परन्तु मानव द्वारा अनवरत हनन के कारण अब ये अदृश्य हो गये है। बिलकारी शाकाहारी प्राणियों में springhare,gerbil आदि अब भी भारी संख्या में पाये जाते हैं। मांसाहारी बिलकारी प्राणियों में mangooses या meerkats प्रमुख हैं।
(v) आस्ट्रेलियाई शीतोष्ण घास प्रदेश का विस्तार आस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी भाग तथा उत्तरी तस्मानिया में पाया जाता है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि (i) शरद काल उत्तरी गोलार्द्ध के शीतोष्ण घास क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म होता है तथा(ii) घासों तथा साथ-साथ युकेलिप्टस वृक्ष भी पाये जाते हैं। दक्षिणी सागर तटीय भाग से (1524 मिलीमीटर) उत्तर जाने पर (635 मिलीमीटर) औसत वार्षिक वर्षा घटती जाती है अतः यहाँ पर घास क्षेत्रों के तीन उपप्रदेश विकसित हुए हैं।
(i) शीतोष्ण लम्बी घास वाला क्षेत्र -इसका विस्तार न्यूसाउथवेल्स के पूर्वी तटीय भाग से विक्टोरिया तथा पूर्वी तस्मानिया तक है। घासों में Poa tussock तथा Themeda australis (इसे कंगारू घास कहते हैं क्योंकि यह कगारू को सर्वाधिक प्रिय होती है) तथा Danthonia pallida अधिक व्यापक हैं।
(ii) शीतोष्ण लम्बी घास वाले क्षेत्र का विकास प्रथम के समानान्तर किन्तु आन्तरिक भागों में हुआ है। यहाँ Danthonia तथा Stipa वंश की छोटी प्रजातियों का विकास हुआ है।
(iii) शुष्कानुकूलित (xerophytic) घास वाला क्षेत्र और अधिक आन्तरिक भाग में विकसित हुआ है। प्रारम्भ में आस्ट्रेलियाई शीतोष्ण घासों का विकास यहाँ के देशज जन्तुओं (यथा कंगारू) के चरने के स्वभाव के आधार पर हुआ था परन्तु भेड़ों के आगमन (मानव द्वारा) बाहर से लाकर लगाये जाने वाले पौधों (यथा clover) तथा घासों (यथा-bromus, hardeum तथा ryegrass) के कारण घासों की कई मौलिक प्रजातियाँ या तो समाप्त हो गई हैं या कमजोर पड़ गई हैं।
स्तनधारी जन्तुओं में कंगारू यहाँ का सबसे बड़ा देशज जन्तु है। बड़े कंगारुओं की यहाँ पर तीन किस्में पायी जाती हैं-(i) लाल कंगारू, (ii) भूरे कंगारू तथा (iii) wallaroos जब से यूरोपीय खरगोशों को यहाँ पर लाया गया (लगभग एक सौ वर्ष पूर्व) तब से इनकी संख्या इतनी बढ़ी है कि अब ये सर्वप्रमुख जन्तु हो गये है। बाद में इनकी संख्या की बाढ़ को रोकने के लिए परभक्षी लोमडी़ को लाया गया परन्तु इसका कोई खास प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ है। उडानविहीन Emu पक्षी यहां के विशिष्ट प्राणी है।
(vi) न्यूज़ीलैण्ड शीतोष्ण घास क्षेत्र का विकास मौलिक रूप में दक्षिणी द्वीप के पूर्वी भाग तथा उत्तरी द्वीप के मध्यवर्ती भाग में हुआ था जिसमें गुच्छेदार घासों का सर्वाधिक विकास हुआ था परन्तु विगत सौ वर्षों में मानव ने इन्हें पूर्णतया बदल दिया है। इस समय घासों को दो प्रमुख किस्मे पायी जाती है।-(i) short tussock grasses (प्रमुख प्रजातियाँ-festuca तथा poa) 0.5 मीटर ऊंची होती है तथा पीले-भूरे रंग की होती है, (ii) tall tussock grasses-उच्च भागो में पायी जाती है (प्रमुख प्रजाति Chiomechloa)। इस बायोम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शाकाहारी स्तनधारी जन्तुओं का पूर्णतया अभाव है(क्योंकि यह द्वीप सदा से अन्य स्थलीय भागों से अलग रहा है)। प्रारम्भ में यहां पर दैत्याकार उड़ानरहित moss पक्षियों का निवास था परन्तु नवागन्तुक मानव द्वारा इनका शिकार इतने बड़े पैमाने पर हुआ कि अब ये विलुप्त हो गये है।
शीतोष्णा कोणधारी वन वायोम इसे टैगा वन वायोम भी कहते है। यह बायोम शीतोष्ण बायोमों का सबसे उत्तरी बायोम (दक्षिण गोलार्द्ध में नहीं पाया जाता है) जिसे टैगा बायोम भी कहते है। इसका विस्तार उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया में शीत महाद्वीपीय अथवा उपध्रुवीय  जलवायु प्रदेशों में पाया जाता है। कोणधारी वृक्ष, वनस्पतियों में सबसे प्रभावशाली है। इनके चार प्रमुख वंश (genera) यथा-spruce(picea), pine (Pinus), fir(Abies) तथा larch (Larix)। वनस्पति समुदाय की अधिकांश संरचना करते हैं। इन कोणधारी वृक्षों के साथ शीतोष्ण पर्णपाती कठोर लकड़ी वाले वृक्षों के वंश भी (alder-Almus, birch-Betula, popular-populus) आपस में समिश्र रूप में पाये जाते है। ज्ञातव्य है कि इन शीतोष्ण पर्णपाती वृक्षो का विकास मौलिक कोणधारी वृक्षों के अग्नि के कारण नष्ट होने तथा मानव द्वारा काटे जाने के कारण द्वितीयक अनुक्रम (secondary sucession) के रूप में हुआ है। इस बायोम में सबसे अधिक मुलायम लकड़ी प्राप्त होती है जिसका सभी बायोमों के वृक्षों से सर्वाधिक आर्थिक महत्त्व होता है यहाँ
की जलवायु की प्रमुख विशेषताये है-(i) अति शीत लम्बी शीत ऋतु (कम से कम 6 महीनो का औसत तापमान शून्य अंश सेण्टीग्रेड से कम होता है), (ii) शरद् काल में हिमपात,(iii) धरातलीय नमी के जम जाने के कारण परमाफ्रास्ट सतह का निर्माण, (iv) लघु अवधि वाला गर्म ग्रीष्मकाल. (v) वनस्पति के वृद्धि काल का समय 50 (उत्तरी सीमा पर) से 100 दिन (दक्षिणी सीमा पर). (vi) वार्षिक वर्षा में अत्यधिक क्षेत्रीय विषमता (500 से 2000 मिलीमीटर, तरल जल तथा ठोस हिम दोनों को मिलाकर) तथा (vii) अत्याधिक वार्षिक तापीय विषमता [ग्रीष्मकाल में 25 सेण्टीग्रेड से शरदकाल में (-)40° सेण्टीग्रेड तक]।
यहाँ को वनस्पतियों में आवृत्तिबीजी कोणधारी (gymnosperm conifers) वृक्ष सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते है। पत्तियां सुई के समान नुकीली होती है ताकि शरद काल में मिट्टियों के हिमीकरण के समय वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कम हो सके। अधिकांश वृक्ष सदाबहार होते है। बीज शंकु के आकार की खोल में बंद रहते हैं। वनों के निचले भाग में न्यूनतम वानस्पतिक आवरण होता है। जलवायु, उच्चावच तथा मिट्टियों में विभिन्नता के साथ वृक्षो के आकार, बनावट तथा शाखाओं के प्रारूप एवं वृक्षों की प्रजातियों में पर्याप्त क्षेत्रीय विषमताएं होती हैं। अधिकांश वृक्षो की ऊंचाई 12 से 21 मीटर के बीच होती है परन्तु पर्वतीय भागो पर इनकी ऊंचाई 100 मीटर तक हो जाती है। जहाँ पर मानव द्वारा वनों की कटाई अधिक हुई है वहाँ पर शीतोष्ण पर्णपाती वनों का द्वितीय अनुक्रम विकसित हुआ है। ( उत्तरी अमेरिकी कोणधारी वन वायोम का विस्तार कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में पाया जाता है। निम्न स्थलीय कोणधारी वनों का क्षेत्र उत्तर में आर्कटिक वृक्ष रेखा(वह रेखा जिसके उत्तर क्षैतिज रूप में तथा ऊपर लम्बवत् रूप में, शरद् काल इतना लम्बा होता है कि वृक्ष का उगना तथा बढ़ना सम्भव नहीं हो पाता है) अर्थात् वृक्ष रहित टुण्ड्रा गायोम की दक्षिणी सीमा से प्रारंभ होकर दक्षिण में शीतोष्ण पर्णपाती वनों की उत्तरी सीमा के मध्य विस्तृत क्षेत्रों में पाया जाता है। सबसे उत्तर में लार्च तथा स्पूस के झुरमुट पाये जाते है। इनके दक्षिण में खुले कोणधारी वनों का विकास हुआ है। इनमें black spurce तथा white spruce बिखरे रूपों में पाये जाते हैं। वतावरण विरल होता है। धरातल पर झाड़ियो, माँस तथा लाइकेन (lichens) का घना आवरण विकसित हुआ है। इस मण्डल में विशुद्ध कोणधारी वनों का अति घना आवरण पाया जाता है जिसमें whitespruce, black spruce
तथर blasam fir का प्रभुत्व होता है। ज्ञातव्य है कि इस कोणधारी वन बायोम के उक्त तीनों मण्डलों में वृक्ष प्रकारों तथा मृदा प्रकारों में पूर्ण सह सम्बन्ध पाया जाता है यथा-उर्वर तथा उत्तम प्रवाह वाली मिट्टियों में white spruce तथा blsam fie, रेतीली मिट्टियों में Jack pines, निचले परन्तु छिछले गर्तों में दलदलों का विकास हुआ है जिनके किनारों पर black spruce के समूह विकसित होते हैं।
(ii) यूरेशिया के शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम का विस्तार पश्चिमी में उत्तरी स्कॉटलैण्ड से प्रारम्भ होकर स्कैण्डिनेविया तथा यूरोपीय रूस से होता हुआ पूर्व में साइबेरिया के पूर्वी भाग तक पाया जाता है। इसका सर्वाधिक विकास साइबेरिया में उत्तर से दक्षिण 1600 किमी. चौड़ी मेखला में (जो पश्चिम से पूर्व में फैली है) हुआ है। उत्तरी अमेरिका की भांति ही इसमें भी उत्तर से दक्षिण तीन मण्डलों (ऊपर इसका उल्लेख किया जा चुका है) का विकास हुआ है। यूरोपीय शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम में वनस्पतियों के प्रकार तथा वितरण हिमानी मिट्टियों (प्लीस्टोसीन हिमानीकरण के समय जनित) के असमान वितरण से पूर्णतया प्रभावित हुए हैं। रेतीली मिट्टियों में पाइन तथा चिकनी मिट्टी तथा दुमट मिट्टियों से स्यूस वृक्षों का विकास हुआ है। इनके बीच में स्थित झीलों के किनारों पर एल्डर, बर्च तथा विलो का विस्तार पाया जाता है। स्कैण्डिनेविकया के समस्त क्षेत्रफल के 50 प्रतिशत भाग पर शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम का विस्तार पाया जाता है। यहाँ पर प्रमुख प्रजातियाँ है-Scotspine,Norway spurce तथा birchi एशियाई भाग (साइबेरिया) में प्रमुख प्रजातियाँ है-फर, स्प्रूस,पाइन, लार्च तथा मध्य साइबेरिया में, जो सबसे सर्द भाग है, कोणधारी वृक्षों के स्थान पर
शीतोष्ण पर्णपाती वनों (बर्च तथा लघु लार्च) का विकास हुआ है।
शीतोष्ण कोणधारी वनों में वनस्पतियों का आदर्श स्तरीकरण नहीं पाया जाता है। घने तथा बन्द वनों में धरातलीय आवरण न्यूनतम होता है परन्तु खुले वनों में कुछ शाकीय पादपो,बौनी झाड़ियों तथा मॉसेस का विरल आवरण, धरातल पर पाया जाता है। इस वन बायोम की पॉडजॉल विशिष्ट मृदा होती है। इसका निर्माण भूमि तल पर पत्तियों, वृक्षो के गिरे तनों
के टूटे भाग, वृक्षों, फलों के शंकु तथा वृक्षों के छालों के वियोजक जीवों द्वारा वियोजन, मस के निर्माण, जल द्वारा अपक्षालन (leaching या eluviation) आदि द्वारा होता है।
इसका रंग काला या गहरा भूरा होता है। ऊपरी आवरण, जो मृदा के A सतह (A hotizon) के ऊपर होता है, में जैविक पदार्थों का बाहुल्य होता है। A मंडल में जल के साथ जैविक पदार्थों का अपक्षालन द्वारा नीचे गमन होता है। अतः यह मंडल अपक्षालन मण्डल (Pleaching horizon) कहा जाता है। B मंडल विनिक्षेपण मण्डल (illuviation horizon) होता है जिसमें लोहा तथा एल्यूमिनियम के यौगिक, क्ले तथा हामस तत्त्वों का जमाव होता है। इसका रंग नारंगी भूरा होता है। C मंडल में आधारभूत शैल आंशिक रूप से अपक्षयित होती है। सबसे निचला D मंडल में आधारभूत शैल का बना होता है।
टैगा या शीतोष्ण कोणधारी बायोम के प्राथमिक उपभोक्ता प्राणियों को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है-(i) वृक्षों के रस चूसने वाली प्रजातियां यथा (aphids) तथा (ii) घास चरने तथा वृक्षों की कोपलो को खाने वाली प्रजातियाँ। इन प्राणियों की आहार ग्रहण करने वाली प्रक्रियाओं से वनस्पतियों पर कुप्रभाव पड़ता है। वृक्षों से रस चूस लेने से वृक्षों में तरल पदार्थों के संचार में व्यवधान हो जाता है तथा        विपत्रण(defoliation,पत्तियों का गिरना) द्वारा पत्तियों के कम हो जाने से प्रकाश संश्लेषण में कमी हो जाती है। नयी कोपलो के भक्षण के कारण भी नयी शाखाओं तथा टहनियों एवं पत्तियों की वृद्धि कम हो जाती है। कुछ प्राणी पुष्पों तथा फलों को खा जाते है तथा भक्षण के समय अधिकांश को काटकर नीचे गिरा देते है जिस कारण पौधो की पुनर्जनन क्षमता घट जाती है। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ पौधे समाप्त हो जाते है तथा कुछ संख्या में कम हो जाते हैं, जिस कारण पादप समुदाय का संघटन ही बदल जाता है।
वन बायोम को प्रभावित करने की मात्रा के आधार पर इस बायोम के प्राणियों को तीन वर्गों में विभक्त किया जाता है—(1) सर्वप्रभावी (dominant). (ii) प्रभावी (influents) तथा (iii) गौण प्रभावी (minor influents)। सर्वप्रभावी पौधों को प्रत्यक्ष रूप से इतना प्रभावित करते है कि पादप समुदाय का संघटन ही बदल जाता है। इस श्रेणी के प्रमुख प्राणी बड़े आकार वाले शाकाहारी जन्तु होते हैं यथा-moosel प्रभावी प्राणियों में रीढ़वाले बडे़ मांसाहारी प्राणी आते हैं (मनुष्य भी इस श्रेणी में आता है)। गौण प्रभावी प्राणी ज्यादातर बिना राढ़ वाले मांसाहारी प्राणी तथा परजीवी प्राणी होते हैं। शाकाहारी बड़े जन्तुओं में caribou तथा moose प्रमुख होते हैं। कीटों की कई प्रजातियाँ भी सर्वप्रभावी प्राणियों की श्रेणी में आती हैं क्योंकि ये वृक्षों का विपन्नण द्वारा, उनकी छालों तथा जड़ों का भक्षण करके, तनों तथा शाखाओं में छेद करके नुकसान पहुंचाते है। इस तरह के कीटों में larch sawfly, pine sawfly, spruce budworms आदि प्रमुख हैं।
Black fly परिवार के कीट कई स्तनधारी प्राणियों तथा पक्षियों के शरीर से खून चूसते हैं। प्रभावी प्राणियों में बड़े आकार वाले परभक्षी (predators) मासाहारी जन्तु होते है यथा timberwolf,lynx गलितमांसभक्षी (scavengers) जन्तुओं में bears तथा wolverines(Gulo gulo) प्रमुख हैं। गौणप्रभावी प्राणियों में स्तनधारी जन्तु तथा पक्षी आते हैं-यथा-spruce grouse (उत्तरी अमेरिका में). caparcaillic (यूरेशिया में) शंक्वाकारा पत्तियों को खाते है; red squirrels (बीजों का भक्षण करते है). crosbil आदि। इस तरह के प्राणियों का भक्षण करने वाले (predators) जन्तुओं में गिलहरियों को खाने वाले pine marten. छोटे पक्षियों का शिकार करने वाले cwls तथा hawks प्रमुख है।
शरद तथा ग्रीष्म काल में कई प्राणियों का मौसमी प्रवास होता है। यहाँ की जलवायु तथा प्राणियो की सरचना में सह-सम्बन्ध पाया जाता है अर्थात् प्राणियों के शरीरों की संरचना इस तरह की होती है कि वे शीतकाल की कठोरता को सहन कर सकें। अधिकांश प्राणी मोटी खाल घने तथा लम्बे बाल वाले होते है। इन्हें समूरदार जानवर (fur animals) कहते है
(यथा mink, marten तथा beaver)। जैसे-जैसे दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते जाते है जन्तुओं का आकार बढ़ता जाता है ताकि वे अति शीत दशाओं को सहन कर सकें। मौसमी परिवर्तन के साथ आहार की आपूर्ति की समस्या भी होती है। शीतकाल में जबकि धरातलीय मट्टियां जम जाती हैं तथा धरातल पर हिमाच्छादन हो जाता है तो धरातलीय लघु पादपों का
आवरण वर्फ के नीचे ढंक जाता है तथा प्राणियों के लिए आहार संकट हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में कुछ घणी शीतनिद्रा (hibernation) में चले जाते है अर्थात् भूमि के नीचे चुपचाप निष्क्रिय पड़े रहते हैं। कुछ छोटे rodents वर्फ की परत के नीचे हो जाते हैं परन्तु वर्फ से ढंकी झाड़ियों तथा मॉसेस से अपना आहार ग्रहण करते रहते हैं। कुछ प्राणी (यथाeavers) जाड़े के लिए पहले से ही आहार का संग्रह कर लेते हैं।
टुण्ड्रा वायोम-टुण्ड्रा का शाब्दिक अर्थ होता है बंजर भूमि (barren ground)। इस वायोम में वर्ष भर सूर्यातप तथा सूर्य प्रकाश का अभाव रहता है जिस कारण वानस्पतिक विकास न्यूनतम होता है। वृक्षों का सर्वथा अभाव रहता है। कम से कम आठ महीनों तक धरातल पूर्णतया हिमाच्छादित रहता है।
तापमान हिमांक से नीचे रहता है। तेज बर्फानी हवायें चलती है। वनस्पति विकास का समय 50 दिन से भी कम होता है। मृदा सदा हिमीकृत अवस्था में होती है। इस तरह के सदा हिमीकृत धरातल को परमाफ्रास्ट कहते हैं।
आर्कटिक टुण्ड्रा का विस्तार उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया के उत्तर में स्थायी ध्रुवीय हिमावरण तथा दक्षिण में शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम की उत्तरी सीमा के मध्य पाया जाता है जिसके अन्तर्गत अलास्का, कनाडा का सुदूर उत्तरी अंचल, यूरोपीय रूस तथा साइबेरिया के उत्तरी भाग आते है। इनके अलावा आर्कटिक द्वीपों पर भी इस बायोम का विस्तार हुआ है। आर्कटिक टुण्ड्रा में वार्षिक वर्षा 400 मिलीमीटर से कम होती है। टुण्ड्रा बायोम को दो प्रकारों में विभक्त किया जाता है-आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम तथा अल्पाइन टुण्ड्रा बायोम (यह उच्च पर्वतों पर पाया जाता है, इसकी स्थिति उष्ण कटिबन्ध से लेकर शीतोष्ण कटिबन्धीय पर्वतों पर वृक्ष रेखा के ऊपर होती है)। यहाँ पर केवल आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम का ही उल्लेख किया जा रहा है।
वृक्ष रेखा के उत्तर जाने पर जलवायु की बढ़ती कठोरता के साथ वनस्पतियों में भी तेजी से परिवर्तन होता जाता है। अतः आर्कटिक टुण्ड्रा को दक्षिणी सीमा से उत्तरी सीमा तक तीन मण्डलों में विभक्त करते है (दक्षिण से उत्तर की ओर)-निम्न आर्कटिक टुण्ड्रा, मध्य आर्कटिक टुण्ड्रा तथा उच्च आर्कटिक टुण्ड्रा (ज्ञातव्य है कि निम्न, मध्य तथा उच्च, अक्षाशों के मान के प्रतीक है)। चित्र 15.5 में कनाडा के आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम के विभिन्न मण्डलों को प्रदर्शित किया गया है। निम्न टुण्ड्रा आर्कटिक टुण्ड्रा का सबसे दक्षिणी मण्डल होता है जिसके अन्तर्गत उत्तरी कनाडा का अधिक भाग, उत्तरी अलास्का, कनाडा के द्वीपो (बैंक्स द्वीप विक्टोरिया द्वीप,बैफिन द्वीप) के दक्षिणी भाग, दक्षिण ग्रीनलैण्ड, साइबेरियन प्रायद्वीप आदि सम्मिलित किये जाते है। उच्च टुण्ड्रा के अन्तर्गत कनाडा के द्वीपमण्डल (archipelago) के उत्तर में स्थित द्वीपों (यथा क्वीन एलिजाबेथ समूह के द्वीप) को सम्मिलित किया जाता है। इसमें वनस्पति छिटपुट रूप में पायी जाती है जिसमें mosses, lichens तथा कठोर शाकीय झाड़ियाँ (यथा avens saxifirages आदि) पायी जाती हैं। वृक्षो का सर्वथा अभाव पाया जाता है। मध्य टुण्ड्रा का विस्तार उक्त दो मण्डलों के मध्य पाया जाता है।
टुण्ड्रा बायोम में भी मृदा में नमी की स्थिति तथा वनस्पति के बीच पूर्ण सहसम्बन्ध पाया जाता है। लिथोसोल (पूर्ण प्रवाह युक्त मिट्टी जिसमें आधार शैल पतली होती है) में lichens तथा mosses का शुष्क समुदाय (xeric community) विकसित होता है; बॉग मृदा में sedges तथा mosses का विस्तार पाया जाता है।
आर्कटिक टुण्ड्रा में शीत की कठोरता तथा सूर्य प्रकाश के अभाव के कारण समस्त विश्व की कुल पादप प्रजातियों की मात्र 3 प्रतिशत पादप प्रजातियां ही विकसित हो पायी है। यहाँ की वनस्पतियाँ शीतानुकूलित (cryophytes) होती है अर्थात् इनमें अतिशीत दशाओं को सहन करने की सामर्थ्य होती है। NPollumin (1959) के अनुसार आर्कटिक टुण्ड्रा में शीतानुकूलित पदार्थों 66 परिवार पाये जाते है।उत्तर की ओर जाने पर शीत की कठोरता बढ़ती जाती है तथा पादप प्रजातियों की संख्या भी कम होती जाती है। अधिकांश पादप गुच्छेदार होते है तथा ऊंचाई 5 से 8 सेंटीमीटर तक होती है। ये जमीन से चिपके रहते है।क्योंकि धरातल का तापमान ऊपर स्थित वायु के ताप से अपेक्षाकृत अधिक होता है। झाड़ियों प्रायः उन भागों में विकसित होती हैं जहाँ पर हिम का ढेर उन्हें तेज चलने वाली बर्फानी हवाओं से बचा सके। इसमें आर्कटिक विलो प्रमुख हैं। इनके तने तथा पत्तियों मृदा स्तर के ऊपर कुछ सेण्टीमीटर तक होती हैं। इनकी वृद्धि दर अत्यंत मन्द होती है परन्तु इनकी आयु बहुत अधिक होती है (150 से 300 वर्ष पुराने पादपों के उदाहरण मिले है)। सदाबहार पुष्पी पादपों का विकास धरातल के गद्दे के रूप में होता है। इनमें प्रमुख है-मॉस कैम्पियन। टुण्ड्रा की कुछ पादप प्रजातियों में गूदेदार पत्तियां होती है। Saxifirage प्रजाति के कुछ पादपों का विकास गुच्छों के रूप में होता है जबकि कुछ चटाई की तरह भूमि पर क्षैतिज रूप में फैलते हैं (यथा-Dryas octopetala)आर्कटिक टुण्ड्रा के पादपों का विकास काल लघु ग्रीष्मकाल (50 दिन तक) होता है।
जिस समय इनके अवयवों का विकास, फूलों का खिलना, परागण, बीजों का बनना, उनका पकना तथा अन्ततः विसरण आदि सभी क्रियायें सम्पादित होती है।
आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम के प्राणियों को दो प्रमुख वर्गों में रखा जा सकता है-
(i) स्थायी निवासी (residents) तथा (ii) प्रवासी (migrants)। शीतकाल में अधिकांश प्राणी टुण्ड्रा छोड़कर दक्षिणी भागों में प्रवास कर जाते है। स्पष्ट है कि प्राणियों में मात्र वे ही शरद् काल में यहां टिक पाते है जिनकी विशिष्ट शारीरिक संरचना कठोर शीत से बचाव करने में समर्थ होती है। इस तरह स्थायी प्राणियों के शरीर के बाहरी भाग में फर या पंखों का घना आवरण होता है जो इनके लिए लिहाफ (रजाई) का कार्य करते हैं। Musk ox (ovibusmuschatus) स्थूल शरीर वाला शाकाहारी जन्तु होता है जिसक शरीर पर कोमल ऊन का घना आवरण होता है तथा मोटे बाल बाहर निकले रहते है। ये बाल इतने लम्बे होते है कि इस जन्तु के खड़ा होने पर भूमि को छू जाते हैं। ऊन तथा बालों का यह घना आवरण सर्दी तथा नमी के लिए अप्रवेश्य होता है, अतः यह जन्तु कठोर शीत से अपना बचाव कर लेता  है। ग्रीष्मकाल के आते ही यह आवरण गिर जाता है तथा जन्तु फटेहाल दिखाई पड़ता है। आर्कटिक लोमड़ी के शरीर पर फर का दुहरा आवरण होता है जिस कारण वह -50° सेण्टीग्रेड तक तापमान को सहन कर लेता है एवं कठोर शीतकाल में लेमिंग तथा खरगोशो का शिकार करने में व्यस्त रहता है। स्थायी पक्षियों में घने पंख होते है (यथा-Ptarmigan पक्षी)। छोटे पक्षी अपने रोयेदार पंखों को फुलाकर तथा फड़फड़ाकर शीत से अपनी रक्षा करते है। कुछ स्थायी प्राणी वर्ष के विभिन्न मौसमों में अपना रंग बदल देते हैं। Ptarmigan पक्षी अपने पंखों का रंग साल में तीन बार बदलता है। आर्कटिक लोमड़ तथा Stoat (mustela erminea) का रंग ग्रीष्मकाल में भरा होता है तथा शरद् काल में श्वेत हो जाता है। कुछ स्तनधारी जन्तुओं (यथा-रीक्ष तथा कैरिबू) के पैर का निचला भाग (जिस पर रोयें नहीं होते है। इस तरह का बना होता है कि उससे होकर शरीर की ऊष्मा बाहर न निकल सके (insulated Feet)। छोटे आकर                                              वाले rodents,lemmings,shrews  तथा volces बर्फ में बिल बनाकर रहते हैं ताकि भक्षकों से बच सके।
आर्कटिक टुण्ड्रा के अधिकांश जन्तु प्रवासी (migrants) होते हैं। जब शरद् काल प्रारम्भ होता है तो ये दक्षिण की ओर वन वाले भागों में भ्रमण कर जाते हैं तथा ग्रीष्मकाल के प्रारम्भ होते ही अपने मूल स्थान में वापस लौट आते हैं। सबसे पहले प्रवास करने तथा पुनः वापस आने वाले प्राणियों में पक्षी प्रमुख होते हैं। (water, fowl, ducks, swans तथा geese की कई प्रजातियाँ)। कुछ पक्षी वसन्तकाल में आगमन के समय दक्षिणी भाग से अपने वास्य क्षेत्र में वापस आने से पहले ही जोड़े खा लेते हैं (लैंगिक सम्पर्क)। कुछ पक्षी अपने उसी घोसले में वापस आ जाते हैं जिन्हें वे शीतकाल के समय छोड़ जाते हैं। चूंकि ग्रीष्मकाल छोटा होता है और इसी लघु समय के अन्तर्गत घोंसला बनाना, सहवास (सम्भोग) करना, अण्डे देना, उनको जनना तथा नवजात शिशुओं को चारा चुगाना आदि सभी कार्य सम्पादित करना होता है अतः इनके जोड़ों (नर तथा मादा)का प्रेमालाप लघु समय तक ही सीमित रहता है। कुछ पक्षी प्रवास के समय अत्याधिक दूरी तक जाते है। इनमें सर्वप्रमुख है-आर्कटिक टर्न (Sterna paradisaea)। ये ग्रीष्मकाल में अपने मूल आर्कटिक टुण्ड्रा
वास्य क्षेत्र में प्रवास करती है तथा शीतकाल के प्रारम्भ होते ही अपना स्थान छोड़कर दक्षिणी गोलार्द्ध में अण्टार्कटिका तक पहुंच जाती है (इस समय दक्षिण गोलार्द्ध में ग्रीष्मकाल होता है)। स्पष्ट है कि आर्कटिक टर्न एक ही वर्ष में दो बार ग्रीष्मकाल का लाभ उठाती है। कीटों में mosquitoes, midges, blackflies आदि प्रमुख हैं। ग्रीष्मकाल में छोटे-छोटे जलीय भण्डारों, दलदलों तथा नदियों में इनके लार्वा का अपार समूह विकसित हो जाता है जो पक्षियों का प्रमुख आहार है।
भ्रमणशील तथा प्रवासी बड़े जन्तुओं में रेण्डियर तथा कैरिबू सर्वप्रमुख हैं। ये शीतकाल में शीतोष्ण कोणधारी वनों में रहते हैं तथा इसी समय नर तथा मादा में सहवास होता है परन्तु बच्चों का जनन ज्यादातर ग्रीष्मकाल में टुण्ड्रा प्रदेश में होता है। ग्रीष्मकाल के प्रारम्भ होते ही caribou भारी झुण्डों में उत्तर की ओर चल पड़ते है तथा सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करके टुण्ड्रा आवास में पहुंचते है तथा मादा caribou यहाँ बच्चे जनती है। शरद् काल के आगमन होते ही इनके झुण्ड पुनः दक्षिण की ओर चल पड़ते हैं। स्पष्ट है कि यह प्रवास आहार की प्राप्यता तथा अप्राप्यता के फलस्वरूप होता है। इनके सामूहिक भ्रमण के समय रीछों का इन पर आक्रमण होता है तथा लंगड़े, कमजोर तथा कुछ गर्भवती मादा कैरिबू को रीछ पकड़ लेते हैं तथा खा जाते हैं। ग्रीष्मकाल में टुण्ड्रा बायोम में कैरिबू पर मच्छरों तथा खून चूसने वाले कीटों का भी भयानक आक्रमण होता रहता है। इनसे बचने के लिए बार-बार जल में शरण लेते हैं।
अति लघु वृद्धि काल (growingperiod), न्यूनतम सूर्यातप तथा सूर्य प्रकाश, मिट्टियो में पोषक तत्त्वों (यथा नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस) का अभाव, अविकसित मृदा, मृदा में नमी का अभाव. हिमीकृत धरातल (परमाफ्रास्ट) आदि के कारण इस आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम में न्यूनतम प्राथमिक उत्पादकता होती है। V.D.Alexandrova (1970) के आकलन के अनुसार उच्च आर्कटिक तथा निम्न आर्कटिक टुण्ड्रा में प्राथमिक उत्पादकता (Primary Productivity केवल वनस्पतियों की) क्रमशः 142 ग्राम तथा 228 ग्राम (शुष्क भार) प्रति वर्ग मीटर प्रतिवर्ष है। स्पष्ट है कि इस कम उत्पादकता के कारण शाकाहारी जन्तुओं के भोजन की आपूर्ति नहीं हो पाती है, अतः ये मौसमी प्रवास करते हैं। सागरीय बायोम-सागरीय बायोम की कुछ ऐसी विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं (जो प्राय: स्थलीय बायोम में नहीं होती है) जो यहाँ के जीव समुदायों (पादप तथा प्राणी दोनो) को प्रभावित करती हैं। महासागरीय जल का तापमान 0° से 30° सेण्टीग्रेड के बीच रहता है।
सागरीय जल में घुले पोषक लवण तत्त्वों की अधिकता होती है। सागरीय बायोम में जीवन तथा आहार श्रृंखला एवं आहार जाल, सूर्य प्रकाश, जल, कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन की सुलभता पर आधरित होता है। ये सभी कारक मुख्य रूप से सागर की ऊपरी सतह में ही आदर्श स्थिति में सुलभ होते हैं। प्रकाश नीचे जाने पर कम होता जाता है तथा 200 मीटर
से अधिक गहराई पर जाने पर पूर्णतया समाप्त हो जाता है। इसी ऊपरी सतह (प्रकाशित मण्डल-photiczone) में प्राथमिक उत्पादक पौधे (हरे पौधे, फाइटोप्लैंकटन प्रकाश संश्लेषण द्वारा आहार पैदा करते हैं) तथा प्राथमिक उपभोक्ता जूप्लैंक्टन भी इसी मण्डल में रहते हैं। तथा फाइटोप्लैंकटन का सेवन करते हैं। अधिक गहराई में रहने वाले प्राणी अवसादों पर निर्भर करते हैं।
सागरीय बायोम प्रकार-सूर्य प्रकाश, पोषक तत्त्वों, कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन की सुलभता के आधार पर सागरीय भागों में विभिन्न प्रकार के आवासों (वास्य क्षेत्र) का निर्माण होता है जिनमें विभिन्न प्रकार के पादप तथा प्राणी समुदाय रहते हैं। मुख्य रूप से सागरीय बायोम को दो प्रमुख विभागों में अलग करते हैं-(i) पेलैजिक बायोम तथा(ii) नितलीय वायोम (benthic biome)। गहराई तथा पादप जीवन के आधार पर
पलैजिक बायोम को दो उपभागों में अलग किया जाता है -(i) तट तल बायोम (nertic biome). यह महाद्वीपीय मग्न तटों का भाग होता है जिसमें जल की गहराई 200 मीटर तक होती है) तथा (ii) खुला सागर बायोम। प्रकाश के दृष्टिकोण से सागरीय बायोम को दो प्रमुख भागों में विभक्त करते है-(i) प्रकाशित बायोम (euphotic या photic biome)
तथा (ii) अप्रकाशित बायोम (aphoticbiome)। महाद्वीपपीय मग्न तट का समस्त लम्बवत् भाग प्रकाशित होता है। यदि सागरीय बायोम के दो विभागों (पेलैजिक तथा बेन्थिक) को ध्यान में रखा जाये तो सागरीय बायोम के निम्न उपविभाग हो सकते है।
(i) पेलैजिक बायोम-सागर तल से सागर तली तक का समस्त जलीय भाग। इसके निम्न उपभाग होते हैं:
(A) प्रकाशित बायोम या ऊपरी पेलैजिक वायोम-गहराई 200 मीटर तक। महाद्वीपीय मग्न तट भी इसी श्रेणी में आता है। इस समस्त मण्डल में सूर्य प्रकाश पहुंचता है परन्तु ऊपर से नीचे जाने पर उसकी मात्रा तथा तीव्रता घटती जाती है।
(B) अप्रकाशित मण्डल या वायोम-इसकी गहराई 200 मीटर से नीचे की ओर साभरतली तक होती है जो विभिन्न महासागरों एवं सागरों में अलग-अलग होती है। इसमें निम्न गौण मण्डल होते हैं.
(i) मध्य पेलैजिक मण्डल-गहराई 1000 मीटर तक।
(ii) गहरे पेलैजिक मण्डल-गहराई 4000 मीटर तक। तापमान कम होता है, जल दाब अधिक तथा पूर्ण अन्धेरा होता है। मात्र जीवप्रदीप्त प्रकाश (bioluminescence) ही होता है।
(iii) अति गहरे पेलैजिक मण्डल-गहराई 6000 मीटर तक होती है।
(ii) सागरतलीय वायोम (Benthicbiome)-इसमें सागरतलीय भाग को सम्मिलित करते हैं। इसके तीन उप-विभाग होते हैं-
(a) बेलांचली मण्डल (Littoral zone) ‘इसके अन्तर्गत सागर तट तथा किनारे वह भाग आता है जो उच्च ज्वार तथा निम्न ज्वार तल के बीच होता है।
(b) उपवेलांचली मण्डल (Sub-littoral zone)-इसके अन्तर्गत महाद्वीपीय मग्न तट में जल के नीचे स्थित स्थलीय (तलीय भाग) भाग आता है।
(c) गहरे तलीय मण्डल (Deep sea benthic zone)-इसके तीन उपमण्डल होते हैं।-
(1) Archinenthal zone-महाद्वीपीय मग्न तट से 1000 मीटर की गहराई पर स्थित तलीय भाग।
(2) Abyssal benthic zone-1000 मीटर से 6000 मीटर तक गहराई पर स्थित तलीय भाग।
(3) Hadal zone-6000 से 7000 मीटर तक की गहराई पर स्थित तलीय भाग।
यह मुख्य रूप से महासागरीय गहरी खाइयों की तली को प्रदर्शित करता है।
सागरीय जीवों (पादपों तथा जन्तु दोनों) को उनके आवास के आधार पर तीनों कोटियों में विभक्त किया जाता है।
(i) प्लैकटन-ये प्रकाशित मण्डल में जल में उतारने वाले सूक्ष्मस्तरीय पादप तथा जन्तु होते हैं।
(ii) नेक्टन-इसके अन्तर्गत बड़े आकार वाले तथा शक्तिाशाली तैरने वाले जन्तु आते हैं (मछलियाँ आदि) जो सागर के प्रत्येक मण्डल में घूमते रहते हैं।
(iii) बेन्थस-इसके अन्तर्गत उन पादपों तथा जन्तुओं को सम्मिलित करते हैं जो सागर तली पर रहते हैं।
(ii) आपके स्कूल प्रांगण में पाए जाने वाले पेड़, झाड़ी व सदाबहार पौधों पर एक संक्षिप्त लेख लिखें और लगभग आधे दिन यह पर्यवेक्षण करें कि किस प्रकार के पक्षी इस वाटिका में आते हैं। क्या आप इन पक्षियों की विविधता का भी उल्लेख कर सकते हैं।
उत्तर-इस परियोजना कार्य को अपने अध्यापकों की सहायता से स्वयं करें। मदद के लिए परियोजना कार्य (i) देखें।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उसके आदर्श उत्तर
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
1. पारिस्थितिकी की परिभाषा लिखें।
उत्तर-पर्यावरण तथा जीवों के बीच पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।
2. प्रकाश संश्लेषण की परिभाषा दें।
उत्तर-पौधों द्वारा प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल को कार्बोहाइड्रेट में बदलने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते है।
3. पारिस्थितिक तंत्र के घटकों के दो वर्ग बताएँ।
उत्तर–पारिस्थितिक तंत्र के दो मुख्य वर्ग है-(i) जैव (Organic), (ii) अजैव(Inorganic)।
4. कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र किसे कहते हैं?
उत्तर-मानव द्वारा कृत तंत्र को पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं। मानव ने अन्य जीवों की तुलना में पर्यावरण को अत्यधिक बदला है। इस परिवर्तन के कारण ही इसे कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं।
5. ‘सुपोषी झील’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-उथली झीलें, जो जैविक उत्पादों के संचय में समृद्ध है, सुपोषी झीलें
कहलाती है।
6. ‘कृषि पारिस्थितिकी’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-कृषि फसलों तथा पर्यावरण के मध्य संबंध को कृषि पारिस्थितिकी कहते है। फसलों के प्रकार जलवायु, ऋतु तथा किसान के चुनाव पर निर्भर है।
7. अप्रकाशी क्षेत्र किसे कहते हैं?
उत्तर-महासागरों में 2000 मीटर की गहराई तक स्थित जल क्षेत्र कम प्रकाश पाता है जो प्रकाश सश्लेषण के लिए अपर्याप्त है। इस क्षेत्र को अप्रकाशी क्षेत्र कहते है।
8. हरे पौधे को उत्पादक क्यों कहा जाता है?
उत्तर-सभी जीव भोजन निर्वाह के लिए भोजन ऊर्जा तथा पदार्थ दोनों की ही आपूर्ति करता है। हरे भरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बोहाइड्रेट पैदा करते है तथा प्रोटीन और वसा का संश्लेषण करते हैं। इसलिए इन्हें उत्पादक कहा जाता है।
9. प्रथम उपभोक्ता किसे कहते हैं?
उत्तर-शाकाहारी घटक मुख्य रूप से अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते हैं. प्रथम उपभोक्ता कहलाते है।
10. जैवमंडल के अजैविक घटक कौन-कौन से है?
उत्तर-अजैविक घटक मुख्य रूप से जलवायु तथा मृदीय कारक है। जलवायु कारकों में तापमान, आर्द्रता, वर्षा तथा हिमपात को शामिल किया जाता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
1. प्राकृतिक वातावरण तथा मानवीय वातावरण में क्या अन्तर है?
उत्तर-वातावरण के दो प्रकार हैं-(i) प्राकृतिक वातावरण, (ii) मानवीय वातावरण।
प्राकृतिक वातावरण से तात्पर्य प्राकृतिक तत्त्वों से है। जैसे-भूमि, वायु, वनस्पति, जल, मिट्टी आदि। इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर वातावरण के ऐसे तत्त्व उत्पन्न होते है जो मानवीय जीवन पर प्रभाव डालते है। वातावरण यथार्थ में एक ही है, परन्तु जब मानव इस दृश्य में प्रविष्ट होता है तो वह इस वातावरण को अपनी इच्छा से प्रभावित करता है। इस वतावरण को मानवीय वातावरण कहा जाता है। इसमें जनसंख्या, परिवहन, बस्तियाँ, धर्म आदि सम्मिलित है।
2. पारिस्थितिक तंत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-प्रकृति के विभिन्न संघटक जीवन तथा विकास के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। स्थलाकृतिया, वनस्पति तथा जीव-जन्तु एक-दूसरे से मिलकर एक वातावरण का निर्माण करते हैं, जिसे पारिस्थितिक तंत्र कहते है। यह वातावरण पृथ्वी पर विभिन्न रूपों में ऊर्जा उत्पन्न करने में सहायक होता है जो जीवों के विकास में सहायता करता है।
इस प्रकार स्थलाकृतियों, वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं में एक चक्र पाया जाता है जिससे हमें पृथ्वी के जैविक पहलू को समझने में सहायता मिलती है।
3. पारिस्थितिकी सन्तुलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-पृथ्वी पर विभिन्न भौगोलिक संघटकों में एक जीवन चक्र होता है। पहले वे उत्पन्न होते है, विकसित होकर प्रौढ़ावस्था में पहुंचते है तथा फिर समाप्त हो जाते हैं। यह चक्र एक लम्बे समय में समाप्त होता है। जीव-जन्तु, वनस्पति, पौधे आदि विकसित होकर एक अन्तिम चरण में पहुंच जाते हैं। इस अवस्था में सभी जीवों की जल, भोजन, वायु आदि आवश्यकताएं पूरी हो जाती है। जैव संख्या तथा वातावरण के बीच एक संतुलन स्थापित हो जाता है। इस अवस्था को पारिस्थितिकी संतुलन कहते हैं। इस अवस्था के पश्चात् इन संघटकों में कोई परिवर्तन नहीं होता।
4. पारिस्थितिक समर्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-खाद्य श्रृंखला में एक स्तर से दूसरे स्तर तक ऊर्जा के रूपान्तरण के प्रतिशत को पारिस्थितिक समर्था कहते हैं। खाद्य शृंखला में चार प्रकार के स्तर पाए जाते हैं। सर्वप्रथम स्तर में आधार स्तर पर प्राथमिक पौष्टिक होते हैं। द्वितीय स्तर पर शाकाहारी होते हैं। तृतीय स्तर पर मासाहारी तथा चतुर्थ स्तर पर अन्य मांसाहारी होते हैं। इनमें 5% से 20% तक ऊर्जा का रूपान्तरण होता है। इसका तात्पर्य यह है कि शाकाहारी अपने निचले स्तर से केवल 10% ऊर्जा प्राप्त करते हैं।
5. प्रकृति का संतुलन कैसे बना रहता है ?
उत्तर-प्रकृति का संतुलन-प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए भोजन को उपलब्धता मुख्य कारक है। यह संतुलन गतिशील है और इसमें उतार-चढ़ाव कुछ सीमाओं के भीतर होता रहता है। कोई भी जीव पृथक् न रहकर अपने ही जीवो की संगत में रहता है।
इसका पारिस्थितिक क्षेत्र जैविक पर्यावरण की अनुकूलता पर निर्भर करता है। जैविक पर्यावरण विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के मध्य पारस्परिक क्रियाओं की उपज है।
पृथ्वी पर विभिन्न भौगोलिक संघटकों में एक जीवन चक्र होता है। पहले वे उत्पन्न होते है, विकसित होकर प्रौढ़ावस्था में पहुंचते हैं तथा फिर समाप्त हो जाते हैं। जीव-जन्तु, वनस्पति. पौधे आदि विकसित होकर एक अंतिम चरण में पहुंच जाते हैं। इस अवस्था में सभी जीवों की जल, भोजन, वायु आदि आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। जीव तथा प्रकृति के बीच एक संतुलन स्थापित हो जाता है। इस अवस्था को पारिस्थितिकी संतुलन या प्रकृति-संतुलन कहते हैं।
6. जैव मंडल में ऊर्जा का प्रवाह कैसे होता है?
उत्तर -जैवमंडल में ऊर्जा प्रवाह-प्रकृति में ऊर्जा प्रकाश संश्लेषित जीवों के माध्यम से प्रवेश करती है और एक जीव से दूसरे जीव को भोजन के रूप में दी जाती है। वे जीव जो सूर्य के प्रकाश का ट्रैप करते हैं, उत्पादक कहलाते हैं। ट्रेप की गई ऊर्जा का कुछ भाग प्राथमिक उपभोक्ताओं द्वारा लिया जाता है। पशु पेड़-पौधों से अधिक सक्रिय होने के कारण ऊर्जा के अधिकतर भाग को अन्य घटक द्वारा उपयोग किए जाने से पहले ही कर लेते है।
ऊर्जा स्थानांतरण में खाद्य श्रृंखला से ऊर्जा का कुछ भाग लुप्त हो जाता है। इस प्रकार ऊर्जा की मात्रा एक स्तर से अगले स्तर पर स्थानांतरित होने पर घटती जाती है। मृत जीवों का अपघटन रासायनिक ऊर्जा का विमोचन करता है। अन्त में समस्त सौर ऊर्जा, जो उत्पादको के माध्यम से जैविक संसार में प्रवेश करती है अजैविक संसार को प्रकाश के रूप में नहीं
बल्कि उष्मा के रूप में वापस कर दी जाती है।
7. पारिस्थितिक तंत्रों की क्या-क्या सीमाएँ हैं?
उत्तर–पारिस्थितिक तंत्रों की सीमाएँ-पारिस्थितिक तंत्र में निवेश एवं उत्पादन का अध्ययन इसकी सीमाओं को आर-पार किया जा सकता है तथा सुविधा के लिए इसे पृथक् अस्तित्व में देखा जाता है। पारिस्थितिक तंत्र की सीमाएँ अस्पष्ट तथा अतिव्यापी है। ऊर्जा तथा पदार्थो का एक पारिस्थिक तंत्र से दूसरे पारिस्थितिक तंत्र में संचलन होता रहता है। यह संचलन नजदीक अथवा दूर के पारिस्थितिक तंत्र से हो सकता है। ऊर्जा एवं पदार्थों का संचलन, जैविक, जलवायविक अथवा भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
हिमालय क्षेत्र से भारी मात्रा में मृदा गंगा, यमुना तथा बह्मपुत्र जैसी नदियों द्वारा अपने डेल्टाओं में लाई जाती है। साइबेरिया से सारस भारत (भरतपुर) प्रवास करते हैं। गहरे महासागरीय अवसाद में उत्पन्न हुआ फास्फोरस शैवाल-क्रस्टेशियाई-जलकाक खाद्य शृंखला द्वारा स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र की ओर परिवहित किया जा सकता है। पृथ्वी पर उपस्थित हजारों पारिस्थितिक तंत्र आपस में जुड़े हुए है।
8. महासागरों का जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-महासागर जलवायु पर व्यापक प्रभाव डालते हैं-
(i) महासागर धरातल, तापमान तथा आर्द्रता पर प्रभाव डालते हैं।
(ii) महासागर सौर ऊर्जा का संचय करते हैं।
(iii) महासागरों में ऊर्जा के अवशेषण और निष्कर्षण की विशाल क्षमता है।
(iv) समुद्र तट पर तापांतर बहुत कम होता है।
(v) महासागरीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों के गपमान को सम करने में मदद करती है।
9. प्राकृतिक पर्यावरण तथा मानवीय (कृत्रिम) पर्यावरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर- -पर्यावरण के दो प्रकार हैं-(i) प्राकृतिक पर्यावरण, (ii) कृत्रिम पर्यावरण।
प्राकृतिक पर्यावरण से अभिप्राय प्राकृतिक तत्त्वों से है। जैसे-भूमि, वायु, वनस्पति, जल, मिट्टी आदि। इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर वातावरण के ऐसे तत्त्व उत्पन्न होते हैं जो मानवीय जीवन पर प्रभाव डालते है। पर्यावरण वास्तव में एक ही है, परन्तु जब मानव इस दृश्य में प्रवेश करता है तो वह इस पर्यावरण को अपनी इच्छा से प्रभावित करता है। पर्यावरण को मानवीय पर्यावरण कहा जाता है। इसमें जनसंख्या, परिवहन, बस्तियाँ आदि सम्मिलित है।
10. मरुस्थलीय वायोम पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-मरुस्थलों की विशेषता अत्यधिक कम वर्षा का होना तथा उच्च वाष्पन है। कम वर्षा के कारण वर्षा से प्राप्त जल भी पौधों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंचता। दिन अत्यधिक गर्म और रात ठंडी होती है। तापमान का मौसमी उतार-चढ़ाव काफी होता है। मरुस्थलों में पेड़-पौधे तथा जीव-जन्तु कम होते हैं। विभिन्न प्रकार के एकेंशिया, कैक्टस, यूफोर्बियाज तथा अन्य गूदेदार वनस्पति मरुस्थल में मिलते हैं। इस बायोम में पाए जाने वाले मुख्य जीव हैं-चीटियाँ, टिड्डियाँ, ततैये, बिच्छू, मकड़ी, छिपकली, रटल साँप तथा अनेक कीटभक्षी पक्षी जैसे-बतासी और अबाबील, बटेर, बत्तख, मरु चूहे. खरगोश, लोमड़ी, गीदड़ तथा विभिन्न प्रकार की बिल्लियाँ।
11. जलीय पारिस्थितिक तंत्र, स्थलीय परिस्थितिक तंत्र से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर-जलीय पारिस्थितिक तंत्र खुले महासागरों से लेकर छोटे-छोटे जलाशयों तक है तथा इनमें खारापन, गहराई तथा तापमान के उतार-चढ़ाव की दशाएँ पाई जाती हैं। समुद्री तथा अलवण जलीय पर्यावरण में भी अनेक पारिस्थितिक तंत्र हैं, जिनकी सीमाएँ अतिव्यापी हैं।
जलीय पर्यावरण के साथ जीवों के अनुकूलन में अशा तथा विविधता की दृष्टि से काफी अन्तर होता है। कुछ प्राणी पूरी तरह जल में रहते हैं; जैसे-मछलियाँ। कुछ प्राणी जल तथा स्थल दोनों पर रहते हैं।
अजैविक कारकों की दृष्टि से जलीय पारिस्थितिक तंत्र तथा स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र काफी भिन्न है। यहाँ रहने वाले समुदायों में भारी अन्तर है।
12. महासागरीय द्रोणियों में किस प्रकार का पर्यावरण पाया जाता है?
उत्तर-महासागरीय द्रोणियों में प्रमुख तीन पर्यावरणों की पहचान की गई है-
(i) वेलांचली क्षेत्र-तट से महाद्वीपीय शेल्फ के किनारे तक की समुद्री सतह।
(ii) नितलस्थ क्षेत्र-महाद्वीपीय ढाल तथा अप्रकाशी एवं वितलीय क्षेत्र तक विस्तृत समुद्री सतह।
(iii) वेलापवर्ती क्षेत्र- इसमें महासागरीय द्रोणी का जल शामिल है।
13. प्लवक क्या होते हैं?
उत्तर पल्वक वे तैरते हुए जीव हैं जिनके पास स्वयं गतिशील होने का कोई साधन नहीं होता। ये जलधाराओं के साथ गति करते हैं। ये सूक्ष्म आकार के जीव होते हैं। ये दो प्रकार को होते हैं-पादप प्लवक तथा प्राणी प्लवक। ये नदी तथा सरिताओं में पाए जाते हैं। पादप प्लवक स्वपोषी जीव होते हैं। डायटम प्लवक वर्ग के पौधे हैं। ये सूक्ष्म होते हैं। ये उप-आर्कटिक तथा अंटार्कटिक क्षेत्र के ठंडे जल में तेजी से पनपते हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. अंतर स्पष्ट कीजिए-
(i) स्थलीय तथा जलीय पारिस्थितिक तंत्र;
(ii) समुद्री तथा अलवणीय जल पर्यावरण;
(iii) टैगा तथा टुंड्रा।
उत्तर -(i) स्थलीय तथा जलीय पारिस्थितिक तंत्र में अंतर-
                       स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र
(i) स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र का उष्ण कटिबंधीय सवाना, भूमध्य सागरीय गुल्म वन, पर्णपाती वन, घास भूमि, मरुस्थल टैगा तथा टुंड्रा क्षेत्रों में बाँटा गया है।
(ii) यहाँ की गर्म तथा आर्द्र जलवायु में चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन, इनमें| भूमि पर तथा वृक्षों पर रहने वाले दोनों जीव शामिल हैं।
(iii) जहाँ वर्षा मौसमी होती है, वहाँ पर मोटी घास और बिखरे वृक्ष पाए जाते हैं जिन्हें सवाना कहते हैं।
(iv) वर्षा, ताप-परिसर, मृदा की प्रकृति, अवरोध, अक्षांश एवं ऊँचाई आदि
बायोम की प्रकृति तथा सीमा का निर्धारण करते हैं।
(v) बायोम के निर्धारण में तापमान तथा वर्षण की दर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण निर्धारक हैं।
                         जलीय पारिस्थितिक तंत्र
(i) जलीय पारिस्थितिक तंत्र खुले महासागरों से लेकर छोटे-छोटे पोखरों
तक है।
(ii) इनमें खारापन, गहराई तथा तापमान के उतार-चढ़ाव की दशाएँ पाई जाती हैं।
(iii) समुद्री तथा अलवणीय जल में भी अनेक पारिस्थितिक तंत्र हैं।
(iv) जलीय पर्यावरण के साथ जीवों के अनुकूलन में अंशों तथा विविधता की दृष्टि से काफी अन्तर होता है।
(v) सागरीय पर्यावरण को निर्धारित करने वाले कारक जल की गहराई, तट से दूरी तथा नदियों एवं हिमानियों का समुद्र में अपवाह है।
(ii) समुद्री तथा अलवणीय जल पर्यावरण में अंतर-
                               समुद्री पर्यावरण:-
(i) इसकी विशेषताएँ लवणों तथा खनिज आयनों का अत्यधिक संकेद्रण है।
(ii) ध्रुवों के समीप तथा नदियों के मुहानों पर खारापन सबसे अधिक होता है।
(iii) तट रेखा से समुद्र की ओर लगभग 160 कि.मी. की दूरी तक धीमे ढाल वाला तथा 200 मीटर तक की गहराई वाला क्षेत्र महाद्वीपीय शेल्फ कहलाता है।
(iv) महासागरों के उर्ध्वाधर क्षेत्रों का निर्धारण प्रकाश संश्लेषण के लिए
उपलब्ध प्रकाश द्वारा होता है।
(v) ऊपर का प्रकाशित जल क्षेत्र तथा नीचे का क्षेत्र जहाँ प्रकाश अपर्याप्त
मात्रा में है, अप्रकाशी क्षेत्र कहलाता है।
(vi) 2000 मीटर के नीचे स्थाई अधकार का क्षेत्र है जिसे वितलीय क्षेत्र कहते है।
(vii) प्रकाशी भाग में बड़ी संख्या में जीव रहते है, जिनमें पादपप्लवक तथा प्राणिप्लवक शामिल हैं।
(viii) महासागरीय द्रोणियों में तीन प्रमुख (पर्यावरण हैं-(a) बेलांचली क्षेत्र, (b) नितलस्थ क्षेत्र, (c) वलापवर्ती क्षेत्र।
                            अलवणीय जल पर्यावरण
(i) झीलें एवं तालाबरूद्ध अलवणीय जलाशय हैं और प्रत्येक बायोम में
मिलती हैं।
(ii) गहरी झीलें, जिनके दोनों किनारों के ढाल पथरीले हों, फॉस्फेट में निर्धन होते हैं।
(iii) गहरी झीलें, जिनके दोनों किनारों के ढाल पथरीले हों, फॉस्फेट में निर्धन होते हैं।
(iv) जलीय धरातल अधिक सूर्यप्रकाश प्राप्त करता है, जिससे जल का
तापमान बढ़ जाता है।
(v) प्रकाश संश्लेषण के लिए जैविक क्रियाएँ भी अधिक होती हैं।
(vi) जल अक्सर पंकिल होता है, जो नदी की सतह तक प्रकाश नहीं पहुंचने देता है।
(vii) पादप्लवक और प्राणिप्लवक दोनों ही सामान्य है।
(viii) यहाँ जीवों की प्रकृति एवं संघटन झीलों के जीवों से मिलता-जुलता है।
(iii) टैगा एवं टुंड्रा बायोम में अंतर-
                                      टैगा बायोम
(i) यहाँ की भौतिक दशाएँ परिवर्तनशील हैं; यहाँ जीवों को तापमान के
उतार-चढ़ाव का प्रतिरोधी होना पड़ता है।
(ii) चीड़, देवदार, फर, हेम्लॉक तथा स्यूस यहाँ की प्रमुख वनस्पतियाँ हैं।
(iii) कुछ क्षेत्रों में वनस्पति इतनी घनी है कि वनों के धरातल तक बहुत कम प्रकाश पहुँच पाता है।
(iv) आर्द्र क्षेत्रों में काई तथा फर्न या पर्णांग बहुतायत से उगते हैं।
(v) इस बायोम में एक एल्क, तित्तिरी, हिरण, खरगोश, गिलहरी, प्यूमास,
वनविडाल तथा कीटों की अनेक प्रजातियाँ मिलती हैं।
                                      टुंड्रा बायोम
(i) ये मैदान हिम तथा बर्फ से ढंके रहते हैं। अत्यधिक कम तापमान तथा कम प्रकाश जीवन को सीमित करने वाले कारक हैं।
(ii) वनस्पति इतनी बिखरी हुई है कि इसे आर्कटिक मरुस्थली भी कहते हैं।
(iii) यह बायोम वास्तव में वृक्ष विहीन है।
(iv) हिमशितित मृदा के कारण यहाँ केवल उथली जडों वाले पौधे ही उग सकते है।
(v) इस क्षेत्र में कैरीबू, आर्कटिक खरगोश आर्कटिक लोमड़ी, रेडियर, हिम-उल्लू तथा प्रवासी पक्षी सामान्य रूप से मिलते हैं।
2. निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखें-
(i) तुंगता के अनुसार बायोम
(ii) मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र;
(iii) मितपोपणी झीले;
(iv) पारिस्थितिक तंत्रों की सीमाएँ।
उत्तर-(i) तुगंता के अनुसार बायोम-टुण्ड्रा बायोम की श्रृंखला हिमालय (एशिया),एंडीज (अमेरिका) तथा रॉकीज (उत्तरी अमेरिका) जैसी पर्वत श्रेणियों के ढालों पर भी देखी जा सकती है। इस पर्वत श्रेणियों पर बायोम प्रकार में धीमा परिवर्तन अक्षांश के स्थाप पर ऊंचाई का अनुसरण करता है। इन बायोमों के निर्धारण में तापमान तथा वर्षण की दर सबसे अधिक महत्वपूर्ण निर्धारक हैं। उष्णकटिबंधीय पर्वतों में पेड़-पौधों के समुदाय तथा इनकी दशाएं पर्वत के आधार से हिमरेखा तक इस प्रकार है- उष्णकटिबंधीय वन (भारत में तराई क्षेत्र); पर्णपाती वन; शंकुधारी वन तथा टुण्ड्रा वनस्पति।
(ii) मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र-मानव ने पर्यावरण को इतना अधिक बदला है कि इसे मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र कहा जाता है। पौधों एवं जीव-जन्तुओं सहित गाँव एवं शहर फलोद्यान एवं बागान, उद्यान एवं पार्क आदि मानवकृत स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र हैं। बड़े बाँध और जलाशय, झीलें, नहरे, छोटे मत्स्य तालाब और जल जीवशाला मानवकृत जलीय
पारिस्थितिक तंत्र के उदाहरण हैं। जैविक समुदाय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संशोधन आग का प्रयोग, पौधो के उगने तथा पशुओं के पालने से आया है। कृषि ही समस्त मानव सभ्यता की जड़ और यही सभ्यता का पोषण भी करती है। मानव ने वनों तथा घास भूमियों के विशाल क्षेत्रों को चुने हुए पौधों, जैसे अनाज, दालें, तिलहन तथा चारा, पैदा करने के लिए शस्य भूमि में बदल दिया है।
मानवकृत सभी पारिस्थितिक तंत्र, जिसमें कृषि पारिस्थितिक तंत्र सम्मिलित है, काफी सरल एवं अत्यधिक सक्षम हैं। इनमें प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र की विविधता का अभाव है। एक ही प्रकार की फसल जलाभाव, बाढ़, बीमारियों, नाशक जीवों अथवा भूमि पर रहने वाले कीटों द्वारा पूरी तरह नष्ट हो सकती हैं।
(iii) मितपोषणी झीलें -झील एवं तालाब प्रत्येक बायोम में मिलते हैं। ये अलवणीय जलाशय हैं। अपेक्षाकृत उथली झीलें जैविक उत्पादों के संचय में समृद्ध हैं, इन्हें सुपोषी झीलें कहते हैं। गहरी झीलें जिनके दोनों किनारों के ढाल तीव्र तथा पथरीले हो, परिसंचरित पोषण जैसे फॉस्फेट में निर्धन होते हैं। इन्हें मितपोषणी झीलें कहते है। इन झीलों के भौतिक कारक अवस्थिति, ऊंचाई और आस-पास के बायोम पर निर्भर करते हैं। कुछ झीलें खारे जल वाली होती हैं, जैसे राजस्थान की साभर झील। अलवणीय तालाबों में स्वपोषी सूक्ष्म पादपप्लवक भी पाए जाते हैं।
अंतर स्पष्ट कीजिए-
(i) प्रथम श्रेणी का उपभोक्ता एवं द्वितीय श्रेणी का उपभोक्ता
(ii) जैविक तथा अजैविक कारक
(iii) खाद्यशृंखला तथा खाद्य जाल।
उत्तर- (i) प्रथम श्रेणी का उपभोक्ता एवं द्वितीय श्रेणी का उपभोक्ता में अंतर:-
                       प्रथम श्रेणी का उपभोक्ता
(i) जो जीव प्रत्यक्ष रूप से पौधों से भोजन प्राप्त करते हैं, प्रथम श्रेणी के
उपभोक्ता हैं।
(ii) उदाहरण के लिए – गाय-बैल, हिरण, भेड़-बकरी तथा अन्य शाकाहारी जीव।
                      द्वितीय श्रेणी का उपभोक्ता
(i) माँसाहारी जीव, जो शाकाहारी जीवों को आपने भोजन के रूप में प्रयोग करते है-द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता हैं।
(ii) उदाहरण- बाघ, सिंह, साँप इत्यादि।
(ii) जैविक तथा अजैविक कारक में अंतर:-
                            जैविक कारक
(i) इसमें वे जन्तु शामिल हैं जो वातावरण से अपना भोजन प्राप्त करते हैं।
(ii) इसमें उत्पादक तथा उपभोक्ता होते हैं।
(iii) उपभोक्ता के चार वर्ग हैं- शाकाहारी, मांसाहारी, परपोषित,अपघटक।
                           अजैविक कारक
(i) इसमें मिट्टी, जल, वायुमंडल में पाए जाने वाले रासायनिक तत्त्व शामिल हैं।
(ii) इनमें जल, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा फॉस्फेट, नाइट्रेट
आदि खनिज शामिल हैं।
(iii) अन्य अजैव तत्त्व तापमान, वर्षा, पवनें, मृदा, जलमंडल आदि हैं।
(iii) खाद्य श्रृंखला तथा खाद्यजाल में अंतर-
                             खाद्य श्रृंखला
(i) किसी पारिस्थितिक तंत्र में एक स्रोत से दूसरे में ऊर्जा स्थानांतरण की प्राक्रया को खाद्य श्रृंखला कहते हैं।
(ii) खाद्य श्रृंखला में निम्न से उच्च स्तरों की ओर खाद्य के रूप में ऊर्जा का प्रवाह होता है।
(iii) उदाहरण- घास → हिरण – बाघ – सूक्ष्म जीव
                              खाद्य जाल
(i) जब कई खाद्य श्रृंखलाएँ एक-दूसरे से घुल मिलकर एक जटिल रूप धारण कर लेती हैं तो उसे खाद्य जाल कहते हैं।
(ii) प्राथमिक उत्पादक पौधे सौर ऊर्जा का प्रयोग करते हैं लेकिन ऊर्जा
स्थानान्तरण के प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा की काफी मात्रा कम हो जाती है।
(iii) उदाहरण-ऊर्जा अन्तरण का पिरामिड से प्रदर्शित किया जा सकता
है, जिसमें मनुष्य का सर्वोपरि स्थान है।

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