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bihar board 8 biology notes | वायु एवं जल-प्रदूषण की समस्या

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bihar board 8 biology notes | वायु एवं जल-प्रदूषण की समस्या

अध्ययन-सामग्री : सजीव जगत के जीव-जन्तुओं तथा पौधों को जीवित रहने के लिए
श्वसन क्रिया आवश्यक होती है। श्वसन के लिए वायु की आवश्यकता होती है। इतना ही नहीं
जन्म से लेकर मृत्यु तक वायु की जरूरत होती है। वायु के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा
सकती है। वायु से अनेक गतिविधियाँ हमारे चारों तरफ संचालित होती हैं। जैसे- पत्ते का हिलना,
पतंग का उड़ना, घिरनी का नाचना, आग का जलना, पानी से बुलबुले का बाहर आना आदि।
पृथ्वी वायु की एक पतली परत से घिरी हुई है। इस परत का विस्तार पृथ्वी की सतह से
कई किलोमीटर ऊपर तक है जिसे वायुमंडल कहते हैं। वायु स्थान घेरती है। वायु हमारे चारों
ओर उपस्थित है। वायु का कोई रंग नहीं होता। वायु पारदर्शी होता है। वायु अनेक गैसों का मिश्रण होता है जिसमें प्रत्येक गैस की अपनी गुणवता होती है और अलग-अलग रूपों में हम सजीव जगत के जीव-जन्तुओं एवं पौधों के काम आती है। जहाँ ऑक्सीजन मानव के श्वसन के लिए आवश्यक है। वहीं कार्बनडाइ ऑक्साइड पौधों के श्वसन के लिए आवश्यक होते हैं। नाइट्रोजन मानव एवं पेड़-पौधों के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में आवश्यक तत्व माने जाते हैं।
                                                वायु की संरचना
                                   नाइट्रोजन-78%
                                   ऑक्सीजन-21%
                      कार्बन-डाइऑक्साइड एवं अन्य–1%
वायु की संरचना में नाइट्रोजन सर्वप्रमुख अवयव है। इसके बाद ऑक्सीजन प्रमुख अवयव
है। शेष सभी अवयव वायु में नगण्य मात्रा में रहते हैं। नाइट्रोजन की मात्रा वायु का लगभग 4/
5वाँ भाग होती है। नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन दोनों गैसें मिलकर वायु का 99% भाग बनाती है।
इस प्रकार वायु में कुछ गैसें, जल-वाष्प तथा धूल के कण विद्यमान होते हैं। वायु की
संरचना में स्थानीय भिन्नता हो सकती है।
वायु में ऑक्सीजन का स्थान अतिमहत्वपूर्ण है। सामान्यतः सभी जीव ऑक्सीजन को अपने
श्वसन क्रिया को पूरा करने के लिए लेते हैं। पौधे भी श्वसन में ऑक्सीजन का प्रयोग करते हैं।
मछली पानी में घुले ऑक्सीजन को श्वास के रूप में अवशोषित करते हैं। ऑक्सीजन मानव शरीर में अनेक क्रिया में मदद करती है। जैसे-खून का बनना। किसी भी वस्तु को जलने में ऑक्सीजन मदद करती है। ऑक्सीजन खुद जलती नहीं है। बल्कि जलने में मदद करती है। यानि ऑक्सीजन दहनशील नहीं होती है। परन्तु दहन के पोषक होती है।
वर्तमान में विज्ञान के प्रचार एवं प्रसार के कारण वायु प्रदूषित हो रही है जिसका मुख्य कारण
मानवीय गतिविधियाँ हैं। यानि वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जा रही है जिसके
कारण वायु की संरचना असंतुलित होती जा रही है। बहुत हद तक पेड़-पौधे इस संतुलन को बनाए रखने में सहायक हैं। परन्तु वनों की कटाई, बढ़ती अबादी, बढ़ते उद्योग-धंधे, बढ़ती मोटर-गाड़ियों की तादाद, आदि गतिविधियों ने वायु संतुलन को असंतुलित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यदि यही रफ्तार से प्रदूषण होता रहा और समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब प्रदूषण अपनी आगोश में मानव-जीवन की लीला को समाप्त कर देगी।
“जल ही जीवन है” किसी ने ठीक ही कहा है। हम आप सोच सकते हैं यदि जल नहीं होता
तो क्या होता। और यदि जल की मात्रा अधिक (बाढ़) हो जाए तो क्या तबाही होती है। इस
अध्याय में जल हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है इसके साथ-साथ हमारे पर्यावरण में इसकी कमी
से बचने के लिए हमें क्या कदम उठाने होंगे तथा इसकी कमी यानी घटता जल-स्तर के कारणों
पर विशेष चर्चा होगी।
“पंच तत्व मिल बना शरीरा” में एक तत्व जल है। एक तरफ वायु जहाँ हमें जीवन-जीने
के लिए होती है तो वहीं जल मानव, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे आदि को जीवन के हर पल-पल में काम आता है। हमारे शरीर में 70% जल है। सोकर उठने के बाद शौच करते हैं, मुँह धोते हैं,
दाँत की सफाई, स्नान, भोजन आदि में जल का प्रयोग होता है।
जल का स्रोत–जल हमें प्राप्त कहाँ से होता है ? भूमि के अन्दर मिलने वाले जल को
भूमिगत जल कहते हैं। भूमि के अन्दर वर्षा के जल का कुछ भाग रिस-रिसकर जमा होता रहता
है जो भूमि के अन्दर विशाल जल-राशि का निर्माण कर देता है। यही जल कुँआ से चापाकल
तथा बोरिंग से होते हुए घर के नलों में आता है। यह जल मुख्य रूप से पेयजल होता है तथा
इस जल की मात्रा भूमि के अन्दर सीमित है। इसके अलावे नदी, झील, समुद्र जल के मुख्य स्रोत हैं।
जब जल को गर्म करते हैं तो गर्मी पाकर जलवाष्प में बदल जाता है, इस क्रिया को वाष्पन
कहते हैं। यही वाष्प पुनः ठंडा होकर जल में बदल जाता है तो इस क्रिया को संघनन कहते हैं।
सूर्य के प्रकाश की गर्मी पाकर नदी, तालाबों, झरनों, समुद्र आदि जलाशयों के जल वाष्पित हो
जाते हैं और काफी ऊंँचाई पर वाष्प के इकट्ठा होने से वाष्प के छोटे-छोटे बून्द एक-दूसरे के
समीप आकर बादल का रूप ले लेते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं, वाष्प के छोटे-छोटे बून्द
संघनित होकर बादल का निर्माण करते हैं। जल कणिकाएँ आपस में लिकर बड़े आकार का
जल-बूंद बनाती हैं। अपने वजन के कारण वे जमीन पर गिरने लगती हैं जिसे हम वर्षा कहते हैं।
प्रकृति में जल से वाष्प बनना, वाष्प से बादल बनना तथा वर्षा के रूप में जल का जमीन पर
आना तथा इस क्रिया को दुहराते रहना ही जल चक्र कहलाता है। कभी-कभी जल की बूंँदें बादल में तैरते रहते हैं और काफी ठंडी होकर छोटे-छोटे गोले बनाता है। जब इसका आकार बड़ा हो जाता है तो यह वर्षा की बूंँदों के साथ जमीन पर गिरने लगता है। बर्फ के इन टुकड़ों को ओला कहते हैं। जलाशयों तथा महासागरों के अलावा पेड-पौधे की पत्तियों से जलवाष्प के रूप में निकलती रहती है। पत्तियों से निकलने वाली वाष्प की क्रिया को वाष्पोत्सर्जन कहते हैं।
अत्यधिक वर्षा होने से तथा ऊंँचे पर्वतों पर जमें बर्फ के पिघलने से नदियों में जल का स्तर
बढ़ जाता है और यह बढ़ते-बढ़ते बड़े क्षेत्र में फैल जाता है। यह खेतों, वनों, गाँवों को जलमग्न
कर देता है जिसे हम बाढ़ कहते हैं। बाढ़ से हमारे देश में फसलें, सम्पदा तथा मानव जीवन की
काफी क्षति होती है।
कभी-कभी वाष्पन तथा वाष्पोत्सर्जन की सामान्य प्रक्रिया के बावजूद महासागरों के ऊपर
बने बादल जिस स्थान पर आकर बरसना चाहिए, वहाँ हवा के विपरीत दिशा में चलने के कारण
वर्षा नहीं होती है। वर्षा के नहीं होने से उस क्षेत्र में सभी जलाशय सूख जाते हैं। जमीन तथा
मिट्टी सूख जाती है। वर्षा न होने की स्थिति में कुंआ का जल सूखने, चापाकल में पानी न आने
तथा बोरिंग से पानी का नहीं आना आदि समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं जिसे सुखाड़ कहते हैं।
सुखाड़ के कारण फसल नष्ट हो जाती हैं जिसका अनेक कुप्रभाव हमारे सजीव जगत पर पड़ता
है। हापरिणामस्वरूप अकाल तथा भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
वर्तमान में इसी समस्याओं से हम संसार के लोग जुझ रहे हैं या आने वाली पीढ़ी को जुझना
पड़ेगा। अत: हम और आप मिलकर जल-संग्रह करने का प्रयास करें।
जल के घटते जल-स्तर रोकने के लिए विभिन्न कदम उठाना आवश्यक है-
(क) अनावश्यक रूप से पानी को नहीं बहाना चाहिए। (ख) ज्यादा से ज्यादा पानी स्नान
और कपड़ा धोने में बर्बाद नहीं करना चाहिए। (ग) वर्षा के पानी को संग्रह करना चाहिए। (घ)
अधिक-से-अधिक पेड़-पौधे लगाना चाहिए। (ङ) वन-की कटाई पर रोक लगाना चाहिए। (च)
जलाशयों को साफ-सुथरा रखना चाहिए। (छ) वायुमंडल तथा पृथ्वी के तापमान को बढ़ने से
रोकने के उपाय करना चाहिए।
प्रदूषण का शब्दिक कार्य गंदगी होता है। प्रारंभ में जनसंख्या सीमित थी तथा प्राकृतिक
संसाधन असीमित थे। परन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि होती गई हम औद्योगिक विकास की
ओर तेजी से बढ़ने लगे। औद्योगिक तकनीक के आने से मानव की भौतिक आवश्यकताओं तथा
सुविधाओं की मांँग बढ़ी और प्राकृतिक स्रोतों का मानव द्वारा निमर्मता से शोषण किया जाने लगा और इस प्रकार प्रकृति में पारिस्थितिक असंतुलन का खतरा पैदा हो गया। यानि मानवीय
क्रिया-कलापों से पर्यावरण घटकों में अवांछित तत्वों की वृद्धि होते जा रही है। जो किसी संसाधन जैसे वायु, जल, मिट्टी इत्यादि के मुख्य वांछित तत्वों के अनुपात को असंतुलित कर देती है जिसे प्रदूषण कहा जाता है।
ऑक्सीजन मानव जीवन के लिए प्रकृति की एक महत्वपूर्ण उपहार है परन्तु आधुनिक यांत्रिक
युग में कल-कारखनों की चिमनियों से निकलनेवाली गैसों, स्वचालित वाहनों में पेट्रोल एवं डीजल
के दहन तथा मनुष्य के अन्य क्रियाकलापों के कारण वायु में धूलकण, धुओं और अनेक प्रकार की हानिकारक गैस पर्याप्त मात्रा में उपस्थित होकर उसे गंदा कर देती है। यह वायु-प्रदूषण कहलाता है। ठीक उसी प्रकार स्वच्छ जल के स्रोतों में ऐसे बाहरी पदार्थ मिल जाते हैं जो इसके गुणों में परिवर्तन लाकर इसे इस्तेमाल करनेवालों के लिए हानिकारक बना देते हैं तो वह जल-प्रदूषण कहलाता है।
इस प्रकार जब वायु, जल, मिट्टी इत्यादि में अवांछित तत्वों की वृद्धि जिसके कारण वांछित
तत्वों के अनुपात में असंतुलन पैदा हो जाते हैं तो उसे प्रदूषण कहा जाता है।
मानवीय क्रियाकलापों के कारण वायु में जब सल्फर डाइऑक्साइड के साथ-साथ नाइट्रोजन
के ऑक्साइड बनते हैं। वायु में ये जलवाष्म से अभिक्रिया कर सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल बनाती है। ये वर्षा को अम्लीय बनाकर पृथ्वी पर बरस जाती है जिसे हम अम्ल वर्षा कहते हैं।
अम्ल वर्षा से फसलों की पत्तियाँ जल जाती हैं तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर काफी प्रभाव
पड़ता है। ताजमहल के आस-पास मथुरा में तेलशोधक कारखाना है जिससे प्रतिदिन 25-30 टन
सल्फर डाइऑक्साइड वायुमंडल को प्राप्त होता है। ताजमहल संगमरमर तथा चूना-पत्थर का बना हुआ है। वहाँ के वायुमंडल में SO2 की अत्यधिक मात्रा उपस्थित होने के कारण वर्षा जल के रूप में ताजमहल पर गिरती है और ताजमहल की दीवार एवं गुम्बज का क्षरण कर रहा है। इसकी सफेदी फीकी पड़ रही है। अम्ल वर्षा से सबसे अधिक क्षति स्वीडन की 20 हजार झीलों को हुई जिनकी सारी मछलियाँ मर गई। इसी तरह जर्मनी के जंगलों को अम्ल वर्षा से अपार क्षति पहुंँची है। इस अम्ल वर्षा के प्रभाव होते हैं जो सजीव तथा निर्जीव जगत के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं।
जल प्रदूषण रोकने के उपाय-
(i) गाँव एवं शहरों की नालियों के गंदे जल को तालाबों, नदियों आदि में न गिराना । (ii)
खाद्य पदार्थों के कचरों, कागज के टुकड़े, प्लास्टिक के थैले तथा उससे बनी चीजें सड़क के
कूड़े-करकट को जल स्रोतों में न फेंकना । (iii) जल-स्रोतों के नजदीक मल-मूत्र न त्यागना ।
(iv) औद्योगिक कचड़े को जल-स्रोत में न गिराना । (v) मानवीय लाश या मृत जानवर को
जल-स्रोत में न बहाना । (vi) कम से कम उर्वरक तथा कीटनाशक का फसल उत्पादन में प्रयोग इत्यादि ।
वायु-प्रदूष्ण को रोकने के उपाय-
(i) वाहनों को अच्छी हालात में रखने से । (ii) ईंधन रहित वाहन चलाने से । (iii) घरों में धुआँ
रहित चूल्हा प्रयोग करने से। (iv) सौर ऊर्जा के प्रयोग से । (v) पवन ऊर्जा के प्रयोग से । (vi)
ज्वारीय ऊर्जा के प्रयोग से । (vii) इंजन में ऐसी व्यवस्था ताकि ईंधन का पूर्णत: दहन हो सके । (viii) गाड़ियों में उत्प्रेरक परिवर्तन लगाने से। (ix) अधिक-से-अधिक पेड़-पौधे लगाकर इत्यादि ।
                                                       अभ्यास
1. प्रदूषण क्या है ?
उत्तर-प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ गंदगी होता है। प्रारंभ में जनसंख्या सीमित थी तथा
प्राकृतिक संसाधन असीमित थे। परन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि होती गई हम औद्योगिक
विकास की ओर तेजी से बढ़ने लगे। औद्योगिक तकनीक के आने से मानव की भौतिक
आवश्यकताओं तथा सुविधाओं की मांग बढ़ी और प्राकृतिक स्रोतों का मानव द्वारा निर्ममता से
शोषण किया जाने लगा और इस प्रकार प्रकृति में पारिस्थितिक असंतुलन का खतरा पैदा हो गया। यानि मानवीय क्रिया-कलापों से पर्यावरणीय घटकों में अवांछित तत्वों की वृद्धि होते जा रही है जो किसी संसाधन जैसे वायु, जल, मिट्टी इत्यादि के मुख्य वांछित तत्वों के अनुपात को असंतुलित कर देता है जिसे प्रदूषण कहा जाता है।
ऑक्सीजन मानव जीवन के लिए प्रकृति की एक महत्वपूर्ण उपहार है परन्तु आधुनिक यांत्रिक
युग में कल-कारखानों की चिमनियों से निकलनेवाली गैसों, स्वचालित वाहनों में पेट्रोल एवं डीजल के दहन तथा मनुष्य के अन्य क्रियाकलापों के कारण वायु में धूलकण, धुआँ और अनेक प्रकार की हानिकारक गैसें पर्याप्त मात्रा में उपस्थित होकर उसे गंदा कर देती है। यह वायु-प्रदूषण कहलाता
है। ठीक उसी प्रकार स्वच्छ जल के स्रोतों में ऐसे बाहरी पदार्थ मिल जाते हैं जो इसके गुणों में परिवर्तन लाकर इसे इस्तेमाल करनेवालों के लिए हानिकारक बना देते हैं तो वह जल प्रदूषण कहलाता है।
इस प्रकार जब वायु, जल, मिट्टी इत्यादि में अवांछित तत्वों की वृद्धि जिसके कारण वांछित
तत्वों के अनुपात में असंतुलन पैदा हो जाते हैं तो उसे प्रदूषण कहा जाता है।
2. क्या स्वच्छ पारदर्शी जल सदैव पीने लायक है? इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-जल में आवश्यकता से अधिक खनिज पदार्थ, लवण, कार्बनिक और अकार्बनिक
पदार्थ, कल-कारखाने से निकले कचरे, मलमूत्र, कूड़ा-करकट इत्यादि के मिल जाने से जल के
लाभदायक गुण नष्ट हो जाते हैं और वह पीने योग्य नहीं रह जाता है। ऐसा जल प्रदूषित जल
कहलाता है। जल स्रोतों में मल-मूत्र बहाने, कचरे बहाने, पशुओं के स्नान करने, लाशें बहाने या
अस्थि-विसर्जन करने से जल प्रदूषित हो जाते हैं। जल एक अच्छा घोलक है जिसके कारण
धात्विक पदार्थ भी इसमें मिले रहते हैं जैसे सीसा, मरकरी, कैडमियम, आर्सेनिक इत्यादि जल को प्रदूषित कर देते हैं। इस प्रकार कुछ ऐसे प्रदूषक हैं जो जल में घुले होते हैं। फिर भी जल स्वच्छ तथा पारदर्शी दिखता है। लेकिन उस जल के पीने से अनेक बीमारियां हो जाती हैं। कुल ऐसे सूक्ष्म जीवाणु इस्सेरेचिया कोलाई, कोलीफार्म, मल स्ट्रेण्टोकोकाई इत्यादि जल में घुले होते हैं जो दिखते नहीं हैं तथा जल स्वच्छ पादर्शी दिखता है। पन्तु ये पीने लायक नहीं होते हैं।
3. क्या आपके आस-पास स्वच्छ जल की आपूर्ति हो रही है ? इस पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-नहीं, हमारे आस-पास स्वच्छ जल की आपूर्ति नहीं हो रही है। क्योंकि हमारे
आस-पास कुछ कुएँ, कुछ चापाकल तो जानवरों के लिए नदी इत्यादि जल के स्रोत हैं। इन स्रोतों
में से कुछ कुएंँ तथा चापाकलों के पानी सम्भवतः ठीक है परन्तु कुछ चापाकलों का पानी आमतौर पर खराब है यानि इसमें आयरन तथा आर्सेनिक की मात्रा अत्यधिक है। क्योंकि जब इसके पानी से सफेद कपड़ा धोते हैं तो वह पीला हो जाता है। उस पानी को बाल्टी या लोटा या किसी बर्तन में रखने पर बर्तन पीला हो जाता है। इतना ही नहीं इस पानी को लगातार सेवन करने से दाँत तथा जीभ काला पड़ने लगता है। ये चापाकलों में कुछ सरकार द्वारा लगाया है तो कुछ लोग अपने लगा रखें हैं, कुछ कुएँ से पीते हैं। लेकिन सभी चापाकल को लगाने से पहले या बाद पानी की जांँच नहीं किया गया है। 2-4 महीने पहले सभी जल स्रोतों के जल की जाँच कर खराब पानी देने वाले को चिह्नित किया गया है। परन्तु इसे बंद करके दूसरी व्यवस्था नहीं की गई है।
4. शुद्ध वायु और प्रदूषित वायु में क्या अंतर है?
उत्तर-शुद्ध वायु तथा प्रदूषित वायु में निम्नलिखित अंतर होते हैं-
5. अम्ल वर्षा कैसे होती है ? टिप्पणी कीजिए इसके प्रभाव की चर्चा कीजिए।
उत्तर-मानवीय क्रिया-कलापों के कारण वायु में जब सल्फर डाइऑक्साइड के साथ-साथ
नाइट्रोजन के ऑक्साइड बनते हैं। वायु में ये जलवाष्प से अभिक्रिया कर सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल बनाती है। ये वर्षा को अम्लीय बनाकर पृथ्वी पर बरस जाती है जिसे हम अम्ल
वर्षा कहते हैं।
अम्ल वर्षा से फसलों की पत्तियाँ जल जाती हैं तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर काफी प्रभाव
पड़ता है। ताजमहल के आस-पास मथुरा में तेलशोधक कारखाना है। जिससे प्रतिदिन 25-30 टन सल्फर डाइऑक्साइड वायुमंडल को प्राप्त होता है। ताजमहल संगमरमर तथा चूना-पत्थर का बना हुआ है। वहाँ के वायुमंडल में SO2 की अत्यधिक मात्रा उपस्थित होने के कारण वर्षा जल के रूप
में ताजमहल पर गिरती है और ताजमहल की दीवार एवं गुम्बज का क्षरण कर रहा है। इसकी सफेदी फीकी पड़ रही है। अम्ल वर्षा से सबसे अधिक क्षति स्वीडन की 20 हजार झीलों को हुई जिनकी सारी मछलियाँ मर गई। इसी तरह जर्मनी के जंगलों को अम्ल वर्षा से अपार क्षति पहुँची है। इस अम्ल वर्षा के प्रभाव होते हैं जो सजीव तथा निर्जीव जगत के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं।
6. निम्नलिखित में से कौन-सी पौध घर गैस है।
(क) कार्बन डाइऑक्साइड (ख) सल्फर डाइऑक्साइड (ग) मिथेन (घ) नाइट्रोजन
उत्तर-(क) कार्बन डाइऑक्साइड
7. ताजमहल की सुन्दरता को ग्रहण लग रहा है। इस पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-मुमताज की याद (प्यार का प्रतीक) में ताजमहल का निर्माण आगरा में मुगल शासक
ने किया। ताजमहल की ख्याति दुनिया में विख्यात है। इसकी सुन्दरता का वर्णन दो-चार दस पंक्तियों में नहीं किया जा सकता है। इसकी सुन्दरता को आप इस बात से समझ सकते हैं कि इसे दुनिया का 7वाँ आश्चर्यजनक महल माना जा रहा है। इसको सुन्दरता पर खरोच लगाने या ग्रहण लगाने के लिए 1973 में बढ़ती मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मथुरा में तेल-शोधक कारखाना लगवाया गया जिससे प्रतिदिन 20-25 टन सल्फर डाइऑक्साइड वायुमंडल को प्राप्त होता है जो अम्लीय वर्षा का मुख्य घटक होता है। अम्लीय वर्षा इसके दीवार तथा गुम्बज का क्षरण कर रही है तथा इसकी सफेदी को धीरे-धीरे खत्म कर रही है जिसे वैज्ञानिकों ने संगमरमर कैंसर नाम दिया है। इस प्रकार वर्तमान में हम कह सकते हैं कि ताजमहल की सुन्दरता पर ग्रहण लग रहा है।
8. जल की उपयोगिता बताइए इसका शुद्धीकरण कैसे किया जाता है ?
उत्तर-
                                “पंच तत्व मिल बना शरीरा।”
                            क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा।”
यानि यह शरीर पांँच तत्वों से मिलकर बना है जिसमें जल भी एक है। “जल ही जीवन
है।” इससे यह साबित होता है कि सजीव जगत के जीवन का हर क्रियकलाप जल पर निर्भर
करता है। जल की उपयोगिता को इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है।
(i) शौच तथा हाथ-मुँह धोने में। (ii) स्नान करने में। (iii) खाना बनाने में। (iv) पीने
के लिए। (v) पेड़-पौधे के विकास के लिए । (vi) जीव-जन्तु को जीवन जीने के लिए । (vii)
सिंचाई के लिए इत्यादि।
जल का शुद्धिकरण करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं।
(i) उबालकर, (ii) छानकर, (iii) ब्लीचिंग पाउडर मिलाकर, (iv) फिटकिरी से इत्यादि ।
9. यदि हम प्रदूषित जल पीयें तो क्या होगा?
उत्तर-प्रदूषित जल पीने से पेट की बीमारी जैसे हैजा, पेचिस आदि होती है। जल एक अच्छा
घोलक होता है। प्रदूषित जल में कई प्रकार के धात्विक पदार्थों जैसे सीसा, मरकरी, कैडमियम,
आर्सेनिक उपस्थित होते हैं। जल में उपस्थित सीसा तथा मरकरी एन्जाइम से अभिक्रिया कर
एन्जाइम की कार्यक्षमता को कम करते हैं जिससे कई बीमारियाँ होती हैं। सीसा तंत्रिका तंत्र,
कैडमियम से इटाई-इटाई रोग उत्पन्न होता है, मरकरी से मिनिमाटा रोग होता है। इस प्रकार
प्रदूषित जल पीने से अनेकों बीमारियाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हो सकते हैं।
10. सही कथन पर (T) तथा गलत कथन पर (F) लगाइए।
(क) संसार की 25% जनसंख्या को निरापद पेयजल नहीं मिला।
(ख) गर्म जल भी एक प्रदूषक होता है।
(ग) जुलाई माह में प्रतिवर्ष वन महोत्सव मनाया जाता है।
(घ) अम्लीय वर्षा खेतों की मिट्टी को प्रभावित करता है।
उत्तर-(क) T, (ख) F, (ग) T, (घ) T।
11. वायु प्रदूषण रोकने के उपाय बताइए।
उत्तर-वायु-प्रदूषण को रोकने के उपाय-
(i) वाहनों को अच्छी हालात में रखने से। (ii) ईंधन रहित वाहन चलाने से। (iii) घरों में
धुआँ रहित चूल्हा प्रयोग करने से। (iv) सौर ऊर्जा के प्रयोग से। (v) पवन ऊर्जा के प्रयोग से।
(vi) ज्वारीय ऊर्जा के प्रयोग से । (vii) इंजन में ऐसी व्यवस्था ताकि ईंधन का पूर्णत: दहन हो सके। (viii) गाड़ियों में उत्प्रेरक परिवर्त लगाने से। (ix) अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाकर इत्यादि ।
12. रेखाचित्र द्वारा पौध घर प्रभाव को दर्शाइए।
उत्तर-
13. कणिकाओं द्वारा होने वाले प्रदूषण का चचा कााजए।
उत्तर-वायुमंडल में अनेकों गैसों के अलावे भी कुल ऐसे ठोस पदार्थ भी होते हैं जो इन गैसों में मिलकर तैरते रहते हैं। ये कणिकाएँ कहलाती हैं। इन कणिकाओं का व्यास 0.02 से 100 माइक्रोमीटर तक रहता है। इनका अत्यधिक समय तक वायु में निलम्बित रहने से दृश्यता को हटाते हैं। धुंँध पैदा करते हैं। ये इस्पात निर्माण, खनन, ताप विद्युत संयंत्रों से, सीमेन्ट उद्योग से निकले प्रदूषक है।
14. भोपाल गैस काण्ड क्या है?
उत्तर-कीटनाशक दवा बनानेवाली यूनियन कार्बाइड फैक्टरी मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित
है। 2 और 3 दिसम्बर, 1984 की मध्यरात्रि में एक ऐसी घटना घटी जो औद्योगिक विकास
के चेहरे पर गहरी कालिख पोत गया। इस फैक्टरी से मिथाइल आइसो साइनेट (MIC) नामक
द्रव ताप बढ़ जाने से गैस में परिणत हो गया और इसका रिसाव शुरू हुआ। यह जहरीली गैस
साँस के साथ फेफड़ों में गई। फेफड़ों में पानी भर गया । साँस फूली और फिर छूट गई। हजारों
लोग सदा के लिए सो गए। हजारों अपंग होकर आज भी कष्टदायक जीवन व्यतीत कर रहे हैं
जिसे सारी दुनिया “भोपाल गैस काण्ड” के नाम से जानते हैं।
15. पृथ्वी को बचाने के लिए पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है। इस पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-पर्यावरण संरक्षण, पृथ्वी को बचाने के लिए अति आवश्यक है। प्रारंभ में जनसंख्या
सीमित थी तथा प्राकृतिक संसाधन असीमित थे परन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि होती गई।
हम औद्योगिक विकास की ओर तेजी से बढ़ने लगे। औद्योगिक तकनीक के आने से मानव की
भौतिक आवश्यकताओं तथा सुविधाओं की मांग बढ़ी और प्राकृतिक स्रोतों का मानव द्वारा निर्ममता से शोषण किया जाने लगा। इस प्रकार प्रकृति में असंतुलन की स्थिति पैदा हो गयी। यानि मानवीय क्रिया-कलापों से पर्यावरणीय घटकों में अवांछित तत्वों की वृद्धि ही जारी है जो किसी न किसी संसाधन जैसे वायु, जल, मिट्टी इत्यादि के मुख्य वांछित तत्वों के अनुपात को असंतुलित कर देती है जिसे प्रदूषण कहा जाता है। जब-जब पर्यावरण असंतुलित हुआ है तब-तब कोई-न-कोई प्राकृतिक आपदाएंँ आई हैं। जैसे बहुत ज्यादा गर्मी पड़ना, बहुत अधिक ठंड पड़ना, बहुत कम वर्षा होना या बहुत अधिक वर्षा होना । बाढ़ आना, सूखा पड़ना सुनामी आना इत्यादि घटनाएँ मानव तथा सजीव-निर्जीव जगत को भारी क्षति पहुंचाते आया है। इतना ही नहीं पर्यावरण असंतुलन के कारण ही मानव में इतनी सारी भयानक बीमारी हो रही है।
इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण पृथ्वी को बचाने के लिए आवश्यक है। समय रहते हम मानव
यदि सचेत नहीं हुए तो प्राकृतिक आपदाएँ एक दिन मानव जीवन की लीला को समाप्त कर देगी।
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